प्रोस्टेट बढ़ने पर हर्बल इलाज से आपरेशन की नोबत नहीं



प्रोस्टेट ग्रन्थि एक बहुत ही छोटी ग्रन्थि होती है | इस ग्रन्थि का आकार एक अखरोट की भांति होता है | यह ग्रन्थि पुरुषों में पाई जाती है | यह पुरुषो के मूत्राशय के नीचे मुत्र् नली के पास होती है | इसमें पुरुषों के सेक्स हार्मोन्स की एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है | जब किसी भी पुरुष की आयु 50 साल की हो जाती है या इससे उपर हो जाती है तो इस ग्रन्थि का आकार बढ़ने लगता है | जैसे – जैसे प्रोस्टेट ग्रन्थि बढती है , इसका सीधा प्रभाव मूत्र नली पर पड़ता है | मूत्र नली का दबाव बढ़ता है जिसके कारण पेशाब के रुकावट की स्थित बन जाती है | जब यह स्थिति बन जाती है | तब पेशाब रुक –रुक कर एक पतली धार में और थोड़ी – थोड़ी मात्रा में आता है | कभी – कभी तो पेशाब टपक – टपक कर आता है और जलन होती है | कभी – कभी तो रोगी अपने मूत्र के वेग को रोक नही पाता है | जिससे रोगी को रात के समय में भी पेशाब करने के लिए नींद से उठना पड़ता है | इस रोग का अधिक प्रभाव लगभग 60 से ७० साल की उम्र मे हो जाता है | 
इस उम्र तक जाते – जाते यह रोग और भी उग्र हो जाता है | इस रोग में पेशाब पूरी तरह से रुक जाने की संभावना भी बन जाती है | ऐसी अवस्था में रोगी को किसी अच्छे डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए | डॉक्टर एक केथेटर नली लगाकर यूरिन बैग में मूत्र करने की व्यवस्था कर देते है | इस रोग का प्रकोप लगभग 50 % पुरुषों में देखने को मिलता है | यह रोग मनुष्य को 60 साल की उम्र के बाद होने लगता है | और समय बीतने के साथ – साथ इस रोग और भी प्रबल हो जाता है | 80 साल से 90 साल तक यह रोग पूरी तरह से व्यक्ति को जकड़ लेता है | जब किसी व्यक्ति की प्रोस्टेट ग्रन्थि बढ़ जाती है तो इसके बारे में कैसे मालूम करते है | इसके क्या लक्षण होते है | इस बात की जानकारी हम आपको दे रहे है |

प्रोस्टेट ग्रन्थि के बढ़ने के लक्षण :-

मूत्र करने में कठनाई महसूस करना |
पेशाब की धार चालू होने में देरी लगना |
रात के समय उठ – उठकर पेशाब के लिए जाना |
थोड़ी – थोड़ी मात्रा में पेशाब का आना
मूत्राशय का पूरी तरह से खाली ना होना | इस रोग में मूत्राशय में थोड़ी सा मूत्र शेष रह जाता है | इस इक्कठे हुए मूत्र में रोगाणु जन्म लेने लगते है | इसके कारण किडनी खराब होने लगती है |
पेशाब करने के बाद पेशाब की बुँदे टपकती रहती है | इसके आलावा आप अपने मूत्र पर काबू भी नही पा सकता है |
इस रोग से पीड़ित व्यक्ति को हमेशा यह लगता है कि उसे पेशाब आया है | लेकिन बाथरूम जाने के बाद पेशाब रुक रुककर आता है |
पेशाब में जलन होती है |
संभोग करते समय बहुत दर्द होता है और वीर्य भी निकलता रहता है |
प्रोस्टेट ग्रन्थि के बढ़ने से अंडकोष में दर्द भी होता है |
इस रोग को ठीक करने के लिए आज के समय में भी कोई औषधी नही बनी है | इस रोग का कोई भी सफल इलाज नही है | इस रोग से पीड़ित रोगी को ओपरेशन करने की सलाह दी जाती है | इस बीमारी से छुटकारा पाने के लिए ओपरेशन में बहुत पैसे खर्च करने पड़ते है | लेकिन फिर भी यह रोग दोबारा हो सकता है |मैं अपने दीर्घ चिकित्सा अनुभव के आधार पर कुछ बहुत ही असरदार आयुर्वेदिक घरेलू उपचार यहा लिख देता हूँ |इन उपायों के चलते आप आपरेशन की त्रासदी से बच जाएँगे|
   *एक दिन में कम से कम 3 से 4 लीटर पानी पीना चाहिए | परन्तु शाम के समय अपनी जरूरत के अनुसार ही पानी पीयें | ऐसा करने से रात के समय पेशाब करने के लिए बार – बार नही उठना पड़ेगा |
*अलसी के बीजों को अच्छी तरह से पीसकर उसका पावडर बना लें | इस पावडर को रोजाना 15 ग्राम की मात्रा में पानी एक साथ घोलकर पीने से इस रोग को लाभ मिलता है | यह एक असरदार उपाय है |
*कद्दू में जिंक की मात्रा अधिक होता है | कडू के बीजों को तवे पर अच्छी तरह से सेंक लें | भुने हुए बीजों को पीसकर उसका पावडर बना लें | इस पावडर की 15 से 20 ग्राम की मात्रा को रोजाना पानी के साथ खाएं | इस उपचार को करने से रोगी का मूत्र खुलकर आने लगता है |
*जिस भोजन में वसा की मात्रा अधिक हो या जो भोजन चर्बी को बढ़ाने वाला हो उस भोजन से परहेज करें | विशेष तौर पर मांस का सेवन बंद कर दें |
*कैफीन युक्त चीजों का उपयोग ना करें | चाय और कॉफ़ी में अधिक कैफीन होता है | जो प्रोस्टेट ग्रन्थि की तकलीफ को और भी बढ़ा देता है | केफीन का प्रयोग करने से मूत्राशय की ग्रीवा कठोर हो जाती है | जो इस रोग के लिए हानिकारक होता है |
*जो व्यक्ति इस रोग से पीड़ित है उसे अपना चेक अप करवाते रहना चाहिए | ताकि यह रोग आगे और ना बढ़ सके |
*इस रोग में रोगी को सोयाबीन का सेवन करना चाहिए | क्योंकि सोयाबीन में कुछ ऐसे तत्व होते है जो हमारे शरीर में टेस्टोंस्टोरन के लेवल को कम करता है | इसलिए हमे रोजाना लगभग 35 से 40 ग्राम सोयाबीन के बीजों को गलाकर खाना चाहिए | यह एक बहुत ही अच्छा उपाय है |
*रोगी को विटामिन सी का अधिक प्रयोग करना चाहिए | इसका सेवन करने से खून संचार की नलियाँ स्वस्थ रहती है और अच्छी तरह से कार्य करती है | इसलिए रोगी को प्रतिदिन विटामिन सी की एक गोली का सेवन करना चाहिए |
*जो लोग इस रोग से पीड़ित है , उन्हें रोजाना दो टमाटर का सेवन करना चाहिए | यदि रोजाना नही खा सकते तो हफ्ते में कम से कम 3 से 4 बार अवश्य खाएं | इस उपाय को करने से प्रोस्टेट ग्रन्थि में होने वाला कैंसर नही होता है | टमाटर में लायकोपिन नामक तत्त्व होता है जो कैंसर की रोकथाम करने के लिए बहुत ही आवश्यक होता है |
*जो लोग इस रोग से पीड़ित है उन्हें नियमित समय के अन्तराल पर सेक्स करना  उचित है|इससे प्रोस्टेट ग्रंथि ठीक रहती है | रोगी व्यक्ति हो या स्वस्थ व्यक्ति दोनों को ही ना तो सेक्स अधिक करना चाहिए और ना ही कम करना चाहिए | महीने में कम से कम 4 से 6 बार सेक्स करे | इससे दोनों का स्वास्थ्य ठीक रहता है |
विशिष्ट परामर्श-

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ने मे हर्बल औषधि सर्वाधिक कारगर साबित हुई हैं| यहाँ तक कि लंबे समय से केथेटर नली लगी हुई मरीज को भी केथेटर मुक्त होकर स्वाभाविक तौर पर खुलकर पेशाब आने लगता है| प्रोस्टेट ग्रंथि के अन्य विकारों (मूत्र    जलन , बूंद बूंद पेशाब टपकना, रात को बार -बार  पेशाब आना,पेशाब दो फाड़)  मे रामबाण औषधि है|  प्रोस्टेट केंसर की नोबत  नहीं आती| आपरेशन  से बचाने वाली औषधि हेतु वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|










दिल की गति तेज होना को रोकने के उपचार


तेजी से दिल धड़कने के घरेलु नुस्खे इस प्रकार हैं: -

प्याज और सेंधा नमक-

दो चम्मच प्याज के रस में सेंधा नमक मिलाकर सुबह-शाम सेवन करें|

गाय का दूध, किशमिश और बादाम-

गाय के दूध में किशमिश तथा बादाम डालकर औटाएं| फिर शक्कर डालकर सहता-सहता घूंट-घूंट पी लें|

गुलाब, धनिया और दूध-


गुलाब की पंखुड़ियों को सुखाकर पीस लें| फिर इसमें धनिया का चूर्ण समभाग में मिलाएं| एक चम्मच चूर्ण खाकर ऊपर से आधा लीटर दूध पिएं|

अनार-

अनार के कोमल कलियों की चटनी बनाकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह के समय निहार मुंह खाएं| लगभग एक सप्ताह सेवन करने से दिल की धड़कन सही रास्ते पर आ जाती है|

सेब, पानी और मिश्री-

200 ग्राम सेब को छिलके सहित छोटे-छोटे टुकड़े करके आधा लीटर पानी में डाल दें| फिर इस पानी को आंच पर रखें| जब पानी जलकर एक कप रह जाए तो मिश्री डालकर सेवन करें| यह दिल को मजबूत करता है

बेल और मक्खन-

बेल का गूदा लेकर उसे भून लें| फिर उसमें थोड़ा-सा मक्खन या मलाई मिलाकर सहता-सहता लार सहित गले के नीचे उतारें|

अंगूर-

भोजन के बाद चार चम्मच अंगूर का रस पिएं|

पिस्ता-

पिस्ते की लौज खाने से हृदय की धड़कन ठीक हो जाती है|

आंवला और मिश्री-

आंवले के चूर्ण में मिश्री मिलाकर एक चम्मच की मात्रा में भोजन के बाद खाएं| यह दिल की धड़कन सामान्य करता है| इससे रक्तचाप में भी लाभ होता है क्योंकि दिल की धड़कन तेज होने पर रक्तचाप भी बढ़/घट जाता है|

सेब, कालीमिर्च और सेंधा नमक-

आधे कप सेब के रस में चार कालीमिर्च का चूर्ण तथा एक चुटकी सेंधा नमक मिलाकर सेवन करें|

गाजर-

आधा कप गाजर का रस गरम करके प्रतिदिन दोपहर के समय पिएं|

टमाटर और पीपल-

टमाटर के रस में पीपल के पेड़ के तने की छाल का 4 ग्राम चूर्ण मिलाकर सेवन करें| टमाटर के रस की मात्रा आधा कप होनी चाहिए|दिल धड़कने पर जरा-सा कपूर जीभ पर रखकर चूसें|

पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

चींटियाँ भगाने के घरेलू उपाय



 चींटी बहुत छोटी होती है लेकिन बहुत सारी एक साथ आकर परेशानी पैदा कर देती है। अक्सर मिठाई आदि मे चुपचाप घुसकर नुकसान कर देती है। हम खीजने के अलावा कुछ नहीं कर पाते। रसोईघर में चींटी का हमला सामान्य सी बात है। शक्कर का डिब्बा चींटियों के लिए सबसे पसंदीदा स्थान होता है। कई बार तो रोटी के कटोरदान में भी चीटियां घुस जाती है। यहां तक की नमकीन का आनंद उठाने भी आ जाती है।
लाल चींटी और काली चींटी ये दो प्रकार की चींटी ज्यादा दिखती है। लाल चींटी छोटी होती है लेकिन काटती जोर का है। इसके काटने पर तेज जलन होती है। काली चींटी सीधी सादी अपने काम से काम रखने वाली होती है। ये कम ही काटती है। चींटियाँ हमारे घर में खुद के लिए एक छोटा सा घर बना लेती है। अक्सर लाइन बना कर अपने घर से निकल कर खाने के सामान तक पहुंचती है। इनकी लाइन का पीछा करते हुए इनके घर तक पहुंचा जा सकता है। चींटियों का रास्ता बना कर किसी चीज तक पहुंचने का तरीका आश्चर्य में डाल देता है।
चींटी हमारे लिए अच्छा काम भी करती है। यह हमें कई प्रकार के कीड़े मकोड़े से बचाती है।
चींटियाँ मकड़ी , खटमल , पिस्सू , मक्खी , सिल्वर फिश , मोथ आदि कीड़े मकोड़े के लार्वा को खा जाती है। ये कीड़े मकोड़े चींटी से ज्यादा नुकसान देह होते है। चींटी  इनको घर मे फैलने से रोकती है। इस तरह हमारी मदद करती है।
चींटियाँ एक दूसरे को संकेत व संदेशों का आदान प्रदान करती है। ये काम चींटियों उनके सिर पर मौजूद एंटीना की मदद से करती है। इसके अलावा फेरोमोन्स की मदद से चींटी रास्ता बनाती है और दूसरी चींटियों को रास्ता दिखती है। फेरोमोन्स एक प्रकार का केमिकल होता है जिसे कीट पतंगे व चीटियाँ उत्सर्जित करते है। इसके द्वारा वे उनकी प्रजाति को विशेष संदेश देने का काम करते है।
खाने पीने का सामान तलाश करने के लिए स्कॉउट चींटी घूमती रहती है। जब उसे कुछ मिलता है तो वह फेरोमोन्स से रास्ता बनाकर अपने साथियों को खाने तक पहुंचने का रास्ता दिखा देती है। दूसरी चींटियां भी उस रास्ते पर चलती हुई फेरोमोन्स से वो रास्ता मजबूत बनाती हुई चलती है। इस तरह से आसानी से दूर तक की मंजिल भी पा लेती है। जब खाना खत्म हो जाता है चींटी उस रास्ते पर चलना बंद कर देती है। इस रास्ते का फेरोमोन्स जल्द ही उड़ कर खत्म हो जाता है।



