पैर व टखनों में सूजन व दर्द के आयुर्वेदिक हर्बल उपचार




चलते हुए अक्‍सर आपका पैर अक्‍सर मुड़ जाता है। जरा सी चूक से कई बार पैरों में मोच आ जाती है। टखने में मोच सामान्‍य है और यह किसी को भी हो सकती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ खिलाडि़यो को ही पैर में मोच आती है। आम आदमी को भी ऐसी समस्‍या आ सकती है। अचानक पैर मुड़ने से टखने में मोच अथवा चोट लग सकती है। जब पैर मुड़ने से टखने के जोड़ को सहारा देने वाला उत्तक क्षतिग्रस्‍त हो जाता है, तो मोच की समस्‍या आती है। हालांकि इसे एक सामान्‍य समस्‍या समझा जाता है, लेकिन सही देखभाल के अभाव में यह समस्‍या काफी बड़ी भी हो सकती है।
पैर व टखनों में सूजन की समस्या- पैरों में मोच आना यूं तो एक सामान्‍य समस्‍या है, जिसके कारण आप कई बार हिल भी नहीं पाते। ऐसे हालात में किसी व्‍यक्ति के लिए चलना फिरना भी मुहाल हो जाता है। पैर व टखनों की सूजन एक दर्दभरी समस्या है। ये समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है। इस स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को काफी तकलीफ का सामना करना पड़ता है। इसमें पैर, खासतौर पर टखनों और एड़ियों के आसपास सूजन, लालिमा और जलन हो जाती है। ये सूजन की समस्या किसी भी मौसम में हो सकती है लेकिन सर्दियों में ये समस्या और अधिक बढ़ जाती है। इसके अलावा, कई और कारणों से ये सूजन की समस्या होती हैं। लेकिन, ऐसे में आप कुछ घरेलू उपाय आजमा सकते हैं। जो कारगर तो हैं ही साथ ही सुरक्षित भी हैं पैर या टखने की चोट के कारण भी उस स्थान पर सूजन की समस्या हो सकती है। सबसे आम है टखने की मोच। ये तब होती है जब टखना गलत तरह से मुड़ जाता है। मोच या पैर की अन्य चोटों के कारण आई सूजन की समस्या से निपटने के लिए आराम सबसे अधिक जरूरी है। बर्फ की सिकाई और टखने को कंप्रैशन बेंडेज से बांधने से इस समस्या में राहत मिल सकती है। अगर ऐसा करने से भी आराम न हो, और सूजन बढ़ जाए तो चिकित्सक के पास जरूर जाएं।
इन्फेक्शन- पैर व टखनों में सूजन इन्फेक्शन का एक लक्षण भी हो सकता है। जिन लोगों को डायबिटीज या पैर की अन्य नर्व संबंधी समस्या होती है, उन्हें पैर के इन्फेक्शन का जोखिम अधिक होता है। अगर आपको डायबिटीज है, तो आपको अपने पैरों में होने वाले फफोलों और दर्द पर ध्यान देने की जरूरत है। दिल, लीवर या किडनी में खराबी कई बार टखने व पैर की सूजन दिल, लीवर या किडनी की किसी बीमारी के लक्षण के रूप में प्रकट होता है। सूजा हुआ टखना दिल के दौरे का संकेत हो सकता है। अगर किडनी सही से काम न कर रही हों, तो भी पैर सूज सकते हैं। लीवर की बीमारी में अल्बमिन कहलाने वाले उस प्रोटीन के उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है जो खून को दूसरे टीशू में फैलने से रोकता है। इस प्रोटीन के कम निर्माण से फ्लूड लीकेज बढ़ जाती है जो गुरुत्वाकर्षण के नियम के कारण पैरों में अधिक पहुंचता है, और उससे सूजन हो जाती है। किसी गंभीर समस्या से बचने के लिए पैर की सूजन के साथ चेस्ट पेन होने पर डॉक्टर से संपर्क करें।
खून का थक्का- पैरों की नसों में होने वाले खून के थक्के पैरों तक आने वाले खून के बहाव को उल्टा दिल तक वापस भेज देते हैं। इस वजह से भी टखने व पैर सूज जाते हैं। ये खून के थक्के यानी ब्लड क्लॉट या तो सुपरफीशियल होते हैं जो त्वचा के नीचे ही नसों में होते हैं, या फिर गहरे हो सकते हैं। गहरे खून के थक्के पैरों की कुछ और मुख्य नसों को ब्लॉक कर सकते हैं। ये खून के थक्के जानलेवा भी हो सकते हैं अगर ये दिल या फेफड़ों तक पहुंच जाएं। अगर आपके एक पैर में सूजन है और साथ में दर्द भी, बुखार और पैर का रंग भी बदल रहा है तो फौरन चिकित्सक के पास जाएं। 
सर्दी से सूजन- सर्दियों में पैरों, खासतौर पर पैर की उंगलियों पर लाल निशान बनने या खुजली के साथ सूजन आने की समस्या काफी आम है। चिलब्लेंस नामक यह बीमारी सर्दियों में नंगे पैर घूमने या तापमान में अचानक बदलाव से होती है। हालांकि सर्दियों में यह सामान्य बीमारी है, लेकिन ध्यान नहीं देने पर कष्टदायक हो सकती है। यह एक कनेक्टिव टिश्यूज डिजीज है। साधारण उपाय करके इससे बचा जा सकता है। सर्दी से बचाव रखें, दस्ताने व मोजे पहने। धूप में ही बाहर निकलें, सिंकाई करें। दवाओं के साइड इफेक्ट्स कई दवाओं के साइड इफेक्ट की वजह से भी पैर व टखनों में सूजन हो जाती है। कैल्शियम चैनल ब्लॉकर, जो कि एक प्रकार की ब्लड प्रैशर की दवा है, उसका साइड इफेक्ट पैरों की सूजन ही होता है। इसके अलावा, एंटीडिप्रेसेंट्स खाने वाले लोगों को कई बार सूजन की इस समस्या का सामना करना पड़ता है। डायबिटीज की दवाएं भी पैर व टखने की सूजन का कारण हो सकती हैं। अगर आपको शक होता है कि आपकी सूजन का कारण आपके द्वारा खाए जाने वाली दवा ही है तो इस बारे में अपने डॉक्टर से बात करें।
गर्भावस्था की समस्या- गर्भावस्था में टखने और पैर की सूजन आम समस्या है। हालांकि अचानक सूजन आया, या अत्यधिक सूजन आना किसी गंभीर समस्या की वजह से हो सकती है। ब्लड प्रेशर के बढ़ जाने, या गर्भावस्था के 20 हफ्तों के बाद यूरीन में प्रोटीन बढ़ जाने से ये समस्या हो सकती है। अगर टखने और पैर की सूजन के साथ साथ, पेट में दर्द, सिरदर्द, बार-बार मूत्र त्यागने, उल्टी व मतली की समस्या भी हो तो तुंरत चिकित्सक की सलाह लें।
मोच के लिए घरेलू नुस्‍खे :- छोटी मोच को पूरी तरह ठीक होने में महीना भर या उससे कुछ ज्‍यादा वक्‍त लग जाता है। जल्‍द और बेहतर आराम पाने के लिए आप कुछ घरेलू उपाय भी आजमा सकते हैं- आपकी जिस टखने में मोच आयी है, उसे पूरा आराम दें। आपको चाहिए कि आप उस पैर पर अधिक वजन न डालें। लेटते समय अपने पैर को तकियों के ऊपर रखें। काम करते समय ऐसी शारीरिक गतिविधियां न करें, जिनसे आपकी टखने पर अधिक जोर पड़ने की संभावना हो। इसके बाद आप अपनी टखने के जोड़ पर आइस पैक लगायें। इससे सूजन और दर्द कम करने में मदद मिलेगी। इस आइस पैक को करीब 10 मिनट तक यूं ही छोड़ दें। इसके बाद आप उसे चोटिल हिस्‍से पर बांध सकते हैं। याद रखें ज्‍यादा टाइट न बांधें। आप अपनी टखने पर गर्म पट्टी भी बांध सकते हैं। यह काफी मददगार होती है। इससे आपकी टखने स्थिर रहती है। इससे टखने को और नुकसान नहीं होता। इससे सूजन भी कम होती है और आपको आराम होता है। हर्ब और मसाले, जैसे अदरक, हल्‍दी, काली मिर्च, तुलसी के पत्ते, अजमोद, मेंहदी, इलायची और लौंग आदि सूजन कम करने में काफी उपयोगी होते हैं। आप इन्‍हें मोच और सूजन पर लगा सकते हैं। इससे काफी आराम मिलेगा। रोटी को एक ओर से पकाइये, अब उस पर सरसों का तेल और हल्‍दी लगाइये। इससे मोच की सिंकाई करें। इससे आपको काफी फायदा होगा। गर्म दूध में थोड़ी सी हल्‍दी डालकर पीने से अंदरूनी चोट और सूजन में फायदा होता है।

पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज 

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका के अचूक उपचार 

गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि




किडनी फेल रोगी घबराएँ नहीं ,करें ये प्रभावशाली हर्बल उपचार


        
किडनी फेल्योर क्या है ?
     शरीर मे किडनी का मुख्य कार्य शुद्धिकरण का होता है| लेकिन किडनी के किसी रोग की वजह से जब दोनों गुर्दे अपना सामान्य कार्य करने मे अक्षम हो जाते हैं तो इस स्थिति को हम किडनी फेल्योर कहते हैं| खून मे क्रिएट्नीन और यूरिया की मात्रा की जांच से किडनी की कार्यक्षमता का पता चलता है| वैसे तो किडनी की क्षमता शरीर की आवश्यकता से ज्यादा होती है इसलिए गुर्दे को थोड़ा नुकसान हो भी जाये तो भी खून की जाच मे कोई खराबी देखने को नहीं मिलती है| जब रोग के कारण किडनी 50 प्रतिशत से ज्यादा खराब हो जाती तभी खून की जांच मे यूरिया और क्रिएट्नीन की बढ़ी हुई मात्रा का प्रदर्शन होता है|किडनी वास्तव में रक्त का शुद्धिकरण करने वाली एक प्रकार की 11 सैं.मी. लम्बी काजू के आकार की छननी है जो पेट के पृष्ठभाग में मेरुदण्ड के दोनों ओर स्थित होती हैं। प्राकृतिक रूप से स्वस्थ गुर्दे में रोज 60 लीटर जितना पानी छानने की क्षमता होती है। सामान्य रूप से वह 24 घंटे में से 1 से 2 लीटर जितना मूत्र बनाकर शरीर को निरोग रखती है। किसी कारणवश यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर दे अथवा दुर्घटना में खो देना पड़े तो उस व्यक्ति का दूसरा गुर्दा पूरा कार्य सँभालता है एवं शरीर को विषाक्त होने से बचाकर स्वस्थ रखता है।
     गुर्दों का विशेष सम्बन्ध हृदय, फेफड़ों, यकृत एवं प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। ज्यादातर हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी बिगड़ते हैं और जब गुर्दे बिगड़ते हैं तब उस व्यक्ति का रक्तचाप उच्च हो जाता है और धीरे-धीरे दुर्बल भी हो जाता है।गुर्दे के रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसका मुख्य कारण आजकल के समाज  मे हृदयरोग, दमा, श्वास, क्षयरोग,मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोगों में किया जा रहा अंग्रेजी दवाओं का दीर्घकाल तक अथवा आजीवन सेवन है।
किडनी  अकर्मण्यता  के लक्षण-
1. उल्टी होना   2. भूख न लगाना  3. थकावट और कमजोरी महसूस होना  4. नींद की समस्या होना 5. पेशाब की मात्रा कम हो जाना  6. दिमाग ठीक से काम नहीं करना  7. हिचकी आना 8. मांसपेशयों मे खिंचाव और आक्षेप आना 
 9. पैरों और टखने मे सूजन आना 
 10. लगातार खुजली होने की समस्या 
11. हृदय मे पानी जमा होने पर छाती मे दर्द होना 
 12. हाई ब्ल प्रेशर जिसे से कट्रोल करना कठिन हो|

किडनी खराब करने  वाली 10 आदतें-

1) पेशाब आने पर करने न जाना (रोकना) 2) रोज 8 गिलास से कम पानी पीना 3) बहुत ज्यादा नमक खाना 4) उच्च रक्त चाप के ईलाज मे लापरवाही 5) शुगर के ईलाज मे लापरवाही 6) अधिक मांसाहार करना 7 दर्द नाशक(पेन किलर) दवाएं लगातार लेते रहना 8) ज्यादा शराब पीना 9) काम के बाद जरूरी मात्रा मे आराम नहीं करना 10) कोला , पेप्सी आदि साफ्ट ड्रिंक्स और सोडा पीना 

*पित्ताश्मरी(Gallstone) की अचूक औषधि*

    हमारे गुर्दे रक्त में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों और जल को फ़िल्टर कर मूत्र के रूप में बाहर निकालने की क्रिया संपन्न करते हैं। हमारी मांसपेशियों में उपस्थित क्रिएटिन फ़ास्फ़ेटस के विखंडन से उर्जा उत्पन होती है और इसी प्रक्रिया में अपशिष्ट पदार्थ क्रिएटनीन बनता है । स्वस्थ गुर्दे अधिकांश क्रिएटनीन को फ़िल्टर कर मूत्र में निष्कासित करते रहते हैं। अगर खून में क्रिएटनीन का स्तर १.५ से ज्यादा हो जाता है तो समझा जाता है कि गुर्दे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इसलिये खून में क्रिएटनीन की मात्रा का परीक्षण करना जरूरी होता है। अब मैं कुछ ऐसे उपाय बताना चाहूंगा जिनको व्यवहार में लाकर रोगी अपने खून मे क्रिटनीन की मात्रा घटा सकते हैं। ये ऊपाय गुर्दे का कार्य-भार कम करते हैं जिससे खून में उपस्थित क्रिएटनीन का लेविल कम होने में मदद मिलती है। क्रिएटनीन कम करने वाले भोजन में प्रोटीन, फ़ास्फ़ोरस,पोटेशियम,नमक की मात्रा बिल्कुल कम होने पर ध्यान दिया जाता है। जिन भोजन पदार्थों में इन तत्वों की अधिकता हो उनका परहेज करना आवश्यक है।

