रहस्यपूर्ण, चमत्कारी जड़ी बूटियाँ


आयुर्वेद के अलावा भारत की स्थानीय संस्कृति में कई चमत्कारिक पौधों के बारे में पढ़ने और सुनने को मिलता है। एक ऐसी जड़ी है जिसको खाने से जब तक उसका असर रहता है, तब तक व्यक्ति गायब रहता है। एक ऐसी जड़ी-बूटी है जिसका सेवन करने से व्यक्ति को भूत-भविष्‍य का ज्ञान हो जाता है। कुछ ऐसे भी पौधे हैं जिनके बल पर स्वर्ण बनाया जा सकता है। इसी तरह कहा जाता है कि धन देने वाला पौधा जिनके भी पास है, वे धनवान ही नहीं बन सकते बल्कि वे कई तरह की चमत्कारिक सिद्धियां भी प्राप्त कर सकते हैं। सचमुच होते हैं इस तरह के पौधे व जड़ी-बूटियां और क्या आज भी पाए जाते हैं? हो सकता है कि आपके आसपास ही हो इसी तरह का पौधा या ढूंढने से मिल जाए आपको ये चमत्कारिक पौधे। तब तो आपको हर तरह की सुख और सुविधाएं प्राप्त हो सकती हैं। जड़ी-बूटियों के माध्यम से धन, यश, कीर्ति, सम्मान आदि सभी कुछ पाया जा सकता है।

1. सोमवल्ली :
प्राचीन ग्रंथों एवं वेदों में सोमवल्ली के महत्व एवं उपयोगिता का व्यापक उल्लेख मिलता है। अनादिकाल से देवी-देवताओं एवं मुनियों को चिरायु बनाने और उन्हें बल प्रदान करने वाला पौधा है सोमवल्ली। बताया जाता है कि रीवा जिले के घने जंगलों में यह पौधा आज भी पाया जाता है। इसका वानस्पतिक नाम Sarcostemma acidum बताया जाता है। इसकी कई तरह की प्रजातियां होती हैं।प्राचीन ग्रंथों व वेद-पुराणों में सोमवल्ली पौधे के बारे में कहा गया है कि इस पौधे के सेवन से शरीर का कायाकल्प हो जाता है। देवी-देवता व मुनि इस पौधे के रस का सेवन अपने को चिरायु बनाने एवं बल सामर्थ्य एवं समृद्धि प्राप्त करने के लिए किया करते थे। इस पौधे की खासियत है कि इसमें पत्ते नहीं होते। यह पौधा सिर्फ डंठल के आकार में लताओं के समान है। हरे रंग के डंठल वाले इस पौधे को सोमवल्ली लता भी कहा जाता है।ऋग्वेद में सोमरस के बारे में कई जगह वर्णन है। एक जगह पर सोम की इतनी उपलब्धता और प्रचलन दिखाया गया है कि इंसानों के साथ-साथ गायों तक को सोमरस भरपेट खिलाए और पिलाए जाने की बात कही गई है।सोम को स्वर्गीय लता का रस और आकाशीय चन्द्रमा का रस भी माना जाता है। ऋग्वेद अनुसार सोम की उत्पत्ति के दो प्रमुख स्थान हैं- 1. स्वर्ग और 2. पार्थिव पर्वत।सोम की लताओं से निकले रस को सोमरस कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि यह न तो भांग है और न ही किसी प्रकार की नशे की पत्तियां। सोम लताएं पर्वत श्रृंखलाओं में पाई जाती हैं। राजस्थान के अर्बुद, उड़ीसा के महेन्द्र गिरि, विंध्याचल, मलय आदि अनेक पर्वतीय क्षेत्रों में इसकी लताओं के पाए जाने के जिक्र है। कुछ विद्वान मानते हैं कि अफगानिस्तान की पहाड़ियों पर ही सोम का पौधा पाया जाता है। यह गहरे बादामी रंग का पौधा है।
इफेड्रा :

 कुछ वर्ष पहले ईरान में इफेड्रा नामक पौधे की पहचान कुछ लोग सोम से करते थे। इफेड्रा की छोटी-छोटी टहनियां बर्तनों में दक्षिण-पूर्वी तुर्कमेनिस्तान में तोगोलोक-21 नामक मंदिर परिसर में पाई गई हैं। इन बर्तनों का व्यवहार सोमपान के अनुष्ठान में होता था। यद्यपि इस निर्णायक साक्ष्य के लिए खोज जारी है। हालांकि लोग इसका इस्तेमाल यौनवर्धक दवाई के रूप में करते हैं।

2. तेलिया कंद :
इसकी जड़ों से तेल का रिसाव होता रहता है इसीलिए इसे तेलिया कंद कहते हैं। माना जाता है कि यह पौधा सोने के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। कहते हैं कि यह किसी विशेष निर्माण विधि से पारे को सोने में बदल देता है, लेकिन इसमें कितनी सच्चाई है यह कोई नहीं जानता। हालांकि माना जाता है कि इसका मुख्य गुण सांप के जहर को काटना है।पहले प्रकार को पुरुष और दूसरे को स्त्रैण तेलिया कंद कहते हैं। इसमें सिर्फ पुरुष प्रकार के तेलिया कंद में ही गुण होते हैं। इसकी पहचान यह है कि इसके कंद को सूई चुभो देने भर से ही तत्काल वह गलकर गिर जाता है। इसका कंद शलजम जैसा होता है। यह पौधा सर्पगंधा से मिलते-जुलते पत्ते जैसा होता है।माना जाता है कि तेलिया कंद का पौधा 12 वर्ष उपरांत अपने गुण दिखाता है। प्रत्येक वर्षाकाल में इसका पौधा जमीन से फूटता है और वर्षाकाल समाप्त होते ही समाप्त हो जाता है। इस दौरान इसका कंद जमीन में ही सुरक्षित बना रहता है। इस तरह जब 12 वर्षाकाल का चक्र पूरा हो जाता है, तब यह पौधा अपने चमत्कारिक गुणों से संपन्न हो जाता है। इसके आसपास की जमीन पूर्णत: तेल में लबरेज हो जाती है
3.‘संजीवनी बूटी’ :

 कुछ विद्वान इसे ही ‘संजीवनी बूटी’ कहते हैं। सोम को न पहचान पाने की विवशता का वर्णन रामायण में मिलता है। हनुमान दो बार हिमालय जाते हैं, एक बार राम और लक्ष्मण दोनों की मूर्छा पर और एक बार केवल लक्ष्मण की मूर्छा पर, मगर ‘सोम’ की पहचान न होने पर पूरा पर्वत ही उखाड़ लाते हैं। दोनों बार लंका के वैद्य सुषेण ही असली सोम की पहचान कर पाते हैं।

4. हत्था जोड़ी :
माना जाता है कि हत्था जोड़ी को अपने पास रखने से लोग आपको सम्मान देने लगते हैं। यह एक विशेष प्रकार का पौधा होता है जिसकी जड़ खोदने पर उसमें मानव भुजा जैसी दो शाखाएं निकलती हैं इसके सिरे पर पंजा जैसा बना होता है। यह पूर्णत: मानव हाथ के समान होता है इसीलिए इसे हत्था जोड़ी कहते हैं।दरअसल, अंगुलियों के रूप में उस पंजे की आकृति ठीक इस तरह की होती है, जैसे कोई मुट्ठी बांधे हो। जड़ निकलकर उसकी दोनों शाखाओं को मोड़कर परस्पर मिला देने से करबद्ध की स्थिति बनती है। इसके पौधे प्राय: मध्यप्रदेश के जंगलों में पाए जाते हैं।हत्था जोड़ी बहुत ही शक्तिशाली व प्रभावकारी है। यह एक जंगली पौधे की जड़ होती है। माना जाता है कि मुकदमा, शत्रु संघर्ष, दरिद्रता आदि के निवारण में इसके जैसा चमत्कारी पौधा कोई दूसरा नहीं। तांत्रिक विधि में इसके वशीकरण के उपयोग किए जाते हैं। हालांकि इसमें कितनी सचाई है, यह हम नहीं जानते।माना जाता है कि जिसके पास यह होती है उस पर मां चामुण्डा की असीम कृपा स्वत: ही होने लगती है और ऐसे व्यक्ति को किसी भी कार्य में सफलता मिलती रहती है। यह धन-संपत्ति देने वाली बहुत ही चमत्कारी जड़ी मानी गई है। कहा जाता है कि इसे जंगल में से लाने के पूर्व इसको किसी विशेष दिन जाकर निमंत्रण दिया जाता है, तब उक्त दिन जाकर उसको लाया जाता है फिर किसी खास मंत्र द्वारा इसे सिद्ध करने के बाद ही पास में रखा जाता है।सिद्ध करने के बाद इसे लाल रंग के कपड़े में बांधकर घर में किसी सुरक्षित स्थान में अथवा तिजोरी में रख दिया जाता है। इससे आय में वृद्घि होती है और सभी तरह के संकटों से मुक्ति मिलती है।
 

5. ब्राह्मी :
ब्राह्मी को बुद्धि और उम्र को बढ़ाने वाला माना गया है। ब्राह्मी तराई वाले स्थानों पर उगती है।यह बुखार, स्मृतिदोष, सफेद दाग, पीलिया, प्रमेह और खून की खराबी को दूर करती है। खांसी, पित्त और सूजन में भी लाभदायक है। ब्राह्मी का उपयोग दिल और दिमाग को संतुलित करने के लिए लिए भी किया जाता है।कहा जाता है कि इसका सही मात्रा के अनुसार सेवन करने से निर्बुद्ध, त्रिकालदर्शी यानी भूत, भविष्य और वर्तमान सब दिखाई देने लगता है।जटामासी, शंखपुष्पी, जपा, अखरोट की तरह ब्राह्मी भी दिमाग और नेत्र के लिए बहुत ही उपयोगी है। ब्राह्मी नाम से कई तरह के टॉनिक बनते हैं। ब्राह्मी दरअसल एक जड़ी है, जो दिमाग के लिए बहुत ही उपयोगी है। यह दिमाग को शांत कर स्थिरता प्रदान करती है, साथ ही यह याददाश्त बढ़ाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।योग और आयुर्वेद के अनुसार बाह्मी से हमारे चक्र भी सक्रिय होते हैं। माना जाता है कि इससे दिमाग के बाएं और दाएं हेमिस्फियर संतुलित रहते हैं। ब्राह्मी में एंटी ऑक्सीडेंट तत्व होते हैं जिससे दिमाग की शक्ति बढ़ने लगती है।
सेवन : 

आधे चम्मच ब्राह्मी के पावडर को गरम पानी में मिला लें और स्वाद के लिए इसमें शहद मिला लें और मेडिटेशन से पहले इसे पीएं तो लाभ होगा। इसके 7 पत्ते चबाकर खाने से भी वही लाभ मिलता है।