चींटी से बचने के उपाय


चींटियों से बचने का सबसे पहला उपाय उनके लिए खाने तक पहुंचने के रास्ते बंद करना है। यानी ऐसी चीजें जिनमे चींटी आ सकती है उन्हें एयर टाइट डिब्बे में रखना चाहिए। घर में साफ सफाई नियमित करनी चाहिए। विशेषकर रसोई में। मीठा थोड़ा भी इधर उधर गिरा हो तो तुरंत साफ कर देना चाहिए। वो सभी छोटी जगह जहां से चींटी का आवागमन सुलभ हो बंद कर देने चाहिए।
स्कॉउट चींटी घूमती हुई नजर आए तो सतर्क हो जाएँ। ये खाना ढूंढ़कर अपनी कॉलोनी को बताती है। अतः इससे पहले कि पूरा कुनबा दावत उड़ाने आ जाए चींटी को ललचाने वाला सामान बिखरा है तो साफ कर दें। ऐसे सामान को अच्छे से डिब्बों में एयर टाइट बंद करके रखें।
चींटीयों को दूर करने के उपाय इस प्रकार है :–

सिरका – Vinegar

सफेद सिरका और पानी बराबर मात्रा में मिलाकर चींटी के आने जाने वाले रास्ते पर स्प्रे कर दें या इस पानी से उनके रास्ते पर पोंछा लगा दें।
इससे फेरोमोन्स साफ हो जाएँगे और चींटी रास्ता भटक जाएगी। खाने तक नहीं पहुंच पाएगी।
लाल चींटी ने बनाए छोटे से छेद में सिरके में थोड़ा बैकिंग सोडा मिलाकर डाल दें। ये काम कुछ दिन के बाद फिर कर दें। चीटियों से मुक्ति मिल जाएगी। 



नींबू – Lemon


नींबू की खुशबू जितनी हमे पसंद है उतनी ही चींटी को नापसंद है। नीबू के छिलके या नीबू के पत्ते जहां भी होंगे चींटियाँ वहाँ से चली जाएंगी।
हम इसका फायदा उठा सकते है। जहां चीटियाँ हों वहाँ नींबू के छिलके डाल दें या नींबू के पत्ते तोड़कर डाल दें। चीटियाँ वहाँ से भाग जाएगी।
संतरे के छिलके और खीरे के छिलके भी चींटी भगा देते है।

पिपरमिंट का तेल – Peppermint Oil

घर में पोंछा लगने के बाद यदि पिपरमिंट के तेल की कुछ बूंद फर्श पर डालकर कपड़े से फैला दें तो चींटी दूर ही रहेगी। पिपरमिंट की गंध
चींटी को दूर रखने का काम करेगी।

तेजपत्ता – Bay Leaves

तेज पत्ता स्वाद व सुगंध के लिए दाल के तड़के में तो काम लेते ही है। ये चींटी को दूर रखने में भी काम आ सकता है। चींटी आने वाली जगह
तेज पत्ता के कुछ टुकड़े डाल दें , चीटियाँ नहीं आएँगी। इसे किचन के ड्रॉअर या कैबिनट आदि में भी रख सकते है।

लौंग – Clove

लौंग के फायदे और उपयोग तो आप बहुत से जानते होंगे। इसका एक और फायदा ये भी है कि इसे चीटियाँ दूर रखने में काम ले सकते है।



शक्कर के डिब्बे में दो तीन लौंग डालकर रखें। चीटियाँ 
शक्कर के डिब्बे तरफ देखेंगी भी नहीं।

कपूर – Camphor

कपूर पूजा में जलाने के लिए घर में पूजा वाले स्थान में रखते है। आपने देखा होगा पूजा वाली जगह चीटियां नहीं आती। इसका कारण कपूर होता है। कपूर की गंध चींटी को दूर रखती है। कपूर को जहाँ से चीटियाँ भगानी हो वहाँ रख देंगे तो चीटियां रवाना हो जाएंगी।

दालचीनी

एक और रसोई का मसाला चींटी को दूर रखने में काम आ सकता है वो है दालचीनी। दालचीनी का टुकड़ा जहाँ होगा वहाँ चीटियां नहीं आती।
जहां लगे Cheeti आ सकती है वहाँ दालचीनी का टुकड़ा रख दें। और असर देखें।

लहसुन

लहसुन के मामले में हमारी और चींटी की पसंद नापसंद मिलती है। हमारी तरह इसको भी लहसुन की गंध अच्छी नहीं लगती। चींटी के आने जाने वाले रास्ते पर लहसुन घिसने से या लहसुन का पावडर बुरकने से इससे मुक्ति मिल सकती है।
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भुना हुआ लहसुन खाने के अनुपम फ़ायदे




भुना हुआ लहसुन खाने के अनुपम फ़ायदे
डाइजेस्टिव सिस्टम -
 अगर आपको भूख कम लगती हो तो लहसुन का सेवन करना आपके लिए फायदेमंद साबित हो सकती है। यह आपके डाइजेस्टिव सिस्टम को ठीक करता है जिससे आपकी भूख भी बढ़ा जाती है।
कॉलेस्ट्राल और ह्रदय - यह बढ़े हुए कॉलेस्ट्राल को कम करता है साथ ही ह्रदय के लिए फ़ायदेमंद है।
एसिडिटी - 
कभी-कभी आपके पेट में एसिड बनने लगता है, लेकिन इसका सेवन करने से यह पेट में एसिड बनने से रोकता है। जिससे आपको तनाव से भी निजात मिल जाता है।
मोटापा - रोजाना भुने हुए लहसुन का सेवन करने से हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म बढ़ जाता है। जिससे बहुत ही जल्दी आपका फैट बर्न हो जाता है।
ब्लड प्रेशर - 
 भुने लहसुन खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है
कैंसर -
भुने हुए लहसुन खाने से शरीर के अंदर उत्पन्न होने वाले कैंसर की कोशिकाएं खत्म हो जाती है।
भुने लहसुन खाने से ब्लड प्रेशर कंट्रोल होता है
विषैले पदार्थ -
शरीर में मौजूद विषैले पदार्थों को मल या मूत्र मार्ग से बाहर करता है
हड्डियां मज़बूत करे -
शरीर की हड्डियां मजबुत होती है।
श्वसन तंत्र से जुड़ी समस्या - 
लहसुन आपकी श्वसन तंत्र के लिए काफी फायदेमंद है। इसका सेवन करने से अस्थमा, निमोनिया, ज़ुकाम, ब्रोंकाइटिस, पुरानी सर्दी, फेफड़ों में जमाव और कफ आदि से निजात और बचाव होता है।
एनर्जी बढ़ाए -
शरीर में खास प्रकार की एनर्जी आती है। जिसके आपके अंदर का आलस्य खत्म हो जाता है।
संक्रमण को खत्म करे - 
भुने हुए लहसुन खाने के 6 घंटे के बाद हमारे रक्त में मौजूद संक्रमण को खत्म करने का काम करता है।

शरीर मे सर से लेकर पाँव तक कोई भी नस खोलने का रामबाण नुस्खा




आवश्यक सामग्री 
10 gm काली मिर्च साबुत
10gm तेज पत्ता
1gm दाल चीनी
10 gm अखरोट गिरी
10gm अलसी
10gm मगज
10 gm मिश्री डला
सभी सामाग्री का वजन 61 ग्राम 

बनाने का तरीका :
    सभी को मिक्सी में पीस कर पाउडर बना ले और ६ ग्राम की 10 पुड़िया बना लीजिये |
एक पुड़िया हर रोज सुबह खाली पेट मामूली गरम पानी से लेनी है और एक घंटे तक कुछ भी नही खाना है ,हाँ चाय पी सकते हैं| ऐड़ी से ले कर चोटी तक की कोई भी नस बन्द हो खुल जाएगी |

    हृदय रोगियों के लिए बेहद फायदेमंद है|गारंटीड।लंबे समय तक लेते रहने से हार्ट पेशेंट को लकवा या हार्ट अटेक नही आयेगा|
पित्त पथरी (gallstone) के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

