पेट की फेट कैसे कम करें

                                                 

प्रॉपर न्यूट्रिशन और सही एक्सरसाइज के मेल से फैट बर्निंग प्रोसेस हेल्दी तरीके से तेज की जा सकती है। और पेट की चर्बी कम की जा सकती है। एक महीने में पेट की चर्बी कम घटाकर कमर का घेरा 4 इंच तक कम किया जा सकता है। 
क्या आप भी अपनी पेट की चर्बी को छुपाने के लिये ढीले-ढाले कपड़े पहनकर निकलते हैं? लोग अकसर एक्सरसाइज न कर पाने के चलते बढ़े पेट को छुपाने के लिए कई पैंतरे आजमाते हैं, लेकिन आखिर आप किन-किन उपायों से और कब तक अपनी पेट की चर्बी को छुपाते फिरेंगे। अब समय आ गया है कि इस चीज़ से ना भागा जाए और इसका डट कर मुकाबला किया जाए। आप बिना एक्सरसाइज किये भी अपने पेट की चर्बी से छुटकारा पा सकते हैं। आइये जानें कैसे-
*शुगर कम कर दें
शुगर में फ्रक्टोज होता है जो पेट के चारों और फैट बढ़ाता है। कोल्ड ड्रिंक, आर्टीफीशियली फ्लेवर्ड जूस और स्वीट बेवरेज से मोटापे का खतरा 60% तक बढ़ जाता है।

*हमेशा भोजन के थोड़ी देर पहले और बाद में एक या दो कप पानी पीयें। इसके अलावा दिन में भी खूब सारा पानी पीजिये, दिन में लगभग 2 ली‍टर पानी जरुर पीजिये नहीं तो आपका शरीर बॉडी फैट बर्न नहीं कर पाता है। पर्याप्त पानी पीने से चयापचय गति बढ़ती है और भोजन ठीक से हज़म हो पाता है।
*हर रात कम से कम 6 से 8 घंटों की नींद लें। यदि इससे कम समय की नींद लेंगे तो आपका हार्मोन हमेशा ही फैट इकठ्ठा करने की स्‍थिती में रहेगा, जिससे आपका फैट घटाने का सपना भी मुश्किल होता जाएगा। साथ ही तनाव से भी दूर रहें।
*सोने से पहले कम से कम दो घंटे तक भोजन न करें। क्योंकि शरीर इस दौरान खाए भोजन को अच्छी तरह से हज़म नहीं कर पाता है। वहीं भरे पेट सोने से कुछ स्वास्थ्य समस्याएं, जैसे बेचैनी या फिर नींद आने में परेशानी आदि हो सकती हैं।

*डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएं

सोयाबीन, टोफू, नट्स जैसे फूड्स में प्रोटीन होता है। इन्हें खाने से जल्दी-जल्दी भूख नहीं लगती और कैलोरी इनटेक कम होता है। पेट के चारों ओर फैट जमा नहीं होता।खूब सारा प्रोटीन, फाइबर और अच्‍छी वसा का सेवन करें। इसका अर्थ है कि अपने आहार में खूब सारी सब्‍जियों, मेवे और लीन मीट को शामिल करें। इस प्रकार के आहार से न सिर्फ चर्बी नहीं एकत्रित होती, बल्कि सेहत भी दुरुस्त बनी रहती है। 

*डाइट में कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा कम करें

व्हाइट शुगर, व्हाइट ब्रेड, पास्ता, मैदा जैसे आइटम फैट बढ़ाते हैं। इन्हें कम खाने से पेट का फैट घटाने में काफी मदद मिलती है। हरी सब्जियां ज्यादा खाएं।
*जंक फूड, शुगर उत्‍पाद और तला-भुना आहार कम से कम खाएं। इनका सेवन कर आप कभी पतले नहीं हो सकते उल्‍टा आप मोटापे के अलावा मधुमेह और हाई बीपी जैसी बीमारियों का शिकार बन सकते हैं। साथ ही डिब्ब बंद आहार व सोड़ा आदि का सेवन न करें। 
*चर्बी कम करने के लिए आप के हेल्थ ड्रिंक भी बनाकर रोजाना पी सकते हैं। इसके लिए आप 3-4 गिलास पानी लें और उसमें 3-4 नींबू निचोड़ें, 6-7 तुलसी के पत्ते डालें। अब उसमे खीरे के कुछ टुकड़े डालें, चाहें तो एक खीरे का जूस भी उसमें मिला सकते हैं। अब इस मिश्रण को रातभर के लिए एक बर्तन में ढंक कर रखे दें। सुबह उठकर इसे पीएं। रोजाना इसी टिप को फॉलों करें। इससे ना सिर्फ पेट की चर्बी कम होगी बल्कि चेहरे पर भी जबरदस्त निखार आ जाएगा
*अपने भोजन के भाग के आकार को कम करें, फिर भले ही आपके सामने आपका पसंदीदा भोजन ही क्यों न हो। वैसे भी पेट संबंधी समस्याओं से बचने व मोटापा कम करने के लिए भूख से थोड़ा कम आहार ही लेने चाहिए। छोटे आहार लें, दिन में इस प्रकार के पांच छोटे आहार लिये जा सकते हैं। भोजन करते समय, बड़े निवाले लेने से बचें और छोटे निवाले में अपने भोजन को विभाजित करें। 
*खाने में जीरा जरूर शामिल करें क्योंकि यह पेट की चर्बी घटाने में मददगार है। इसके अलावा सेब, अनानास, खीरा और टमाटर भी पेट की अतिरिक्त चर्बी को कम करने में सहायक होते हैं। जहां अनानास में ब्रोमीलेन नामक एंजाइम होता है जो चर्बी को कम करने में मदद करता है, तो वहीं सेब के अंदर फायबर और बीटा कैरोटीन होता है जो चर्बी घटाता है।

हेल्दी ब्रेकफास्ट जरूर करें

ब्रेकफास्ट अवॉइड करने से भूख ज्यादा लगती है और वजन बढ़ता है। ओटमील, दलिया और हाई प्रोटीन वाला ब्रेकफास्ट पेट का फैट घटाने में हैल्पफुल है।
*ज्यादातर लोगों को बंदगोभी पसंद नहीं होती, लेकिन शायद लोग नहीं जानते कि बंदगोभी चर्बी को कम करने में काफी मदद करती है। अगर बंदगोभी की सब्जी पसंद नहीं है तो इसे सलाद के रूप में खाएं..रोजाना कम से कम एक बार।

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सर्दी मे सांस की तकलीफ हो तो करें ये उपाय



सर्दियों में कई तरह की बीमारियां लोगों को परेशान करती हैं। इस मौसम में सांस लेने में तकलीफ आम बीमारी है। न सिर्फ वो लोग जिन्हें अस्थमा, बोंक्राइटिस और हाइपरटेंशन जैसी बीमारियां हैं बल्कि उन्हें भी सर्दियों में सांस लेने में तकलीफ होती है, जिन्हें इस तरह की कोई बीमारी नहीं होती है।

क्यों होती है यह प्रॉब्लम

इंडियन मेडिकल असोसिएशन के वाइस प्रेजिडेंट (इलेक्ट) डॉ. के. के. अग्रवाल का कहना है कि ज्यादा ठंडी हवा से सर्दियों में सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। फॉग और स्मॉग इसका कारण है। हमारे फेफडे़ सिकुड़ जाते हैं जिस कारण हमें सांस में लेने में दिक्कत आती है। वहीं राकलैंड हॉस्पिटल में कंसल्टेंट मेडिसिन डॉ. वैभव गुप्ता का कहना है कि फेफड़ों के सिकुड़ने से ऑक्सिजन हमारे ब्लड में सही से नहीं पहंुच पाती, जिससे ऐसी समस्या होती है।

इन्हें होती है ज्यादा समस्या

- ऐसे लोग जिन्हें लगातार चेस्ट इन्फेक्शन रहता हो
- बोंक्राइटिस के मरीज
- जिन्हें अस्थमा या सांस की तकलीफ की बीमारी हो
- हाइपरटेंशन

लक्षण
- चलते वक्त या कोई भी काम करते समय सांस फूलना
- समय पर सही ट्रीटमेंट न लेने पर बैठे-बैठे भी सांस फूलने लगती है
- खांसी, बलगम
- बुखार के साथ बदन टूटना, बॉडी और सिर में दर्द होना
- छाती में जकड़न होना
- गले में दर्द होना
कैसे बचें
- ठंड में बाहर निकलने से पहले नाक और मुंह को अच्छी तरह ढंके। इससे ठंडी हवा सीधे अंदर नहीं जाएगी।इससे पॉल्यूशन से भी बचाव होगा क्योंकि हवा के साथ धूल के कण भी सांस के साथ अंदर चले जाते हैंजिससे सांस लेने में दिक्कत होती है।
- सर्दियों में भी ज्यादा से ज्यादा पानी पिएं। ठंड में हम लोग पानी कम पीते हैं जबकि यूरीन बार-बार जातेहैं जिससे इन्फेक्शन हो सकता है। पानी को गुनगुना करके पिएं तो ज्यादा बेहतर रहेगा।
- पर्सनल हाइजीन का ख्याल रखें। हर दो घंटे में हाथ और मुंह को साफ पानी से धोएं। साफ रुमाल काइस्तेमाल करें।
- बाहर का खाना खाने या ज्यादा ऑयली खाना खाने के बाद गुनगुना पानी पीएं या गुनगुने पानी में नमकडालकर गरारे करें। इससे गले में मौजूद मिट्टी या तेल के तत्व साफ हो जाएंगे।