6. पलाश:
पलाश के फूल को टेसू का फूल कहा जाता है। इसे ढाक भी कहा जाता है। यह बसंत ऋ‍तु में खिलता है। पलाश 3 प्रकार का होता है- एक वह जिसमें सफेद फूल उगते हैं और दूसरा वह जिसमें पीले फूल लगते हैं और तीसरा वह जिसमें लाल-नारंगी फूल लगते हैं। माना जाता है कि सफेद पलाश के फूल की एक गूटिका बनती है जिसे मुंह में रखने के बाद आदमी तब तक गायब रहता है जब तक की गूटिका पूर्णत: गल नहीं जाए।
 
तीनों ही तरह के पलाश के कई चमत्कारिक गुण हैं। माना जाता है कि सफेद पलाश के पत्तों से पुत्र की प्राप्ति की जा सकती है, जबकि इसके पौधे के घर में रहने से धन और समृद्धि बढ़ती है।पलाश के पत्ते, डंगाल, फल्ली तथा जड़ तक का बहुत ज्यादा महत्व है। पलाश के पत्तों का उपयोग ग्रामीण दोने-पत्तल बनाने के लिए करते हैं जबकि इसके फूलों से होली के रंग बनाए जाते हैं। हालांकि इसके फूलों को पीसकर चेहरे में लगाने से चमक बढ़ती है। पलाश की फलियां कृमिनाशक का काम करती हैं। इसके उपयोग से बुढ़ापा भी दूर रहता है। इसके फूल के उपयोग से लू को भगाया जा सकता है, साथ ही त्वचा संबधी रोग में भी यह लाभदायक सिद्ध हुआ है।इसके  पांचों अंगों- तना, जड़, फल, फूल और बीज से दवाएं बनाने की विधियां दी गई हैं। इस पेड़ से गोंद भी मिलता है जिसे ‘कमरकस’ कहा जाता है। इससे वीर्यवान बना जा सकता है। पलाश पुष्प पीसकर दूध में मिलाकर गर्भवती माताओं को पिलाने से बलवान संतान का जन्म होता है।सफेद पलाश के फूल, चांदी की गणेश प्रतिमा व चांदी में मड़े हुए एकाक्षी नारियल को अभिमंत्रित कर तिजोरी में रखें। इससे धन-संपत्ति बढ़ती है। माना जाता है कि पलाश के पीले फूल से सोना बनाया जा सकता है। प्राचीन साहित्य में इसका उल्लेख मिलता है।

7. बांदा :
बांदा, वांदा अथवा बंदाल नाम की परोपजीवी वनस्पति प्रात: सभी बड़े वृक्षों पर उग जाती है, जैसे आम, पीपल, महुआ, 
जामुन आदि। इसके पतले, लाल गुच्छेदार फूल और मोटे कड़े पत्ते पीपल के पत्ते के बराबर होते हैं। हालांकि बहुत से अलग-अलग भी बांदा होते हैं, जैसे पीपल का पेड़ किसी भी दूसरे पेड़ पर उग आता है तो उसे पीपल का बांदा कहते हैं। इसी तरह नीम, जामुन आदि के बांदा भी होते हैं। तंत्रशास्त्र के अनुसार प्रत्येक पेड़ पर उगा बांधा एक विशेष फल देता है।
बांदा का धार्मिक और कई मामलों में तांत्रिक महत्व भी है। कहते हैं कि भरणी नक्षत्र में कुश का वांदा लाकर पूजा के स्थान पर रखने से आर्थिक परेशानियां दूर होती हैं।
पुष्प नक्षत्र में इमली का वांदा लाकर दाहिने हाथ में बांधने से कंपन के रोग में आराम मिलेगा।
मघा नक्षत्र में हरसिंगार का वांदा लाकर घर में रखने से समृद्धि एवं संपन्नता में वृद्धि होती है।

विशाखा नक्षत्र में महुआ का वांदा लाकर गले में धारण करने से भय समाप्त हो जाता है। डरावने सपने नहीं आते हैं। शक्ति (पुरुषत्व) में वृद्धि होती है।
बरगद का बांदा बाजू में बांधने से हर कार्य में सफलता मिलती है और कोई आपको हानि नहीं पहुंचा सकता।
अनार का बांदा पूजा करने के बाद घर में रखने से किसी की बुरी नजर नहीं लगती और न ही भूत-प्रेत आदि नकारात्मक शक्तियों का घर में प्रवेश होता है।
बेर के बांदे को विधिवत तोड़कर लाने के पश्चात देव प्रतिमा की तरह इसको स्नान करवाएं व पूजा करें। इसके बाद इसे लाल कपड़े में बांधकर धारण कर लें। इस प्रकार आप जो भी इससे मांगेंगे, वह सब आपको प्राप्त होगा।हरसिंगार के बांदे को पूजा करने के बाद लाल कपड़े में लपेटकर तिजोरी में रखें तो आपको कभी धन की कमी नहीं होगी। आम के पेड़ के बांदे को भुजा पर धारण करने से कभी भी आपकी हार नहीं होती और विजय प्राप्त होती है।

8. श्वेत अपराजिता :

श्वेत अपराजिता का पौधा मिलना कठिन है। हालांकि नीले रंग का आसानी से मिल जाता है। श्वेत आंकड़ा और लक्ष्मणा का पौधा भी श्वेत अपराजिता के पौधे की तरह धनलक्ष्मी को आकर्षित करने में सक्षम है। इसके सफेद या नीले रंग के फूल होते हैं। अक्सर सुंदरता के लिए इसके पौधे को बगीचों में लगाया जाता है। इसमें बरसात के सीजन में फलियां और फूल लगते हैं।
संस्कृत में इसे आस्फोता, विष्णुकांता, विष्णुप्रिया, गिरीकर्णी, अश्वखुरा कहते हैं जबकि हिन्दी में कोयल और अपराजिता। बंगाली में भी अपराजिता, मराठी में गोकर्णी, काजली, काली, पग्ली सुपली आदि कहा जाता है। गुजराती में चोली गरणी, काली गरणी कहा जाता है। तेलुगु में नीलंगटुना दिटेन और अंग्रेजी में मेजरीन कहा जाता है।दोनों प्रकार की कोयल (अपराजिता), चरपरी (तीखी), बुद्धि बढ़ाने वाली, कंठ (गले) को शुद्ध करने वाली, आंखों के लिए उपयोगी होती है। यह बुद्धि या दिमाग और स्मरण शक्ति को बढ़ाने वाली है तथा सफेद दाग (कोढ़), मूत्रदोष (पेशाब की बीमारी), आंवयुक्त दस्त, सूजन तथा जहर को दूर करने वाली है।

9. कीड़ा घास :

कीड़े जैसी दिखने के कारण उत्तराखंड के लोग इसे कीड़ा घास कहते हैं। तिब्बती भाषा में इसको ‘यारसाद्-गुम-बु’ कहा जाता है जिसका अर्थ होता है ग्रीष्म ऋतु में घास और शीत ऋतु में जंतु। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार यर्सी गंबा हिमालयी क्षेत्र की विशेष प्रकार एवं यहां पाए जाने वाले एक कीड़े के जीवनचक्र के अद्भुत संयोग का परिणाम है।
कहते हैं कि उत्तराखंड के पिथौरागढ़ एवं चमोली जिले के 3,500 मीटर की ऊंचाई के एल्पाइन बुग्यालों में यह घास पाई जाती है। तिब्बती साहित्य के अनुसार यहां के चरवाहों ने देखा कि जंगलों में चरने वाले उनके पशु एक विशेष प्रकार की घास, जो कीड़े के समान दिखाई देती है, को खाकर हृष्ट-पुष्ट एवं बलवान हो जाते हैं। धीरे-धीरे यह घास एक चमत्कारी औषधि के रूप में अनेक बीमारियों के इलाज के लिए प्रयोग होने लगी।
यह नारंगी रंग की एक पतली जड़ की तरह दिखाई देती है जिसका भीतरी भाग सफेद होता है। इसका ऊपरी भाग एक स्प्रिंग की भांति घुमावदार होता है जिस पर झुर्रियां होती हैं। इन झुर्रियों के कारण ही यह इल्लड़ जैसी लगती है। इन झुर्रियों की मुख्य रचना में 7-8 आकृतियां झुंड के रूप में मिलती हैं। इनमें बीच की रचनाएं बड़ी एवं महत्वपूर्ण होती हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार ये झुंड वस्तुत: कार्डिसेप्स नामक फफूंद के सूखे हुए अवशेष होते हैं। उनके अनुसार इस घास में एस्पार्टिक एसिड, ग्लूटेमिक एसिड, ग्लाईसीन जैसे महत्वपूर्ण एमीनो एसिड तथा कैल्शियम, मैग्नीशियम, सोडियम जैसे अनेक प्रकार के तत्व, अनेक प्रकार के विटामिन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। इसको एकत्रित करने के लिए अप्रैल से लेकर जुलाई तक का समय उपयुक्त होता है। अगस्त के महीने से धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से इसका क्षय होने लगता है और शरद ऋतु के आने तक यह पूर्णतया विलुप्त हो जाती है।यह औषधि हृदय, यकृत तथा गुर्दे संबंधी व्याधियों में उपयोगी सिद्ध हुई है। शरीर के जोड़ों में होने वाली सूजन एवं पीड़ा तथा जीर्ण रोगों जैसे अस्थमा एवं फेफड़े के रोगों में इसका प्रयोग लाभकारी होता है। इसका प्रयोग शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। उम्र के साथ-साथ बढ़ने वाली हृदय एवं मस्तिष्क की रक्त वाहिनियों की कठोरता को भी यह कम करता है। कुल मिलाकर यह आपकी बढ़ती आयु को रोकने में सक्षम है।

10. सिद्धि देने वाली जड़ी-बूटी :
गुलतुरा (दिव्यता के लिए), तापसद्रुम (भूतादि ग्रह निवारक), शल (दरिद्रता नाशक), भोजपत्र (ग्रह बाधाएं निवारक), विष्णुकांता (शस्त्रु नाशक), मंगल्य (तांत्रिक क्रिया नाशक), गुल्बास (दिव्यता प्रदानकर्ता), जिवक (ऐश्वर्यदायिनी), गोरोचन (वशीकरण), गुग्गल (चामंडु सिद्धि), अगस्त (पितृदोष नाशक), अपमार्ग (बाजीकरण)।बांदा (चुम्बकीय शक्ति प्रदाता), श्‍वेत और काली गुंजा (भूत पिशाच नाशक), उटकटारी (राजयोग दाता), मयूर शिका (दुष्टात्मा नाशक) और काली हल्दी (तांत्रिक प्रयोग हेतु) आदि ऐसी अनेक जड़ी-बूटियां हैं, जो व्यक्ति के सांसारिक और आध्यात्मिक जीवन को साधने में महत्वपूर्ण मानी गई हैं।

11. भूख-प्यास को रोके जड़ी :