किडनी निष्क्रियता की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

ब्रायोनिया औषधि के उपयोग


व्यापक-लक्षण व प्रकृति
लक्षणों में कमी
जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति, धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की जोरों से और एकाएक होती है।
दर्द वाली जगह को दबाने से रोग में कमी होना
हरकत से रोगी की वृद्धि और विश्राम से रोग में कमी
ठडी हवा से आराम
जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी में)
आराम से रोग में कमी
श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना
गठिये में सूजन पर गर्म सेक से और हरकत से रोगी को आराम मिलना
रजोधर्म बन्द होने पर नाक या मुँह से खून गिरना या ऐसा होने से सिर-दर्द होना
लक्षणों में वृद्धि
सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाना
हरकत से रोग बढ़ जाना
क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग
खाने के बाद रोग में वृद्धि
गठिये में गर्मी और हरकत से आराम
क्रोध से वृद्धि
*जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की तेज, जोरों की, और एकाएक होती है – प्राय: लोग जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में एकोनाइट या बेलाडोना दे देते है, और समझते हैं कि उन्होंने ठीक दवा दी। परन्तु चिकित्सक को समझना चाहिये कि जैसे रोग के आने और जाने की गति होती है, वैसे ही औषधि के लक्षणों में भी रोग के आने और जाने की गति होती है। इस गति को ध्यान में रखकर ही औषधि का निर्वाचन करना चाहिये, अन्यथा कुछ लक्षण दूर हो सकते हैं, रोग दूर नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, एकोनाइट का रोगी हिष्ट-पुष्ट होता है, ठंड में जाने से उसे बड़ी जोर का जुकाम, खांसी या बुखार चढ़ जाता है। शाम को सैर को निकला और आधी रात को ही तेज बुखार चढ़ गया। बेलाडोना में भी ऐसा ही पाया जाता है, परन्तु उसमें सिर-दर्द आदि मस्तिष्क के लक्षण विशेष होते हैं। ब्रायोनिया में ऐसा नहीं होता। रोगी ठंड खा गया, तो उसके लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होंगे। पहले दिन कुछ छींके आयेंगी, दूसरे दिन नाक बहने लगेगा, तीसरे दिन बुखार चढ़ जायगा। बुखार, जैसे धीरे-धीरे आय वैसे धीरे-धीरे ही जायेगा। इसीलिये टाइफॉयड में एकोनाइट या बेलाडोना नहीं दिया जाता, उसके लक्षण ब्रायोनिया से मिलते हैं। औषधि देते हुए औषधि की गति और प्रकृति को समझ लेना जरूरी है। रोग के लक्षणों और औषधि की गति तथा प्रकृति के लक्षणों में साम्य होना जरूरी है, तभी औषधि लाभ करेगी। रोग दो तरह के हो सकते हैं-स्थायी तथा अस्थायी। स्थायी-रोग में स्थायी-प्रकृति की औषधि ही लाभ करेगी, अस्थायी-रोग में अस्थायी-प्रकृति की औषधि लाभ करेगी। एकोनाइट और बेलाडोना के रोग तेजी से और एकाएक आते हैं, और एकाएक ही चले जाते हैं। ऐसे रोगों में ही ये दवायें लाभप्रद हैं। ब्रायोनिया, पल्सेटिला के रोग शनै: शनै: आते हैं, और कुछ दिन टिकते हैं। इसलिये शनै: शनै: आनेवाले और कुछ दिन टिकने वाले रोगों में इन दवाओं की तरफ ध्यान जाना चाहिये। थूजा, साइलीशिया, सल्फर आदि के रोग स्थायी-प्रकृति के होते हैं, अत: चिर-स्थायी रोगों के इलाज के लिये इन औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। इसीलिये जब रोग बार-बार अच्छा हो-हो कर लौटता है तब समझना चाहिये कि यह स्थायी-रोग है, तब एकोनाइट से लाभ नहीं होगा, तब सल्फर आदि देना होगा क्योंकि एकोनाइट की प्रकृति ‘अस्थायी’ (Acute) है, और सल्फर की प्रकृति ‘स्थायी’ (Chronic) है।
*हरकत से रोग की वृद्धि और विश्राम से कमी –
दर्द होने पर हरकत से रोग बढ़ेगा इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु हरकत से रोग बढ़ने का गूढ़ अर्थ है। अगर रोगी लेटा हुआ है, तो आंख खोलने या आवाज सुनने तक से रोगी कष्ट अनुभव करता है। डॉ० मुकर्जी ने अपने ‘मैटीरिया मैडिका’ में स्वर्गीय डॉ० नाग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उन्होंने हैजे के एक रोगी को यह देखकर कि आंखें खोलने से ही उसे पाखाना होता था, ब्रायोनिया देकर ठीक कर दिया। वात-रोग, गठिया, सूजन, गिर जाने से दर्द आदि में हरकत से रोग की वृद्धि होने पर ब्रायोनिया लाभ करता है। इस प्रकार के कष्ट में आर्निका से लाभ न होने पर ब्रायोनिया से लाभ हो जाता है। ब्रायोनिया में हरकत से रोग की वृद्धि होती है-इस लक्षण को खूब समझ लेना चाहिये। अगर किसी व्यक्ति को ठंड लग गई है, रोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा है, एक दिन छीकें, दूसरे दिन शरीर में पीड़ा तीसरे दिन बुखार-इस प्रकार रोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा है, और वह साथ ही यह भी अनुभव करने लगता है कि वह बिस्तर में आराम से, शान्तिपूर्वक पड़े रहना पसन्द करता है; न्यूमोनिया, प्लुरिसी का दर्द शुरू नहीं हुआ, परन्तु वह देखता है कि रोग की शुरूआत से पहले ही उसकी तबीयत आराम चाहती है, हिलने-डुलने से उसका रोग बढ़ता है; ऐसी हालत में ब्रायोनिया ही दवा है। दायें फफड़े के न्यूमोनिया में उक्त-लक्षण होने पर ब्रायोनिया और बांये फफड़े के न्यूमोनिया में उक्त-लक्षण होने पर एकोनाइट फायदा करता है।
*यह तो ठीक है कि ब्रायोनिया में हरकत से रोग की वृद्धि होती है, परन्तु कभी-कभी ब्रायोनिया का रोगी दर्द से इतना परेशान हो जाता है कि चैन से लेट भी नहीं सकता। वह उठकर घूमना-फिरना नहीं चाहता, परन्तु दर्द इतना प्रबल होता है कि पड़े रहने में भी उसे चैन नहीं मिलता। शुरू-शुरू में वह चैन से पड़े रहना चाहता था, परन्तु अब तकलीफ़ इतनी बढ़ गई है कि न चाहते हुए भी इधर-उधर टहलने लगता है। इस हालत में चिकित्सक रस टॉक्स देने की सोच सकता है, परन्तु इस बेचैनी से टहलने में जिसमें रोग की शुरूआत में रोगी टहल नहीं सकता था, जिसमें अब भी दिल तो उसका आराम से लेटने को चाहता है, परन्तु दर्द लेटने नहीं देता, ऐसी हालत में हिलने-डुलने पर भी ब्रायोनिया ही दवा है। रोग का उपचार करते हुए रोग की समष्टि को ध्यान में रखना चाहिये, सामने जो लक्षण आ रहे हैं उनके पीछे छिपे लक्षणों को भी आँख से ओझल नहीं होने देना चाहिये।
* जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी) –
 यह लक्षण हरकत से रोग-वृद्धि के लक्षण का ही दूसरा रूप है। जिधर दर्द हो उधर का हिस्सा दबा रखने से वहां हरकत नहीं होती इसलिये दर्द की तरफ लेटे रहने से रोगी को आराम मिलता है। प्लुरिसी में जिधर दर्द हो उधर लेटने से आराम मिले तो ब्रायोनिया लाभ करेगा। प्लुरिसी में ब्रायोनिया इसलिये लाभ करता है क्योंकि फेफड़े के आवरण में जो शोथ हो जाती है, वह सांस लेते हुए जब साथ के आवरण को छूती है, तब इस छूने से दर्द होता है, परन्तु उस हिस्से को दबाये रखने से यह छूना बन्द हो जाता है, इसलिये कहते हैं कि ब्रायोनिया में जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटने से आराम मिलता है। असल में, यह लक्षण ‘हरकत से रोग की वृद्धि’ – इस लक्षण का ही दूसरा रूप है। जब दर्द का हिस्सा दब जाता है तब हरकत बन्द हो जाती है।
डॉ० बर्नेट प्रसिद्ध होम्योपैथ हुए हैं। वे पहले एलोपैथ थे। उन्हें होम्योपैथ बनाने का श्रेय ब्रायोनिया की है। वे लिखते हैं कि बचपन में उन्हें बायीं तरफ प्लुरिसी हो गई थी जिससे नीरोग होने पर भी उन्हें फेफड़े में दर्द बना रहा। सभी तरह के इलाज कराये-एलोपैथी के, जल-चिकित्सा के, भिन्न-भिन्न प्रकार के फलाहार के, भोजन में अदला-बदली के, परन्तु किसी से रोग ठीक न हुआ। अन्त में यह देखने के लिये कि होम्योपैथ इसके विषय में क्या कहते हैं, वे होम्योपैथी पढ़ने लगे। पढ़ते-पढ़ते ब्रायोनिया में उन्हें अपने लक्षण मिलते दिखाई दिये। उन्होंने ब्रायोनिया खरीद कर उसका अपने ऊपर प्रयोग किया और जो कष्ट सालों से उन्हें परेशान कर रहा था, जो किसी प्रकार के इलाज से ठीक नहीं हो रहा था, वह 15 दिन में ब्रायोनिया से ठीक हो गया। यह अनेक कारणों में से एक कारण है जिसने उन्हें एलोपैथ से होम्योपैथ बना दिया।
* श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना –
खुश्की के कारण रोगी के होंठ सूख जाते हैं, खुश्की के कारण वे चिटक जाते हैं, खून तक निकलने लगता है। एरम ट्रिफि में हम देख आये हैं कि होठों और नाक की खुश्की इस कदर बढ़ जाती है कि रोगी उन्हें नोचता-नोचता खून तक निकाल देता है। नाक में अंगुली घुसेड़ता जाता है। ब्रायोनिया में इसी खुश्की के कारण उसे प्यास बहुत लगती है। देर-देर में पानी पीता है परन्तु अधिक मात्रा में पीता है। एकोनाइट में जल्दी-जल्दी, ज्यादा-ज्यादा; आर्सेनिक में जल्दी-जल्दी थोड़ा-थोड़ा; ब्रायोनिया में दिन-रात देर-देर में ज्यादा-ज्यादा ठंडा पानी पीता है। नक्स मौस्केटा और पल्स में प्यास नहीं रहती।
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की और कब्ज – 
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की का असर आंतों पर भी पड़ता है। रोगी को कब्ज रहती है। सूखा, सख्त, भुना हुआ-सा मल आता है। बहुत दिनों में टट्टी जाता है। सख्त मल को तर करने के लिये पेट में श्लेष्मा का नामोनिशान तक नहीं होता। अगर पेट में से म्यूकस निकलता भी है तो टट्टी से अलग, टट्टी खुश्क ही रहती है। भयंकर कब्ज को यह ठीक कर देता है।
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की और खुश्क खांसी –
श्लैष्मिक-झिल्ली की शुष्कता का असर फफड़ों पर भी पड़ता है। खांसते-खांसते गला फटने-सा लगता है, परन्तु कफ भीतर से नहीं निकलता। ठंड से गरम कमरे में जाने से खांसी बढ़ने में ब्रायोनिया और गरम कमरे से ठंडे कमरे में जाने से खांसी बढ़े तो फॉसफोरस या रुमेक्स ठीक हैं। ब्रायोनिया की शिकायतें प्राय: नाक से शुरू होती हैं। पहले दिन छीकें, जुकाम, नाक से पानी बहना, आंखों से पानी, आंखों में और सिर में दर्द। इसके बाद अगले दिन शिकायत आगे बढ़ती है, तालु में गले में, श्वास प्रणालिका में तकलीफ बढ़ जाती है। अगर इस प्रक्रिया को रोक न दिया जाय, तो प्लुरिसी, न्यूमोनिया तक शिकायत पहुंच जाती है। इन सब शिकायतों में रोगी हरकत से दु:ख मानता है, आराम से पड़े रहना चाहता है। श्वास-प्रणालिका की शिकायतों-जुकाम, खांसी, गला बैठना, गायकों की आवाज का पड़ जाना, गले में टेटवे का दर्द आदि-में इस औषधि पर विचार करना चाहिये।
*रजोधर्म बन्द होने के बाद नाक या मुँह से खून गिरना या सिर-दर्द –
यह ब्रायोनिया का विश्वसनीय लक्षण है। अगर रोगिणी नाक या मुँह से खून निकलने की शिकायत करे, तो उसे यह पूछ लेना चाहिये कि उसका रजोधर्म तो बन्द नहीं हो गया। मासिक बन्द होने से भी सिर-दर्द हो जाया करता है।
*सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना, सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाना – 
कब्ज़ होने से भी सिर-दर्द शुरू हो जाता है। इस सिर-दर्द का लक्षण यह है कि यह सूर्योदय के साथ शुरू होता है, सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाता है। इसके साथ ब्रायोनिया के अन्य लक्षण भी रह सकते हैं, यथा हिलने-डुलने से सिर-दर्द का
बढ़ना, आँख खुलते ही बढ़ना।
सिर-दर्द में ब्रायोनिया और बेलाडोना की तुलना –
सूर्योदय के साथ संबंध न होने पर भी ब्रायोनिया में सिर-दर्द हो सकता है। प्रत्येक अस्थायी-रोग में सिर-दर्द उसके साथ जुड़ा ही रहता है। इतना सिर-दर्द होता है कि सिर को दबाने से ही आराम आता है। ब्रायोनिया के सिर-दर्द में रोगी को गर्मी सहन नहीं होती। हरकत से सिर-दर्द बढ़ता है, आँख झपकने तक से सिर में पीड़ा होती है। इस सिर-दर्द का कारण सिर में रक्त-संचय है। बेलाडोना में भी सिर में रक्त-संचय के कारण सिर-दर्द होता है, परन्तु दोनों में अन्तर यह है कि बेलाडोना का सिर-दर्द आधी-तूफान की तरह आता है, यकायक आता है, ब्रायोनिया का सिर-दर्द धीरे-धीरे आता है, उसकी चाल मध्यम और धीमी होती है। दोनों औषधियों की यह प्रकृति है – एकदम आना बेलाडोना की, और धीमे-धीमे आना ब्रायोनिया की प्रकृति है।
*गठिये के रोग में गर्मी और हरकत से आराम –
ब्रायोनिया का उपयोग गठिये में भी होता है। ब्रायोनिया का रोगी ठंडी हवा पसन्द करता है, ठंडा कपड़ा ओढ़ना चाहता है, परन्तु गठिये के दर्द में अपनी प्रकृति के विरुद्ध उसे गर्मी से आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यद्यपि ब्रायोनिया में रोगी आराम से लेटे रहना चाहता है, तो भी गठिये के रोग में वह चलने-फिरने से ही ठीक रहता है क्योंकि इस प्रकार उसके दुखते अंगों को गति से गर्मी मिलती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि ब्रायोनिया में परस्पर-विरुद्ध प्रकृतियां काम कर रही हैं। वह प्रकृति से ऊष्णता-प्रधान है परन्तु गठिये में उसे गर्मी पसन्द है, यह होते हुए भी उसकी आधारभूत प्रकृति ऊष्णता-प्रधान ही रहती है। गठिया ठीक होने पर आँख में दर्द-अगर यह देखा जाय कि जिस अंग में गठिये का दर्द था वह तो ठीक हो गया, परन्तु आंख में दर्द शुरू हो गया, आंख लाल हो गई, सूज गई, उसमें से रुधिर आने लगा, तब ब्रायोनिया से यह ठीक होगा।
* क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग की उत्पत्ति –
ब्रायोनिया में अनेक मानसिक-लक्षण हैं। बच्चा क्रोध करता है और जो वस्तु मिल नहीं सकती उसे फौरन चाहता है और दिये जाने पर उसे परे फेंक देता है; तरह-तरह की चीजों के लिये जिद करता और दे दी जायें तो लेने से इन्कार करता है; घर में होने पर भी कहता है-घर में जाऊंगा, उसे ऐसा गलता है कि वह घर में नहीं है। बड़ा आदमी अपने रोजगार की बातें अंटसंट बका करता है। ये लक्षण मानसिक रोग में, डिलीरियम आदि में प्रकट होते हैं। क्रोध से उत्पन्न मानसिक-लक्षणों में स्टैफ़िसैग्रिया भी उपयोगी है। अगर रोगी कहे: डाक्टर, अगर मेरा किसी से झगड़ा हो जाय, तो मैं इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि सिर-दर्द होने लगता है, नींद नहीं आती, तो ऐसे रोगी को स्टैफिसैग्रिया ठीक कर देगा।
हरकत से दस्त आना परन्तु रात को दस्त न होना 
जब तक रोगी रात को लेटा रहता है दस्त नहीं आता, परन्तु सवेरे बिस्तर से हिलते ही उसे बाथरूम में दौड़ना पड़ता है। पेट फूला रहता है, दर्द होता है और टट्टी जाने की एकदम हाजत होती है। बड़ा भारी दस्त आता है, एक बार ही नहीं, कई बार आ जाता है, और जब रोगी टट्टी से निबट लेता है तब शक्तिहीन होकर मृत-समान पड़ा रहता है, थकावट से शरीर पर पसीना आ जाता है। अगर लेटे-लेटे जरा भी हरकत करे, तो फिर बाथरूम के लिये दौड़ना पड़ता है। जो दस्त दिन में कई बार आयें और रात को जब मनुष्य हरकत नही करता बन्द हो जायें, उन्हें यह दवा ठीक कर देती है। पैट्रोलियम में रोगी रात को कितनी भी हरकत क्यों न करे उसे दस्त नहीं होता, सिर्फ दिन की दस्त होता है, रात को नहीं होता; ब्रायोनिया में दिन को दस्त होता है, रात को जरा-सी भी हरकत करे तो दस्त की हाजत हो जाती है, अन्यथा रात को दस्त नहीं होता।
ब्रायोनिया औषधि के अन्य लक्षण
*नौ बजे रोग की वृद्धि – 
ब्रायोनिया के ज्वर के लक्षण 9 बजे शाम को बढ़ जाते हैं। 9 बजे ज्वर आयेगा या सर्दी लगनी शुरू हो जायगी। कैमोमिला के लक्षण 9 बजे प्रात: बढ़ जाते हैं।
*रोगी खुली हवा चाहता है – 
ब्रायोनिया का रोगी एपिस और पल्स की तरह दरवाजे-खिड़कियां खुली रखना पसन्द करता है। बन्द कमरा उसे घुटा-घुटा लगता है। बन्द कमरे में उसकी तकलीफें बढ़ जाती है। खुली हवा उसे रुचती है।
* खाने के बाद रोग वृद्धि – 
खाने के बाद रोग बढ़ जाना इसका व्यापक लक्षण है। रोगी कहता है कि खाना खाने के बाद तबीयत गिर जाती है।
*दांत के दर्द में दबाने और ठंडे पानी से लाभ –
 दांत के दर्द में मुँह में ठंडे पानी से लाभ होता है क्योंकि ब्रायोनिया ठंड पसन्द करने वाली दवा है। जिधर दर्द हो उधर लेटने पर दर्द वाली जगह को दबाने से आराम मिलता है। यह भी ब्रायोनिया का चरित्रगत-लक्षण है। होम्योपैथी में रोग तथा औषधि की प्रकृति को जान कर उनका मिलान करने से ही ठीक औषधि का निर्वाचन हो सकता है। ठंडे पानी से और दर्द वाले दांत को दबाने से रोग बढ़ना चाहिये था, परन्तु क्योंकि ब्रायोनिया में ठंड से और दर्द वाली जगह को दबाने से आराम होना इसका ‘व्यापक-लक्षण’ (General symptom) है, इसलिये ऐसी शिकायत में ब्रायोनिया से लाभ होता है।
*गर्म-शरीर में शीत से रोग में वृद्धि –
 शरीर गर्म हो जाने पर ठंडा पानी पीने, या उसमें स्नान से रोग बढ़ जाता है। यद्यपि ब्रायोनिया के रोगी को ठंड पसन्द है, ठंडा पानी उसे रुचता है, परन्तु अगर वह गर्मी से आ रहा है, शरीर गर्म हो रहा है, तब ठंडा पानी पीने या ठंडे स्नान से उसे गठिये का दर्द बढ़ जायगा। अगर उसे खांसी होगी या सिर-दर्द होता होगा, वह बढ़ जायगा, या हो जायगा। शरीर के गर्म रहने पर ठडा पानी पीने से जोर का सिर-दर्द हो जायगा। ब्रायोनिया की तरह रस टॉक्स में भी शरीर हो, तो ठडे जल से सिर-दर्द आदि तकलीफ भयंकर रूप धारण कर लेंगी। अगर शरीर की गर्मी की हालत में ठंडा पानी पी लिया जायगा, तो पेट की भी शिकायत पैदा हो सकती है जिसमें ब्रायोनिया लाभ करेगा।
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विटामिन बी काम्प्लेक्स के स्रोत और स्वास्थ्य लाभ

