कान का बहरापन कम सुनाई देना के उपचार

 


जब कान (Ear) की वायु शब्दवाही स्रोतों को रोक देती है, तो व्यक्ति को बहरेपन (Deafness) की शिकायत होने लगती है. इस बीमारी (Disease) में सुनने की क्षमता कम या बिल्कुल समाप्त हो जाती है. बहरापन तीन प्रकार का होता है. ऊंचा सुनाई देना, कठिनता से सुनना और बिल्कुल न सुनना. वृद्धों का तथा पुराना बहरापन असाध्य होता है. यानी इसे ठीक करना बहुत मुश्किल होता है.

कान के मध्य या भीतरी भाग में सूजन तथा फोड़े के कारण या कानों में जीव-जंतुओं के चले जाने से बहरापन आ सकता है. कई बीमारियों के दुष्परिणामस्वरूप भी बहरापन होने की संभावना रहती है, जैसे- खसरा, टायफॉइड, मम्प्स, सिफिलिस आदि. बहरापन आनुवंशिक भी होता है, जो चार-छह महीने के बाद बच्चे में दिखाई देने लगता है. कान में पानी जाने या कान बह रहा हो, फिर भी उसका इलाज न कराने से बहरापन आ जाता है. किसी आघात से, भयंकर विस्फोटों या धमाकों के कारण भी बहरापन आ सकता है.

जब बच्चा साल-डेढ़ साल का हो जाने पर मां-पापा जैसे सामान्य शब्द भी न बोल पाए, तो किसी कान के विशेषज्ञ यानी ईएनटी डॉक्टर से बच्चे में बहरेपन की जांच ज़रूर करा लेनी चाहिए, क्योंकि अक्सर बहरेपन के कारण ही बच्चा न तो बोल पाता है और न ही कोई प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाता है.

* सप्ताह में एक बार कानों में शुद्ध सरसों का तेल हल्का गुनगुना करके डालना फ़ायदेमंद होता है. इससे बहरापन दूर होता है.

* ताज़ा मूली का रस, सरसों का तेल और शहद तीनों बराबर मात्रा में लेकर अच्छी तरह से मिला लें. इसकी दो से चार बूंद दिन में चार बार कान में डालने से श्रवण शक्ति बढ़ती है.

* बहरापन होने पर नियमित रूप से कुछ दिनों तक तुलसी के पत्तों का रस निकालकर हल्का गर्म करके कान में डालना चाहिए.

* सोंठ, गुड़ और घी खाने से कम सुनने में लाभ होता है और कान की सांय-सांय की आवाज़ भी बंद होती है.

* 4-5 बूंद सरसों का तेल कान में डालनेे से कम सुनाई पड़ने की शिकायत दूर हो जाती है.

* अदरक के रस और शहद में थोड़ा-सानमक मिलाकर 2-4 बूंद कान में डालें, अवश्य फ़ायदा करेगा.

* बहरेपन की स्थिति में नियमित रूप से दालचीनी का तेल रात को सोते समय कान में डालें. कुछ ही दिनों में लाभ होगा.

* लहसुन की 3-4 कलियां कूटी हुई, एक टेबलस्पून जैतून का तेल व आधा टीस्पून प्याज़ का रस लें. एक कप मेें जैतून का तेल डालकर उसमें प्याज़ का रस व लहसुन की कलियां डालकर अच्छी तरह से मिला लें. इस मिश्रण को दोनों कानों में 3-4 बूंद डालकर रूई से ढंक दें.

* अखरोट या कड़वे बादाम तेल की कुछ बूंदें कान में डालने से भी सुनने की क्षमता बढ़ती है.

* दूध में थोड़ा-सा हींग मिलाकर कान में कुछ बूंद डालने से फ़ायदा होता है.

* 25 ग्राम गुड़ में एक चम्मच सोंठ मिलाकर क़रीब चार महीने तक नियमित रूप से लेने से बहरेपन की शिकायत दूर होती है.

* हर रोज़ एक ग्लास गर्म पानी में एक चम्मच सेब का सिरका और एक चम्मच शहद मिलाकर दो बार पीएं, इससे सुनने की क्षमता बढ़ेगी.

* सरसों के तेल में कुछ दाने धनिया के डालकर पकाएं. जब आधा रह जाए, तब इसे छानकर दो-दो बूंद कान में डालें. लाभ होगा.

* बारीक़ पिसा हुआ सुहागा कान में डालकर उसके ऊपर 5-6 बूंद नींबू का रस डालने से कान के भीतर गैस उत्पन्न होगी और मैल फूलकर बाहर आ जाएगी. इससे कान का परदा साफ़ हो जाएगा और सुनाई देने लगेगा.

*यदि आप संगीत सुनने का शौक रखते हैं और अक्सर इसे सुनने के लिए ईयर फोन का प्रयोग करने हैं, तो ध्यान रखें कि 2 घंटे से अधि‍क समय तक तेज आवाज को न सुनें। यह आपके कानों को क्षति पहुंचा सकता है।  

*अपना ईयर फोन किसी और को प्रयोग न करने दें और ना ही किसी और का ईयर फोन खुद इस्तेमाल करें। यह आपके कानों में बैक्टीरियल इंफेक्शन या अन्य समस्या की रिस्क को कम करेगा।

*धूम्रपान - अत्यधि‍क धूम्रपान करना आपकी सुनने की क्षमता को कम कर सकता है। इससे बचने के लिए बेहतर होगा कि आप धूम्रपान की आदत कम कर दें या छोड़ ही दें।  

*अगर आप तैरने का शौक रखते हैं तो हर बार तैरने के बाद अपने कानों को ठीक तरीके से पोंछें और साफ करें। कानों में गीलापन बने रहने पर बैक्टीरिया पनपने का खतरा अधि‍क होता है जो सुनने की क्षमता कम कर सकता है।


हथेली और तलवों मे पसीना आने के उपचार

 


सामान्यत: शरीर के कुछ खास अंगों में अधि‍क पसीना आता है लेकिन हथेली और तलवों में हर किसी को पसीना नहीं आता। अगर आपको भी हथेली और पैर के तलवों में पसीना आता है, तो यह जानकारी आपके लिए है। समान्य तापमान पर भी हथेली और तलवों में पसीना आना बिल्कुल सामान्य प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह किसी स्वास्थ्य समस्या का सूचक भी हो सकता है।  

दरअसल सामान्य या कम तापमान पर भी पसीना आना, और खास तौर से हथेली व पैर के तलवों में पसीना आने की यह समस्या हाइपरहाइड्रोसिस नामक बीमारी भी हो सकती है। कभी कभार ऐसा होना सामान्य हो सकता है, लेकिन अक्सर इस तरह से पसीना आना हाइपरहाइड्रोसिस की ओर इशारा करता है। केवल हथेली या तलवे ही नहीं पूरे शरीर में अत्यधि‍क पसीना आना भी इस समस्या को दर्शाता है।
पसीना आना भले ही शरीर से अवांछित तत्वों को बाहर निकालने की प्रक्रिया है जो त्वचा और शरीर की आंतरिक सफाई का एक हिस्सा है, लेकिन दूसरी ओर अधि‍क पसीना आना आपके स्वास्थ्य को बिगाड़ भी सकता है। ज्यादा पसीना नमी पैदा करता है, और इसमें पनपने वाले बैक्टीरिया आपके स्वास्थ्य को प्रभावित करते हैं और कई बीमारियों को पैदा करने में महत्वपूर्ण भमिका निभाते हैं।
हाइपरहाइड्रोसिस का इलाज सामान्यत: स्वेद ग्रंथि के ऑपरेशन द्वारा होता है लेकिन अत्यधि‍क पसीने की परेशानी को आप कुछ हद तक कम कर सकते हैं।इसके लिए आपको ऐसे कपड़ों का चुनाव करना चाहिए जो पसीने को आसानी से सोख ले और आपकी त्वचा सांस ले सके।   
इसके अलावा हथेली और के तलवों में आने वाले पसीने से बचने के लिए उन्हें खुला रखना बेहद जरूरी है। दिनभर अगर आप ऑफिस में या बाहर, मोजे और जूतों से पैक रहते हैं, तो घर पर उन्हें पूरी तरह से खुला रखें। इसके अलावा जब भी संभव हो पैरों से जूते और मोजे निकाल दें। इससे पसीना कम आएगा और बैक्टीरिया भी नहीं पनपेंगे। 
हाथों के लिए भी खुलापन बहुत जरूरी है और इसमें लगातार हवा लगती रहे इस बात का भी ध्यान रखें। हाथों को हमेशा साफ रखें और शरीर की सफाई का भी विशेष ध्यान रखें।
प्रतिदिन नहाएं और त्वचा को अच्छी तरह से पोंछकर साफ करें, इसके बाद डिओ या अन्य उत्पादों का प्रयोग करें। हो सके तो नहाने के पानी में एंटी बैक्टीरियल लिक्विड की कुछ बूंदे डाल दें।