वेदादि ग्रंथों के अलावा कौटिल्य के अर्थशास्त्र में जड़ी-बूटी, दूध आदि से निर्मित ऐसे आहार का विवरण है जिसके सेवन के बाद पूरे महीने भोजन की जरूरत नहीं पड़ती।
कहते हैं कि आंधीझाड़ा से अत्यधिक भूख लगने (भस्मक रोग) और अत्यधिक प्यास लगने का रोग समाप्त किया जा सकता है। अर्थात जो लोग ज्यादा खाने के शौकीन हैं और मोटापे से ग्रस्त हैं वे इस जड़ी का उपयोग कर भूख को समाप्त कर सकते हैं।इसे संस्कृत में अपामार्ग, हिन्दी में चिरचिटा, लटजीरा और आंधीझाड़ा कहते हैं। अंग्रेजी में इसे रफ चेफ ट्री नाम से जाना जाता है। यह पौधा 1 से 3 फुट ऊंचा होता है और भारत में सब जगह घास के साथ अन्य पौधों की तरह पैदा होता है। खेतों की बागड़ के पास, रास्तों के किनारे, झाड़ियों में इसे सरलता से पाया जा सकता है।




वायरल फीवर के घरेलू नुस्खे ,आहार और बुखार की कमजोरी दूर करने के उपाय


                                                      

    मौसम में बदलाव के साथ ही शरीर में भी कई प्रकार के बदलाव शुरू हो जाते हैं और गर्मी में मौसम नमीयुक्त और चिपचिपा होने लगता है। इस मौसम में वायरल बुखार से ज्यादा लोग प्रभावित होते हैं। वायरस से होने वाला बुखार, गला दर्द व नाक बहने की समस्याएं ज्यादा लेकर आता है। यह बुखार बच्चों व बडों को समान रूप से प्रभावित करता है। वायरल में संक्रमण की स्थिति कुछ दिनों से लेकर कुछ हफ्तों तक रह सकती है। वायरल में कई लोग खाना-पीना छोड देते हैं। लेकिन खाना छोडने से बीमारी और बढ सकती है। इसलिए जहां तक संभव हो वायरल में खूब खाना खाएं और डिहाइडेशन से बचने के लिए खूब पानी पिएं।
वायरल बुखार में खाने के फायदे
वायरल बुखार तभी होता है जब शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है और रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढाने के लिए खान-पान का उचित ध्यान रखना चाहिए। अगर सेहतमंद ओर प्रोटीन युक्त खाना खाया जाए तो शरीर में रोग-प्रतिरोधक क्षमता खुद निर्मित हो जाती है। सादा, ताजा खाना ही खाएं क्योंकि है वीफूड आसानी से पच नहीं सकते हैं। रखे हुए खाने को गर्म करके ही खाएं क्योंकि इससे सभी बैक्टीरिया समाप्त हो जाते हैं। खाने में अदरक, लहसुन, हींग, जीरा, काली मिर्च, हल्दी और धनिये का प्रयोग अवश्य करें क्योंकि इनमे पाए जाने वाले तत्व पाचन शक्ति को बढाते हैं और वायरल के कीटाणुओं से लडते हैं।

वायरल बुखार में क्या-क्या खाएं

मौसमी संतरा व नीबूं खाएं जिसमें विटामिन-सी और वीटा कैरोटींस होता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है।
वायरल फीवर होने पर डाई फूड खूब खाना चाहिए। डाई फूड में जिंक भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
लहसुन में कैल्सियम, मैग्नीशियम, फास्फोरस और खनिज तत्व पाए जाते हैं। इससे सर्दी, जुकाम, दर्द, सूजन और त्वचा से संबंधित बीमारियां नहीं होती हैं। लहसुन घी या तेल में तलकर चटनी के रूप में भी प्रयो‍ग किया जा सकता है।
खूब पानी पियें। इससे डिहाइडेशन के अलावा शरीर पर हमला करने वाले माइक्रो आर्गेनिज्म को बाहर निकालने में मदद मिलती है।
तुलसी के पत्ते में खांसी, जुकाम, बुखार और सांस संबंधी रोगों से लडने की शक्ति है। बदलते मौसम में तुलसी के पत्तियों को उबालकर या चाय में डालकर पीने से नाक और गले के इंफेक्शन से बचाव होता है।
वायरल बुखार में हरी और पत्तेदार सब्जियों का अधिक मात्रा में प्रयोग करें। क्योंकि हरी सब्जियों में पानी की मात्रा ज्यादा होती है जिससे डिहाइडेशन नहीं होता है।
टमाटर, आलू और संतरा खाएं। इनमें विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाया जाता है।
वायरल में दही खाना बंद न करें क्योंकि दही खाने से बैक्टीरिया से लडने में सहायता मिलती साथ ही यह पाचन क्रिया को सही रखता है। पेट खराब, आलसपन और बुखार को दूर करता है।
वायरल में गाजर खाएं, इसमें केरोटीन पाया जाता है जिससे रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढती है और कीटाणुओं से लडने में मदद मिलती है।
अधिक मात्रा में केले और सेब का सेवन करें। इन दोनों ही में अधिक मात्रा में पोटैसियम पाई जाती है जो ऐसा इलेक्ट्रोलाइट है दस्‍त समाप्‍त होती है।
वयरल बुखार में खाना खूब खाएं लेकिन खाने का गलत कंबीनेशन कभी ना लें। मसलन अगर आप दही खा रहे हैं तो हैवी नॉनवेज या नींबू अथवा कोई खटटी चीज ना खाएं। ठंडे और तरल पेय पदार्थों का सेवन न करें क्योंकि वे शरीर में पानी रोकते हैं और असंतुलन होता है। वायरल होने पर दिमाग पर बिलकुल जोर ना लगाएं क्योंकि ऐसा करने से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होगी और वायरल ज्यादा दिनों तक रह सकता है।
वायरल होने से वाले शरीर में कुछ इस तरह के लक्षण दिखते हैं जैसे, गले में दर्द, खांसी, सिर दर्द, थकान, जोड़ों में दर्द के साथ ही उल्टी और दस्त होना, आंखों का लाल होना और माथे का बहुत तेज गर्म होना आदि. बड़ों के साथ यह वायरल फीवर बच्चों में भी तेजी से फैलता है.
इन घरेलू उपचार से आप इस इंफेक्शन से राहत पा सकते हैं...

1. हल्दी और सौंठ का पाउडर

अदरक में एंटी आक्सिडेंट गुण बुखार को ठीक करते हैं. एक चम्मच काली मिर्च का चूर्ण, एक छोटी चम्मच हल्दी का चूर्ण और एक चम्मच सौंठ यानी अदरक के पाउडर को एक कप पानी और हल्की सी चीनी डालकर गर्म कर लें. जब यह पानी उबलने के बाद आधा रह जाए तो इसे ठंडा करके पिएं. इससे वायरल फीवर से आराम मिलता है.

2. तुलसी का इस्तेमाल

तुलसी में एंटीबायोटिक गुण होते हैं जिससे शरीर के अंदर के वायरस खत्म होते हैं. एक चम्मच लौंग के चूर्ण और दस से पंद्रह तुलसी के ताजे पत्तों को एक लीटर पानी में डालकर इतना उबालें जब तक यह सूखकर आधा न रह जाए. इसके बाद इसे छानें और ठंडा करके हर एक घंटे में पिएं. आपको वायरल से जल्द ही आराम मिलेगा.

3. धनिया की चाय

धनिया सेहत का धनी होता है इसलिए यह वायरल बुखार जैसे कई रोगों को खत्म करता है.वायरल के बुखार को खत्म करने के लिए धनिया चाय बहुत ही असरदार औषधि का काम करती है.

4. मेथी का पानी

आपके किचन में मेथी तो होती ही है.मेथी के दानों को एक कप में भरकर इसे रात भर के लिए भिगों लें और सुबह के समय इसे छानकर हर एक घंटे में पिएं. जल्द ही आराम मिलेगा.

5. नींबू और शहद

नींबू का रस और शहद भी वायरल फीवर के असर को कम करते हैं. आप शहद और नींबू का रस का सेवन भी कर सकते हैं.
अक्सर लंबे समय से चले आ रहे बुखार या ज्यादा श्रम करने के बाद शरीर एकदम सुस्त सा महसूस करता है। शरीर में कमजोरी आने से इसका सीधा असर हमारी कार्यक्षमता पर पड़ता है। शहरी जीवन भागदौड़ भरा होता है जबकि वनांचलों में आदिवासियों की जीवनचर्या बेहत नियमित होती है साथ ही इनके भोजन और जीवनशैली में वनस्पतियों का बेजा इस्तमाल होता है और शायद यही वजह है जिससे वनवासियों की औसत आयु आम शहरी लोगों से ज्यादा होती है।लगातार कंप्यूटर पर बैठे रहना, खानपान के समय में अनियमितता और तनाव भरा जीवन मानसिक और शारीरिक तौर से थका देता है।

गोंद शारीरिक ऊर्जा के लिए उत्तम -

पीपल के पेड़ से निकलने वाली गोंद को शारीरिक ऊर्जा के लिए उत्तम माना जाता है। मिश्री या शक्कर के साथ पीपल की करीब 1 ग्राम गोंद मात्रा लेने से शरीर में ऊर्जा का संचार होता है और यह थकान मिटाने के लिए एक कारगर नुस्खा माना जाता है। प्रतिदिन इसका सेवन करते रहने से बुजुर्गों की सेहत भी बनी रहती है।

 दैनिक आहार के रूप में अपनाए पेजा -

पातालकोट (मप्र) जैसे दूरगामी आदिवासी अंचलों में प्रो-बायोटिक आहार “पेजा” दैनिक आहार के रूप में सदियों से अपनाया जाता रहा है और इसका भरपूर सेवन भी किया जाता है। पेजा एक ऐसा व्यंजन है जो चावल, छाछ, बारली (जौ), निंबू और कुटकी को मिलाकर बनाया जाता है। आदिवासी हर्बल जानकार इस आहार को कमजोरी, थकान और बुखार आने पर अक्सर रोगियों को देते हैं। पके हुए चावल, जौ और कुटकी को एक मिट्टी के बर्तन में डाल दिया जाता है और इसमें छाछ मिला दी जाती है जिससे कि यह पेस्ट की तरह गाढ़ा बन जाए। इस पूरे मिश्रण पर स्वादानुसार नींबू का रस और नमक मिलाकर अंधेरे कमरे में रख दिया जाता है। दो दिनों के बाद इसे फेंटकर एक खास व्यंजन यानि पेजा तैयार हो जाता है। भोजन के वक्त एक कटोरी पेजा का सेवन जरूरी माना जाता है और ये बेहद स्वादिष्ट भी होता है।

लटजीरा के पौधे रस

लटजीरा के संपूर्ण पौधे के रस (4 मिली प्रतिदिन) का सेवन तनाव, थकान और चिढ़चिढ़ापन दूर करता है साथ ही इसकी वजह से नींद नहीं आने की समस्या में भी राहत मिलती है। सेवन करने से निश्चित फायदा मिलता है। टमाटर के साथ फराशबीन का सूप शरीर में अक्सर होने वाली थकान, ज्यादा पसीना आना और कमजोरी दूर करने के लिए आदिवासी टमाटर के साथ फराशबीन को उबालकर सूप तैयार करते हैं और दिन में दो बार चार दिनों तक देते हैं, माना जाता है कि यह सूप शक्तिवर्धक होता है।

