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सांस फूलने के आयुर्वेदिक उपचार,



    

अक्‍सर ऐसा होता है कि बिना किसी बीमारी के भी काम करते हुए सांस फूलने लगती है या सीढ़ियां चढ़ने से सांस फूल जाती है। कई लोग सोचते हैं कि मोटे लोगों की सांस जल्दी फूलती है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई बार पतले लोगों की सांस भी थोड़ा चलने पर ही फूलने लगती है। दिल्ली जैसे शहर में जहां हर तरह का प्रदूषण है, सांस फूलने की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है।फेफड़ों से संबंधित प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों के कारण भी सांस की समस्या होती है। वहीं फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण होते हैं।
सांस फूलना या सांस ठीक से न ले पाना
सांस फूलना या सांस ठीक से न ले पाना एलर्जी, संक्रमण, सूजन, चोट या मेटाबोलिक स्थितियों की वजह से हो सकता है। अकसर सांस तब फूलती है जब मस्तिष्क के संकेत फेफड़ों को सांस की रफ्तार बढ़ाने का निर्देश देते हैं। फेफड़ों से संबंधित प्रणाली को प्रभावित करने वाली स्थितियों के कारण भी सांस की समस्या होती है। वहीं फेफड़ों और ब्रोंकाइल ट्यूब्स में सूजन होना सांस फूलने के आम कारण होते हैं। इसी तरह सिगरेट पीने या अन्य टॉक्सिंस के कारण श्वसन क्षेत्र (रेस्पिरेट्री ट्रैक) में लगी चोट की वजह से भी सांस लेने में दिक्कत पैदा हो सकती है। वहीं दिल की बीमारियों या खून में ऑक्सीजन का स्तर कम होने के कारण भी सांस फूलती है।
तुलसी का रस
बेहद गुणकारी तुलसी सांस फूलने की समस्या में भी बेहद लाभदायक होती है। तुलसी का रस और शहद चाटने से अस्‍थमा रोगियों को व सांस फूलने की समस्या वाले लोगों को आराम मिलता है। इससे सांस की बंद नलियां तुरंत ही खुल जाती हैं।
शहद
शहद एक बेहद आम घरेलू उपचार है, जो अस्‍थमा के इलाज के लिये भी प्रयोग किया जाता है। अस्‍थमा अटैक आने पर शहद वाले पानी से भाप लेने से पर जल्द ही समस्या से राहत मिलती है। इसके अलावा दिन में तीन बार एक ग्‍लास पानी के साथ शहद मिला कर पीने से बीमारी भ ी आराम मिलता है। शहद बलगम को भी ठीक करता है, जो अस्‍थमा व सांस की परेशानी पैदा करता है।

कॉफी है लाभदायक 
अगर आपको अस्थमा का अटैक आया है तो आप तुरंत गरम कॉफी पी सकते हैं। यह श्वांस नलिकाओं में रूकी हुई हवा को तुरंत ही खोल देगी। अगर कॉफी नहीं पी सकते तो कॉफी की महक सूंघने से भी लाभ होता है।
गरम जगह में जाएं
ठंडी जगह में सांस फूले तो गरम जगह पर चले जाएं, जहां पर ऐसी या कूलर न हो। इसके अलावा अगर गरम शॉवर ले सकते हैं तो भी आपको राहत मिलती है। साथ ही जब भी आपकी सांस फूलने लगे तो भींड भाड़ और धूल भरी जगह छोड़ दें और किसी खुली जगह पर चले जाएं।
यूकेलिप्‍टस तेल
यदि सांस फूलने की समस्या है को घर में यूकेलिप्‍टस का तेल जरूर रखें। जब कभी सांस फूले तो यूकेलिप्‍टस का तेल सूंघ लें, इसको सूंघने से आपको तुरंत फायदा होगा और समस्या धीरे-धीरे ठीक होने लगेगी। अम्ल बनाने वाले पदार्थ न लें
सांस फूलने की समस्या होने पर आहार में कार्बोहाइड्रेट चिकनाई एवं प्रोटीन जैसे एसिड बनाने वाले पदार्थ सीमित मात्रा में लें और ताज़े फल, हरी सब्जियां तथा अंकुरित चने जैसे क्षारीय खाद्य पदार्थों का भरपूर मात्रा में सेवन करें।
दमा होता है बड़ा कारण
श्वास नलिकाएं फेफड़े से हवा को अंदर व बाहर करती हैं। दमा होने पर इन नलिकाओं के अंदर की दीवार में सूजन हो जाती है। यह सूजन नलिकाओं को बेहद संवेदनशील बना देता है और किसी भी संवेदनशील चीज के स्पर्श से यह तीखी प्रतिक्रिया करता है। जब नलिकाएं प्रतिक्रिया करती हैं, तो उनमें संकुचन होता है और फेफड़े में हवा की कम मात्रा जाती है और सांस फूलने लगती है।
बदलता मौसम भी है कारण
एलर्जी से होने वाले अस्थमा (दमा) की वजह से भी सांस फूल जाती है। यह स्थिति जीवन के लिए खतरा भी बन सकती है। बदलता मौसम इसे और बढ़ाता है। फरीदाबाद के सर्वोदय अस्पताल और रिसर्च सेंटर के रेस्पिरेट्री के विभागाध्यक्ष डॉ. दानिश जमाल के अनुसार, ‘वसंत की गुनगुनी धूप की जगह गर्म हवाएं चलने लगी हैं। अधिकांश मरीज मौसमी दमे के शिकार हो जाते हैं। जो इसके मरीज हैं उन्हें इसके अटैक पड़ने लगते हैं। दिल्ली जैसे महानगर में तनाव भी इसकी बड़ी वजह है।’



फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए करें ये उपाय

    

   फेफड़े हमारे शरीर के बेहद महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। क्योंकि जीवित रहने के लिए सांस लेना जरूरी है और सांस लेने के लिए स्वस्थ फेफड़े होना आवश्यक है। यदि अपने फेफड़ों की सही देखभाल करें तो ये जीवन भर हमारा बेहतर साथ दे सकते हैं। अगर फेफड़ों पर बाहर से किसी प्रकार का हमला न हो तो वे काफी टिकाऊ बने रहते हैं। यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हमारे फेफड़े तब तक स्वस्थ रहते हैं जब तक हम खुद किसी तरह धूम्रपान आदि से इन्हें मुसीबत में न डालें। ऐसे कुछ तरीके हैं जिनकी मदद से हम अपने फेफड़ों को हमेशा स्वस्थ रख सकते हैं। क्यों हैं गंभीर विषय विश्व भर में सैकड़ों लाखों लोग हर साल फेफड़े संबंधी रोग जैसे टीबी, अस्थमा, निमोनिया, इन्फ्लुएंजा, फेफड़े का कैंसर और फेफड़े संबंधी कुछ अन्य दीर्घ प्रतिरोधी विकारों से पीडि़त हैं। और दुखद है कि इनके कारण लगभग 1 करोड़ लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं। फेफड़ों के रोग हर देश व सामाजिक समूह के लोगों को प्रभावित करते हैं, लेकिन खासतौर पर गरीब, बूढे़ और कमजोर व्यक्तियों पर ये जल्दी असर डालते हैं। फेफड़ों में फैलने वाले इन संक्रमणों के बारे में लोगों के बीच जानकारी का काफी अभाव है।


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प्रदूषित वातावरण-
घर के भीतर का प्रदूषण जैसे- लकड़ी, कंडे या कोयले को जला कर खाना पकाना, धूम्रपान, तंबाकू आदि का सेवन ऐसे कई कारणों से फेफड़े संबंधी रोगियों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है। लेकिन यदि उचित जीवन शैली और धूम्रपान मुक्त वातावरण बनाया जाए तो फेफड़े संबंधी संक्रमणों को काफी हद तक कम किया जाना संभव है।
ब्रीदिंग एक्सरसाइज जरूर करें
ब्रीदिंग एक्सरसाइज करने से फेफड़ों को मजबूत बनाया जा सकता है और उनसे ज्यादा काम लिया जा सकता है। साथ ही आपका हृदय स्वास्थ्य जितना अच्छा होगा आपके फेफड़ों को हृदय और मासपेशियों को ऑक्सीजन देने के लिए ब्रीदिंग एक्सरसाइज ठीक रहती है।
धूम्रपान न करें -


