चींटियाँ भगाने के घरेलू उपाय



 चींटी बहुत छोटी होती है लेकिन बहुत सारी एक साथ आकर परेशानी पैदा कर देती है। अक्सर मिठाई आदि मे चुपचाप घुसकर नुकसान कर देती है। हम खीजने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। रसोईघर में चींटी का हमला सामान्य सी बात है। शक्कर का डिब्बा चींटियों के लिए सबसे पसंदीदा स्थान होता है। कई बार तो रोटी के कटोरदान में भी चीटियां घुस जाती है। यहां तक की नमकीन का आनंद उठाने भी आ जाती है।
लाल चींटी और काली चींटी ये दो प्रकार की चींटी ज्यादा दिखती है। लाल चींटी छोटी होती है लेकिन काटती जोर का है। इसके काटने पर तेज जलन होती है। काली चींटी सीधी सादी अपने काम से काम रखने वाली होती है। ये कम ही काटती है। चींटियाँ हमारे घर में खुद के लिए एक छोटा सा घर बना लेती है। अक्सर लाइन बना कर अपने घर से निकल कर खाने के सामान तक पहुंचती है। इनकी लाइन का पीछा करते हुए इनके घर तक पहुंचा जा सकता है। चींटियों का रास्ता बना कर किसी चीज तक पहुंचने का तरीका आश्चर्य में डाल देता है।
चींटी हमारे लिए अच्छा काम भी करती है। यह हमें कई प्रकार के कीड़े मकोड़े से बचाती है।
चींटियाँ मकड़ी , खटमल , पिस्सू , मक्खी , सिल्वर फिश , मोथ आदि कीड़े मकोड़े के लार्वा को खा जाती है। ये कीड़े मकोड़े चींटी से ज्यादा नुकसान देह होते है। चींटी  इनको घर मे फैलने से रोकती है। इस तरह हमारी मदद करती है।
चींटियाँ एक दूसरे को संकेत व संदेशों का आदान प्रदान करती है। ये काम चींटियों उनके सिर पर मौजूद एंटीना की मदद से करती है। इसके अलावा फेरोमोन्स की मदद से चींटी रास्ता बनाती है और दूसरी चींटियों को रास्ता दिखती है। फेरोमोन्स एक प्रकार का केमिकल होता है जिसे कीट पतंगे व चीटियाँ उत्सर्जित करते है। इसके द्वारा वे उनकी प्रजाति को विशेष संदेश देने का काम करते है।
खाने पीने का सामान तलाश करने के लिए स्कॉउट चींटी घूमती रहती है। जब उसे कुछ मिलता है तो वह फेरोमोन्स से रास्ता बनाकर अपने साथियों को खाने तक पहुंचने का रास्ता दिखा देती है। दूसरी चींटियां भी उस रास्ते पर चलती हुई फेरोमोन्स से वो रास्ता मजबूत बनाती हुई चलती है। इस तरह से आसानी से दूर तक की मंजिल भी पा लेती है। जब खाना खत्म हो जाता है चींटी उस रास्ते पर चलना बंद कर देती है। इस रास्ते का फेरोमोन्स जल्द ही उड़ कर खत्म हो जाता है।



चींटी से बचने के उपाय


चींटियों से बचने का सबसे पहला उपाय उनके लिए खाने तक पहुंचने के रास्ते बंद करना है। यानी ऐसी चीजें जिनमे चींटी आ सकती है उन्हें एयर टाइट डिब्बे में रखना चाहिए। घर में साफ सफाई नियमित करनी चाहिए। विशेषकर रसोई में। मीठा थोड़ा भी इधर उधर गिरा हो तो तुरंत साफ कर देना चाहिए। वो सभी छोटी जगह जहां से चींटी का आवागमन सुलभ हो बंद कर देने चाहिए।

स्कॉउट चींटी घूमती हुई नजर आए तो सतर्क हो जाएँ। ये खाना ढूंढ़कर अपनी कॉलोनी को बताती है। अतः इससे पहले कि पूरा कुनबा दावत उड़ाने आ जाए चींटी को ललचाने वाला सामान बिखरा है तो साफ कर दें। ऐसे सामान को अच्छे से डिब्बों में एयर टाइट बंद करके रखें।
चींटीयों को दूर करने के उपाय इस प्रकार है :–

सिरका – Vinegar

सफेद सिरका और पानी बराबर मात्रा में मिलाकर चींटी के आने जाने वाले रास्ते पर स्प्रे कर दें या इस पानी से उनके रास्ते पर पोंछा लगा दें।
इससे फेरोमोन्स साफ हो जाएँगे और चींटी रास्ता भटक जाएगी। खाने तक नहीं पहुंच पाएगी।
लाल चींटी ने बनाए छोटे से छेद में सिरके में थोड़ा बैकिंग सोडा मिलाकर डाल दें। ये काम कुछ दिन के बाद फिर कर दें। चीटियों से मुक्ति मिल जाएगी। 



नींबू – Lemon


नींबू की खुशबू जितनी हमे पसंद है उतनी ही चींटी को नापसंद है। नीबू के छिलके या नीबू के पत्ते जहां भी होंगे चींटियाँ वहाँ से चली जाएंगी।
हम इसका फायदा उठा सकते है। जहां चीटियाँ हों वहाँ नींबू के छिलके डाल दें या नींबू के पत्ते तोड़कर डाल दें। चीटियाँ वहाँ से भाग जाएगी।
संतरे के छिलके और खीरे के छिलके भी चींटी भगा देते है।