सोरायसिस(छाल रोग) के आयुर्वेदिक उपचार   

   जब उच्च प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ उपयोग नहीं किये जाएंगे तो मांसपेशियों में कम क्रिएटीन मौजूद रहेगा अत: क्रिएटनीन भी कम बनेगा। किडनी को भी अपशिष्ट पदार्थ को फ़िल्टर करने में कम ताकत लगानी पडेगी जिससे किडनी की तंदुरस्ती में इजाफ़ा होगा। याद रखने योग्य है कि क्रिएटिन के टूटने से ही क्रिएटनीन बनता है। एक और जहां उच्च क्रिएटनीन लेविल गुर्दे की गंभीर विकृति की ओर संकेत करता है वही शरीर में जल की कमी से समस्या और गंभीर हो जाती है। जल की कमी से रक्तगत क्रिएटनीन में वृद्धि होती है। अत: महिलाओं को २४ घंटे में २.५ लिटर तथा पुरुषों को ३.५ लिटर पानी पीने की सलाह दी जाती है। चाय ,काफ़ी में केफ़ीन तत्व ज्यादा होता है जो गुर्दे के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।अत: इनका सर्वथा परित्याग आवश्यक है।     मूत्र प्रणाली में कोई संक्रामक रोग हो जाने से भी रक्तगत क्रिएटनीन बढ सकता है। अत: इस विषय में सावधानी पूर्वक इलाज करवाना चाहिये। उच्च रक्त चाप से गुर्दे को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाओं को नुकसान होता है। इससे भी रक्त गत क्रिएटनीन बढ जाता है। अत: ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने के उपाय करना जरूरी है।मेरा ब्लड प्रेशर संबंधी लेख ध्यान से पढें। नमक ३ ग्राम से ज्यादा हानिकारक है।<नियमित २० मिनिट व्यायाम करने और ३ किलोमिटर घूमने से खून में क्रिएटनीन की मात्रा काबू करने में मदद मिलती है।व्यायाम और घूमने के मामले में बिल्कुल आलस्य न करें ।     मधुमेह रोग धीरे -धीरे गुर्दे को नुकसान पहुंचाता रहता है। इसलिये यह रोग भी रक्तगत क्रिएटनीन को बढाने में अपनी भूमिका निर्वाह करता है। खून में शर्करा संतुलित बनाये रखने के उपाय आवश्यक हैं। डायबीटीज पर मेरा लेख पढें और तदनुसार उपाय करें।

बिदारीकन्द के औषधीय उपयोग    

   प्रोटीन हमारे शरीर के ऊतकों और मांसपेशियों के निर्माण में उपयोग होता है। इससे रोगों के विरुद्ध लडने में भी मदद मिलती है। जब प्रोटीन शारीरिक क्रियाओं के लिये टूटता है तो इससे यूरिया अपशिष्ट पदार्थ बनता है। अकर्मण्य अथवा क्षतिग्रस्त किडनी इस यूरिया को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाती है। खून में यूरिया का स्तर बढने पर क्रिएटनीन भी बढेगा । मांस में और अंडों में किडनी के लिये सबसे ज्यादा हानिकारक प्रोटीन पाया जाता है।अत: किडनी रोगी को ये भोजन पदार्थ नहीं लेना चाहिये। प्रोटीन की पूर्ति थोडी मात्रा में दालो के माध्यम से कर सकते हैं।

शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

* किडनी के सुचारु कार्य नहीं करने से खून में पोटेशियम का लेविल बहुत ज्यादा बढ जाता है। पोटेशियम की अधिकता से अचानक हार्ट अटेक होने की सम्भावना बढ जाती है। अगर लेबोरेटरी जांच में रक्त में पोटेशियम बढा हुआ पाया जाए तो कम पोटेशियम वाला खाना लेना चाहिये। *  पाईनेपल,शिमला मिर्च,पत्ता गोभी,फूल गोभी,लहसुन,प्याज,अंडे की सफेदी,जेतुन का तेल,मछली,, खीरा ककडी,गाजर,सेव,लाल अंगूर और सफ़ेद चावल  कम पोटेशियम वाले भोजन  पदार्थ हैं । * केला,तरबूज,किशमिस,पालक टमाटर, आलू बुखारा ,भूरे  चावल,संतरा,आलू का उपयोग वर्जित है।इनमे अधिक पोटेशियम पाया जाता है।लेकिन अगर पोटेशियम वांछित स्तर का हो तो इन फ़लों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

हाथ पैर और शरीर का कांपना कारण और उपचार

क्रोनिक किडनी फेल्योर  के कारणों का उपचार - *डायबीटीज और उच्च रक्तचाप  का उचित इलाज | *पेशाब में इन्फेक्शन का  सही उपचार| *किडनी में पथरी  का हर्बल उपचार जो गुर्दे की कार्यक्षमता  बढाता हो| एलौपथिक पद्धति में  किडनी फेल्योर के लिए कोई  स्पेसिफिक  मेडिसिन नहीं है और  शुगर और ब्लड  प्रेशर  नियंत्रण  पर ही ज्यादा  ध्यान देते हैं|
* दामोदर चिकित्सालय रजि. की  हर्बल औषधि क्रोनिक किडनी फेल्योर में वरदान तुल्य  सिद्ध होती है| बढ़ा हुआ क्रिएटनिन और यूरिया  नीचे  आने लगता  है | 

नसों में होने वाले दर्द से निजात पाने के तरीके

किडनी के मरीज क्या खाएँ- रोगी की किडनी कितने प्रतिशत काम रही है, उसी के हिसाब से उसे खाना दिया जाए तो किडनी की आगे और खराब होने से रोका जा सकता है :
1. प्रोटीन : 1 ग्राम प्रोटीन/किलो मरीज के वजन के हिसाब से लिया जा सकता है। नॉनवेज खाने वाले 1 अंडा, 30 ग्राम मछली, 30 ग्राम चिकन और वेज लोग 30 ग्राम पनीर, 1 कप दूध, 1/2 कप दही, 30 ग्राम दाल 
2. कैलरी : दिन भर में 7-10 सर्विंग कार्बोहाइड्रेट्स की ले सकते हैं।  1 सर्विंग बराबर होती है - 1 स्लाइस ब्रेड, 1/2 कप चावल या 1/2 कप पास्ता।
3. विटामिन : दिन भर में 2 फल और 1 कप सब्जी लें।
4. सोडियम : एक दिन में 1/4 छोटे चम्मच से ज्यादा नमक न लें। अगर खाने में नमक कम लगे तो नीबू, इलाइची, तुलसी आदि का इस्तेमाल स्वाद बढ़ाने के लिए करें। पैकेटबंद चीजें जैसे कि सॉस, आचार, चीज़, चिप्स, नमकीन आदि न लें।
5. फॉसफोरस : दूध, दूध से बनी चीजें, मछली, अंडा, मीट, बीन्स, नट्स आदि फॉसफोरस से भरपूर होते हैं इसलिए इन्हें सीमित मात्रा में ही लें।
6. कैल्शियम : दूध, दही, पनीर, फल और सब्जियां उचित मात्रा में लें। ज्यादा कैल्शियम किडनी में पथरी का कारण बन सकता है।