- सुबह मॉर्निंग वॉक पर जाने से पहले खूब सारा पानी पीकर जाएं। गले, नाक और कानों को ढककर जाएं।
- अस्थमा, ब्रोंकाइटिस या सांस से जुड़ी कोई भी बीमारी है या 70 साल से ज्यादा उम्र है तो ज्यादा सुबहवॉक पर न जाएं। थोड़ी धूप निकलने के बाद ही वॉक पर निकलें।
- अस्थमा के मरीज इनहेलर साथ रखें
- ताजे फल और सलाद खाएं। विटामिन सी भरपूर मात्रा में लें जिससे इम्यूनिटी बनी रहे


कब जाएं डॉक्टर के पास

अगर कोई बीमारी नहीं है, फिर भी इस मौसम में सांस लेने में तकलीफ महसूस कर रहे हैं और घरेलू इलाजजैसे तुलसी और अदरक का काढ़ा पीना, गुनगुने पानी के गरारे, स्टीम लेने के बावजूद भी ठीक न हों तो दो से तीन दिन बाद ही डॉक्टको दिखाएं।

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कोलेस्ट्रॉल कम करने वाले भोजन पदार्थ


                                         

कोलेस्ट्रॉल एक तरह का वसायुक्त तत्व है, जिसका उत्पादन लिवर करता है। यह कोशिकाओं की दीवारों, नर्वस सिस्टम के सुरक्षा कवच और हॉर्मोस के निर्माण में अहम भूमिका निभाता है। यह प्रोटीन के साथ मिलकर लिपोप्रोटीन बनाता है, जो फैट को खून में घुलने से रोकता है। हमारे शरीर में दो तरह के कोलेस्ट्रॉल होते हैं-एचडीएल (हाई डेंसिटी लिपोप्रोटीन, अच्छा कोलेस्ट्रॉल) और एलडीएल (लो डेंसिटी लिपोप्रोटीन, बुरा कोलेस्ट्रॉल)। एचडीएल यानी अच्छा कोलेस्ट्रॉल काफी हलका होता है और यह ब्लड वेसेल्स में जमे फैट को अपने साथ बहा ले जाता है। बुरा कोलेस्ट्रॉल यानी एलडीएल ज्यादा चिपचिपा और गाढा होता है। अगर इसकी मात्रा अधिक हो तो यह ब्लड वेसेल्स और आर्टरी में की दीवारों पर जम जाता है, जिससे खून के बहाव में रुकावट आती है। इसके बढने से हार्ट अटैक, हाई ब्लडप्रेशर और ओबेसिटी जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कोलेस्ट्रॉल की जांच के लिए लिपिड प्रोफाइल नामक ब्लड टेस्ट कराया जाता है। किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में कुल कोलेस्ट्रॉल की मात्रा 200 मिग्रा./डीएल से कम, एचडीएल 60 मिग्रा./डीएल से अधिक और एलडीएल 100 मिग्रा./डीएल से कम होना चाहिए। अगर सचेत तरीके से खानपान में कुछ चीजों को शामिल किया जाए तो बढते कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित किया जा सकता है :

  लहसुन

लहसुन में कई ऐसे एंजाइम्स पाए जाते हैं, जो एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मददगार साबित होते हैं। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए शोध के अनुसार लहसुन के नियमित सेवन से एलडीएल कोलेस्ट्रॉल का स्तर 9 से 15 प्रतिशत तक घट सकता है। इसके अलावा यह हाई ब्लडप्रेशर को भी नियंत्रित करता है।

कितना खाएं : 

प्रतिदिन लहसुन की दो कलियां छीलकर खाना सेहत के लिए फायदेमंद होता है।

ध्यान रखें :

अगर लहसुन के गुणकारी तत्वों का फायदा लेना हो तो बाजार में बिकने वाले गार्लिक सप्लीमेंट्स के बजाय सुबह खाली पेट कच्चा लहसुन खाना ज्यादा अच्छा रहता है। कुछ लोगों को इससे एलर्जी होती है। अगर ऐसी समस्या हो तो लहसुन न खाएं।

 ड्राई फ्रूट्स

बादाम, अखरोट और पिस्ते में पाया जाने वाला फाइबर, ओमेगा-3 फैटी एसिड और विटमिंस बुरे कोलेस्ट्रॉल को घटाने और अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढाने में सहायक होते हैं। इनमें मौजूद फाइबर देर तक पेट भरे होने का एहसास दिलाता है। इससे व्यक्ति नुकसानदेह फैटयुक्त स्नैक्स के सेवन से बचा रहता है।
कितना खाएं : 

प्रतिदिन 5 से 10 दाने।
ध्यान रखें: 

घी-तेल में भुने नमकीन और मेवों का सेवन न करें। इससे हाई ब्लडप्रेशर की समस्या हो सकती है। बादाम-अखरोट को पानी में भिगोकर और पिस्ते को वैसे ही छील कर खाना ज्यादा फायदेमंद साबित होता है। पानी में भिगोने से बादाम-अखरोट में मौजूद फैट कम हो जाता है और इनमें विटमिन ई की मात्रा बढ जाती है। अगर अखरोट से एलर्जी हो तो इसके सेवन से बचें। शारीरिक श्रम न करने वाले लोग अधिक मात्रा में बादाम न खाएं। इससे मोटापा बढ सकता है।

सोयाबीन और दालें

सोयाबीन, दालें और अंकुरित अनाज खून में मौजूद एलडीएल कोलेस्ट्रॉल को बाहर निकालने में लिवर की मदद करते हैं। ये चीजें अच्छे कोलेस्ट्रॉल को बढाने में भी सहायक होती हैं।

कितना खाएं :

एक स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन 18 ग्राम फाइबर की जरूरत होती है। इसके लिए एक कटोरी दाल और एक कटोरी रेशेदार सब्जियों (बींस, भिंडी और पालक) के साथ वैकल्पिक रूप से स्प्राउट्स का सेवन पर्याप्त होता है। विशेषज्ञों के अनुसार प्रतिदिन सोयाबीन से बनी दो चीजों का सेवन जरूर करना चाहिए। इससे बैड कोलेस्ट्रॉल के स्तर में 5 प्रतिशत तक कटौती की जा सकती है। इसके लिए एक कटोरी उबला हुआ सोयाबीन, सोया मिल्क, दही या टोफू का सेवन किया जा सकता है।

ध्यान रखें:

यूरिक एसिड की समस्या से ग्रस्त लोगों के लिए दालों और सोयाबीन में मौजूद प्रोटीन नुकसानदेह साबित होता है। अगर आपको ऐसी समस्या हो तो इन चीजों का सेवन सीमित मात्रा में करना चाहिए।

  ओट्स

ओट्स में मौजूद बीटा ग्लूकॉन नामक गाढा चिपचिपा तत्व हमारी आंतों की सफाई करते हुए कब्ज की समस्या दूर करता है। इसकी वजह से शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल का अवशोषण नहीं हो पाता। वैज्ञानिकों द्वारा किए गए अध्ययनों से यह साबित हो चुका है कि अगर तीन महीने तक नियमित रूप से ओट्स का सेवन किया जाए तो इससे कोलेस्ट्रॉल के स्तर में 5 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।

कितना खाएं: 

एक स्वस्थ व्यक्ति को प्रतिदिन लगभग 3 ग्राम बीटा ग्लूकॉन की जरूरत होती है। अगर रोजाना एक कटोरी ओट्स या 2 स्लाइस ओट्स ब्रेड का सेवन किया जाए तो हमारे शरीर को पर्याप्त मात्रा में बीटा ग्लूकॉन मिल जाता है।

ध्यान रखें : 

ओट्स में मौजूद फाइबर और बीटा ग्लूकॉन पेट में जाकर फूलता है। इससे कुछ लोगों को गैस की समस्या हो सकती है। इसलिए जिन लोगों की पाचन शक्ति कमजोर हो, उन्हें इससे बचना चाहिए। लैक्टोज इंटॉलरेंस (दूध की एलर्जी) वाले लोगों को नमकीन ओट्स का सेवन करना चाहिए।

ऑलिव ऑयल

इसमें मौजूद मोनो अनसैचुरेटेड फैट कोलेस्ट्रॉल के स्तर को स्थिर रखने में सहायक होता है। यह ऑर्टरी की दीवारों को मजबूत बनाता है। इससे हृदय रोग की आशंका कम हो जाती है। यह हाई ब्लडप्रेशर और शुगर लेवल को भी नियंत्रित रखता है। रिसर्च से यह प्रमाणित हो चुका है कि अगर छह सप्ताह तक लगातार ऑलिव ऑयल में बना खाना खाया जाए तो इससे कोलेस्ट्रॉल के स्तर में 8 प्रतिशत तक कमी आ सकती है।

ध्यान रखें : 

कुकिंग के लिए वर्जिन ऑलिव ऑयल और सैलेड ड्रेसिंग के लिए एक्सट्रा वर्जिन ऑलिव ऑयल का इस्तेमाल करना चाहिए। कुछ लोगों को इससे एलर्जी भी होती है, अगर ऐसी समस्या हो तो इसके बजाय फलेक्स सीड या राइस ब्रैन ऑयल का सेवन किया जा सकता है। ऑलिव ऑयल हाई ब्लडप्रेशर और शुगर को नियंत्रित रखता है, लेकिन इसकी अधिक मात्रा दोनों चीजों का लेवल बहुत कम कर देती है।