पिपरमिंट का तेल – Peppermint Oil

घर में पोंछा लगने के बाद यदि पिपरमिंट के तेल की कुछ बूंद फर्श पर डालकर कपड़े से फैला दें तो चींटी दूर ही रहेगी। पिपरमिंट की गंध
चींटी को दूर रखने का काम करेगी।

तेजपत्ता – Bay Leaves

तेज पत्ता स्वाद व सुगंध के लिए दाल के तड़के में तो काम लेते ही है। ये चींटी को दूर रखने में भी काम आ सकता है। चींटी आने वाली जगह
तेज पत्ता के कुछ टुकड़े डाल दें , चीटियाँ नहीं आएँगी। इसे किचन के ड्रॉअर या कैबिनट आदि में भी रख सकते है।

लौंग – Clove

लौंग के फायदे और उपयोग तो आप बहुत से जानते होंगे। इसका एक और फायदा ये भी है कि इसे चीटियाँ दूर रखने में काम ले सकते है।



शक्कर के डिब्बे में दो तीन लौंग डालकर रखें। चीटियाँ 
शक्कर के डिब्बे तरफ देखेंगी भी नहीं।

कपूर – Camphor

कपूर पूजा में जलाने के लिए घर में पूजा वाले स्थान में रखते है। आपने देखा होगा पूजा वाली जगह चीटियां नहीं आती। इसका कारण कपूर होता है। कपूर की गंध चींटी को दूर रखती है। कपूर को जहाँ से चीटियाँ भगानी हो वहाँ रख देंगे तो चीटियां रवाना हो जाएंगी।

दालचीनी

एक और रसोई का मसाला चींटी को दूर रखने में काम आ सकता है वो है दालचीनी। दालचीनी का टुकड़ा जहाँ होगा वहाँ चीटियां नहीं आती।
जहां लगे Cheeti आ सकती है वहाँ दालचीनी का टुकड़ा रख दें। और असर देखें।

लहसुन

लहसुन के मामले में हमारी और चींटी की पसंद नापसंद मिलती है। हमारी तरह इसको भी लहसुन की गंध अच्छी नहीं लगती। चींटी के आने जाने वाले रास्ते पर लहसुन घिसने से या लहसुन का पावडर बुरकने से इससे मुक्ति मिल सकती है।




भुना हुआ लहसुन खाने के अनुपम फ़ायदे




भुना हुआ लहसुन खाने के अनुपम फ़ायदे
डाइजेस्टिव सिस्टम -
 अगर आपको भूख कम लगती हो तो लहसुन का सेवन करना आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। यह आपके डाइजेस्टिव सिस्टम को ठीक करता है जिससे आपकी भूख भी बढ़ा जाती है।
कॉलेस्ट्राल और ह्रदय - यह बढ़े हुए कॉलेस्ट्राल को कम करता है साथ ही ह्रदय के लिए फ़ायदेमंद है।
एसिडिटी - 
कभी-कभी आपके पेट में एसिड बनने लगता है, लेकिन इसका सेवन करने से यह पेट में एसिड बनने से रोकता है। जिससे आपको तनाव से भी निजात मिल जाता है।
मोटापा - रोजाना भुने हुए लहसुन का सेवन करने से हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ जाता है। जिससे बहुत ही जल्दी आपका फैट बर्न हो जाता है।
ब्लड प्रेशर - 
 भुने लहसुन खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है
कैंसर -
भुने हुए लहसुन खाने से शरीर के अंदर उत्पन्न होने वाले कैंसर की कोशिकाएं खत्म हो जाती है।
भुने लहसुन खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है
विषैले पदार्थ -
शरीर में मौजूद विषैले पदार्थों को मल या मूत्र मार्ग से बाहर करता है
हड्डियां मज़बूत करे -
शरीर की हड्डियां मजबुत होती है।
श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्या - 
लहसुन आपकी श्वसन तंत्र के लिए काफी फायदेमंद है। इसका सेवन करने से अस्थमा, निमोनिया, ज़ुकाम, ब्रोंकाइटिस, पुरानी सर्दी, फेफड़ों में जमाव और कफ आदि से निजात और बचाव होता है।
एनर्जी बढ़ाए -
शरीर में खास प्रकार की एनर्जी आती है। जिसके आपके अंदर का आलस्य खत्म हो जाता है।
संक्रमण को खत्म करे - 
भुने हुए लहसुन खाने के 6 घंटे के बाद हमारे रक्त में मौजूद संक्रमण को खत्म करने का काम करता है।


किडनी फेल (गुर्दे खराब ) की   रामबाण   औषधि



शरीर मे सर से लेकर पाँव तक कोई भी नस खोलने का रामबाण नुस्खा




आवश्यक सामग्री 
10 gm काली मिर्च साबुत
10gm तेज पत्ता
1gm दाल चीनी
10 gm अखरोट गिरी
10gm अलसी
10gm मगज
10 gm मिश्री डला
सभी सामाग्री का वजन 61 ग्राम 

बनाने का तरीका :
    सभी को मिक्सी में पीस कर पाउडर बना ले और ६ ग्राम की 10 पुड़िया बना लीजिये |
एक पुड़िया हर रोज सुबह खाली पेट मामूली गरम पानी से लेनी है और एक घंटे तक कुछ भी नही खाना है ,हाँ चाय पी सकते हैं| ऐड़ी से ले कर चोटी तक की कोई भी नस बन्द हो खुल जाएगी |

    हृदय रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद है|गारंटीड।लंबे समय तक लेते रहने से हार्ट पेशेंट को लकवा या हार्ट अटेक नही आयेगा|
 