    स्वस्थ रहने के लिए हम हमेशा संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाने की कोशिश करते हैं, परन्तु फिर भी कई बार हमारे खानपान में कोई न कोई ऐसी कमी रह ही जाती है, जिससे सेहत संबंधी कई समस्याएं हमें परेशान करने लगती हैं। शरीर को सुचारु रूप से चलाने में विटामिन्स और माइक्रोन्यूट्रीएंट्स बहुत जरूरी होते हैं, पर विटामिन बी-12 एक ऐसा तत्व है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सही से काम करने में मदद करता है। इसकी कमी सेहत के लिए निश्चित रूप से बड़े स्तर पर नुकसानदेह साबित हो सकती है।    विटामिन बी कॉम्पलेक्स जल में घुलनशील विटामिन है। यह हमारे शरीर के लिए जरूरी विटामिन है। विटामिन बी कॉम्पलेक्स की शरीर में कमी हो जाए तो स्मरण शक्ति कमजोर हो सकती है, आप अचानक थकान महसूस कर सकते हैं, डिप्रेशन के शिकार हो सकते हैं।


स्वस्थ रहने के लिए हम हमेशा संतुलित और पौष्टिक आहार अपनाने की कोशिश करते हैं, परन्तु फिर भी कई बार हमारे खानपान में कोई न कोई ऐसी कमी रह ही जाती है, जिससे सेहत संबंधी कई समस्याएं हमें परेशान करने लगती हैं। शरीर को सुचारु रूप से चलाने में विटामिन्स और माइक्रोन्यूट्रीएंट्स बहुत जरूरी होते हैं, पर विटामिन बी कॉम्पलेक्स एक ऐसा तत्व है, जो मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र के सही से काम करने में मदद करता है। इसकी कमी सेहत के लिए निश्चित रूप से बड़े स्तर पर नुकसानदेह साबित हो सकती है।

क्यों है जरूरी विटामिन बी कॉम्पलेक्स?
विटामिन बी कॉम्पलेक्स मेटॉबालिज्म बढ़ाता है। यह पोषण को ऊर्जा में बदलने के काम करता है। हमारी कोशिकाओं में पाए जाने वाले जीन डीएनए को बनाने और उनकी मरम्मत में सहायता करता है। यह ब्रेन, स्पाइनल कोर्ड और नसों के कुछ तत्वों की रचना में भी सहायक होता है। हमारी लाल रक्त कोशिशओं का निर्माण भी इसी से होता है। यह शरीर के सभी हिस्सों के लिए अलग-अलग तरह के प्रोटीन बनाने का भी काम करता है।

क्या हैं लक्षण-
विटामिन बी कॉम्पलेक्स की कमी से हाथ-पैरों में झनझनाहट और जलन, जीभ में सूजन, कुछ भी याद रखने में परेशानी, त्वचा का पीला पड़ना, कमजोरी महसूस होना, चलने में कठिनाई, अनावश्यक थकान, डिप्रेशन आदि समस्याएं हो सकती हैं। अगर शरीर में विटमिन बी-12 की बहुत ज्यादा कमी हो जाए तो इससे स्पाइनल कोर्ड की नसें नष्ट होने लगती हैं। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को पैरालिसिस का भी अटैक हो सकता है।
विटामिन बी कॉम्पलेक्स के स्रोत-

अक्सर यह सवाल उठता है कि हमें अपने खानपान में किन चीजों को शामिल करना चाहिए, ताकि शरीर में विटामिन बी कॉम्पलेक्स की कमी न हो। हालांकि मांसाहारी पदार्थों में विटामिन बी कॉम्पलेक्स की भरपूर मात्रा होती है, परन्तु शाकाहारी लोगों को विशेष रूप से अपने भोजन पर ध्यान देना चाहिए। विटामिन बी कॉम्पलेक्स के कुछ मुख्य स्रोत है। हमें डेरी उत्पादों का सेवन भरपूर मात्रा में करना चाहिए जैसे दूध, दही, पनीर, चीज, मक्खन, सोया मिल्क आदि। इसके अलावा जमीन के भीतर उगने वाली सब्जियों जैसे आलू, गाजर, मूली, शलजम, चुकंदर आदि में भी विटामिन बी आंशिक रूप से पाया जाता है।
विटामिन बी काम्पलेक्स के तत्व-
   विटामिन- बी कोई एक तत्व नहीं होता। यह कई रूपों में पाया जाता है। मुख्य रूप से इसकी संख्या चार है- बी-1, बी- 2, बी- 6 और बी- 16 इत्यादि। इन्हें सम्मिलित रूप से ‘बी-कम्पलेक्स’ कहा जाता है। बी-कम्पलेक्स विटामिन-सी (एस्कॉर्बिक एसिड) की भांति जल में घुलनशील है।
विटामिन- बी समूह का पहले सदस्य ‘थाइमीन’ है। अत: इसे बी-1 कहा जाता है। यह स्नायु और पाचन-प्रणाली को स्वस्थ रखता है। रोगाणुओं से संघर्ष करने की शक्ति प्रदान करता है। इसकी कमी से भूख कम लगती है। कमजोरी का अनुभव होता है। ‘बेरी-बेरी’ नामक रोग हो जाता है। मानसिक असंतुलन की समस्या पैदा होती है। यह हमे जौ, बाजरा, ज्वार, मैदा, चावल, सोयाबीन, गेहूं, अंकुरित अनाज, दलिया, मटर और मूंगफली से प्राप्त होता है।
विटामिन बी- 12 को ‘राइबो-फ्लोबिन’ भी कहते हैं। यह मुंह, जीभ और नेत्रों के लिए आवश्यक है। इसकी कमी से जीभ लाल हो जाती है, मुंह में छाले पड़ जाते हैं। मुंह के कोण फट जाते हैं, नासिका द्वार पर पपड़ी हो जाती है। आंखें कमजोर हो जाती हैं। दूध, खमीर, अनाज, दालें, दही और हरी पत्तेदार सब्जियां इसके प्रमुख स्रोत हैं।
     विटामिन बी- 6 को रसायन विज्ञान की भाषा में ‘पाइरीडॉक्सीन’ कहते हैं। यह त्वचा के लिए आवश्यक है। इसकी कमी से बुध्दि मंद पड़ जाती है। शरीर में एेंठन आती है। यह दूध, कलेजी, खमीर, मांस और अनाज में पाया जाता है।
विटामिन- बी12 का रासायनिक नाम ‘सायनोकाबालामीन’ है। यह त्वचा, तंत्रिका, उत्तक, हड्डियों और मांसपेशियों के लिए जरूरी है। इसकी कमी से एनीमिया रोग हो जाता है। यह मुख्यत: मांस, मछली, अंडा, दूध और पनीर से मिलता है।
बी- कम्पलेक्स में अन्य विटामिन इस प्रकार हैं- नाइकोटोनिक एसिड, बायोटीन, पैन्टोथेनिक एसिड और फालिक एसिड इत्यादि।
बी-कम्पलेक्स को दवा के रूप में भी सेवन कर सकते हैं। अधिकतर विटामिन की दवाइयों के साथ विटामिन- सी भी मिला हुआ रहता है। अनेक मशहूर ब्रांड के बी-कम्पलेक्स की दवाइयां मिलती है। जिनमें प्रमुख हैं- कोबाडेक्स फोर्ट कैप्सूल, बी- फ्लेक्स फोर्ट टेबलेट, पोली-विषयन सीरप व टेबलेट, बीको जाइमसी-फोर्ट टेबलेट, बेसीलेक इत्यादि।

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कचनार के पेड़ के औषधीय गुण और लाभ


कचनार का फूल जितना खूबसूरत होता है उतना ही यह सेहत के लिए भी गुणकारी होता है। मुंह में छाले आ गए हों या पेट में कीड़े हो गए हों, कचनार का फूल हर सूरत में कारगर उपचार है।
प्रकृति के पास औषधि का खजाना है जो युगों-युगों से जीवों के काम आते रहे हैं। इन्हीं में से एक कचनार का पेड़ भी है जो कई रोगों को जड़ से खत्‍म करने की क्षमता रखता है। इस पेड़ की पत्तियां, तना व फूल आदि सभी उपयोगी हैं। कचनार की गणना सुंदर व उपयोगी वृक्षों में होती है। इसकी अनेक प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से गुलाबी कचनार का सबसे ज्यादा महत्‍व है। कचनार के फूल, कलियां और वृक्ष की छाल को औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता है। यह शरीर के किसी भी भाग में ग्रंथि (गांठ) को गलाने के लिए किया जाता है। इसके अलावा रक्त विकार व त्वचा रोग जैसे- दाद, खाज-खुजली, एक्जीमा, फोड़े-फुंसी आदि के लिए भी कचनार की छाल का उपयोग किया जाता है। यह वात रोगों के लिए भी बहुत लाभकारी है।


