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उच्च रक्तचाप को जड़ से खत्म करने के आयुर्वेदिक उपाय




    हाइपरटेन्षन (hypertension) या उच्च रक्तचाप आज के समय के घातक रोगों में से एक है. इसे आयुर्वेद में ‘रक्त गति वात’ भी कहा जाता है. रक्तचाप की दर व्यक्ति की आयु, शारीरिक एवं मानसिक कार्यशीलता, परिवारिक पृष्ठभूमि तथा उसके खानपान पर निर्भर करती है. एक स्वस्थ मनुष्य में रक्तचाप की दर 80 मि.मी. डाइयासटोलिक (diastolic) और 120 मि.मी. सिसटोलिक (systolic) होती है.

उच्च रक्तचाप के कारण-

अनुचित खानपान, अत्यंत गरिष्ठ भोजन का सेवन तथा शारीरिक व्यायाम की कमी उच्च रक्तचाप के प्रमुख कारण हैं. फास्ट फूड, फसलों के उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रयोग किए जाने वाले कीटनाशक, प्रिज़र्वेटिव्स, इन सब कारणों से शरीर में जीवविष (toxins) प्रविष्ट होते हैं जो कि पाचन क्रिया पर प्रादुर्भाव डालते है. पाचन क्रिया के मंद पड़ने से भोजन से आम (acidic toxin) उत्पन्न होता है जो रक्त में प्लास्मा से संयुक्त होकर साम (Blood+Toxin) का निर्माण कर देता है. ‘साम’ सामान्य रक्त से अधिक घनिष्ट और भारी होता है जिस कारण ये रक्तवाहिनियों के कमज़ोर हिस्सों में जाकर जम जाता है. इस कारण रक्त धमनियों की चौड़ाई कम हो जाती है और रक्त को स्रोतों (channels- arteries) में वहन करने में अवरोध आता है और इस कारण धमनियों में अधिक दबाव या ‘ब्लड प्रेशर’ का निर्माण हो जाता है. मॉडर्न मेडिकल साइंस अब इस बात को स्वीकार रहा की रक्तचाप और हृदय संबंधी बीमारियों का कारण है चीनी और वेजिटेबल आयिल्स के उपयोग से उत्पन्न धमनियों में जलन और शुष्कता. यह जड़ है इस बीमारी की.
मानसिक तनाव, चिंताग्रस्त रहने से, अधिक सोचने से भी रक्तचाप की दर सामन्य से बढ़ जाती है. बहुत अधिक तला हुआ गरिष्ठ भोजन खाना, चाय-कॉफी का अधिक सेवन, प्रोसेस्ड फूड भी रक्तचाप को बढ़ाने के कारण हैं.

उच्च रक्तचाप के लक्षण -

उच्च रक्तचाप को Silent Killer भी कहा जाता है. इस रोग के लक्षणों की सही पहचान करना अत्यंत आवश्यक है और इसका उपचार आयुर्वेद द्वारा संभव है. गर्दन के पीछे के हिस्से में दर्द (occipital headache), घबराहट और कंपकपी महसूस होना, चक्कर आना और बिना काम किए थकान का रहना, उच्च रक्तचाप के प्रमुख लक्षण है.
आयुर्वेद अनुसार इस रोग की चिकित्सा में प्रमुख कारण का निवारण करना आवश्यक है. उच्च रक्तचाप तीनों दोषों की विकृति, हृदय तथा रक्त धमनियाँ में उत्पन्न विकार से होता है. रक्त धमनियों में वयान वायु की गड़बड़ी के लक्षण पाए जाते हैं. इसलिए उपचार में इन सब लक्षणों पर ध्यान दिया जाना चाहिए.
उपचार विधि -
आयुर्वेद अनुसार इस रोग की चिकित्सा में प्रमुख कारण का निवारण करना आवश्यक है. उच्च रक्तचाप तीन दोषों की विकृति, हृदय तथा रक्त धमनियाँ सबको प्रभावित करता है. रक्त धमनियों में वयान वायु की गड़बड़ी के लक्षण पाए जाते हैं. पित्त की विकृति भी इस रोग का प्रमुख कारण है. पित्त और वात प्रकृति के व्यक्ति जिनमें इन दोषों के विकृत होने की संभावना बनती है, उन लोगों में उच्च रक्तचाप होने की संभावना दूसरों से अधिक होती है. इस रोग के समूल नाश के लिए चिकित्सक सर्वप्रथम पाचन क्रिया को सुगठित करने की औषधि देते हैं. साथ ही साथ पूर्व में बढ़े हुए जीव विष (toxins) को शरीर से निकालना भी आवश्यक हैंं. मानसिक तनाव को घटाने के लिए, ध्यान, प्राणायाम को करना भी चिकित्सा का अंग है|