 नीबू

नीबू सहित सभी खट्टे फलों में कुछ ऐसे घुलनशील फाइबर पाए जाते हैं, जो स्टमक (खाने की थैली) में ही बैड कोलेस्ट्रॉल को रक्त प्रवाह में जाने से रोक देते हैं। ऐसे फलों में मौजूद विटमिन सी रक्तवाहिका नलियों की सफाई करता है। इस तरह बैड कोलेस्ट्रॉल पाचन तंत्र के जरिये शरीर से बाहर निकल जाता है। खट्टे फलों में ऐसे एंजाइम्स पाए जाते हैं, जो मेटाबॉलिज्म की प्रक्रिया तेज करके कोलेस्ट्रॉल घटाने में सहायक होते हैं।
कितना खाएं : गुनगुने पानी के साथ सुबह खाली पेट एक नीबू के रस का सेवन करें।
ध्यान रखें : चकोतरा बुरे कोलेस्ट्रॉल को घटाने में बहुत मददगार होता है। इसलिए कुछ लोग इसे भी अपनी डाइट में शामिल करते हैं, लेकिन अगर आप पहले से कुछ दवाओं का सेवन कर रहे हैं तो इसे अपनी डाइट में शामिल करने से पहले डॉक्टर से सलाह जरूर लें क्योंकि कुछ दवाओं के साथ इसका बहुत तेजी से केमिकल रिएक्शन होता है, जिसकी वजह से हार्ट अटैक और स्ट्रोक जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

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यूनानी चिकित्सा मे डेंगू ज्वर का इलाज


डेंगी के उपचार में यूनानी पद्धति में कई प्रकार की औषधियां मौजूद हैं। इनके प्रयोग से डेंगी को जल्दी और आसानी से रोका जा सकता है। साथ ही इनका शरीर पर कोई साइड इफेक्ट्स भी नहीं पड़ता है। एमएमजी हॉस्पिटल में बीयूएमएस डिपार्टमेंट के एमडी मोहम्मद सारिक ने बताया कि यूनानी पद्धति में सभी प्रकार के सिरोटाइप के डेंगी का इलाज संभव है। इसके अलावा शरीर को डेंगी से लड़ने के लिए भी तैयार किया जा सकता है, जिससे डेंगी होगा ही नहीं।
डेंगी वायरस शरीर को कमजोर करने का कार्य करता है। वहीं यूननी दवाओं से शरीर को इस बीमारी से लड़ने के लिए पहले ही मजबूत किया जा सकता है। डॉ. मोहम्मद सारिक ने बताया कि खमीर-ए-मरवारीद मोती से बना होता है। जिसे आम दिनों में भी व्यक्ति ले सकता है। इससे शरीर इम्यूनिटी बढ़ती है और शरीर डेंगी जैसे बुखार से लड़ने के लिए भी तैयार रहता है। इसके अलावा शरीर पर नीम का तेल पर लगाकर भी मच्छरों से बचा जा सकता है।


आसान तरीके घर में ही बढ़ेगी प्लेटलेट्स 

मोहम्मद सारिक ने बताया कि डेंगी होने पर सबसे ज्यादा टेंशन प्लेटलेट्स के कम होने से होती है। कई डॉक्टर प्लेटलेट्स चढ़ाने के नाम पर मोटी फीस वसूल लेते हैं। उन्होंने बताया कि यूनानी तरीके से देशी नुस्खों से प्लेटलेट्स को बढ़ाया जा सकता है। डेंगी के मरीजों के लिए गिलोई का ऐसा तना लें जिसकी मोटाई अंगूठे की मोटाई के बराबर हो। रात के समय ऐसे तने का छह इंच का टुकड़ा काट लें। इसे थोड़ा मुलायम कर लें। आधे गिलास पानी में इस टुकड़े को भीगने दें। इसमें आधा चम्मच ऐलोवेरा का रस डाल दें। साथ ही पपीते के बीज को पीसकर इसकी आधा चम्मच मात्रा इसमें डालें। सुबह इस पानी में मौजदू पदार्थो को हाथ से मसल दें। व छान लें। सुबह खाली पेट इस पानी का सेवन करें। लगातार इसके इस्तेमाल से प्लेटलेट्स का स्तर सामान्य बना रहेगा। इसके साथ बकरी के दूध से भी प्लेटलेट्स को बढ़ाया जा सकता है।

डेंगी होने पर इन उपचारों को करें प्रयोग 

डेंगी होने पर तुलसी के 11 पत्तों को पानी में डाल कर उसे उबाल लें। इसके बाद मरीज को इस पानी को सुबह-शाम पिला सकते हैं। इस नुस्खे को आम लोग भी अपना सकते हैं।
खाकसी के बीज शरीर पर डाले जाने से भी बुखार कंट्रोल होता है।
हब-ए-बुखार यूनानी पद्धति में डेंगी के होने पर दी जाने वाली इकलौती दवा है। इससे बुखार कंट्रोल होता है। मरीज को दो-दो गोली सुबह और शाम दी जाती है।
शरबत खाकसी डेंगी के मरीज को दिया जाने वाला सिरप है। यह सिरप मरीज को सुबह-शाम 2-2 चम्मच दिया जाता है।
कलौंजी के पाउडर से बुखार के मरीज को ताकत मिलती है। मरीज को दिन में तीन बार 3-3 ग्राम कलौंजी का पाउडर गर्म पानी के साथ देने से सेहत में जल्दी सुधार होता है।
डेंगी का इलाज यूनानी पद्धति से हो सकता है। ज्यादातर लोगों को इस बारे में जानकारी नहीं होती है। यूनानी नुस्खों से शरीर को पहले ही डेंगी से लड़ने के लिए तैयार किया जा सकता है। वहीं डेंगी होने पर घर रहकर डॉक्टर की सलाह पर दवा और नुस्खों को प्रयोग कर डेंगी को हरा सकते हैं।


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सफ़ेद मूसली के फायदे और खाने के तरीके


                                                 


 सफेद मूसली को आयुर्वेद की दुनिया में चमत्कार माना जाता है। इसे इस्तेमाल करनें से पहले आप यह जान लें कि सफेद मूसली खाने की विधि क्या है?
सफेद मूसली एक प्रकार का पौधा है, जिसके भीतर सफेद छोटे फूल मौजूद होते हैं। यह बहुत सी बिमारियों के इलाज में कारगार साबित हुआ है। इसके अलावा इसे दुसरे पदार्थों के साथ मिलाकर भी औषधि तैयार की जाती है।
मुख्य रूप से सफेद मूसली का प्रयोग सेक्स सम्बन्धी रोगों के लिए किया जाता है। मर्दों में शुक्राणुओं की कमी होनें पर इसका प्रयोग किया जाता है।
मूसली मर्दों में टेस्टोस्टेरोन नामक हार्मोन की मात्रा भी बढ़ाता है। इससे एड्रेनल नामक ग्रंथि अच्छे से कार्य करती है, जो शरीर के कई कार्यों के लिए जिम्मेदार होती है।
सफेद मूसली शरीर में विभिन्न क्रियाओं के सुचारू रूप से चलने को भी सुनिश्चित करता है। यह खून के बहने का भी संचालन करता है। इसके अलावा थकान के समय इसे लेने से थकान दूर होती है।

सफेद मूसली खाने का तरीका:

यदि आप सेक्स सम्बन्धी समस्याओं के लिए मूसली का इस्तेमाल कर रहे हैं, तो आप रोजाना सुबह और शाम में एक-एक सफेद मूसली का कैप्सूल दूध के साथ ले सकते हैं।
इसके अलावा यदि आप पाउडर के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं, तो एक बार में आप 3 से 5 ग्राम मूसली का सेवन करें।

सफेद मूसली खाने के तरीके

विभिन्न लोगों के लिए सफेद मूसली खाने के तरीके अलग-अलग होते हैं:
विभिन्न लोगों के लिए सफेद मूसली खाने का तरीका निम्न है:
छोटे बच्चे एक बार में 1 ग्राम से कम
बच्चे (13 -19 साल) 1.5 से 2 ग्राम
जवान (19 से 60 साल) 3 से 6 ग्राम
बुजुर्ग (60 साल से ज्यादा) 2 से 3 ग्राम
गर्भावस्था में 1 से 2 ग्राम
दूध पिलाने वाली माँ 1 से 2 ग्राम
अधिकतम खुराक 12 ग्राम (3-4 बार में)
कब लें: खाना खाने के 2 घंटे बाद
यदि सफेद मूसली लेते समय आपको भूख लगनी बंद हो जाती है, तो खुराक को उसे हिसाब से कम कर लें।
जैसा हमनें बताया कि सफेद मूसली को खाने का तरीका विभिन्न लोगों के लिए अलग है। कई लोग इसे जड़ी-बूटी के रूप में खाना पसंद करते हैं। कई लोग इसे मिठाई के रूप में खाते हैं, जिसे मूसली पाक भी कहते हैं।

सफेद मूसली का सेवन करें थकान और कमजोरी में

सफेद मूसली आपकी थकान और कमजोरी दूर करती है।
मूसली को शक्कर के साथ लेने से शरीर में ताकत आती है और कमजोरी दूर भागती है।
इसके लिए रोजाना दिन में दो बार सफेद मूसली को शक्कर के साथ बराबर मात्रा में लें।

सफेद मूसली का प्रयोग वजन बढ़ाने में

सफ़ेद मूसली कमजोर शरीर को पोषकता प्रदान करती है और आपका वजन बढ़ाने में मदद करती है।
यदि आप वजन बढाने की कोशिश कर रहे हैं तो मूसली के पाउडर को दूध के साथ लें।
बहुत से लोगों में मूसली को पचाने की समस्या होती है। ऐसे में आप मूसली खाने का तरीका बदल सकते हैं। आप मूसली के पाउडर की जगह मूसली का रस पी सकते हैं।
इसके अलावा मूसली के प्रभाव को कम करने के लिए आप इसके साथ शहद मिलाकर भी ले सकते हैं।

