पीपल के औषधीय गुण ,लाभ ,प्रयोग //Benefits of Ficus religiosa

   

     पीपल का वृक्ष सबके लिए जाना पहचाना है, यह हर जगह पाया जाता है। पीपल ही एक ऐसा वृक्ष है, जो चौबीसों घंटे ऑक्सीजन देता है, इसके औषधीय गुणों को बहुत कम लोग जानते हैं। पीपल को औषधियों का खजाना माना गया है। आयुर्वेद की सुश्रुत संहिता और चरक संहिता में पीपल के औषधीय गुणों के बारे में बताया गया है। पीपल के अलग-अलग हिस्सों जैसे पत्तों से लेकर छाल तक का इस्तेमाल करके बुखार, अस्थमा, खांसी, स्किन डिजीज जैसी कई प्रॉब्लम्स से राहत पाई जा सकती है।

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

दांतों के लिए फायदेमंद

दांतों की बदबू, दांतों का हिलना और मसूड़ों का दर्द व सड़न को दूर करने के लिए 2 ग्राम काली मिर्च, 10 ग्राम पीपल की छाल और कत्था को बारीक पीसकर उसका पाउडर बना लें। और इससे दांतों को साफ करें। आपको इन रोगों से मुक्ति मिलेगी।

झुर्रियों से बचाव-

बहुत ही कम लोगों को ही यह बात मालूम है कि झुर्रियों को खत्म करने के लिए पीपल एक अहम भूमिका निभाता है। यह बढ़ती हुई उम्र की वजह से चेहरे पर झुर्रियां रोक देता है। पीपल की जड़ों को काट लें और उसे पानी में अच्छे से भिगोकर इसका पेस्ट बना लें। और इस पेस्ट को नियमित चेहरे पर लगाएं।

नजला-जुकाम से मुक्ति

नजला-जुकाम होने पर पीपल के पत्तों को छाया में सुखा लें। और इनकों पीसकर चूर्ण बना लें। और इसे गुनगुने पानी में थोड़ी सी मिश्री के साथ मिलाकर पीएं।

पेट की तकलीफ को दूर करे

पेट की किसी भी तरह की समस्या जैसे कब्ज, गैस और पेट दर्द आदि को दूर करता है। पीपल के ताजे पत्तों को कूट कर इसका रस सुबह-शाम पीएं। पीपल के पत्ते वात और पित्त को खत्म करते हैं।

थकान दूर करने के उपाय

दमा : 


पीपल की अन्तरछाल (छाल के अन्दर का भाग) निकालकर सुखा लें और कूट-पीसकर खूब महीन चूर्ण कर लें, यह चूर्ण दमा रोगी को देने से दमा में आराम मिलता है। पूर्णिमा की रात को खीर बनाकर उसमें यह चूर्ण बुरककर खीर को 4-5 घंटे चन्द्रमा की किरणों में रखें, इससे खीर में ऐसे औषधीय तत्व आ जाते हैं कि दमा रोगी को बहुत आराम मिलता है। इसके सेवन का समय पूर्णिमा की रात को माना जाता है।

दाद-खाज :

 पीपल के 4-5 कोमल, नरम पत्ते खूब चबा-चबाकर खाने से या एैसा नहीं कर सकते हो तो पीपल के पेड़ की छाल का काढ़ा बना लें और इसे दाद व खुजली वाली जगह पर लगाएं।

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मसूड़े : 

मसूड़ों की सूजन दूर करने के लिए इसकी छाल के काढ़े से कुल्ले करें।   

घावों को करे ठीक-

चोट के घावों को जल्दी भरने के लिए पीपल के पत्तों को गर्म कर लें और चोट की वजह से होने वाले घावों पर लगा दें।

फटी एड़ियों मे लाभप्रद -

पीपल के पत्तों से निकलने वाले दूध को फटी एड़ियों पर लगाने से एड़ियां कोमल और सामान्य हो जाती हैं।इसकी छाल का रस या दूध लगाने से पैरों की बिवाई ठीक हो जाती है।  

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   हिचकी:

पीपल की छाल को जलाकर राख कर लें, इसे एक कप पानी में घोलकर रख दें, जब राख नीचे बैठ जाए, तब पानी नितारकर पिलाने से हिचकी आना बंद हो जाता है।
     पीपल में प्रतिदिन जल अर्पित करने से कुंडली के कई अशुभ माने जाने ग्रह योगों का प्रभाव समाप्त हो जाता है। शनि की साढ़ेसाती या ढय्या में पीपल की पूजा शनि के कोप से बचाती है। इस पेड़ की मात्र परिक्रमा से ही कालसर्प जैसे ग्रह योग के बुरे प्रभावों से छुटकारा मिल जाता है। इसके अतिरिक्त शास्त्रों के अनुसार इस वृक्ष में सभी देवी-देवताओं का वास भी माना गया है।
    धार्मिक के साथ-साथ पीपल के पेड़ और उसके कोमल पत्तों का ऐतिहासिक और वैज्ञानिक महत्व भी है। चाणक्य के काल में पीपल के पत्ते सांप का जहर उतारने के काम आते थे। आज जिस तरह जल को पवित्र करने के लिए तुलसी के पत्तों को पानी में डाला जाता है, वैसे पीपल के पत्तों को भी जलाशय और कुंडों में इसलिए डालते थे ताकि जल किसी भी प्रकार की गंदगी से मुक्त हो जाए।

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विभिन्न रोगों मे बबूल(कीकर) पेड़ का औषधीय उपयोग // In various diseases acacia (acacia) tree medicinal uses




परिचय :बबूल का पेड़ बहुत ही पुराना है, बबूल की छाल एवं गोंद प्रसिद्ध व्यवसायिक द्रव्य है। वास्तव में बबूल रेगिस्तानी प्रदेश का पेड़ है। इसकी पत्तियां बहुत छोटी होती है। यह कांटेदार पेड़ होता है। सम्पूर्ण भारत वर्षमें बबूल के लगाये हुए तथा जंगली पेड़ मिलते हैं। गर्मी के मौसम में इस पर पीले रंग के फूल गोलाकार गुच्छों में लगते है तथा सर्दी के मौसम में फलियां लगती हैं।बबूल के पेड़ बड़े व घने होते हैं। ये कांटेदार होते हैं।इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है। बबूल के पेड़ पानी के निकट तथा काली मिट्टी में अधिक मात्रा में पाये जाते हैं।इनमें सफेद कांटे होते हैं जिनकी लम्बाई 1 सेमी से 3 सेमी तक होती है। इसके कांटे जोड़े के रूप में होते हैं। इसके पत्ते आंवले के पत्ते की अपेक्षा अधिक छोटे और घने होते हैं। बबूल के तने मोटे होते हैं और छाल खुरदरी होती है। इसके फूल गोल, पीले और कम सुगंध वाले होते हैं तथा फलियां सफेद रंग की 7-8 इंच लम्बी होती हैं। इसके बीज गोल धूसर वर्ण (धूल के रंग का) तथा इनकी आकृति चपटी होती है।

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बबूल या कीकर (Acacia Nilotica) के औषधीय गुण

गुण : बबूल कफ (बलगम), कुष्ठ रोग (सफेद दाग), पेट के कीड़ों और शरीर में प्रविष्ट विष का नाश करता है.


गोंद : 

यह गर्मी के मौसम में एकत्रित किया जाता है. इसके तने में कहीं पर भी काट देने पर जो सफेद रंग का पदार्थ निकलता है. उसे गोंद कहा जाता है.
मात्रा : इसकी मात्रा काढ़े के रूप में 50 ग्राम से 100 ग्राम तक, गोंद के रूप में 5 से 10 ग्राम तक तथा चूर्ण के रूप में 3 से 6 ग्राम तक लेनी चाहिए.

उल्लेख करते हैं विभिन्न रोगों में बबूल या कीकर (Acacia Nilotica) के उपयोग

दांत का दर्द-

इस की फली के छिलके और बादाम के छिलके की राख में नमक मिलाकर मंजन करने से दांत का दर्द दूर हो जाता है|
इस की कोमल टहनियों की दातून करने से भी दांतों के रोग दूर होते हैं और दांत मजबूत हो जाते हैं|
इस की छाल, पत्ते, फूल और फलियों को बराबर मात्रा में मिलाकर बनाये गये चूर्ण से मंजन करने से दांतों के रोग दूर हो जाते हैं|
इस की छाल के काढ़े से कुल्ला करने से दांतों का सड़ना मिट जाता है|
रोजाना सुबह नीम या इस की दातुन से मंजन करने से दांत साफ, मजबूत और मसूढे़ मजबूत हो जाते हैं|
मसूढ़ों से खून आने व दांतों में कीड़े लग जाने पर बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर रोजाना 2 से 3 बार कुल्ला करें. इससे कीड़े मर जाते हैं तथा मसूढ़ों से खून का आना बंद हो जाता है|


कफ अतिसार :

 बबूल के पत्ते, जीरे और स्याह जीरे को बराबर मात्रा में पीसकर इसकी 10 ग्राम की फंकी रात के समय रोगी को देने से कफ अतिसार मिट जाता है|


रक्तातिसार (खूनी दस्त) :