जीवनशैली और खानपान संबंधित सुझाव-

माँस, अंडे, नमक, अचार, चाय, कॉफी का प्रयोग निम्न मात्रा में करना चाहिए.
धूम्रपान और शराब का सेवन नही करना चाहिए.
प्रोटीन और वसा युक्त भोजन का सेवन कम-से-कम रखना और सब्जी, फल आदि की मात्रा भोजन में बढ़ाना हितकर है.
लहसुन, अमला, नींबू, चकोतरा, मौसमी, तरबूज़, बिना मलाई का दूध, और कॉटेज चीज़ का प्रयोग करने से रोगी को लाभ मिलता है. भोजन हल्का और सुपाच्य होना चाहिए.
vishकिसी एक विशिष्ट पद्धति द्वारा किए जाने वाला व्यायाम, जैसे कि जॉगिंग (jogging), तैरना या फुर्ती से की गयी नियमित सैर (brisk walking) को भी दिनचर्या में शामिल करना चाहिए.
अगर संभव हो तो किसी समझदार योग सलाहकार द्वारा सीख कर अधोमुखश्वानसन, उत्तानसन, पश्चिमोत्तासन, हलासन, सेतु-बँध सर्वंगासन, इन सबका अभ्यास करने से विशेष लाभ होता है.

उच्च रक्त चाप मे लाभदायक घरेलू औषधियाँ -

3 से 4 लहसुन लौंग, 10-12 तुलसी के पत्ते लेकर इनका रस निकाल लें और एक-चौथाई गिलास गेहूँ के जवारे के रस के साथ मिलकर रोज़ सेवन करें.
1 छोटे चम्मच प्याज़ के रस में बराबर मात्रा में शहद मिलकर एक हफ्ते तक सेवन करें. यदि लाभ मिले तो इस प्रयोग को कुछ और दिन तक जारी रखें.
लस्सी में एक छोटा चम्मच लहसुन का पेस्ट बनाकर दिन में दो बार लें.
10 ग्राम तरबूज के बीजों को भूनकर उन्हें पीस लें. इस पाउडर को 2 कप पानी में 10 से 15 मिनिट तक उबालें. प्राप्त मिक्स्चर को छान कर सेवन करें. यह प्रयोग रोज़ करें.
त्रिफला का रोज़ रात्रि में सेवन और एक चम्मच मेथी दाना रात को भिगो कर रखने के बाद प्रातः काल उसका सेवन करना चाहिए.

उच्च रक्तचाप में लाभकारी औषधियाँ -

सर्पगन्ध  एक ऐसी बूटी है जिसे सदियों से उच्च रक्तचाप के उपचार में प्रयोग किया गया है. रसगंधा नामक औषधि जिसमें शूतशेखर, जटामांसी और सर्पगन्ध प्रयोग होते हैं, इस व्याधि के निराकरण में अत्यंत उपयोगी है.

अर्जुन - 

शोध द्वारा ये नतीजे पाये गयें हैं कि यह अँग्रेज़ी चिकित्सा में प्रयोग होने वाली Beta-blocker दवाइयाँ की तरह ही अपना कार्य करती है. इसके साथ-साथ यह औषधि, जिगर तथा हृदय की रक्षाकारक भी है.