सफेद मूसली के फायदे सेक्स-सम्बन्धी रोग में

अश्वगंधा की तरह ही सफेद मूसली भी आपकी सेक्स ड्राइव को बढ़ाकर आपकी निजी जिन्दगी को बेहतर बनाती है।
यह आपके गुप्तांगों में खून की मात्रा को बढ़ाती है, जिससे आप लम्बे समय तक उत्तेजित रह सकते हैं।
सफेद मूसली मर्दों में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा को काफी हद तक बढ़ा देता है। यह हार्मोन बहुत से कार्यों में जरूरी होता है।
बेहतर परिणाम के लिए आप इसे अकरकरा के साथ लें।

सफेद मूसली शुक्राणु बढ़ाने में

शरीर में शुक्राणु की कमी से कई अन्य रोग हो सकते हैं। इसके अलावा इस स्थिति में पुरुष अपना आत्म-विश्वास खोने लगता है। ऐसे में वह कई इलाज खोजता है।
ऐसे स्थिति के लिए काफी समय से लोग सफेद मूसली का इस्तेमाल करते आये हैं।
सफ़ेद मूसली आपके शुक्राणु की मात्रा बढ़ाता है, इनकी गति तेज करता है और शुक्राणु को स्वस्थ बनाता है।

सफेद मूसली जोड़ों के दर्द में

सफ़ेद मूसली को अक्सर लोग शरीर में दर्द के लिए लेते आये हैं। इसका सेवन दर्द में, विशेषकर जोड़ों के दर्द में, बहुत लाभदायक होता है।
यदि आपको लगातार जोड़ों में दर्द है, तो आपको आर्थराइटिस हो सकता है। इसके लिए एक प्राकृतिक इलाज सफ़ेद मूसली है।
आपको बस रोजाना दूध के साथ आधा चम्मच सफेद मूसली लेना है।

सफेद मूसली से माँ का दुध बढ़ता है

सफेद मूसली गर्भावस्था में लेने से महिला के प्राकृतिक दूध की मात्रा में बढ़त होती है।
इसके लिए इसे कुछ विशेष पदार्थों जैसे, गन्ना, जीरा आदि के साथ ही लेना चाहिए।
यहाँ एक बात का ध्यान रखें कि यदि आप गर्भ से हैं, तो आपको मूसली लेने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श करना होगा। ऐसा इसलिए क्योंकि गर्भावस्था में आप पहले से ही कई दवाइयां लेते हैं, जिससे मूसली आपको नुकसान कर सकती है।

सफेद मूसली डायबिटीज में

सफेद मूसली एक बेहतरीन औषधि है। इसमें डायबिटीज से लड़ने की क्षमता होती है। यदि एक दुबले-पतले व्यक्ति को डायबिटीज है, तो मूसली उसका इलाज करने में सक्षम होती है, लेकिन मोटे व्यक्ति में यह थोड़ा मुश्किल होता है।
यदि आपका वजन कम है, और आपको डायबिटीज है, तो आपको आधा चम्मच मूसली दूध से साथ रोजाना लेना चाहिए।
सफेद मूसली को दूध के साथ लेने से आपका रक्त चाप भी नियंत्रित होगा।
आप सफेद मूसली को बॉडी बनाने के लिए खा सकते हैं। यह आपकी मांसपेसियों को बढ़ाने में मदद करती है और आपके टिश्यू को मजबूत बनाती है
सफेद मूसली को खाने का सबसे अच्छा तरीका क्या है?
आप सफेद मूसली के पाउडर को दूध में मिलाकर ले सकते हैं।
इसके अलावा आप इसे शहद के साथ मिलाकर भी ले सकते हैं।
आप सफेद मूसली के कैप्सूल को भी दूध या पानी के साथ ले सकते हैं।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

रहस्यपूर्ण, चमत्कारी जड़ी बूटियाँ


आयुर्वेद के अलावा भारत की स्थानीय संस्कृति में कई चमत्कारिक पौधों के बारे में पढ़ने और सुनने को मिलता है। एक ऐसी जड़ी है जिसको खाने से जब तक उसका असर रहता है, तब तक व्यक्ति गायब रहता है। एक ऐसी जड़ी-बूटी है जिसका सेवन करने से व्यक्ति को भूत-भविष्‍य का ज्ञान हो जाता है। कुछ ऐसे भी पौधे हैं जिनके बल पर स्वर्ण बनाया जा सकता है। इसी तरह कहा जाता है कि धन देने वाला पौधा जिनके भी पास है, वे धनवान ही नहीं बन सकते बल्कि वे कई तरह की चमत्कारिक सिद्धियां भी प्राप्त कर सकते हैं। सचमुच होते हैं इस तरह के पौधे व जड़ी-बूटियां और क्या आज भी पाए जाते हैं? हो सकता है कि आपके आसपास ही हो इसी तरह का पौधा या ढूंढने से मिल जाए आपको ये चमत्कारिक पौधे। तब तो आपको हर तरह की सुख और सुविधाएं प्राप्त हो सकती हैं। जड़ी-बूटियों के माध्यम से धन, यश, कीर्ति, सम्मान आदि सभी कुछ पाया जा सकता है।

1. सोमवल्ली :
प्राचीन ग्रंथों एवं वेदों में सोमवल्ली के महत्व एवं उपयोगिता का व्यापक उल्लेख मिलता है। अनादिकाल से देवी-देवताओं एवं मुनियों को चिरायु बनाने और उन्हें बल प्रदान करने वाला पौधा है सोमवल्ली। बताया जाता है कि रीवा जिले के घने जंगलों में यह पौधा आज भी पाया जाता है। इसका वानस्पतिक नाम Sarcostemma acidum बताया जाता है। इसकी कई तरह की प्रजातियां होती हैं।प्राचीन ग्रंथों व वेद-पुराणों में सोमवल्ली पौधे के बारे में कहा गया है कि इस पौधे के सेवन से शरीर का कायाकल्प हो जाता है। देवी-देवता व मुनि इस पौधे के रस का सेवन अपने को चिरायु बनाने एवं बल सामर्थ्य एवं समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया करते थे। इस पौधे की खासियत है कि इसमें पत्ते नहीं होते। यह पौधा सिर्फ डंठल के आकार में लताओं के समान है। हरे रंग के डंठल वाले इस पौधे को सोमवल्ली लता भी कहा जाता है।ऋग्वेद में सोमरस के बारे में कई जगह वर्णन है। एक जगह पर सोम की इतनी उपलब्धता और प्रचलन दिखाया गया है कि इंसानों के साथ-साथ गायों तक को सोमरस भरपेट खिलाए और पिलाए जाने की बात कही गई है।सोम को स्वर्गीय लता का रस और आकाशीय चन्द्रमा का रस भी माना जाता है। ऋग्वेद अनुसार सोम की उत्पत्ति के दो प्रमुख स्थान हैं- 1. स्वर्ग और 2. पार्थिव पर्वत।सोम की लताओं से निकले रस को सोमरस कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि यह न तो भांग है और न ही किसी प्रकार की नशे की पत्तियां। सोम लताएं पर्वत श्रृंखलाओं में पाई जाती हैं। राजस्थान के अर्बुद, उड़ीसा के महेन्द्र गिरि, विंध्याचल, मलय आदि अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी लताओं के पाए जाने के जिक्र है। कुछ विद्वान मानते हैं कि अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर ही सोम का पौधा पाया जाता है। यह गहरे बादामी रंग का पौधा है।
इफेड्रा :

 कुछ वर्ष पहले ईरान में इफेड्रा नामक पौधे की पहचान कुछ लोग सोम से करते थे। इफेड्रा की छोटी-छोटी टहनियां बर्तनों में दक्षिण-पूर्वी तुर्कमेनिस्तान में तोगोलोक-21 नामक मंदिर परिसर में पाई गई हैं। इन बर्तनों का व्यवहार सोमपान के अनुष्ठान में होता था। यद्यपि इस निर्णायक साक्ष्य के लिए खोज जारी है। हालांकि लोग इसका इस्तेमाल यौनवर्धक दवाई के रूप में करते हैं।

2. तेलिया कंद :
इसकी जड़ों से तेल का रिसाव होता रहता है इसीलिए इसे तेलिया कंद कहते हैं। माना जाता है कि यह पौधा सोने के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कहते हैं कि यह किसी विशेष निर्माण विधि से पारे को सोने में बदल देता है, लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है यह कोई नहीं जानता। हालांकि माना जाता है कि इसका मुख्य गुण सांप के जहर को काटना है।पहले प्रकार को पुरुष और दूसरे को स्त्रैण तेलिया कंद कहते हैं। इसमें सिर्फ पुरुष प्रकार के तेलिया कंद में ही गुण होते हैं। इसकी पहचान यह है कि इसके कंद को सूई चुभो देने भर से ही तत्काल वह गलकर गिर जाता है। इसका कंद शलजम जैसा होता है। यह पौधा सर्पगंधा से मिलते-जुलते पत्ते जैसा होता है।माना जाता है कि तेलिया कंद का पौधा 12 वर्ष उपरांत अपने गुण दिखाता है। प्रत्येक वर्षाकाल में इसका पौधा जमीन से फूटता है और वर्षाकाल समाप्त होते ही समाप्त हो जाता है। इस दौरान इसका कंद जमीन में ही सुरक्षित बना रहता है। इस तरह जब 12 वर्षाकाल का चक्र पूरा हो जाता है, तब यह पौधा अपने चमत्कारिक गुणों से संपन्न हो जाता है। इसके आसपास की जमीन पूर्णत: तेल में लबरेज हो जाती है
3.‘संजीवनी बूटी’ :