आँव रोग (पेचिश) के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार

7. पोटैशियम : फल, सब्जियां, दूध, दही, मछली, अंडा, मीट में पोटैशियम काफी होता है। इनकी ज्यादा मात्रा किडनी पर बुरा असर डालती है। इसके लिए केला, संतरा, पपीता, अनार, किशमिश, भिंडी, पालक, टमाटर, मटर न लें। सेब, अंगूर, अनन्नास, तरबूज़, गोभी ,खीरा , मूली, गाजर ले सकते हैं।
8. फैट : खाना बनाने के लिए वेजिटेबल या ऑलिव आईल  का ही इस्तेमाल करें। बटर, घी और तली -भुनी चीजें न लें। फुल क्रीम दूध की जगह स्किम्ड दूध ही लें।
 9. तरल चीजें : शुरू में जब किडनी थोड़ी ही खराब होती है तब सामान्य मात्रा में तरल चीजें ली जा सकती हैं, पर जब किडनी काम करना कम कर दे तो तरल चीजों की मात्रा का ध्यान रखें। सोडा, जूस, शराब आदि न लें। किडनी की हालत देखते हुए पूरे दिन में 5-7 कप तरल चीजें ले सकते हैं।
 10. सही समय पर उचित मात्रा में जितना खाएं, पौष्टिक खाएं। 
11. अंकुरित मूंग किडनी खराब रोगी के लिए उत्तम आहार है| अंकुरित मूंग को भली प्रकार उबालकर जीवाणु रहित कर लेना चाहिए|

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

आर्थराइटिस(संधिवात)के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार



विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -

इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl
हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl
जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 
सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 
 केस रिपोर्ट 2-
रोगी का नाम - Awdhesh 
निवासी - कानपुर 
ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट
दिनांक - 26/4/2016
Urea- 55.14   mg/dl
creatinine-13.5   mg/dl 
यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -
creatinine 1.34 mg/dl
urea 22  mg/dl