पेट के कीड़े


पीले कचनार के छाल को पानी में उबालकर ठंडा कर लें। दो से तीन दिन इसका सेवन करने से पेट के कीड़े मर जाएंगे और छाला समाप्त हो जाएगा।

बवासीर-

 कचनार की कलियों को सूखाकर उसका पाउडर बनालें और मक्खन के साथ 11 दिनों तक सेवन करें तो खूनी बवासीर से राहत मिलता है। 
कचनार की एक चम्मच छाल को एक कप छांछ के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से बवासीर में खून गिरना बंद होता है। 

सूजन

कचनार की जड़ को पानी में घिसकर लेप बना लें और इसे गर्म कर लें। इसके गर्म-गर्म लेप को सूजन पर लगाने से आराम मिलता है।

कब्ज


कचनार के फूलों को चीनी के साथ घोटकर शर्बत की तरह बनाकर सुबह-शाम पीने से कब्ज दूर होती है और मल साफ होता है। कचनार के फूलों का गुलकन्द रात में सोने से पहले 2 चम्मच की मात्रा में कुछ दिनों तक सेवन करने से कब्ज दूर होती है।

कुबड़ापन

अगर कुबड़ापन का रोग बच्चों में हो तो उसके पीठ के नीचे कचनार का फूल बिछाकर सुलाने से कुबड़ापन दूर होता है। लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग कचनार और गुग्गुल को शहद के साथ मिलाकर सेवन करने से कुबड़ापन दूर होता है। कुबड़ापन के दूर करने के लिए कचनार का काढ़ा बनाकर सेवन करना चाहिए।

घाव

कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर सुबह-शाम पीने से घाव ठीक होता है। इसके काढ़े से घाव को धोना भी चाहिए।

स्तनों की गांठ

कचनार की छाल को पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण लगभग आधे ग्राम की मात्रा में सौंठ और चावल के पानी (धोवन) के साथ मिलाकर पीने और स्तनों पर लेप करने से गांठ ठीक होती है।

मुंह में छाले

कचनार की छाल का काढ़ा बनाकर उसमें थोड़ा-सा कत्था मिलाकर छालों पर लगाने से आराम मिलता है।

खांसी और दमा

शहद के साथ कचनार की छाल का काढ़ा 2 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से खांसी और दमा में आराम मिलता है।

दांतों के रोग

कचनार की छाल को पानी में उबाल लें और उस उबले पानी को छानकर एक शीशी में बंद करके रख लें। यह पानी 50-50 मिलीलीटर की मात्रा में गर्म करके रोजाना 3 बार कुल्ला करें। इससे दांतों का हिलना, दर्द, खून निकलना, मसूढों की सूजन और पायरिया खत्म हो जाता है।

यौन शक्ति बढ़ाने के नायाब नुस्खे



    आजकल युवा लोगों में सबसे बड़ी चिंता शीघ्रपतन को लेकर रहती है जाहिर है की नवविवाहित पुरषों में ये अधिक होती है अगर वो इन 10 घरेलू नुस्खों में से एक या दो को भी अपनी पाचन शक्ति के अनुसार अपना लेते है तो उनके जीवन में बहार आ जाएगी इन नुस्खों के इस्तेमाल में 2 या 3 बातो का विशेष ध्यान रखे एक तो कब्ज न रहने दे और कोई भी नुस्खा अपनाए तो अपनी पाचन शक्ति के अनुसार और सबसे बड़ी बात खान-पान का पूरा ध्यान रखे खट्टे व् मिर्च वाले भोजन न करें अनारदाना तो मनुष्य को नपुंसकता की और लेकर जाता है।
सेक्स पावर बढ़ाने के नुस्खे -
*सफेद मूसली का चूर्ण एक-एक चम्मच सुबह-शाम फांक कर ऊपर से एक गिलास मिश्री मिला दूध पी ले यह प्रयोग 12 महीने करें यह प्रयोग करने से शरीर कभी भी कमजोर  नहीं होगा और बल वीर्य बढ़ेगा और यौन शक्ति बनी रहेगी|
*आधा सेर दूध में चार छुहारे डाल कर उबाले जब खूब अच्छी तरह दूध उबलने लगे तो इसमें केसर की 5 -6 पंखुड़िया और 4 चम्मच मिश्री डाल दीजिये जब दूध उबालकर आधा रह जाये तो इस दूध को सोने से पहले घूंट-घूंट कर के पी जाये यह बहुत ही पोष्टिक प्रयोग है और शीतकाल में करने योग्य है|
मुलहठी का चूर्ण एक चम्मच (6 ग्राम ) और एक छोटा चम्मच देसी घी और दो चम्मच शहद मिलाकर चाट ले इसके बाद एक गिलास दूध में आधा चम्मच सौंठ और एक चम्मच मिश्री डालकर उबालकर थोड़ा ठंडा करके पिए यह प्रयोग शरीर की सभी धा-तुओं को बेहद पुष्ट कर देगा| इस प्रयोग को हर रोज सोने से पहले या सहवास के बाद करना चाहिए
*इमली के बीज चार दिन तक पानी में घोलकर रखे इसके बाद इनका छिलका हटाकर इसकी गिरी के दोगुने वजन के बराबर दो वर्ष पुराण गुड लेकर मिला ले अभी इनको पीसकर बराबर कर ले अभी इसकी छोटे बेर जितनी गोलिया बना ले और छाया में सुखा लीजिए सहवास करने से दो घंटे पहले पानी के साथ निगल ले यह धातु पोष्टिक नुस्खा है|
*असगंद और बिधारा दोनों को अलग-अलग कुट पिसकर महीन चूर्ण बना कर बराबर मात्रा में मिला लीजिए हर रोज सुबह एक चम्मच चूर्ण थोड़े से घी में मिलाकर चाट ले और ऊपर से मिश्री मिला दूध पी ले हर सर्दियों में यह प्रयोग 3 -4 महीने के लिए करें और इसके साथ नारियल तेल या नारायण तेल की मालिश शरीर पर करें फिर देखे इस नुस्खे का चमत्कार|
 * उड़द की दाल पिसवाले इसे शुद्ध देसी घी में सेंककर कांच के बर्तन में भरकर रख ले एक-एक चम्मच यह दाल थोड़े से घी में मिलाकर सुबह व रात को सोते समय खाकर ऊपर से मिश्री मिला दूध पी ले इससे धातु ,बल ,वीर्य स्तंभन  बढ़ेगी| अगर उड़द न पचा सके तो एक समय ही ले|

बालों के झड़ने और गंजेपन के रामबाण उपचार 

कोंच के बीज 250 ग्राम ,ताल मखाना 100 ग्राम और मिश्री 350 ग्राम इन सबको अलग-अलग पीसकर चूर्ण कर ले और मिलाकर शीशी में भर ले सुबह-शाम इस चूर्ण को एक-एक चम्मच मिश्री वाले दूध के साथ पिए
*सफेद या लाल प्याज का रस ,शहद,अदरक का रस ,देसी घी 6 -6 मिलाकर नित्य चाटे एक महीने के सेवन से नपुंसक भी शक्तिशाली हो जाता है नित्य करने से सेक्स पावर बहुत बढ़ जाती है|
*सूखे सिंघाड़े पिसवा लीजिए इसके आटे का हलवा बनाकर सुबह नाश्ते में अपनी पाचन शक्ति के अनुसार खूब चबा-चबा कर खाये यह शरीर को पुष्ट और शक्तिशाली बनाता है नवविवाहित नोजवानो के लिए यह बहुत ही उपयोगी है इससे धातु पुष्ट  होकर शरीर बलिष्ठ होता है|
*शकरकंदी का हलवा देसी घी में बनाकर हर रोज नाश्ते में खाये इसके गुण सिंघाड़े के आटे के हलवे के बराबर है हर रोज खाने वाला व्यक्ति कभी भी शीघ्र पतन का शिकार नहीं होता|

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि 

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आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचा


होम्योपैथिक औषधि फास्फोरस के लक्षण उपयोग



Phosphorus Homeopathic Medicine 
लक्षण तथा मुख्य-रोग लक्षणों में कमी
स्नायु-संस्थान (Nervous system) के रोगी की प्रमुख औषधि (लक्षणों का यकायक होना – नि:सत्वता, बेहोशी, पसीना) खाने से रोगी को आराम
जीवनी-शक्ति का निम्न-स्तर पर पहुंच जाना (शोक, चिंता, मानसिक कार्य में अतिः व्यभिचार आदि का दुष्परिणाम) नींद से रोगी को आराम
स्नायु-रोग में भिन्न-भिन्न अंगों में जलन; जलन में सल्फर और आर्सेनिक से तुलना मालिश से रोगी की आराम
सहज-स्राव (Bleeding remedy) नमकीन और घी के पदार्थ पसन्द करना
सारी पाक-स्थली का खाली-खाली अनुभव करना और रात को भी उठकर खाना लक्षणों में वृद्धि
रोगी के शीत-प्रधान होने पर भी पेट तथा सिर में ठंड पसन्द करना ठंडी हवा से रोग-वृद्धि
कब्ज में कुत्ते के मल-जैसा, और दस्तों में मल-द्वार मानो खुल गया जैसा लगना वायु-मंडल में एकदम परिवर्तन से रोग-वृद्धि-
गर्म कमरे से ठंडे स्थान में जाने से खांसी, गला पकना या बैठ जाना मानसिक श्रम से रोग-वृद्धि
न्यूमोनिया तथा टी०बी० में उपयोगी – न्यूमोनिया में रोगी बांयी करवट नहीं लेट सकता बाईं करवट लेटने से वृद्धि-
* स्नायु-संस्थान (Nervous system) के रोगी की प्रमुख औषधि (लक्षणों का यकायक होना – नि:सत्वता, बेहोशी, पसीना) – स्नायु-संस्थान पर प्रभाव करने वाली फास्फोरस के बराबर दूसरी कोई औषधि नहीं है। स्नायु-संस्थान का केन्द्र मस्तिष्क तथा मेरु-दंड (Spinal cord) है। इन पर जब रोग आक्रमण करता है तब यकायक लक्षण प्रकट होते हैं। रोगी एकदम नि:सत्व, पक्षाघात हो जाता है, बेहोशी आ जाती है, एकदम पसीना आने लगता है। ये सब मस्तिष्क अथवा स्नायु-संस्थान पर रोग के आक्रमण के लक्षण हैं, और इन लक्षणों के होने पर फास्फोरस का ध्यान में रखना उचित है।
* जीवनी-शक्ति का निम्न-स्तर पर पहुंच जाना -
शोक, चिंता, मानसिक कार्य में अतिः व्यभिचार आदि का दुष्परिणाम–
 इस प्रकार मस्तिष्क तथा मेरु-दण्ड पर रोग का आक्रमण तब होता है जब जीवनी-शक्ति अपने निम्नतम स्तर पर पहुंच जाती है। निम्नतम स्तर पर पहुंचने के अनेक कारण हो सकते हैं। उदाहरणार्थ, दु:ख, शोक, चिंता, दिन-रात मानसिक कार्य में लगे रहने से उसमें अति कर देना या व्यभिचार आदि कुकर्मों में जीवनी-शक्ति का ह्रास कर देना आदि ऐसे कारण हैं जिनसे जीवनी-शक्ति निम्नतम-स्तर में पहुंच जाती है और यकायक शक्तिहीनता, कंपन, अंगों का सुन्न पड़ जाना, एकदम पसीना आना आदि लक्षण प्रकट होने लगते हैं। फास्फोरस का इस अवस्था पर विशेष स्वास्थ्यप्रद प्रभाव है। इससे स्नायुओं का पोषण होने लगता है, उनका क्षीण होना रुक जाता है। इसलिये इसे ‘स्नायु की औषधि’ (Nerve remedy) कहा जाता है। जीवनी-शक्ति के निम्न-स्तर पर होने की दशा में कोई छोटा-सा भी कारण शारीरिक तथा मानसिक क्षीणता को उत्पन्न कर सकता है और जरा-सी ही मानसिक-आघात से मनुष्य ढह सकता है।
स्नायु-रोग में भिन्न-भिन्न अंगों में जलन; जलन में सल्फर और आर्सेनिक से तुलना – 
जीवनी-शक्ति को निम्नतम-स्तर पर पहुंचने का प्रथम-प्रकाश शरीर के भिन्न-भिन्न अंगों में जलन के रूप में प्रकट होता है। यह जलन विशेष तौर पर त्वचा में होती है। रोगी खासकर प्रात: काल इस जलन से बेचैन रहता है, घबराया रहता है, चिंताकुल रहता है, टिक कर बैठ नहीं सकता, लगातार हरकत करता रहता है, कभी यहाँ बैठता है, कभी वहां, न कहीं चैन से खड़ा रह सकता है, न कहीं चैन से बैठ सकता है, कहीं टिक नहीं सकता। जिंकम में भी न टिकने का लक्षण है, परन्तु न टिक सकने की बेचैनी उसके पैरों तक सीमित रहती है, वह पैर हिलाता रहता है, परन्तु फास्फोरस तो समस्त शरीर से बेचैन रहता है, बेचैनी सिर्फ पैरों में ही सीमित नहीं रहती।
फास्फोरस की जलन विशेष तौर पर रीढ़ की हड्डी में पायी जाती है। रीढ़ की हड्डी के भिन्न-भिन्न स्थानों में रोगी को जलन अनुभव होती है, खास करके दोनों फलकों के बीच के स्थान पर। लाइको में भी फलकों के बीच के स्थान पर जलन पायी जाती है। लाइको में कन्धों के बीच में जलन ऐसी अनुभव होती है जैसे राई का प्लास्तर लगा हो। रीढ़ की हड्डी के अलावा पीठ में भी जलन नीचे से ऊपर को जाती है। इस प्रकार की जलन इसमें अन्य किसी औषधि की अपेक्षा अधिक है। मेरु-दंड (Spinal cord) के रोगों में फास्फोरस का अन्य औषधियों की अपेक्षा प्रमुख स्थान है।
जलन में फास्फोरस की सल्फर तथा आर्सेनिक से तुलना- 
जलन में मुख्य तौर पर तीन औषधियों की तरफ ध्यान दिया जाता है। वे है – सल्फर, आर्सेनिक तथा फास्फोरस। जलन के पुराने रोगों में सल्फर और नवीन रोगों में आर्सेनिक उपयोगी है। इसका यह अभिप्राय नहीं कि आर्सेनिक जलन के पुराने रोगों में लाभ नहीं करता। अगर घाव बहुत पुराना हो जाय सड़ने लगे, जलन करता हो, तो पुराना होने पर भी उसमें आर्सेनिक लाभ करेगा। फास्फोरस की जलन इतनी ही तीव्र होती है जैसी सल्फर या आर्सेनिक की, परन्तु भेद यह है कि आर्सेनिक की जलन में सेंक से रोगी को आराम पहुंचता है, जो बात सल्फर और फास्फोरस में नहीं है। फास्फोरस की जलन सिर्फ स्नायविक हो सकती है। जहां कहीं भी तीव्र जलन का लक्षण हो, वहां फास्फोरस को प्रमुख स्थान दिया जाना चाहिये। सिकेल कौर में भी जलन है, परन्तु उसकी जलन आर्सेनिक से उल्टी होती है। आर्सेनिक तो गर्मी पसन्द करता है, परन्तु सिकेल गर्मी को बर्दाश्त नहीं कर सकता, कपड़ा तक अपने पर नहीं रख सकता। सल्फर की जलन प्राय: पाँव के तलुवों में अनुभव होती है, बिस्तर में जाते ही रोगी के पांव के तलुवे जलने लगते हैं, वह बिस्तर में पांव रखने के लिये ठंडी जगह ढूंढा करता है या बिस्तर से पांव बाहर निकाल लेता है, फास्फोरस की जलन विशेष तौर से हथेलियों में होती है। जैसे सल्फर का रोगी पांवों को नहीं ढक सकता, वैसे फास्फोरस का रोगी हाथों को नहीं ढक सकता। जलन हाथों से शुरू होकर शरीर के अन्य स्थानों पर, चेहरे तक भी फैल जाती है।
*सहज-स्राव (Bleeding remedy) – 
इस औषधि के रोगी को रक्त-स्राव झट से होने लगता है। जरा-सी चोट से खून निकलने लगता है, जमता नहीं। किसी-किसी रोगी के लिये रक्त-स्राव की यह प्रकृति अत्यन्त खतरनाक होती है। उसका रक्त बहता ही जाता है, इसी से उसकी मृत्यु तक हो सकती है। फास्फोरस प्रकृति की स्त्री को रक्त-स्राव तो होना ही चाहिये, अगर माहवारी का रक्त-स्राव नहीं होता, तो किसी और जगह से खून बह निकलेगा। नाक से, फेफड़ों से, किसी भी स्थान से रक्त बह-निकलना चाहिये अगर वहां से न निकलेगा, तो दूसरी जगह से निकलेगा।
*कब्ज में कुत्ते के मल-जैसा- 
और दस्तों में मल-द्वार मानो खुल गया जैसा लगना – कब्ज में मल खुश्क, लम्बा, कुत्ते के मल-जैसा, चिमड़ा और बहुत कांखने से निकलता है। अगर रोगी को दस्त आये तो ऐसे लगता है मानो पानी का नलका धड़ाके से खुल गया और नल के पानी की तरह बहने लगा। अगर ऐसा नहीं होता, तो मल अपने-आप गुदा-प्रदेश से रिसा करता है। हनीमैन ने लिखा है कि यह औषधि उन रोगियों को बहुत लाभ पहुंचाती है, जो पतली टट्टी या अतिसार (दस्तों) के पुराने मरीज होते हैं।
* गर्म कमरे से ठंडे स्थान में जाने से खांसी, गला पकना या बैठ जाना –
 गर्म कमरे में ठंडी हवा में जाने से खांसी उठने लगे तो फास्फोरस, और ठंडक से गर्म कमरे में जाने से खांसी आये तो ब्रायोनिया औषधि है। गला पक जाता है, दुखने लगता है, बोला नहीं जाता। गायकों तथा व्याख्याताओं के गला बैठ जाने और दुखने में फास्फोरस लाभप्रद है। डॉ० फ़ैरिंगटन लिखते हैं कि जब खाँसी में गले की बहुत गहराई से जोर लगाकर कफ उठाना पड़े, तब फास्फोरस से लाभ होता है।
*न्यूमोनिया तथा टी०बी० में उपयोगी – 
न्यूमोनिया में रोगी बांयी करवट नहीं लेट सकता – हम लाइकोपोडियम के प्रकरण में लिख आये हैं कि न्यूमोनिया में तीन अवस्थाएं होती हैं – पहली अवस्था ‘शोथावस्था’ (Congestive stage) की होती है जिसमें फेफड़े में शोथ हो जाती है; दूसरी अवस्था ‘स्थूलावस्था’ (Hepatization) की है जिसमें फेफड़ा कफ से भर जाता और कड़ा पड़ जाता है; तीसरी अवस्था ‘विपाकावस्था’ (Stage of Resolution) की है जिसमें अगर कफ घुल गया तो रोगी अच्छा हो जाता है, न घुला तो कफ न निकल सकने के कारण मर जाता है। तीसरी अवस्था में रोगी सांस के लिये छटपटाता है और उसके नथुने पंखे की तरह सांस लेने के लिये चलते हैं। इस अवस्था में लाइको चमत्कारी लाभ करता है।
* सारी पाक-स्थली का खाली-खाली अनुभव करना और रात को भी उठकर खाना – 
रोगी अनुभव करता है कि उसकी सम्पूर्ण पाक-स्थली खाली हो गई है, उसमें कुछ नही रहा। रोगी बिना खाये नहीं रह सकता, रात को भी उठकर खाता है। भूख को क्षण भर के लिये भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। अभी खाया है, परन्तु खाने के बाद फिर भूख को अनुभव करता है। खाने से उसका कष्ट मिलता है, परन्तु खाने के बाद फिर भूख का अनुभव होता है। इस प्रकार भूख का अनुभव होना आयोडाइन, चेलिडोनियम, पेट्रोलियम तथा ऐनाकार्डियम में पाया जाता है। परन्तु भूख अनुभव होने के अतिरिक्त रोगी को पेट का खाली-खाली होने का अनुभव होना भी फास्फोरस का लक्षण है। पेट के खाली-खाली होने का लक्षण इग्नेशिया, कैलि कार्ब, सीपिया तथा स्टैनम में भी पाया जाता है, परन्तु फास्फोरस में पेट का खालीपन ऊपर-नीचे सारे पेट में होता है, पेट में ही नहीं, संपूर्ण ‘पाक-स्थली’ में पाया जाता है। इग्नेशिया में पेट के खालीपन के साथ रोगिणी गहरी सांस छोड़ती है; कैलि कार्ब में पेट अन्दर घसता-सा महसूस होता है, खाने से भी यह नहीं मिटती; सीपिया में पेट की शून्यता ‘मानो पेट में कुछ भी नहीं’ खाने से कम हो जाती है; स्टैनम में पेट के खालीपन के साथ छाती की कमजोरी पायी जाती है। पेट के खाली-खाली होने का अनुभव फास्फोरस में सबसे ज्यादा पाया जाता है।
*रोगी के शीत-प्रधान होने पर भी पेट तथा सिर में ठंड पसन्द करना – 
रोगी स्वभाव से शीत-प्रधान होता है, ठंड से उसके रोग बढ़ जाते हैं, गर्मी पसन्द करता है, यह उसका ‘व्यापक-लक्षण’ है। परन्तु कभी-कभी ‘व्यापक-लक्षण’ तथा ‘अंग विशेष के लक्षण’ में विरोध भी होता है। फास्फोरस का रोगी अपने ‘व्यापक-लक्षण’ में तो शीत-प्रधान है, परन्तु पेट तथा सिर के रोगों में उसे ठंडक पसन्द होती है। वह आइसक्रीम खाना पसन्द करता है, बर्फ का पानी पीना चाहता है, परन्तु पेट में ठंडे पानी पीने के साथ इसका लक्षण यह है कि पेट में जब वह पानी गर्म हो जाता है, तब उल्टी हो जाती है। अगर रोगी शीत-प्रधान हो, परन्तु ठंडा पानी पीये और ठंडा पानी पीने के बाद जब वह पेट में गर्म हो जाय तब उल्टी हो जाय, तो फास्फोरस से अवश्य लाभ होगा। पेट के दर्द में अगर ठंडी चीजें खाने से आराम हो, गर्म खाने से तकलीफ बढ़े, तो पेट में कैंसर होने की संभावना होती है। ऐसे लक्षण में फास्फोरस लाभ करता है।
फास्फोरस औषधि के अन्य लक्षण
*रोगी नंगा हो जाता है – कभी-कभी रोगी प्रेमावेश में आकर अपने को नंगा कर लेता है। निर्लज्ज होकर अपने अंगों का प्रदर्शन करता है। हायोसाइमस में भी यह लक्षण है।
*पुराने जुकाम में खून आना –
 रोगी का जुकाम पुराना हो जाता है। उसके रुमाल में जुकाम का खून लग रहता है तब फास्फोरस 200 की एक मात्रा से लाभ होगा।
*नींद देर में और टूट-टूट कर आती है – 
रोगी को नींद देर में, और टूट-टूट कर आती है। प्रेम के स्वप्न आते है।
*पपोटे सूजना – ऊपर के पपोटों के सूजने में कैलि कार्ब, नीचे के पपोटों के सूजने में एपिस तथा आंखों के ऊपर-नीचे और चेहरे के सूजन में फास्फोरस उपयोगी है।
*नींद के बाद आराम – थोड़ी भी नींद के बाद रोगी को आराम मिलता है। लैकेसिस में नींद के बाद रोग के लक्षण बढ़ जाते हैं।
* वृद्ध-पुरुषों के चक्कर – 
मस्तिष्क के रोग में चक्कर आने तथा वृद्ध-पुरुषों के अनेक प्रकार के चक्करों में यह महौषधि है। दूसरी कोई औषधि चक्कर के इतने लक्षणों पर नहीं घटती
*फास्फोरस का सजीव मूर्त-चित्रण – 
स्नायु-प्रधान, तपेदिक के रोगी जैसा, लम्बा, पतला, चिपटी छाती, जन्म से कमजोर, हड्डियां ऐसी जैसे जल्दी बढ़ गयी हों, जरा-से शारीरिक या मानकिस श्रम से पस्त हो जाने वाला। किसी बात में मन नहीं लगता। चाहता है कि कोई शरीर को दबाता रहे, मालिश कर दे। रक्तहीन लड़के या लड़कियां। सर्दी बर्दाश्त नहीं होती। नमकीन चीजें पसन्द होती हैं। ऐसा है मूर्त-रूप फास्फोरस का।
*शक्ति तथा प्रकृति – फास्फोरस 6, फास्फोरस 30, फास्फोरस 200 (औषधि ‘सर्द’-प्रकृति के लिये है|

Coronavirus के उपचार में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन लेना फायदेमंद या नुकसानदेह ?



इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) ने बताया है कि कोरोना मरीजों की देखभाल में जुटे डॉक्टरों, या मरीज के साथ रह रहे लोगों में कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन (HCQ) मददगार साबित हो सकती है। आईसीएमआर ने इससे संबंधित एक नोटिफिकेशन भी जारी किया है। वहीं कुछ लोगों को इस बात की गलतफहमी हो गई है कि कोरोना वायरस से निबटने की दवा तैयार कर ली गई है और अब इससे डरने की कोई जरूरत नहीं है। मलेरिया के ईलाज इस्तेमाल होने वाली इस दवा की जनकर कालाबाजारी हो रही है।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की सोच बेहद घातक है क्योंकि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन कोरोना वायरस से संक्रमित व्यक्ति का उपचार करने के लिए नहीं, बल्कि उसके उपचार में मदद कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों में कोरोना का संक्रमण रोकने के लिए सुझायी गयी है।
क्या है हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन
दरअसल, हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन या क्लोरोक्वीन से मलेरिया के उपचार में इस्तेमाल की जाने वाली दवा है। मलेरिया के मामलों में इसका काफी अच्छा असर होता है। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का बेहतर असर देखते हुए कुछ विशेषज्ञों ने इसे आर्थराइटिस के मरीजों के उपचार में भी इस्तेमाल किया और इसे असरकारी पाया। लेकिन यही दवा कोरोना वायरस संक्रमित व्यक्ति के लिए उपयोगी हो सकती है या नहीं, अभी इसे गारंटी के साथ नहीं कहा जा सकता।
लेकिन मरीजों के उपचार के दौरान स्वास्थ्यकर्मी डॉक्टर-नर्स या मरीज के करीबी जो उनके आसपास रहते हैं, उनमें भी कोरोना संक्रमण फैलने की आशंका रहती है। इन लोगों में कोरोना का संक्रमण फैलने से रोकने के लिए ही हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। लेकिन इसे कोरोना से निबटने की दवा नहीं हैं और इस पर अभी परीक्षण चल रहा है।
चर्चा में क्यों आई
दरअसल, पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कोरोना के खतरे पर बातचीत करते हुए हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की चर्चा कर दी थी। इससे कुछ लोगों में यह संदेश चला गया कि अमेरिका ने कोरोना वायरस का इलाज खोजने में लगभग सफलता हासिल कर ली है। इसके बाद से ही हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन या क्लोरोक्वीन पर खूब चर्चा होने लगी।
बिना सच जाने लोग इसकी कालाबाजारी तक करने लगे और अचानक यह दवा बाजार से गायब हो गई। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह सही जानकारी नहीं है, और बिना डॉक्टरों की विशेष निगरानी में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल किया गया तो यह बेहद नुकसानदेह हो सकती है।
क्या कहते हैं विशेषज्ञ
अपोलो हॉस्पिटल दिल्ली में सीनियर कंसलटेंट डॉक्टर एसके पोद्दार ने अमर उजाला से विशेष बातचीत में कहा कि हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की दवा केवल डॉक्टरों के निर्देश पर ही इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अपने स्तर पर इसका सेवन बेहद घातक साबित हो सकता है।
कोरोना मरीजों का उपचार कर रहे स्वास्थ्यकर्मियों या नजदीकी लोगों को भी हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन देने के समय विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए। हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन और क्लोरोक्वीन दोनों ही मलेरिया के उपचार की दवाएं हैं। लेकिन नकारात्मक प्रभावों में कमी होने के कारण विशेषज्ञ क्लोरोक्वीन के डेरेवेटिव हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का ही इस्तेमाल ज्यादा उपयुक्त समझते हैं।
स्वास्थ्यकर्मियों को भी पहले हफ्ते में हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की एक गोली (400 mg) सुबह और एक गोली शाम को देनी चाहिए। इसके अगले हफ्ते से लेकर आगे के तीन हफ्तों तक हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन की एक-एक गोली तीन हफ्तों तक दी जानी चाहिए।
इस दवा को देने से पहले स्वास्थ्यकर्मी/मरीज के परिवार के व्यक्ति की ईसीजी होनी चाहिए। साथ ही, जब तक दवा चल रही है, बीच-बीच में ईसीजी/शुगर लेवल चेक किया जाना चाहिए। पंद्रह वर्ष से कम आयु के मरीजों को इसे किसी भी हालत में बिल्कुल नहीं दी जानी चाहिए।
क्या है खतरा
अगर कोई व्यक्ति बिना डॉक्टर की सलाह के हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन का इस्तेमाल शुरू करता है, तो इसके गंभीर परिणाम देखने को मिल सकते हैं। इस दवा से हार्ट ब्लॉक जैसी स्थिति भी पैदा हो सकती है जो किसी को भारी पड़ सकती है। इसके आलावा हाइड्रोक्सीक्लोरोक्वीन शुगर लेवल घटा देती है, इसका भी नकारात्मक असर देखने को मिल सकता है। कुछ मामलों में यह दृष्टि क्षमता को भी प्रभावित कर सकती है।