बबूल की हरी कोमल पत्तियों के एक चम्मच रस में शहद मिलाकर 2-3 बार रोगी को पिलाने से खूनी दस्त बंद हो जाते हैं|
10 ग्राम बबूल के गोंद को 50 मिलीलीटर पानी में भिगोकर मसलकर छानकर पिलाने से अतिसार और रक्तातिसार मिट जाता है|


प्रवाहिका (पेचिश) : 

बबूल की कोमल पत्तियों के रस में थोड़ी सी हरड़ का चूर्ण मिलाकर सेवन करना चाहिए इसके ऊपर से छाछ पीना चाहिए|

धातु पुष्टि के लिए :-

 बबूल की कच्ची फलियों के रस में एक मीटर लंबे और एक मीटर चौडे़ कपड़े को भिगोकर सुखा लेते हैं। एक बार सूख जाने पर उसे दुबारा भिगोकर सुखा लेते है। इसी प्रकार इस प्रक्रिया को 14 बार करते हैं।इसके बाद उस कपड़े को 14 भागों में बांट लेते हैं, और रोजाना एक टुकड़े को 250 ग्राम दूध में उबालकर पीने से धातु की पुष्टि होती है।

मुंह के रोग-

बबूल की छाल, मौलश्री छाल, कचनार की छाल, पियाबांसा की जड़ तथा झरबेरी के पंचांग का काढ़ा बनाकर इसके हल्के गर्म पानी से कुल्ला करें. इससे दांत का हिलना, जीभ का फटना, गले में छाले, मुंह का सूखापन और तालु के रोग दूर हो जाते हैं|
बबूल, जामुन और फूली हुई फिटकरी का काढ़ा बनाकर उस काढ़े से कुल्ला करने पर मुंह के सभी रोग दूर हो जाते हैं.
बबूल की छाल को बारीक पीसकर पानी में उबालकर कुल्ला करने से मुंह के छाले दूर हो जाते हैं|
बबूल की छाल के काढ़े से 2-3 बार गरारे करने से लाभ मिलता है. गोंद के टुकड़े चूसते रहने से भी मुंह के छाले दूर हो जाते हैं|
बबूल की छाल को सुखाकर और पीसकर चूर्ण बना लें. मुंह के छाले पर इस चूर्ण को लगाने से कुछ दिनों में ही छाले ठीक हो जाते हैं|
बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर दिन में 2 से 3 बार गरारे करें. इससे मुंह के छाले ठीक होते हैं|


वीर्य के रोग-

बबूल की कच्ची फली सुखा लें और मिश्री मिलाकर खायें इससे वीर्य रोग में लाभ होता है.
10 ग्राम बबूल की मु
लायम पत्तियों को 10 ग्राम मिश्री के साथ पीसकर पानी के साथ लेने से वीर्य-रोगों में लाभ होता है. अगर बबूल की हरी पत्तियां न हो तो 30 ग्राम सूखी पत्ती भी ले सकते हैं|
कीकर (बबूल) की 100 ग्राम गोंद भून लें इसे पीसकर इसमें 50 ग्राम पिसी हुई असगंध मिला दें. इसे 5-5 ग्राम सुबह-शाम हल्के गर्म दूध से लेने से वीर्य के रोग में लाभ होता है|
50 ग्राम कीकर के पत्तों को छाया में सुखाकर और पीसकर तथा छानकर इसमें 100 ग्राम चीनी मिलाकर 10-10 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ लेने से वीर्य के रोग में लाभ मिलता है|
   इसकी फलियों को छाया में सुखा लें और इसमें बराबर की मात्रा मे मिश्री मिलाकर पीस लेते हैं. इसे एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित रूप से पानी के साथ सेवन से करने से वीर्य गाढ़ा होता है और सभी वीर्य के रोग दूर हो जाते हैं|


सांस फूलने(दमा) के लिए प्रभावी घरेलू उपचार

इस के गोंद को घी में तलकर उसका पाक बनाकर खाने से पुरुषों का वीर्य बढ़ता है और प्रसूत काल स्त्रियों को खिलाने से उनकी शक्ति भी बढ़ती है|
इस का पंचांग लेकर पीस लें और आधी मात्रा में मिश्री मिलाकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित सेवन करने से कुछ ही समय में वीर्य रोग में लाभ मिलता है|


प्रदर रोग : - 

14 से 28 मिलीलीटर बबूल की छाल का काढ़ा दिन में दो बार पीने से प्रदर रोग में लाभ होता है।
*40 मिलीलीटर बबूल की छाल और नीम की छाल का काढ़ा रोजाना 2-3 बार पीने से प्रदर रोग में लाभ मिलता है।
*2-3 ग्राम अश्वगंधा चूर्ण और 1 ग्राम वंशलोचन दोनों को मिलाकर सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करने से प्रदर रोग मिट जाता है।


बलवीर्य की वृद्धि :

 इस के गोंद को घी में भूनकर उसका पकवान बनाकर सेवन करने से मनुष्य के सेक्स करने की ताकत बढ़ जाती है|


वीर्य की कमी :

 इस के पत्तों को चबाकर उसके ऊपर से गाय का दूध पीने से कुछ ही दिनों में गर्मी के रोग में लाभ होता है. बबूल की कच्ची फलियों का रस दूध और मिश्री में मिलाकर खाने से वीर्य की कमी दूर होती है|

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धातु पुष्टि के लिए :

 इस की कच्ची फलियों के रस में एक मीटर लंबे और एक मीटर चौडे़ कपड़े को भिगोकर सुखा लेते हैं. एक बार सूख जाने पर उसे दुबारा भिगोकर सुखा लेते है. इसी प्रकार इस प्रक्रिया को 14 बार करते हैं. इसके बाद उस कपड़े को 14 भागों में बांट लेते हैं, और रोजाना एक टुकड़े को 250 ग्राम दूध में उबालकर पीने से धातु की पुष्टि होती है|


स्तन का ढीलापन दूर करे- 

इस की फलियों के चेंप (दूध) से किसी कपड़े को भिगोकर सुखा लें. इस कपड़े को स्तनों पर बांधने से ढीले स्तन कठोर हो जाते हैं|
दाद के लिए : सांप की केंचुली में बबूल का गोंद मिलाकर दाद के स्थान पर पट्टी बांधने से लाभ होता है|


योनि का संकुचन : - 

*10 ग्राम बबूल की छाल को 400 मिलीलीटर पानी में पकायें। जब यह 100 मिलीलीटर
की मात्रा में बचे तो इसे 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम पीने से और इस काढे़ में थोड़ी-सी फिटकरी मिलाकर योनि में पिचकारी देने से योनिमार्ग शुद्ध होता है और श्वेतप्रदर ठीक हो जाता है, इसके साथ ही योनि टाईट हो जाती है।

*बबूल की 1 भाग छाल को लेकर उसे 10 भाग पानी में रातभर भिगोकर उस पानी को उबाल लेते हैं। जब पानी आधा रह जाए तो उसे छानकर बोतल में भर लेते हैं।
लघुशंका (शौचक्रिया) के बाद इस पानी से योनि को धोने से प्रदर एवं योनि शौथिल्य (ढीलापन) में लाभ मिलता है।
*बबूल की फलियों के चेंप (दूध) से मोटे कपड़े को भिगोकर सुखा लें। सूख जाने फिर भिगोकर सुखायें। इस क्रिया को 7 बार तक करके सुखा लेते हैं। स्त्री-प्रसंग (संभोग) से पहले इस कपड़े के टुकड़ों को दूध या पानी में भिगोकर, दूध और पानी को पी लें तो इससे स्तम्भन (वीर्य का देर से निकलना) होता है। यदि इस कपड़े के टुकड़े को स्त्री अपनी योनि में रख ले तो भी योनि तंग हो जाती है।
*बबूल, बेर, कचनार, अनार, नीलश्री को बराबर मात्रा में लेकर पानी में उबाल लें उसी समय उसमें कपड़ा डालकर भिगो लेते हैं। फिर उसमें पानी के छींटे दें और कपड़े को योनि में रखें इससे योनि सिकुड़ जाती है।


अम्लपित्त (एसीडिटी) : 

इस के पत्तों का काढ़ा बनाकर उसमें 1 ग्राम आम का गोंद मिला देते हैं. इस काढ़े को शाम को बनाते हैं और सुबह पीते हैं. इस प्रकार से इस काढ़े को सात दिन तक लगातार पीने से अम्लपित्त का रोग मिट जाता है|

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रक्त बहने पर : 


इस की फलियां, आम के बौर, मोचरस के पेड़ की छाल और लसोढ़े के बीज को एकसाथ पीस लें और इस मिश्रण को दूध के साथ मिलाकर पीने से खून का बहना बंद हो जाता है|


प्रमेह :

इस के अंकुर को सात दिन तक सुबह-शाम 10-10 ग्राम चीनी के साथ मिलाकर खाने से प्रमेह से पीड़ित रोगियों को लाभ प्राप्त होता है|

सूतिका रोग : -

10 ग्राम बबूल की आन्तरिक छाल और 3 कालीमिर्च को एक साथ पीसकर, सुबह-शाम खाने से और पथ्य में सिर्फ बाजरे की रोटी और गाय का दूध पीने से
भयंकर सूतिका रोग से पीड़ित स्त्रियां भी बच जाती है।

कान के रोग : 

बबूल के फूलों को सरसों के तेल में डालकर आग पर पकाने के लिए रख दें. पकने के बाद इसे आग पर से उतारकर छानकर रख लें. इस तेल की 2 बूंदे कान में डालने से कान में से मवाद का बहना ठीक हो जाता है.