माईग्रेन रोग की जानकारी व उपचार



माइग्रेन की बीमारी काफी दर्दनाक, आवर्ती और गंभीर सिरदर्द की स्थिति है। यह किसी भी उम्र में व्यक्तियों को परेशान कर सकती है। महिलाओं को माइग्रेन होने की संभावना तीन गुना अधिक होती है। यदि कोई व्यक्ति गंभीर सिरदर्द का अनुभव करता है, जिसमें दर्द की आवृति नस के फड़कने के सामान होती है, तो यह माइग्रेन की स्थिति होती है, जिसका तुरंत इलाज किया जाना आवश्यक होता है। माइग्रेन के अनेक कारण हो सकते हैं। यह स्थिति अनेक प्रकार की न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के उत्पन्न होने का कारण भी बन सकती है। अतः व्यक्तियों को माइग्रेन को ट्रिगर करने वाले कारकों के बारे में जानने और उनसे परहेज करने की आवश्यकता होती है।
माइग्रेन, गंभीर सिर दर्द की स्थिति है, जिसमें आमतौर पर सिर के एक तरफ गंभीर दर्द, स्पंदन के रूप में उत्पन्न होता है। माइग्रेन में कभी सिर के दाएं तो कभी बाएं हिस्से में अचानक दर्द होने लगता है। जिसे हम सर की गर्मी भी कहते हैं, मानसिक तनाव और कम नींद के कारण होने वाली यह समस्या पुरुषों की बजाए महिलाओं में ज्यादा देखी जाती है। इस रोग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें दिन में अचनाक कभी भी तेज दर्द उभर आता है।
व्यक्तियों में माइग्रेन की स्थिति में उत्पन्न होने वाला दर्द, कई घंटों या दिनों तक बना रह सकता है। दर्द इतना गंभीर हो सकता है कि यह सम्बंधित व्यक्ति की दैनिक गतिविधियों में हस्तक्षेप उत्पन्न कर सकता है। माइग्रेन की बीमारी 15 से 55 वर्ष की आयु के लोगों को अधिक प्रभावित करती है। यह समस्या अक्सर मतली, उल्टी तथा प्रकाश और ध्वनि के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ उत्पन्न हो सकती है।
कुछ व्यक्तियों में माइग्रेन का सांकेतिक लक्षण औरा (aura) के रूप में जाना जाता है, जो सिरदर्द से पहले या उसके साथ उत्पन्न होता है। आभा (aura) में दृश्य गड़बड़ी शामिल हो सकती है, जैसे प्रकाश की चमक (flashes of light) और blind spots या अन्य गड़बड़ी, जैसे चेहरे के एक तरफ या हाथ या पैर में झुनझुनी और बोलने में कठिनाई इत्यादि।
माइग्रेन की स्थिति लोगों में एक गंभीर, स्थिर सिरदर्द का कारण बन सकती है। सिर का दर्द हल्के रूप में शुरू हो सकता है, और उपचार के बिना अधिक गंभीर हो जाता है।
व्यक्तियों में माइग्रेन का दर्द सबसे अधिक माथे (forehead) को प्रभावित करता है। यह दर्द आमतौर पर सिर के एक तरफ होता है, लेकिन यह दोनों तरफ शिफ्ट हो सकता है।
अधिकांशतः माइग्रेन लगभग 4 घंटे तक रहता है। यदि इलाज न किया जाये या उपचार प्रभावी न हो तो इस स्थिति में 72 घंटे से एक सप्ताह तक बना रह सकता है।
माइग्रेन कई प्रकार का हो सकता है। सबसे सामान्य माइग्रेन के प्रकारों में औरा के साथ माइग्रेन (migraine with aura) और औरा के बिना माइग्रेन (Migraine without aura) प्रमुख हैं।
औरा के साथ माइग्रेन – Migraine with aura in Hindi
इस प्रकार के माइग्रेन को क्लासिक माइग्रेन (classic migraine), जटिल माइग्रेन (complicated migraine) और नकसीर माइग्रेन (hemiplegic migraine) कहा जाता था। माइग्रेन की स्थिति में अनेक व्यक्ति औरा का अनुभव कर सकते हैं। औरा, सिरदर्द शुरू होने की चेतावनी के रूप में कार्य करता है। औरा (aura) का प्रत्येक लक्षण आमतौर पर पाँच मिनट से एक घंटे के बीच रहता है।
जब औरा के साथ माइग्रेन की स्थिति दृष्टि को प्रभावित करती है, तो रोगी ऐसी चीजों को देख सकता है जो कि वास्तव में नहीं हैं। वे अपने सामने की वस्तु के कुछ हिस्सों को भी नहीं देख सकते हैं या हिस्सा गायब हो जाता है, और फिर वापस आता है।
इस प्रकार के माइग्रेन की स्थिति में सिरदर्द शुरू होने से पहले व्यक्ति निम्न प्रकार के लक्षणों को महसूस कर सकता है, जैसे:
डबल विज़न
सुनने की समस्याएं
चक्कर आना
भाषण समस्याएं, इत्यादि।
औरा के बिना माइग्रेन – Migraine without aura in Hindi
इस प्रकार के माइग्रेन की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति संवेदना में बिना कोई गड़बड़ी के माइग्रेन का अनुभव करता है। वर्तमान में 70 से 90 प्रतिशत माइग्रेन, औरा के बगैर उत्पन्न होते हैं। यदि इस स्थिति का इलाज नहीं किया जाए या उपचार सफल न हो, तब सिरदर्द का अटैक आमतौर पर 4 से 72 घंटे तक बना रहता है। दर्द स्पंदन के रूप में होता है, तथा सिर हिलाने-डुलाने या झुकाने के दौरान दर्द ओर भी बदतर हो जाता है।
माइग्रेन के अन्य प्रकार
माइग्रेन के अन्य प्रकार हैं:
क्रोनिक माइग्रेन (Chronic migraine) – इस प्रकार के माइग्रेन की स्थिति में माइग्रेन अटैक महीने के 15 दिनों में ट्रिगर होता है। इसे कभी-कभी गंभीर माइग्रेन भी कहा जाता है और दवाओं के अधिक उपयोग करने के कारण हो सकता है।
एक्यूट माइग्रेन (Acute migraine) – एक्यूट माइग्रेन को एपिसोडिक माइग्रेन (episodic migraine) के नाम से भी जाना जाता है, इस प्रकार के माइग्रेन की स्थिति में महीने में 14 दिन तक सिरदर्द होता है।
वेस्टिबुलर माइग्रेन (Vestibular migraine) – वर्टिगो से जुड़े माइग्रेन को वेस्टिबुलर माइग्रेन के रूप में जाना जाता है। माइग्रेन से पीड़ित लगभग 40 प्रतिशत लोगों में कुछ वेस्टिबुलर लक्षण प्रगट होते हैं। वेस्टिबुलर माइग्रेन की स्थिति में संतुलन खोने और चक्कर आने से सम्बंधित लक्षण प्रगट होते हैं।
मासिक धर्म माइग्रेन (Menstrual migraine) – यह तब होता है जब हमले मासिक धर्म चक्र से जुड़े पैटर्न में होते हैं।
हेमार्टेजिक माइग्रेन (Hemiplegic migraine) – यह अस्थायी अवधि के लिए शरीर के एक तरफ की कमजोरी का कारण बनता है।
माइग्रेन के साथ माइग्रेन आभा (Migraine with brainstem aura) – यह एक दुर्लभ प्रकार का माइग्रेन है, जो गंभीर रूप से न्यूरोलॉजिकल क्रियाओं को प्रभावित करता है।
मासिक धर्म माइग्रेन (Menstrual migraine) – मासिक धर्म से संबंधित माइग्रेन की स्थिति, माइग्रेन से पीड़ित महिलाओं में से 60 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करता है। इस प्रकार का माइग्रेन मासिक धर्म के पहले, दौरान या मासिक धर्म के बाद में और ओव्यूलेशन के दौरान भी उत्पन्न हो सकता है
माइग्रेन के लक्षण
माइग्रेन एक गंभीर सिरदर्द है, जो अक्सर सिर के एक तरफ होता है। माइग्रेन के प्रारंभिक लक्षणों या संकेतों की पहचान कर, व्यक्ति इसको पूर्ण विकसित होने से पहले ही रोकने में सफलता प्राप्त कर सकता है।
यह माइग्रेन अक्सर बचपन, किशोरावस्था या वयस्कता के दौरान शुरू होता है, यह बीमारी चार चरणों के माध्यम से प्रगति कर सकती है, जो इस प्रकार हैं: प्रॉड्रोम (prodrome), औरा (aura), अटैक (attack) और पोस्टड्रोम (post-drome)। प्रत्येक व्यक्ति जो माइग्रेन से पीड़ित होता है, उसे इन सभी चरणों से गुजरना पड़ता है।
प्रॉड्रोम – prodrome
इस स्टेज में सिरदर्द शुरू होने के एक या दो दिन पहले, माइग्रेन के लक्षण प्रगट होने लगते हैं। प्रॉड्रोम माइग्रेन की स्थिति के दौरान निम्न लक्षणों को देखा जा सकता है: जैसे:
कब्ज (Constipation)
मूड में बदलाव या डिप्रेशन
भूख में कमी
गर्दन में अकड़न
चिड़चिड़ापन
थकान या ऊर्जा में कमी का अहसास होना
प्यास और पेशाब में वृद्धि होना
बार-बार जम्हाई आना, इत्यादि।
औरा – Aura
कुछ व्यक्ति, माइग्रेन से ठीक पहले या माइग्रेन के दौरान औरा स्टेज से सम्बंधित लक्षणों को महसूस कर सकते हैं। माइग्रेन की औरा स्टेज में तंत्रिका तंत्र की गड़बड़ी से संबंधित लक्षण उत्पन्न होते हैं। इस स्टेज से सम्बंधित लक्षणों को आमतौर पर देखा जा सकता है। प्रत्येक लक्षण आमतौर पर धीरे-धीरे शुरू होते हैं और 20 से 60 मिनट तक रहते हैं। माइग्रेन औरा के लक्षणों में शामिल हैं:
दृश्य से सम्बंधित समस्याएं, जैसे चमकीले धब्बे (bright spots) या प्रकाश की चमक (light flashes), इत्यादि
अस्थायी रूप से दृष्टि खोना
चेहरे, हाथों या पैरों में चुभन, झुनझुनी या सुन्नता महसूस होना
चेहरे या शरीर के एक तरफ कमजोरी महसूस होना
स्पष्ट रूप से बोलने में कठिनाई होना, इत्यादि।
अटैक – Attack