कद्दू के बीज फायदेमंद

ग्रामीण इलाकों में जी मचलना, थकान होना या चिंतित और तनावग्रस्त व्यक्ति को कद्दू के बीजों को शक्कर के साथ मिलाकर खिलाया जाता है। कद्दू के करीब 5 ग्राम बीज और इतनी ही मात्रा में मिश्री या शक्कर की फांकी मारी जाए तो बेहद फायदा होता है। ये मानसिक तनाव भी दूर करते हैं। 

आलू- बुखारे का करें सेवन -

आलू- बुखारे के सेवन से शरीर से टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते हैं, कब्जियत दूर होती है और पेट की बेहतर सफाई होती है। इन फलों में पाए जाने वाले फ़ाईबर्स और एंटी ऑक्सिडेंट्स की वजह से पाचन क्रिया ठीक तरह से होती है और शरीर की कोशिकाओं में मेटाबोलिज़्म की क्रिया सुचारू क्रम में होती है। इन फलों में सिट्रिक एसिड पाया जाता है जो कि थकान दूर करने में सहायक होता है और इसके सेवन से लीवर यानि यकृत तथा आंतो की क्रियाविधियां सुचारू रहती हैं अत: आलू-बुखारा खाने से शरीर में जमा अतिरिक्त वसा या ज्यादा वजन कम करने में मदद होती है और व्यक्ति शारीरिक तौर पर बेहद स्वस्थ महसूस करता है। 

दूब घास/दूर्वा का प्रतिदिन करें सेवन

आदिवासियों के अनुसार दूब घास/दूर्वा का प्रतिदिन सेवन शारीरिक स्फूर्ति प्रदान करता है और शरीर को थकान महसूस नहीं होती है। करीब 10 ग्राम ताजी दूर्वा को एकत्र कर साफ धो लिया जाए और इसे एक गिलास पानी के साथ मिलाकर ग्राईंड कर लिया जाए और पी लिया जाए, यह शरीर में ताजगी का संचार लाने में मददगार होती है। वैसे आधुनिक विज्ञान के अनुसार भी दूब घास एक शक्तिवर्द्धक औषधि है क्योंकि इसमें ग्लाइकोसाइड, अल्केलाइड, विटामिन `ए´ और विटामिन `सी´ की पर्याप्त मात्रा पाई जाती है।

दूध के साथ लें शहद -

शहद को दूध के साथ मिलाकर लिया जाए तो हृदय, दिमाग और पेट के लिए फ़ायदेमंद होता है। नींबू पानी के साथ शहद मिलाकर पीने से ये शरीर को ऊर्जा और ठंडक प्रदान करता है। आदिवासियों का मानना है कि यदि शहद का सेवन प्रतिदिन किया जाए तो ये शरीर को चुस्त दुरुस्त रखने में काफ़ी मदद करता है साथ ही शारीरिक ताकत को बनाए रखकर थकान दूर करता है।

कच्चे आलू का रस लें -

हम जानते हैं कि आलू में पोषक तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। कच्चे आलू को कुचलकर एक चम्मच रस तैयार किया जाए और इसे दिन में कम से कम चार बार लिया जाए। आदिवासी हर्बल जानकारों के अनुसार आलू का रस रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है और कई प्रकार के रोगों से लड़ने की क्षमता शरीर को मिल जाती है। आलू की मदद से कमजोरी, थकान और ऊर्जा की कमी को काफी हद तक कम किया जा सकता है। उबले आलूओं का सेवन भी थकान दूर भगाने में बेहद कारगर होता है। 

थकान मिटाए तुलसी

पातालकोट के आदिवासी हर्बल जानकार तुलसी को थकान मिटाने वाली एक औषधि मानते हैं, इनके अनुसार अत्यधिक थकान होने पर तुलसी के पत्तियों और मंजरी के सेवन से थकान दूर हो जाती है। तरबूजे के छिलकों का मुरब्बा तरबूज के छिलकों की आंतरिक सतह को काटकर आदिवासी इनका मुरब्बा तैयार करते हैं, माना जाता है कि यह बेहद शक्तिवर्धक होता है। इसके छिलकों को बारीक काटकर सुखा लेते हैं और चूर्ण तैयार कर लिया जाता है। माना जाता है कि इस चूर्ण की आधी चम्मच मात्रा प्रतिदिन सुबह खाली पेट लेने से शरीर में ताकत का संचार होता है और कई तरह की व्याधियों में राहत भी मिलती है, कुल मिलाकर ये पूर्ण रूप से सेहत दुरुस्ती के लिए कारगर होता है।

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फास्ट फूड हानिकारक है तंदुरुस्ती के लिए


      आज हर बड़े और छोटे शहरों के हर गली और नुक्कड़ में मेढ़क के छाते की तरह फास्ट फूड जॉइन्ट पनपता जा रहा है। बड़े-बूढ़े और जवान सभी वहाँ भीड़ लगाकर अपने भूख को शांत करने के लिए व्यस्त रहते हैं। यह आश्चर्य की बात है कि ऐसा क्या है जो इन जॉइन्ट को इतना लोकप्रिय बना रहा है। क्या वहाँ का खाना स्वादिष्ट और पुष्टिकारक होता है? फास्ट फूड वास्तविक रूप में है क्या? फास्ट फूड शब्द का मतलब वह खाना जो ज़ल्दी बनता भी है और तुरन्त परोसा भी जा सकता है। फास्ट फूड शब्द को 1951 में मरिअम वेबस्टर के शब्दकोश से पहचान मिली।

सही में फास्ट फूड है क्या?

जो खाना कम समय में तैयार हो सके उसको फास्ट फूड कहते हैं। रेस्तरां या स्टोर में जो खाना पकाया रहता है और सिर्फ गर्म करके परोसा जाता है वही इसका सही अर्थ है। ले जाने के लिए फास्ट फूड पैकेज में भी पाया जाता है।
यह खाना साधारणतः दुकान में पाए जाता हैं, जो स्टॉल/बूथ की तरह होते हैं, जहाँ आश्रय का स्थान या बैठने का स्थान नहीं होता है। उन्हें क्विक सर्विस रेस्तरां भी कहते हैं। फूड स्टफ का रेस्तरां चेन भी होता है जो केंद्र स्थल से फूड स्टफ विशेष विक्रय अधिकार दुकान तक भेजते हैं।

फास्ट फूड प्रतिष्ठित कैसे हुआ

पका हुआ खाना का विक्रय शहरी विकास से संबंधित है। समय आजकल के लिए सबसे महंगा ज़रूरत का समान बन गया है। लोगों के पास बैठकर संपूर्ण खाना खाने का समय नहीं है। विशेषकर काम करनेवालों के लिए जो दोपहर के खाने के वक्त कुछ जल्दी से चबाकर पेट भर लेना चाहते हैं, वे फास्ट फूड ज़्वाइंट में जाना पसंद करते हैं।
आजकल लोग अलग रहना ज़्यादा पसंद करते हैं, संगठित परिवार के जगह। एकल परिवार में दोनों पति-पत्नी काम करते हैं, उनके पास चूल्हे के पास जाकर खाना बनाने का समय कम होता है। ऐसे परिवार बाहर से खाना मँगाकर खाना पसंद करते हैं, जहाँ खर्चा थोड़ा होता है या घर में दे जाने के लिए कुछ नहीं लगता है।

फास्ट फूड आधुनिक युग का विकास नहीं है

मध्य युग से ही फास्ट फूड का पता चलता है, जहाँ वेन्डर द्वारा पका हुआ माँस, फ्लान, पाईस, पेस्ट्रीस, वेफर, वेफल्स, पैनकेक लंदन और पैरिस जैसे शहर में बेचे जाते थे। अविवाहित लोग जो अकेले रहते थे, वे ही ज़्यादातर ग्राहक होते थे, जिन्हें खुद खाना बनाना पड़ता था। वे क्वाटर में रहते थे और वे किचन की सुविधा उपभोग करने में असमर्थ थे उन्हें फास्ट फूड खाकर ही पेट भरना पड़ता था। यात्री और तीर्थयात्री को धार्मिक जगहों पर फास्ट फूड खाकर भूख को संतुष्ट करना पड़ता है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद मोटरगाड़ी की सुविधा आम लोगों को मिली, इस तरह कुछ चलयमान रेस्तरां का भी आर्विभाव हुआ।

इस तरह के दुकान में कैसा खाना मिलता है 

ज़्यादातर आधुनिक वाणिज्यिक फास्ट-फूड से संसाधित होते हैं जो मानक उत्पादक के तरीके और पाकशैली में मानक सामग्री डालकर बड़ी मात्रा में पकाये जाते हैं। उनको कार्टन या प्लास्टिक में रैप करके दिया जाता है जिससे उत्पादक का खर्चा कम पड़ता है। मुख्यतः फास्ट फूड का मेनू संसाधित सामग्री से बनता है और केंद्र स्थल से अलग-अलग दुकान में जाता है, जहाँ गरम करके परोसा जाता है, या तो डीप फ्राई करके, माइक्रोवेव में या जल्दी एकत्र करके दिया जाता है। इस तरह उत्पादक को मार्केट में क्वालिटी और नाम बनाए रखने में सहायता होती है ।

फास्ट फूड खाने से हानि और लाभ

वे खाने की बजाय फास्ट फूट का सेवन ज्यादा पसंद करते हैं। आर्युवेद में फास्ट फूड को स्वास्थ्य के लिए जहर कहा गया है। आज इस लेख के जरिये हम आपको फास्ट फूड के सेवन से होने वाले नुकसान और इसके फायदे के बारे में विस्तार से बता रहे हैं।

दिल संबंधी रोग

शरीर में कोलेस्ट्राल की मात्रा बढ़ने के लिए फास्टफूड काफी हद तक जिम्मेदार होता है। कोलेस्ट्रॉल बढ़ने से दिल संबंधी बीमारियों का खतरा काफी बढ़ जाता है। वहीं दूसरी तरफ वजन बढ़ने से भी हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
 
मोटापे की समस्या

फास्ट फूड में कैलोरी और शुगर की मात्रा ज्यादा होती है। इसके ज्यादा सेवन से आपका वजन बढ़ने लगता है। पोषक तत्वों की कमी के कारण फास्ट शरीर को नुकसान पहुंचाता है। फास्ट फूड का संयमित सेवन आपकी सेहत को नुकसान नहीं पहुंचाता।