कान का दर्द : 

रूई की एक लम्बी सी बत्ती बनाकर उसके आगे के सिरे में शहद लगा दें और उसमें लाल फिटकरी को पीसकर उसका चूर्ण लपेट दें. इस बत्ती को कान में डालकर एक दूसरे रूई के फाये से कान को बंद कर दें. ऐसा करने से कान का जख्म, कान का दर्द और कान से मवाद बहना जैसे रोग ठीक हो जाते हैं|


पीलिया : 

बबूल के फूलों को मिश्री के साथ मिलाकर बारीक पीसकर चूर्ण तैयार कर लें. फिर इस चूर्ण की 10 ग्राम की फंकी रोजाना दिन में देने से ही पीलिया रोग मिट जाता है.


कान के बहने पर : 

बबूल की छाल का काढ़ा बनाकर तेज और पतली धार से कान में डालें. इसके बाद एक सलाई लेकर उसमें बारीक कपड़ा या रूई लपेटकर धीरे-धीरे कान में इधर-उधर घुमाएं और फूली हुई फिटकरी का थोड़ा-सा पानी कान में डालें. इससे कान का बहना बंद हो जाता है.

शक्तिवर्द्धक

बबूल के गोंद को घी के साथ तलकर उसमें दुगुनी चीनी मिला देते हैं इसे रोजाना 20 ग्राम की मात्रा में लेने से शक्ति में वृद्धि होती है|
प्यास : प्यास और जलन में इसकी छाल के काढ़े में मिश्री मिलाकर पिलाना चाहिए इससे लाभ होता है|


अरुचि : 

बबूल की कोमल फलियों के अचार में सेंधानमक मिलाकर खिलाने से भोजन में रुचि बढ़ती है तथा पाचनशक्ति बढ़ जाती है|

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पेट के अल्सर से निजात पाने के उपाय //Home remedies to overcome stomach ulcers

   

  अल्सर एक खतरनाक बीमारी है। हम बात कर रहे हैं पेट के अल्सर की। पेप्टिक अल्सर की वजह से कई समस्याएं हो सकती हैं। पेट के अंदर की सतह पर छाले होते हैं जो धीरे-धीरे जख्मों में बदलने लगते हैं। और अल्सर से परेशान इंसान को कई तरह की समस्याएं आने लगती हैं। पेट का अल्सर यानि पेप्टिक अल्सर दो तरह का होता है एक डयूडिनल अल्सर और दूसरा है गैस्ट्रिक अल्सर। समय पर इलाज न मिलने से अल्सर के रोगी की मौत भी हो सकती है।

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   अल्‍सर कई प्रकार का होता है - अमाशय का अल्‍सर, पेप्टिक अल्‍सर या गैस्ट्रिक अल्‍सर। अल्‍सर उस समय बनते हैं जब खाने को पचाने वाला अम्ल अमाशय की दीवार को क्षति पहुंचाता है। पहले पोषण की कमी, तनाव और लाइफ-स्‍टाइल को अल्‍सर का प्रमुख कारण माना जाता था। लेकिन, वैज्ञानिकों ने नये शोध में यह पता लगाया है कि ज्यादातर अल्सर एक प्रकार के जीवाणु हेलिकोबैक्टर पायलोरी या एच. पायलोरी द्वारा होता है। अल्‍सर की समस्‍या का इलाज समय पर नही किया जाए तो यह गंभीर समस्‍या बन जाती है। इस बैक्‍टीरिया के अलावा अल्‍सर के लिए कुछ हद तक खान-पान और लाइफस्‍टाल भी जिम्‍मेदार है। आइये हम आपको इस बीमारी से बचने के कुछ घरेलू उपचार बताते हैं।
    अल्सर होने के संकेत साफ होते हैं इस रोग में रोगी को पेट संबंधी दिक्कते जैसे पेट में जलन, दर्द और उल्टी में खून आदि आने लगता है। और कुछ समय बाद जब यह अल्सर फट जाता है तब यह जानलेवा बन जाता है।

 अल्सर के मुख्य लक्षण :

मल से खून का आना।
बदहजमी का होना।
सीने में जलन।
वजन का अचानक से घटना।
पेट में बार-बार दर्द का उठना और किसी पेनकिलर या एंटी-एसिड की दवाओं से ही पेट दर्द का ठीक होना अल्सर का लक्षण हो सकता है।
ड्यूडिनल अल्सर का मुख्य लक्षण है खाली पेट में दर्द होना। और खाना खाने के बाद ही दर्द का ठीक होना। वहीं पेप्टिक अल्सर में इंसान को भूख कम लगती है।
इसके अलावा भी अल्सर के रोगी को बार-बार कई दिक्कतें आती हैं जैसे पेट में जलन और मिचली का आना।

 अल्सर का कारण :

अधिक तनाव लेना।
गलत तरह के खान-पान करना।
अनियमित दिनचर्या।
अधिक धूम्रपान करना।
अत्याधिक दर्द निवारक दवाओं का सेवन करना।अधिक चाय या काफी पीना।
अधिक गरम मसालें खाना।

गाजर और पत्ता गोभी का रस :

 पत्तागोभी पेट में खून के प्रभाव को बढ़ाती है और अल्सर को ठीक करती है। पत्ता गोभी और गाजर का रस मिलाकर पीना चाहिए। पत्ता गोभी में लेक्टिक एसिड होता है जो शरीर में एमीनो एसिड को बनाता है।

सहजन : 

दही के साथ सहजन के पत्तों का बना पेस्ट बना लें और दिन में कम से कम एक बार इसका सेवन करें। इस उपाय से पेट के अल्सर में राहत मिलती है।

मेथी का दाना : 

अल्सर को ठीक करने में मेथी बेहद लाभदायक होती है। एक चम्मच मेथी के दानों को एक गिलास पानी में उबालें और इसे ठंडा करके छान लें। अब आप शहद की एक चम्मच को इस पानी में मिला लें और इसका सेवन रोज दिन में एक बार जरूर करें। ये उपाय अल्सर को जड़ से खत्म करता है।

 शहद :
  पेट के अल्सर को कम करता है शहद। क्योकिं शहद में ग्लूकोज पैराक्साइड होता है जो पेट में बैक्टीरिया को खत्म कर देता ह। और अल्सर के रोगी को आराम मिलता है।
नारियल : नारियल अल्सर को बढ़ने से रोकता है साथ ही उन कीड़ों को भी मार देता है जो अल्सर को बढ़ाते हैं। नारियल में मौजूद एंटीबेक्टीरियल गुण और एंटी अल्सर गुण होते हैं। इसलिए अल्सर के रोगी को नारियल तेल और नारियल पानी का सेवन अधिक से अधिक करना चाहिए।

नई और पुरानी खांसी के रामबाण उपचार 

केला : 

केला भी अल्सर को रोकता है। केले में भी एंटीबैक्टीरियल गुण होते हैं जो पेट की एसिडिटी को ठीक करते हैं। पका और कच्चा हुआ केला खाने से अल्सर के रोगी को फायदा मिलता है।आप चाहें तो केले की सब्जी बनाकर भी खा सकते हैं।
*हालांकि दूध खाने से गैस्ट्रिक एसिड बनाता है, लेकिन आधा कप ठंडे दूध में आधा नीबू निचोड़कर पिया जाए तो वह पेट को आराम देता है। जलन का असर कम हो जाता है और अल्‍सर ठीक होता है।

पोहा 

अल्‍सर के लिए बहुत फायदेमंद घरेलू नुस्‍खा है, इसे बिटन राइस भी कहते हैं। पोहा और सौंफ को बराबर मात्रा में मिलाकर चूर्ण बना लीजिए, 20 ग्राम चूर्ण को 2 लीटर पानी में सुबह घोलकर रखिए, इसे रात तक पूरा पी जाएं। यह घोल नियमित रूप से सुबह तैयार करके दोपहर बाद या शाम से पीना शुरू कर दें। इस घोल को 24 घंटे में समाप्‍त कर देना है, अल्‍सर में आराम मिलेगा।
*अल्‍सर के मरीजों के लिए गाय के दूध से बने घी का इस्तेमाल करना फायदेमंद होता है।
*अल्‍सर के मरीजों को बादाम का सेवन करना चाहिए, बादाम पीसकर इसका दूध बना लीजिए, इसे सुबह-शाम पीने से अल्‍सर ठीक हो जाता है।
*आंतों का अल्सर होने पर हींग को पानी में मिलाकर इसका एनीमा देना चाहिये, इसके साथ ही रोगी को आसानी से पचने वाला खाना चाहिए।
*अल्सर होने पर एक पाव ठंडे दूध में उतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर देना चाहिए, इससे कुछ दिनों में आराम मिल जायेगा।

छाछ की पतली कढ़ी 

बनाकर रोगी को रोजाना देना चाहिये, अल्‍सर में मक्की की रोटी और कढ़ी खानी चाहिए, यह बहुत आसानी से पच जाती है।