गोक्शूरा -: 

यह औषधि भी रोगनिवारक है तथा इसकी कार्यपद्धति ACE Inhibitors के समान है

पंचकर्म चिकित्सा द्वारा उच्च रक्तचाप का उपचार -

निरूह बस्ती चिकित्सा यदि किसी समझदार वैद्य द्वारा करवाई जाए तो इस रोग के उपचार में बहुत लाभ देती है. इसी प्रकार धारा चिकित्सा भी ज़िद्दी रोग के उपचार में लाभदायक है. दुग्ध तथा बाला द्वारा सिद्ध किए हुए तैल को रोगी के मस्तक पर डाल जाता है. इस विधि को चिकित्सक की देखरेख में किया जाना चाहिए और ये चमत्कारिक प्रभाव देती है.

दोष प्रधानता के अनुरूप रोग निवारण -

*यदि वात दोष के प्रादुर्भाव का कारण मुख्य रूप से रोग का कारण है तो चिंता, तनाव , अधिक सोचने, पढ़ने, लिखने से रोग में अभिवृद्धि पाई जाती है.
*इस अवस्था में रोग-निवारण हेतु रोगी के मनोरोग का उपचार प्रमुख रूप से किया जाता है.
वात उपचार: 125 मिलीग्राम सरपगंध और जटामंसी को 2.5 माह तक दिन में तीन बार लेना चाहिए.
*लहसुन का एक लौंग शहद के साथ रोज़ लेने से भी इसमें फायदा मिलता है.
*सारस्वत पाउडर भी इस रोग के उपचार में लाभदायक है.
*अश्वगंधा से बनी हुई औषधि मिश्रण का सेवन करना चाहिए.
*पित्त की विकृति द्वार उत्पन्न रोग में रोगी को अधिक क्रोध आता है, चिड़चिड़ापन, नकसीर फूटना, भयंकर सरदर्द, आँखों का चौधियाना,  आदि लक्षण मिलते हैं|
*पित्त को शांत करने वाले औषधियों का सेवन करने से इस अवस्था में राहत मिलती है. 250 मिलीग्राम ब्राहमी का सेवन रोज़ रात्रि मे करना चाहिए.
*इसके अलावा ब्राहमी रसायन या सारस्वत पाउडर का प्रयोग भी लाभप्रद है.
*सर्वा (Indian sarsaparilla) का 15 दिन तक सेवन भी पित्त को शांत करता है.
*कफ की प्रधानता से उत्पन्न होने वाले रोग में व्यक्ति को हल्का सरदर्द, आलस्य, प्रमाद, हाथ-पाँव का फूलना उच्च रक्तचाप के साथ पाए जाते हैं.
chitr*इस अवस्था में रोग के निराकरण के लिए 1 ग्राम गुग्गुलु अथवा अर्जुन का दिन में दो बार सेवन करना चाहिए.
250 ग्राम शिलाजीत दिन में तीन माह के लिए दिन में तीन बार लाभप्रद है.
*रक्त धमनियों को साफ़ करने के लिए 1 ग्राम त्रिफला गुग्गूल का 3 महीने के लिए उपयोग फ़ायदेमंद है.
इस अवस्था में यदि 100 मिलीग्राम इलायची और दालचीनी का प्रयोग दिन में 3 बार 3 महीने तक किया तो लाभदायक सिद्ध होता है.
मंत्र शक्ति मे विश्वास रखने वाले व्यक्ति  निम्न मंत्र के प्रयोग  से लाभान्वित हो सकते हैं-
प्रसन्‍न मंत्र का प्रयोग ब्‍लड प्रेशर को दूर करने के लिए किया जाता है. इस मंत्र को उत्तर की ओर मुख करके 7 दिन तक जाप करने से लाभ मिलता है.
मंत्र यह  है: -