किडनी मे creatinine और यूरिया बढ़ जाने के आयुर्वेदिक हर्बल उपचार

 



 किडनी हमारे शरीर की सफाई करती हैं जिसमे मुख्या तौर पर ये क्रिएटिनिन और यूरिया शरीर से यूरिन के ज़रिये बाहर निकालती हैं, मगर हमारी दिनचर्या और बिगड़ती आदतो के कारण ये अपनी कार्य क्षमता खो देती हैं जिस कारण से इन ज़हरीले तत्वों को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाती और हमको भयंकर रोग लग जाते हैं। आज हम आपको बता रहे हैं कुछ ऐसे नुस्खे जिन से आपकी किडनी बिलकुल सही काम करने लग जाएगी। आप धैर्यपूर्वक इनका उपयोग करे। और दुसरो को भी बताये।

   किडनी का क्रिएटिनिन और यूरिया का लेवल अगर बढ़ जाए तो आप कुछ उपचार करे जो बिलकुल निर्दोष हैं और 90% मरीजों को फायदा देते हैं।
*चीनी और सफ़ेद नमक बिल्कुल बंद कर दे इसकी जगह शक्कर और सेंधा नमक इस्तेमाल करे।
 लौकी का जूस निकाले 5-5 पत्ते तुलसी और पोदीने के डाल कर  
सुबह खाली पेट पिए।
*100 ग्राम हरड़, 200 ग्राम बहेड़ा, और 300 ग्राम आंवला, इन सब का चूर्ण मिक्स करोगे तो ये त्रिफला चूर्ण बन जाएगा, अब इसमें 100 ग्राम गोखरू, और 300 ग्राम भूमि आंवला चूर्ण मिक्स कर ले। इस चूर्ण को 1-1 (5 gram) चम्मच सुबह शाम गुनगुने पानी के साथ ले।
*भोजन में अलसी के तेल का इस्तेमाल करे।
*इसके साथ में आप सुबह नाश्ते के पहले ज्वार का काढ़ा बना कर पिए। 10 ग्राम ज्वार को एक गिलास पानी में डाल कर उबाले आधा रहने पर इसको पिए।

*दिन में एक समय पीपल के 15 पत्ते ले इनको कूट कर 2 गिलास पानी में उबाले, आधा रहने पर इसको छान कर पिए। नाश्ते के आधे घंटे बाद ये करे।


*गेंहू के जवारो और गिलोय का रस

आवश्यक सामग्री

गेंहू के जवारे (गेंहू घास) का रस
गिलोय(अमृता) का रस।
गेंहू की घास को धरती की संजीवनी के समान कहा गया है, जिसे नियमित रूप से पीने से मरणासन्न अवस्था में पड़ा हुआ रोगी भी स्वस्थ हो जाता है। और इसमें अगर गिलोय(अमृता) का रस मिला दिया जाए तो ये मिश्रण अमृत बन जाता है। गिलोय अक्सर पार्क में या खेतो में लगी हुयी मिल जाती है।
*गेंहू के जवारों का रस 50 ग्राम और गिलोय (अमृता की एक फ़ीट लम्बी व् एक अंगुली मोटी डंडी) का रस निकालकर – दोनों का मिश्रण दिन में एक बार रोज़ाना सुबह खाली पेट निरंतर लेते रहने से डायलिसिस द्वारा रक्त चढ़ाये जाने की अवस्था में आशातीत लाभ होता है।
इसके निरंतर सेवन से कई प्रकार के कैंसर से भी मुक्ति मिलती है। रक्त में हीमोग्लोबिन और प्लेटलेट्स की मात्रा तेज़ी से बढ़ने लगती है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बहुत बढ़ जाती है। रक्त में तुरंत श्वेत कोशिकाएं (W.B.C.) बढ़ने लगती हैं। और रक्तगत बिमारियों में आशातीत सुधार होता है। तीन मास तक इस अमृतपेय को निरंतर लेते रहने से कई असाध्य बीमारियां ठीक हो जाती हैं।

आँखों  का चश्मा  हटाने का अचूक  घरेलू उपाय

इस मिश्रण को रोज़ाना ताज़ा सुबह खाली पेट थोड़ा थोड़ा घूँट घूँट करके पीना है। इसको लेने के बाद कम से कम एक घंटे तक कुछ नहीं खाएं।
* नीम गिलोय की तीन अंगुली जितनी डंठल को पानी में उबालकर, मसल छानकर पीते रहने से डायलिसिस वाले रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
*एक टाइम के भोजन में सहजन की फली नियमित खाए। और भोजन में कड़ी पत्ता ज़रूर डाले। भोजन में दही का इस्तेमाल ज़रूर करे और दही में सेंधा नमक ज़रूर डाले।
* शाम के खाने के बाद पुनर्नवा का काढ़ा बना कर पिए। 5 ग्राम पुनर्नवा एक गिलास पानी में डाल कर उबाले और आधा रहने पर इसको छान कर पी ले।

इसके साथ में आपको सुबह जल्दी उठ कर कपाल भाति प्राणायाम भी करना होगा। मगर बहुत धीमी गति से।
*ये सब करने के बाद आपको रिजल्ट एक से ३ महीने में मिल जाएगा। और हमको ज़रूर अपना रिजल्ट बताये।

*अगर आप डायलिसिस पर है तो आप प्राणायाम किसी शिक्षक की देख रेख में करे।
*इसके साथ में आपको सुबह जल्दी उठ कर कपाल भाति प्राणायाम भी करना होगा।
ये सब करने के बाद आपको रिजल्ट एक से ३ महीने में मिल जाएगा। 
*अगर आप डायलिसिस पर है तो आप प्राणायाम किसी शिक्षक की देख रेख में करे
*जिन लोगो का dialyasis चल रहा हैं वह भी ये प्रयोग कर सकते हैं। मगर सिर्फ डॉक्टर या वैद जी से संपर्क करने के बाद। अन्यथा नुक्सान भी हो सकता हैं।
*नीम और पीपल की छाल का काढ़ा
आवश्यक सामग्री।
नीम की छाल – 10 ग्राम
पीपल की छाल – 10 ग्राम
3 गिलास पानी में 10 ग्राम नीम की छाल और 10 ग्राम पीपल की छाल लेकर आधा रहने तक उबाल कर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को दिन में 3-4 भाग में बाँट कर सेवन करते रहें। इस प्रयोग से मात्र सात दिन क्रिएटिनिन का स्तर व्यवस्थित हो सकता है या प्रयाप्त लेवल तक आ सकता है।



गोखरू काँटा काढ़ा

250 ग्राम गोखरू कांटा (ये आपको पंसारी से मिल जायेगा) लेकर 4 लीटर पानी मे उबालिए जब पानी एक लीटर रह जाए तो पानी छानकर एक बोतल मे रख लीजिए और गोखरू कांटा फेंक दीजिए। इस काढे को सुबह शाम खाली पेट हल्का सा गुनगुना करके 100 ग्राम के करीब पीजिए। शाम को खाली पेट का मतलब है दोपहर के भोजन के 5, 6 घंटे के बाद। काढ़ा पीने के एक घंटे के बाद ही कुछ खाइए और अपनी पहले की दवाई ख़ान पान का रूटीन पूर्ववत ही रखिए।
    15 दिन के अंदर यदि आपके अंदर अभूतपूर्व परिवर्तन हो जाए तो डॉक्टर की सलाह लेकर दवा बंद कर दीजिए। जैसे जैसे आपके अंदर सुधार होगा काढे की मात्रा कम कर सकते है या दो बार की बजाए एक बार भी कर सकते है।
ज़रूरत के अनुसार ये प्रयोग एक हफ्ते से 3 महीने तक किया जा सकता है। मगर इसके रिजल्ट १५ दिन में ही मिलने लग जाते हैं। अगर कोई रिजल्ट ना आये तो बिना डॉक्टर या वैद की सलाह से इसको आगे ना बढ़ाएं।
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विशिष्ट सलाह-  



बढे हुए क्रिएटनिन  तथा यूरिया के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की कार्य क्षमता बढ़ाने में हर्बल औषधि ही  सर्वाधिक सफल होती हैं| वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -




इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-


रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl












हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl

परिणाम- क्रेयटिनिन और यूरिया  नार्मल 



 केस रिपोर्ट-

रोगी का नाम - Awdhesh 

निवासी - कानपुर 

ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट







दिनांक - 26/4/2016

Urea- 55.14   mg/dl

creatinine-13.5   mg/dl 


यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -




creatinine 1.34 mg/dl


urea 22 mg/dl 






















मिर्गी रोग का असरदार घरेलू उपाय

 