पिपली  के गुण प्रयोग लाभ 

बादाम : 

बादाम को पीसकर इसे अल्सर के रोगी को देना चाहिए। इन बादामों को इस तरह से बारीक चबाएं कि यह दूध की तरह बनकर पेट के अंदर जाएं।

लहसुन :
लहुसन की तीन कच्ची कलियों को कुटकर पानी के साथ सेवन करें।
गाय का दूध : गाय के दूध में हल्दी को मिलाकर पीना चाहिए। हल्दी में मौजूद गुण अल्सर को बढ़ने नहीं देते हैं।

 शहद :
गुडहल की पत्तियों के रस का शरबत बनाकर पीने से अल्सर रोग ठीक होता है।
बेलफल की पत्तियों का सेवन : बेल की पत्तियों में टेनिन्स नामक गुण होता है जो पेट के अल्सर को ठीक करते हैं। बेल का जूस पीने से पेट का दर्द और दर्द ठीक होता है।

अल्सर के लिए जरूरी परहेज :

अधिक दवाओं का सेवन न करें।
अल्सर का अधिक बढ़ने पर इसका ऑपरेशन ही एक मात्र उपाय है। यदि यह कैंसर में बदल जाता है तो अल्सर की कीमोथैरेपी की जाती है।
यदि आप चाहते हैं कि अल्सर का रोग आपको न लगें तो आपको अपने खान-पान और गलत लतों को छोड़ना होगा।



अवसाद दूर करने के उपाय//Methods to overcome depression

    


    आजकल की व्यस्त लाइफस्टाइल में अवसाद की समस्या आम बन चुकी है। अवसाद एक द्वन्द है, जो मन एवं भावनाओं में गहरी दरार पैदा करता है। अवसाद यह संकेत देता है कि आप कई मनोविकारों का शिकार हो सकते हैं। अवसाद में सामान्यत: मन अशान्त, भावना अस्थिर एवं शरीर अस्वस्थता का अनुभव करते हैं। ऐसी स्थिति में हमारी कार्यक्षमता प्रभावित होती है और हमारी शारीरिक व मानसिक विकास में व्यवधान आता है।
   अवसाद यानी डिप्रेशन किसी भी इंसान के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बीमारी है। इस बीमारी में डॉक्टर के इलाज के अलावा घरेलू उपचार करके भी लाभ प्राप्त किया जा सकता है। सेब, काजू, इलायची, जैम, टोस्ट और केक अवसाद कम करने में मदद करते हैं।

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

   प्रसव के बाद महिलाओं के जीवन में सब कुछ बदल जाने से कभी कभी वे अवसाद से ग्रस्त हो जाती हैं क्योंकि उन्हें अपनी आदतें अपने शिशु की दिनचर्या के अनुसार बदलनी पड़ती हैं।
   आपको डिप्रेशन से बचना है तो अपनी लाइफस्टाइल व डेली रूटीन पर गौर करना जरूरी है। अवसाद से निपटने के कई तरीके व दवाएं हैं लेकिन अगर प्राकृतिक तरीकों से इसका निपटारा किया जाए तो बेहतर है। इससे आपकी सेहत को कोई नुकसान भी नहीं पहुंचेगा। अब लिखते हैं  प्राकृतिक तरीकों से अवसाद को दूर करने के अचूक उपायों के बारे में-

संतुलित आहार

  संतुलित आहार लें फल, सब्जी, मांस, फलियां, और कार्बोहाइड्रेट आदि का संतुलित आहार लेने से मन खुश रहता है। एक संतुलित आहार न केवल अच्छा शरीर बनता है बल्कि यह दुखी मन को भी अच्छा बना देता है।

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दोस्त बनाएं

  अच्छे दोस्त बनायें अच्छे दोस्त आपको आवश्यक सहानुभूति प्रदान करते हैं और साथ ही साथ अवसाद के समय आपको सही निजी सलाह भी देते हैं। इसके अतिरिक्त, जरूरत के समय एक अच्छा श्रोता साथ होना नकारात्मकता और संदेह को दूर करने में सहायक है।

नकारात्मक लोगों से बचें सामाजिक बनें

अकसर अवसादग्रस्त होने पर लोग खुद को एक कमरे में बंद कर लेते हैं जो कि बहुत गलत है। ऐसे समय में आपको और भी ज्यादा मजबूत बनना चाहिए और लोगों से घुल मिल कर रहना चाहिए। खुद को सामाजिक बनाएं ऐसे में आपको नकारात्मक विचारों से अपना ध्यान हटाने में मदद मिलेगी।

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व्यायाम करें

व्यायाम अवसाद को दूर करने का सबसे अच्छा तरीका है। इससे न केवल एक अच्छी सेहत मिलती है बल्कि शरीर में एक सकारात्मक उर्जा का संचार भी होता है। व्यायाम करने से शरीर में सेरोटोनिन और टेस्टोस्टेरोन हार्मोन्स का स्राव होता है जिससे दिमाग स्थिर होता है और अवसाद देने वाले बुरे विचार दूर रहते हैं।
नकारात्मक लोगों से दूर रहें कोई भी ऐसे लोगों के बीच में रहना पसंद नहीं करता जो कि लगातार दूसरों को नीचे गिराने में लगे रहते हैं। ऐसे लोगों से दूर रहने से मन को शांति और विवेक प्रदान करने में आपको मदद मिलेगी।

पर्याप्त नींद लें

अवसाद की समस्या तभी होती है जब या तो बहुत अधिक सोते हैं या बिल्कुल नहीं सो पाते हैं। इस समस्या से बचने के लिए बेड पर जाने का एक समय निर्धारित कर लें और हर रोज उसी समय पर सोएं। इससे आप अवसाद से तो बचेंगे ही साथ ही आपकी लाइफस्टाइल भी अच्छी होगी। अच्छी नींद के लिए आप चाहें तो सोने से पहले नहा सकते हैं या हर्बल टी या ग्रीन टी भी ले सकते हैं।

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कुछ नया करें
जब आप अवसाद ग्रस्त होते हैं तो खुद को कुछ नया करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। म्यूजियम जाएं या अपनी कोई मनपसंद लेखक की किताब पार्क में बैठकर पढ़ें। आप चाहें तो अपनी मनपसंद हॉबी क्लास भी ज्वाइन कर सकती हैं जैसे डांस, कुकिंग, गायन, पेंटिंग आदि। इससे आपका मन भी लगा रहेगा और अवसाद की समस्या से भी बचेंगे।
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नजला-जुकाम: कारण और उपाय//Catarrh cold, Causes and Remedy

    

    नजला या जुकाम ऐसा रोग है जो किसी भी दिन किसी भी स्त्री या पुरुष को हो सकता है| यह रोग वैसे तो ऋतुओं के आने-जाने के समय होता है लेकिन वर्षा, जाड़े और दो ऋतुओं के बीच के दिनों में ज्यादातर होता है|नजला-जुकाम एक बहुत ही आम और हमेशा परेशान करने वाला रोग है। वास्तव में यह रोग नहीं, शरीर की एक सांवेदनिक प्रतिक्रिया है, जो मौसम बदलने, नाक में धूल कण जाने आदि से उत्पन्न होती है। पूरे विश्व के लोग कभी न कभी, इसके शिकार होते ही हैं। नज़ला-जुकाम शीत के कारण होने वाला एक ऐसा रोग है, जिसमें नाक से पानी बहने लगता है। मामूली- सा दिखने वाला यह रोग, कफ की अधिकता के कारण अधिक कष्टदायक हो जाता है। यों तो ऋतु आदि के प्रभाव से दोष संचय काल में संचित हो कर अपने प्रकोप काल में ही कुपित होते हैं, परंतु दोषों के प्रकोपक कारणों की अधिकता, या प्रबलता के कारण तत्काल भी कुपित हो जाते हैं, जिससे जुकाम हो जाता है; अर्थात नज़ला-जुकाम शीत काल के अतिरिक्त भी हो सकता है।
आयुर्वेद में नजला-जुकाम 6 प्रकार के बताये गये हैं। आचार्य चरक ने इसके चार प्रकार बताये हैं, जबकि आचार्य सुश्रुत ने पांच प्रकार माने हैं।
वायुजन्य (वातज) : वायु से उत्पन्न जुकाम में नाक में वेदना, सुंई चुभने जैसी पीड़ा, छींक आना, नाक से पतला स्राव आना, गला, तालु और होठों का सूख जाना, सिर दर्द और आवाज बैठ जाना आदि लक्षण होते हैं।
पित्तजन्य (पित्तज) : नाक से गर्म और पीले रंग का स्राव आना, नाक का अगला भाग पक जाना, ज्वर, मुख शुष्क हो जाना, बार-बार प्यास लगना, शरीर दुबला और त्वचा चमकरहित होना इसके लक्षण हैं। नाक से धुंआ निकलता महसूस होता है।