थकान

फास्ट फूड खाने वाले व्यक्तियों या बच्चों को थकान बहुत जल्दी होने लगती है। फास्ट फूड के सेवन से आपका पेट को एकदम भर जाता है लेकिन इसमें पोषक तत्वों की कमी के कारण पर्याप्त प्रोटीन, विटामिन आदि नहीं होने के कारण आपका शरीर में विटामिन की कमी हो जाती है। ऐसे में थोड़ा चलने पर ही आपको थकान होने लगती है।

तनाव

यदि आप भूख लगने पर फास्ट फूड के सेवन को तरजीह देते हैं तो यह आपके तनाव का कारण भी बन सकता है। जो लोग अपने जीवन में ज्यादा फास्ट फूड का सेवन करते हैं, उनके तनाव का स्तर उतना ही ज्यादा होता है।

डायबिटीज

फास्ट फूड के सेवन से टाइप 2 डायबिटीज होने का खतरा काफी ज्यादा रहता है। टाइप 2 डायबिटीज फास्ट फूड और जंक फूड के सेवन, बिगड़ी हुई लाइफस्टाइल, असमय खाने और शारीरिक रूप से कम एक्टिव रहने के कारण होती है।

कैंसर

हाल हीं में प्रकाशित एक शोध के मुताबिक शुगर और फैट से भरे फास्ट फूड का सेवन करने से पेट से संबंधित कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है। एक अन्य शोध के मुताबिक फास्ट फूड प्रोस्टेट कैंसर का भी कारण है।

फास्ट फूड की अच्छाई

मिलने में सुविधाजनक

फास्ट फूड हर गली-मोहल्ले में आसानी से मिलने वाला खाद्य पदार्थ है। अधिकतर रेस्टोरेंट तो फास्ट फूड की फ्री होम डिलीवरी भी करते हैं। हाइवे और रास्ते पर फास्ट फूड रेस्टोरेंट के ड्राइव-थ्रू काउंटर बने हुए हैं, इनसे आप बिना किसी देरी के फास्ट फूड लेकर खा सकते हैं। यदि आप एकदम पेट भरने के लिए कुछ खाना चाहते हैं तो ऐसे में फास्ट फूड एक बेहतर विकल्प है।

रुपये और समय की बचत

फास्ट फूड गली और चौराहों पर आराम से मिलने के कारण पौष्टिक खाने के मुकाबले काफी सस्ता भी होता है। एक रिपोर्ट के मुताबिक घर में बने खाने के मुकाबले फास्ट फूड काफी सस्ता होता है। वहीं समय की बात करें तो फास्ट फूड अन्य भोजन के मुकाबले आसानी से मिल और बन जाता है तो इस कारण इसे खाने से समय की भी बचत हो जाती है।


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आँख से ज्यादा पानी गिरने (आँसू) के घरेलू उपचार

                                                 


    आँखों में पानी आने का कारण आंसुओं का ज्यादा बनना, सूजन या सामान्य आंसुओं का पूरी तरह नहीं निकल पाना है। इसके इलाज के लिए कुछ घरेलू नुस्खे फायदेमंद है। आंखों की सूजन को कम करने के आसान घरेलू उपचार आँखों से पानी आना (अश्रुपात) वह स्थिति है जिसमें बिना किसी कारण के आँसू पैदा होते हैं और पूरी तरह बाहर नहीं निकल पाते हैं।इसका समाधान घरेलू इलाज से हो सकता है
ठंडे या गरम कपड़े से दबाना आंसू नलिकाओं की रुकावट आँखों में पानी का प्रमुख कारण है। ठंडे या गरम कपड़े से दबाने से आँखों से यह परत हट जाती है, जिससे जहरीले पदार्थ भी बाहर निकाल जाते हैं और आँख की ललाई और जलन ठीक हो जाती है।

धनिया का इस्तेमाल –

 धनिया हमारे स्वस्थ्य के लिए बहुत अच्छा होता है अगर आपको आँख से जुडी कोई परेशानी हो तो ऐसे में धनिया और चीनी को मिलाकर पीस ले|और अब इसे पानी में मिलाकर उबाल ले|जब उबल जाये तो ठंडा करके इसे छान ले|अब इसे आप इस्तेमाल करे ऐसा कुछ दिन करने से आपको बहुत लाभ होगा|

इलाइची –

हम सभी के शरीर को स्वस्थ रखने में इलाइची बहुत मदद करती है अगर किसी को आँख से रिलेटेड कोई दिक्कत हो तो ऐसे में आप इलाइची को पीस ले|अब इसे आप गरम दूध में मिलाकर सेवन करे आप अगर रात में इसका सेवन करेगे तो फायदा अधिक होगा|

बादाम –

बादाम हमारे सेहत के लिए बहुत उपयोगी होता है|बादाम हमारी आँख के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है|रात को सोते समय आप बादाम को दूध के साथ मिलाकर रख दे|सुबह उठकर आप बादाम को खा ले और उस दूध में चन्दन मिलाकर अच्छे से आँखों और पलकों की धुलाई करे ऐसा करने से आँख की लालिमा ख़तम तो हो ही जाएगी साथ ही आँख से अगर पानी गिर रहा हो तो उससे भी राहत मिल जाती है|यदि कोई धूल मिट्टी चली गई हो यदि आपको लगे कि कोई बाहरी तत्व या धूल, मिट्टी आँखों में चली गई है तो आप गीले कपड़े से इसे साफ कर सकते हैं। आंसुओं को हाथों के बजाय गीले कपड़े से ही साफ करें क्यों कि हाथों में कई बैक्टीरिया होते हैं। 
नारियल का तेल हम सब जानते हैं कि नारियल का तेल एक अच्छा मोश्चुराइजर है। इसे आँखों के आस पास रगड़ने से आराम मिलेगा।

नमक और पानी का घोल 

आँखों में पानी होने पर जलन और खुजली चलती है। ऐसे में आप नमक और पानी का घोल घर पर बनाकर इलाज कर सकते हैं। नमक एक एंटी-बैक्टीरियल होने के कारण यह जहरीले बैक्टीरिया को आँखों से बाहर निकाल देता है। इसे 3 दिन तक दिन में कई बार लगाएँ।

टी बैग 

ठंडे या गरम कपड़े से दबाने की तरह ही टी बैग भी एक अच्छा घरेलू उपाय है। टी बैग को कुछ देर गर्म पानी में रखें। जब यह गर्म हो जाये तो इसे आँखों पर रखें। कैमोमाइल, पेपरमिंट और स्पेयरमिंट पानी भरी आँखों के इलाज के लिए कारगर हैं।

बेकिंग सोडा – 


बेकिंग सोडा हमारी आँखों के लिए बहुत लाभकारी होता है अगर किसी की आँखों में कोई भी परेशानी हो जैसे आँख में जलन और दर्द या लालिमा और फिर आँख से पानी आने जैसे परेशानी में आप बेकिंग सोडा का इस्तेमाल कर सकते है इसका इस्तेमाल आपको बताये की आप गरम पानी में सोडे को मिला ले|जब पानी ठंडा हो जाये तो उसी से अपने आँख और पलकों की अच्छे से धुलाई करे ऐसा नियमित रूप से करने से आपको बहुत राहत मिलेगी और मै उम्मीद के साथ कह सकता हू की आपको बहुत फायदा होगा|

नसों को ब्लाकेज से बचाने वाले भोजन पदार्थ

                             

                     

    तेज रफ्तार में भागती जिंदगी ने हमारी जीवनशैली को पूरी तरह से बिगाड़ कर रख दिया है। खान-पान की गलत आदतों के चलते आज हम कम उम्र में सेहत से जुड़ी कई परेशानियों का सामना कर रहे हैं। डायबिटीज, हाई ब्लड प्रैशर, कोलेस्ट्रॉल, अस्थमा, हार्ट से जुड़ी समस्याएं आम हो गई है। इसी के साथ नसों की ब्लाकेज की समस्या भी काफी सुनने को मिल रही है। आकड़ों की मानें तो उत्तरी भारत में लगभग 40 प्रतिशत लोगों की धमनियां कमजोर है। 20 प्रतिशत महिलाओं को गर्भावस्था के बाद यह परेशानी होती है। इसकी पहचान सही समय पर नहीं हो पाती, जिसका असर वैरिकाज वेंस (varicose veins) के रूप में सामने आता है। पैरों में सूजन व नसों के गुच्छे बनने शुरू हो जाते हैं।
    दरअसल, नसों की कमजोरी और ब्लॉकेज होने का कारण हमारी डाइट में पोषक तत्वों की कमी है। संतुलित की बजाए बाहर का तला भूना व फास्ट फूड खाने से हमारे रक्त में अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा बढ़ जाती हैं जो नसों के ब्लड सर्कुलेशन में रूकावट डालना शुरू कर देते हैं। इससे शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल की मात्रा बढ़ने लगती है, जिससे नसों में खून का प्रवाह अच्छे से नहीं होता और थका जमना शुरू हो जाता है जो बाद में ब्लाकेज का रूप ले लेता है। हार्ट व शरीर के अन्य हिस्सों में ब्लॉकेज खोलने के लिए सर्जरी व दवाओं का सहारा लिया जाता है जो काफी महंगा इलाज है।
किन लोगों को होती है ब्लाकेज की परेशानी
वेन ब्लॉकेज की परेशानी तब होती है जब खून संचारित होकर दिल तक नहीं पहुंचता जो बाद में गांठों और गुच्छे के रूप में हमारे सामने आता है। यह परेशानी उन लोगों को होती हैं जो लगातार कई घटों रोजाना एक ही पोस्चर में बैठकर काम करते हैं। वैरिकॉज की परेशानी पैरों की धमनियों में अधिक होती हैं क्योंकि यहां खून के प्रवाह का भार अधिक होता है।
आहार जो करते हैं धमनियों की नैचुरल सफाई
    मेडिटेरेनियन डाइट प्लान जिसमें कम मात्रा में कोलेस्ट्रॉल हो लेकिन फाइबर की मात्रा भरपूर हो। शुगर व नमक का कम सेवन करें और मक्खन की जगह आलिव ऑयल वसा का इस्तेमाल करें। धमनियों के अनुकूल खाद्य पदार्थ व हर्ब जैसे चने, अनार, जई, एवाकाडो, लहसुन, केसर, हल्दी, कैलामस, हरी सब्जियों व फलों का सेवन करें। खाना खाने के बाद गुनगुना गर्म पानी का सेवन जरूर करें क्योंकि इसे नसों में ब्लाकेज का खतरा काफी हद तक कम हो जाता है। मैटाबॉलिज्म को बढ़ाने के लिए एरोबिक एक्सरसाइज का सहारा लें।

लहसुन


लहसुन कोलेस्ट्रॉल को घटाने में काफी लाभदायक है इसलिए अपने आहार में लहसुन को जरूर शामिल करें। बंद धमनियों की समस्या होने पर 3 लहसुन की कली को 1 कप दूध में उबाल कर पीएं।

एवोकाडो

एवोकाडो में मौजूद मिनरल्स, विटामिन A, E और C कोलेस्ट्रॉल को कंट्रोल में रखते है। इससे रक्त कोशिकाओं में कोलेस्ट्रॉल जमा नहीं होता और आप ब्लाकेज की समस्या से बचे रहते है।