आर्थराइटिस(संधिवात)के  अचूक   
हर्बल औषधि

ब्रायोनिया औषधि के उपयोग


व्यापक-लक्षण व प्रकृति
लक्षणों में कमी
जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति, धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की जोरों से और एकाएक होती है।
दर्द वाली जगह को दबाने से रोग में कमी होना
हरकत से रोगी की वृद्धि और विश्राम से रोग में कमी
ठडी हवा से आराम
जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी में)
आराम से रोग में कमी
श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना
गठिये में सूजन पर गर्म सेक से और हरकत से रोगी को आराम मिलना
रजोधर्म बन्द होने पर नाक या मुँह से खून गिरना या ऐसा होने से सिर-दर्द होना
लक्षणों में वृद्धि
सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाना
हरकत से रोग बढ़ जाना
क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग
खाने के बाद रोग में वृद्धि
गठिये में गर्मी और हरकत से आराम
क्रोध से वृद्धि
*जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की तेज, जोरों की, और एकाएक होती है – प्राय: लोग जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में एकोनाइट या बेलाडोना दे देते है, और समझते हैं कि उन्होंने ठीक दवा दी। परन्तु चिकित्सक को समझना चाहिये कि जैसे रोग के आने और जाने की गति होती है, वैसे ही औषधि के लक्षणों में भी रोग के आने और जाने की गति होती है। इस गति को ध्यान में रखकर ही औषधि का निर्वाचन करना चाहिये, अन्यथा कुछ लक्षण दूर हो सकते हैं, रोग दूर नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, एकोनाइट का रोगी हिष्ट-पुष्ट होता है, ठंड में जाने से उसे बड़ी जोर का जुकाम, खांसी या बुखार चढ़ जाता है। शाम को सैर को निकला और आधी रात को ही तेज बुखार चढ़ गया। बेलाडोना में भी ऐसा ही पाया जाता है, परन्तु उसमें सिर-दर्द आदि मस्तिष्क के लक्षण विशेष होते हैं। ब्रायोनिया में ऐसा नहीं होता। रोगी ठंड खा गया, तो उसके लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होंगे। पहले दिन कुछ छींके आयेंगी, दूसरे दिन नाक बहने लगेगा, तीसरे दिन बुखार चढ़ जायगा। बुखार, जैसे धीरे-धीरे आय वैसे धीरे-धीरे ही जायेगा। इसीलिये टाइफॉयड में एकोनाइट या बेलाडोना नहीं दिया जाता, उसके लक्षण ब्रायोनिया से मिलते हैं। औषधि देते हुए औषधि की गति और प्रकृति को समझ लेना जरूरी है। रोग के लक्षणों और औषधि की गति तथा प्रकृति के लक्षणों में साम्य होना जरूरी है, तभी औषधि लाभ करेगी। रोग दो तरह के हो सकते हैं-स्थायी तथा अस्थायी। स्थायी-रोग में स्थायी-प्रकृति की औषधि ही लाभ करेगी, अस्थायी-रोग में अस्थायी-प्रकृति की औषधि लाभ करेगी। एकोनाइट और बेलाडोना के रोग तेजी से और एकाएक आते हैं, और एकाएक ही चले जाते हैं। ऐसे रोगों में ही ये दवायें लाभप्रद हैं। ब्रायोनिया, पल्सेटिला के रोग शनै: शनै: आते हैं, और कुछ दिन टिकते हैं। इसलिये शनै: शनै: आनेवाले और कुछ दिन टिकने वाले रोगों में इन दवाओं की तरफ ध्यान जाना चाहिये। थूजा, साइलीशिया, सल्फर आदि के रोग स्थायी-प्रकृति के होते हैं, अत: चिर-स्थायी रोगों के इलाज के लिये इन औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। इसीलिये जब रोग बार-बार अच्छा हो-हो कर लौटता है तब समझना चाहिये कि यह स्थायी-रोग है, तब एकोनाइट से लाभ नहीं होगा, तब सल्फर आदि देना होगा क्योंकि एकोनाइट की प्रकृति ‘अस्थायी’ (Acute) है, और सल्फर की प्रकृति ‘स्थायी’ (Chronic) है।
*हरकत से रोग की वृद्धि और विश्राम से कमी –
दर्द होने पर हरकत से रोग बढ़ेगा इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु हरकत से रोग बढ़ने का गूढ़ अर्थ है। अगर रोगी लेटा हुआ है, तो आंख खोलने या आवाज सुनने तक से रोगी कष्ट अनुभव करता है। डॉ० मुकर्जी ने अपने ‘मैटीरिया मैडिका’ में स्वर्गीय डॉ० नाग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उन्होंने हैजे के एक रोगी को यह देखकर कि आंखें खोलने से ही उसे पाखाना होता था, ब्रायोनिया देकर ठीक कर दिया। वात-रोग, गठिया, सूजन, गिर जाने से दर्द आदि में हरकत से रोग की वृद्धि होने पर ब्रायोनिया लाभ करता है। इस प्रकार के कष्ट में आर्निका