कारण-
आमतौर पर कब्ज होने पर सर्दी लग जाने से होता है. पानी में निरंतर भीगने, एकाएक पसीना बंद हो जाने से, ठंडे पदार्थों का सेवन ज्यादा करने से, प्राक्रतिक आवेगों को रोकने प्रदूषित वातावरण में रहने से, या तम्बाकू का अधिक सेवन करने से हो जाता है. यह एक संक्रमण रोग है. इससे नाक की श्लेष्मा झिल्ली में शोध हो जाता है. इस रोग की सुरूआत में नाक में श्लेष्मा का बहना या बिलकुल खुश्क हो कर नाक बंद हो जाना, छींकें आना, नाक में खुश्की, सिर दर्द, नाक में जलन, आखें लाल होना, कान बंद होना खांसी के साथ कफ का आना, नाक में खुजली होना आदि नजला जुकाम के लक्षण होते हैं.
खाने मे खराबी, ठंड से, सु-बह उठने के साथ ठंडा पानी से मूह धोना या पीना , ज्यादा शराब पीने , ओर किसी नजले जुखाम के मरीज के साथ रहने पर

लक्षण

बार बार छींके आना, नाक मे खुजली, नाक का बहाना, गले मे खरास, बार बार नाक बंद होना, आंखो मे पानी बहाना और खांसी

नजला (जुकाम) की पहचान-

शुरू में नाक में खुश्की मालूम पड़ती है| बाद में छींकें आने लगती हैं| आंख-नाक से पानी निकलना शुरू हो जाता है| जब श्लेष्मा (पानी) गले से नीचे उतरकर पेट में चला जाता है तो खांसी बन जाती है| कफ आने लगता है| कान बंद-से हो जाते हैं| माथा भारी और आंखें लाल हो जाती हैं| बार-बार नाक बंद होने के कारण सांस लेने में परेशानी होती है| रात में नींद नहीं आती| रोगी को मुंह से सांस लेनी पड़ती है|

घरेलू उपचार हल्दी से -

-100 ग्राम साबुत हल्दी लें।
-घुन लगे टुकड़ों को निकाल दे।
- अच्छा होगा कि कच्ची हल्दी जो बाजार मे सब्जी बेचने वाले बेचते हैं वह ले।उसके छोटे छोटे टुकड़े काट कर सूखा ले।
- पीसी हुई हल्दी ना ले।
- साबुत हल्दी के छोटे छोटे (गेहूं या चने के समान) टुकड़े कर ले।
- एक लौहे की या पीतल की कड़ाही ले। ना मिले तो एल्यूमिनियम की कड़ाही ले।
स्टील या नॉन स्टिक की ना ले।
-उसमे लगभग 25 ग्राम देशी घी डालकर हल्दी के टुकड़े धीमी आग पर भुने।
- यदि किसी को घी नहीं खाना है तो वह बिना घी के भून सकता है।
 -हल्दी को इस प्रकार गरम करे कि ना तो वह जले और ना ही कच्ची रहे।
-अब इसे आग से उतार कर पीस कर रख ले।

प्रयोग विधि—

- 1 छोटा चम्मच यह भुनी हुई हल्दी और  10 ग्राम गुड प्रतिदिन सुबह या शाम गरम दूध से ले।
- जो अक्सर यात्रा करते हैं वह यह करे।
-हल्दी और गुड बराबर मिलाकर रख ले।
- 2 चम्मच यह दवाई गरम पानी से ले।
- साथ मे बर्फी या पेड़ा खाए।
- चाय से ना ले। चाय से कोई लाभ नहीं होगा।
 -लेने के 1 घण्टे तक ठंडा पानी ना पिए।
 -यह दवाई धीरे काम करती है।
-लगभग 1 सप्ताह प्रयोग से कुछ लाभ होता है।
- स्थायी लाभ के लिए कम से कम 3 महीने प्रयोग करे।
- जो अधिक परेशान हैं वह सुबह और शाम प्रयोग करे।
 -बच्चो को आयु के अनुसार कम मात्रा दे।
- गर्भवती स्त्री को भी दे सकते हैं।
- नाक की एलर्जी इस्नोफिलिया आदि सभी ठीक हो जाते हैं।


नजला जुकाम (Influenza Cold) के अन्य  उपाय

*अदरक और देशी घी

अदरक के छोटे-छोटे टुकड़ों को देशी घी में भून लें| फिर उसे दिन में चार-पांच बार कुचलकर खा जाएं| इससे जुकाम बह जाएगा और रोगी को शान्ति मिलेगी|
* तुलसी के पत्ते, सौंठ, छोटी इलायची 6-6 ग्राम और दालचीनी 1 ग्राम ले कर पीस लें. और 100 ग्राम पानी में उबालें आधा पानी रह जाने पर छान कर पियें ऐसा काढ़ा दिन में 3 बार पीने से नजला जुकाम ठीक हो जाता है|

अदरक और तुलसी मिश्रण-

रस निकालने के लिए अदरक और तुलसी दोनों को पीस लें। शहद डालें और इसे अपने बच्चे को दें।


*हल्दी, अजवायन, पानी और गुड़-

10 ग्राम हल्दी का चूर्ण और 10 ग्राम अजवायन को एक कप पानी में आंच पर पकाएं| जब पानी जलकर आधा रह जाए तो उसमें जरा-सा गुड़ मिला लें| इसे छानकर दिन में तीन बार पिएं| दो दिन में जुकाम छूमंतर हो जाएगा|
* तुलसी के पत्ते छाया में सुखा कर पीस लें और नसवार की तरह सूंघें इससे छींकें आती हैं और जुकाम ठीक हो जाता है|
* छोटी इलायची, सौंठ, दालचीनी सभी को एक- एक ग्राम लें और तुलसी दल 6 ग्राम सब को कूट कर दिन में 3-4 बार चाय बना कर पीने से नजला जुकाम से छुटकारा मिलता है\
* तुलसी का रस शहद के साथ दिन में 4 बार चाटने से जुकाम ठीक हो जाता है साथ ही बुखार भी ठीक हो जाता है|


लौंग शहद मिश्रण

अब यह एक ऐसा उपचार है जो आपको यह सोचने पर मजबूर कर सकता है कि, सर्दी के लिए लौंग? मैं आपको बताती हूँ, यह बहुत उपयोगी होता है! यह कफनाशक है और बलगम से छुटकारा पाने में सहायता करता है। यह खांसी दूर रखने में भी लाभदायक होता है और बच्चे को अच्छी नींद प्रदान करता है।
५ लौंग को सूखा भूनें और ठंडा होने के बाद अच्छी तरह पीस लें। इसमें शहद डालें और सोने से पहले बच्चे को दें।

*लहसुन, शहद और कलौंजी-

लहसुन की दो पूतियों को आग में भूनकर पीस लें| फिर चूर्ण को शहद के साथ चाटें| कलौंजी का चूर्ण बनाकर पोटली में बांध लें| फिर इसे बार-बार सूंघें| नाक से पानी आना रुक जाएगा|


*हल्दी दूध -

हल्दी के साथ मिले हुए दूध को ‘हल्दी दूध’ के रूप में भी जाना जाता है, जिससे हममें से ज्यादातर लोग परिचित हैं। यह लोकप्रिय उपचार है और सूखी खांसी के लिए बहुत प्रभावशाली होता है। इसे एक गिलास दूध में चुटकी भर हल्दी डालकर उबाल कर तैयार किया जाता है।
हल्दी को इसके चिकित्सीय गुणों के लिए जाना जाता है और यह बीमारी से लड़ने में और तेजी से आराम पहुंचाने में सहायता करता है। गर्म दूध आपके बच्चे को अच्छी और आरामदायक नींद प्रदान करने में भी सहायता करता है।



*दालचीनी और जायफल-

दालचीनी तथा जायफल  दोंनो एक चम्मच की मात्रा में चूर्ण के रूप में लेने से जुकाम फूर्र हो जाता है|

* 3 ग्राम तुलसी के पत्ते, 2 ग्राम दालचीनी, डेढ ग्राम सौंठ 1 ग्राम केसर, 2 ग्राम जावित्त्री, डेढ़ ग्राम लौंग, इन सब को पोटली में बांध कर 500 ग्राम पानी में पकाएं आधा पानी रहने पर इस में 250 ग्राम दूध मिला कर पीने से नजला जुकाम वह वदन दर्द दोनों मिट जाते हैं|
* तुलसी के बीज, गिलोय और कटेली की जड़ समान मात्रा में ले कर पीस लें और 4 रत्ती चूर्ण 1 चम्मच शहद में मिला कर सुबह शाम तीन दिन खाने से नजला जुकाम मिट जाता है|

*गुड़ के साथ अजवाइन का पानी -

१ कप पानी को चुटकी भर अजवाइन और १ चम्मच गुड़ के साथ उबालें। छानकर ठंडा करें और इसे अपने बच्चे को दें।
इसकी खुराक है दिन में एक बार १ चम्मच।


*गर्म सरसों तेल की मालिश-

सरसों के तेल को थोड़े कलौंजी और २ लहसुन की कलियों के साथ गर्म करें। इसे बच्चे के सीने, नाक के नीचे, पैरों के पीछे और हथेलियों पर लगाएं। हल्के हाथ से मालिश करें।
मालिश के बाद आप अतिरिक्त तेल पोंछ सकती हैं।