ओट्स

ओट्स का रोजाना सुबह नाश्ते में सेवन भी ब्लाकेज की समस्या को दूर करता है। इसमें फाइबर भरपूर मात्रा में पाया जाता है

पर्याप्त नींद

इसके अलावा भरपूर नींद लें क्योंकि नींद लेने से हार्मोंनल संतुलन नहीं बिगड़ता।

धूम्रपान को कहें ना 

धूम्रपान भी नसों की ब्लाकेज का मुख्य कारण है। इसलिए अगर आप स्मोकिंग करते हैं तो उसे आज ही ना कर दें। 

एक्सरसाइज

रोजाना 30 मिनट योग एरोबिक या हल्का फुल्का व्यायाम जरूर करें इससे नसों में हलचल होती रहती हैं जिससे ब्लाकेज का खतरा कम रहता है।

मोटापे पर रखें कंट्रोल 

मोटापे को बीमारियों की जड़ कहा जाता है। नसों की ब्लाकेज के लिए भी आपका बढ़ता वजन जिम्मेदार है इसलिए बटर, चीज, क्रीम, केक, रैड मीट जैसी फैटी डाइट का सेवन कम करें। 

अनार

एंटीऑक्सीडेंट, नाइट्रिक और ऑक्साइड के गुणों से भरपूर अनार के 1 गिलास जूस का रोजाना सेवन आपको धमनियों की ब्लोकेज के साथ कई हेल्थ प्रॉब्लम से दूर रखता है।

ड्राई फ्रूट्स


रोजाना कम से कम 50-100 ग्राम बादाम, अखरोट और पेकन (Pecan) का सेवन आपकी रक्त कोशिकाओं में कोलेस्ट्रॉल जमा नहीं होने देता। इससे आप ब्लाकेज की समस्या से बचे रहते है

आयुर्वेदिक हर्ब्स

लहसुन, शहद, हल्दी, केसर, कैमलस और कुसुरा फूल को मिलाकर पीस लें। इसके रोजाना सेवन करने से आप ब्लाकेज की समस्या के साथ कई हेल्थ प्रॉब्लम से बच सकते है।


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बवासीर (पाईल्स) के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार


                                           

    बवासीर का घरेलू इलाज अथवा बवासीर दूर करने के उपाय आयुर्वेद में है या नहीं इस बात को लेकर लोग हमेशा शंकाग्रस्त रहते है। आइये आज हम आपको पाइल्स के सफल आयुर्वेदिक इलाज बताते है जिन्हें अपनाकर आप स्वस्थ लाइफ जी सकते हैं। बवासीर दो प्रकार की होती है, खूनी बवासीर और बादी वाली 

बवासीर:

    खूनी बवासीर में मस्से खूनी सुर्ख होते है,और उनसे खून गिरता है,जबकि बादी वाली बवासीर में मस्से काले रंग के होते है,और मस्सों में खाज पीडा और सूजन होती है,अतिसार संग्रहणी और बवासीर यह एक दूसरे को पैदा करने वाले होते है।

अदरक से उपचार:

बवासीर के रोगी को बादी और तले हुये पदार्थ नही खाने चाहिये,जिनसे पेट में कब्ज की संभावना हो,हरी सब्जियों का ज्यादा प्रयोग करना चाहिये,बवासीर से बचने का सबसे सरल उपाय यह है कि शौच करने उपरान्त जब मलद्वार साफ़ करें तो गुदा द्वार को उंगली डालकर अच्छी तरह से साफ़ करें,इससे कभी बवासीर नही होता है।
इसके लिये आवश्यक है कि मलद्वार में डालने वाली उंगली का नाखून कतई बडा नही हो,अन्यथा भीतरी मुलायम खाल के जख्मी होने का खतरा होता है,प्रारंभ में यह उपाय अटपटा लगता है,पर शीघ्र ही इसके अभ्यस्त हो जाने पर तरोताजा महसूस भी होने लगता है, बवासीर के घरेलू उपचार इस प्रकार से है।

बवासीर की बीमारी और आयुर्वेदिक इलाज

जीरे को जरूरत के अनुसार भून कर उसमे मिश्री मिलाकर मुंह में डालकर चूंसने से तथा बिना भुने जीरे को पीस कर मस्सों पर लगाने से बवासीर की बीमारी में फ़ायदा होता है
    पके केले को बीच से चीरकर दो टुकडे कर लें और उसपर कत्था पीसकर छिडक दें,इसके बाद उस केले को खुले आसमान के नीचे शाम को रख दें,सुबह को उस केले को प्रात:काल की क्रिया करके खालें,एक हफ़्ते तक इस प्रयोग को करने के बाद भयंकर से भयंकर बवासीर समाप्त हो जाती है।
छोटी पिप्पली को पीस कर चूर्ण बना ले,और शहद के साथ लेने से आराम मिलता है
एक चम्मच आंवले का चूर्ण सुबह शाम शहद के साथ लेने पर बवासीर में लाभ मिलता है,इससे पेट के अन्य रोग भी समाप्त होते है
  खूनी बवासीर में नींबू को बीच से चीर कर उस पर चार ग्राम कत्था पीसकर बुरक दें,और उसे रात में छत पर रख दें,सुबह दोनो टुकडों को चूस लें,यह प्रयोग पांच दिन करें खूनी बवासीर का शर्तिया घरेलू उपचार है
पचास ग्राम रीठे तवे पर रखकर कटोरी से ढक दें,और तवे के नीचे आग जला दें,एक घंटे में रीथे जल जायेंगे,ठंडा होने पर रीठों को खरल कर ले या सिल पर पीस लें,इसके बाद सफ़ेद कत्थे का चूर्ण बीस ग्राम और कुश्ता फ़ौलाद तीन ग्राम लेकर उसमें रीठे बीस ग्राम भस्म मिला दें,उसे सुबह शाम मक्खन के साथ खायें,ऊपर से दूध पी लें,दोनो प्रकार के बवासीर में दस से पन्द्रह दिन में आराम आ जाता है,गुड गोस्त ,शराब ,आम और अंगूर का परहेज करें।
खूनी बवासीर में गेंदे के हरे पत्ते नौ ग्राम काली मिर्च के पांच दाने और कूंजा मिश्री दस ग्राम लेकर साठ ग्राम पानी में पीस कर मिला लें,दिन में एक बार चार दिन तक इस पानी को पिएं,गरम चीजों को न खायें,खूनी बवासीर खत्म हो जायेगा।
पचास ग्राम बडी इलायची तवे पर रख कर जला लें,ठंडी होने पर पीस लें,रोज सुबह तीन ग्राम चूर्ण पंद्रह दिनो तक ताजे पानी से लें,बवासीर में लाभ होता है
हारसिंगार के फ़ूल तीन ग्राम काली मिर्च एक ग्राम और पीपल एक ग्राम सभी को पीसकर उसका चूर्ण जलेबी की पचास ग्राम चासनी में मिला लें,रात को सोते समय पांच छ: दिन तक इसे खायें,यह खूनी बवासीर का शर्तिया घरेलू उपचार है,मगर ध्यान रखें कि कब्ज करने वाले भोजन को न करें
दूध का ताजा मक्खन और काले तिल दोनो एक एक ग्राम को मिलाकर खाने से बवासीर में फ़ायदा होता है
 

नागकेशर मिश्री और ताजा मक्खन इन तीनो को रोजाना सम भाग खाने से बवासीर में फ़ायदा होता है
जंगली गोभी की तरकारी घी में पकाकर उसमें सेंधा नमक डालें,इस तरकारी को आठ दिन रोटी के साथ खाने से बवासीर में आराम मिलता है
कमल केशर तीन मासे,नागकेशन तीन मासे शहद तीन मासे चीनी तीन मासे और मक्खन तीन मासे (तीन ग्राम) इन सबको मिलाकर खाने से बवासीर में फ़ायदा होता है
नीम के ग्यारह बीज और छ: ग्राम शक्कर रोजाना सुबह को फ़ांकने से बवासीर में आराम मिलता है
पीपल का चूर्ण छाछ में डालकर पीने से बवासीर में आराम मिलता है
कमल का हरा पत्ता पीसकर उसमे मिश्री मिलाकर खायें,बवासीर का खून आना बन्द हो जाता है
सुबह शाम को बकरी का दूध पीने से बवासीर से खून आना बन्द हो जाता है
प्रतिदिन दही और छाछ का प्रयोग बवासीर का नाशक है
प्याज के छोटे छोटे टुकडे करने के बाद सुखालें,सूखे टुकडे दस ग्राम घी में तलें,बाद में एक ग्राम तिल और बीस ग्राम मिश्री मिलाकर रोजाना खाने से बवासीर का नाश होता है
गुड के साथ हरड खाने से बवासीर में फ़ायदा होता है
बवासीर में छाछ अम्रुत के समान है,लेकिन बिना सेंधा नमक मिलाये इसे नही खाना चाहिये
मूली का नियमित सेवन बवासीर को ठीक कर देता है



मुख की दुर्गंध के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार

                                             


     किसी व्यक्ति की स्माइल से उस व्यक्ति के व्यक्तित्व पर दुसरे के सामने अच्छा इम्प्रैशन पड़ता है | आपकी छोटी सी मुस्कराहट और हँसी बड़े बड़े काम कर सकती है लेकिन बहुत बार लोग खुल कर हस नहीं पाते जिसके दो मुख्य कारण हो सकते हैं दांतों का पीलापन और मुंह या सांस की बदबू |
ऐसे में आपके दोस्त आपसे दूर रहना शुरू कर देते हैं आपके दोस्त आपको बता भी नहीं पाते की आपके मुंह से दुर्गंध आ रही है | ऐसे में आपका आत्मविशवास कम होने लगता है आप अपने चाहने वालों से दूर हो जाते हैं | लोग आपकी पीठ पीछे आपका मजाक बनाने लगते हैं | ऐसे में आपको अपने आत्मविश्वास को बनाये रखना है |
सबसे पहले आपको जानने की कोशिश करनी है की क्या आपके मुह से badboo आ रही है | इसके लिए आप अपने मुह से कुछ दूरी पर अपना दायाँ हाथ रखकर मुह से सांस छोड़ें | इससे सांस आपके नाक तक पहुंचेगी और आपको पता चल जाएगा की आपके मुह से badbu आ रही है या नहीं | आप अपना हाथ भी सूंघकर देखे इससे आपको पता चल जाएगा की साँसों से दुर्गन्ध आ रही है या नहीं |

बदबूदार पदार्थ खाना (प्याज,लहसुन)
दवाओं का प्रयोग करने के दौरान
तम्बाकू वाले पदार्थ इस्तेमाल करने से

कब्ज की समस्या
लीवर से जुडी कोई बीमारी
बहुत कम पानी पीना
पेट से जुडी कोई समस्या
टोन्सिल की समस्या के कारन
मुहं में इन्फेक्शन
दांतों की समस्या
ब्रश नहीं करना
जीभ की सफाई नहीं करना