मिर्गी रोग का कारण-

मिर्गी का रोग नकारात्मक भावों के कारण उत्पन्न होता है, जैसे अधिक चिंता करना, शोक में अधिक समय तक डूबे रहना, भयग्रस्त रहना, क्रोध करना, ईर्ष्या तथा द्वेष करना आदि। इन सब भावों का दिमाग, खून के दौरे, पाचन संस्थान, मल-मूत्र संस्थान पर खराब प्रभाव पड़ता है। इसके अलावा ज्यादा हस्तमैथुन या स्त्री प्रसंग करना, अधिक शराब पीना, शक्ति से ज्यादा मानसिक परिश्रम करना, आंव, कृमि आदि की बीमारी तथा दिमाग में चोट लगना आदि कारणों से भी मिर्गी (अपस्मार) के दौरे पड़ने लगते हैं।
मिर्गी रोग का लक्षण -

मिर्गी के दौरे में व्यक्ति अचानक अकड़कर बेहोश हो जाता है। बेहोश होने से पहले रोगी को इस बात की जानकारी बिल्कुल नहीं होती कि उसको इस बीमारी का दौरा पड़ने वाला है। वह चलते-फिरते, बातें करते-करते यकायक बेहोश हो जाता हैं। उसकी गरदन अकड़ कर टेढ़ी हो जाती है, आंखें फटी-सी रह जाती हैं, मुंह से झाग निकलने लगते हैं, रोगी अपने हाथ-पैर पटकने लगता है, दांत आपस में जुड़ जाते हैं या कभी-कभी जीभ भी बाहर आ जाती है। सांस लेने में तकलीफ होती है, हृदय की धड़कन बढ़ जाती है और व्यक्ति अपनी सुध-बुध खो देता है।
मिर्गी का घरेलू उपचार-
तुलसी है रामबाण
तुलसी कई बीमारियों में रामबाण की तरह कम करता है। तुलसी में काफी मात्रा में एंटी ऑक्सीडेंट पाए जाते हैं जो मस्तिष्क में फ्री रेडिकल्स को ठीक करते हैं। रोजाना तुलसी के 20 पत्ते चबाकर खाने से रोग की गंभीरता में गिरावट देखी जाती है।तुलसी के पत्तों को पीसकर शरीर पर मलने से मिरगी के रोगी को लाभ होता है।तुलसी के पत्तों के रस में जरा सा सेंधा नमक मिलाकर 1 -1 बूंद नाक में टपकाने से मिरगी के रोगी को लाभ होता है।तुलसी की पत्तियों के साथ कपूर सुंघाने से मिर्गी के रोगी को होश आ जाता है।*करौंदे के पत्तों की चटनी नित्य खाने से अपस्मार का रोग जाता रहता है।
*एक गिलास दूध में एक चम्मच मेहंदी के पत्तों का रस मिलाकर पिलाएं।
*एक चम्मच प्याज के रस में थोड़ा सा पानी मिलाकर रोगी को नित्य पिलाएं। जब मिर्गी के दौरे पड़ने बंद हो जाएं, तो यह रस पिलाना बंद कर दें।

*रोगी यदि मिर्गी के दौरे में बेहोश हो गया हो, तो राई को पीसकर रोगी को सुंघाएं, इससे बेहोशी दूर हो जाती है।
*तुलसी के पत्तों का रस लेकर उसमें चुटकी भर सेंधा नमक मिलाकर नाक में टपकाएं।
*तुलसी का सत्त्व (रस) तथा कपूर मिलाकर सुंघाने से रोगी की चेतना लौट आती है।
*शहतूत तथा सेब के रस में जरा-सी हींग मिलाकर रोगी को देने से लाभ मिलता है।
*शरीफे के पत्तों को पीसकर उसका रस रोगी की नाक में डालें।
*आक की जड़ की छाल निकाल लें। फिर उसे बकरी के दूध में घिस लें। मिर्गी का दौरा पड़ने पर इस रस को रोगी को सुंघाएं।
रस का सेवन
शहतूत और अंगूर के रस का सेवन मिर्गी के रोगियों के लिए फायदेमंद होता है। रोजाना सुबह खाली पेट आधा किलो शहतूत और अंगूर का रस लें।नींबू के रस के साथ गोरखमुण्डी को खाने से मिर्गी के दौरे आने बन्द हो जाते हैं।प्याज के रस के साथ थोड़ा सा पानी मिलाकर सुबह पीने से मिर्गी के दौरे पड़ने बन्द हो जाते हैं।प्याज के रस के साथ थोड़ा सा पानी मिलाकर सुबह पीने से मिर्गी के दौरे पड़ने बन्द हो जाते हैं।*नीबू के रस में जरा-सी हींग डालकर रोगी के मुंह में डालें।
पेठा या कद्दू

कद्दू या पेठा सबसे कारगर घरेलू इलाज है। इसमें पाये जाने वाले पोषक तत्वों से मस्तिष्क के नाडी-रसायन संतुलित हो जाते हैं जिससे मिर्गी रोग की गंभीरता में गिरावट आ जाती है। पेठे की सब्जी भी बनाई जाती है और आप इसकी सब्जी का भी सेवन कर सकते हैं, लेकिन इसका जूस रोज़ाना पीने से काफी फायदा होता है। अगर इसका स्वाद अच्छा ना लगे तो इसमें चीनी और मुलहटी का पावडर भी मिलाया जा सकता है।
*मिर्गी के रोगी को लहसुन कुचलकर सुंघाने से होश आ जाता है।
*मिर्गी के रोग को दूर करने के लिए लहसुन घी में भूनकर खाएं।
प्रोटीन वाला भोजन
मिर्गी के रोगी को ज्यादा फैट वाला और कम कार्बोहाइड्रेड वाला डायट लेना चाहिए। मिर्गी के रोगी को प्रोटीन और विटामिन युक्त भोजन करना चाहिए।मिर्गी के रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय गुनगुने पानी के साथ त्रिफला के चूर्ण का सेवन करना चाहिए। तथा फिर सोयाबीन को दूध के साथ खाना चाहिए इसके बाद कच्ची हरे पत्तेदार सब्जियां खाने चाहिए। बकरी का दूध मिरगी के मरीजों के लिए काफी फायदेमंद होता है। 2 कप दूध में चौथाई कप मेंहदी के पत्तों का रस मिलाकर प्रतिदिन सुबह खाना खाने के 2 घंटे बाद कुछ सप्ताह तक लगातार सेवन करने से मिर्गी के रोग में लाभ मिलता है।
मिर्गी का प्राकृतिक चिकित्सा-
*रोगी का सिर सीधा करके उसके नीचे तकिया लगा दें। अब उसके पैरों के तलवों पर पानी की धार धीरे-धीरे छोड़ें।
*पैरों के नाखूनों पर तिल्ली या आंवले का तेल मलें।
*बेहोशी हटने पर रोगी के सिर के बीचोबीच तिल्ली के तेल में कपूर मिलाकर मलें।
*स्नान करते समय रोगी को नेति-क्रिया अर्थात् नाक से पानी खींचकर मुंह से निकालने के लिए कहें। इस क्रिया को दो-तीन बार करने के बाद रोगी को इस क्रिया का अभ्यास हो जाएगा तथा इस रोग में लाभ होगा।
*बाथिंग टब में रोगी को बैठाकर उसके घुटनों पर पानी की धार छोड़ें। घुटने की नसों का संबंध मस्तिष्क से भी है।
मिर्गी का आयुर्वेदिक उपचार
*रीठे को कूट-पीसकर कपड़छान कर लें। इस चूर्ण का रोज सुबह-शाम नस्य (सूंघने की क्रिया) लें। ऐसा करने से कुछ दिनों में यह रोग खत्म हो जाता है।
*5 ग्राम लहसुन तथा 10 ग्राम काले तिल को पीसकर चटनी के रूप में 20-25 दिन तक सेवन करें।
*एक चम्मच शहद में आधा चम्मच ब्राह्मी का रस मिलाकर सेवन करें।
*शतावर के चूर्ण को एक पाव दूध के साथ नित्य सेवन करें।
*मुलेठी का चूर्ण आधा चम्मच, 10 ग्राम पेठे के रस के साथ सेवन करें।
*बच का चूर्ण शहद या देसी घी के साथ चाटें।
*250 ग्राम सरसों का तेल, 250 ग्राम नीम का तेल, 250 ग्राम चिड़चिड़े का रस, 100 ग्राम ग्वार पाठे का रस। इन सबको मिलाकर धीमी आंच पर पकाएं। तेल जब चौथाई मात्रा में रह जाए, इसे उतार व छानकर शीशी में भर लें। इस तेल की नित्य मालिश करें। इससे सब प्रकार की मिर्गी रोग दूर हो जाता है।
*शोधा हुआ पारा, अभ्रक की भस्म, लोहे का सार, शोधा हुआ गंधक, शोधा हरताल तथा रसौंत। सब चीजें बराबर की मात्रा में लेकर थोड़े-से गोमूत्र में खरल करें। उसके बाद उसमें दूनी गंधक मिलाकर लोहे के बरतन में धीमी आंच पर पकाएं। लगभग दो घंटे अच्छी तरह पकने के बाद इसे उतार लें, फिर ठंडा करें। इसमें से दो रत्ती दवा प्रतिदिन खाएं। लगभग एक माह में मिर्गी की बीमारी ठीक हो जाएगी।
*स्मृतिसागर रस 125-250 मि. ग्राम तक दो बार शहद से लें।