*गर्म पानी में गुड़, जीरा और काली मिर्च -

बच्चे को सर्दी, खांसी और गले में खराश होने पर यह मिश्रण प्रभावकारी होता है। इसे दिन में एक बार १-२ चम्मच से ज्यादा ना दें क्योंकि गुड़ की तासीर गर्म होती है।
गुड़ पाउडर – १ से २ छोटा चम्मच
जीरा – चुटकी भर
काली मिर्च – १ या २
पानी – १ कप
सभी सामग्रियों को १० मिनट के लिए पानी में उबालें। छाने, ठंडा करें और अपने बच्चे को दें।

*सोंठ पाउडर मिश्रण -

जीरे, सोंठ और मिश्री को महीन पाउडर के रूप में पीस लें। एक हवाबंद बर्तन में रखें। इसे अपने बच्चे की लगातार होने वाली सर्दी-खांसी के लिए प्रयोग करें।

*गोमूत्र-

दोंनो नथुनों में गोमूत्र (ताजा) की दो-दो बूंदें सुबह-शाम टपकाएं
|*अदरक, प्याज, और तुलसी का रस समान मात्रा में मिला कर शहद के साथ चाटने से जुकाम में आराम आता है|

*अदरक और शहद-

एक चम्मच अदरक के रस में आधा चमच शहद मिलाकर चाट लें|


जीरा पाउडर मिश्रण 

जीरा – १ छोटा चम्मच
मिश्री या कलकंदम – १ या २ टुकड़े
जीरे और मिश्री दोनों को महीन पाउडर में पीस लें। जब भी आपके बच्चे को खांसी आती है तो उसे यह मिश्रण दें।


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होम्योपैथिक की कुछ स्पेसिफ़िक औषधियां//Some of the specific homeopathic drugs


क्रोटेलस – ब्लैक-वाटर-फीवर
बेलाडोना – स्कारलेट फीवर
आर्सेनिक – टोमेन पायजनिंग
मर्क कौर – डिसेन्ट्री (खूनी)
लैट्रोडेक्टस – एन्जाइना पैक्टोरिस
कोका – थकावट
कॉफ़िया .- दांत का दर्द
सीपिया – रिश्तेदारों से विराग
रस टॉस्क, रूटा – कमर का दर्द

आयोडाइड, स्पंजिया – गलगंड
स्टैफिसैग्रिया – दांत खुरना
स्पंजिया और हिपर – क्रुप खांसी
ड्रॉसेरा – हूपिंग-खांसी
थूजा – मस्से
एकोनाइट – बेचैनी का तेज़ बुखार
मेजेरियम – सिर की पपड़ी के नीचे पस
शक्ति – 3, 6, 30, 200


पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार

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मानसिक रोगों के इलाज में मददगार है स्वप्न चिकित्सा// Dream therapy is helpful in the treatment of mental diseases::


   आधुनिक मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सोते समय की चेतना की अनुभूतियों को स्वप्न कहते हैं। स्वप्न के अनुभव की तुलना मृगतृष्णा के अनुभवों से की गई है। यह एक प्रकार का विभ्रम है। स्वप्न में सभी वस्तुओं के अभाव में विभिन्न प्रकार की वस्तुएँ दिखाई देती हैं। स्वप्न की कुछ समानता दिवास्वप्न से की जा सकती है। परंतु दिवास्वप्न में विशेष प्रकार के अनुभव करनेवाला व्यक्ति जानता है कि वह अमुक प्रकार का अनुभव कर रहा है। स्वप्न अवस्था में अनुभवकर्ता जानता नहीं कि वह स्वप्न देख रहा है। स्वप्न की घटनाएँ वर्तमान काल से संबंध रखती हैं। दिवास्वप्न की घटनाएँ भूतकाल तथा भविष्यकाल से संबंध रखती हैं।
  भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार स्वप्न चेतना की चार अवस्थाओं में से एक विशेष अवस्था है। बाकी तीन अवस्थाएँ जाग्रतावस्था, सुषुप्ति अवस्था और तुरीय अवस्था हैं। स्वप्न और जाग्रतावस्था में अनेक प्रकार की समानताएँ हैं। अतएव जाग्रतावस्था के आधार पर स्वप्न अनुभवों को समझाया जाता है। इसी प्रकार स्वप्न अनुभवों के आधार पर जाग्रतावस्था के अनुभवों को भी समझाया जाता है।
स्वप्नों का अध्ययन चिकित्सा दृष्टि से भी किया गया है। साधारणत: रोग की बढ़ी चढ़ी अवस्था में रोगी भयानक स्वप्न देखता है और जब वह अच्छा होने लगता है तो वह स्वप्नों में सौम्य दृश्य देखता है।
   एक यूरोपीय साइंस फाउंडेशन (ESF) कार्यशाला ने स्पष्ट अर्थ वाले स्वप्न के दैरान मस्तिष्क की गतिविधियों और मानसिक स्थितियों में समानता पायी है, जो मानसिक रोगों के इलाज में उपयोगी हो सकती है।
  जब कोई व्यक्ति इस बारे में अवगत है कि वह सपना देख रहा है तो स्पष्ट अर्थ वाला स्वप्न सोने और जागने के बीच एक संकर अवस्था है। यह मस्तिष्क में वैद्युत गतिविधियों का एक विशिष्ट पैटर्न बनाती है जिसमें सिज़ोफ्रेनिया जैसी मानसिक विकृति की अवस्था द्वारा बनाए गए पैटर्न से समानता होती है।
जर्मनी में फ्रैंकफर्ट विश्वविद्यालय के उर्सुला वॉस इशारा करते हैं कि स्पष्ट अर्थ वाले स्वप्न और मानसिक स्थितियों के बीच संबंधों की पुष्टि करने से इस बात पर आधारित नए चिकित्सकीय रास्तों की संभावना होती है कि स्वस्थ रूप से सपना देखना तंत्रिका विज्ञान और मनोरोग विकारों के साथ जुड़ी अस्थिर अवस्थाओं से किस प्रकार अलग है।
कार्यशाला के दौरान प्राप्त नए आंकड़ों से पता चलता है कि स्पष्टतापूर्वक सपना देखने से मस्तिष्क एक असंबद्धता की अवस्था में होता है, ऐसा कुछ जो संबंद्धता की पुष्टि करता है।

वॉस के अनुसार, असंबद्धता में मानसिक प्रक्रियाओं, जैसे कि तार्किक सोच या भावनात्मक प्रतिक्रिया पर नियंत्रण खोना शामिल है।
वॉस कहते हैं कि कुछ मानसिक स्थितियों में इस अवस्था को उस समय भी होने का पता चला है, जब लोग जागे होते हैं।
इटली के मिलान में यूनिवर्सिटी डेगली स्टडी डी मिलानो में कार्यशाला के संयोजक सिल्वियो स्कारोन का कहना है, "मनोरोग विज्ञान के क्षेत्र में, मरीजों के सपनों में रूचि उत्तरोत्तर नैदानिक ​​अभ्यास और अनुसंधान दोनों से बाहर हो गयी है। लेकिन यह नया काम दिखाता हुआ प्रतीत होता है कि हम स्पष्ट अर्थ वाले सपने और उन कुछ मानसिक स्थितियों के बीच तुलना करने में सक्षम हो सकते हैं जिसमें हमारे जगे होने पर चेतना की असामान्य असंबद्धता जैसे मनोरोग, अवैयक्तिकीकरण और छद्मआघात शामिल होते हैं।"

   नए निष्कर्षों ने स्वप्न चिकित्सा के द्वारा कुछ दशाओं का उपचार करने के बदनाम विचार में फिर से चिकित्सकों की रूचि को पुनर्जीवित किया है, जैसे कि उदाहरण के लिए बुरे सपने से पीड़ित लोगों का इलाज उनके स्पष्ट अर्थ वाले सपने द्वारा किया जा सकता है ताकि वे होश में जाग सकें।
   सेक्रोन का कहना है, "एक तरफ, बुनियादी सपना शोधकर्ता अपने ज्ञान को अब मानसिक रोगियों पर इस लक्ष्य के साथ लागू कर सकते हैं कि मनोरोग विज्ञान के लिए एक उपयोगी उपकरण का निर्माण हो सकेगा, रोगियों के स्वप्नों में रूचि पैदा हो सकेगी। दूसरी ओर, तंत्रिका विज्ञान शोधकर्ता पता लगा सकते हैं कि अपने काम को सुप्त शोध से तीव्र मानसिक और मस्तिष्क-दिमाग की असंबद्ध अवस्थाओं के डेटा का मतलब निकालने के लिए मनोरोग की दशाओं तक कैसे फैलाया जाए।''

शोध टीम ने उस विचार का भी अध्ययन किया जिसमें पागल भ्रम और अन्य भ्रमात्मक घटनाएं होती हैं, जब असंबद्ध स्वप्न देखने की अवस्था में धमकीपूर्ण स्थितियों से लेकर जागने की अवस्था में आने की पुनरावृत्ति होती है।
  सेक्रोन का कहना है, "वास्तविक धमकीपूर्ण घटनाएं शायद स्वप्न प्रणाली को सक्रिय कर देती हैं, ताकि उन सिमुलेशनों का उत्पादन करें जो धारणा और व्यवहार के संदर्भ में धमकीपूर्ण घटनाओं के यथार्थवादी रिहर्सल हैं। यह सिद्धांत इस आधार पर काम करता है कि वह वातावरण जिसमें मानव मस्तिष्क विकसित हुआ, उसमें वे लगातार खतरनाक घटनाएं शामिल थीं जिसने मानव प्रजनन के लिए खतरा पैदा किया। ये पैतृक मानव आबादी पर एक गंभीर चयन दबाव होता है और शायद धमकी सिमुलेशन तंत्र को पूरी तरह से सक्रिय कर देती।"