 कुछ विद्वान इसे ही ‘संजीवनी बूटी’ कहते हैं। सोम को न पहचान पाने की विवशता का वर्णन रामायण में मिलता है। हनुमान दो बार हिमालय जाते हैं, एक बार राम और लक्ष्मण दोनों की मूर्छा पर और एक बार केवल लक्ष्मण की मूर्छा पर, मगर ‘सोम’ की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं। दोनों बार लंका के वैद्य सुषेण ही असली सोम की पहचान कर पाते हैं।

4. हत्था जोड़ी :
माना जाता है कि हत्था जोड़ी को अपने पास रखने से लोग आपको सम्मान देने लगते हैं। यह एक विशेष प्रकार का पौधा होता है जिसकी जड़ खोदने पर उसमें मानव भुजा जैसी दो शाखाएं निकलती हैं इसके सिरे पर पंजा जैसा बना होता है। यह पूर्णत: मानव हाथ के समान होता है इसीलिए इसे हत्था जोड़ी कहते हैं।दरअसल, अंगुलियों के रूप में उस पंजे की आकृति ठीक इस तरह की होती है, जैसे कोई मुट्ठी बांधे हो। जड़ निकलकर उसकी दोनों शाखाओं को मोड़कर परस्पर मिला देने से करबद्ध की स्थिति बनती है। इसके पौधे प्राय: मध्यप्रदेश के जंगलों में पाए जाते हैं।हत्था जोड़ी बहुत ही शक्तिशाली व प्रभावकारी है। यह एक जंगली पौधे की जड़ होती है। माना जाता है कि मुकदमा, शत्रु संघर्ष, दरिद्रता आदि के निवारण में इसके जैसा चमत्कारी पौधा कोई दूसरा नहीं। तांत्रिक विधि में इसके वशीकरण के उपयोग किए जाते हैं। हालांकि इसमें कितनी सचाई है, यह हम नहीं जानते।माना जाता है कि जिसके पास यह होती है उस पर मां चामुण्डा की असीम कृपा स्वत: ही होने लगती है और ऐसे व्यक्ति को किसी भी कार्य में सफलता मिलती रहती है। यह धन-संपत्ति देने वाली बहुत ही चमत्कारी जड़ी मानी गई है। कहा जाता है कि इसे जंगल में से लाने के पूर्व इसको किसी विशेष दिन जाकर निमंत्रण दिया जाता है, तब उक्त दिन जाकर उसको लाया जाता है फिर किसी खास मंत्र द्वारा इसे सिद्ध करने के बाद ही पास में रखा जाता है।सिद्ध करने के बाद इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर घर में किसी सुरक्षित स्थान में अथवा तिजोरी में रख दिया जाता है। इससे आय में वृद्घि होती है और सभी तरह के संकटों से मुक्ति मिलती है।
 

5. ब्राह्मी :
ब्राह्मी को बुद्धि और उम्र को बढ़ाने वाला माना गया है। ब्राह्मी तराई वाले स्थानों पर उगती है।यह बुखार, स्मृतिदोष, सफेद दाग, पीलिया, प्रमेह और खून की खराबी को दूर करती है। खांसी, पित्त और सूजन में भी लाभदायक है। ब्राह्मी का उपयोग दिल और दिमाग को संतुलित करने के लिए लिए भी किया जाता है।कहा जाता है कि इसका सही मात्रा के अनुसार सेवन करने से निर्बुद्ध, त्रिकालदर्शी यानी भूत, भविष्य और वर्तमान सब दिखाई देने लगता है।जटामासी, शंखपुष्पी, जपा, अखरोट की तरह ब्राह्मी भी दिमाग और नेत्र के लिए बहुत ही उपयोगी है। ब्राह्मी नाम से कई तरह के टॉनिक बनते हैं। ब्राह्मी दरअसल एक जड़ी है, जो दिमाग के लिए बहुत ही उपयोगी है। यह दिमाग को शांत कर स्थिरता प्रदान करती है, साथ ही यह याददाश्त बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।योग और आयुर्वेद के अनुसार बाह्मी से हमारे चक्र भी सक्रिय होते हैं। माना जाता है कि इससे दिमाग के बाएं और दाएं हेमिस्फियर संतुलित रहते हैं। ब्राह्मी में एंटी ऑक्सीडेंट तत्व होते हैं जिससे दिमाग की शक्ति बढ़ने लगती है।
सेवन : 

आधे चम्मच ब्राह्मी के पावडर को गरम पानी में मिला लें और स्वाद के लिए इसमें शहद मिला लें और मेडिटेशन से पहले इसे पीएं तो लाभ होगा। इसके 7 पत्ते चबाकर खाने से भी वही लाभ मिलता है।

6. पलाश:
पलाश के फूल को टेसू का फूल कहा जाता है। इसे ढाक भी कहा जाता है। यह बसंत ऋ‍तु में खिलता है। पलाश 3 प्रकार का होता है- एक वह जिसमें सफेद फूल उगते हैं और दूसरा वह जिसमें पीले फूल लगते हैं और तीसरा वह जिसमें लाल-नारंगी फूल लगते हैं। माना जाता है कि सफेद पलाश के फूल की एक गूटिका बनती है जिसे मुंह में रखने के बाद आदमी तब तक गायब रहता है जब तक की गूटिका पूर्णत: गल नहीं जाए।
 
तीनों ही तरह के पलाश के कई चमत्कारिक गुण हैं। माना जाता है कि सफेद पलाश के पत्तों से पुत्र की प्राप्ति की जा सकती है, जबकि इसके पौधे के घर में रहने से धन और समृद्धि बढ़ती है।पलाश के पत्ते, डंगाल, फल्ली तथा जड़ तक का बहुत ज्यादा महत्व है। पलाश के पत्तों का उपयोग ग्रामीण दोने-पत्तल बनाने के लिए करते हैं जबकि इसके फूलों से होली के रंग बनाए जाते हैं। हालांकि इसके फूलों को पीसकर चेहरे में लगाने से चमक बढ़ती है। पलाश की फलियां कृमिनाशक का काम करती हैं। इसके उपयोग से बुढ़ापा भी दूर रहता है। इसके फूल के उपयोग से लू को भगाया जा सकता है, साथ ही त्वचा संबधी रोग में भी यह लाभदायक सिद्ध हुआ है।इसके  पांचों अंगों- तना, जड़, फल, फूल और बीज से दवाएं बनाने की विधियां दी गई हैं। इस पेड़ से गोंद भी मिलता है जिसे ‘कमरकस’ कहा जाता है। इससे वीर्यवान बना जा सकता है। पलाश पुष्प पीसकर दूध में मिलाकर गर्भवती माताओं को पिलाने से बलवान संतान का जन्म होता है।सफेद पलाश के फूल, चांदी की गणेश प्रतिमा व चांदी में मड़े हुए एकाक्षी नारियल को अभिमंत्रित कर तिजोरी में रखें। इससे धन-संपत्ति बढ़ती है। माना जाता है कि पलाश के पीले फूल से सोना बनाया जा सकता है। प्राचीन साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है।

7. बांदा :
बांदा, वांदा अथवा बंदाल नाम की परोपजीवी वनस्पति प्रात: सभी बड़े वृक्षों पर उग जाती है, जैसे आम, पीपल, महुआ, 
जामुन आदि। इसके पतले, लाल गुच्छेदार फूल और मोटे कड़े पत्ते पीपल के पत्ते के बराबर होते हैं। हालांकि बहुत से अलग-अलग भी बांदा होते हैं, जैसे पीपल का पेड़ किसी भी दूसरे पेड़ पर उग आता है तो उसे पीपल का बांदा कहते हैं। इसी तरह नीम, जामुन आदि के बांदा भी होते हैं। तंत्रशास्त्र के अनुसार प्रत्येक पेड़ पर उगा बांधा एक विशेष फल देता है।
बांदा का धार्मिक और कई मामलों में तांत्रिक महत्व भी है। कहते हैं कि भरणी नक्षत्र में कुश का वांदा लाकर पूजा के स्थान पर रखने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं।
पुष्प नक्षत्र में इमली का वांदा लाकर दाहिने हाथ में बांधने से कंपन के रोग में आराम मिलेगा।
मघा नक्षत्र में हरसिंगार का वांदा लाकर घर में रखने से समृद्धि एवं संपन्नता में वृद्धि होती है।

विशाखा नक्षत्र में महुआ का वांदा लाकर गले में धारण करने से भय समाप्त हो जाता है। डरावने सपने नहीं आते हैं। शक्ति (पुरुषत्व) में वृद्धि होती है।
बरगद का बांदा बाजू में बांधने से हर कार्य में सफलता मिलती है और कोई आपको हानि नहीं पहुंचा सकता।
अनार का बांदा पूजा करने के बाद घर में रखने से किसी की बुरी नजर नहीं लगती और न ही भूत-प्रेत आदि नकारात्मक शक्तियों का घर में प्रवेश होता है।
बेर के बांदे को विधिवत तोड़कर लाने के पश्चात देव प्रतिमा की तरह इसको स्नान करवाएं व पूजा करें। इसके बाद इसे लाल कपड़े में बांधकर धारण कर लें। इस प्रकार आप जो भी इससे मांगेंगे, वह सब आपको प्राप्त होगा।हरसिंगार के बांदे को पूजा करने के बाद लाल कपड़े में लपेटकर तिजोरी में रखें तो आपको कभी धन की कमी नहीं होगी। आम के पेड़ के बांदे को भुजा पर धारण करने से कभी भी आपकी हार नहीं होती और विजय प्राप्त होती है।

8. श्वेत अपराजिता :