*अश्वगन्धादि तैल नाक में सुंघाएं।
*वात कुलान्तक रस 125 मि. ग्राम वचा चूर्ण 500 मि. ग्राम के साथ मिलाकर दें।
*सहजन की छाल, नेत्रवाला, कूट, सोंठ, काली मिर्च, पीपर, हींग, सफेद जीरा, लहसुन। सभी चीजें बराबर-बराबर मात्रा में लेकर 600 ग्राम सरसों के तेल में पकाएं। जब अच्छी तरह पक कर लाल हो जाए, तो इसे आग पर से उतार लें। इस तेल को चौड़े मुंह की शीशी में भर लें। फिर उसकी नस्य लें। यह मिर्गी रोग को दूर करने की बड़ी अच्छी दवा है।

*पीपल, चित्रक, चक, सोंठ, पीपलामूल, त्रिफला, बायबिडंग, सोंठ, नमक, अजवायन, धनिया, सफ़ेद जीरा। इन सबको बराबर की मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इसमें से दो चुटकी चूर्ण प्रतिदिन पानी के साथ सेवन करें।
*दशमूल धृत 2-4 ग्राम दूध में मिलाकर दो बार लें।



आर्थराइटिस(संधिवात),गठियावात की तुरंत असर हर्बल औषधि



बलगम कफ के आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

 




बलगम (जिसे कफ के रूप में भी जाना जाता है), ज़ुकाम और अन्य ऊपरी श्वसन संक्रमण का एक आम उत्पाद है। बलगम से निपटना बहुत मुश्किल हो सकता है और ऐसा लग सकता है कि यह कभी खतम नहीं होगी। अगर आप अपने गले और नाक में बन रहे बलगम से राहत पाना चाहते हैं, तो उपचार के इन तरीकों में से कुछ की कोशिश करें।

अदरक और शहद

अदरक में ऐसे बहुत से तत्व होते हैं जो बहुत सारी बीमारियों का सामना कर सकते हैं। इसके सेवन से सर्दी खांसी में फायदा होता है और श्वसन प्रक्रिया ठीक हो जाती है। 100 ग्राम ग्राम अदरक को कूट लें। दो-तीन चम्मच शहद को उसमें मिला लें। इस पेस्ट को दो-दो चम्मच दिन में दो बार लें। समस्या दूर हो जाएगी।

गरारे

एक ग्लास गर्म पानी में एक चम्मच नमक मिलाएं। अपनी गर्दन थोड़ी सी पीछे की तरफ गिराएं और फिर इस नमक के पानी से गरारे करें। इस पानी को निगलें न। कुछ देर तक गले में रखकर गरारे करने के बाद आप निश्चित रूप से अच्छा महसूस करेंगे।

लेमन टी

नींबू में मौजूद सिट्रिक एसिड और शहद के एंटीसेप्टिक तत्व बलगम कम करने और गले का दर्द दूर करने में मदद करते हैं। ब्लैक टी बनाइये, और उसमें एक चम्मच ताजे नींबू का रस और एक चम्मच शहद का मिला दीजिए।

सफेद-मिर्च

आधी चम्मच सफेद कालीमिर्च को पीस लें। इसमें 1 चम्मच शहद मिला लें। इस मिक्सचर को 10-15 सेकेंड माइक्रोवेव करें। फिर पी लें। इसे पीते ही आपको फौरन आराम मिलेगा। बलगम से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए इस मिक्चर को एक हफ्ते तक दिन में तीन बार जरूर लें।

हाइड्रेटेड रहें:

 सभी बीमारियों की तरह, जल्दी ठीक होने के लिए हाइड्रेटेड रहना आवश्यक है। दिन भर में हर घंटे पानी पीकर अपने शरीर को बलगम बाहर निकालने में मदद करें। आप अपनी फ्लूइड (fluid) इन्टेक (intake) को सप्लीमेन्ट (supplement) करने के लिए जूस और चाय भी ले सकते हैं।

लहसुन और नींबू


लहसुन में सूजन दूर करने वाले तत्व मौजूद होते हैं और नींबू में सिट्रिक एसिड। जब दोनों का इस्तेमाल किया जाता है तो ये बलगम दूर करने में हमारी मदद करते हैं। एक कप पानी उबालें। उसमें तीन नींबू निचोड़ें। थोड़ा सा कुटा हुआ अदरक मिलाएं। साथ में आधी चम्मच काली मिर्च का पाउडर और एक चुटकी नमक। इन सब को अच्छे से मिला लें और पी लें। इससे आपको बलगम की समस्या से फौरन निजात मिल जाएगी।

बलगम को  भाप से बाहर निकालें: 

भाप आपके सीने, नाक और गले में बलगम को तोड़ने में मदद करती है जिससे आप आसानी से इसे अपने शरीर से बाहर निकाल पाते हैं। एक बर्तन में पानी उबालें और इसमें युकलिप्टुस (eucalyptus) के तेल की कुछ बूंदें मिलाएँ। अपने चेहरे को बर्तन के ऊपर रखें और कई मिनटों तक भाप लें। इसके अतिरिक्त आप बलगम को तोड़ने के लिए गर्म स्नान (shower) कर सकते हैं

हल्दी

बलगम के उपचार के लिए हल्दी सबसे अधिक प्रभाव डालने वाली चीज है। ये एंटीऑक्सीडेंट की तरह काम करती है और इसमें कर्क्यूमिन होता है जो शरीर की बहुत सारी आंतरिक और बाहरी समस्याओं में फायदा पहुंचाता है। एक ग्लास गर्म दूध में हल्की और आधा चम्मच काली मिर्च पाउडर मिलाएं। अब इसमें एक चम्मच शहद मिलाएं। बलगम को दूर करने के लिए इसे रोज पियें।

प्याज और नींबू

एक प्याज छील कर उसे पीस लें। अब एक नींबू का रस निकाल लें। इसे एक कप पानी में इन दोनों को मिलाकर दो तीन मिनट के लिए उबाल लें। आंच से उतार लें और एक चम्मच शहद मिला लें। इस मिक्सचर को एक दिन में तीन बार पियें, बलगम की समस्या दूर हो जाएगी।


अंगूर का जूस

अंगूर की प्रकृति एक्सपेक्टोरेंट होता हैं और इसलिए ये आपके फेफड़ों के लिए और बलगम दूर करने में फायदा पहुंचाता है। दो चम्मच अंगूर के जूस में दो चम्मच शहद मिला लें। इस मिक्चर को एक हफ्ते तक दिन में तीन बार लें।

प्राकृतिक जड़ी बूटियाँ खाएँ: 

मुलैठी (licorice), मेथी और चिकवीड (chickweed) जैसी जड़ी बूटियाँ खाना आपके गले से बलगम साफ करने में मदद करेगा। इन्हें अपने खाने में जोड़ें या अगर आप स्वाद को बर्दाशत कर सकते हैं, तो इन्हें कच्चा खाएँ या पानी में उबालकर इनकी चाय बनाएँ


चिकन सूप

गर्मागर्म चिकन सूप बलगम की समस्या को दूर करता है और आपकी श्वास की नली को मॉइश्चुराइज करता है। ये बलगम को पतला कर सकता है। इसलिए अपना गला साफ करने के लिे दिन में दो से तीन बार गर्म चिकन का सूप पियें। आप इसमें अलग से अदरक और लहसुन भी मिला सकते हैं, अधिक और जल्दी फायदा होगा।

गाजर

गाजर में विटामिन सी की प्रचुर मात्रा होती है। इसमें मौजूद एंटीऑक्सीडेंट तत्वों की वजह से ये आपके इम्यून सिस्टम को बढ़ाता है। इसके अलावा इसमें ऐसे बहुत से विटामिन और पोषक तत्व होते हैं जो खांसी और बलगम की समस्या को दूर करते हैं। 3-4 ताजी गाजर का जूस निकालें। उसमें थोड़ा पानी और दो-तीन चम्मच शहद मिलाएं। अच्छी तरह इस मिश्रण को मिलाएं। इस मिश्रण को एक दिन में दो से तीन बार पियें, आपकी बलगम की समस्या ठीक हो जाएगी।

डेयरी उत्पाद न खाएँ: 

सारे डेयरी प्रोडक्टस में एक विशेष प्रोटीन, कैसिइन (casein), होता है जो ठंडा करता है और आपके शरीर में और बलगम बनाता है। अनावश्यक रूप से अधिक बलगम का निर्माण रोकने के लिए, दूध, चीज़, दही या आइसक्रीम जैसे डेयरी प्रोडक्टस न खाएँ।






स्त्रियों के गुप्त रोगों की चिकित्सा,

 




स्त्रियों में योनिदोष -

यह रोग स्त्रियों को गलत तरीके से या दूषित भोजन के कारण होता है इस रोग को सूचिकावक्र योनिरोग कहते हैं।

कई बार बच्चे पैदा करने के बाद बहुत सी स्त्रियों की योनि फैल जाती है जिसे महतायोनि दोष कहते हैं।

कुछ स्त्रियों की योनि से पुरुष-सहवास के समय असाधारण रूप से पानी निकला करता है जिसमें कभी-कभी बदबू भी आती है। प्रसव के बाद दो से तीन महीने के अंदर ही स्त्री यदि पुरुष से सहवास क्रिया करती है तो स्त्रियों के योनि में रोग उत्पन्न हो जाता है जिसे त्रिमुखायोनि दोष कहते हैं।

कुछ स्त्रियों को पुरुषों के साथ सहवास क्रिया करने पर तृप्ति ही नहीं होती है। इस रोग को अत्यानन्दायोनि दोष कहते हैं।

कुछ स्त्रियां सहवास के समय में पुरुषों से पहले ही रस्खलित हो जाती है इस रोग को आनन्दचरणयोनि दोष कहते हैं।

कुछ स्त्रियां सहवास के समय में पुरुष के रस्खलित होने के बहुत देर बाद रस्खलित होती हैं ऐसे रोग को अनिचरणायोनि दोष कहते हैं।  अधिकांश महिला व पुरुष ऐसे होते हैं, जो संक्रमण के कारण इन रोगों की चपेट में आते हैं। सर्दियों की शुरुआत से ही ऐसे मरीजों की संख्या अचानक से बढ़ जाती है। सर्दियों में लोग शरीर की सफाई ठीक से नहीं रखते। कपड़े कई दिनों तक नहीं बदले जाते हैं। लोग नहाने से परहेज करते हैं। नहाने से परहेज करने और कपड़ों के लगातार न बदलने के कारण संक्रमण से फैलने वाले गुप्त रोगों की संभावना बढ़ जाती है।सर्दियों में शरीर की सफाई न रखने और नहाने से परहेज करने के कारण लोगों में गुप्त रोग की संभावना बढ़ जाती हैं।

स्त्रियों के गुप्त रोगों की चिकित्सा


गुप्तांगों के रोग-गुप्तांगों में रोग अधिकतर संक्रमण के कारण होता है: जानिये इसका इलाज


परिचय:-

गुप्तांगों में रोग अधिकतर संक्रमण के कारण होता है। वैसे देखा जाए तो गुप्तांगों में कई रोग हो सकते हैं जिनमें मुख्य दो रोग होते हैं जो इस प्रकार हैं-

आतशक (सिफलस)-

इस रोग में स्त्री-पुरुषों के गुप्तांगों (स्त्रियों में योनिद्वार तथा पुरुषों में लिंग) के पास एक छोटी सी फुंसी होकर पक जाती है तथा उसमें मवाद पड़ जाती है।

इस रोग की दूसरी अवस्था में योनि अंग सूज जाते हैं। शरीर के दूसरे अंगों पर भी लाल चकते, घाव, सूजन तथा फुंसियां हो जाती हैं।

तीसरी अवस्था में यह त्वचा तथा हडि्डयों के जोड़, हृदय तथा स्नायु संस्थान को प्रभावित कर रोगी को अन्धा, बहरा बना देता है।

इस रोग के होने का सबसे प्रमुख कारण संक्रमण होना है जो इस रोग से पीड़ित किसी रोगी के साथ संभोग या चुम्बन करने से फैलता है। इस रोग से पीड़ित रोगी जिन चीजों को इस्तेमाल करता है उस चीजों को यदि कोई स्वस्थ व्यक्ति इस्तेमाल करता है तो उसे भी यह रोग हो सकता है।

सुजाक (गिनोरिया)-


इस रोग के हो जाने पर रोगी के मूत्रमार्ग में खुजली होना, पेशाब करते हुए बहुत दर्द तथा जलन होना, पेशाब के साथ पीला पदार्थ या मवाद बाहर आना, अण्डकोष में सूजन होना आदि लक्षण पैदा हो जाते हैं।

जब यह रोग स्त्रियों को हो जाता है तो पहले उसकी योनि से पीला स्राव निकलने लगता है तथा जब वह पेशाब करती है तो उस समय बहुत तेज दर्द होता है। उसकी योनि की मांसपेशियां सूज जाती हैं। यह सूजन बढ़ते-बढ़ते गर्भाशय तक पंहुच जाती है। ऐसी अवस्था में यदि स्त्री गर्भवती होती है तो उसका गर्भपात हो सकता है। पहले यह रोग योनि तथा लिंग तक सीमित रहता है और बाद में यह शरीर के अन्य भागों में भी हो जाता है। आतशक में घाव बाहरी होते हैं तथा सुजाक में घाव आंतरिक होते हैं।

गुप्तांग रोगों का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी किसी दूसरे के साथ संभोग से दूर रहना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी-भी अपने वस्त्र तथा अपने द्वारा इस्तेमाल की गई चीजों को किसी दूसरे व्यक्ति को इस्तेमाल न करने देने चाहिए नहीं तो यह रोग दूसरे व्यक्तियों में भी फैल सकता है।इस रोग से पीड़ित रोगी को अपना भोजन दूसरों को नहीं खिलाना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को अपना उपचार करने के लिए सबसे पहले अपने शरीर के खून को शुद्ध करने तथा दूषित विष को शरीर से बाहर करने के लिए

उपवास करना बहुत जरूरी है जो आवश्यकतानुसार 7 से 14 दिन तक किया जा सकता है।गुप्तांगों के रोग से पीड़ित रोगी को रसाहार पदार्थों जैसे- पालक, सफेद पेठे का रस, हरी सब्जियों का रस, तरबूज, खीरा, गाजर, चुकन्दर का रस आदि का सेवन अधिक मात्रा में करना चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को प्रतिदिन पानी अधिक मात्रा में पीना चाहिए।

नारियल का पानी प्रतिदिन पीने से रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

इस रोग से पीड़ित रोगी को इस रोग का उपचार कराने के साथ-साथ अधिक मात्रा में फल, सलाद, अंकुरित चीजें खानी चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को गेहूं के जवारे का रस पीना चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

चौलाई के साग के पत्ते 25-25 ग्राम दिन में 2-3 बार खाने से गुप्तांग रोग से पीड़ित रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

आंवले के रस में थोड़ी सी हल्दी तथा शहद मिलाकर सेवन करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।

गुप्तांगों के रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले पेट को साफ करना चाहिए और पेट को साफ करने के लिए रोगी व्यक्ति को एनिमा क्रिया करनी चाहिए।

इस रोग से पीड़ित रोगी को नीम की पत्तियों को उबालकर उस पानी से घाव को धोना चाहिए।

इस रोग के कारण हुए घाव तथा सूजन और फुंसी वाले स्थान पर प्रतिदिन मिट्टी की पट्टी रखने से गुप्तांगों के रोग जल्दी ठीक हो जाते हैं।

प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार इस रोग से पीड़ित रोगी को गर्म कटिस्नान प्रतिदिन करने से अधिक लाभ मत हैसफेद कपड़ा, लाल कपड़ा प्रतिमास दो-चार बार होना, पेट में तकलीफ होना तथा कमर में दर्द बढ़ जाना आदि के उपचार में कच्चा पुदीना एक कट्टा लेकर दो गिलास पानी में उबालकर एक कप जूस में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर सुबह (निराहार) एक बार और रात में सोते समय दूसरी बार पी लेना चाहिए। इस प्रकार 40 दिनों तक करते रहें। पथ्य में अचार, बैंगन, मुर्गी, अंडे तथा मछली आदि का प्रयोग न करें।