  धूम्रपान करना फेफड़ों को सबसे ज्यादा हानि पहुंचाता है। बात जब धूम्रपान की आती है तो इसकी कोई सुरक्षित दहलीज नहीं है। कोई जितना अधिक धूम्रपान करेगा, फेफड़ो का कैंसर और सीओपीडी जिसके अंदर दीर्घकालिक फेफड़ों का सूजन और एफिसेमा आता है, होने का खतरा उतना ही अधिक होगा। लेकिन केवल सिगरेट बंद कर देना काफी नहीं है, मारिजुआना पाइप या सिगार भी फेफड़ों के लिए उतना ही घातक होते हैं। पानी-फेफड़ों की सेहत को दुरुस्त बनाए रखने के लिए पानी बेहद जरूरी होता है। पानी से फेफड़े हाइड्रेट, गीले बने रहते हैं और फेफड़ों की गंदगी इसी गीलेपन की वजह से बाहर निकल पाती है और फेफड़े सेहतमंद बने रहते हैं। इसलिए गर्मी हो या ठंड पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहना चाहिए।
घर को स्वच्छ रखें-वायु प्रदूषण सिर्फ बाहर होने वाली समस्या नहीं है। घर में भी कई चीजें हैं जैसे लकड़ी से जलने वाले स्टोव, अंगीठी, मोल्ड, मोमबत्तियां और एयर फ्रेशनर भी वायु प्रदूषण का कारण बन सकते हैं। इसलिए, यहां पर तीन तरह के उपाय जरूरी हैं, पहला स्रोत को हटाना, दूसरा वेंटिलेशन को बढ़ाना और तीसरा वायु को स्वच्छ रखने का बंदोबस्त करना।
पौष्टिक भोजन करें-
वे खाद्य पदार्थ जिसमें एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं फेफड़ों के लिए बेहद फायदेमंद होता है। जो लोग फूलगोभी, ब्रोकली, बंदगोभी खाते हैं उनमें फेफड़ो का कैंसर होने की आशंका ये चीजें न खाने वाले लोगों की तुलना में काफी कम होती है।
काम करते समय सावधानी–
कई काम जैसे निर्माण, बालों की स्टाइलिंग व जस्टिंग आदि में गंदगी भीतर जाने की वजह से फेफड़ों पर खतरा होता है। तो ऐसा कोई भी काम करते समय अपने मुंह और नाक को ठीक तरह से ढक कर ही काम करें।
मौसम के अनुरूप देखभाल-उमस भरे या बहुत ठंडे मौसम में फेफड़ों को स्वस्थ रखने या उससे संबंधित परेशानी से राहत पाने के लिए खूब पानी पिएं। फेफड़ों से संबंधित किसी तरह की परेशानी हो तो बहुत खट्टी या ठंडी चीजें न खाएं। इसके सेवन से फेफड़ों में सूजन की आशंका रहती है। शरीर को एकदम सर्दी से गर्मी या गर्मी से सर्दी में ले जाने से भी बचें।
वायु प्रदूषण से बचें-
ज्यादातर गर्मी के महीने में कुछ जगहों में ओजोन और दूसरे प्रदूषक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। फेफड़ों की समस्या से जूझ रहे लोग ज्यादातर वायु प्रदूषण से संवेदनशील होते हैं। इसलिए बाहर जाएं तो मेडिकेटिड मास्क का उपयोग करें और शरीर को समय -समय पर डिटॉक्सिफाई करते रहें।
फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए उपयोगी जड़ी बूटियां – फेफड़ों का काम वातावरण से ऑक्सीजन लेना है. कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण में वापिस छोड़ना है. साथ ही यह शुद्ध रक्त धमनी द्वारा दिल में पहुंचता है. जहां से यह फिर से शरीर के विभिन्न अवयवों में पम्प किया जाता है. यही कारण है कि फेफड़ों का स्वस्थ रहना जरूरी है. बहुत से हर्ब्स ऐसे है जिनके सेवन से फेफड़ों को स्वस्थ रखा जा सकता हैं.
तुलसी
तुलसी के सूखे पत्‍ते, कत्‍था, कपूर और इलायची समान मात्रा में ले ल‍ीजिए। इसमें नौ गुना चीनी मिलाकर बराबर मात्रा में पीस लें। इस मिश्रण की चुटकी भर मात्रा दिन में दो बार खायें। इससे फेफड़ों में जमा कफ निकल जाता है।
एचिनासा Echinacea
एचिनासा एक एंटी माइक्रोबियल हर्ब है। जो रोगों से लड़ने के लिए जाना जाता है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है। एचिनासा सफेद रक्त कोशिका के उत्पादन द्वारा काम करता है।
शहतूत के पत्‍ते