अमेरिका में हार्वर्ड विश्वविद्यालय से हाल ही में सेवानिवृत्त हुए मनोचिकित्सक और सपना शोधकर्ता एलन हॉबस्न जोर देकर कहते हैं कि हालांकि, सपना देखने से धमकियों के पूरी तरह से फिर से पैदा करने की संभावना नहीं है, पर इनकी सीखने की प्रक्रिया में भूमिका हो सकती है।
  जब आप जागे होते हैं तो सामग्री जुड़ जाती है और सोने के दौरान स्वप्न चेतना के स्वत: कार्यक्रम के साथ एकीकृत हो जाती है। यह उस प्रेक्षण के साथ काम करता है कि दिन के समय में सीखना रात में सोने के समय सुदृढ़ हो जाती है, जिससे वह घटना होती है जिसमें लोग उन तथ्यों को दिन में उस समय की तुलना में बेहतर याद रखते हैं जब उन्होंने उनको सीखा है।


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किस ऋतु में क्या खाएँ?// What to eat in what season?

    आज लोग पर्याप्त पौष्टिक भोजन कर रहे हैं, परंतु उसका लाभ नहीं हो रहा है। अच्छा खाने के बाद भी रोग हो रहे हैं। इसका कारण है कि भोजन लेने का तरीका और समय सही नहीं है। उन्हें यही नहीं पता कि किस समय और क्या खाना उचित है।
दही का वर्षा ऋतु में सेवन न करें। वर्षा ऋतु को पित्त का संचय काल माना गया है। इसमें स्वाभाविक रूप से पित्त बनता है। अम्ल गुण वाला होने के कारण से दही पित्त को बढ़ाता है। इसलिए वर्षा ऋतु में दही का सेवन करने से पित्तज रोग होने की संभावना बढ़ जाएगी। पित्तज रोग यानी चर्म रोग, एसिडिटी, शरीर में उष्णता बढ़ना आदि हैं। इसके अतिरिक्त रात में कभी भी दही का सेवन नहीं किया जाना चाहिए। दही स्रोतों में रूकावट पैदा करने वाला है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्रोतों का निर्बाध होना आवश्यक है ताकि रस, रक्त, मांस, मेद, हड्डी, मज्जा, वीर्य आदि के पोषण की प्रक्रिया चलती रहती है। स्रोतों के बाधित होने से आम का संचय होता है जिससे भूख घटना, जुकाम, खांसी, मोटापा, मधुमेह आदि होने की संभावना बढ़ जाती है। आज जो मधुमेह बढ़ रहा है, उसका एक बड़ा कारण दही का बढ़ता उपयोग है। 

पंजाब में इसलिए मधुमेह के रोगी अधिक पाए जाते हैं। हालांकि राजस्थान जैसे जांगल प्रदेशों में दही का प्रयोग लाभकारी है। थोड़ा बहुत स्थान का भी प्रभाव रहता है, परंतु ये सर्वसामान्य नियम हैं, इसका ध्यान रखना चाहिए।दही खाना ही हो तो उसे छाछ का रूप दे दें। इसमें थोड़ा पानी मिला लें और उसमें सैंधा या काला नमक मिला लें। फिर यह लाभकारी हो जाएगा। दही पथ्य नहीं है, छाछ पथ्य है। दही में पेट के लिए लाभकारी वैक्टीरिया होते हैं, परंतु उनका लाभ लेने और नुकसानों से बचने के लिए दही में कुछ न कुछ जैसे पानी, शक्कर, शहद, घी, आंवला या मंूग का सूप आदि कुछ अवश्य मिलाएं।
अब जानते हैं किस ऋतु मे क्या आहार होना चाहिए-



शिशिर ऋतु (जनवरी से मार्च)
इस मौसम में घी, सेंधा नमक, मूँग की दाल की खिचड़ी, अदरक व कुछ गरम प्रकृति का भोजन करना चाहिए।
कड़वे, तिक्त, चटपटे, ठंडी प्रकृति के व बादीकारक भोजन से परहेज रखें।
बसंत ऋतु (मार्च से मई)
इस मौसम में जौ, चना, ज्वार, गेहूँ, चावल, मूँग, अरहर, मसूर की दाल, बैंगन, मूली, बथुआ, परवल, करेला, तोरई, अदरक, सब्जियाँ, केला, खीरा, संतरा, शहतूत, हींग, मेथी, जीरा, हल्दी आँवला आदि कफनाशक पदार्थों का पदार्थों का सेवन करें।
गन्ना, आलू, भैंस का दूध, उड़द, सिंघाड़ा, खिचड़ी व बहुत ठंडे पदार्थ, खट्टे, मीठे, चिकने, पदार्थों का सेवन हानिकारक है। ये कफ में वृद्धि करते हैं।
ग्रीष्म ऋतु (जून से जुलाई)
पुराना गेहूँ, जौ, सत्तू, भात, खीर, दूध ठंडे पदार्थ, कच्चे आम का पना, बथुआ, करेला, परवल, ककड़ी, तरबूज आदि का सेवन वाँछनीय है।
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आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार




पेशाब की समस्याओं की होम्योपैथिक चिकित्सा // Homeopathic treatment of urination problems





मूत्राशय एवं गुर्दे संबंधी रोग अनेक कारणों से हो सकते हैं। विकसित देशों में इन रोगियों की संख्या अधिक पाई जाती है। गुर्दे संबंधी बीमारियां मुख्य रूप से अकारण होने वाले बुखार की स्थिति में, थकान, वजन गिरते जाना, उल्टी होना, जी मिचलाना, कमजोरी एवं रक्तहीनता की परेशानियां होने पर, गुर्दो की कार्यप्रणाली की जांच करना भी आवश्यक है, क्योंकि यह सब गुर्दो की खराबी की वजह से भी हो सकता है।
उच्च रक्तचाप, हृदय का काम करना बंद कर देना, पैरों, चेहरे एवं शरीर की सूजन गुर्दो की खराबी को परिलक्षित करने के लिए पर्याप्त हैं। बिना कारण सिरदर्द रहना, दौरे पड़ना, मूर्छा आना आदि भी गुर्दो की खराबी के कारण हो सकता है। गुर्दो में पथरी के कारण दर्द रहना, मधुमेह होना, सूजन के साथ-साथ उदर में पानी भर जाना गुर्दो की खराबी को ही परिलक्षित करते हैं। पेशाब करते समय दर्द होना, पेशाब न होना, अधिक पेशाब होना, पेशाब में खून आना, पेशाब रोक न पाना, सोते समय पेशाब निकल जाना आदि मूत्राशय से संबंधित परेशानियां हैं।

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पेशाब करने में दर्द महसूस होना – 
यह अनेकों कारणों से हो सकता है – पेशाब करने की अचानक इच्छा होना, मूत्राशय के पीछे के झिल्ली की सूजन, पथरी अथवा किसी अनियमित कोशिका-वृद्धि के कारण हो सकती है। अन्य कारण, जिनकी वजह से दर्द के साथ एकदम ही पेशाब की हाजत उठती है, वे हैं –*मूत्राशय में पथरी।
* बुढ़ापे में प्रोस्टेट ग्रंथि के अनियमित रूप से बढ़ जाने के कारण।
* मूत्राशय में कैंसर।
 *स्त्रियों में गर्भाशय में गांठ बनने के कारण या पेट में बच्चा होने पर, मूत्राशय पर दबाव पड़ने के कारण।

*मूत्राशय में सूजन
 *प्रोस्टेट ग्रंथियों की सूजन।
* पेशाब के रास्ते यूरंथ्रा की सूजन।
   *क्षयरोग की वजह से गुर्दे / मूत्राशय में गांठे बनने के कारण

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पेशाब न होना –
 *उल्टियां एवं दस्त होने के कारण।
* अत्यधिक दवाइयों का सेवन, जिनसे बार-बार पेशाब करने जाना पड़ता हो।
* शरीर में पानी की कमी के कारण।
* बुखार एवं पसीना आने से।

प्लाज्मा स्तर (घनत्व) घट जाने के कारण –
* उल्टियां एवं दस्त होने के कारण।
* अत्यधिक दवाइयों का सेवन, जिनसे बार-बार पेशाब करने जाना पड़ता हो।
* हृदय का काम करना बंद करने की स्थिति में (संकुचन के कारण)।

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गुर्दे की तात्कालिक अथवा पुरानी बीमारी के कारण
1. मूत्र नलियों का क्षरण।
2. गुर्दों की कार्टिकल सतह का क्षरण।
मूत्र-मार्ग में रुकावट जैसे पथरी इत्यादि के कारण 
पेशाब अधिक होना – .
 * मधुमेह (डायबिटीज मेलीटस)।
 *डायबिटीज इन्सीपिंडस।
* सिर में चोट लगने के कारण।
* गुर्दे की पुरानी खराबी के कारण।
 *मैनीटॉल चिकित्सा के कारण।
* पेशाब नलियों के क्षरण के ठीक होने की स्थिति में।
 *अत्यधिक पानी पीने के कारण।