से लाभ न होने पर ब्रायोनिया से लाभ हो जाता है। ब्रायोनिया में हरकत से रोग की वृद्धि होती है-इस लक्षण को खूब समझ लेना चाहिये। अगर किसी व्यक्ति को ठंड लग गई है, रोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा है, एक दिन छीकें, दूसरे दिन शरीर में पीड़ा तीसरे दिन बुखार-इस प्रकार रोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा है, और वह साथ ही यह भी अनुभव करने लगता है कि वह बिस्तर में आराम से, शान्तिपूर्वक पड़े रहना पसन्द करता है; न्यूमोनिया, प्लुरिसी का दर्द शुरू नहीं हुआ, परन्तु वह देखता है कि रोग की शुरूआत से पहले ही उसकी तबीयत आराम चाहती है, हिलने-डुलने से उसका रोग बढ़ता है; ऐसी हालत में ब्रायोनिया ही दवा है। दायें फफड़े के न्यूमोनिया में उक्त-लक्षण होने पर ब्रायोनिया और बांये फफड़े के न्यूमोनिया में उक्त-लक्षण होने पर एकोनाइट फायदा करता है।
*यह तो ठीक है कि ब्रायोनिया में हरकत से रोग की वृद्धि होती है, परन्तु कभी-कभी ब्रायोनिया का रोगी दर्द से इतना परेशान हो जाता है कि चैन से लेट भी नहीं सकता। वह उठकर घूमना-फिरना नहीं चाहता, परन्तु दर्द इतना प्रबल होता है कि पड़े रहने में भी उसे चैन नहीं मिलता। शुरू-शुरू में वह चैन से पड़े रहना चाहता था, परन्तु अब तकलीफ़ इतनी बढ़ गई है कि न चाहते हुए भी इधर-उधर टहलने लगता है। इस हालत में चिकित्सक रस टॉक्स देने की सोच सकता है, परन्तु इस बेचैनी से टहलने में जिसमें रोग की शुरूआत में रोगी टहल नहीं सकता था, जिसमें अब भी दिल तो उसका आराम से लेटने को चाहता है, परन्तु दर्द लेटने नहीं देता, ऐसी हालत में हिलने-डुलने पर भी ब्रायोनिया ही दवा है। रोग का उपचार करते हुए रोग की समष्टि को ध्यान में रखना चाहिये, सामने जो लक्षण आ रहे हैं उनके पीछे छिपे लक्षणों को भी आँख से ओझल नहीं होने देना चाहिये।
* जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी) –
 यह लक्षण हरकत से रोग-वृद्धि के लक्षण का ही दूसरा रूप है। जिधर दर्द हो उधर का हिस्सा दबा रखने से वहां हरकत नहीं होती इसलिये दर्द की तरफ लेटे रहने से रोगी को आराम मिलता है। प्लुरिसी में जिधर दर्द हो उधर लेटने से आराम मिले तो ब्रायोनिया लाभ करेगा। प्लुरिसी में ब्रायोनिया इसलिये लाभ करता है क्योंकि फेफड़े के आवरण में जो शोथ हो जाती है, वह सांस लेते हुए जब साथ के आवरण को छूती है, तब इस छूने से दर्द होता है, परन्तु उस हिस्से को दबाये रखने से यह छूना बन्द हो जाता है, इसलिये कहते हैं कि ब्रायोनिया में जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटने से आराम मिलता है। असल में, यह लक्षण ‘हरकत से रोग की वृद्धि’ – इस लक्षण का ही दूसरा रूप है। जब दर्द का हिस्सा दब जाता है तब हरकत बन्द हो जाती है।
डॉ० बर्नेट प्रसिद्ध होम्योपैथ हुए हैं। वे पहले एलोपैथ थे। उन्हें होम्योपैथ बनाने का श्रेय ब्रायोनिया की है। वे लिखते हैं कि बचपन में उन्हें बायीं तरफ प्लुरिसी हो गई थी जिससे नीरोग होने पर भी उन्हें फेफड़े में दर्द बना रहा। सभी तरह के इलाज कराये-एलोपैथी के, जल-चिकित्सा के, भिन्न-भिन्न प्रकार के फलाहार के, भोजन में अदला-बदली के, परन्तु किसी से रोग ठीक न हुआ। अन्त में यह देखने के लिये कि होम्योपैथ इसके विषय में क्या कहते हैं, वे होम्योपैथी पढ़ने लगे। पढ़ते-पढ़ते ब्रायोनिया में उन्हें अपने लक्षण मिलते दिखाई दिये। उन्होंने ब्रायोनिया खरीद कर उसका अपने ऊपर प्रयोग किया और जो कष्ट सालों से उन्हें परेशान कर रहा था, जो किसी प्रकार के इलाज से ठीक नहीं हो रहा था, वह 15 दिन में ब्रायोनिया से ठीक हो गया। यह अनेक कारणों में से एक कारण है जिसने उन्हें एलोपैथ से होम्योपैथ बना दिया।
* श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना –
खुश्की के कारण रोगी के होंठ सूख जाते हैं, खुश्की के कारण वे चिटक जाते हैं, खून तक निकलने लगता है। एरम ट्रिफि में हम देख आये हैं कि होठों और नाक की खुश्की इस कदर बढ़ जाती है कि रोगी उन्हें नोचता-नोचता खून तक निकाल देता है। नाक में अंगुली घुसेड़ता जाता है। ब्रायोनिया में इसी खुश्की के कारण उसे प्यास बहुत लगती है। देर-देर में पानी पीता है परन्तु अधिक मात्रा में पीता है। एकोनाइट में जल्दी-जल्दी, ज्यादा-ज्यादा; आर्सेनिक में जल्दी-जल्दी थोड़ा-थोड़ा; ब्रायोनिया में दिन-रात देर-देर में ज्यादा-ज्यादा ठंडा पानी पीता है। नक्स मौस्केटा और पल्स में प्यास नहीं रहती।
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की और कब्ज – 
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की का असर आंतों पर भी पड़ता है। रोगी को कब्ज रहती है। सूखा, सख्त, भुना हुआ-सा मल आता है। बहुत दिनों में टट्टी जाता है। सख्त मल को तर करने के लिये पेट में श्लेष्मा का नामोनिशान तक नहीं होता। अगर पेट में से म्यूकस निकलता भी है तो टट्टी से अलग, टट्टी खुश्क ही रहती है। भयंकर कब्ज को यह ठीक कर देता है।
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की और खुश्क खांसी –
श्लैष्मिक-झिल्ली की शुष्कता का असर फफड़ों पर भी पड़ता है। खांसते-खांसते गला फटने-सा लगता है, परन्तु कफ भीतर से नहीं निकलता। ठंड से गरम कमरे में जाने से खांसी बढ़ने में ब्रायोनिया और गरम कमरे से ठंडे कमरे में जाने से खांसी बढ़े तो फॉसफोरस या रुमेक्स ठीक हैं। ब्रायोनिया की शिकायतें प्राय: नाक से शुरू होती हैं। पहले दिन छीकें, जुकाम, नाक से पानी बहना, आंखों से पानी, आंखों में और सिर में दर्द। इसके बाद अगले दिन शिकायत आगे बढ़ती है, तालु में गले में, श्वास प्रणालिका में तकलीफ बढ़ जाती है। अगर इस प्रक्रिया को रोक न दिया जाय, तो प्लुरिसी, न्यूमोनिया तक शिकायत पहुंच जाती है। इन सब शिकायतों में रोगी हरकत से दु:ख मानता है, आराम से पड़े रहना चाहता है। श्वास-प्रणालिका की शिकायतों-जुकाम, खांसी, गला बैठना, गायकों की आवाज का पड़ जाना, गले में टेटवे का दर्द आदि-में इस औषधि पर विचार करना चाहिये।
*रजोधर्म बन्द होने के बाद नाक या मुँह से खून गिरना या सिर-दर्द –
यह ब्रायोनिया का विश्वसनीय लक्षण है। अगर रोगिणी नाक या मुँह से खून निकलने की शिकायत करे, तो उसे यह पूछ लेना चाहिये कि उसका रजोधर्म तो बन्द नहीं हो गया। मासिक बन्द होने से भी सिर-दर्द हो जाया करता है।
*सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना, सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाना – 
कब्ज़ होने से भी सिर-दर्द शुरू हो जाता है। इस सिर-दर्द का लक्षण यह है कि यह सूर्योदय के साथ शुरू होता है, सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाता है। इसके साथ ब्रायोनिया के अन्य लक्षण भी रह सकते हैं, यथा हिलने-डुलने से सिर-दर्द का
बढ़ना, आँख खुलते ही बढ़ना।
सिर-दर्द में ब्रायोनिया और बेलाडोना की तुलना –
सूर्योदय के साथ संबंध न होने पर भी ब्रायोनिया में सिर-दर्द हो सकता है। प्रत्येक अस्थायी-रोग में सिर-दर्द उसके साथ जुड़ा ही रहता है। इतना सिर-दर्द होता है कि सिर को दबाने से ही आराम आता है। ब्रायोनिया के सिर-दर्द में रोगी को गर्मी सहन नहीं होती। हरकत से सिर-दर्द बढ़ता है, आँख झपकने तक से सिर में पीड़ा होती है। इस सिर-दर्द का कारण सिर में रक्त-संचय है। बेलाडोना में भी सिर में रक्त-संचय के कारण सिर-दर्द होता है, परन्तु दोनों में अन्तर यह है कि बेलाडोना का सिर-दर्द आधी-तूफान की तरह आता है, यकायक आता है, ब्रायोनिया का सिर-दर्द धीरे-धीरे आता है, उसकी चाल मध्यम और धीमी होती है। दोनों औषधियों की यह प्रकृति है – एकदम आना बेलाडोना की, और धीमे-धीमे आना ब्रायोनिया की प्रकृति है।
*गठिये के रोग में गर्मी और हरकत से आराम –
ब्रायोनिया का उपयोग गठिये में भी होता है। ब्रायोनिया का रोगी ठंडी हवा पसन्द करता है, ठंडा कपड़ा ओढ़ना चाहता है, परन्तु गठिये के दर्द में अपनी प्रकृति के विरुद्ध उसे गर्मी से आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यद्यपि ब्रायोनिया में रोगी आराम से लेटे रहना चाहता है, तो भी गठिये के रोग में वह चलने-फिरने से ही ठीक रहता है क्योंकि इस प्रकार उसके दुखते अंगों को गति से गर्मी मिलती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि ब्रायोनिया में परस्पर-विरुद्ध प्रकृतियां काम कर रही हैं। वह प्रकृति से ऊष्णता-प्रधान है परन्तु गठिये में उसे गर्मी पसन्द है, यह होते हुए भी उसकी आधारभूत प्रकृति ऊष्णता-प्रधान ही रहती है। गठिया ठीक होने पर आँख में दर्द-अगर यह देखा जाय कि जिस अंग में गठिये का दर्द था वह तो ठीक हो गया, परन्तु आंख में दर्द शुरू हो गया, आंख लाल हो गई, सूज गई, उसमें से रुधिर आने लगा, तब ब्रायोनिया से यह ठीक होगा।
* क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग की उत्पत्ति –
ब्रायोनिया में अनेक मानसिक-लक्षण हैं। बच्चा क्रोध करता है और जो वस्तु मिल नहीं सकती उसे फौरन चाहता है और दिये जाने पर उसे परे फेंक देता है; तरह-तरह की चीजों के लिये जिद करता और दे दी जायें तो लेने से इन्कार करता है; घर में होने पर भी कहता है-घर में जाऊंगा, उसे ऐसा गलता है कि वह घर में नहीं है। बड़ा आदमी अपने रोजगार की बातें अंटसंट बका करता है। ये लक्षण मानसिक रोग में, डिलीरियम आदि में प्रकट होते हैं। क्रोध से उत्पन्न मानसिक-लक्षणों में स्टैफ़िसैग्रिया भी उपयोगी है। अगर रोगी कहे: डाक्टर, अगर मेरा किसी से झगड़ा हो जाय, तो मैं इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि सिर-दर्द होने लगता है, नींद नहीं आती, तो ऐसे रोगी को स्टैफिसैग्रिया ठीक कर देगा।
हरकत से दस्त आना परन्तु रात को दस्त न होना 
जब तक रोगी रात को लेटा रहता है दस्त नहीं आता, परन्तु सवेरे बिस्तर से हिलते ही उसे बाथरूम में दौड़ना पड़ता है। पेट फूला रहता है, दर्द होता है और टट्टी जाने की एकदम हाजत होती है। बड़ा भारी दस्त आता है, एक बार ही नहीं, कई बार आ जाता है, और जब रोगी टट्टी से निबट लेता है तब शक्तिहीन होकर मृत-समान पड़ा रहता है, थकावट से शरीर पर पसीना आ जाता है। अगर लेटे-लेटे जरा भी हरकत करे, तो फिर बाथरूम के लिये दौड़ना पड़ता है। जो दस्त दिन में कई बार आयें और रात को जब मनुष्य हरकत नही करता बन्द हो जायें, उन्हें यह दवा ठीक कर देती है। पैट्रोलियम में रोगी रात को कितनी भी हरकत क्यों न करे उसे दस्त नहीं होता, सिर्फ दिन की दस्त होता है, रात को नहीं होता; ब्रायोनिया में दिन को दस्त होता है, रात को जरा-सी भी हरकत करे तो दस्त की हाजत हो जाती है, अन्यथा रात को दस्त नहीं होता।
ब्रायोनिया औषधि के अन्य लक्षण
*नौ बजे रोग की वृद्धि – 
ब्रायोनिया के ज्वर के लक्षण 9 बजे शाम को बढ़ जाते हैं। 9 बजे ज्वर आयेगा या सर्दी लगनी शुरू हो जायगी। कैमोमिला के लक्षण 9 बजे प्रात: बढ़ जाते हैं।
*रोगी खुली हवा चाहता है – 
ब्रायोनिया का रोगी एपिस और पल्स की तरह दरवाजे-खिड़कियां खुली रखना पसन्द करता है। बन्द कमरा उसे घुटा-घुटा लगता है। बन्द कमरे में उसकी तकलीफें बढ़ जाती है। खुली हवा उसे रुचती है।
* खाने के बाद रोग वृद्धि – 
खाने के बाद रोग बढ़ जाना इसका व्यापक लक्षण है। रोगी कहता है कि खाना खाने के बाद तबीयत गिर जाती है।
*दांत के दर्द में दबाने और ठंडे पानी से लाभ –
 दांत के दर्द में मुँह में ठंडे पानी से लाभ होता है क्योंकि ब्रायोनिया ठंड पसन्द करने वाली दवा है। जिधर दर्द हो उधर लेटने पर दर्द वाली जगह को दबाने से आराम मिलता है। यह भी ब्रायोनिया का चरित्रगत-लक्षण है। होम्योपैथी में रोग तथा औषधि की प्रकृति को जान कर उनका मिलान करने से ही ठीक औषधि का निर्वाचन हो सकता है। ठंडे पानी से और दर्द वाले दांत को दबाने से रोग बढ़ना चाहिये था, परन्तु क्योंकि ब्रायोनिया में ठंड से और दर्द वाली जगह को दबाने से आराम होना इसका ‘व्यापक-लक्षण’ (General symptom) है, इसलिये ऐसी शिकायत में ब्रायोनिया से लाभ होता है।
*गर्म-शरीर में शीत से रोग में वृद्धि –
 शरीर गर्म हो जाने पर ठंडा पानी पीने, या उसमें स्नान से रोग बढ़ जाता है। यद्यपि ब्रायोनिया के रोगी को ठंड पसन्द है, ठंडा पानी उसे रुचता है, परन्तु अगर वह गर्मी से आ रहा है, शरीर गर्म हो रहा है, तब ठंडा पानी पीने या ठंडे स्नान से उसे गठिये का दर्द बढ़ जायगा। अगर उसे खांसी होगी या सिर-दर्द होता होगा, वह बढ़ जायगा, या हो जायगा। शरीर के गर्म रहने पर ठडा पानी पीने से जोर का सिर-दर्द हो जायगा। ब्रायोनिया की तरह रस टॉक्स में भी शरीर हो, तो ठडे जल से सिर-दर्द आदि तकलीफ भयंकर रूप धारण कर लेंगी। अगर शरीर की गर्मी की हालत में ठंडा पानी पी लिया जायगा, तो पेट की भी शिकायत पैदा हो सकती है जिसमें ब्रायोनिया लाभ करेगा।
शक्ति तथा प्रकृति – 6, 30, 200 (औषधि ‘गर्म’-Hot-प्रकृति को लिये है)

 

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विटामिन बी काम्प्लेक्स के स्रोत और स्वास्थ्य लाभ

    स्वस्थ रहने के लिए हम हमेशा संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाने की कोशिश करते हैं, परन्तु फिर भी कई बार हमारे खानपान में कोई न कोई ऐसी कमी रह ही जाती है, जिससे सेहत संबंधी कई समस्याएं हमें परेशान करने लगती हैं। शरीर को सुचारु रूप से चलाने में विटामिन्स और माइक्रोन्यूट्रीएंट्स बहुत जरूरी होते हैं, पर विटामिन बी-12 एक ऐसा तत्व है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सही से काम करने में मदद करता है। इसकी कमी सेहत के लिए निश्चित रूप से बड़े स्तर पर नुकसानदेह साबित हो सकती है।    विटामिन बी कॉम्पलेक्स जल में घुलनशील विटामिन है। यह हमारे शरीर के लिए जरूरी विटामिन है। विटामिन बी कॉम्पलेक्स की शरीर में कमी हो जाए तो स्मरण शक्ति कमजोर हो सकती है, आप अचानक थकान महसूस कर सकते हैं, डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं।


स्वस्थ रहने के लिए हम हमेशा संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाने की कोशिश करते हैं, परन्तु फिर भी कई बार हमारे खानपान में कोई न कोई ऐसी कमी रह ही जाती है, जिससे सेहत संबंधी कई समस्याएं हमें परेशान करने लगती हैं। शरीर को सुचारु रूप से चलाने में विटामिन्स और माइक्रोन्यूट्रीएंट्स बहुत जरूरी होते हैं, पर विटामिन बी कॉम्पलेक्स एक ऐसा तत्व है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सही से काम करने में मदद करता है। इसकी कमी सेहत के लिए निश्चित रूप से बड़े स्तर पर नुकसानदेह साबित हो सकती है।

क्यों है जरूरी विटामिन बी कॉम्पलेक्स?
विटामिन बी कॉम्पलेक्स मेटॉबालिज्म बढ़ाता है। यह पोषण को ऊर्जा में बदलने के काम करता है। हमारी कोशिकाओं में पाए जाने वाले जीन डीएनए को बनाने और उनकी मरम्मत में सहायता करता है। यह ब्रेन, स्पाइनल कोर्ड और नसों के कुछ तत्वों की रचना में भी सहायक होता है। हमारी लाल रक्त कोशिशओं का निर्माण भी इसी से होता है। यह शरीर के सभी हिस्सों के लिए अलग-अलग तरह के प्रोटीन बनाने का भी काम करता है।

क्या हैं लक्षण-
विटामिन बी कॉम्पलेक्स की कमी से हाथ-पैरों में झनझनाहट और जलन, जीभ में सूजन, कुछ भी याद रखने में परेशानी, त्वचा का पीला पड़ना, कमजोरी महसूस होना, चलने में कठिनाई, अनावश्यक थकान, डिप्रेशन आदि समस्याएं हो सकती हैं। अगर शरीर में विटमिन बी-12 की बहुत ज्यादा कमी हो जाए तो इससे स्पाइनल कोर्ड की नसें नष्ट होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को पैरालिसिस का भी अटैक हो सकता है।
विटामिन बी कॉम्पलेक्स के स्रोत-

अक्सर यह सवाल उठता है कि हमें अपने खानपान में किन चीजों को शामिल करना चाहिए, ताकि शरीर में विटामिन बी कॉम्पलेक्स की कमी न हो। हालांकि मांसाहारी पदार्थों में विटामिन बी कॉम्पलेक्स की भरपूर मात्रा होती है, परन्तु शाकाहारी लोगों को विशेष रूप से अपने भोजन पर ध्यान देना चाहिए। विटामिन बी कॉम्पलेक्स के कुछ मुख्य स्रोत है। हमें डेरी उत्पादों का सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए जैसे दूध, दही, पनीर, चीज, मक्खन, सोया मिल्क आदि। इसके अलावा जमीन के भीतर उगने वाली सब्जियों जैसे आलू, गाजर, मूली, शलजम, चुकंदर आदि में भी विटामिन बी आंशिक रूप से पाया जाता है।
विटामिन बी काम्पलेक्स के तत्व-
   विटामिन- बी कोई एक तत्व नहीं होता। यह कई रूपों में पाया जाता है। मुख्य रूप से इसकी संख्या चार है- बी-1, बी- 2, बी- 6 और बी- 16 इत्यादि। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘बी-कम्पलेक्स’ कहा जाता है। बी-कम्पलेक्स विटामिन-सी (एस्कॉर्बिक एसिड) की भांति जल में घुलनशील है।
विटामिन- बी समूह का पहले सदस्य ‘थाइमीन’ है। अत: इसे बी-1 कहा जाता है। यह स्नायु और पाचन-प्रणाली को स्वस्थ रखता है। रोगाणुओं से संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करता है। इसकी कमी से भूख कम लगती है। कमजोरी का अनुभव होता है। ‘बेरी-बेरी’ नामक रोग हो जाता है। मानसिक असंतुलन की समस्या पैदा होती है। यह हमे जौ, बाजरा, ज्वार, मैदा, चावल, सोयाबीन, गेहूं, अंकुरित अनाज, दलिया, मटर और मूंगफली से प्राप्त होता है।
विटामिन बी- 12 को ‘राइबो-फ्लोबिन’ भी कहते हैं। यह मुंह, जीभ और नेत्रों के लिए आवश्यक है। इसकी कमी से जीभ लाल हो जाती है, मुंह में छाले पड़ जाते हैं। मुंह के कोण फट जाते हैं, नासिका द्वार पर पपड़ी हो जाती है। आंखें कमजोर हो जाती हैं। दूध, खमीर, अनाज, दालें, दही और हरी पत्तेदार सब्जियां इसके प्रमुख स्रोत हैं।
     विटामिन बी- 6 को रसायन विज्ञान की भाषा में ‘पाइरीडॉक्सीन’ कहते हैं। यह त्वचा के लिए आवश्यक है। इसकी कमी से बुध्दि मंद पड़ जाती है। शरीर में एेंठन आती है। यह दूध, कलेजी, खमीर, मांस और अनाज में पाया जाता है।
विटामिन- बी12 का रासायनिक नाम ‘सायनोकाबालामीन’ है। यह त्वचा, तंत्रिका, उत्तक, हड्डियों और मांसपेशियों के लिए जरूरी है। इसकी कमी से एनीमिया रोग हो जाता है। यह मुख्यत: मांस, मछली, अंडा, दूध और पनीर से मिलता है।
बी- कम्पलेक्स में अन्य विटामिन इस प्रकार हैं- नाइकोटोनिक एसिड, बायोटीन, पैन्टोथेनिक एसिड और फालिक एसिड इत्यादि।
बी-कम्पलेक्स को दवा के रूप में भी सेवन कर सकते हैं। अधिकतर विटामिन की दवाइयों के साथ विटामिन- सी भी मिला हुआ रहता है। अनेक मशहूर ब्रांड के बी-कम्पलेक्स की दवाइयां मिलती है। जिनमें प्रमुख हैं- कोबाडेक्स फोर्ट कैप्सूल, बी- फ्लेक्स फोर्ट टेबलेट, पोली-विषयन सीरप व टेबलेट, बीको जाइमसी-फोर्ट टेबलेट, बेसीलेक इत्यादि।
 