शहतूत के पत्‍ते चबाने से फेफड़ों के रोग, फेफड़ों की जलन, सिरदर्द और खांसी आदि दूर होती है।
मेंहदी
एचिनासा की तरह मेंहदी में भी एंटी माइक्रोबियल हर्ब होते हैं। इसमें मौजूद शक्तिशाली तेल में एंटीसेप्टिक, एंटीबैक्‍टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं। हर्बल चिकित्सक जुकाम, गले में खराश, फ्लू, खांसी, ब्रोंकाइटिस और छाती में संक्रमण को समाप्त करने के लिए मेंहदी का इस्तेमाल करते हैं।
अंजीर
फेफड़े की परेशानियों को दूर करने में अंजीर काफी मदद करती है। 5 अंजीर को एक गिलास पानी में उबाल लीजिये। दिन में दो बार इसका सेवन करने से फेफड़ों की गंदगी साफ होती है और उन्‍हें शक्ति मिलती है।
लहसुन
लहसुन को कफनाशक समझा जाता है। भोजन के बाद लहसुन का सेवन करने से छाती साफ रहती है और कई रोगों से रक्षा होती है।
मुनक्‍का
मुनक्‍का के ताजे और साफ 15 दाने रात में 150 मिलीलिटर पानी में भिगो दें। सुबह बीज निकालकर फेंक दें। गूदे को खूब अच्‍छी तरह चबा-चबाकर खायें। बचे हुए पानी को पी लें। एक महीने तक इसका सेवन करने से फेफड़े मजबूत होते हैं।
शहद
रोजाना सुबह एक चम्‍मच शहद का सेवन करें। एक दो महीने तक इसका सेवन करने से फेफड़ों के रोग दूर होते हैं और फेफड़े मजबूत बनते हैं।
अंगूर
अंगूर फेफड़े के सभी प्रकार के रोगों को दूर रखता है। खांसी और दमे जैसी बीमारियों में अंगूर कासेवन बहुत फायदा पहुंचाता है। हां अगर आपको डायबिटीज है तो इसका अधिक सेवन न करें।


मुलहठी
खांसी और खराश में मुलहठी के फायदे आप जानते ही हैं। यह फेफड़ों के लिए बहुत लाभदायक होती है। पान में डालकर मुलहठी का सेवन करने से कफ नाश होता है।
कैसे होता है फेंफड़ा खराब : फेंफड़े मुख्यत: धूम्रपान, तम्बाकू और वायु प्रदूषण के अलावा फंगस, ठंडी हवा, भोजन में कुछ पदार्थ, ठंडे पेय, धुएँ, मानसिक तनाव, इत्र और रजोनिवृत्ति जैसे अनेक कारणों से फेंफड़ा.
एक्ट्रा एफर्ट : इसके बाद यदि आप करना चाहें तो ब्रह्ममुद्रा 10 बार, कन्धसंचालन 10 बार (सीधे-उल्टे), मार्जगसन 10 बार, शशकासन 2 बार (10 श्वास-प्रश्वास के लिए), वक्रासन 10 श्वास के लिए, भुजंगासन 3 बार(10 श्वास के लिए), धनुरासन 2 बार (10 श्वास-प्रश्वास के लिए), पाश्चात्य प्राणायाम (10 बार गहरी श्वास के साथ), उत्तानपादासन 2 बार, 10 सामान्य श्वास के लिए, शवासन 5 मिनट, नाड़ीसांधन प्राणायाम 10-10 बार एक. स्वर से, कपालभाति 50 बार, भस्त्रिका कुम्भक 10 बार, जल्दी-जल्दी श्वास-प्रश्वास के बाद कुम्भक यथाशक्ति 3 बार दोहराना था।

सावधानी-
 सभी प्राणायाम, बंध या आसन का अभ्यास स्वच्छ व हवायुक्त स्थान पर करना. करना चाहिए। पेट, फेंफड़े, गुदा और गले में किसी भी प्रकार का गंभीर रोग हो तो योग चिकित्सक की सलाह लें।

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