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पेशाब में रक्त आना 
 पोटैशियम की कमी।
 कैल्शियम की अधिकता।
1. गुर्दों 
में किसी लीजन (चोट अथवा पीड़ा) के कारण।
2. मूत्र नलियों अथवा मूत्राशय में चोट अथवा पीड़ा के कारण
3. पेशाब रोक पाने में असंयम
असत्याभास के कारण –
1. अचानक पेशाब निकल जाना।
2. मूत्राशय की निष्क्रियता।
3. मूत्राशय की ग्रीवा पर अवरोध को प्रकट करते हुए उक्त संक्रमण हो सकता हैं।

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प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ जाना – लगभग 60 या 70 वर्ष के पुरुषों में मूत्राशय के निकास द्वार पर स्थित प्रोस्टेट ग्रंथि जब आकार में बढ़ जाती है, तो मूत्र के सामान्य प्रवाह में रुकावट डालने लगती है जिससे रोगी को पेशाब बूंद-बूंद होना, मूत्र की धार दूर तक जाना, रात को बार-बार मूत्र को उठना जैसे प्रारंभिक लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। इस दशा को बहुत-से रोगी अनदेखा करके टालते रहते है और फिर एक दिन अचानक पूर्णरूपेण पेशाब रुक जाने के कारण डाक्टरों के पास आते हैं, तो कैथेटर (नली) द्वारा पेशाब उतारने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता। बार-बार कैथेटर डालने से मूत्रतंत्र में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
पेशाब रोग की होमियोपैथिक रेमेडीज-
लक्षणों की समानता के आधार पर उपरोक्त वर्णित बीमारियों एवं रोग लक्षणों के लिए निम्न होमियोपैथिक औषधियां अत्यधिक कारगर एवं सफल सिद्ध रही हैं –

सांस फूलने(दमा) के लिए प्रभावी घरेलू उपचार

हेमेमिलिस : बार-बार पेशाब की हाजत के साथ ही पेशाब में खून आना (काले रंग का रक्त स्राव, स्त्रियों में उपनियमित माहवारी) मूल अर्क में 5-10 बूंद औषधि दिन में तीन बार नियमित रूप से लेने पर आराम मिलता है। 30 शक्ति में भी ले सकते हैं।
एपिस : पेशाब में जलन व दुखन, कम मात्रा में कतरे आना, बार-बार हाजत, चुभन जैसा दर्द, गाढ़े पीले रंग का पेशाब, पेशाब की हाजत होने पर रोक पाना मुश्किल, आखिरी बूंद पर अत्यधिक जलन एवं दर्द महसूस होना आदि लक्षण मिलने पर 30 शक्ति में सेवन करना लाभप्रद रहता है।
सैबेलसैरुलाटा : रात्रि में हर वक्त पेशाब करने की हाजत रहना, पेशाब करने में दिक्कत महसूस होना, प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ी हुई, रात में सोते-सोते अपने आप पेशाब हो जाना आदि लक्षण मिलने पर मूल अर्क में 10 बूंद दवा दो-तीन बार सेवन करने पर तात्कालिक लाभ मिलता है।

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

जिन स्त्रियों में स्तन का विकास ढंग से नहीं हो पाता, उनके स्तन विकास के लिए उपरोक्त दवा (सैबेलसैरुलाटा) अत्यंत उपयोगी है। साथ ही ऐसी स्त्रियों को जैतून के तेल से सुबह शाम स्तन-गोलाई में मालिश भी करनी चाहिए।
लाइकोपोडियम : किसी शीशी में पेशाब को भर कर रखने से तली में रेत के लाल कण जम जाएं और पेशाब बिलकुल साफ रंग का रहे, यह इस दवा का मुख्य लक्षण है। ये लाल कण लिथिक एसिड के होते हैं जिसे यूरिक एसिड भी कहते हैं। यदि रेत कणों को शुरू में ही बाहर न निकाल दिया जाए, तो ये घनीभूत होकर गुर्दे में ही पथरी बन जाते हैं। लाइकोपोडियम 30 शक्ति की 4-6 गोलियां सुबह-शाम चूसनी चाहिए। यह गुर्दे के दर्द की भी दवा है, बशर्ते दर्द दाहिनी तरफ होता हो। पेशाब होने से पहले कमर में दर्द होना और पेशाब धीरे-धीरे होना भी लाइकोपोडियम के लक्षण हैं। कुछ दिन बाद इस की 200 शक्ति की 4 – 6 गोलियों की एक खुराक ले लेने से मूत्र पथरी बनने की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है।

प्रोस्टेट वृद्धि से मूत्र समस्या का 100% अचूक ईलाज 

केप्सिकम : पेशाब करते समय जलन रहती है। जैसी जलन लाल मिर्च खाने से होती है, वैसी ही भयंकर जलन रोगी महसूस करता है। पाखाना करते समय भी ऐसी ही जलन रहती है। खांसी होने पर, खांसते समय रोगी के सिर में भयंकर दर्द उठता है, धसक-सी लगती है। 30 शक्ति में, दिन में 3 बार 7 दिन तक खानी चाहिए।
सारसापेरिला : पेशाब के समय असह्य कष्ट होना, गर्म चीजों के सेवन से कष्ट बढ़ना, बैठक पेशाब करने में तकलीफ के साथ-साथ बूंद-बूंद करके पेशाब उतरना, खड़े होकर करने पर पेशाब आसानी से होना, पेशाब में सफेद पदार्थ का निकलना और पेशाब का मटमैला होने की स्थिति में 6 शक्ति में लें।
केंथेरिस : मूत्र-मार्ग का संक्रमण, बार-बार पेशाब जाना, असंयम, पेशाब रोक पाने में असमर्थ, पेशाब रोकने पर दर्द, बूंद-बूंद करके पेशाब होना, पेशाब से पहले एवं पेशाब के बाद में जलन रहना, हर वक्त पेशाब की इच्छा, जेलीयुक्त पेशाब आदि लक्षण मिलने पर दवा 30 शक्ति में प्रयोग करनी चाहिए।

पित्त पथरी (gallstone)  की अचूक औषधि 

नाइट्रिक एसिड : थोड़ा पेशाब होना, घोड़े के बदबूदार पेशाब जैसी दुर्गंध, जलन, चुभन पेशाब में खून एवं सफेद पदार्थ (एल्ब्युमिन) आना, ठंडा पेशाब, साथ ही किसी चौपहिया गाड़ी में चलने पर सारी परेशानियां दूर हो जाती हैं, तो 30 शक्ति में औषधि का सेवन करना चाहिए।
यूकेलिप्टस : गुर्दो का संक्रमण, इन्फ्लूएंजा, पेशाब में रक्त, पेशाब में मवाद आता है, किंतु जांच कराने पर यूरिया कम मात्रा में मिलता है। पेशाब की थैली (ब्लैडर) में ऐसा अहसास होता है कि पक्षाघात हो गया है, पेशाब निकालने की ताकत चुक चुकी है। यूरेथरा (मूत्रमार्ग) में संकुचन आ जाना, मूत्र-मार्ग में घातक जीवाणु संक्रमण, जिसके कारण कोशिका व ऊतकक्षय होने लगता है,पेशाब की बार-बार हाजत आदि लक्षण मिलने पर 10-20 बूंद मूल अर्क लाभ मिलने तक दिन में दो-तीन बार लेते रहना चाहिए।

रोग व क्‍लेश दूर करने के आसान मंत्र

इक्विजिटम : ब्लैडर (पेशाब की थैली) में हर वक्त हलका दर्द एवं भारीपन, ऐसा अहसास जैसे थैली भरी हुई है, किंतु पेशाब करने के बाद भी राहत न मिलना, बार-बार पेशाब की हाजत, साथ ही अत्यधिक दर्द होना, बूंद-बूंद कर पेशाब होना, तीक्ष्ण जलन, कटने जैसा दर्द महसूस होना, पेशाब रोक पाना असम्भव, बच्चों द्वारा रात्रि में बिस्तर में ही पेशाब कर देना, बूढ़ी औरतों में भी यही बीमारी रहती है। पेशाब में म्यूकस स्राव (चिकनाहट) गर्भावस्था के दौरान एवं बच्चा पैदा होने के बाद स्त्रियों में पेशाब होने में दिक्कत होना व दर्द होना आदि लक्षण मिलने पर मूल अर्क कुनकुने पानी में सेवन करने पर अत्यधिक लाभ मिलता है।
टेरेबिंथ : पेशाब में रक्त, रुक-रुक कर जलन के साथ पेशाब होना, गुर्दो का संक्रमण, पीठ दर्द, मूत्र-मार्ग में स्थायी जलन एवं दर्द, पेशाब में बनकशा पुष्पों (बैंगनी पुष्प) की गंध आदि लक्षण मिलने पर 6 × शक्ति में सेवन करना लाभप्रद रहता है।
किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि 

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार