यौन शक्ति बढ़ाने के नायाब नुस्खे



    आजकल युवा लोगों में सबसे बड़ी चिंता शीघ्रपतन को लेकर रहती है जाहिर है की नवविवाहित पुरषों में ये अधिक होती है अगर वो इन 10 घरेलू नुस्खों में से एक या दो को भी अपनी पाचन शक्ति के अनुसार अपना लेते है तो उनके जीवन में बहार आ जाएगी इन नुस्खों के इस्तेमाल में 2 या 3 बातो का विशेष ध्यान रखे एक तो कब्ज न रहने दे और कोई भी नुस्खा अपनाए तो अपनी पाचन शक्ति के अनुसार और सबसे बड़ी बात खान-पान का पूरा ध्यान रखे खट्टे व् मिर्च वाले भोजन न करें अनारदाना तो मनुष्य को नपुंसकता की और लेकर जाता है।
सेक्स पावर बढ़ाने के नुस्खे -
*सफेद मूसली का चूर्ण एक-एक चम्मच सुबह-शाम फांक कर ऊपर से एक गिलास मिश्री मिला दूध पी ले यह प्रयोग 12 महीने करें यह प्रयोग करने से शरीर कभी भी कमजोर  नहीं होगा और बल वीर्य बढ़ेगा और यौन शक्ति बनी रहेगी|
*आधा सेर दूध में चार छुहारे डाल कर उबाले जब खूब अच्छी तरह दूध उबलने लगे तो इसमें केसर की 5 -6 पंखुड़िया और 4 चम्मच मिश्री डाल दीजिये जब दूध उबालकर आधा रह जाये तो इस दूध को सोने से पहले घूंट-घूंट कर के पी जाये यह बहुत ही पोष्टिक प्रयोग है और शीतकाल में करने योग्य है|
मुलहठी का चूर्ण एक चम्मच (6 ग्राम ) और एक छोटा चम्मच देसी घी और दो चम्मच शहद मिलाकर चाट ले इसके बाद एक गिलास दूध में आधा चम्मच सौंठ और एक चम्मच मिश्री डालकर उबालकर थोड़ा ठंडा करके पिए यह प्रयोग शरीर की सभी धा-तुओं को बेहद पुष्ट कर देगा| इस प्रयोग को हर रोज सोने से पहले या सहवास के बाद करना चाहिए
*इमली के बीज चार दिन तक पानी में घोलकर रखे इसके बाद इनका छिलका हटाकर इसकी गिरी के दोगुने वजन के बराबर दो वर्ष पुराण गुड लेकर मिला ले अभी इनको पीसकर बराबर कर ले अभी इसकी छोटे बेर जितनी गोलिया बना ले और छाया में सुखा लीजिए सहवास करने से दो घंटे पहले पानी के साथ निगल ले यह धातु पोष्टिक नुस्खा है|
*असगंद और बिधारा दोनों को अलग-अलग कुट पिसकर महीन चूर्ण बना कर बराबर मात्रा में मिला लीजिए हर रोज सुबह एक चम्मच चूर्ण थोड़े से घी में मिलाकर चाट ले और ऊपर से मिश्री मिला दूध पी ले हर सर्दियों में यह प्रयोग 3 -4 महीने के लिए करें और इसके साथ नारियल तेल या नारायण तेल की मालिश शरीर पर करें फिर देखे इस नुस्खे का चमत्कार|
 * उड़द की दाल पिसवाले इसे शुद्ध देसी घी में सेंककर कांच के बर्तन में भरकर रख ले एक-एक चम्मच यह दाल थोड़े से घी में मिलाकर सुबह व रात को सोते समय खाकर ऊपर से मिश्री मिला दूध पी ले इससे धातु ,बल ,वीर्य स्तंभन  बढ़ेगी| अगर उड़द न पचा सके तो एक समय ही ले|
कोंच के बीज 250 ग्राम ,ताल मखाना 100 ग्राम और मिश्री 350 ग्राम इन सबको अलग-अलग पीसकर चूर्ण कर ले और मिलाकर शीशी में भर ले सुबह-शाम इस चूर्ण को एक-एक चम्मच मिश्री वाले दूध के साथ पिए
*सफेद या लाल प्याज का रस ,शहद,अदरक का रस ,देसी घी 6 -6 मिलाकर नित्य चाटे एक महीने के सेवन से नपुंसक भी शक्तिशाली हो जाता है नित्य करने से सेक्स पावर बहुत बढ़ जाती है|
*सूखे सिंघाड़े पिसवा लीजिए इसके आटे का हलवा बनाकर सुबह नाश्ते में अपनी पाचन शक्ति के अनुसार खूब चबा-चबा कर खाये यह शरीर को पुष्ट और शक्तिशाली बनाता है नवविवाहित नोजवानो के लिए यह बहुत ही उपयोगी है इससे धातु पुष्ट  होकर शरीर बलिष्ठ होता है|
*शकरकंदी का हलवा देसी घी में बनाकर हर रोज नाश्ते में खाये इसके गुण सिंघाड़े के आटे के हलवे के बराबर है हर रोज खाने वाला व्यक्ति कभी भी शीघ्र पतन का शिकार नहीं होता|


होम्योपैथिक औषधि फास्फोरस के लक्षण उपयोग



Phosphorus Homeopathic Medicine 
लक्षण तथा मुख्य-रोग लक्षणों में कमी
स्नायु-संस्थान (Nervous system) के रोगी की प्रमुख औषधि (लक्षणों का यकायक होना – नि:सत्वता, बेहोशी, पसीना) खाने से रोगी को आराम
जीवनी-शक्ति का निम्न-स्तर पर पहुंच जाना (शोक, चिंता, मानसिक कार्य में अतिः व्यभिचार आदि का दुष्परिणाम) नींद से रोगी को आराम
स्नायु-रोग में भिन्न-भिन्न अंगों में जलन; जलन में सल्फर और आर्सेनिक से तुलना मालिश से रोगी की आराम
सहज-स्राव (Bleeding remedy) नमकीन और घी के पदार्थ पसन्द करना
सारी पाक-स्थली का खाली-खाली अनुभव करना और रात को भी उठकर खाना लक्षणों में वृद्धि
रोगी के शीत-प्रधान होने पर भी पेट तथा सिर में ठंड पसन्द करना ठंडी हवा से रोग-वृद्धि
कब्ज में कुत्ते के मल-जैसा, और दस्तों में मल-द्वार मानो खुल गया जैसा लगना वायु-मंडल में एकदम परिवर्तन से रोग-वृद्धि-
गर्म कमरे से ठंडे स्थान में जाने से खांसी, गला पकना या बैठ जाना मानसिक श्रम से रोग-वृद्धि
न्यूमोनिया तथा टी०बी० में उपयोगी – न्यूमोनिया में रोगी बांयी करवट नहीं लेट सकता बाईं करवट लेटने से वृद्धि-
* स्नायु-संस्थान (Nervous system) के रोगी की प्रमुख औषधि (लक्षणों का यकायक होना – नि:सत्वता, बेहोशी, पसीना) – स्नायु-संस्थान पर प्रभाव करने वाली फास्फोरस के बराबर दूसरी कोई औषधि नहीं है। स्नायु-संस्थान का केन्द्र मस्तिष्क तथा मेरु-दंड (Spinal cord) है। इन पर जब रोग आक्रमण करता है तब यकायक लक्षण प्रकट होते हैं। रोगी एकदम नि:सत्व, पक्षाघात हो जाता है, बेहोशी आ जाती है, एकदम पसीना आने लगता है। ये सब मस्तिष्क अथवा स्नायु-संस्थान पर रोग के आक्रमण के लक्षण हैं, और इन लक्षणों के होने पर फास्फोरस का ध्यान में रखना उचित है।
* जीवनी-शक्ति का निम्न-स्तर पर पहुंच जाना -
शोक, चिंता, मानसिक कार्य में अतिः व्यभिचार आदि का दुष्परिणाम–
 इस प्रकार मस्तिष्क तथा मेरु-दण्ड पर रोग का आक्रमण तब होता है जब जीवनी-शक्ति अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच जाती है। निम्नतम स्तर पर पहुंचने के अनेक कारण हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, दु:ख, शोक, चिंता, दिन-रात मानसिक कार्य में लगे रहने से उसमें अति कर देना या व्यभिचार आदि कुकर्मों में जीवनी-शक्ति का ह्रास कर देना आदि ऐसे कारण हैं जिनसे जीवनी-शक्ति निम्नतम-स्तर में पहुंच जाती है और यकायक शक्तिहीनता, कंपन, अंगों का सुन्न पड़ जाना, एकदम पसीना आना आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं। फास्फोरस का इस अवस्था पर विशेष स्वास्थ्यप्रद प्रभाव है। इससे स्नायुओं का पोषण होने लगता है, उनका क्षीण होना रुक जाता है। इसलिये इसे ‘स्नायु की औषधि’ (Nerve remedy) कहा जाता है। जीवनी-शक्ति के निम्न-स्तर पर होने की दशा में कोई छोटा-सा भी कारण शारीरिक तथा मानसिक क्षीणता को उत्पन्न कर सकता है और जरा-सी ही मानसिक-आघात से मनुष्य ढह सकता है।
स्नायु-रोग में भिन्न-भिन्न अंगों में जलन; जलन में सल्फर और आर्सेनिक से तुलना – 
जीवनी-शक्ति को निम्नतम-स्तर पर पहुंचने का प्रथम-प्रकाश शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में जलन के रूप में प्रकट होता है। यह जलन विशेष तौर पर त्वचा में होती है। रोगी खासकर प्रात: काल इस जलन से बेचैन रहता है, घबराया रहता है, चिंताकुल रहता है, टिक कर बैठ नहीं सकता, लगातार हरकत करता रहता है, कभी यहाँ बैठता है, कभी वहां, न कहीं चैन से खड़ा रह सकता है, न कहीं चैन से बैठ सकता है, कहीं टिक नहीं सकता। जिंकम में भी न टिकने का लक्षण है, परन्तु न टिक सकने की बेचैनी उसके पैरों तक सीमित रहती है, वह पैर हिलाता रहता है, परन्तु फास्फोरस तो समस्त शरीर से बेचैन रहता है, बेचैनी सिर्फ पैरों में ही सीमित नहीं रहती।
फास्फोरस की जलन विशेष तौर पर रीढ़ की हड्डी में पायी जाती है। रीढ़ की हड्डी के भिन्न-भिन्न स्थानों में रोगी को जलन अनुभव होती है, खास करके दोनों फलकों के बीच के स्थान पर। लाइको में भी फलकों के बीच के स्थान पर जलन पायी जाती है। लाइको में कन्धों के बीच में जलन ऐसी अनुभव होती है जैसे राई का प्लास्तर लगा हो। रीढ़ की हड्डी के अलावा पीठ में भी जलन नीचे से ऊपर को जाती है। इस प्रकार की जलन इसमें अन्य किसी औषधि की अपेक्षा अधिक है। मेरु-दंड (Spinal cord) के रोगों में फास्फोरस का अन्य औषधियों की अपेक्षा प्रमुख स्थान है।
जलन में फास्फोरस की सल्फर तथा आर्सेनिक से तुलना- 
जलन में मुख्य तौर पर तीन औषधियों की तरफ ध्यान दिया जाता है। वे है – सल्फर, आर्सेनिक तथा फास्फोरस। जलन के पुराने रोगों में सल्फर और नवीन रोगों में आर्सेनिक उपयोगी है। इसका यह अभिप्राय नहीं कि आर्सेनिक जलन के पुराने रोगों में लाभ नहीं करता। अगर घाव बहुत पुराना हो जाय सड़ने लगे, जलन करता हो, तो पुराना होने पर भी उसमें आर्सेनिक लाभ करेगा। फास्फोरस की जलन इतनी ही तीव्र होती है जैसी सल्फर या आर्सेनिक की, परन्तु भेद यह है कि आर्सेनिक की जलन में सेंक से रोगी को आराम पहुंचता है, जो बात सल्फर और फास्फोरस में नहीं है। फास्फोरस की जलन सिर्फ स्नायविक हो सकती है। जहां कहीं भी तीव्र जलन का लक्षण हो, वहां फास्फोरस को प्रमुख स्थान दिया जाना चाहिये। सिकेल कौर में भी जलन है, परन्तु उसकी जलन आर्सेनिक से उल्टी होती है। आर्सेनिक तो गर्मी पसन्द करता है, परन्तु सिकेल गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, कपड़ा तक अपने पर नहीं रख सकता। सल्फर की जलन प्राय: पाँव के तलुवों में अनुभव होती है, बिस्तर में जाते ही रोगी के पांव के तलुवे जलने लगते हैं, वह बिस्तर में पांव रखने के लिये ठंडी जगह ढूंढा करता है या बिस्तर से पांव बाहर निकाल लेता है, फास्फोरस की जलन विशेष तौर से हथेलियों में होती है। जैसे सल्फर का रोगी पांवों को नहीं ढक सकता, वैसे फास्फोरस का रोगी हाथों को नहीं ढक सकता। जलन हाथों से शुरू होकर शरीर के अन्य स्थानों पर, चेहरे तक भी फैल जाती है।
*सहज-स्राव (Bleeding remedy) – 
इस औषधि के रोगी को रक्त-स्राव झट से होने लगता है। जरा-सी चोट से खून निकलने लगता है, जमता नहीं। किसी-किसी रोगी के लिये रक्त-स्राव की यह प्रकृति अत्यन्त खतरनाक होती है। उसका रक्त बहता ही जाता है, इसी से उसकी मृत्यु तक हो सकती है। फास्फोरस प्रकृति की स्त्री को रक्त-स्राव तो होना ही चाहिये, अगर माहवारी का रक्त-स्राव नहीं होता, तो किसी और जगह से खून बह निकलेगा। नाक से, फेफड़ों से, किसी भी स्थान से रक्त बह-निकलना चाहिये अगर वहां से न निकलेगा, तो दूसरी जगह से निकलेगा।
*कब्ज में कुत्ते के मल-जैसा- 
और दस्तों में मल-द्वार मानो खुल गया जैसा लगना – कब्ज में मल खुश्क, लम्बा, कुत्ते के मल-जैसा, चिमड़ा और बहुत कांखने से निकलता है। अगर रोगी को दस्त आये तो ऐसे लगता है मानो पानी का नलका धड़ाके से खुल गया और नल के पानी की तरह बहने लगा। अगर ऐसा नहीं होता, तो मल अपने-आप गुदा-प्रदेश से रिसा करता है। हनीमैन ने लिखा है कि यह औषधि उन रोगियों को बहुत लाभ पहुंचाती है, जो पतली टट्टी या अतिसार (दस्तों) के पुराने मरीज होते हैं।
* गर्म कमरे से ठंडे स्थान में जाने से खांसी, गला पकना या बैठ जाना –
 गर्म कमरे में ठंडी हवा में जाने से खांसी उठने लगे तो फास्फोरस, और ठंडक से गर्म कमरे में जाने से खांसी आये तो ब्रायोनिया औषधि है। गला पक जाता है, दुखने लगता है, बोला नहीं जाता। गायकों तथा व्याख्याताओं के गला बैठ जाने और दुखने में फास्फोरस लाभप्रद है। डॉ० फ़ैरिंगटन लिखते हैं कि जब खाँसी में गले की बहुत गहराई से जोर लगाकर कफ उठाना पड़े, तब फास्फोरस से लाभ होता है।
*न्यूमोनिया तथा टी०बी० में उपयोगी – 
न्यूमोनिया में रोगी बांयी करवट नहीं लेट सकता – हम लाइकोपोडियम के प्रकरण में लिख आये हैं कि न्यूमोनिया में तीन अवस्थाएं होती हैं – पहली अवस्था ‘शोथावस्था’ (Congestive stage) की होती है जिसमें फेफड़े में शोथ हो जाती है; दूसरी अवस्था ‘स्थूलावस्था’ (Hepatization) की है जिसमें फेफड़ा कफ से भर जाता और कड़ा पड़ जाता है; तीसरी अवस्था ‘विपाकावस्था’ (Stage of Resolution) की है जिसमें अगर कफ घुल गया तो रोगी अच्छा हो जाता है, न घुला तो कफ न निकल सकने के कारण मर जाता है। तीसरी अवस्था में रोगी सांस के लिये छटपटाता है और उसके नथुने पंखे की तरह सांस लेने के लिये चलते हैं। इस अवस्था में लाइको चमत्कारी लाभ करता है।
* सारी पाक-स्थली का खाली-खाली अनुभव करना और रात को भी उठकर खाना – 
रोगी अनुभव करता है कि उसकी सम्पूर्ण पाक-स्थली खाली हो गई है, उसमें कुछ नही रहा। रोगी बिना खाये नहीं रह सकता, रात को भी उठकर खाता है। भूख को क्षण भर के लिये भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। अभी खाया है, परन्तु खाने के बाद फिर भूख को अनुभव करता है। खाने से उसका कष्ट मिलता है, परन्तु खाने के बाद फिर भूख का अनुभव होता है। इस प्रकार भूख का अनुभव होना आयोडाइन, चेलिडोनियम, पेट्रोलियम तथा ऐनाकार्डियम में पाया जाता है। परन्तु भूख अनुभव होने के अतिरिक्त रोगी को पेट का खाली-खाली होने का अनुभव होना भी फास्फोरस का लक्षण है। पेट के खाली-खाली होने का लक्षण इग्नेशिया, कैलि कार्ब, सीपिया तथा स्टैनम में भी पाया जाता है, परन्तु फास्फोरस में पेट का खालीपन ऊपर-नीचे सारे पेट में होता है, पेट में ही नहीं, संपूर्ण ‘पाक-स्थली’ में पाया जाता है। इग्नेशिया में पेट के खालीपन के साथ रोगिणी गहरी सांस छोड़ती है; कैलि कार्ब में पेट अन्दर घसता-सा महसूस होता है, खाने से भी यह नहीं मिटती; सीपिया में पेट की शून्यता ‘मानो पेट में कुछ भी नहीं’ खाने से कम हो जाती है; स्टैनम में पेट के खालीपन के साथ छाती की कमजोरी पायी जाती है। पेट के खाली-खाली होने का अनुभव फास्फोरस में सबसे ज्यादा पाया जाता है।
*रोगी के शीत-प्रधान होने पर भी पेट तथा सिर में ठंड पसन्द करना – 
रोगी स्वभाव से शीत-प्रधान होता है, ठंड से उसके रोग बढ़ जाते हैं, गर्मी पसन्द करता है, यह उसका ‘व्यापक-लक्षण’ है। परन्तु कभी-कभी ‘व्यापक-लक्षण’ तथा ‘अंग विशेष के लक्षण’ में विरोध भी होता है। फास्फोरस का रोगी अपने ‘व्यापक-लक्षण’ में तो शीत-प्रधान है, परन्तु पेट तथा सिर के रोगों में उसे ठंडक पसन्द होती है। वह आइसक्रीम खाना पसन्द करता है, बर्फ का पानी पीना चाहता है, परन्तु पेट में ठंडे पानी पीने के साथ इसका लक्षण यह है कि पेट में जब वह पानी गर्म हो जाता है, तब उल्टी हो जाती है। अगर रोगी शीत-प्रधान हो, परन्तु ठंडा पानी पीये और ठंडा पानी पीने के बाद जब वह पेट में गर्म हो जाय तब उल्टी हो जाय, तो फास्फोरस से अवश्य लाभ होगा। पेट के दर्द में अगर ठंडी चीजें खाने से आराम हो, गर्म खाने से तकलीफ बढ़े, तो पेट में कैंसर होने की संभावना होती है। ऐसे लक्षण में फास्फोरस लाभ करता है।
फास्फोरस औषधि के अन्य लक्षण
*रोगी नंगा हो जाता है – कभी-कभी रोगी प्रेमावेश में आकर अपने को नंगा कर लेता है। निर्लज्ज होकर अपने अंगों का प्रदर्शन करता है। हायोसाइमस में भी यह लक्षण है।
*पुराने जुकाम में खून आना –
 रोगी का जुकाम पुराना हो जाता है। उसके रुमाल में जुकाम का खून लग रहता है तब फास्फोरस 200 की एक मात्रा से लाभ होगा।
*नींद देर में और टूट-टूट कर आती है – 
रोगी को नींद देर में, और टूट-टूट कर आती है। प्रेम के स्वप्न आते है।
*पपोटे सूजना – ऊपर के पपोटों के सूजने में कैलि कार्ब, नीचे के पपोटों के सूजने में एपिस तथा आंखों के ऊपर-नीचे और चेहरे के सूजन में फास्फोरस उपयोगी है।
*नींद के बाद आराम – थोड़ी भी नींद के बाद रोगी को आराम मिलता है। लैकेसिस में नींद के बाद रोग के लक्षण बढ़ जाते हैं।
* वृद्ध-पुरुषों के चक्कर – 
मस्तिष्क के रोग में चक्कर आने तथा वृद्ध-पुरुषों के अनेक प्रकार के चक्करों में यह महौषधि है। दूसरी कोई औषधि चक्कर के इतने लक्षणों पर नहीं घटती
*फास्फोरस का सजीव मूर्त-चित्रण – 
स्नायु-प्रधान, तपेदिक के रोगी जैसा, लम्बा, पतला, चिपटी छाती, जन्म से कमजोर, हड्डियां ऐसी जैसे जल्दी बढ़ गयी हों, जरा-से शारीरिक या मानकिस श्रम से पस्त हो जाने वाला। किसी बात में मन नहीं लगता। चाहता है कि कोई शरीर को दबाता रहे, मालिश कर दे। रक्तहीन लड़के या लड़कियां। सर्दी बर्दाश्त नहीं होती। नमकीन चीजें पसन्द होती हैं। ऐसा है मूर्त-रूप फास्फोरस का।
*शक्ति तथा प्रकृति – फास्फोरस 6, फास्फोरस 30, फास्फोरस 200 (औषधि ‘सर्द’-प्रकृति के लिये है|


Coronavirus के उपचार में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन लेना फायदेमंद या नुकसानदेह ?



इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने बताया है कि कोरोना मरीजों की देखभाल में जुटे डॉक्टरों, या मरीज के साथ रह रहे लोगों में कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) मददगार साबित हो सकती है। आईसीएमआर ने इससे संबंधित एक नोटिफिकेशन भी जारी किया है। वहीं कुछ लोगों को इस बात की गलतफहमी हो गई है कि कोरोना वायरस से निबटने की दवा तैयार कर ली गई है और अब इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। मलेरिया के ईलाज इस्तेमाल होने वाली इस दवा की जनकर कालाबाजारी हो रही है।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की सोच बेहद घातक है क्योंकि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति का उपचार करने के लिए नहीं, बल्कि उसके उपचार में मदद कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों में कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए सुझायी गयी है।
क्या है हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन
दरअसल, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन या क्लोरोक्वीन से मलेरिया के उपचार में इस्तेमाल की जाने वाली दवा है। मलेरिया के मामलों में इसका काफी अच्छा असर होता है। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का बेहतर असर देखते हुए कुछ विशेषज्ञों ने इसे आर्थराइटिस के मरीजों के उपचार में भी इस्तेमाल किया और इसे असरकारी पाया। लेकिन यही दवा कोरोना वायरस संक्रमित व्यक्ति के लिए उपयोगी हो सकती है या नहीं, अभी इसे गारंटी के साथ नहीं कहा जा सकता।
लेकिन मरीजों के उपचार के दौरान स्वास्थ्यकर्मी डॉक्टर-नर्स या मरीज के करीबी जो उनके आसपास रहते हैं, उनमें भी कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका रहती है। इन लोगों में कोरोना का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए ही हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। लेकिन इसे कोरोना से निबटने की दवा नहीं हैं और इस पर अभी परीक्षण चल रहा है।
चर्चा में क्यों आई
दरअसल, पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोरोना के खतरे पर बातचीत करते हुए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की चर्चा कर दी थी। इससे कुछ लोगों में यह संदेश चला गया कि अमेरिका ने कोरोना वायरस का इलाज खोजने में लगभग सफलता हासिल कर ली है। इसके बाद से ही हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन या क्लोरोक्वीन पर खूब चर्चा होने लगी।
बिना सच जाने लोग इसकी कालाबाजारी तक करने लगे और अचानक यह दवा बाजार से गायब हो गई। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह सही जानकारी नहीं है, और बिना डॉक्टरों की विशेष निगरानी में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल किया गया तो यह बेहद नुकसानदेह हो सकती है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
अपोलो हॉस्पिटल दिल्ली में सीनियर कंसलटेंट डॉक्टर एसके पोद्दार ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की दवा केवल डॉक्टरों के निर्देश पर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अपने स्तर पर इसका सेवन बेहद घातक साबित हो सकता है।
कोरोना मरीजों का उपचार कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों या नजदीकी लोगों को भी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन देने के समय विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और क्लोरोक्वीन दोनों ही मलेरिया के उपचार की दवाएं हैं। लेकिन नकारात्मक प्रभावों में कमी होने के कारण विशेषज्ञ क्लोरोक्वीन के डेरेवेटिव हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का ही इस्तेमाल ज्यादा उपयुक्त समझते हैं।
स्वास्थ्यकर्मियों को भी पहले हफ्ते में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की एक गोली (400 mg) सुबह और एक गोली शाम को देनी चाहिए। इसके अगले हफ्ते से लेकर आगे के तीन हफ्तों तक हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की एक-एक गोली तीन हफ्तों तक दी जानी चाहिए।
इस दवा को देने से पहले स्वास्थ्यकर्मी/मरीज के परिवार के व्यक्ति की ईसीजी होनी चाहिए। साथ ही, जब तक दवा चल रही है, बीच-बीच में ईसीजी/शुगर लेवल चेक किया जाना चाहिए। पंद्रह वर्ष से कम आयु के मरीजों को इसे किसी भी हालत में बिल्कुल नहीं दी जानी चाहिए।
क्या है खतरा
अगर कोई व्यक्ति बिना डॉक्टर की सलाह के हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल शुरू करता है, तो इसके गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इस दवा से हार्ट ब्लॉक जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है जो किसी को भारी पड़ सकती है। इसके आलावा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन शुगर लेवल घटा देती है, इसका भी नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है। कुछ मामलों में यह दृष्टि क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है।

ब्रायोनिया (Bryonia) होम्योपैथिक औषधि के लक्षण उपयोग






व्यापक-लक्षण व प्रकृति
लक्षणों में कमी
जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति, धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की जोरों से और एकाएक होती है।
दर्द वाली जगह को दबाने से रोग में कमी होना
हरकत से रोगी की वृद्धि और विश्राम से रोग में कमी
ठडी हवा से आराम
जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी में)
आराम से रोग में कमी
श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना
गठिये में सूजन पर गर्म सेक से और हरकत से रोगी को आराम मिलना
रजोधर्म बन्द होने पर नाक या मुँह से खून गिरना या ऐसा होने से सिर-दर्द होना
लक्षणों में वृद्धि
सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाना
हरकत से रोग बढ़ जाना
क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग
खाने के बाद रोग में वृद्धि
गठिये में गर्मी और हरकत से आराम
क्रोध से वृद्धि
*जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की तेज, जोरों की, और एकाएक होती है – प्राय: लोग जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में एकोनाइट या बेलाडोना दे देते है, और समझते हैं कि उन्होंने ठीक दवा दी। परन्तु चिकित्सक को समझना चाहिये कि जैसे रोग के आने और जाने की गति होती है, वैसे ही औषधि के लक्षणों में भी रोग के आने और जाने की गति होती है। इस गति को ध्यान में रखकर ही औषधि का निर्वाचन करना चाहिये, अन्यथा कुछ लक्षण दूर हो सकते हैं, रोग दूर नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, एकोनाइट का रोगी हिष्ट-पुष्ट होता है, ठंड में जाने से उसे बड़ी जोर का जुकाम, खांसी या बुखार चढ़ जाता है। शाम को सैर को निकला और आधी रात को ही तेज बुखार चढ़ गया। बेलाडोना में भी ऐसा ही पाया जाता है, परन्तु उसमें सिर-दर्द आदि मस्तिष्क के लक्षण विशेष होते हैं। ब्रायोनिया में ऐसा नहीं होता। रोगी ठंड खा गया, तो उसके लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होंगे। पहले दिन कुछ छींके आयेंगी, दूसरे दिन नाक बहने लगेगा, तीसरे दिन बुखार चढ़ जायगा। बुखार, जैसे धीरे-धीरे आय वैसे धीरे-धीरे ही जायेगा। इसीलिये टाइफॉयड में एकोनाइट या बेलाडोना नहीं दिया जाता, उसके लक्षण ब्रायोनिया से मिलते हैं। औषधि देते हुए औषधि की गति और प्रकृति को समझ लेना जरूरी है। रोग के लक्षणों और औषधि की गति तथा प्रकृति के लक्षणों में साम्य होना जरूरी है, तभी औषधि लाभ करेगी। रोग दो तरह के हो सकते हैं-स्थायी तथा अस्थायी। स्थायी-रोग में स्थायी-प्रकृति की औषधि ही लाभ करेगी, अस्थायी-रोग में अस्थायी-प्रकृति की औषधि लाभ करेगी। एकोनाइट और बेलाडोना के रोग तेजी से और एकाएक आते हैं, और एकाएक ही चले जाते हैं। ऐसे रोगों में ही ये दवायें लाभप्रद हैं। ब्रायोनिया, पल्सेटिला के रोग शनै: शनै: आते हैं, और कुछ दिन टिकते हैं। इसलिये शनै: शनै: आनेवाले और कुछ दिन टिकने वाले रोगों में इन दवाओं की तरफ ध्यान जाना चाहिये। थूजा, साइलीशिया, सल्फर आदि के रोग स्थायी-प्रकृति के होते हैं, अत: चिर-स्थायी रोगों के इलाज के लिये इन औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। इसीलिये जब रोग बार-बार अच्छा हो-हो कर लौटता है तब समझना चाहिये कि यह स्थायी-रोग है, तब एकोनाइट से लाभ नहीं होगा, तब सल्फर आदि देना होगा क्योंकि एकोनाइट की प्रकृति ‘अस्थायी’ (Acute) है, और सल्फर की प्रकृति ‘स्थायी’ (Chronic) है।
*हरकत से रोग की वृद्धि और विश्राम से कमी –
दर्द होने पर हरकत से रोग बढ़ेगा इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु हरकत से रोग बढ़ने का गूढ़ अर्थ है। अगर रोगी लेटा हुआ है, तो आंख खोलने या आवाज सुनने तक से रोगी कष्ट अनुभव करता है। डॉ० मुकर्जी ने अपने ‘मैटीरिया मैडिका’ में स्वर्गीय डॉ० नाग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उन्होंने हैजे के एक रोगी को यह देखकर कि आंखें खोलने से ही उसे पाखाना होता था, ब्रायोनिया देकर ठीक कर दिया। वात-रोग, गठिया, सूजन, गिर जाने से दर्द आदि में हरकत से रोग की वृद्धि होने पर ब्रायोनिया लाभ करता है। इस प्रकार के कष्ट में आर्निका से लाभ न होने पर ब्रायोनिया से लाभ हो जाता है। ब्रायोनिया में हरकत से रोग की वृद्धि होती है-इस लक्षण को खूब समझ लेना चाहिये। अगर किसी व्यक्ति को ठंड लग गई है, रोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा है, एक दिन छीकें, दूसरे दिन शरीर में पीड़ा तीसरे दिन बुखार-इस प्रकार रोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा है, और वह साथ ही यह भी अनुभव करने लगता है कि वह बिस्तर में आराम से, शान्तिपूर्वक पड़े रहना पसन्द करता है; न्यूमोनिया, प्लुरिसी का दर्द शुरू नहीं हुआ, परन्तु वह देखता है कि रोग की शुरूआत से पहले ही उसकी तबीयत आराम चाहती है, हिलने-डुलने से उसका रोग बढ़ता है; ऐसी हालत में ब्रायोनिया ही दवा है। दायें फफड़े के न्यूमोनिया में उक्त-लक्षण होने पर ब्रायोनिया और बांये फफड़े के न्यूमोनिया में उक्त-लक्षण होने पर एकोनाइट फायदा करता है।
*यह तो ठीक है कि ब्रायोनिया में हरकत से रोग की वृद्धि होती है, परन्तु कभी-कभी ब्रायोनिया का रोगी दर्द से इतना परेशान हो जाता है कि चैन से लेट भी नहीं सकता। वह उठकर घूमना-फिरना नहीं चाहता, परन्तु दर्द इतना प्रबल होता है कि पड़े रहने में भी उसे चैन नहीं मिलता। शुरू-शुरू में वह चैन से पड़े रहना चाहता था, परन्तु अब तकलीफ़ इतनी बढ़ गई है कि न चाहते हुए भी इधर-उधर टहलने लगता है। इस हालत में चिकित्सक रस टॉक्स देने की सोच सकता है, परन्तु इस बेचैनी से टहलने में जिसमें रोग की शुरूआत में रोगी टहल नहीं सकता था, जिसमें अब भी दिल तो उसका आराम से लेटने को चाहता है, परन्तु दर्द लेटने नहीं देता, ऐसी हालत में हिलने-डुलने पर भी ब्रायोनिया ही दवा है। रोग का उपचार करते हुए रोग की समष्टि को ध्यान में रखना चाहिये, सामने जो लक्षण आ रहे हैं उनके पीछे छिपे लक्षणों को भी आँख से ओझल नहीं होने देना चाहिये।
* जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी) –
 यह लक्षण हरकत से रोग-वृद्धि के लक्षण का ही दूसरा रूप है। जिधर दर्द हो उधर का हिस्सा दबा रखने से वहां हरकत नहीं होती इसलिये दर्द की तरफ लेटे रहने से रोगी को आराम मिलता है। प्लुरिसी में जिधर दर्द हो उधर लेटने से आराम मिले तो ब्रायोनिया लाभ करेगा। प्लुरिसी में ब्रायोनिया इसलिये लाभ करता है क्योंकि फेफड़े के आवरण में जो शोथ हो जाती है, वह सांस लेते हुए जब साथ के आवरण को छूती है, तब इस छूने से दर्द होता है, परन्तु उस हिस्से को दबाये रखने से यह छूना बन्द हो जाता है, इसलिये कहते हैं कि ब्रायोनिया में जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटने से आराम मिलता है। असल में, यह लक्षण ‘हरकत से रोग की वृद्धि’ – इस लक्षण का ही दूसरा रूप है। जब दर्द का हिस्सा दब जाता है तब हरकत बन्द हो जाती है।
डॉ० बर्नेट प्रसिद्ध होम्योपैथ हुए हैं। वे पहले एलोपैथ थे। उन्हें होम्योपैथ बनाने का श्रेय ब्रायोनिया की है। वे लिखते हैं कि बचपन में उन्हें बायीं तरफ प्लुरिसी हो गई थी जिससे नीरोग होने पर भी उन्हें फेफड़े में दर्द बना रहा। सभी तरह के इलाज कराये-एलोपैथी के, जल-चिकित्सा के, भिन्न-भिन्न प्रकार के फलाहार के, भोजन में अदला-बदली के, परन्तु किसी से रोग ठीक न हुआ। अन्त में यह देखने के लिये कि होम्योपैथ इसके विषय में क्या कहते हैं, वे होम्योपैथी पढ़ने लगे। पढ़ते-पढ़ते ब्रायोनिया में उन्हें अपने लक्षण मिलते दिखाई दिये। उन्होंने ब्रायोनिया खरीद कर उसका अपने ऊपर प्रयोग किया और जो कष्ट सालों से उन्हें परेशान कर रहा था, जो किसी प्रकार के इलाज से ठीक नहीं हो रहा था, वह 15 दिन में ब्रायोनिया से ठीक हो गया। यह अनेक कारणों में से एक कारण है जिसने उन्हें एलोपैथ से होम्योपैथ बना दिया।
* श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना –
खुश्की के कारण रोगी के होंठ सूख जाते हैं, खुश्की के कारण वे चिटक जाते हैं, खून तक निकलने लगता है। एरम ट्रिफि में हम देख आये हैं कि होठों और नाक की खुश्की इस कदर बढ़ जाती है कि रोगी उन्हें नोचता-नोचता खून तक निकाल देता है। नाक में अंगुली घुसेड़ता जाता है। ब्रायोनिया में इसी खुश्की के कारण उसे प्यास बहुत लगती है। देर-देर में पानी पीता है परन्तु अधिक मात्रा में पीता है। एकोनाइट में जल्दी-जल्दी, ज्यादा-ज्यादा; आर्सेनिक में जल्दी-जल्दी थोड़ा-थोड़ा; ब्रायोनिया में दिन-रात देर-देर में ज्यादा-ज्यादा ठंडा पानी पीता है। नक्स मौस्केटा और पल्स में प्यास नहीं रहती।
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की और कब्ज – 
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की का असर आंतों पर भी पड़ता है। रोगी को कब्ज रहती है। सूखा, सख्त, भुना हुआ-सा मल आता है। बहुत दिनों में टट्टी जाता है। सख्त मल को तर करने के लिये पेट में श्लेष्मा का नामोनिशान तक नहीं होता। अगर पेट में से म्यूकस निकलता भी है तो टट्टी से अलग, टट्टी खुश्क ही रहती है। भयंकर कब्ज को यह ठीक कर देता है।
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की और खुश्क खांसी –
श्लैष्मिक-झिल्ली की शुष्कता का असर फफड़ों पर भी पड़ता है। खांसते-खांसते गला फटने-सा लगता है, परन्तु कफ भीतर से नहीं निकलता। ठंड से गरम कमरे में जाने से खांसी बढ़ने में ब्रायोनिया और गरम कमरे से ठंडे कमरे में जाने से खांसी बढ़े तो फॉसफोरस या रुमेक्स ठीक हैं। ब्रायोनिया की शिकायतें प्राय: नाक से शुरू होती हैं। पहले दिन छीकें, जुकाम, नाक से पानी बहना, आंखों से पानी, आंखों में और सिर में दर्द। इसके बाद अगले दिन शिकायत आगे बढ़ती है, तालु में गले में, श्वास प्रणालिका में तकलीफ बढ़ जाती है। अगर इस प्रक्रिया को रोक न दिया जाय, तो प्लुरिसी, न्यूमोनिया तक शिकायत पहुंच जाती है। इन सब शिकायतों में रोगी हरकत से दु:ख मानता है, आराम से पड़े रहना चाहता है। श्वास-प्रणालिका की शिकायतों-जुकाम, खांसी, गला बैठना, गायकों की आवाज का पड़ जाना, गले में टेटवे का दर्द आदि-में इस औषधि पर विचार करना चाहिये।
*रजोधर्म बन्द होने के बाद नाक या मुँह से खून गिरना या सिर-दर्द –
यह ब्रायोनिया का विश्वसनीय लक्षण है। अगर रोगिणी नाक या मुँह से खून निकलने की शिकायत करे, तो उसे यह पूछ लेना चाहिये कि उसका रजोधर्म तो बन्द नहीं हो गया। मासिक बन्द होने से भी सिर-दर्द हो जाया करता है।
*सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना, सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाना – 
कब्ज़ होने से भी सिर-दर्द शुरू हो जाता है। इस सिर-दर्द का लक्षण यह है कि यह सूर्योदय के साथ शुरू होता है, सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाता है। इसके साथ ब्रायोनिया के अन्य लक्षण भी रह सकते हैं, यथा हिलने-डुलने से सिर-दर्द का
बढ़ना, आँख खुलते ही बढ़ना।
सिर-दर्द में ब्रायोनिया और बेलाडोना की तुलना –
सूर्योदय के साथ संबंध न होने पर भी ब्रायोनिया में सिर-दर्द हो सकता है। प्रत्येक अस्थायी-रोग में सिर-दर्द उसके साथ जुड़ा ही रहता है। इतना सिर-दर्द होता है कि सिर को दबाने से ही आराम आता है। ब्रायोनिया के सिर-दर्द में रोगी को गर्मी सहन नहीं होती। हरकत से सिर-दर्द बढ़ता है, आँख झपकने तक से सिर में पीड़ा होती है। इस सिर-दर्द का कारण सिर में रक्त-संचय है। बेलाडोना में भी सिर में रक्त-संचय के कारण सिर-दर्द होता है, परन्तु दोनों में अन्तर यह है कि बेलाडोना का सिर-दर्द आधी-तूफान की तरह आता है, यकायक आता है, ब्रायोनिया का सिर-दर्द धीरे-धीरे आता है, उसकी चाल मध्यम और धीमी होती है। दोनों औषधियों की यह प्रकृति है – एकदम आना बेलाडोना की, और धीमे-धीमे आना ब्रायोनिया की प्रकृति है।
*गठिये के रोग में गर्मी और हरकत से आराम –
ब्रायोनिया का उपयोग गठिये में भी होता है। ब्रायोनिया का रोगी ठंडी हवा पसन्द करता है, ठंडा कपड़ा ओढ़ना चाहता है, परन्तु गठिये के दर्द में अपनी प्रकृति के विरुद्ध उसे गर्मी से आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यद्यपि ब्रायोनिया में रोगी आराम से लेटे रहना चाहता है, तो भी गठिये के रोग में वह चलने-फिरने से ही ठीक रहता है क्योंकि इस प्रकार उसके दुखते अंगों को गति से गर्मी मिलती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि ब्रायोनिया में परस्पर-विरुद्ध प्रकृतियां काम कर रही हैं। वह प्रकृति से ऊष्णता-प्रधान है परन्तु गठिये में उसे गर्मी पसन्द है, यह होते हुए भी उसकी आधारभूत प्रकृति ऊष्णता-प्रधान ही रहती है। गठिया ठीक होने पर आँख में दर्द-अगर यह देखा जाय कि जिस अंग में गठिये का दर्द था वह तो ठीक हो गया, परन्तु आंख में दर्द शुरू हो गया, आंख लाल हो गई, सूज गई, उसमें से रुधिर आने लगा, तब ब्रायोनिया से यह ठीक होगा।
* क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग की उत्पत्ति –
ब्रायोनिया में अनेक मानसिक-लक्षण हैं। बच्चा क्रोध करता है और जो वस्तु मिल नहीं सकती उसे फौरन चाहता है और दिये जाने पर उसे परे फेंक देता है; तरह-तरह की चीजों के लिये जिद करता और दे दी जायें तो लेने से इन्कार करता है; घर में होने पर भी कहता है-घर में जाऊंगा, उसे ऐसा गलता है कि वह घर में नहीं है। बड़ा आदमी अपने रोजगार की बातें अंटसंट बका करता है। ये लक्षण मानसिक रोग में, डिलीरियम आदि में प्रकट होते हैं। क्रोध से उत्पन्न मानसिक-लक्षणों में स्टैफ़िसैग्रिया भी उपयोगी है। अगर रोगी कहे: डाक्टर, अगर मेरा किसी से झगड़ा हो जाय, तो मैं इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि सिर-दर्द होने लगता है, नींद नहीं आती, तो ऐसे रोगी को स्टैफिसैग्रिया ठीक कर देगा।
हरकत से दस्त आना परन्तु रात को दस्त न होना 
जब तक रोगी रात को लेटा रहता है दस्त नहीं आता, परन्तु सवेरे बिस्तर से हिलते ही उसे बाथरूम में दौड़ना पड़ता है। पेट फूला रहता है, दर्द होता है और टट्टी जाने की एकदम हाजत होती है। बड़ा भारी दस्त आता है, एक बार ही नहीं, कई बार आ जाता है, और जब रोगी टट्टी से निबट लेता है तब शक्तिहीन होकर मृत-समान पड़ा रहता है, थकावट से शरीर पर पसीना आ जाता है। अगर लेटे-लेटे जरा भी हरकत करे, तो फिर बाथरूम के लिये दौड़ना पड़ता है। जो दस्त दिन में कई बार आयें और रात को जब मनुष्य हरकत नही करता बन्द हो जायें, उन्हें यह दवा ठीक कर देती है। पैट्रोलियम में रोगी रात को कितनी भी हरकत क्यों न करे उसे दस्त नहीं होता, सिर्फ दिन की दस्त होता है, रात को नहीं होता; ब्रायोनिया में दिन को दस्त होता है, रात को जरा-सी भी हरकत करे तो दस्त की हाजत हो जाती है, अन्यथा रात को दस्त नहीं होता।
ब्रायोनिया औषधि के अन्य लक्षण
*नौ बजे रोग की वृद्धि – 
ब्रायोनिया के ज्वर के लक्षण 9 बजे शाम को बढ़ जाते हैं। 9 बजे ज्वर आयेगा या सर्दी लगनी शुरू हो जायगी। कैमोमिला के लक्षण 9 बजे प्रात: बढ़ जाते हैं।
*रोगी खुली हवा चाहता है – 
ब्रायोनिया का रोगी एपिस और पल्स की तरह दरवाजे-खिड़कियां खुली रखना पसन्द करता है। बन्द कमरा उसे घुटा-घुटा लगता है। बन्द कमरे में उसकी तकलीफें बढ़ जाती है। खुली हवा उसे रुचती है।
* खाने के बाद रोग वृद्धि – 
खाने के बाद रोग बढ़ जाना इसका व्यापक लक्षण है। रोगी कहता है कि खाना खाने के बाद तबीयत गिर जाती है।
*दांत के दर्द में दबाने और ठंडे पानी से लाभ –
 दांत के दर्द में मुँह में ठंडे पानी से लाभ होता है क्योंकि ब्रायोनिया ठंड पसन्द करने वाली दवा है। जिधर दर्द हो उधर लेटने पर दर्द वाली जगह को दबाने से आराम मिलता है। यह भी ब्रायोनिया का चरित्रगत-लक्षण है। होम्योपैथी में रोग तथा औषधि की प्रकृति को जान कर उनका मिलान करने से ही ठीक औषधि का निर्वाचन हो सकता है। ठंडे पानी से और दर्द वाले दांत को दबाने से रोग बढ़ना चाहिये था, परन्तु क्योंकि ब्रायोनिया में ठंड से और दर्द वाली जगह को दबाने से आराम होना इसका ‘व्यापक-लक्षण’ (General symptom) है, इसलिये ऐसी शिकायत में ब्रायोनिया से लाभ होता है।
*गर्म-शरीर में शीत से रोग में वृद्धि –
 शरीर गर्म हो जाने पर ठंडा पानी पीने, या उसमें स्नान से रोग बढ़ जाता है। यद्यपि ब्रायोनिया के रोगी को ठंड पसन्द है, ठंडा पानी उसे रुचता है, परन्तु अगर वह गर्मी से आ रहा है, शरीर गर्म हो रहा है, तब ठंडा पानी पीने या ठंडे स्नान से उसे गठिये का दर्द बढ़ जायगा। अगर उसे खांसी होगी या सिर-दर्द होता होगा, वह बढ़ जायगा, या हो जायगा। शरीर के गर्म रहने पर ठडा पानी पीने से जोर का सिर-दर्द हो जायगा। ब्रायोनिया की तरह रस टॉक्स में भी शरीर हो, तो ठडे जल से सिर-दर्द आदि तकलीफ भयंकर रूप धारण कर लेंगी। अगर शरीर की गर्मी की हालत में ठंडा पानी पी लिया जायगा, तो पेट की भी शिकायत पैदा हो सकती है जिसमें ब्रायोनिया लाभ करेगा।
शक्ति तथा प्रकृति – 6, 30, 200 (औषधि ‘गर्म’-Hot-प्रकृति को लिये है)

सूंघने की क्षमता बढ़ाने के उपचार

                                                      
      आपके अपने सूंघने की शक्ति को बढ़ाने के कई कारण हो सकते हैं। एक कारण यह भी है कि यह स्वाद लेने वाली इन्द्रिय से काफी नजदीकी से जुड़ा है। अपनी नाक को दबाकर खाने को चखने की कोशिश करें। यह एक ज़रूरी हुनर है जो शराब, कॉफ़ी, बियर और चाय की सुगंध का वर्णन करने में मदद करती है। सामान्य रूप से अगर आप एक फूल की सुगंध में जटिलता को सूंघ पा रहे हैं तो यह एक गहरा आनंद देता है।
एक औसत इंसान की नाक तकरीबन 10,000 अलग प्रकार की गंध को पहचान सकती है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, आपकी यह शक्ति कमजोर होने लगती हैं। आइए हम आपको बताते हैं कि सूंघने की क्षमता को कैसे बढ़ाया जाये।

*सूंघने की क्षमता बढ़ाने के उपाय-

क्या आप जानते हैं कि एक औसत इंसान की नाक तकरीबन 10,000 अलग प्रकार की गंध को पहचान सकती है? और सामान्य रूप से अगर आप एक फूल की सुगंध में जटिलता को सूंघ पा रहे हैं तो यह एक गहरा आनंद देता है। वैसे तो सूंघने की शक्ति बढ़ाने के कई कारण हो सकते हैं, लेकिन सबसे अहम कारण यह है कि यह स्‍वाद लेने वाली इंद्रियों से काफी नजदीक से जुड़ा होता है। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, आपकी यह शक्ति कमजोर होने लगती हैं। आइए हम आपको बताते हैं कि सूंघने की क्षमता को कैसे बढ़ाया जाये।
आप जिस चीज़ को सूंघ पा रहे हैं उसपर ज्यादा ध्यान दें। लोग अक्सर मांसपेशियों के विषय में कहते हैं "इस्तमाल में लाओ या गंवाओ", पर यही बात इन्द्रियों के लिए भी सच साबित होती है। अधिक अभ्यास के लिए अपने आँखों में पट्टी बाँध कर, किसी को अपनी नाक के पास अलग अलग चीज़ों को लाने के लिए कहें और देखें कि आप उस चीज़ को पहचान पाते हैं या नहीं|

बलगम निर्माण वाले आहार से परहेज-

*क्‍या आपने इस बात को नोटिस किया है कि जुकाम में आपके सूंघने की क्षमता बहुत कम हो जाती है। नाक के झिल्ली में सकुंचन के कारण गंध पकड़ने वाली नसें कमजोर हो जाती है। इसलिए सूंघने के क्षमता को बढ़ाने के लिए आपको ऐसे भोजन से परहेज करना चाहिए जो अधिक बलगम का निर्माण करते हैं। ऐसा खाना जो घुटन को बढ़ावा देता है जैसे दूध, पनीर, दही और आइसक्रीम ऐसी स्थिति में छोड़ने से आपको काफी मदद मिल सकती है। 
*महक की समस्या को कैस्टर ऑयल की मदद से दूर किया जा सकता है। इसमें मौजूद एंटीइंफ्लेमेट्री, एंटीऑक्सीडेंट और एंटीमाइक्रोबियल गुण होते हैं जो नाक को साफ करने में मदद करते है। इसका इस्तेमाल करने के लिए रोज सुबह और रात को सोने से पहले कैस्टर ऑयल को दोनों नॉस्ट्रिल में लगाएं।

*कुछ विशेष गंध से आपको कैसा महसूस होता है-

सूंघने की क्षमता को बढ़ाने के लिए आपको इस बात पर भी ध्‍यान देना होगा कि कुछ विशेष गंध आपको कैसा महसूस कराती हैं। जो नर्व गंध का अनुभव कराती है वह दिमाग के भावनात्‍मक हिस्‍से से सीधे तौर पर जुड़ी होती है, और यह आपके समझदारी को बाहर छोड़ देती है। अध्‍ययन के अनुसार, उदाहरण के लिए जहां एक फास्ट फूड के रैपर, ताजा रोटी या पेस्ट्री की गंध आपकी लालसा को जगा देती है, वहीं दूसरी ओर, पुदीना और दालचीनी एकाग्रता में सुधार और चिड़चिड़ापन दूर करने में मदद करती है और नींबू और कॉफी सामान्य रूप में स्पष्ट सोच और उच्च एकाग्रता के स्तर को बढ़ावा देने में मदद करती है।

*जिंक का सेवन करें-

ज्यादा से ज्यादा ज़िंक अपने खाने में शुमार करने की कोशिश करें। हायपोस्मिया नामक बीमारी ज़िंक की कमी से होती है। अपने सूंघने की शक्ति बढ़ाने के लिए, ऐसा खाना खाएं जिसमें ज़िंक की मात्रा पर्याप्त हो (जैसे घोंघा, मसूर दाल, सूरजमुखी के बीज और पीकन) और साथ में रोज़ मल्टी विटामिन टेबलेट्स लें जिसमें 7 मिलीग्राम जिंक हो।
*गंध को लहसुन की मदद से वापिस लाया जा सकता है। यह नाक को साफ करके बंद हुए नाक के मार्ग को खोलता है। इसके लिए आपको 2-3 लहसुन की कलियों की जरुरत होती है। इसे एक कप पानी में अच्छी तरह उबाल लें। जब एक बार यह उबल जाए तो इससे 10 मिनट तक भाप लें। या आप इस पानी को गर्म-गर्म पी सकते हैं। इस तरह से दिन में 2-3 बार करें

*दुर्गन्ध से दूर रहे-

सूंघने की क्षमता को बढ़ाने के लिए आप गंदी बदबू से बचने की कोशिश करें। क्‍योंकि काफी देर तक गन्दी बदबू सूंघने से भी आपकी सूंघने की क्षमता पर असर पड़ सकता है। और वह धीरे-धीरे कम होने लगती है।

एक्‍सरसाइज करें-

फिट रहने के लिए एक्‍सरसाइज करने के लिए कहा जाता है। लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि इससे हमारी सूंघने की क्षमता भी बढ़ती है। अध्ययन भी बताते हैं कि हमारी सूंघने की शक्ति एक्‍सरसाइज करने के बाद और तेज  हो जाती है। इसलिए अब आपको एक्‍सरसाइज द्वारा फिट रहने का एक और कारण मिल गया।
चीजों को धीरे-धीरे सूंघें
*जब आप किसी गंध को पहचानने की कोशिश कर रहे हों तो एक बार में गंध को अन्दर लेने से अच्छा है कि इसे धीरे-धीरे और छोटी मात्रा में लें। ऐसा करने से आपकी सूंघने की क्षमता बढ़ेगी। आपने देखा होगा कि कुत्ते भी कुछ सूंघते समय ऐसा ही करते हैं। इसलिए कहा जाता है कि कुत्‍ते की सूंघने की क्षमता बहुत अधिक होती है।
सूंघने की क्षमता को प्रभावित करने वाली चीजों से बचें
*अदरक आपके स्वाद की तंत्रिका को सक्रिय करने और गंध की क्षमता को उत्तेजित करता है। आप इस समस्या को रोजाना अदरक खाकर या अदरक की चाय पीकर दूर कर सकते हैं
*ऐसी चीजों से बचें जो आपकी सूंघने की क्षमता को कम करने में योगदान देते हैं। कुछ ठंडे इलाज आपकी सूंघने की क्षमता को कम कर सकते हैं। इसके साथ ही धूम्रपान और शराब भी आपकी सूंघने की क्षमता को प्रभावित करता है। इसलिए कम से कम शराब पीयें क्योंकि अगर आपके खून में अल्कोहल की मात्रा बढ़ने से आपके सूंघने की क्षमता कम हो सकती है।
*नींबू में मौजूद सिट्रस फ्लेवर स्वाद और गंध को पुन: प्राप्त करने में मदद करता है। नींबू में उच्च मात्रा में विटामिन सी होता है जो शरीर को इंफेक्शन से बचाकर इम्यूनिटी बूस्ट करने में मदद करता है। इसके लिए एक नींबू के जूस में 2 चम्मच शहद मिलाकर इसे गर्म पानी में मिलाकर दिन में 2 बार पिएं। या आप खाने के साथ नींबू का सेवन भी कर सकते हैं।
*जब आप खाने की खरीददारी कर रहे हों तो ध्यान रखें कि सबसे अच्छी खुशबू वाली चीज़ वही होंगी जिसकी ज़रुरत आपके शरीर को होगी। इसलिए जो खाना सबसे अच्छी खुशबू दे रहा हो उसे चुन लें। दवाइयों और विटामिन बोतल को सूंघ कर भी आप पता लगा सकते हैं कि किसकी खुशबू बेहतर है और कौन सी दवाई या विटामिन की ज़रुरत आपके शरीर को है।

मुनक्का कई रोगों मे फायदे मंद औषधि



आयुर्वेद में तो मुनक्का को औषधीय गुणों से भरपूर बताया गया है। इसकी प्रकृति या तासीर गर्म होती है। यह कई रोगों में दवाई के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।
कब्ज में राहत
यदि किसी को कब्ज की समस्या है तो उसके लिए शाम के समय 10 मुनक्कों को साफ धोकर एक गिलास दूध में उबाल लें, फिर रात को सोते समय इसके बीज निकल दें और मुनक्के खा लें तथा ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस प्रयोग को नियमित करने से लाभ मिलेगा। 
मुंह के रोग से आराम
मुनक्के में मौजूद ओलेक्रोलिक एसिड और फाइटोकेमिकल्स मुंह और दांतों को सुरक्षित रखते हैं और आपके दांतों के क्षय और कैविटी का डर भी दूर होता है। मुनक्के मेें भरपूर मात्रा में कैल्शियम भी होता है, साथ ही यह दांतों में बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकता है। इसके अलावा मुनक्के में मौजूद बोरान मुंह में रोगाणु के निर्माण को कम करता है।
बढ़ता है खून
रात को सोने से पहले 10 मुनक्का पानी में भिगोकर रख दें। सुबह इन्हें दूध के साथ उबाल लें और हल्का ठंडा करके पियें। इसके नियमित सेवन से खून बढ़ता है। अगर आप इसे दूध के साथ नहीं लेना चाहते तो अच्छे से चबा-चबाकर खायें। 



हड्डियों के लिए फायेदमंद
मुनक्के में कैल्शियम भरपूर मात्रा में पाया जाता हैं, जिस कारण मुनक्का खाने से आपकी हड्डियां मजबूत बनती हैं। यह आपको गठिया, ऑस्टियोपोरोसिस जैसी समस्याओं से बचने में सहायता करता है।
वजन बढ़ाने में
हर मेवे की तरह मुनक्का भी वजन बढ़ाने में मदद करता है क्योंकि इसमे फ्रुक्टोज़ और ग्लूकोस पाया जाता है जो हमें एनर्जी प्रदान करता है. 10 मुनक्का 5 छुहारे को सुबह शाम दूध में उबाल कर इस का सेवन करें, आप का वजन बढ़ना शुरू हो जायेगा
गठिया जैसी बीमारी होगी दूर
मुनक्के में पोटेशियम और मैग्नीशियम भरपूर मात्रा में होता है। यह अम्लता को कम करने और सिस्टम से विषाक्त पदार्थों को दूर कर किडनी स्टोन, दिल की बीमारियों और गाठिया जैसी बीमारियों को दूर करने में मदद करता है।
सर्दी-जुकाम होने पर
सर्दी-जुकाम हो जाए तो रात को सोने से पहले दूध में 2-3 मुनक्के उबाल कर सेवन करें। यदि सर्दी-जुकाम पुराना हो गया है तो सप्ताह भर यह दूध पीते रहें। सर्दी-जुकाम होने पर सात मुनक्का रात्रि में सोने से पूर्व बीज निकालकर दूध में उबालकर लें।



बुखार में
मुनक्का में मौजूद फिनोलिक पायथोन्यूट्रिएंट, जर्मीशिडल और एंटीऑक्सीडेंट तत्वों की वजह से जाने जाते हैं. यह जीवाणु संक्रमण और वायरल से लड़कर बुखार को जल्दी ठीक करने में मदद करते हैं. रात को 10 मुनक्का और अंजीर को पानी में भिगोकर रख दें. सुबह एक गिलास दूध में इसे उबाल लें.
आंखों के लिए
आंखों के लिए भी मुनक्का बेहद फायदेमंद होता है। इसमें बीटा कैरोटीन मौजूद होता है। इसका रोज सेवन करने से आंखों की रोशनी तेज होती है। मुनक्का को रात में भिगो कर रख दें और सुबह उठकर इसका सेवन करें। 
दूर करे एनीमिया
मुनक्के में मौजूद आयरन और साथ ही बी कॉम्लेक्स विटामिन एनीमिया के इलाज में मददगार साबित होते हैं। मुनक्के में मौजूद कॉपर लाल रक्त कोशिकाओं के उत्पादन में मदद करता है।
यौन दुर्बलता में
मुनक्का कामेच्छा को बढ़ाता है. मुनक्का में मौजूद एमिनो एसिड यौन दुर्बलता को दूर करता है. इस लिए तो शादी शुदा लोगों को पहली रात दूध का गिलास दिया जाता है जिसमें मुनक्का और केसर मिला होता है.
मुनक्का के कुछ अन्य फायदे
* फेफड़ों के रोग में मुनक्का के ताजे और साफ 15 दानों को पानी में साफ करके रात में 150 मिलीलीटर पानी में भिगो दें। सुबह बीज निकालकर उन्हें 1-1 करके खूब चबा-चबाकर खा लें। बचे हुए पानी में थोड़ी सी चीनी मिलाकर या बिना चीनी मिलाएं ही पी लें। इसे लगतार एक महीने तक सेवन करने से फेफड़ों की कमजोरी और विषैले पदार्थ नष्ट हो जाते हैं।
* पानी में मुनक्का के 8 से 10 दाने रात को भिगोकर रख दें। सुबह मुनक्का फूल जाने पर इसे चबा-चबाकर खायें। रोज सुबह इसको खाने से मुंह के छाले व जख्म ठीक हो जाते हैं।
* महिलाओं को मासिक धर्म की वजह से खून की कमी हो जाती है। उनके लिए मुनक्का बहुत ही ज्यादा फायदेमंद होता है, क्योंकि मुनक्का आयरन का मुख्य स्रोत है और मुनक्का खाने से शरीर में हीमोग्लोबिन की मात्रा भी बढ़ती है।
* जिन बच्चों को रात में बिस्तर में पेशाब करने की समस्या होती है, उन्हें 2 मुनक्के के बीज रात को एक हफ्ते तक खिलाने से वे रात को बिस्तर गीला नहीं करते।
* इसमें पोटेशियम की मात्रा अधिक होती है। यह हार्ट अटैक की बीमारियों से भी बचाने में मदद करता है।
* इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स मौजूद होते हैं। यह कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों से बचाने में भी मदद करता है।
* मुनक्के का पानी हमारे शरीर में मौजूद टॉक्सिन निकालकर उसे डिटॉक्स करता है, जिससे स्किन स्वस्थ और चमकदार बनती है।

हिस्टीरिया के कारण ,लक्षण और उपचार



हिस्टीरिया रोग जो है वो अमूमन अविवाहित लड़कियों और स्त्रियों को होता है और इसके होने के पीछे कई मनोवैज्ञानिक कारण भी है | हिस्टीरिया रोग होने पर रोगी को मिर्गी के समान दौरे पढ़ते है और यह काफी तकलीफदेह भी होता है | इसलिए इसके कारण और उपचार से जुडी जानकारी हम आपसे शेयर कर रहे है चलिए इस बारे में बात करते है |
आयुर्वेद में इसे ‘योषापस्मार’ के नाम से जाना जाता है। योषा शब्द स्त्रीवाचक है और अपस्मार मिर्गी का घोतक। यह रोग अविवाहित स्त्रियों को अधिक होता है। इस रोग में मिर्गी के समान दौरे पड़ते हैं।

हिस्टीरिया के कारण

हिस्टीरिया के प्रमुख कारणों में पर पुरुष से बलात्कार के कारण उत्पन्न खौफ, प्रेम में असफलता, काम वासना में अतृप्ति, प्रेमी से बिछुड़ना, शारीरिक मानसिक परिश्रम न कर आराम तलब जिंदगी गुजारना, अत्यंत भोग-विलास में जीवन व्यतीत करना, अश्लील साहित्य पढ़ना, उत्तेजक फिल्में देखना, श्वेत प्रदर से लंबे समय तक पीड़ित रहना, बांझपन, डिंबाशय व जरायु रोग, नाड़ियों की कमजोरी, आकस्मिक मानसिक आघात, मासिक धर्म का रुकना, कष्टपूर्ण मासिक धर्म, सास-बहू आदि परिवार के सदस्यों से तालमेल न बैठना, सामाजिक एवं पारिवारिक बंधनो में बांधना, चिंता, भय, शोक, मानसिक तनाव, अत्यधिक भावुक प्रकृति का होना, पति का वृद्ध, छोटा, बीमार होना या अन्य स्त्री से प्रेम का चक्कर, लम्बे समय तक पति से दूर रहना, संभोग करने का मौका न मिलना, जवानी बीत जाने पर भी विवाह न होना, असुरक्षा की भावना, बुद्धि की कमी, किसी गुप्त पाप को मन में दबाये रखना आदि होते हैं।

हिस्टीरिया के लक्षण

इस रोग के लक्षणों में रोगिणी को दौरा पड़ने से पूर्व आभास होने लगता है, लेकिन जब दौरा पड़ जाता है, तो उसे कुछ ज्ञान नहीं रहता। बेहोशी का दौरा 24 से 48 घंटों तक रह सकता है। मूर्च्छावस्था के दौरान ही झटके आते हैं, गले की मांसपेशियां जकड़ जाती हैं, मुट्ठी बंध जाती हैं, दांत भिंच जाते हैं, कंपकंपी होती है, श्वास लेने में तकलीफ होती है, सांस रूकती सी लगती है, पेट फूल जाता है, स्मृति का लोप हो जाता है, बहुत ज्यादा मात्रा में पेशाब होता है। इसके अलावा किसी किसी रोगी में हाथ-पैर पटकना, सांसे तेज चलना, ह्रदय की धड़कन अधिक बढ़ जाना, भयंकर सिर दर्द, बेचैनी, असंभव बातें बोलना, कभी रोना, कभी हंसना, कभी गाना, उलटी करना, आँखें नचाना, बाल और शरीर नोंचना आदि लक्षण भी देखने को मिलते हैं।

हिस्टीरिया में क्या खाएं

हिस्टीरिया का इलाज और रोकथाम खान पान को संतुलित करने से भी संभव है और रोगी अपनी खानपान की आदतों में बदलाव कर इसे संयमित कर सकती है |गेहूं की रोटी, पुराना चावल, दलिया, मूंग की दाल, मसूर की दाल भोजन में खाएं।
फलों में पपीता, अंजीर, खीरा, संतरा, मौसमी, अनार, बेल के फल का सेवन करें।
आंवले का मुरब्बा सुबह-शाम के भोजन के साथ खाएं।
गाय का दूध ,नारियल का पानी और मठा और छाछ का उपयोग खाने के दौरान अधिक से अधिक करें |
दूध पीते समय उसमे जितना आपको अच्छा लगे उतनी मात्रा  मे शहद  मिलकर उसके साथ किशमिश का सेवन करें | यह काफी लाभप्रद है |







हिस्टीरिया में क्या न खाएं-

भारी, गरिष्ठ, बासी, तामसी भोजन न खाएं।
ताली-भुनी, मिर्च-मसालेदार, चटपटी चीजें सेवन न करें।

चाय, कॉफी, शराब, तम्बाकू, गुटखे से परहेज करें।
गुड़, तेल, हरी-लाल मिर्च, खटाई, अचार न खाएं।
मांस, मछली, अंडा आदि से परहेज करें।
हिस्टीरिया रोग निवारण में सहायक उपाय
हिस्टीरिया में क्या करें-
सुबह घूमने जाएँ। नियमित हलका-फुलका व्यायाम करें।
रोगिणी अविवाहित हो तो विवाह करवा दें।
पति-पत्नी में सुलह करवाएं।
रोगिणी को दौरा पड़ने पर बदन के कपड़े ढीले कर दें। हवादार, साफ जगह में बिस्तर पर लिटाएं और सिर के नीचे तकिया लगा दें।
बेहोश रोगिणी के मुँह, आँखों पर ठंडे पानी के छीटें मारें।
मानसिक कारणों का मनोवैज्ञानिक से विश्लेषण कराकर उपचार कराएं।
एक मोहल्ले से दूसरे या एक शहर से दूसरे शहर में स्थान परिवर्तन कराएं।
रोगिणी से थोड़ा सख्त व्यवहार करें, लेकिन उसकी उपेक्षा न करें।

हिस्टीरिया में क्या न करें
कब्ज या गैस बनने की शिकायत न होने दें।
रोगिणी से अत्यधिक सहानुभूति न जतायें।
एकांत निवास में रोगिणी को अकेला न छोड़ें।
अश्लील साहित्य न पढ़ें और न ही ऐसी फ़िल्में देखें।
घूम्रपान की आदत न पालें।
होश में लाने के लिए नाक के नथुनों में प्याज या लहसुन का रस या अमृतधारा या कपूर रस की कुछ बूंदें टपकाएं।
गर्भाशय संबंधी विकारों के कारण दौरे पड़ रहे हों, तो स्त्री रोग विशेषज्ञ से इलाज कराएं।
अधिक मानसिक या शारीरिक परिश्रम तथा चिंता, भय, शोक न करें।
मल-मूत्रादि के वेगों को न रोकें|

जौ (बारले) के औषधीय गुण और लाभ


जौ एक ऐसा अनाज है, जो एक साथ स्वास्थ्य से जुड़े कई फायदे पहुंचाता है और सेहत की समस्याओं में बचाए रखता है। यह एक स्वादिष्ट और सेहतमंद अनाज है,
जौ एक विशेष खाद्य आहार है जिसका उपयोग भारत में प्राचीन समय से किया जा रहा है। जौ के फायदे आपको कई स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं से बचा सकते हैं। जौ का उपयोग विशेष रूप से जौ की रोटी के रूप में किया जाता है। हालांकि जौ के औषधीय गुणों के कारण आप इसे कई व्‍यंजनों के रूप में उपयोग कर सकते हैं। जौ खाने के फायदे उच्‍च रक्‍तचाप, गठिया, अस्‍थमा, नपुंसकता, त्‍वचा समस्‍याओं और हृदय रोगों को दूर करने के लिए कर सकते हैं। आज इस लेख में आप जौ खाने के फायदे और नुकसान संबंधी जानकारी प्राप्‍त करेगें।
बारले (जौ) क्‍या है
जौ एक प्रमुख खाद्य अनाज है जो घास परिवार (grass family) से संबंधित है। जौ का वैज्ञानिक नाम होर्डियम बल्‍गारे (Hordium vulgar) है जो कि समशीतोष्‍ण जलवायु में अच्‍छी तरह से विकास करता है। जौ का उपयोग विशेष रूप से जानवरों के चारे के रूप में किया जाता था। लेकिन अपने औषधीय गुणों और स्‍वास्‍थ्‍य लाभों के कारण इसे खाद्य आहार के रूप में इस्‍तेमाल किया जाने लगा। हालांकि जौ का उपयोग बीयर और कुछ आसुत पेय पदार्थों के लिए भी किया जाता है।
जौ के प्रकार
उपयोग के आधार पर जौ के कई प्रकार होते हैं जिन्‍हें आप बाजार से खरीद सकते हैं। जौ को आमतौर पर जौ के बीज या जौ के पानी के रूप में सेवन किया जाता है। हालांकि जौ के अलग-अलग प्रकार अलग-अलग उपयोग के लिए होते हैं। इसलिए यह आपको तय करना है कि जौ का कौन सा प्रकार आपके लिए अधिक उपयोगी है।
जौ की तासीर क्‍या होती है
जौ की तासीर ठंडी होती है जिसके कारण यह पेट संबंधी समस्‍याओं को प्रभावी रूप से दूर कर सकती है। जौ की ठंडी तासीर होने के अलावा इसमें बहुत से पोषक तत्‍व और खनिज पदार्थों की अच्‍छी मात्रा होती है। जिसके कारण यह हमारी बहुत सी स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं को प्रभावी रूप से दूर कर सकता है।
जौ घास (Barley Grass) – ये जौ के पौधे के युवा अंकुर होते हैं। इनकी ऊंचाई केवल कुछ ही इंच होती है जब ये उपयोग करने के लिए अच्‍छे होते हैं। जौ के इस रूप में एंटीऑक्‍सीडेंट, विटामिन, खनिज और प्रोटीन की अच्‍छी मात्रा होती है।


पर्ल जौ (Pearl Barley) – जौ का यह प्रकार बाजार में सबसे अधिक मात्रा में उपलब्‍ध होता है। इस प्रकार का जौ सफेद रंग के होते हैं, इनके दाने एक समान अकार के होते हैं जो छोटे मोती के समान दिखाई देते हैं। इस प्रकार के जौ से चोकर को साफ करके बनाया जाता है। पर्ल बारले मुख्‍य रूप से सूप और सलाद आदि में उपयोग किया जाता है।
हुल्‍ड बारले (Hulled Barley) – जौ के इस प्रकार में केवल पौधे आधारित भूसी को साफ किया जाता है। जबकि जौ के ऊपरी आवरण को साफ कर पूरे चोकर को बरकरार रखते हुए बनाया जाता है। यह जौ की अन्‍य किस्‍मों की तुलना में अधिक फाइबर और पौष्टिकता से भरपूर होता है।
ग्रीन जौ पाउडर (Barley Green Powder) – जौ का यह प्रकार जौ की हरी घास का पाउडर होता है। जिसके कई चिकित्‍सीय लाभ होते हैं। इसे व्‍हीटग्रास पाउडर की तरह ही बनाया जाता है। इस पाउडर में विभिन्‍न विटामिन, और खनिज पदार्थों की अच्‍छी मात्रा होती है। यह पानी में आसानी से घुलनशील होता है।
जौ का आटा (Barley Flour) – यह जौ को बीजों को पीसकर तैयार किया जाता है। बहुत से लोग इसे गेहूं के आटे के विकल्‍प के रूप में उपयोग करते हैं। जौ का आटा मौती जौ की तुलना में अधिक पोषक तत्‍वों और फाइबर का अच्‍छा स्रोत होता है।
आपको बता दें कि जो महिलाएं गर्भपात जैसी समस्या का सामना कर रही है उसके लिए जौ अमृत के समान है। इसके सेवन के लिए आप जौ के आटे में घी और ड्राई फ्रुट डाल कर इसके लड्डू तैयार कर सकती है।
खाद्य की घटिया क्वालिटी और गलत खानपान की आदतों के चलते आजकल अधिकतर लोग पत्थरी की समस्या से परेशान रहते है। ऐसे लोग इस पानी में उबालकर रोजाना इसका एक गिलास पानी पिएं। इसके निरंतर सेवन से आपको पत्थरी की परेशानी से छुटकारा मिलेगा।
*डायबिटीज के रोगियों के लिए भी जौ काफी फायदेमंद है। दरअसल डायबिटीज के पेशेंटस को हेल्दी डाइट लेनी पड़ती है इसलिए यह उन्हें बहुत फायेदा पहुंचाती है। आपकी इसके आटे की रोटी बनाकर खा सकते है। आप इसमें चने का आटा भी मिक्स कर सकते है।
*लोगों का जंक फूड के प्रति बढ़ता रूझान आज मोटापे की बढ़ी वजह बना हुआ है। अधिकतर लोग अपने बढ़ते वजन से परेशान रहते है। ऐसे लोगों के लिए भी जौ काफी लाभकारी है। इसे दूध के साथ या खीर बनाकर खाने से मोटापा कम होता है।
*मोटापा कम करने के लिए जौ का प्रयोग अत्यंत लाभदायक साबित होता है। इसे किसी भी रूप में लेना वजन कम करने में मददगार है। चाहें तो जौ के आटे की रोटी का सेवन प्रतिदिन कर सकते हैं, यह लाभकारी होगा।
* शरीर में किसी प्रकार की सूजन होने पर जौ का पानी उबालकर पीना फायदेमंद होता होगा। इसके अलावा शरीर में गर्मी बढ़ जाने पर भी जौ के पानी का सेवन ठंडक देने में सहायक है।


ग्‍वार की फली के औषधीय गुण


ग्‍वार की फली का नाम सुनते ही हम नाक सिकोड़ने लगते हैं लेकिन क्‍या आप जानते हैं कि ये फलियां स्‍वास्‍थ्‍यवर्धक गुणों से भरपूर होती हैं। इन फलियों में आपको हेल्‍दी बनाने के सारे गुण होते हैं। ग्वार फली में प्रोटीन, घुलनशील फाइबर, अनेक प्रकार के विटामिन, जैसे विटामिन के, सी और ए और भरपूर मात्रा में कार्बोहाइड्रेट पाये जाते हैं। इनके अलावा इसमें फॉस्फोरस, कैल्शियम, आयरन और पोटेशियम भी पाए जाते हैं। सबसे अच्‍छी बात तो यह है कि इसमें किसी तरह का कोलेस्ट्रॉल या वसा नहीं पाया जाता है। इसे जबरदस्त टॉनिक माना जा सकता है। 

ग्वार फली के फायदे के कारण ग्वार फली भारतीय घरों में सब्जी के रुप में इस्तेमाल की जाती है। ग्वार फली हरे रंग की बीन्स होती है जिनका उपयोग मुख्य रुप से गम बनाने के लिए किया जाता है। ग्वार फली औद्योगिक रुप से काफी महत्वपूर्ण तो होती ही है साथ ही यह ब्लड शुगर के लेवल को कम करने और कॉलेस्ट्रोल के स्तर को कम करने के लिए भी लाभकारी होती है। यहीं कारण है कि ग्वार फली का उपयोग एक महत्वपूर्ण खाद्य पदार्थ के रुप में किया जाता है।
ग्वार फली में बहुत कम कैलोरी होती है इसलिए यह वजन कम करने के लिए काफी उपयोगी होती है। प्रति 100 ग्राम ग्वार फली में मात्र 15 कैलोरी होती है लेकिन यह भरपूर ऊर्जा प्रदान करती है। इसी के साथ ग्वारफली में प्रोटीन, मिनरल्स, विटामिन्स और डायटरी फाइबर भी होते हैं। कम फैट और कैलोरी के साथ अत्यधिक प्रोटीन होने के कारण ग्वारफली का सेवन हृदय के स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। 
ग्वारफली में मौजूद पोषक तत्व
ग्वार फली को कल्सटर बीन्स भी कहते हैं जिसमें निम्न मात्रा में पोषक तत्व मौजूद होते हैं।
आयरन- 75 प्रतिशत
विटामिन सी- 55.6 प्रतिशत
फास्फोरस- 35.71 प्रतिशत
कैल्शियम-10 प्रतिशत
प्रोटीन- 8 प्रतिशत
फाइबर- 10 प्रतिशत
पोटेशियम- 15 प्रतिशत
पोषक तत्व जैसे विटामिन A, विटामिन K, विटामिन C, फॉलेट, कार्बोहाइड्रेट, फॉस्फोरस, कैल्शियम, आयरन, पोटेशियम आदि पोषक तत्व ग्वार फली में पर्याप्त मात्रा में होते हैं। इसलिए ग्वार फली को पोषक तत्वों से भरपूर और स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।
ग्वार फली खाने के फायदे एनीमिया के खतरे कोकम करता है

आयरन रक्त में हिमोग्लोबिन बनाता है जिससे खून की कमी नहीं होती। ग्वारफली आयरन का एक अच्छा स्रोत होती है इसलिए इसका सेवन करने से एनीमिया जैसी समस्या नहीं होती है।
ग्वार फली के फायदे डायबिटीज में

ग्लाइको न्यूट्रिएंट्स नामक तत्व ग्वार फली में पाया जाता है जो कि खून में रक्त शर्करा को कम करता है इसलिए ग्वार फली का सेवन करना डायबिटीज के रोगियों के लिए लाभकारी होता है।
ग्वार फली के सेवन के लाभ हृदय के लिए

 ग्वार फली में डायटरी फाइबर होते है जो कि खून में कॉलेस्ट्रोल के स्तर को कम करता है। यह दिल की सुरक्षा के लिए एक गार्ड का काम करती है इसमें पोटेशियम भी पर्याप्त मात्रा में होता है इसलिए ग्वार फली खाना भी दिल के लिए उपयोगी होता है।
डायबिटीज में लाभकारी

ग्‍वार की फली डायबटीज रोगियों के लिए बहुत लाभकारी होती है। इस फली के सेवन से शरीर में ब्‍लड शुगर की मात्रा घट जाती है और इंसुलिन की मात्रा में इजाफा होता है। इसके आहार फाइबर भोजन को पचाने में बेहद मददगार होते हैं। कच्ची फलियों को चबाना डायबिटजी रोगियों के लिए हितकर होता है। 

ग्वार फली के फायदे 
हड्डियां मजबूत बनाने में

ग्वारफली में फास्फोरस और कैल्शियम पर्याप्त मात्रा में होते हैं इसलिए हड्डियों को मजबूत बनाने के लिए ग्वारफली खाना उपयोगी होता है।
ग्वार फली खाने के फायदे रक्त संचरण में

रक्त संचरण के कारण ही शरीर के हर हिस्से में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन पहुंचती है और अंग सही ढंग से काम करते हैं। ग्वार फली खाने के फायदे रक्त संचरण को बढ़ाते है इसलिए ग्वार फली को भोजन में शामिल जरूर करें।ग्‍वार में आयरन की भरपूर मात्रा होने के कारण यह शरीर में ऑक्‍सीजन को उचित मात्रा में प्रवाहित करने में मदद करता है, जिससे रक्‍त का संचार अच्‍छी तरह से होने लगता है। इसके अलावा, ग्‍वार की फली में फीटोकेमिकल की मौजूदगी ब्‍लड सर्कुलेशन को और बेहतर बनाने में मदद करता है।

दिल के लिए मददगार

यह सब्जी हृदय के रोगियों के लिए उत्तम मानी जाती है। क्‍योंकि इसमें शरीर का कोलेस्‍ट्रॉल को घटाने के गुण होते हैं। साथ ही ग्‍वार की फली में फाइबर और पौटेशियम की मात्रा काफी ज्‍यादा होती है। इसकी फलियों में पाए जाने वाले फाइबर को कोलेस्ट्रोल स्तर को संतुलित बनाए रखने के लिए लाभकारी मानता है।

ग्वार फली खाने के फायदे 
गर्भवती महिलाओं के लिए
ग्‍वार की फली का सेवन गर्भावस्‍था के दौरान अवश्‍य करना चाहिए, इसके सेवन से गर्भावस्‍था के दौरान शरीर में सभी पोषक तत्‍वों की कमी पूरी हो जाती है। विटामिन के की पर्याप्‍त मात्रा, इसमें होने के कारण यह हड्डियों को मजबूत करने और भ्रूण के विकास में सहायक होता है। इसमे फॉलिक एसिड भी भरपूर मात्रा में होता है जो शरीर को स्‍वस्‍थ बनाये रखने में मदद करता फॉलिक एसिड ग्वारफली में पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है जो कि गर्भवती महिलाओं के लिए उपयोगी पोषक तत्व होता है। इसलिए गर्भावस्था में ग्वार फली खाना मां और शिशु दोनों के लिए लाभकारी होता है।
ग्वार फली के फायदे दिमाग को स्वस्थ रखती है

दिमाग के स्वास्थ्य के लिए ग्वार फली फायदेमंद होती है। ग्वार फली में मौजूद फॉलेट, विटामिन के और हाइपोग्लाइसेमिक गुण दिमाग और नर्व सिस्टम को रिलेक्स करते हैं और साथ ही दिमाग को शांत रखने के लिए उपयोगी होती है। इसका सेवन करने से आप तनाव और चिंता से काफी हद तक दूरी बना लेता हैं। जिससे आपका दिमाग शांत रहता है और आपके दिमाग को ठंडकता प्रदान करता है।
ग्वार फली खाने के फायदे बाउल मूवमेंट के लिए

ग्वारफली में लेक्सेटिव प्रोपर्टीज होती है जो अलग-अलग प्रकार की बाउल मूवमेंट संबंधी परेशानियों से बचाने के लिए लाभकारी होती है। बाउल मूवमेंट के दौरान शरीर में जमा टॉक्सिन्स को निकालने के लिए भी ग्वार फली का सेवन लाभकारी होता है।
ग्वार फली खाने के नुकसान

हालांकि ग्वार फली सेहत के लिए लाभकारी होता है पर ज्यादा ग्वार फली सेहत के लिए नुकसान दायक होती है। आइए जानते हैं ग्वार फली खाने के नुकसान और हानिकारक दुष्प्रभाव।
ग्वार फली खाने के नुकसान से पेट खराब हो सकता है–

 ज्यादा ग्वार फली खाने से पेट खराब होने का खतरा रहता है क्योंकि इसमें काफी डायटरी फाईबर होता है जिससे गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्या पैदा हो सकती है। इससे पेट में दर्द जैसी समस्याएं हो सकती है।
ग्वार फली खाने के नुकसान आंतों के लिए– 

ग्वार फली बहुत ज्यादा पानी अवशोषित करता है इसलिए ग्वारफली का अत्यधिक सेवन करने से छोटी आंत का चॉक होना जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती है। इसलिए ग्वारफली का अत्यधिक सेवन ना करें।

फूल गोभी के स्वास्थ्य लाभ व नुकसान

                                                       
                                 
हम सभी अपने आहार में फूल गोभी को पसंद करते हैं। लेकिन क्‍या आप फूलगोभी खाने के फायदे और नुकसान जानते हैं। फूल गोभी के फायदे हृदय रोग, मस्तिष्‍क विकारों और कैंसर आदि के खतरे को कम करते हैं। फूल गोभी का उपयोग आपकी आंखों के लिए भी फायदेमंद होता है। इसके अलावा फूल गोभी के औषधीय गुण शरीर में हार्मोन संतुलन को बनाए रखने में भी सहायक होते हैं
फूलगोभी आम तौर पर सबसे सुलभ उपलब्ध होने वाली सब्जी है, जिसका प्रयोग न केवल सब्जी बनाने बल्कि अलग-अलग स्वादिष्ट व्यंजन बनाने के लिए भी किया जाता है। यह सब्जी भले ही बेहद आम हो, लेकिन इससे मिलने वाले फायदे बहुत खास और अनमोल हैं।
स्‍वास्‍थ्‍य लाभ के लिए जाने जानी वाली फूल गोभी में पोषक तत्‍वों की उच्‍च मात्रा होती है। इसमें कैलोरी की मात्रा बहुत ही कम होती है लेकिन प्रोटीन उच्‍च होते हैं। आपके शरीर को जिन पोषक तत्‍वों और खनिज पदार्थों की आवश्‍यकता होती है लगभग वे सभी फूल गोभी में मौजूद रहते हैं।
* फूलगोभी में कैल्शियम, फास्फोरस, प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट और लौह तत्व के अलावा विटामिन ए, बी, सी, आयोडीन, और पोटैशियम तथा थोड़ी सी मात्रा में तांबा भी मौजूद होता है। गोभी आपको इतने सारे पोषक तत्व एक साथ प्रदान करती है।
*आप अपनी अच्‍छी सेहत के लिए प्राकृतिक खाद्य पदार्थों का सेवन कर सकते हैं। वैसे भी फूलगोभी आहार के लिए बहुत ही लोकप्रिय है। लेकिन अपने स्‍वास्‍थ्‍य लाभों के कारण फूलगोभी का उपभोग बहुत ही जरूरी हो जाता है। पर्याप्‍त मात्रा में फूल गोभी का सेवन न केवल शरीर को स्‍वस्‍थ्‍य रखता है बल्कि कई गंभीर समस्‍याओं से भी बचाता है। इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लामेटरी गुण शरीर की सूजन को रोकने में सहायक होते हैं।


हृदय स्‍वास्‍थ्‍य के लिए फूल गोभी

पोषक तत्‍वों के भरपूर फूल गोभी के लाभ हृदय स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देने में मदद करते हैं। अध्‍ययनो से पता चलता है कि फूल गोभी में फाइबर की उच्‍च मात्रा होती है जो हृदय के फायदेमंद होता है। इसके अलावा फूल गोभी में मौजूद सल्‍फोराफेन (Sulfurafen) रक्‍तचाप को नियंत्रित करने में सहायक होता है। इसके अलावा फूल गोभी में ओमेगा-3 फैटी एसिड होता है जो शरीर में कोलेस्‍ट्रॉल को कम करता है। कोलेस्‍ट्रॉल हृदय स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक होता है। क्‍योंकि रक्‍त वाहिकाओं में यह रक्‍त प्रवाह को रोकने का कारण बन सकता है। इस तरह से आप अपने हृदय को स्‍वस्‍थ्‍य रखने के लिए फूल गोभी का उपयोग कर सकते हैं।
बेनिफिट्स फॉर वेट लॉस
आपको यह जानकर हैरानी हो सकती है कि फूलगोभी के फायदे वजन कम कर सकते हैं। फूल गोभी में सल्‍फोराफेन, विटामिन सी और फोलेट की उच्‍च मात्रा होती है। अध्‍ययनों से पता चलता है कि विटामिन सी शारीरिक गतिविधियों के दौरान अतिरिक्‍त वसा को कम करने में मदद करता है। साथ ही फूल गोभी में कैलोरी कम होती है इसलिए फूल गोभी वजन घटाने में सहायक होता है। इसके अलावा फूलगोभी में मौजूद पोषक तत्‍व भूख बढ़ाने वाले हार्मोन को कम करते हैं जिससे आपको आपको बार-बार भूख नहीं लगती है। फूल गोभी में ओमेगा-3s भी होता है जो लेप्टिन के स्राव को उत्‍तेजित करता है। लेप्टिन एक हार्मोन है जो चयापचय को बढ़ाता है और शरीर के वजन को नियंत्रित करता है। यदि आप भी अपना वजन कम करना चाहते हैं अपने आहार में फूल गोभी को शामिल कर सकते हैं।
मस्तिष्‍क स्‍वास्‍थ्‍य के लिए
आप अपने मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देने के लिए फूल गोभी का इस्‍तेमाल अपने खाने में कर सकते हैं। फूल गोभी में कोलीन (choline) नामक महत्‍वपूर्ण यौगिक होता है। यह एक प्रकार का विटामिन बी है जो मस्तिष्‍क स्‍वास्‍थ्‍य और विकास को बढ़ावा देता है। एक पशु अध्‍ययन से पता चलता है कि गर्भावस्‍था के दौरान कोलीन का सेवन पशुओं के दिमाग पर सुपर-चार्ज देता है। जिससे यह संज्ञानात्‍मक कार्य को बढ़ावा देता है। इस तरह से फूल गोभी का सेवन आपके मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ा सकता है। साथ ही यह अल्‍जाइमर जैसी अन्‍य तंत्रिका संबंधी विकारों को भी दूर करने में सहायक होता है।
*खून साफ करने और चर्म रोगों से बचाने में गोभी बेहद फायदेमंद होती है। इसके लिए आप चाहें तो कच्ची गोभी या फिर इसका जूस बनाकर सेवन कर सकते हैं। यह दोनों ही तरीके कारगर होंगे। 
किडनी स्‍वास्‍थ्‍य के लिए
आपके शरीर के अहम हिस्‍से के रूप में किडनी को जाना जाता है। आप किडनी से संबंधित समस्‍याओं को दूर करने के लिए फूल गोभी का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। फूल गोभी में मौजूद फाइटोकेमिकल्‍स शरीर से विषाक्‍त पदार्थों को दूर करने में सहायक होते हैं। इसके अलावा फूल गोभी में पोटेशियम और विटामिन सी की अच्‍छी मात्रा होती है जो किड़नी की रक्षा करते हैं। इसके अलावा यह वजन को नियंत्रित करने में भी सहायक है। क्‍योंकि अधिक वजन होने से किड़नी पर जोर पड़ता है। लेकिन कुछ लोग गुर्दे की पथरी या गुर्दे की बीमारियों के दौरान फूल गोभी का सेवन न करने की सलाह देते हैं। इसलिए ऐसी स्थिति में अपने डॉक्‍टर की सलाह पर ही फूल गोभी का सेवन करें।
ऑक्‍सीडेटिव तनाव कम करे
विटामिन सी के अलावा फूल गोभी में बहुत से एंटीऑक्‍सीडेंट, मैंगनीज आदि भी होते हैं। ये घटक शरीर को आवश्‍यक पोषण दिलाने में सहायक होते हैं। इसके अलावा इसमें फाइटोकेमिकल्‍स भी होते हैं जो कैंसर को रोकने वाले एंजाइमों को उत्‍तेजित करते हैं। जो शरीर को ऑक्‍सीडेटिव तनाव और फ्री रेडिकल्‍स से होने वाले नुकसान से बचाते हैं। इस तरह से आप भी ऑक्‍सीडेटिव तनाव के लक्षणों को कम करने के लिए फूल गोभी के लाभ प्राप्‍त कर सकते हैं।
श्वसन समस्‍याओं के लिए
मानव स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं में श्वसन समस्‍याएं प्रमुख हैं जो कि गंभीर हो सकती हैं। श्वसन रोग पेपिलोमाटोसिस (papillomatosis) मानव पेपिलोमा वायरस (papilloma virus) के कारण होता है। यह वायरस स्‍वरयंत्र, स्‍वशनप्रणाली, फेफड़े और ब्रोन्‍ची में मुखर डोरियों को प्रभावित करता है। फूलगोभी के औषधीय गुण इन समस्‍याओं से निपटने में सहायक होते हैं। क्‍योंकि इसमें इंडोल-3-काबिनोल (indole-3-carbinol) होता है। इसलिए फूल गोभी और इसी तरह की अन्‍य सब्‍जीयों का सेवन श्वसन संबंधी समस्‍याओं से बचा सकता है।
*गले की समस्याएं, जैसे गले में दर्द, सूजन आदि होने पर गोभी के पत्तों को पीसकर उसका रस निकालें और इसका सेवन करें। गोभी का रस गले की समस्याओं में लाभकारी साबित होगा।
*लिवर में मौजूद एंजाइम्‍स को सक्रिय करने में गोभी का सेवन मददगार होता है। इसके सेवन से लिवर सही तरीके से काम करता है और शरीर से विषैले तत्वों को बाहर कर देता है। 
*गर्भावस्‍था के दौरान गोभी काफी फायदेमंद होती है। यह फोलेट, विटामिन ए और विटामिन बी से भी भरपूर होती है और कोशिकाओं के विकास के साथ ही इससे गर्भ में पल रहे भ्रूण को काफी लाभ होता है। गोभी विटामिन सी का भी उत्‍तम स्रोत है।


कैंसर के खतरे को करें कम

गोभी का सेवन करने से कैंसर जैसी घातक बीमारी का समाधान भी हो जाता है। इतना ही नहीं, इसका सेवन करने से स्तन कैंसर, ब्लैडर कैंसर और फेफड़ो का कैंसर भी ठीक हो जाता है।
हड्डी स्‍वास्‍थ्‍य के लिए
स्‍वस्‍थ्‍य शरीर का आधार स्‍वस्‍थ हड्डियां होती हैं। कैल्शियम और विटामिन K की कमी के कारण ऑस्टियोपोरोसिसऔर फ्रैक्‍चर आदि की संभावना बढ़ जाती है। लेकिन आप इन संभावनाओं को कम करने के लिए फूल गोभी का सेवन कर सकते हैं। फूल गोभी में विटामिन K की उच्‍च मात्रा होती है। यह हड्डियों के लिए कैल्शियम अवशोषण को बढ़ावा देता है। नियमित रूप से गोभी का सेवन समग्र हड्डी स्‍वास्‍थ्‍य के लिए अच्‍छा होता है और विटामिन K मूत्र द्वारा कैलिशयम के उत्‍सर्जन को भी रोकता है। जोड़ों का दर्द, गठिया और हड्डियों में दर्द की समस्या होने पर गोभी और गाजर का रस बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से काफी लाभ होता है। लगातार तीन महीने इसका सेवन बेहद लाभप्रद है।
आंखों को स्‍वस्‍थ रखें
फूल गोभी में पाये जाने वाले सल्‍फोराफेन हमारी आंखों के लिए भी फायदेमंद होते हैं। यह रेटिना क्षेत्र के कमजोर ऊतकों को ऑक्‍सीडेटिव तनाव से बचाने में सहायक होते हैं। जिसके परिणामस्‍वरूप अंधापन, मोतियाबिंद, धब्‍बेदार अध: पतन और अन्‍य आंखों संबंधी समस्‍याएं हो सकती है। इस तरह से आप भी आपनी आंखों के स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देने के लिए फूल गोभी का उपयोग कर सकते हैं।
*मसूड़ों में दर्द, सूजन या मसूड़ों से खून आने की समस्या होने पर गोभी के पत्तों के रस से कुल्ला करना फायदेमंद होगा। यह पैराथायरॉइड ग्रंथि के सही कार्या
कार्यान्वयन में भी मददगार होती है।


सूजन का इलाज

स्‍वास्‍थ्‍य लाभ से भरपूर फूल गोभी के फायदे शरीर की सूजन को कम करने में भी मदद करते हैं। क्‍योंकि फूल गोभी में शक्तिशाली एंटीऑक्‍सीडेंट बीटा-कैरोटीन क्वेरसेटिन (quercetin), सिंनामिक एसिड (cinnamic acid) और बीटा-क्रिप्टोक्सैन्थिन (beta-cryptoxanthin) आदि होते हैं। ये घटक शरीर में ऑक्‍सीडेटिव तनाव को कम करने और सूजन को दूर करने में सहायक होते हैं। इसके अलावा फूल गोभी में इंडोल-3-कार्बिनोल एक महत्‍वपूर्ण एंटी-इंफ्लामेटरी गुण होता हैं। यह सूजन के लक्षणों को कम करने में सहायक होता है। इस तरह से आप अपने आहार में फूल गोभी को शामिल कर सूजन आदि से छुटकारा और राहत पा सकते हैं।
*कोलायटिस, पेट दर्द या पेट से संबंधित अन्य समस्याओं में गोभी कारगर है। चावल के पानी में इसके हरे भाग को पाकर इसका सेवन करने से पेट की समस्याओं से निजात मिलती है।
सावधानी-
जैसा कि आप सभी जाने हैं कि गोभी को हम विशेष आहार के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके फायदे बहुत अधिक हैं, लेकिन कुछ लोगों के लिए इसके दुष्‍प्रभाव भी हो सकते हैं। फूल गोभी में जटिल कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो पाचन तंत्र में पूरी तरह से टूट नहीं पाते हैं। इन कोर्बोहाइड्रेट को आंतों के बैक्‍टीरिया द्वारा खाया जाता है जिसके परिणामस्‍वरूप गंधयुक्‍त गैसे निकलती हैं।
फूल गोभी में प्‍यूरीन होता है जिसके कारण अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर में यूरिक एसिड का निर्माण हो सकता है। यह आगे चलकर किडनी स्‍टोन या गाउट जैसी समस्‍याएं पैदा कर सकता है।
फूल गोभी गंभीर एनाफिलेक्सिस को ट्रिगर कर सकती है जो किसी पदार्थ के लिए एलर्जी की प्रतिक्रिया है।
एंटीकोआगुलंट्स पर लोगों को डॉक्‍टर की सलाह पर ही फूल गोभी का सेवन करने की सलाह दी जाती है।