औरा स्टेज के बाद माइग्रेन अटैक की स्थिति उत्पन्न होती है। यह वास्तविक माइग्रेन का सबसे तीव्र या गंभीर चरण (स्टेज) है। माइग्रेन अटैक की स्थिति में उत्पन्न होने वाले लक्षण, आमतौर पर चार से 72 घंटे तक रह सकते हैं। माइग्रेन के लक्षण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न हो सकते हैं, अटैक की स्थिति में माइग्रेन के कुछ प्रमुख लक्षण निम्न हैं, जैसे:
दर्द आमतौर पर सिर के एक तरफ होता है, लेकिन अक्सर दोनों तरफ महसूस किया जा सकता है
स्पंदन के रूप में दर्द का अनुभव
प्रकाश, ध्वनि और कभी-कभी गंध के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाना
जी मिचलाना और उल्टी की समस्या
चक्कर या बेहोशी आना, इत्यादि।
पोस्टड्रोम – postdrome
माइग्रेन की अटैक स्टेज के बाद, एक व्यक्ति अक्सर पोस्टड्रोम स्टेज का अनुभव करता है। इस स्टेज (चरण) के दौरान, आमतौर पर निम्न लक्षणों को महसूस किया जा सकता है, जैसे
भ्रमित होना
मूड और भावनाओं में परिवर्तन
ख़ामोशी महसूस करना
थकावट और उदासीन महसूस होना
हल्का, सुस्त सिरदर्द बना रहना, इत्यादि।
माइग्रेन का कारण
माइग्रेन का अभी तक कोई भी ज्ञात कारण नहीं है। हालांकि शोधकर्ताओं ने माइग्रेन की बीमारी को ट्रिगर करने वाले कुछ कारकों का पता लगाया है, जिसमें मस्तिष्क रसायनों में परिवर्तन (सेरोटोनिन के स्तर में कमी) और मस्तिष्क की असामान्य गतिविधियों को शामिल किया गया है। इसके साथ ही माइग्रेन के विकास में आनुवांशिकी और पर्यावरणीय कारक की एक अहम् भूमिका रहती है। माइग्रेन का कारण बनने वाले या इस स्थिति को ट्रिगर करने वाले कारकों में निम्न को शामिल किया जा सकता है, जैसे:
हार्मोनल परिवर्तन – हार्मोन के बदलते स्तर के कारण महिलाओं को मासिक धर्म, गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति के दौरान माइग्रेन के लक्षणों का अनुभव हो सकता है।
भावनात्मक कारक – तनाव, अवसाद, चिंता, उत्तेजना (उत्सुकता) और सदमा इत्यादि भावनात्मक विकार माइग्रेन का कारण बन सकते हैं।
शारीरिक कारण – थकान और अपर्याप्त नींद, कंधे या गर्दन में तनाव, खराब मुद्रा (आसन) और तीव्र शारीरिक परिश्रम, ये सभी माइग्रेन को ट्रिगर कर सकते हैं। लो ब्लड शुगर और जेट लेग सिंड्रोम (विमान यात्रा से हुई थकान) भी माइग्रेन का कारण बन सकती हैं।
आहार संबंधी कारक – शराब और कैफीन माइग्रेन को ट्रिगर करने में योगदान दे सकते हैं। कुछ विशिष्ट खाद्य पदार्थों भी माइग्रेन के जोखिम को बढ़ा सकते हैं, जिसमें चॉकलेट, पनीर, खट्टे फल और टायरामाइन युक्त खाद्य पदार्थ इत्यादि शामिल हैं।
दवाएं – कुछ नींद की गोलियां, हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एचआरटी) दवाएं और मिश्रित गर्भनिरोधक गोली (contraceptive pill) आदि को माइग्रेन के संभावित कारकों में शामिल किया गया है।
पर्यावरणीय कारक – कुछ पर्यावरणीय कारक भी माइग्रेन के जोखिम को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:
तीव्र गंध जैसे- इत्र, पेंट थिनर, सेकंड हैंड स्मोक, इत्यादि
तेज आवाज या शोर,
तापमान में परिवर्तन और तेज रोशनी या सूरज की चकाचौंध, इत्यादि
माइग्रेन अक्सर अज्ञात और अनुपचारित होते हैं। यदि किसी व्यक्ति को नियमित रूप से माइग्रेन के संकेत और लक्षण महसूस होते हैं, तो इसके इलाज के लिए तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए, इन लक्षणों में शामिल हैं:
अचानक तीव्र सिर दर्द या दर्द के पैटर्न में बदलाव महसूस होना
बुखार के साथ सिरदर्द
गर्दन में अकड़न
मानसिक भ्रम
दौरे
दोहरी दृष्टि
सुन्नता या बोलने में परेशानी, इत्यादि।
माइग्रेन का इलाज – Migraine treatment in Hindi
वर्तमान में माइग्रेन का कोई भी उपयुक्त इलाज नहीं है। इलाज के माध्यम से माइग्रेन के अटैक को रोकने, और उत्पन्न होने वाले लक्षणों को कम करने का लक्ष्य रखा जाता है, इसके लिए डॉक्टर दर्द निवारक और प्रिवेंटिव मेडिसिन (Preventive medications) की सहायता ले सकता है।
डॉक्टर द्वारा सिफारिश की जाने वाली ओवर-द-काउंटर दवाएं, माइग्रेन से पीड़ित व्यक्तियों में दर्द को कम करने में मदद कर सकती हैं। ओवर-द-काउंटर दवाओं के अंतर्गत एस्पिरिन या इबुप्रोफेन (एडविल, मोट्रिन आईबी) को शामिल किया जा सकता है। अधिक समय तक उपयोग किये जाने पर ये दवाएं सिरदर्द, अल्सर और जठरांत्र संबंधी मार्ग में रक्तस्राव का कारण बन सकती है।
डॉ. द्वारा मरीज के लिए माइग्रेन से राहत प्रदान करने के लिए कैफीन, एस्पिरिन और एसिटामिनोफेन (acetaminophen) दवाओं की सिफारिश की जा सकती है।
डॉक्टर द्वारा माइग्रेन के इलाज में Triptans, Dihydroergotamine दवाओं का भी उपयोग किया जा सकता है।
माइग्रेन की रोकथाम के लिए दवाएं
माइग्रेन को ट्रिगर करने वाली स्थितियों को कम करने वाली दवाओं का उपयोग कर माइग्रेन की रोकथाम और उपचार में सफलता प्राप्त की जा सकती है, इन दवाओं में शामिल हैं:
रक्तचाप कम करने वाली दवाएं – रक्तचाप कम करने वाली दवाओं में प्रोप्रानोलोल (propranolol) और मेटोप्रोलोल टारट्रेट (metoprolol tartrate) जैसे बीटा ब्लॉकर्स शामिल हैं। कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स जैसे- वेरापामिल (verapamil) दवाएं औरा (aura) के साथ उत्पन्न होने वाले माइग्रेन की स्थिति को रोकने में मददगार कर सकती हैं।
एंटीडिप्रेसेंट – एक ट्राइसाइक्लिक एंटीडिप्रेसेंट (एमिट्रिप्टीलिन) ड्रग (tricyclic antidepressant), माइग्रेन को रोकने में सहायक हो सकता है।
एंटी सीज़र दवाएं (Anti-seizure drugs) – वैल्प्रोएट (Valproate (Depacon)) और टोपिरामेट (Topiramate (Topamax)) आदि दवाएं माइग्रेन की आवृति को कम करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन ये दवाएं अनेक दुष्प्रभाव जैसे- चक्कर आना, वजन में बदलाव, जी मिचलाना, इत्यादि का कारण बन सकती हैं।
बोटॉक्स इंजेक्शन – बोटोक्स इंजेक्शन कुछ वयस्कों में हर 12 सप्ताह के लिए माइग्रेन को रोकने में मदद कर सकता है।
कैल्सीटोनिन जीन-संबंधी पेप्टाइड (CGRP) मोनोक्लोनल एंटीबॉडी – माइग्रेन का इलाज करने के लिए इन दवाओं का उपयोग किया जा सकता है। इन्हें मासिक इंजेक्शन के रूप में दिया जा सकता है।
माइग्रेन से बचने के घरेलू उपाय
कोई भी व्यक्ति जीवनशैली में बदलाव कर, माइग्रेन की आवृत्ति को रोकने में सफलता प्राप्त कर सकता है, जिसमें शामिल हैं:
पर्याप्त नींद लें
धूम्रपान न करें
सोने और खाने की एक स्वास्थ्य दिनचर्या बनायें
तनाव कम करें
हाइड्रेटेड रहने के लिए अधिक मात्रा में पानी पिए या तरल पदार्थ का सेवन करें
कुछ खाद्य पदार्थों जैसे- शराब और कैफीन से परहेज
नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम करें।
जब माइग्रेन के लक्षण शुरू होते हैं, तो शांत, अंधेरे कमरे में जाने की कोशिश करें, आँखें बंद करें और आराम करें।
एक ठंडे कपड़े या बर्फ के पैक को तौलिया में लपेटकर अपने माथे पर या गर्दन के पीछे रखें।
सिरदर्द से सम्बंधित लक्षणों को डायरी में नोट करें, इससे दर्द को बढ़ाने वाले कारकों के बारे में जाननें में सहायता मिलेगी।
माइग्रेन में क्या खाएं
एक स्वस्थ आहार का सेवन कर पीड़ित व्यक्ति माइग्रेन को कम करने में सफलता प्राप्त कर सकता है। एक स्वस्थ माइग्रेन आहार के रूप में ताजे खाद्य पदार्थों को शामिल किया जा सकता है, जो कि निम्न हैं:
फल जैसे- चेरी और क्रैनबेरी
सब्जियां जैसे- समर स्क्वैश (summer squash), शकरकंद, गाजर, और पालक
साबुत अनाज
लीन प्रोटीन (lean proteins), इत्यादि।
माइग्रेन में परहेज
माइग्रेन बीमारी की स्थिति में कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करने की सिफारिश की जाती है, जो माइग्रेन की स्थित को ट्रिगर कर सकती है। इनमें शामिल हो सकते हैं:
शराब या कैफीन युक्त पेय
खाद्य योजक (food additives), जैसे- नाइट्रेट (nitrates), एस्पार्टेम (aspartame), या मोनोसोडियम ग्लूटामेट (monosodium glutamate)
टायरामाइन (tyramine) युक्त खाद्य पदार्थ
खट्टे फल
दुग्ध उत्पाद, चॉकलेट
नट्स
लाइमा बीन्स (lima beans)
नेवी बीन (navy beans)
प्याज
सौकरकूट (sauerkraut)
एज्ड चीज़ (aged cheeses), सॉरेक्राट (sauerkraut) और सोया सॉस (soy sauce), इत्यादि।