ब्रायोनिया (Bryonia) होम्योपैथिक औषधि के लक्षण उपयोग






व्यापक-लक्षण व प्रकृति
लक्षणों में कमी
जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति, धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की जोरों से और एकाएक होती है।
दर्द वाली जगह को दबाने से रोग में कमी होना
हरकत से रोगी की वृद्धि और विश्राम से रोग में कमी
ठडी हवा से आराम
जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी में)
आराम से रोग में कमी
श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना
गठिये में सूजन पर गर्म सेक से और हरकत से रोगी को आराम मिलना
रजोधर्म बन्द होने पर नाक या मुँह से खून गिरना या ऐसा होने से सिर-दर्द होना
लक्षणों में वृद्धि
सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाना
हरकत से रोग बढ़ जाना
क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग
खाने के बाद रोग में वृद्धि
गठिये में गर्मी और हरकत से आराम
क्रोध से वृद्धि
*जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में ब्रायोनिया की गति धीमी, एकोनाइट तथा बेलाडोना की तेज, जोरों की, और एकाएक होती है – प्राय: लोग जुकाम, खांसी, ज्वर आदि रोगों में एकोनाइट या बेलाडोना दे देते है, और समझते हैं कि उन्होंने ठीक दवा दी। परन्तु चिकित्सक को समझना चाहिये कि जैसे रोग के आने और जाने की गति होती है, वैसे ही औषधि के लक्षणों में भी रोग के आने और जाने की गति होती है। इस गति को ध्यान में रखकर ही औषधि का निर्वाचन करना चाहिये, अन्यथा कुछ लक्षण दूर हो सकते हैं, रोग दूर नहीं हो सकता। उदाहरणार्थ, एकोनाइट का रोगी हिष्ट-पुष्ट होता है, ठंड में जाने से उसे बड़ी जोर का जुकाम, खांसी या बुखार चढ़ जाता है। शाम को सैर को निकला और आधी रात को ही तेज बुखार चढ़ गया। बेलाडोना में भी ऐसा ही पाया जाता है, परन्तु उसमें सिर-दर्द आदि मस्तिष्क के लक्षण विशेष होते हैं। ब्रायोनिया में ऐसा नहीं होता। रोगी ठंड खा गया, तो उसके लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होंगे। पहले दिन कुछ छींके आयेंगी, दूसरे दिन नाक बहने लगेगा, तीसरे दिन बुखार चढ़ जायगा। बुखार, जैसे धीरे-धीरे आय वैसे धीरे-धीरे ही जायेगा। इसीलिये टाइफॉयड में एकोनाइट या बेलाडोना नहीं दिया जाता, उसके लक्षण ब्रायोनिया से मिलते हैं। औषधि देते हुए औषधि की गति और प्रकृति को समझ लेना जरूरी है। रोग के लक्षणों और औषधि की गति तथा प्रकृति के लक्षणों में साम्य होना जरूरी है, तभी औषधि लाभ करेगी। रोग दो तरह के हो सकते हैं-स्थायी तथा अस्थायी। स्थायी-रोग में स्थायी-प्रकृति की औषधि ही लाभ करेगी, अस्थायी-रोग में अस्थायी-प्रकृति की औषधि लाभ करेगी। एकोनाइट और बेलाडोना के रोग तेजी से और एकाएक आते हैं, और एकाएक ही चले जाते हैं। ऐसे रोगों में ही ये दवायें लाभप्रद हैं। ब्रायोनिया, पल्सेटिला के रोग शनै: शनै: आते हैं, और कुछ दिन टिकते हैं। इसलिये शनै: शनै: आनेवाले और कुछ दिन टिकने वाले रोगों में इन दवाओं की तरफ ध्यान जाना चाहिये। थूजा, साइलीशिया, सल्फर आदि के रोग स्थायी-प्रकृति के होते हैं, अत: चिर-स्थायी रोगों के इलाज के लिये इन औषधियों का प्रयोग करना चाहिये। इसीलिये जब रोग बार-बार अच्छा हो-हो कर लौटता है तब समझना चाहिये कि यह स्थायी-रोग है, तब एकोनाइट से लाभ नहीं होगा, तब सल्फर आदि देना होगा क्योंकि एकोनाइट की प्रकृति ‘अस्थायी’ (Acute) है, और सल्फर की प्रकृति ‘स्थायी’ (Chronic) है।
*हरकत से रोग की वृद्धि और विश्राम से कमी –
दर्द होने पर हरकत से रोग बढ़ेगा इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, परन्तु हरकत से रोग बढ़ने का गूढ़ अर्थ है। अगर रोगी लेटा हुआ है, तो आंख खोलने या आवाज सुनने तक से रोगी कष्ट अनुभव करता है। डॉ० मुकर्जी ने अपने ‘मैटीरिया मैडिका’ में स्वर्गीय डॉ० नाग का उल्लेख करते हुए लिखा है कि उन्होंने हैजे के एक रोगी को यह देखकर कि आंखें खोलने से ही उसे पाखाना होता था, ब्रायोनिया देकर ठीक कर दिया। वात-रोग, गठिया, सूजन, गिर जाने से दर्द आदि में हरकत से रोग की वृद्धि होने पर ब्रायोनिया लाभ करता है। इस प्रकार के कष्ट में आर्निका से लाभ न होने पर ब्रायोनिया से लाभ हो जाता है। ब्रायोनिया में हरकत से रोग की वृद्धि होती है-इस लक्षण को खूब समझ लेना चाहिये। अगर किसी व्यक्ति को ठंड लग गई है, रोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा है, एक दिन छीकें, दूसरे दिन शरीर में पीड़ा तीसरे दिन बुखार-इस प्रकार रोग धीरे-धीरे बढ़ने लगा है, और वह साथ ही यह भी अनुभव करने लगता है कि वह बिस्तर में आराम से, शान्तिपूर्वक पड़े रहना पसन्द करता है; न्यूमोनिया, प्लुरिसी का दर्द शुरू नहीं हुआ, परन्तु वह देखता है कि रोग की शुरूआत से पहले ही उसकी तबीयत आराम चाहती है, हिलने-डुलने से उसका रोग बढ़ता है; ऐसी हालत में ब्रायोनिया ही दवा है। दायें फफड़े के न्यूमोनिया में उक्त-लक्षण होने पर ब्रायोनिया और बांये फफड़े के न्यूमोनिया में उक्त-लक्षण होने पर एकोनाइट फायदा करता है।
*यह तो ठीक है कि ब्रायोनिया में हरकत से रोग की वृद्धि होती है, परन्तु कभी-कभी ब्रायोनिया का रोगी दर्द से इतना परेशान हो जाता है कि चैन से लेट भी नहीं सकता। वह उठकर घूमना-फिरना नहीं चाहता, परन्तु दर्द इतना प्रबल होता है कि पड़े रहने में भी उसे चैन नहीं मिलता। शुरू-शुरू में वह चैन से पड़े रहना चाहता था, परन्तु अब तकलीफ़ इतनी बढ़ गई है कि न चाहते हुए भी इधर-उधर टहलने लगता है। इस हालत में चिकित्सक रस टॉक्स देने की सोच सकता है, परन्तु इस बेचैनी से टहलने में जिसमें रोग की शुरूआत में रोगी टहल नहीं सकता था, जिसमें अब भी दिल तो उसका आराम से लेटने को चाहता है, परन्तु दर्द लेटने नहीं देता, ऐसी हालत में हिलने-डुलने पर भी ब्रायोनिया ही दवा है। रोग का उपचार करते हुए रोग की समष्टि को ध्यान में रखना चाहिये, सामने जो लक्षण आ रहे हैं उनके पीछे छिपे लक्षणों को भी आँख से ओझल नहीं होने देना चाहिये।
* जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटे रहने से आराम (जैसे, प्लुरिसी) –
 यह लक्षण हरकत से रोग-वृद्धि के लक्षण का ही दूसरा रूप है। जिधर दर्द हो उधर का हिस्सा दबा रखने से वहां हरकत नहीं होती इसलिये दर्द की तरफ लेटे रहने से रोगी को आराम मिलता है। प्लुरिसी में जिधर दर्द हो उधर लेटने से आराम मिले तो ब्रायोनिया लाभ करेगा। प्लुरिसी में ब्रायोनिया इसलिये लाभ करता है क्योंकि फेफड़े के आवरण में जो शोथ हो जाती है, वह सांस लेते हुए जब साथ के आवरण को छूती है, तब इस छूने से दर्द होता है, परन्तु उस हिस्से को दबाये रखने से यह छूना बन्द हो जाता है, इसलिये कहते हैं कि ब्रायोनिया में जिस तरफ दर्द हो उस तरफ लेटने से आराम मिलता है। असल में, यह लक्षण ‘हरकत से रोग की वृद्धि’ – इस लक्षण का ही दूसरा रूप है। जब दर्द का हिस्सा दब जाता है तब हरकत बन्द हो जाती है।
डॉ० बर्नेट प्रसिद्ध होम्योपैथ हुए हैं। वे पहले एलोपैथ थे। उन्हें होम्योपैथ बनाने का श्रेय ब्रायोनिया की है। वे लिखते हैं कि बचपन में उन्हें बायीं तरफ प्लुरिसी हो गई थी जिससे नीरोग होने पर भी उन्हें फेफड़े में दर्द बना रहा। सभी तरह के इलाज कराये-एलोपैथी के, जल-चिकित्सा के, भिन्न-भिन्न प्रकार के फलाहार के, भोजन में अदला-बदली के, परन्तु किसी से रोग ठीक न हुआ। अन्त में यह देखने के लिये कि होम्योपैथ इसके विषय में क्या कहते हैं, वे होम्योपैथी पढ़ने लगे। पढ़ते-पढ़ते ब्रायोनिया में उन्हें अपने लक्षण मिलते दिखाई दिये। उन्होंने ब्रायोनिया खरीद कर उसका अपने ऊपर प्रयोग किया और जो कष्ट सालों से उन्हें परेशान कर रहा था, जो किसी प्रकार के इलाज से ठीक नहीं हो रहा था, वह 15 दिन में ब्रायोनिया से ठीक हो गया। यह अनेक कारणों में से एक कारण है जिसने उन्हें एलोपैथ से होम्योपैथ बना दिया।
* श्लैष्मिक-झिल्ली का खुश्क होना और इसलिये देर-देर में, बार-बार अधिक मात्रा में पानी पीना –
खुश्की के कारण रोगी के होंठ सूख जाते हैं, खुश्की के कारण वे चिटक जाते हैं, खून तक निकलने लगता है। एरम ट्रिफि में हम देख आये हैं कि होठों और नाक की खुश्की इस कदर बढ़ जाती है कि रोगी उन्हें नोचता-नोचता खून तक निकाल देता है। नाक में अंगुली घुसेड़ता जाता है। ब्रायोनिया में इसी खुश्की के कारण उसे प्यास बहुत लगती है। देर-देर में पानी पीता है परन्तु अधिक मात्रा में पीता है। एकोनाइट में जल्दी-जल्दी, ज्यादा-ज्यादा; आर्सेनिक में जल्दी-जल्दी थोड़ा-थोड़ा; ब्रायोनिया में दिन-रात देर-देर में ज्यादा-ज्यादा ठंडा पानी पीता है। नक्स मौस्केटा और पल्स में प्यास नहीं रहती।
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की और कब्ज – 
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की का असर आंतों पर भी पड़ता है। रोगी को कब्ज रहती है। सूखा, सख्त, भुना हुआ-सा मल आता है। बहुत दिनों में टट्टी जाता है। सख्त मल को तर करने के लिये पेट में श्लेष्मा का नामोनिशान तक नहीं होता। अगर पेट में से म्यूकस निकलता भी है तो टट्टी से अलग, टट्टी खुश्क ही रहती है। भयंकर कब्ज को यह ठीक कर देता है।
श्लैष्मिक-झिल्ली की खुश्की और खुश्क खांसी –
श्लैष्मिक-झिल्ली की शुष्कता का असर फफड़ों पर भी पड़ता है। खांसते-खांसते गला फटने-सा लगता है, परन्तु कफ भीतर से नहीं निकलता। ठंड से गरम कमरे में जाने से खांसी बढ़ने में ब्रायोनिया और गरम कमरे से ठंडे कमरे में जाने से खांसी बढ़े तो फॉसफोरस या रुमेक्स ठीक हैं। ब्रायोनिया की शिकायतें प्राय: नाक से शुरू होती हैं। पहले दिन छीकें, जुकाम, नाक से पानी बहना, आंखों से पानी, आंखों में और सिर में दर्द। इसके बाद अगले दिन शिकायत आगे बढ़ती है, तालु में गले में, श्वास प्रणालिका में तकलीफ बढ़ जाती है। अगर इस प्रक्रिया को रोक न दिया जाय, तो प्लुरिसी, न्यूमोनिया तक शिकायत पहुंच जाती है। इन सब शिकायतों में रोगी हरकत से दु:ख मानता है, आराम से पड़े रहना चाहता है। श्वास-प्रणालिका की शिकायतों-जुकाम, खांसी, गला बैठना, गायकों की आवाज का पड़ जाना, गले में टेटवे का दर्द आदि-में इस औषधि पर विचार करना चाहिये।
*रजोधर्म बन्द होने के बाद नाक या मुँह से खून गिरना या सिर-दर्द –
यह ब्रायोनिया का विश्वसनीय लक्षण है। अगर रोगिणी नाक या मुँह से खून निकलने की शिकायत करे, तो उसे यह पूछ लेना चाहिये कि उसका रजोधर्म तो बन्द नहीं हो गया। मासिक बन्द होने से भी सिर-दर्द हो जाया करता है।
*सूर्योदय के साथ सिर-दर्द शुरू होना, सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाना – 
कब्ज़ होने से भी सिर-दर्द शुरू हो जाता है। इस सिर-दर्द का लक्षण यह है कि यह सूर्योदय के साथ शुरू होता है, सूर्यास्त के साथ बन्द हो जाता है। इसके साथ ब्रायोनिया के अन्य लक्षण भी रह सकते हैं, यथा हिलने-डुलने से सिर-दर्द का
बढ़ना, आँख खुलते ही बढ़ना।
सिर-दर्द में ब्रायोनिया और बेलाडोना की तुलना –
सूर्योदय के साथ संबंध न होने पर भी ब्रायोनिया में सिर-दर्द हो सकता है। प्रत्येक अस्थायी-रोग में सिर-दर्द उसके साथ जुड़ा ही रहता है। इतना सिर-दर्द होता है कि सिर को दबाने से ही आराम आता है। ब्रायोनिया के सिर-दर्द में रोगी को गर्मी सहन नहीं होती। हरकत से सिर-दर्द बढ़ता है, आँख झपकने तक से सिर में पीड़ा होती है। इस सिर-दर्द का कारण सिर में रक्त-संचय है। बेलाडोना में भी सिर में रक्त-संचय के कारण सिर-दर्द होता है, परन्तु दोनों में अन्तर यह है कि बेलाडोना का सिर-दर्द आधी-तूफान की तरह आता है, यकायक आता है, ब्रायोनिया का सिर-दर्द धीरे-धीरे आता है, उसकी चाल मध्यम और धीमी होती है। दोनों औषधियों की यह प्रकृति है – एकदम आना बेलाडोना की, और धीमे-धीमे आना ब्रायोनिया की प्रकृति है।
*गठिये के रोग में गर्मी और हरकत से आराम –
ब्रायोनिया का उपयोग गठिये में भी होता है। ब्रायोनिया का रोगी ठंडी हवा पसन्द करता है, ठंडा कपड़ा ओढ़ना चाहता है, परन्तु गठिये के दर्द में अपनी प्रकृति के विरुद्ध उसे गर्मी से आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त यह भी ध्यान रखना चाहिये कि यद्यपि ब्रायोनिया में रोगी आराम से लेटे रहना चाहता है, तो भी गठिये के रोग में वह चलने-फिरने से ही ठीक रहता है क्योंकि इस प्रकार उसके दुखते अंगों को गति से गर्मी मिलती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि ब्रायोनिया में परस्पर-विरुद्ध प्रकृतियां काम कर रही हैं। वह प्रकृति से ऊष्णता-प्रधान है परन्तु गठिये में उसे गर्मी पसन्द है, यह होते हुए भी उसकी आधारभूत प्रकृति ऊष्णता-प्रधान ही रहती है। गठिया ठीक होने पर आँख में दर्द-अगर यह देखा जाय कि जिस अंग में गठिये का दर्द था वह तो ठीक हो गया, परन्तु आंख में दर्द शुरू हो गया, आंख लाल हो गई, सूज गई, उसमें से रुधिर आने लगा, तब ब्रायोनिया से यह ठीक होगा।
* क्रोध आदि मानसिक-लक्षणों से रोग की उत्पत्ति –
ब्रायोनिया में अनेक मानसिक-लक्षण हैं। बच्चा क्रोध करता है और जो वस्तु मिल नहीं सकती उसे फौरन चाहता है और दिये जाने पर उसे परे फेंक देता है; तरह-तरह की चीजों के लिये जिद करता और दे दी जायें तो लेने से इन्कार करता है; घर में होने पर भी कहता है-घर में जाऊंगा, उसे ऐसा गलता है कि वह घर में नहीं है। बड़ा आदमी अपने रोजगार की बातें अंटसंट बका करता है। ये लक्षण मानसिक रोग में, डिलीरियम आदि में प्रकट होते हैं। क्रोध से उत्पन्न मानसिक-लक्षणों में स्टैफ़िसैग्रिया भी उपयोगी है। अगर रोगी कहे: डाक्टर, अगर मेरा किसी से झगड़ा हो जाय, तो मैं इतना उत्तेजित हो जाता हूँ कि सिर-दर्द होने लगता है, नींद नहीं आती, तो ऐसे रोगी को स्टैफिसैग्रिया ठीक कर देगा।
हरकत से दस्त आना परन्तु रात को दस्त न होना 
जब तक रोगी रात को लेटा रहता है दस्त नहीं आता, परन्तु सवेरे बिस्तर से हिलते ही उसे बाथरूम में दौड़ना पड़ता है। पेट फूला रहता है, दर्द होता है और टट्टी जाने की एकदम हाजत होती है। बड़ा भारी दस्त आता है, एक बार ही नहीं, कई बार आ जाता है, और जब रोगी टट्टी से निबट लेता है तब शक्तिहीन होकर मृत-समान पड़ा रहता है, थकावट से शरीर पर पसीना आ जाता है। अगर लेटे-लेटे जरा भी हरकत करे, तो फिर बाथरूम के लिये दौड़ना पड़ता है। जो दस्त दिन में कई बार आयें और रात को जब मनुष्य हरकत नही करता बन्द हो जायें, उन्हें यह दवा ठीक कर देती है। पैट्रोलियम में रोगी रात को कितनी भी हरकत क्यों न करे उसे दस्त नहीं होता, सिर्फ दिन की दस्त होता है, रात को नहीं होता; ब्रायोनिया में दिन को दस्त होता है, रात को जरा-सी भी हरकत करे तो दस्त की हाजत हो जाती है, अन्यथा रात को दस्त नहीं होता।
ब्रायोनिया औषधि के अन्य लक्षण
*नौ बजे रोग की वृद्धि – 
ब्रायोनिया के ज्वर के लक्षण 9 बजे शाम को बढ़ जाते हैं। 9 बजे ज्वर आयेगा या सर्दी लगनी शुरू हो जायगी। कैमोमिला के लक्षण 9 बजे प्रात: बढ़ जाते हैं।
*रोगी खुली हवा चाहता है – 
ब्रायोनिया का रोगी एपिस और पल्स की तरह दरवाजे-खिड़कियां खुली रखना पसन्द करता है। बन्द कमरा उसे घुटा-घुटा लगता है। बन्द कमरे में उसकी तकलीफें बढ़ जाती है। खुली हवा उसे रुचती है।
* खाने के बाद रोग वृद्धि – 
खाने के बाद रोग बढ़ जाना इसका व्यापक लक्षण है। रोगी कहता है कि खाना खाने के बाद तबीयत गिर जाती है।
*दांत के दर्द में दबाने और ठंडे पानी से लाभ –
 दांत के दर्द में मुँह में ठंडे पानी से लाभ होता है क्योंकि ब्रायोनिया ठंड पसन्द करने वाली दवा है। जिधर दर्द हो उधर लेटने पर दर्द वाली जगह को दबाने से आराम मिलता है। यह भी ब्रायोनिया का चरित्रगत-लक्षण है। होम्योपैथी में रोग तथा औषधि की प्रकृति को जान कर उनका मिलान करने से ही ठीक औषधि का निर्वाचन हो सकता है। ठंडे पानी से और दर्द वाले दांत को दबाने से रोग बढ़ना चाहिये था, परन्तु क्योंकि ब्रायोनिया में ठंड से और दर्द वाली जगह को दबाने से आराम होना इसका ‘व्यापक-लक्षण’ (General symptom) है, इसलिये ऐसी शिकायत में ब्रायोनिया से लाभ होता है।
*गर्म-शरीर में शीत से रोग में वृद्धि –
 शरीर गर्म हो जाने पर ठंडा पानी पीने, या उसमें स्नान से रोग बढ़ जाता है। यद्यपि ब्रायोनिया के रोगी को ठंड पसन्द है, ठंडा पानी उसे रुचता है, परन्तु अगर वह गर्मी से आ रहा है, शरीर गर्म हो रहा है, तब ठंडा पानी पीने या ठंडे स्नान से उसे गठिये का दर्द बढ़ जायगा। अगर उसे खांसी होगी या सिर-दर्द होता होगा, वह बढ़ जायगा, या हो जायगा। शरीर के गर्म रहने पर ठडा पानी पीने से जोर का सिर-दर्द हो जायगा। ब्रायोनिया की तरह रस टॉक्स में भी शरीर हो, तो ठडे जल से सिर-दर्द आदि तकलीफ भयंकर रूप धारण कर लेंगी। अगर शरीर की गर्मी की हालत में ठंडा पानी पी लिया जायगा, तो पेट की भी शिकायत पैदा हो सकती है जिसमें ब्रायोनिया लाभ करेगा।
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