मुख की  बदबू दूर करने ke उपाय

लौंग मुह और दांतों की बहुत सी समस्याओं में लाभकारी होती है | मुह से बदबू आने पर लौंग को चबाने से बदबू नहीं आएगी और दांत में दर्द दांत की सेंसिटिविटी की समस्या से भी छुटकारा मिलता है |

छोटी इलाइची :

अगर आपको कहीं बाहर जाना है और आप चाहते हैं आपके मुह से बदबू की जगह खुशबू आये तो घर के kitchen में मौजूद छोटी इलाइची भी एक कारगर उपाय है | छोटी इलायची चबाने से मुह से दुर्गन्ध नहीं आती है |


गेहूं के जवारे का रस :

गेहूं के जवारे का रस पायरिया और मुह से आने वाली दुर्गन्ध को दूर करने का अच्छा उपाय है | इसलिए गेहू के जवारे का रस पिने से भी मुह की बदबू से छुटकारा मिलता है |

निम्बू का रस :

निम्बू के रस से मुह में बदबू पैदा करने वाले बैक्टीरिया मर जाते हैं क्यूंकि निम्बू का रस एंटी बैक्टीरियल की तरह से काम करता है | इसे प्रयोग करने के लिए एक गिलास पानी में कुछ बुँदे निम्बू का रस मिला ले और इस पानी से दिन में दो बार कुल्ला करने से मुह से बदबू आनी बंद हो जाएगी |

दालचीनी का प्रयोग :

घर में इस्तेमाल की जाने वाली दालचीनी मुह और साँसों में बदबू पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ख़तम करने का काम भी करती है | इसे इस्तेमाल करने के लिए दालचीनी और थोड़ी सी अजवायन को पानी में उबाल लें और इस पानी से दिन में दो बार गरारे और कुल्ला करें |

नीम और बबूल :

नीम में एंटी बैक्टीरियल गुण पाए जाते हैं जो मुह में बदबू पैदा करने वाले बैक्टीरिया को ख़तम करने में सक्षम है | इसलिए रोजाना नीम या बबूल का दातुन करने से भी मुह की बदबू से छुटकारा मिलता है | नीम के पत्तों को पानी में उबाल कर उस पानी से गरारे करने से भी muh ki badboo दूर होती है |

पानी से 

शरीर के किसी भी हिस्से से बदबू आने का मतलब है शरीर में विषेले पदार्थों का जमा होना | शरीर में विषेले पदार्थों के जमा होने से रोकने के लिए जरूरी है हमारा लीवर और किडनी सही तरह से काम करते रहे | इनकी कार्यप्रणाली और विषेले पदार्थो को शरीर से बाहर निकालने के लिए दिन में 8 से 10 गिलास पानी पिए इससे भी मुह की दुर्गन्ध से छुटकारा मिलेगा |

सरसों का तेल :

सरसों के तेल और नमक का मिश्रण मुह और दांतों सम्बंधित समस्याओं को दूर करने का जबरदस्त नुस्खा है | इसे इस्तेमाल करने के लिए हथेली पर थोडा सा सरसों का तेल लेकर इसमें नमक मिला लें और उंगली के साथ दांतों पर मसाज करें | इससे भी मुह की दुर्गन्ध से छुटकारा मिलेगा |

बेकिंग सोडा :

बेकिंग सोडे को पानी में डालकर कुल्ला करे | बेकिंग सोडा मुह में बदबू पैदा करने वाले कीटाणुओं से लड़ता है और मुह की बदबू से छुटकारा दिलाता है |

सेब का सिरका :

सेब का सिरका भी मुह से आने वाली बदबू को दूर करने का अच्छा उपाय है | मुह से बदबू आने की स्थिति में पानी में थोडा सा सेब का सिरका मिला कर गरारे करें | इससे साँसों की बदबू से छुटकारा मिलता है |


ग्रीन टी :

ग्रीन टी में एंटी ओक्सिडेंट गुण पाए जाते हैं | ग्रीन टी के सेवन से शरीर से विषाक्त पदार्थ बाहर निकल जाते हैं और मुह की बदबू से छुटकारा मिलता है | Bad breathing problem को दूर करने के लिए दिन में एक से दो कप ग्रीन टी का सेवन मुह के स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है |

तुलसी के पत्ते :

तुलसी बहुत सी बिमारियों को दूर करने का अच्छा उपाय है | मुह की समस्याएँ, गले की समस्याएँ और शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में तुलसी बहुत कारगर है | मुह और सांसो की बदबू को दूर करने के लिए तुलसी की पत्तियों को चबा कर खाए इससे मुह की बदबू से छुटकारा मिलता है |

सौंफ :

खाने खाने के बाद कुल्ला जरूर करें और मुह की दुर्गन्ध को दूर करने के लिए सौंफ और मिश्री को मिलाकर खाने से हाजमा सही रहता है और मुह से खाने की दुर्गन्ध भी नहीं आती |
मुह से आने वाली बदबू अगर पेट की समस्या की वजह से है तो रात को त्रिफला चूर्ण का इस्तेमाल करें | दिन में दो बार ब्रश करें और रात को सोने से पहले ब्रश जरूर करें | ज्यादा सख्त तारों वाला ब्रश का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए | खाना खाने के बाद कुल्ला करें जिससे खाना मुह में नहीं रहेगा जो सड़ कर बदबू पैदा नहीं करेगा |
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मूंग की दाल के स्वास्थ्य लाभ // Health Benefits of Moong Dal


                                                       


    मूंग की दाल सिर्फ बीमारी में ही नहीं बल्कि हेल्थ को मेंटेन करने के लिए भी जरूरी है। इसमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट्स और फास्फोरस होता है। इस दाल के पापड़, लड्डू और हलवा भी बनता है। इस दाल को अपनी डाइट में शामिल करने से मसल्स मजबूत होती हैं और एनीमिया दूर होता है।

  जरूरी नहीं कि स्‍वाद में जो अच्‍छा हो, वो स्‍वास्‍थ्‍यवर्द्धक भी हो। अक्‍सर ऐसा ही होता है, जो चीज खाने में बिल्‍कुल अच्‍छी नहीं लगती है वो गुणों से भरपूर ही होती है। स्‍वादिष्‍ट भोजन करने से पहले हर किसी को शरीर के विकास के लिए विटामिन और खनिज की जरूरत होती है। आयुर्वेद के चिकित्सक डॉ. सत्य प्रकाश मिश्र के मुताबिक दालों में सबसे पौष्टिक दाल, मूंग की होती है, इसमें विटामिन ए, बी, सी और ई की भरपूर मात्रा होती है। साथ ही पौटेशियम, आयरन, कैल्शियम की मात्रा भी मूंग में बहुत होती है। इसके सेवन से शरीर में कैलोरी भी बहुत नहीं बढ़ती है। अगर अंकुरित मूंग दाल खाएं तो शरीर में कुल 30 कैलोरी और 1 ग्राम फैट ही पहुंचता है।
स्‍प्राउट खाने से होता है स्‍वास्‍थ्‍य लाभ: अंकुरित मूंग दाल में मैग्‍नीशियम, कॉपर, फोलेट, राइबोफ्लेविन, विटामिन, विटामिन सी, फाइबर, पोटेशियम, फास्फोरस, मैग्नीशियम, आयरन, विटामिन बी -6, नियासिन, थायमिन और प्रोटीन होता है। मूंग की दाल के स्‍प्राउट ऐसे ही कुछ लाभकारी गुण निम्‍न प्रकार है। मूंग की दाल के स्‍प्राउट में ग्‍लूकोज लेवल बहुत कम होता है इस वजह से मधुमेह रोगी इसे खा सकते हैं।


* मूंग की दाल को उत्तम आहार माना गया है, जो पाचन क्रिया को दुरुस्त करती है और पेट में ठंडक पैदा करती है, जिससे पाचन और पेट में गर्मी बढ़ने की समस्या नहीं होती।
*मूंग की दाल के स्‍प्राउट में ओलियोसाच्‍चाराइडस होता है जो पॉलीफिनॉल्‍स से आता है। ये दोनों की घटक, गंभीर रोगों से लड़ने की क्षमता को प्रबल करते हैं। कैंसर के रोगी भी इसका सेवन आराम से कर सकते हैं।
*मूंग की दाल में ऐसे गुण होते हैं जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा देते हैं और उसे बीमारियों से लड़ने की ताकत देते हैं। इसमें एंटी-माइक्रोबियल और एंटी-इंफलामेट्री गुण होते हैं, जो शरीर की इम्‍यूनिटी बढ़ाते हैं।
*मूंग की दाल के स्‍प्राउट में शरीर के टॉक्सिक को निकालने के गुण होते हैं। इसके सेवन से शरीर में विषाक्‍त तत्‍वों में कमी आती है।

*कब्ज की समस्या होने पर मूंग की छिलके वाली दाल का सेवन बेहद लाभप्रद होता है, इसके सेवन से पेट साफ होने में मदद मिलती है।
*शरीर में कोलेस्ट्रॉल बढ़ने पर मूंग दाल का सेवन लाभकारी होता है, यह अतिरिक्त कोलेस्ट्रॉल को शरीर से हटाने में मददगार होती हैवजन कम करने की चाह रखने वालों के लिए मूंगदाल का सेवन फायदेमंद साबित हो सकता है, इसमें 100 से भी कम कैलोरी होती है और इसे खाने के बाद पेट भी लंबे समय तक भरा रहता है जिससे आप अतिरिक्त कैलोरी नहीं लेते।
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टांगों मे होने वाली ऐंठन और दर्द के उपचार

                                     


कमजोरी की वजह से अक्सर महिलाओं को रात के समय पैरों या फिर टांगों में ऐंठन पड़ने की समस्या हो जाती है। वैसे तो इसका कोई खास कारण नहीं है लेकिन शारीरिक कमजोरी, उठने-बैठने का गलत तरीका और बैलेंस डाइट की अनदेखी इसकी वजहें हो सकती है। कई बार को टांगों में होने वाली इस ऐंठन से थोडी देर में आराम मिल जाता है लेकिन लगातार इस तरह की समस्या बनी रहे तो आगे चलकर दिक्कत हो सकती है। इससे बचने के लिए दवाइयां खाने से बेहतर है कि घरेलू तरीकों को अपनाया जाए।
कैल्शियम से भरपूर आहार का सेवन
यह हड्डियों से जुड़ी कमजोरी मानी जाती है। इससे छुटकारा पाने के लिए कैल्शियम से भरपूर आहारों का सेवन करना शुरु करें। हर रोज कैल्शियम युक्त आहार का सेवन करने से फायदा मिलता है। दूध,हरी पत्तेदार सब्जियां,फल और सूप को डाइट में शामिल करें।

