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साँप और बिच्छू के जहर उतारने के मंत्र// Mantra for snake and scorpion poisoning




ॐ नमो आदेश गुरु का,काला बिच्छू कंकरीयाला,

सोना का डंक ,रुपे का भाला,उतरे तो उतारूँ,

चढ़े तो मारूं।नीलकंठ मोर ,गरुड़ का आयेगा,

मोर खायेगा तोड़ ,जा रे बिच्छू डंक छोड़,

मेरी भक्ति ,गुरु की शक्ति फुरो मन्त्र ,ईश्वरो वाचा।

इस मन्त्र का १०८ झाडा नीम की डाल का लगाना है। और मन्त्र को पढ़ना हैं, चाहे कितना भी विषैला बिच्छु हो जहर उतर जायेगा. पर ध्यान रहे इस मन्त्र को सिद्ध करने की जरुरत पड़ती है,


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 

सर्प विश उतारने का मंत्र 

ॐ नमो पर्वताग्रे रथो आंती,

विटबड़ा कोटि तन्य बीरडर पंचनशपनं

पुरमुरी अंसडी तनय तक्षक नागिनी आण,रुद्रिणी आण,

गरुड़ की आण। शेषनाग की आण,

विष उड़नति,फुरु फुरु फुरु ॐ डाकू रडती,

भरडा भरडती विष तू दंती उदकान

    यह मन्त्र २१ या १०८ बार पानी या काली मिर्च पर अभिमंत्रित करके देना. काली मिर्च चबाने को कहना, रोगी को पानी पिलाना तथा पानी मुह पर छोड़ना तो कैसा भी विष हो फ़ौरन उतर जायेगा. यह मंत्र नागपंचमी के दिन सिद्ध किया जाता है, उस इन साधक उपवास रखे, खीर शक्कर और घी से युक्त मिठाई बनाकर नागमुर्ती के आगे भोग लगावें और उस दिन आनंद के साथ भोजन करें. नाग देवता की स्तुति करें, ऐसा करने से मंत्र सिद्ध हो जाता हैं

मंत्र सिद्धि कैसे की जाती है?

मंत्र को सिद्ध करने के दो उपाय है – जात सूतक निवृत्ति और मृत सूतक निवृत्ति।

1. जात सूतक निवृत्ति : इसके लिए जप के प्रारंभ से एक सौ आठ बार ॐ कार से पुटित करके इष्ट मंत्र का जप करना चाहिए।

2. मृत सूतक निवृत्ति : इसके लिए भूत लिपि विधान करे।

नियम :

1. इस प्रकार नित्य एक हजार जप एक महीने तक करने से ही मंत्र जागरित होता है।

2. पूर्व में तीन प्राणायाम और अंत में भी तीन प्राणायाम करने चाहिए।

3. प्राणायाम का नियम यह है की चार मंत्र से पूरक, सोलह मंत्र से कुंभक और आठ मंत्र से रेचक करना चाहिए।

4. जप पूरा होने पर मानसिक रूप से उसे इष्ट देवता के दाहिने हाथ में समर्पित कर लेना चाहिए। यदि देवी इष्ट स्वरुप हो तो उसके बाएं हाथ में समर्पित करना चाहिए।

5. प्रतिदिन अनुष्ठान के अंत में जप का दंशांश हवन, हवन का दंशांश तर्पण, तर्पण का दंशांश अभिषेक और यथाशक्ति ब्राह्मण भोजन करना चाहिए।

 
6. यदि नियम संख्या पांच का पालन किसी वजह से संभव न हो सके तो जितना होम हुआ है, उससे चौगुना जप ब्राह्मणों को, छः गुना क्षत्रियों को तथा आठ गुना वैश्य को करना चाहिए।

7. अनुष्ठान के 5 अंग : जप, होम, तर्पण, अभिषेक और ब्राह्मण भोजन।

यदि होम तर्पण अभिषेक न हो तो ब्राह्मण या गुरु के आशीर्वाद मात्र से भी ये कार्य सम्पन्न माने जा सकते है।

8. स्त्रियों को होम-तर्पण आदि की आवश्यकता नहीं है। केवल मात्र से ही उन्हें सफलता मिल जाती है।