श्वेत अपराजिता का पौधा मिलना कठिन है। हालांकि नीले रंग का आसानी से मिल जाता है। श्वेत आंकड़ा और लक्ष्मणा का पौधा भी श्वेत अपराजिता के पौधे की तरह धनलक्ष्मी को आकर्षित करने में सक्षम है। इसके सफेद या नीले रंग के फूल होते हैं। अक्सर सुंदरता के लिए इसके पौधे को बगीचों में लगाया जाता है। इसमें बरसात के सीजन में फलियां और फूल लगते हैं।
संस्कृत में इसे आस्फोता, विष्णुकांता, विष्णुप्रिया, गिरीकर्णी, अश्वखुरा कहते हैं जबकि हिन्दी में कोयल और अपराजिता। बंगाली में भी अपराजिता, मराठी में गोकर्णी, काजली, काली, पग्ली सुपली आदि कहा जाता है। गुजराती में चोली गरणी, काली गरणी कहा जाता है। तेलुगु में नीलंगटुना दिटेन और अंग्रेजी में मेजरीन कहा जाता है।दोनों प्रकार की कोयल (अपराजिता), चरपरी (तीखी), बुद्धि बढ़ाने वाली, कंठ (गले) को शुद्ध करने वाली, आंखों के लिए उपयोगी होती है। यह बुद्धि या दिमाग और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली है तथा सफेद दाग (कोढ़), मूत्रदोष (पेशाब की बीमारी), आंवयुक्त दस्त, सूजन तथा जहर को दूर करने वाली है।

9. कीड़ा घास :

कीड़े जैसी दिखने के कारण उत्तराखंड के लोग इसे कीड़ा घास कहते हैं। तिब्बती भाषा में इसको ‘यारसाद्-गुम-बु’ कहा जाता है जिसका अर्थ होता है ग्रीष्म ऋतु में घास और शीत ऋतु में जंतु। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार यर्सी गंबा हिमालयी क्षेत्र की विशेष प्रकार एवं यहां पाए जाने वाले एक कीड़े के जीवनचक्र के अद्भुत संयोग का परिणाम है।
कहते हैं कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ एवं चमोली जिले के 3,500 मीटर की ऊंचाई के एल्पाइन बुग्यालों में यह घास पाई जाती है। तिब्बती साहित्य के अनुसार यहां के चरवाहों ने देखा कि जंगलों में चरने वाले उनके पशु एक विशेष प्रकार की घास, जो कीड़े के समान दिखाई देती है, को खाकर हृष्ट-पुष्ट एवं बलवान हो जाते हैं। धीरे-धीरे यह घास एक चमत्कारी औषधि के रूप में अनेक बीमारियों के इलाज के लिए प्रयोग होने लगी।
यह नारंगी रंग की एक पतली जड़ की तरह दिखाई देती है जिसका भीतरी भाग सफेद होता है। इसका ऊपरी भाग एक स्प्रिंग की भांति घुमावदार होता है जिस पर झुर्रियां होती हैं। इन झुर्रियों के कारण ही यह इल्लड़ जैसी लगती है। इन झुर्रियों की मुख्य रचना में 7-8 आकृतियां झुंड के रूप में मिलती हैं। इनमें बीच की रचनाएं बड़ी एवं महत्वपूर्ण होती हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार ये झुंड वस्तुत: कार्डिसेप्स नामक फफूंद के सूखे हुए अवशेष होते हैं। उनके अनुसार इस घास में एस्पार्टिक एसिड, ग्लूटेमिक एसिड, ग्लाईसीन जैसे महत्वपूर्ण एमीनो एसिड तथा कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम जैसे अनेक प्रकार के तत्व, अनेक प्रकार के विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसको एकत्रित करने के लिए अप्रैल से लेकर जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है। अगस्त के महीने से धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से इसका क्षय होने लगता है और शरद ऋतु के आने तक यह पूर्णतया विलुप्त हो जाती है।यह औषधि हृदय, यकृत तथा गुर्दे संबंधी व्याधियों में उपयोगी सिद्ध हुई है। शरीर के जोड़ों में होने वाली सूजन एवं पीड़ा तथा जीर्ण रोगों जैसे अस्थमा एवं फेफड़े के रोगों में इसका प्रयोग लाभकारी होता है। इसका प्रयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। उम्र के साथ-साथ बढ़ने वाली हृदय एवं मस्तिष्क की रक्त वाहिनियों की कठोरता को भी यह कम करता है। कुल मिलाकर यह आपकी बढ़ती आयु को रोकने में सक्षम है।

10. सिद्धि देने वाली जड़ी-बूटी :
गुलतुरा (दिव्यता के लिए), तापसद्रुम (भूतादि ग्रह निवारक), शल (दरिद्रता नाशक), भोजपत्र (ग्रह बाधाएं निवारक), विष्णुकांता (शस्त्रु नाशक), मंगल्य (तांत्रिक क्रिया नाशक), गुल्बास (दिव्यता प्रदानकर्ता), जिवक (ऐश्वर्यदायिनी), गोरोचन (वशीकरण), गुग्गल (चामंडु सिद्धि), अगस्त (पितृदोष नाशक), अपमार्ग (बाजीकरण)।बांदा (चुम्बकीय शक्ति प्रदाता), श्‍वेत और काली गुंजा (भूत पिशाच नाशक), उटकटारी (राजयोग दाता), मयूर शिका (दुष्टात्मा नाशक) और काली हल्दी (तांत्रिक प्रयोग हेतु) आदि ऐसी अनेक जड़ी-बूटियां हैं, जो व्यक्ति के सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन को साधने में महत्वपूर्ण मानी गई हैं।

11. भूख-प्यास को रोके जड़ी :

वेदादि ग्रंथों के अलावा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जड़ी-बूटी, दूध आदि से निर्मित ऐसे आहार का विवरण है जिसके सेवन के बाद पूरे महीने भोजन की जरूरत नहीं पड़ती।
कहते हैं कि आंधीझाड़ा से अत्यधिक भूख लगने (भस्मक रोग) और अत्यधिक प्यास लगने का रोग समाप्त किया जा सकता है। अर्थात जो लोग ज्यादा खाने के शौकीन हैं और मोटापे से ग्रस्त हैं वे इस जड़ी का उपयोग कर भूख को समाप्त कर सकते हैं।इसे संस्कृत में अपामार्ग, हिन्दी में चिरचिटा, लटजीरा और आंधीझाड़ा कहते हैं। अंग्रेजी में इसे रफ चेफ ट्री नाम से जाना जाता है। यह पौधा 1 से 3 फुट ऊंचा होता है और भारत में सब जगह घास के साथ अन्य पौधों की तरह पैदा होता है। खेतों की बागड़ के पास, रास्तों के किनारे, झाड़ियों में इसे सरलता से पाया जा सकता है।




वायरल फीवर के घरेलू नुस्खे ,आहार और बुखार की कमजोरी दूर करने के उपाय


                                                      

    मौसम में बदलाव के साथ ही शरीर में भी कई प्रकार के बदलाव शुरू हो जाते हैं और गर्मी में मौसम नमीयुक्त और चिपचिपा होने लगता है। इस मौसम में वायरल बुखार से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। वायरस से होने वाला बुखार, गला दर्द व नाक बहने की समस्याएं ज्यादा लेकर आता है। यह बुखार बच्चों व बडों को समान रूप से प्रभावित करता है। वायरल में संक्रमण की स्थिति कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकती है। वायरल में कई लोग खाना-पीना छोड देते हैं। लेकिन खाना छोडने से बीमारी और बढ सकती है। इसलिए जहां तक संभव हो वायरल में खूब खाना खाएं और डिहाइडेशन से बचने के लिए खूब पानी पिएं।
वायरल बुखार में खाने के फायदे
वायरल बुखार तभी होता है जब शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढाने के लिए खान-पान का उचित ध्यान रखना चाहिए। अगर सेहतमंद ओर प्रोटीन युक्त खाना खाया जाए तो शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता खुद निर्मित हो जाती है। सादा, ताजा खाना ही खाएं क्योंकि है वीफूड आसानी से पच नहीं सकते हैं। रखे हुए खाने को गर्म करके ही खाएं क्योंकि इससे सभी बैक्टीरिया समाप्त हो जाते हैं। खाने में अदरक, लहसुन, हींग, जीरा, काली मिर्च, हल्दी और धनिये का प्रयोग अवश्य करें क्योंकि इनमे पाए जाने वाले तत्व पाचन शक्ति को बढाते हैं और वायरल के कीटाणुओं से लडते हैं।

वायरल बुखार में क्या-क्या खाएं

मौसमी संतरा व नीबूं खाएं जिसमें विटामिन-सी और वीटा कैरोटींस होता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है।
वायरल फीवर होने पर डाई फूड खूब खाना चाहिए। डाई फूड में जिंक भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
लहसुन में कैल्सियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और खनिज तत्व पाए जाते हैं। इससे सर्दी, जुकाम, दर्द, सूजन और त्वचा से संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं। लहसुन घी या तेल में तलकर चटनी के रूप में भी प्रयो‍ग किया जा सकता है।
खूब पानी पियें। इससे डिहाइडेशन के अलावा शरीर पर हमला करने वाले माइक्रो आर्गेनिज्म को बाहर निकालने में मदद मिलती है।
तुलसी के पत्ते में खांसी, जुकाम, बुखार और सांस संबंधी रोगों से लडने की शक्ति है। बदलते मौसम में तुलसी के पत्तियों को उबालकर या चाय में डालकर पीने से नाक और गले के इंफेक्शन से बचाव होता है।
वायरल बुखार में हरी और पत्तेदार सब्जियों का अधिक मात्रा में प्रयोग करें। क्योंकि हरी सब्जियों में पानी की मात्रा ज्यादा होती है जिससे डिहाइडेशन नहीं होता है।
टमाटर, आलू और संतरा खाएं। इनमें विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
वायरल में दही खाना बंद न करें क्योंकि दही खाने से बैक्टीरिया से लडने में सहायता मिलती साथ ही यह पाचन क्रिया को सही रखता है। पेट खराब, आलसपन और बुखार को दूर करता है।
वायरल में गाजर खाएं, इसमें केरोटीन पाया जाता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है और कीटाणुओं से लडने में मदद मिलती है।
अधिक मात्रा में केले और सेब का सेवन करें। इन दोनों ही में अधिक मात्रा में पोटैसियम पाई जाती है जो ऐसा इलेक्ट्रोलाइट है दस्‍त समाप्‍त होती है।
वयरल बुखार में खाना खूब खाएं लेकिन खाने का गलत कंबीनेशन कभी ना लें। मसलन अगर आप दही खा रहे हैं तो हैवी नॉनवेज या नींबू अथवा कोई खटटी चीज ना खाएं। ठंडे और तरल पेय पदार्थों का सेवन न करें क्योंकि वे शरीर में पानी रोकते हैं और असंतुलन होता है। वायरल होने पर दिमाग पर बिलकुल जोर ना लगाएं क्योंकि ऐसा करने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होगी और वायरल ज्यादा दिनों तक रह सकता है।
वायरल होने से वाले शरीर में कुछ इस तरह के लक्षण दिखते हैं जैसे, गले में दर्द, खांसी, सिर दर्द, थकान, जोड़ों में दर्द के साथ ही उल्टी और दस्त होना, आंखों का लाल होना और माथे का बहुत तेज गर्म होना आदि. बड़ों के साथ यह वायरल फीवर बच्चों में भी तेजी से फैलता है.
इन घरेलू उपचार से आप इस इंफेक्शन से राहत पा सकते हैं...

1. हल्दी और सौंठ का पाउडर

अदरक में एंटी आक्सिडेंट गुण बुखार को ठीक करते हैं. एक चम्मच काली मिर्च का चूर्ण, एक छोटी चम्मच हल्दी का चूर्ण और एक चम्मच सौंठ यानी अदरक के पाउडर को एक कप पानी और हल्की सी चीनी डालकर गर्म कर लें. जब यह पानी उबलने के बाद आधा रह जाए तो इसे ठंडा करके पिएं. इससे वायरल फीवर से आराम मिलता है.

2. तुलसी का इस्तेमाल

तुलसी में एंटीबायोटिक गुण होते हैं जिससे शरीर के अंदर के वायरस खत्म होते हैं. एक चम्मच लौंग के चूर्ण और दस से पंद्रह तुलसी के ताजे पत्तों को एक लीटर पानी में डालकर इतना उबालें जब तक यह सूखकर आधा न रह जाए. इसके बाद इसे छानें और ठंडा करके हर एक घंटे में पिएं. आपको वायरल से जल्द ही आराम मिलेगा.

3. धनिया की चाय

धनिया सेहत का धनी होता है इसलिए यह वायरल बुखार जैसे कई रोगों को खत्म करता है.वायरल के बुखार को खत्म करने के लिए धनिया चाय बहुत ही असरदार औषधि का काम करती है.

4. मेथी का पानी

आपके किचन में मेथी तो होती ही है.मेथी के दानों को एक कप में भरकर इसे रात भर के लिए भिगों लें और सुबह के समय इसे छानकर हर एक घंटे में पिएं. जल्द ही आराम मिलेगा.

5. नींबू और शहद

नींबू का रस और शहद भी वायरल फीवर के असर को कम करते हैं. आप शहद और नींबू का रस का सेवन भी कर सकते हैं.
अक्सर लंबे समय से चले आ रहे बुखार या ज्यादा श्रम करने के बाद शरीर एकदम सुस्त सा महसूस करता है। शरीर में कमजोरी आने से इसका सीधा असर हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है। शहरी जीवन भागदौड़ भरा होता है जबकि वनांचलों में आदिवासियों की जीवनचर्या बेहत नियमित होती है साथ ही इनके भोजन और जीवनशैली में वनस्पतियों का बेजा इस्तमाल होता है और शायद यही वजह है जिससे वनवासियों की औसत आयु आम शहरी लोगों से ज्यादा होती है।लगातार कंप्यूटर पर बैठे रहना, खानपान के समय में अनियमितता और तनाव भरा जीवन मानसिक और शारीरिक तौर से थका देता है।

गोंद शारीरिक ऊर्जा के लिए उत्तम -

पीपल के पेड़ से निकलने वाली गोंद को शारीरिक ऊर्जा के लिए उत्तम माना जाता है। मिश्री या शक्कर के साथ पीपल की करीब 1 ग्राम गोंद मात्रा लेने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और यह थकान मिटाने के लिए एक कारगर नुस्खा माना जाता है। प्रतिदिन इसका सेवन करते रहने से बुजुर्गों की सेहत भी बनी रहती है।

 दैनिक आहार के रूप में अपनाए पेजा -

पातालकोट (मप्र) जैसे दूरगामी आदिवासी अंचलों में प्रो-बायोटिक आहार “पेजा” दैनिक आहार के रूप में सदियों से अपनाया जाता रहा है और इसका भरपूर सेवन भी किया जाता है। पेजा एक ऐसा व्यंजन है जो चावल, छाछ, बारली (जौ), निंबू और कुटकी को मिलाकर बनाया जाता है। आदिवासी हर्बल जानकार इस आहार को कमजोरी, थकान और बुखार आने पर अक्सर रोगियों को देते हैं। पके हुए चावल, जौ और कुटकी को एक मिट्टी के बर्तन में डाल दिया जाता है और इसमें छाछ मिला दी जाती है जिससे कि यह पेस्ट की तरह गाढ़ा बन जाए। इस पूरे मिश्रण पर स्वादानुसार नींबू का रस और नमक मिलाकर अंधेरे कमरे में रख दिया जाता है। दो दिनों के बाद इसे फेंटकर एक खास व्यंजन यानि पेजा तैयार हो जाता है। भोजन के वक्त एक कटोरी पेजा का सेवन जरूरी माना जाता है और ये बेहद स्वादिष्ट भी होता है।

लटजीरा के पौधे रस

लटजीरा के संपूर्ण पौधे के रस (4 मिली प्रतिदिन) का सेवन तनाव, थकान और चिढ़चिढ़ापन दूर करता है साथ ही इसकी वजह से नींद नहीं आने की समस्या में भी राहत मिलती है। सेवन करने से निश्चित फायदा मिलता है। टमाटर के साथ फराशबीन का सूप शरीर में अक्सर होने वाली थकान, ज्यादा पसीना आना और कमजोरी दूर करने के लिए आदिवासी टमाटर के साथ फराशबीन को उबालकर सूप तैयार करते हैं और दिन में दो बार चार दिनों तक देते हैं, माना जाता है कि यह सूप शक्तिवर्धक होता है।

कद्दू के बीज फायदेमंद

ग्रामीण इलाकों में जी मचलना, थकान होना या चिंतित और तनावग्रस्त व्यक्ति को कद्दू के बीजों को शक्कर के साथ मिलाकर खिलाया जाता है। कद्दू के करीब 5 ग्राम बीज और इतनी ही मात्रा में मिश्री या शक्कर की फांकी मारी जाए तो बेहद फायदा होता है। ये मानसिक तनाव भी दूर करते हैं। 

आलू- बुखारे का करें सेवन -

आलू- बुखारे के सेवन से शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते हैं, कब्जियत दूर होती है और पेट की बेहतर सफाई होती है। इन फलों में पाए जाने वाले फ़ाईबर्स और एंटी ऑक्सिडेंट्स की वजह से पाचन क्रिया ठीक तरह से होती है और शरीर की कोशिकाओं में मेटाबोलिज़्म की क्रिया सुचारू क्रम में होती है। इन फलों में सिट्रिक एसिड पाया जाता है जो कि थकान दूर करने में सहायक होता है और इसके सेवन से लीवर यानि यकृत तथा आंतो की क्रियाविधियां सुचारू रहती हैं अत: आलू-बुखारा खाने से शरीर में जमा अतिरिक्त वसा या ज्यादा वजन कम करने में मदद होती है और व्यक्ति शारीरिक तौर पर बेहद स्वस्थ महसूस करता है। 

दूब घास/दूर्वा का प्रतिदिन करें सेवन

आदिवासियों के अनुसार दूब घास/दूर्वा का प्रतिदिन सेवन शारीरिक स्फूर्ति प्रदान करता है और शरीर को थकान महसूस नहीं होती है। करीब 10 ग्राम ताजी दूर्वा को एकत्र कर साफ धो लिया जाए और इसे एक गिलास पानी के साथ मिलाकर ग्राईंड कर लिया जाए और पी लिया जाए, यह शरीर में ताजगी का संचार लाने में मददगार होती है। वैसे आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी दूब घास एक शक्तिवर्द्धक औषधि है क्योंकि इसमें ग्लाइकोसाइड, अल्केलाइड, विटामिन `ए´ और विटामिन `सी´ की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है।

दूध के साथ लें शहद -

शहद को दूध के साथ मिलाकर लिया जाए तो हृदय, दिमाग और पेट के लिए फ़ायदेमंद होता है। नींबू पानी के साथ शहद मिलाकर पीने से ये शरीर को ऊर्जा और ठंडक प्रदान करता है। आदिवासियों का मानना है कि यदि शहद का सेवन प्रतिदिन किया जाए तो ये शरीर को चुस्त दुरुस्त रखने में काफ़ी मदद करता है साथ ही शारीरिक ताकत को बनाए रखकर थकान दूर करता है।

कच्चे आलू का रस लें -

हम जानते हैं कि आलू में पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। कच्चे आलू को कुचलकर एक चम्मच रस तैयार किया जाए और इसे दिन में कम से कम चार बार लिया जाए। आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार आलू का रस रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है और कई प्रकार के रोगों से लड़ने की क्षमता शरीर को मिल जाती है। आलू की मदद से कमजोरी, थकान और ऊर्जा की कमी को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उबले आलूओं का सेवन भी थकान दूर भगाने में बेहद कारगर होता है। 

थकान मिटाए तुलसी

पातालकोट के आदिवासी हर्बल जानकार तुलसी को थकान मिटाने वाली एक औषधि मानते हैं, इनके अनुसार अत्यधिक थकान होने पर तुलसी के पत्तियों और मंजरी के सेवन से थकान दूर हो जाती है। तरबूजे के छिलकों का मुरब्बा तरबूज के छिलकों की आंतरिक सतह को काटकर आदिवासी इनका मुरब्बा तैयार करते हैं, माना जाता है कि यह बेहद शक्तिवर्धक होता है। इसके छिलकों को बारीक काटकर सुखा लेते हैं और चूर्ण तैयार कर लिया जाता है। माना जाता है कि इस चूर्ण की आधी चम्मच मात्रा प्रतिदिन सुबह खाली पेट लेने से शरीर में ताकत का संचार होता है और कई तरह की व्याधियों में राहत भी मिलती है, कुल मिलाकर ये पूर्ण रूप से सेहत दुरुस्ती के लिए कारगर होता है।

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फास्ट फूड हानिकारक है तंदुरुस्ती के लिए


      आज हर बड़े और छोटे शहरों के हर गली और नुक्कड़ में मेढ़क के छाते की तरह फास्ट फूड जॉइन्ट पनपता जा रहा है। बड़े-बूढ़े और जवान सभी वहाँ भीड़ लगाकर अपने भूख को शांत करने के लिए व्यस्त रहते हैं। यह आश्चर्य की बात है कि ऐसा क्या है जो इन जॉइन्ट को इतना लोकप्रिय बना रहा है। क्या वहाँ का खाना स्वादिष्ट और पुष्टिकारक होता है? फास्ट फूड वास्तविक रूप में है क्या? फास्ट फूड शब्द का मतलब वह खाना जो ज़ल्दी बनता भी है और तुरन्त परोसा भी जा सकता है। फास्ट फूड शब्द को 1951 में मरिअम वेबस्टर के शब्दकोश से पहचान मिली।

सही में फास्ट फूड है क्या?

जो खाना कम समय में तैयार हो सके उसको फास्ट फूड कहते हैं। रेस्तरां या स्टोर में जो खाना पकाया रहता है और सिर्फ गर्म करके परोसा जाता है वही इसका सही अर्थ है। ले जाने के लिए फास्ट फूड पैकेज में भी पाया जाता है।
यह खाना साधारणतः दुकान में पाए जाता हैं, जो स्टॉल/बूथ की तरह होते हैं, जहाँ आश्रय का स्थान या बैठने का स्थान नहीं होता है। उन्हें क्विक सर्विस रेस्तरां भी कहते हैं। फूड स्टफ का रेस्तरां चेन भी होता है जो केंद्र स्थल से फूड स्टफ विशेष विक्रय अधिकार दुकान तक भेजते हैं।

फास्ट फूड प्रतिष्ठित कैसे हुआ

पका हुआ खाना का विक्रय शहरी विकास से संबंधित है। समय आजकल के लिए सबसे महंगा ज़रूरत का समान बन गया है। लोगों के पास बैठकर संपूर्ण खाना खाने का समय नहीं है। विशेषकर काम करनेवालों के लिए जो दोपहर के खाने के वक्त कुछ जल्दी से चबाकर पेट भर लेना चाहते हैं, वे फास्ट फूड ज़्वाइंट में जाना पसंद करते हैं।
आजकल लोग अलग रहना ज़्यादा पसंद करते हैं, संगठित परिवार के जगह। एकल परिवार में दोनों पति-पत्नी काम करते हैं, उनके पास चूल्हे के पास जाकर खाना बनाने का समय कम होता है। ऐसे परिवार बाहर से खाना मँगाकर खाना पसंद करते हैं, जहाँ खर्चा थोड़ा होता है या घर में दे जाने के लिए कुछ नहीं लगता है।

फास्ट फूड आधुनिक युग का विकास नहीं है

मध्य युग से ही फास्ट फूड का पता चलता है, जहाँ वेन्डर द्वारा पका हुआ माँस, फ्लान, पाईस, पेस्ट्रीस, वेफर, वेफल्स, पैनकेक लंदन और पैरिस जैसे शहर में बेचे जाते थे। अविवाहित लोग जो अकेले रहते थे, वे ही ज़्यादातर ग्राहक होते थे, जिन्हें खुद खाना बनाना पड़ता था। वे क्वाटर में रहते थे और वे किचन की सुविधा उपभोग करने में असमर्थ थे उन्हें फास्ट फूड खाकर ही पेट भरना पड़ता था। यात्री और तीर्थयात्री को धार्मिक जगहों पर फास्ट फूड खाकर भूख को संतुष्ट करना पड़ता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद मोटरगाड़ी की सुविधा आम लोगों को मिली, इस तरह कुछ चलयमान रेस्तरां का भी आर्विभाव हुआ।

इस तरह के दुकान में कैसा खाना मिलता है 

ज़्यादातर आधुनिक वाणिज्यिक फास्ट-फूड से संसाधित होते हैं जो मानक उत्पादक के तरीके और पाकशैली में मानक सामग्री डालकर बड़ी मात्रा में पकाये जाते हैं। उनको कार्टन या प्लास्टिक में रैप करके दिया जाता है जिससे उत्पादक का खर्चा कम पड़ता है। मुख्यतः फास्ट फूड का मेनू संसाधित सामग्री से बनता है और केंद्र स्थल से अलग-अलग दुकान में जाता है, जहाँ गरम करके परोसा जाता है, या तो डीप फ्राई करके, माइक्रोवेव में या जल्दी एकत्र करके दिया जाता है। इस तरह उत्पादक को मार्केट में क्वालिटी और नाम बनाए रखने में सहायता होती है ।

फास्ट फूड खाने से हानि और लाभ

वे खाने की बजाय फास्ट फूट का सेवन ज्यादा पसंद करते हैं। आर्युवेद में फास्ट फूड को स्वास्थ्य के लिए जहर कहा गया है। आज इस लेख के जरिये हम आपको फास्ट फूड के सेवन से होने वाले नुकसान और इसके फायदे के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

दिल संबंधी रोग

शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ने के लिए फास्टफूड काफी हद तक जिम्मेदार होता है। कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से दिल संबंधी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। वहीं दूसरी तरफ वजन बढ़ने से भी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
 
मोटापे की समस्या

फास्ट फूड में कैलोरी और शुगर की मात्रा ज्यादा होती है। इसके ज्यादा सेवन से आपका वजन बढ़ने लगता है। पोषक तत्वों की कमी के कारण फास्ट शरीर को नुकसान पहुंचाता है। फास्ट फूड का संयमित सेवन आपकी सेहत को नुकसान नहीं पहुंचाता।

थकान

फास्ट फूड खाने वाले व्यक्तियों या बच्चों को थकान बहुत जल्दी होने लगती है। फास्ट फूड के सेवन से आपका पेट को एकदम भर जाता है लेकिन इसमें पोषक तत्वों की कमी के कारण पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन आदि नहीं होने के कारण आपका शरीर में विटामिन की कमी हो जाती है। ऐसे में थोड़ा चलने पर ही आपको थकान होने लगती है।

तनाव

यदि आप भूख लगने पर फास्ट फूड के सेवन को तरजीह देते हैं तो यह आपके तनाव का कारण भी बन सकता है। जो लोग अपने जीवन में ज्यादा फास्ट फूड का सेवन करते हैं, उनके तनाव का स्तर उतना ही ज्यादा होता है।

डायबिटीज

फास्ट फूड के सेवन से टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा काफी ज्यादा रहता है। टाइप 2 डायबिटीज फास्ट फूड और जंक फूड के सेवन, बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल, असमय खाने और शारीरिक रूप से कम एक्टिव रहने के कारण होती है।

कैंसर

हाल हीं में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक शुगर और फैट से भरे फास्ट फूड का सेवन करने से पेट से संबंधित कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। एक अन्य शोध के मुताबिक फास्ट फूड प्रोस्टेट कैंसर का भी कारण है।

फास्ट फूड की अच्छाई

मिलने में सुविधाजनक

फास्ट फूड हर गली-मोहल्ले में आसानी से मिलने वाला खाद्य पदार्थ है। अधिकतर रेस्टोरेंट तो फास्ट फूड की फ्री होम डिलीवरी भी करते हैं। हाइवे और रास्ते पर फास्ट फूड रेस्टोरेंट के ड्राइव-थ्रू काउंटर बने हुए हैं, इनसे आप बिना किसी देरी के फास्ट फूड लेकर खा सकते हैं। यदि आप एकदम पेट भरने के लिए कुछ खाना चाहते हैं तो ऐसे में फास्ट फूड एक बेहतर विकल्प है।

रुपये और समय की बचत

फास्ट फूड गली और चौराहों पर आराम से मिलने के कारण पौष्टिक खाने के मुकाबले काफी सस्ता भी होता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक घर में बने खाने के मुकाबले फास्ट फूड काफी सस्ता होता है। वहीं समय की बात करें तो फास्ट फूड अन्य भोजन के मुकाबले आसानी से मिल और बन जाता है तो इस कारण इसे खाने से समय की भी बचत हो जाती है।


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