थकान दूर करने के उपाय

गर्म दूध का सेवन

हर रोज रात को सोने से पहले एक गिलास गर्म दूध का सेवन करें। इसे बैस्ट सुपरफूड्स में से एक माना गया है। इसके सेवन से मांसपेशियों को मजबूती मिलती है। इससे ऐंठन की समस्या से निजात मिलती है।  
 
*गुनगुने पानी से स्नान भी टांगों की ऐंठन से आराम दिलाने में मददगार है। इससे मांसपेशियों की ऐंठन से आराम मिलता है। तुरंत राहत पाने के लिए आप पैरों के लिए हॉट पैड का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

रोजाना खाएं केला

केले में मौजूद कैल्शियम हड्डियों की मजबूती के लिए लाभकारी है। इसमें बहुत से पोषक तत्व शरीरिक कमजोरी को दूर करने में मददगार है। ऐंठन की समस्या से छुटकारा पाने के लिए हर रोज केले का सेवन करें।

सरसों के तेल की मसाज

सरसों के तेल में एसिटीक एसिड किसी भी तरह की दर्द से राहत पाने में मददगार है। इससे कोई साइड इफैक्ट भी नहीं होता। इस तेल को गुनगुना करके इससे पैरों की मसाज करें।

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खूनी या बादी बवासीर के मस्सो का इलाज

                                                          


बवासीर के मस्सो पर लगाने के लिए तेल
एरंडी के तेल को थोड़ा गर्म कर आग से नीचे उतार कर उसमे कपूर मिलाकर व घोलकर रख ले। अगर कपूर की मात्रा १० ग्राम हो तो अरंडी का तेल ८० ग्राम होना चाहिए। मतलब ८ गुना अगर कपूर ५ ग्राम हैं तो तेल ४० ग्राम।
पाखाना करने के बाद मस्सो को धोकर और पोछकर इस तेल को दिन में दो बार नर्मी से मस्सो पर इतना मलें की मस्सो में शोषित हो जायें। इस तेल की नर्मी से मालिश से मस्सो की तीव्र शोथ, दर्द, जलन, सुईयां चुभने को आराम आ जाता ही और निरंतर प्रयोग से मस्सो खुश्क हो जाते है।
बवासीर के मस्से सूजकर संगर की भांति मोटे हो जाते है और कभी-कभी गुदा से बाहर निकल आते है। ऐसी अवस्था में यदि उन पर इस तेल को लगाकर अंदर किया जाये तो दर्द नही होता और मस्से नरम होकर आसानी से गुदा के अंदर प्रवेश किये जा सकते है।
 
सहायक उपचार.

बवासीर की उग्र अवस्था में भोजन में केवल दही और चावल, मूंग की खिचड़ी ले। देसी घी प्रयोग में लाएं। मल को सख्त और कब्ज न होने दे। अधिक तेज मिर्च-मसालेदार, उत्तेजक और गरिष्ठ पदार्थो के सेवन से बचे।
खुनी बवासीर में छाछ या दही के साथ कच्चा प्याज ( या पीसी हुयी प्याज की चटनी ) खाना चहिए।
रक्तस्रावी बवासीर में दोपहर के भोजन के एक घटे बाद आधा किलो अच्छा पपीता खाना हितकारी है।
बवासीर चाहे कैसी भी हो बड़ी हो अथवा खुनी, मूली भी अक्सीर है। कच्ची मूली ( पत्तो सहित ) खाना या इसके रस का पच्चीस से पचास ग्राम की मात्रा से कुछ दिन सेवन बवासीर के अतिरिक्त रक्त के दोषो को निकालकर रक्त को शुद्ध करता है।

बवासीर में विशेष

बवासीर से बचने के लिए गुदा को गर्म पानी से न धोएं। खासकर जब तेज गर्मियों के मौसम में छत की टंकियों व नलों से बहुत गर्म पानी आता है तब गुदा को उस गर्म पानी से धोने से बचना चाहिए।
एक बार बवासीर ठीक हो जाने के बाद बदपरहेजी ( जैसे अत्यधिक मिर्च-मसाले, गरिष्ठ और उत्तेजक पदार्थो का सेवन ) के कारण उसके दुबारा होने की संभावना रहती है। अत: बवासीर के रोगी के लिए बदपरहेजी से बचना परम आवश्यक है।
किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

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जेतून के तेल के अनजाने फायदे


                                                        


1. त्वचा के लिए जैतून का तेल बहुत फायदेमंद है। रोजाना चेहरे पर इसकी मसाज करने से त्वचा की झुर्रियां समाप्त हो जाती हैं और त्वचा में नमी और चमक बनी रहती है।
2. ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में किए गए एक शोध के अनुसार जैतून का तेल आंत में होने वाले कैंसर से बचाव करने में अहम भूमिका निभाता है। इसके अलावा यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में मदद करता है।

3. विटमिन ए, बी, सी, डी और ई के साथ-साथ जैतून के तेल में आयरन और पर्याप्त मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स भी होते हैं, जो बालों की कोमलता और मजबूती बढ़ाने में मदद करते हैं। यह ओलेइक एसिड और ओमेगा-9 फैटी एसिड का भी अच्छा स्रोत है।
4.जैतून के तेल में फैटी एसिड की पर्याप्त मात्रा होती है जो हृदय रोग के खतरों को कम करती है। मधुमेह रोगियों के लिए यह काफी लाभदायक है। शरीर में शुगर की मात्रा को संतुलित बनाए रखने में इसकी खास भूमिका है। इसलिए आहार में भी इस तेल का प्रयोग किया जाता है।
5. लंबे समय तक जैतून के तेल को आहार में शामिल करने पर यह शरीर में मौजूद वसा को खुद ब खुद कम करने लगता है। इससे आपका मोटापा कम होता है, वह भी हेल्दी तरीके से।
6.जैतून के तेल में कैल्शि‍यम की काफी मात्रा पाई जाती है, इसलिए भोजन में इसका उपयोग या अन्य तरीकों से इसे आहार में लेने से ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं से निजात मिलती है।

7. जैतून के तेल को मेकअप रिमूवर के रूप में भी इस्तेमाल किया जाता है। इसके प्रयोग से त्वचा रूखी भी नहीं होती और त्वचा का रंग गोरा होता है। यह त्वचा को पोषण प्रदान करता है।
8. जैतून के तेल में संतृप्त वसा लगभग ना के बराबर होता है जिससे यह आपके शुुगर लेवल को नियंत्रि‍त करता है। साथ ही इसे खाने से बॉर्डर लाइन डायबीटिज होने का खतरा 50 प्रतिशत तक कम हो जाता है।
9. जैतून के तेल में एंटी-ऑक्सीडेंट की मात्रा भी काफी होती है। इसमें विटामिन ए, डी, ई, के और बी-कैरोटिन की मात्रा अधिक होती है। इससे कैंसर से लड़ने में आसानी होती है साथ ही यह मानसिक विकार दूर कर आपको जवां बनाए रखने में भी मदद करता है
10.इसमें संतृप्त वसा की मात्रा कम होती है जिससे शरीर में कॉलेस्टेरोल की मात्रा को भी संतुलित बनाए रखने में मदद मिलती है। इससे हृदयाघात का खतरा काफी कम हो जाता है।

    मालिश के लिए नारियल और सरसों के तेल के साथ-साथ जैतून के तेल को भी बेहतर माना जाता है.
प्राचीन काल से ही जैतून के तेल (ऑलिव ऑयल) को अत्यधिक गुणकारी एवं स्वास्थ्यवर्धक बताया गया है. यह तेल बालों, त्वचा एवं स्वास्थ्य सम्बन्धी समस्याओं में अत्यधिक लाभकारी सिद्ध हुआ है. ऐसा माना जाता है कि नवजात शिशु की जैतून के तेल की मालिश करने से वह रोगमुक्त हो जाता है. यह तेल विभिन्न कार्यों जैसे खाना बनाने, त्वचा की मालिश, हाथ-पैर के दर्द आदि के काम में भी लाया जा सकता है.जैतून के तेल की सिर पर नियमित रूप से मालिश करने से बाल मजबूत एवं घने होते हैं, साथ ही साथ बालों का झड़ना व बालों में दोमुँहें होने की समस्या का भी निवारण हो जाता है.
इसे बालों में कंडीशनर की तरह प्रयोग में लाया जा सकता है जिससे डैंड्रफ की समस्या का समाधान होता है व बाल मुलायम हो जातें हैं. 

• इसकी आँखों के चारों ओर मालिश से आँखों के नीचे काले घेरे एवं दाग नहीं होते. इससे रतौंधी की समस्या भी दूर होती है.
• जैतून के तेल में विटामिन E भरपूर मात्रा में पाए जाने के कारण यह त्वचा को कई बाहरी कारकों से सुरक्षित रखता है एवं त्वचा की सेंसिटिविटी को कम करता है.• जैतून के तेल की शरीर पर मालिश, शरीर को स्फूर्तिदायक एवं स्वस्थ बनाती है. इसका नित्य प्रयोग त्वचा की झुर्रियों एवं काले धब्बों को खत्म कर त्वचा को सौन्दर्यवान बनाता है.
• इसकी नियमित मालिश से शरीर पर कील, मुँहासे, दाग-धब्बे आदि नहीं होते. इसके अतिरिक्त यह स्किन कैंसर एवं स्किन सम्बन्धी अन्य बीमारियों के निवारण में भी सहायक सिद्ध होता है.
• जैतून के तेल का प्रयोग फेसपैक, बॉडी लोशन एवं स्क्रब के रूप में भी किया जाता है. इसके प्रयोग से त्वचा पर निखार आता है व त्वचा कोमल एवं मुलायम होती है.

• इसमें विटामिन्स एवं मिनरल्स होने के कारण यह त्वचा के अंदर जाकर उसे खूबसूरत बनाता है. इसकी मालिश शरीर को स्फूर्तिदायक एवं दिमाग को तनावमुक्त करती है।
• जैतून के तेल की मालिश से त्वचा को पोषण मिलता है. इससे वह रूखी व शुष्क नहीं होती एवं त्वचा पर चमक बनी रहती है. इसके प्रयोग से त्वचा साफ़ हो जाती है.
 
इसकी मालिश से नवजात शिशु की हड्डियाँ मजबूत होतीं हैं. इसकी नियमित मालिश बच्चे को बढ़ने में सहायता प्रदान करती है.
• नहाने के थोड़ी देर बाद जैतून के तेल की मालिश करने से त्वचा का कालापन दूर हो जाता है एवं त्वचा दमकने लगती है.

• इसकी मालिश से होठों के फटने की समस्या भी दूर होती है व होंठ मुलायम होते है. जैतून के तेल की मालिश से नाखूनों में मजबूती और चमक भी आती है.
इस तरह जैतून के तेल की मालिश कई तरह से शरीर के लिए लाभप्रद है.
 • रात को सोने से पहले पैर की एड़ियों एवं जोड़ों पर जैतून का तेल मलने से एड़ियों व जोड़ों का दर्द दूर होता है. इससे एड़ियाँ कोमल व मुलायम होतीं हैं.
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