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कचनार के पेड़ के औषधीय गुण और लाभ


कचनार का फूल जितना खूबसूरत होता है उतना ही यह सेहत के लिए भी गुणकारी होता है। मुंह में छाले आ गए हों या पेट में कीड़े हो गए हों, कचनार का फूल हर सूरत में कारगर उपचार है।
प्रकृति के पास औषधि का खजाना है जो युगों-युगों से जीवों के काम आते रहे हैं। इन्हीं में से एक कचनार का पेड़ भी है जो कई रोगों को जड़ से खत्‍म करने की क्षमता रखता है। इस पेड़ की पत्तियां, तना व फूल आदि सभी उपयोगी हैं। कचनार की गणना सुंदर व उपयोगी वृक्षों में होती है। इसकी अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से गुलाबी कचनार का सबसे ज्यादा महत्‍व है। कचनार के फूल, कलियां और वृक्ष की छाल को औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह शरीर के किसी भी भाग में ग्रंथि (गांठ) को गलाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा रक्त विकार व त्वचा रोग जैसे- दाद, खाज-खुजली, एक्जीमा, फोड़े-फुंसी आदि के लिए भी कचनार की छाल का उपयोग किया जाता है। यह वात रोगों के लिए भी बहुत लाभकारी है।


पेट के कीड़े


पीले कचनार के छाल को पानी में उबालकर ठंडा कर लें। दो से तीन दिन इसका सेवन करने से पेट के कीड़े मर जाएंगे और छाला समाप्त हो जाएगा।

बवासीर-

 कचनार की कलियों को सूखाकर उसका पाउडर बनालें और मक्खन के साथ 11 दिनों तक सेवन करें तो खूनी बवासीर से राहत मिलता है। 
कचनार की एक चम्मच छाल को एक कप छांछ के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से बवासीर में खून गिरना बंद होता है। 

सूजन

कचनार की जड़ को पानी में घिसकर लेप बना लें और इसे गर्म कर लें। इसके गर्म-गर्म लेप को सूजन पर लगाने से आराम मिलता है।

कब्ज


कचनार के फूलों को चीनी के साथ घोटकर शर्बत की तरह बनाकर सुबह-शाम पीने से कब्ज दूर होती है और मल साफ होता है। कचनार के फूलों का गुलकन्द रात में सोने से पहले 2 चम्मच की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से कब्ज दूर होती है।

कुबड़ापन

अगर कुबड़ापन का रोग बच्चों में हो तो उसके पीठ के नीचे कचनार का फूल बिछाकर सुलाने से कुबड़ापन दूर होता है। लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग कचनार और गुग्गुल को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से कुबड़ापन दूर होता है। कुबड़ापन के दूर करने के लिए कचनार का काढ़ा बनाकर सेवन करना चाहिए।

घाव

कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से घाव ठीक होता है। इसके काढ़े से घाव को धोना भी चाहिए।

स्तनों की गांठ

कचनार की छाल को पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण लगभग आधे ग्राम की मात्रा में सौंठ और चावल के पानी (धोवन) के साथ मिलाकर पीने और स्तनों पर लेप करने से गांठ ठीक होती है।

मुंह में छाले

कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ा-सा कत्था मिलाकर छालों पर लगाने से आराम मिलता है।

खांसी और दमा

शहद के साथ कचनार की छाल का काढ़ा 2 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से खांसी और दमा में आराम मिलता है।

दांतों के रोग

कचनार की छाल को पानी में उबाल लें और उस उबले पानी को छानकर एक शीशी में बंद करके रख लें। यह पानी 50-50 मिलीलीटर की मात्रा में गर्म करके रोजाना 3 बार कुल्ला करें। इससे दांतों का हिलना, दर्द, खून निकलना, मसूढों की सूजन और पायरिया खत्म हो जाता है।
 

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