स्त्रियों के इन रोगों को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार-
योनिदोष से पीड़ित रोगी स्त्री का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी स्त्री को कम से कम एक महीने तक फलों का रस पीकर उपवास रखना चाहिए तथा उपवास के समय में रोगी स्त्री को प्रतिदिन गुनगुने पानी से एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप कुछ ही दिनों में रोग ठीक हो जाता है।
योनिदोष से पीड़ित रोगी स्त्री को उपवास समाप्त करने के बाद सादे तथा पचने वाले भोजन का सेवन करना चाहिए तथा प्रतिदिन घर्षणस्नान, मेहनस्नान, सांस लेने वाले व्यायाम तथा शरीर के अन्य व्यायाम करने चाहिए तथा सुबह के समय में साफ तथा स्वच्छ जगह पर टहलना चाहिए।
योनिदोष से पीड़ित रोगी स्त्री को प्रतिदिन गुनगुने पानी में रूई को भिगोकर, इससे अपनी योनि तथा गर्भाशय को साफ करना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
योनिदोष से सम्बंधित रोग को ठीक करने के लिए धनिये का पानी, जौ का पानी, कच्चे नारियल का पानी कुछ दिनों तक स्त्रियों को पिलाना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक हो जाता है और मासिकधर्म सही समय पर होने लगता है।
कुछ दिनों तक चुकन्दर का रस कम से कम 100 मिलीलीटर दिन में दो से तीन बार पीने से स्त्रियों के योनिदोष से संबन्धित रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
योनिदोष से संबन्धित रोग से पीड़ित स्त्रियों को मिर्च-मसाले, दूषित भोजन, अधिक चाय, कॉफी, मैदे के खाद्य पदार्थ, केक, चीनी, तली-भुनी चीज तथा डिब्बा बंद खाद्य पदार्थों को सेवन नहीं करना चाहिए।
योनिदोष से संबन्धित रोग को ठीक करने के लिए स्त्री को सुबह के समय में आंवले का रस शहद में मिलाकर पीना चाहिए।
एक चम्मच तुलसी के रस में एक चम्मच शहद मिलाकर फिर उसमें एक चुटकी कालीमिर्च मिलाकर इसको दिन में दो बार प्रतिदिन चाटने से स्त्रियों के योनिदोष से संबन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।
धनिये के बीज को उबालकर फिर इसको छानकर इसके पानी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम पीने से स्त्रियों के योनिदोष से संबन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।
अदरक को पानी में उबालकर फिर इसको छानकर इसके पानी को प्रतिदिन सुबह तथा शाम पीने से स्त्रियों के योनिदोष से संबन्धित रोग को ठीक हो जाते हैं।
बथुए को उबालकर फिर इसको छानकर इसके पानी को पीने से स्त्रियों के योनिदोष से संबन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।
तुलसी की जड़ को सुखाकर पीसकर चूर्ण बना लें फिर इस चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर प्रतिदिन दिन में दो बार सेवन करने से स्त्रियों के योनिदोष से संबन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।
स्त्रियों के योनिदोष से संबन्धित रोगों को ठीक करने के लिए कई प्रकार के आसन है जिनको करने से ये रोग तुरंत ठीक हो जाते हैं। 
ये आसन इस प्रकार हैं- अर्धमत्स्येन्द्रासन, शवासन, शलभासन, पश्चिमोत्तानासन, त्रिकानासन,, बज्रासन, भुजंगासन तथा योगनिद्रा आदि।
योनिदोष से संबन्धित रोगों को ठीक करने के लिए स्त्रियों के पेड़ू पर मिट्टी की गीली पट्टी का लेप करना चाहिए तथा स्त्रियों को एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद स्त्री को अपने शरीर पर सूखा घर्षण करना चाहिए तथा कटिस्नान करना चाहिए फिर इसके बाद स्त्री को अपने कमर पर गीली पट्टी लपेटनी चाहिए और स्त्री को खाली पेट रहना चाहिए। इस प्रकार से रोगी का उपचार करने से योनिदोष से संबन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।



योनिदोष से संबन्धित रोग से पीड़ित स्त्री को जब योनि में जलन तथा दर्द हो रहा हो उस समय उसे कटिस्नान कराना चाहिए तथा उसके पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी लगानी चाहिए और कमर पर लाल तेल की मालिश करनी चाहिए। फिर उसकी कमर पर गीले कपड़े की पट्टी लपेटनी चाहिए। लेकिन इस उपचार को करते समय स्त्रियों को योगासन नहीं करना चाहिए।
यदि रोगी स्त्री का मासिकस्राव आना बंद हो गया हो तो रोगी स्त्री को सुबह के समय में गर्म पानी से कटिस्नान करना चाहिए तथा रात को सोते समय एक बार फिर से कटिस्नान करना चाहिए। फिर रोगी स्त्री को दूसरे दिन गर्म तथा ठंडे पानी में बारी-बारी से सिट्ज बाथ कम से कम दो बार कराना चाहिए। इस प्रकार से प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कम से कम एक महीने तक करने से योनिदोष से संबन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।
यदि स्त्री को योनि में तेज दर्द है तो रोगी स्त्री को सुबह के समय में गर्म पानी में कटिस्नान और रात को सोने से पहले एक बार गर्म तथा दूसरी बार ठंडे पानी से कटिस्नान करना चाहिए। जिसके फलस्वरूप योनिदोष से संबन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।
स्त्री को यदि योनि में तेज दर्द हो रहा हो तो अजवायन का पाउडर बनाकर, एक चम्मच पाउडर गर्म दूध में मिलाकर प्रतिदिन दिन अजवायन का पाउडर बनाकर, एक चम्मच पाउडर गर्म दूध में मिलाकर प्रतिदिन दिन में दो बार रोगी स्त्री को सेवन करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
तुलसी की पत्तियां सभी प्रकार के मासिकधर्म के रोगों को ठीक कर सकती हैं। इसलिए योनिदोष से संबन्धित रोग से पीड़ित रोगी स्त्री को प्रतिदिन दो चम्मच तुलसी की पत्तियों का रस पीना चाहिए। इसमें एक चम्मच शहद मिलाकर सेवन करने से रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
आधा गिलास अनार का रस प्रतिदिन सुबह के समय में नाश्ते के बाद पीने से योनिदोष से संबन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।
एक गिलास गाजर के रस में चुकन्दर का रस बराबर मात्रा में मिलाकर दो महीने तक पीने से ठीक हो जाता है ।

:तीन-तीन महीने तक मासिक धर्म का न होना तथा पेट में पीड़ा होना आदि के लिए एक कप गर्म पानी में आधा चम्मच कलौंजी का तेल और दो चम्मच शहद मिलाकर सुबह निराहार पेट रात में भोजनोपरांत सोते समय पी लेना चाहिए। इस प्रकार सेवन एक महीने तक करते रहें। आलू तथा बैंगन वर्जित हैं।
पेशाब में जलन 
मूत्र नलियों में रक्त संचार सुचारू रूप से न होना और पेशाब से रक्त का जाना आदि में एक कप मौसम्मी का जूस लेकर उसमें आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर उसका सेवन करें। सुबह एक बार और दूसरी बार रात में सोने से पूर्व। दस दिन तक इस इलाज को जारी रखिए। खाने में गर्मी पैदा करने वाली वस्तुएं, मिर्च और खट्टी वस्तुओं का उपयोग कम करना चाहिए।
बवासीर का मस्सा
*एक चम्मच सिरके में आधा चम्मच कलौंजी का तेल मिलाकर दिन में दो बार मस्से की जगह पर लगाएं।
क्या सावधानी रखें गुप्त रोग होने पर
*नहाने से परहेज न करें।
*प्रतिदिन अंत: वस्त्र व अन्य कपड़ों को बदलें।
*शौच के बाद शरीर के अंदरुनी अंगों को ठीक से साफ करें।
*पूर्व में संक्रमण से पीड़ित या एलर्जी वाले लोगों को अधिक सतर्क होने की है जरूरत।
जब त्वचा की सतह पर जलन का एहसास होता है और त्वचा को खरोंचने का मन करता है तो उस बोध को खुजली कहते हैं। खुजली के कई कारण होते हैं जैसे कि तनाव और चिंता, शुष्क त्वचा, अधिक समय तक धूप में रहना, औषधि की विपरीत प्रतिक्रिया, मच्छर या किसी और जंतु का दंश, फंफुदीय संक्रमण, अवैध यौन संबंध के कारण, संक्रमित रोग की वजह से, या त्वचा पर फुंसियाँ, सिर या शरीर के अन्य हिस्सों में जुओं की मौजूदगी इत्यादि से।
*खुजली वाली जगह पर चन्दन का तेल लगाने से काफी राहत मिलती है।
*दशांग लेप, जो आयुर्वेद की 10 जड़ी बूटियों से तैयार किया गया है, खुजली से काफी हद तक आराम दिलाता है। किसी भी प्रकार की समस्या होने पर उसे छुपाने की बजाय चिकित्सक से संपर्क करें।




आर्थराइटिस(संधिवात),गठियावात की तुरंत असर हर्बल औषधि





होम्योपैथिक औषधि Veratrum Album/ वेरेट्रम एल्बम के गुण लक्षण उपयोग

 





धुले हुए चावल के पानी की तरह पतले दस्त – 

रोगी को धुले हुए चावल के पानी की तरह के दस्त आते हैं, ऐसे निकलते हैं जैसे पिचकारी छूट रही हो। पेट में सख्त दर्द होता है, रोगी को प्यास बेहद लगती है, ठंडा पानी मांगता है। दस्त भारी-भारी होते हैं, जल्दी-जल्दी होते हैं: दस्तों के समान कय जल्दी नहीं होती। रोगी के माथे पर ठंडा पसीना आता है, रोगी अत्यन्त कमजोर हो जाता है, मुर्दे के समान बिस्तर से लग जाता है, सारा शरीर बर्फ के समान ठंडा हो जाता है, रोगी को ऐसा लगता है मानो सिर पर बर्फ़ का टुकड़ा रखा हुआ है। यह ठंडक हैजे के रोगियों में पायी जाती है, हैजे की तीनों दवाओं-कैम्फर, वेरेट्रम, क्यूप्रम-में भी पायी जाती है, परन्तु जैसा हमने ऊपर लिखा, इतनी ठंड लगने पर भी माथे पर ठंडा पसीना आना इस औषधि का अपना लक्षण है। कैम्फर में ठंडक का लक्षण मौजूद है, परन्तु पसीने का लक्षण नहीं है।

माथे पर ठंडा पसीना आना – 

वेरेट्रम एल्बम औषधि का सब से मुख्य-लक्षण माथे पर ठंडे पसीने का आना है। इस औषधि की हैजे में विशेष प्रसिद्धि है, परन्तु हैजे में भी इसकी प्रसिद्धि का यही कारण है कि इसका मुख्य-लक्षण- ‘माथे पर ठंडा पसीना आना’ – हैजे में मौजूद रहता है। किसी भी रोग में अगर यह लक्षण हो, तो इस औषधि को विचार-कोटि में रखना ही होगा। खांसी, दमा, हैजा, ब्रोंकाइटिस, न्यूमोनिया, टाइफॉयड, कब्ज – कोई भी रोग क्यों न हो, अगर उस में माथे पर ठंडा पसीना आने का लक्षण मौजूद है, तो इस औषधि से लाभ होगा।




इस औषधि में ठंडक आश्चर्यजनक रूप में पायी जाती है। अगर किसी रोग में यह औषधि रोग को ठीक करेगी, तो रोग के साथ ठंडक का होना अवश्य जुड़ा होगा। शरीर बिल्कुल ठंडा, शरीर से जो स्राव निकले वे ठंडे, रोगी बिल्कुल नि:सत्व, शक्तिहीन, अत्यन्त ठंडा, गर्मी का नामोनिशान नहीं, होंठ इतने ठंडे कि नीले पड़ जायें, अंगुलियां भी ठंड के कारण नीली, शरीर में रक्त इतना ठंडा मानो बर्फ का पानी नाड़ियों में दौड़ रहा हो, सिर ठंडा, हाथ-पैर इतने ठंडे मानो रोगी मरा पड़ा हो, मानो सिर पर बर्फ का टुकड़ा पड़ा हो, इस ठंडक में भी आश्चर्य की बात यह है कि माथा ठंडे पसीने से तर-शरीर के किसी अंग में गर्मी नहीं दिखाई पड़ती।

हैजे में वेरेट्रम एल्बम, कैम्फर और क्यूप्रम की तुलना – 

हम कैम्फर और क्यूप्रम के प्रकरण में लिख आये हैं कि 1831 में, जब हनीमैन 76 वर्ष के थे, युरोप में हैजे का प्रकोप हुआ। तब तक हनीमैन के सामने हैजे का कोई मरीज नहीं आया था। रोग के लक्षणों के आधार पर उन्होंने कहा कि इस रोग के लक्षण तीन औषधियों में पाये जाते हैं – कैम्फर, क्यूप्रम तथा वेरेट्रम एल्बम उनका कथन था कि हैजे के लक्षण जब पहले-पहल प्रकट हों – कय, दस्त आदि-तब सब से प्रथम औषधि कैम्फर है। इसका प्रभाव बहुत क्षणिक होता है, इसलिये शुरू-शुरू में हर पांच मिनट के अन्तर से स्पिरिट ऑफ़ कैम्फर के कुछ बून्द तब तक देते रहना चाहिये जब तक शरीर में गर्मी न आ जाय। इन तीनों औषधियों के लक्षणों की तुलना निम्न है जिस से स्पष्ट होता है कि किस औषधि में कौन-सा लक्षण सर्व-प्रधान है; हैजे के कय-दस्त आदि लक्षण तो तीनों में रहते ही हैं।

कैम्फर वेरेट्रम क्यूप्रम

मुख्यतम लक्षण शरीर का ठंडा होना है मुख्यतम लक्षण भारी-भारी दस्त कय है मुख्यतम लक्षण ऐंठन का होना है

नीला पड़ जाने का लक्षणों में दूसरा स्थान है नीला पड़ जाने का लक्षणों में दूसरा स्थान है रोगी नीला इसमें भी पड़ता है

कय-दस्त थोड़े होते हैं – इस में खुश्क हैजा होता है ठंडा पड़ जाने का लक्षणों में तीसरा स्थान है कय-दस्त इसमें भी आते है

हैजे में आर्सेनिक – 

जिन तीन औषधियों की हैजे के लक्षणों में हमने ऊपर जिक्र किया, उनके अतिरिक्त आर्सेनिक में भी हैजे के-से लक्षण हो सकते हैं। उन लक्षणों के अलावा बेचैनी और जलन-ये दो लक्षण और दो जुड़ जायें, तो आर्सेनिक का क्षेत्र आ जाता है। इस में धुले हुए चावलों के पानी के-से दस्त नहीं होते, दस्तों का रंग काला सा होता है, परिमाण थोड़ा होता है और वे बदबूदार होते हैं।

हैजे में कार्बोवेज – 




हैजे में जब कय और दस्त बन्द हो जायें, फिर भी अगर रोगी ढहता चला जाय, शक्ति क्षीण होती जाय, पेट में हवा भर जाये, रोगी मृतक समान हो जाये, मृत्यु का बर्फीला पंजा रोगी को पकड़ता दीखे, तब कार्बोवेज देना चाहिए। है, पसीना नहीं

हैजे के प्रतिरोधक के तौर पर वेरेट्रम –

 कई चिकित्सकों का कहना है कि हैजे के शुरू-शुरू के लक्षणों में ज़ब रोगी को दस्त आने लगे, कय हो, और माथे पर ठंडा पसीना आये, तब इस औषधि को ‘प्रतिरोधक’ के तौर पर देने से हैजा अपना उग्र रूप धारण नहीं करता और रोग हैजे में परिणत नहीं होता।

 हैजे के प्रतिरोधक के तौर पर कैम्फर – 

हनीमैन ने हैजे के लक्षणों की शुरूआत में कैम्फ़र को ‘प्रतिरोधक’ के तौर पर देने की सिफारिश की है। कैम्फर का विशेष-क्षेत्र सूखे हैजे (Dry cholera) में है, रोग का आक्रमण अचानक और एकदम होता है, और रोगी का बल एकदम लुप्त होता जाता है।

वेरेट्रम का पागलपन-

हर समय कुछ-न-कुछ करते रहना, कुछ नहीं तो कपड़े फाड़ देना, घुटने टेक कर घंटों प्रार्थना करना – रोगी हर समय कुछ-न-कुछ करते रहना चाहता है, अगर कुछ भी करने.को न हो, तो कपड़े ही फाड़ने लगता है, घुटने टेक कर घंटों प्रार्थना करता है, प्रार्थना भी इतनी जोर से करता है कि कई घर दूर उसकी आवाज़ सुनाई देती है। वह समझता है कि वह कोई महान् अवतार है, दुनिया को पुकार-पुकार कर कहता है कि अपने पापों का प्रायश्चित करो। बड़े-बड़े लेक्चर झाड़ता है। सोचता है कि दुनियां भस्म हो जानेवाली है। कभी-कभी गन्दे गीत गाता है, अपने को नंगा कर लेता है।

शक्ति – 6, 30, 200 (दस्तों में 6 शक्ति से नीचे मत दो)





सायटिका रोग का होम्योपैथिक इलाज

 




  सायटिका जिसे वैद्यकीय भाषा में गृध्रसी एवं बोलचाल की भाषा में अर्कुलनिसा कहते हैं। सायटिका आजकल एक सामान्य समस्या बन गई है और इस रोग की सम्भावना 40 से 50 वर्ष की उम्र में ज्यादा होती है। इसका दर्द बहुत ही परेशान करने वाला होता है और दैनिक जीवन को काफी कष्टदायी बना देता है।

कमर से संबंधित नसों में से अगर किसी एक में भी सूजन आ जाए तो पूरे पैर में असहनीय दर्द होने लगता है, जिसे गृध्रसी या सायटिका (Sciatica) कहा जाता है। यह तंत्रिकाशूल (Neuralgia) का एक प्रकार है, जो बड़ी गृघ्रसी तंत्रिका (sciatic nerve) में सर्दी लगने से या अधिक चलने से अथवा मलावरोध और गर्भ, अर्बुद (Tumour) तथा मेरुदंड (spine) की विकृतियाँ, इनमें से किसी का दबाव तंत्रिका या तंत्रिकामूलों पर पड़ने से उत्पन्न होता है। कभी-कभी यह तंत्रिकाशोथ (Neuritis) से भी होता है।

पीड़ा नितंबसंधि (Hip joint) के पीछे प्रारंभ होकर, धीरे धीरे तीव्र होती हुई, तंत्रिकामार्ग से अँगूठे तक फैलती है। घुटने और टखने के पीछे पीड़ा अधिक रहती है। पीड़ा के अतिरिक्त पैर में शून्यता (numbness) भी होती है। तीव्र रोग में असह्य पीड़ा से रोगी बिस्तरे पर पड़ा रहता है। पुराने (chronic) रोग में पैर में क्षीणता और सिकुड़न उत्पन्न होती है।

क्या हैं सायटिका रोग के कारण

सायटिका रोग के अनेक कारण है-

गठिया

वायु

उपदंश

चोट लगना

सियाटिक नर्व पर लगातार दबाव पड़ना

अस्थि मज्जा के कुछ रोग हो जाना

स्लिप डिस्क हो जाना

अधिक देर तक बैठना

अर्बुद लेम्बासेक्रल फाइब्रोसाइटिस आदि के कारण होता है।

क्या हैं सायटिका रोग के लक्षण

सायटिका रोग में नितम्बों से लेकर घुटनों के पिछले हिस्से तक और कभी-कभी एड़ी तक दर्द की एक लकीर जैसी खींची हुई मालूम पड़ती है और यह दर्द कभी-कभी हल्का एवं कभी-कभी असहनीय हो जाता है। कुछ देर बैठे रहने के बाद फिर उठने एवं चलने-फिरने पर बहुत ही तकलीफदेय एवं सुई चुभने जैसा दर्द होता है। इसी के साथ पैर में कभी-कभी झंझनाहट भी महसूस होती है। इस दर्द के कारण रोगी को बेचैनी महसूस होती है और रात में उसकी नींद भी खुल जाती है।

 सायटिका के होम्योपैथिक उपचार

एलोपैथी में जहां सायटिका दर्द का उपचार केवल दर्द निवारक दवाइयां एवं ट्रेक्शन है वहीं पर होम्यापैथी में रोगी के व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर दवाईयों का चयन किया जाता है जिससे इस समस्या का स्थाई समाधान हो जाता है। सायटिका रोग के उपचार में प्रयुक्त होने वाली औषधियां इस प्रकार हैं।

कोलोसिन्थरोगी के चिड़चिड़े स्वभाव के कारण क्रोध आ जाता हो, गृध्रसी बायी ओर का पेशियों में खिंचाव व चिरने-फाड़ने जैसा दर्द विशेषकर दबाने या गर्मी पहुंचाने से राहत मालूम हो।

नेफाइलियम

पुरानी गृध्रसी वात आराम करने से पैरों की पिंडलियों मं ऐंठन होने की अनुभूति के साथ सुन्नपन व दर्द अंगों को ऊपर की ओर खींचने एवं जांघ को उदर तक मोड़ने से राहत हो।

रसटॉक्स

ठंड व सर्द मैसम में रोग बढ़ने की प्रवृत्ति, अत्यधिक बेचैनी के साथ निरन्तर स्थिति बदलते रहने का स्वभाव, गृध्रसी वात का जो दर्द चलने-फिरने से आराम होता है एवं आराम करने से ज्यादा, साथ ही सन्धियों एवं कमर में सूजन के साथ दर्द होता हो।

ब्रायोनिया

अत्यधिक चिड़चिड़ापन, बार-बार गुस्सा आने की प्रवृत्ति, पुराने गृध्रसी वात, दोनों पैर में सूई की चुभन तथा चीड़फाड़ किए जाने जैसा दर्द हो जो चलने फिरने से बढ़ता हो एवं आराम करने से घटता हो, साथ ही पैरों के जोड़ सूजे हुए, लाल व गर्म हो, जिसमें टीस मारने जैसा जलन युक्त दर्द हो।

गुएकम

सभी तरह के वात जैसे गठिया व आमवाती दर्द जो खिंचाव के साथ फाड़ती हुई महसूस हो, टखनों मे दर्द जो ऊपर की ओर पूरे पैरों में फैल जाया करता हो, साथ ही पैरों के जोड़ सूजे हुए, दर्दनाक व दबाव के प्रति असहनीय, गर्मी बर्दास्त न हो।

लाइकोपोडियम

सायटिका जो विशेषकर दायें पैर में हो, दर्द कमर से लेकर नीचे पैर तक हो एवं पैरों में सुन्नपन व खिंचाव के साथ दर्द महसूस हो, साथ ही साथ रोगी को बहुत पुरानी वात व गैस हो व भूख की कमी महसूस हो।

आर्निका माॅन्ट

बहुत पुरानी चोट जिनके वजह से रोग प्रार्दुभाव स्थान में लाल सूजन व कुचलने जैसा दर्द हो साथ ही रोग ठंड व बरसात से बढ़े, आराम व गर्माहट से घटे।

कॉसटिकम

दाहिने पैर में रोग की शुरुआत, रोग वाली जगह का सुन्न व कड़ा होना, ऐसा मालूम होता हो कि जैसे वहां की मांसपेशियां एक साथ बंधी हुई हो साथ ही नोच-फेंकने जैसा दर्द होता रहे।

ट्यूबरकुलिनम

जिन रोगियों के वंश में टी.बी. का इतिहास हो, साथ ही उनको सायटिका दर्द भी पुराना हो। इसके अतिरिक्त बेलाडोना, जिंकमेट, लीडमपाल, फेरमफॅास, आर्सेनिक एल्बम, कैमोमिला, कैल्मिया, अमोनियम मेयोर, कॉली बाइक्रोम, नेट्रसल्फ आदि औषधियों का प्रयोग रोगी के लक्षणों के आधार पर किया जाता है।

सावधानियां

*लंबे समय तक एक ही जगह पर बैठे रहने से बचें। हर आधे-एक घंटे में कुछ देर के लिए खड़े रहने की कोशिश करें। इससे कमर की हड्डियों को आराम मिलता है।
झुककर भारी वस्तुओं को उठाने की आदत से भी बचने की कोशिश करें। इससे रीढ़ की हड्डियों के जोड़ों पर अधिक जोर पड़ता है।
*भारी वजन उठाकर लंबी दूर तय न करें। अगर ऐसा करना जरूरी हो भी तो बीच-बीच में कहीं बैठकर थोड़ी देर के लिए आराम कर लें।
*अगर आपका पेशा ऐसा हो कि आपको घंटों कुर्सी पर बैठा रहना पड़ता हो या कंप्यूटर पर काफी देर तक काम करना पड़ता हो तो कुर्सी में कमर के हिस्से पर एक छोटा सा तकिया लगा लें व सीधे बैठने की कोशिश करें।
*चिकित्सक से सलाह लेकर कमर और रीढ़ की हड्डी से संबंधित कसरत नियमित रूप से करें।
*चिकित्सक की सलाह अनुसार कमर का बेल्ट भी उपयोग कर सकते हैं। याद रखें कि लंबे समय तक बेल्ट पहनने से कमर का स्नायु तंत्र कमजोर होता है। इसलिए बेल्ट का उपयोग यदा-कदा ही करें।
*सायटिका रोग के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां व्याप्त हैं। कुछ तथाकथित चिकित्सक चीरा लगाकर गन्दा खून निकालकर सायटिका के इलाज का दावा करते हैं जो कि गलत है क्योंकि इस रोग का खून के गन्द होने से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार के इलाज से आपकी समस्या बढ़ सकती है। सायटिका रोगी को निम्न सावधानियां अपनानी चाहिए।

*रोगी को बिस्तर पर आराम करना चाहिए।

*रोगी को नियमित रूप से व्यायाम एवं टहलना चाहिए।

*रोगी को हल्का भोजन लेना चाहिए।

*अस्वास्थ्यप्रद वातावरण एव सीलनभरे गन्दे मकान में नहीं रहना चाहिए।


विशिष्ट परामर्श-  


संधिवात,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| रोगी के व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर  निर्मित औषधि से बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त गतिशीलता हासिल करते हैं| 

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