लीवर के प्रमुख रोग व आयुर्वेदिक हर्बल उपचार



लिवर मानव शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग होता है। अगर आप कहते हैं कि लिवर पर पूरा मानव शरीर टिका है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। जिन लोगों का पाचन तंत्र खराब होता है उसमें करीब 80 फीसद रोल लिवर का होता है। लिवर के मुख्य कार्यों में भोजन चयापचय, ऊर्जा भंडारण, विषाक्त पदार्थों को बाहर निकलना, डिटॉक्सीफिकेशन, प्रतिरक्षा प्रणाली का समर्थन और रसायनों का उत्‍पादन आदि शामिल हैं। आजकल की भागदौड़ भरा लाइफस्टाइल और हेल्दी खानपान से दूरी खराब लिवर की सबसे बड़ी वजह हो गई है। वहीं, हद से ज्यादा सिगरेट, बीड़ी और शराब का सेवन भी लिवर का दुश्मन होता है। इस बात की गांठ बांध लें कि अगर इंसान का लिवर एक बार खराब हो जाए तो उसका जीना भी लगभग नामुमकिन हो जाता है। आज हम आपको अंग्रेजी दवाओं के बजाय लिवर को दुरुस्त रखने के लिए कुछ घरेलू उपाय बता रहे हैं।
 शहरी भारतीयों के खानपान के तौर-तरीकों में हाल में बड़े बदलाव देखने को मिले हैं. ढेर सारे कार्बोहाइड्रेट, बिना रिफाइन किया हुआ आटा और कम वसा वाली खुराक से रुझान अब उच्च वसायुक्त और कम अवशिष्ट वाली खुराक की ओर हो गया है.
आधुनिक भारतीय आहार अत्यधिक कार्बोहाइड्रेट और वसायुक्त होता जा रहा है. इसके साथ ही एल्कोहल का सेवन भी बढ़ा है, जिसके नतीजे हृदय की बीमारियों, उच्च रक्तचाप (बीपी), मुधमेह और लिवर (कलेजा) से जुड़ी बीमारियों के रूप में सामने आ रहे हैं.
हृदय रोगों और मधुमेह जैसे रोगों पर मीडिया में खूब तवज्‍जो दी जा रही है. लेकिन लिवर-शरीर का सबसे बड़ा अंग और इसकी मुख्य केमिकल फैक्टरी-इनकी अपेक्षा थोड़ा उपेक्षित ही रहा है. आंतों से आने वाले खाए गए भोजन का पहला पड़ाव होने के कारण लिवर के हमारे खानपान में किए गए बदलावों से सर्वाधिक प्रभावित होने की संभावना बनी रहती है.
डेढ़ किग्रा का लिवर हमारे ऊपरी उदर के दाईं ओर स्थित होता है और यह खाए गए भोजन को संसाधित करता है जिसके बाद इसे अंतड़ियां अवशोषित कर लेती हैं. यह कार्बोहाइड्रेट्स को ग्लाइकोजन के रूप में जमा करके रखता है और जब भी जरूरत होती है यह तुरंत ही इसे ग्लूकोज के रूप में स्त्रावित कर देता है.
हमारे द्वारा लिए गए नुक्सानदायक पदार्थों को यह निष्क्रिय कर देता है और प्रोटीन पैदा करता है जो हमें संक्रमण और रक्तस्त्राव से बचाता है. हम क्या खाते हैं और कैसा जीवन जीते हैं उनमें मामूली सुधार कर के यह संभव है कि हम अपने लिवर को स्वस्थ रख सकें.


कैसे पहुंचता है लिवर को नुकसान

अच्छे और स्वस्थ लिवर के लिए कार्बोहाइड्रेट, वसा और प्रोटीन के सही संयोग वाला आहार जरूरी है. जैसा हम जानते हैं कि इनमें से किसी भी चीज की अति खतरनाक हो सकती है. इसमें अत्यधिक खाना भी शामिल है जो लिवर को ज्‍यादा काम करना पड़ेगा और सही कार्य करने की उसकी क्षमता भी कम होगी. वसा और एल्कोहल के रूप में ढेर सारी कैलॉरी लेने के कारण यह लिवर के इर्द-गिर्द जमा हो जाएगी, जिससे कोशिकाओं संबंधी क्षति हो सकती है और इसके महत्वपूर्ण कार्यों में व्यवधान डाल सकती है.
हमारी खुराक में लगभग 40 फीसदी कच्चे फल और सब्जियां शामिल होने चाहिए जो, इसके फाइबर संबंधी सामग्री में इजाफा करते हैं, वसा को अवशोषित करने और पेट की सफाई करने का काम करते हैं. अच्छा वसा (ये जरूरी फैटी एसिड होते हैं जो फिश ऑयल सरीखे खाद्य पदार्थों में मिलते हैं) शरीर की प्रत्येक कोशिका में मौजूद झिल्‍ली और लिवर के सही कार्य करने के लिए जरूरी होते हैं.
साधारण साफ-सफाई, जो उबले पानी और साफ भोजन से हासिल की जा सकती है, वायरल हेपेटाइटिस से बचाती है. हमें अपने अल्कोहल के सेवन को सीमित करना चाहिए जो पुरुषों के लिए रोजाना दो यूनिट (एक यूनिट में 10 ग्राम अल्कोहल होता है और यह एक बीयर, वाइन का एक गिलास या स्पिरिट की एक चुस्की के बराबर होता है) और महिलाओं के लिए एक यूनिट काफी है. इसके साथ ही, हमें ढेर सारा पानी या तरल पदार्थों का सेवन करना चाहिए क्योंकि इनसे किडनी के जरिये ढेर सारे जहरीले रासायनिक पदार्थों को शरीर से बाहर करने में मदद मिलती है.
बढ़ता बोझ

भारत में मृत्यु होने के 10 शीर्ष कारणों में से लिवर का रोग भी एक है, ये रोग हर उम्र के लोगों पर अपना असर दिखा रहे हैं. लिवर के रोगों से पीड़ित लोग सुस्त, पीला रंग और समस्याएं पीलिया (जॉन्डिस), पेट में पानी भर जाना, खून की उल्टी होना, कैंसर, कोमा और मृत्यु का रूप भी अख्तियार कर सकती हैं.
ऐसा अनुमान लगाया गया है कि देश में हर साल लगभग दो लाख लोग लिवर की बीमारियों से दम तोड़ देते हैं और इनमें से अधिकतर को स्वच्छ पेयजल, नकली दवाओं के सेवन से बचकर, सही खान-पान का अनुकरण करके और एल्कोहल की मात्रा कम करने जैसे साधारण उपायों से बचाया जा सकता है.
तीन बीमारियां
भारत में की लिवर की तीन सबसे घातक बीमारियां चर्बीदार लिवर, हेपेटाइटिस और सिरोसिस हैं, प्रत्येक के लिए विशेष खानपान की जरूरत है. चर्बीदार लिवर वह स्थिति है जिसमें वसा की बड़ी बूंदें लिवर की कोशिकाओं में चली जाती हैं और फिर उसकी कार्यप्रणाली के साथ हस्तक्षेप करती हैं. इसके कई कारण हो सकते हैं, जिनमें सबसे आम (लेकिन काफी अजीब) अत्यधिक खाने के साथ ही कुपोषण (जरूरी प्रोटीन और विटामिनों की कमी) और एल्कोहल का अत्यधिक सेवन हैं.
अत्यधिक खाने के कारण होने वाले गैर-एल्कोहल चर्बीदार लिवर रोग को आम तौर पर एनएएफएलडी के नाम से जाना जाता है.
भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (आइसीएमआर) ने अनुमान लगाया है कि हमारी आबादी का 32 फीसदी हिस्सा एनएएफएलडी से पीड़ित है. जिसमें कम-से-कम अत्यधिक पोषण शामिल है, और यह आंकड़ा शराब की लत के शिकार लोगों में और भी अधिक है. लिवर में अतिरिक्त और अवांछित वसा 30 फीसदी मामलों में लिवर कोशिका की खराबी आ जाती है जो अक्सर सिरोसिस का रूप धारण कर लेती है जिसमें लिवर सख्त, भूरा, छोटा और गांठ जैसा हो जाता है.
इसलिए यह जरूरी है कि चर्बीदार लिवर का जल्द इलाज करा लिया जाए. किसी भी दवाई से ज्‍यादा श्रेष्ठ सलाह यही होगी कि कम कैलॉरी, कम वसा और अधिक प्रोटीन, नियमित व्यायाम और एल्कोहल की मात्रा को सीमित करके इस पर काबू पाया जा सकता है.

हेपेटाइटिस लिवर की सूजन है जो दूषित जल में विषाणुओं, असुरक्षित यौन संबंध और दोबारा प्रयोग की गई सुई से हो सकता है. इसे आम तौर पर पीलिया के नाम से जाना जाता है. इस स्थिति में खानपान में ढेर सारे कार्बोहाइड्रेट (50-60 फीसदी) होने चाहिए. साथ ही वेजिटेबल प्रोटींस (20-30 फीसदी) और कम वसा (10-20 फीसदी) शामिल होने चाहिए.
इसमें हाल में सेवन किए जाने वाले खाद्य पदार्थों में ताजे फल और जूस (सेब, अंगूर, गन्ना, नींबू का रस, नारियल पानी), सब्जियां (मूली, पालक, बंद-गोभी, खीरा, चुकंदर, टमाटर, करेला) और सब्जियों से प्रोटीन (दाल, मटर, फलियां और मेवे) शामिल हैं. यह बेहतर है कि तले हुए खाद्य पदार्थ, नमकीन, अचार, जंक फूड, कंसंट्रेटेड चीनी, एल्कोहल और लाल मांस खाने से बचना चाहिए.

असरदार हल्दी के गुण

हल्दी के नियमित सेवन से लिवर की सभी समस्याओं से छुटकारा पाया जा सकता है। लिवर एंटीसेप्टिक गुण और एंटीऑक्सीडेंट का सबसे अच्छा स्त्रोत है। हल्दी की रोगनिरोधन क्षमता हैपेटाइटिस बी व सी का कारण बनने वाले वायरस को बढ़ने से रोकती है। दूध में हल्दी मिलाकर पीने से लिवर दुरुस्त रहता है।
अमृत है आंवला

विटामिन सी का सबसे अच्छा स्त्रोत अगर कुछ है तो वो आंवला ही है। यह आंखों, बालों और त्वचा के लिए फायदेमंद होने के साथ ही लिवर के लिए भी बहुत अच्छा होता है। कई शोध में भी यह साबित हो चुका है कि आंवले में लिवर को सुरक्षित रखने वाले सभी तत्व मौजूद होते हैं।
वरदान है करेला

करेला भले ही टेस्ट में कड़वा होता है लेकिन करेले का स्वाद भले ही कड़वा हो लेकिन यह लिवर के लिहाज से बहुत गुणकारी होता है। रोजाना 1 ग्लास करेले का जूस पीने से लिवर स्वस्थ रहता है। साथ ही यह फैटी लिवर की परेशानी को भी खत्म करती है।
साबुत अनाज के फायदे

साबुत अनाज फाइबर और दूसरे पौष्टिक तत्‍वों से भरपूर है, यह आसानी से पच भी जाता है। फैटी एसिड की यह औषधि लीवर के नुकसानदायक टॉक्सिन को तोड़ती है। अच्छे परिणाम के लिए आपको प्रोसेस्ड ग्रेन के बजाय होल ग्रेन और इसके उत्पाद का सेवन करना चाहिए।
रसीला टमाटर

अगर आप फैटी लीवर की समस्‍या से ग्रस्त हैं तो कच्चा टमाटर खाना आपके लिए बहुत फायदेमंद होगा। यह आसानी से उपलब्ध हो जाता है और अच्छे परिणाम के लिए आपको इसका नियमित सेवन करना चाहिए।
ग्रीन टी करेगी जादू

दूध और अदरक वाली चाय के शौकीन ये बात जान लें कि अगर आप अपने लिवर को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो दूध वाली चाय की जगह ग्रीन का सेवन करना शुरू कर दें। ग्रीन टी में भरपूर मात्रा में एंटी-आक्सीडेंट होते हैं जो सभी विषैले तत्वों को खत्म करते हैं। रोजाना सुबह उठकर 1 कप ग्रीन टी पीनी चाहिए।
जैतून का तेल

जैतून का तेल लिवर के लिए सबसे अच्छा विकल्प है। नाश्‍ते में या फिर किसी भी तरह से जैतून का सेवन करना चाहिए। अगर आप जैतून के तेल का सेवन नहीं कर पाते हैं तो आपको सिगरेट, शराब और तंबाकू के अलावा बेकार खानपान से दूर रहना होगा। ये आपकी सेहत बिगाड़ने के साथ ही लिवर के भी दुश्मन हैं।
स्वस्थ लिवर की खुराक
स्वस्थ लिवर के लिए खुराक में सबसे पहले ऐसे खाद्य पदार्थ शामिल होने चाहिए जो डिटॉक्सिफिकेशन की प्रक्रिया को बढ़ाते हैं; खाने में ऐसे पदार्थ पर्याप्त मात्रा में हों जो
लिवर की रक्षा करते हैं
स्वस्थ लिवर के लिए रोजाना के नियम
*पर्याप्त मात्रा में ताजे फल और हरी पत्तेदार सब्जियों का सेवन.
*ढेर सारा पानी (उबला हुआ या बोतलबंद), फलों का जूस.
*अत्यधिक तले हुए भोजन से बचने की कोशिश करें.
*सही मात्रा में एल्कोहल का सेवन करें.
*बेकार की दवाएं न खाएं.
सही आहार ही कुंजी
अपने रात्रि भोजन की आधी प्लेट में बगैर स्टार्च वाली सब्जियां रखें, एक-चौथाई प्रोटीन हो और बाकी प्लेट में स्टार्च चलेगा.
भूख बढ़ाने वाले पदार्थों का प्रयोग करें-7 इंच के आकार की प्लेट का प्रयोग करें. यह मात्रा को नियंत्रित करता है.
वातित ड्रिंक्स एंप्टी कैलॉरी उपलब्ध कराती हैं. इसके बजाए ताजे फलों का जूस, सब्जियों के सूप या छांछ का सेवन करें.
भोजन तब ही करें जब आपको भूख लगे और अपनी क्षमता से आधा भोजन ही करें.
पोलीमील आजमाएं जिसमें वाइन (150 मिली प्रतिदिन), मछली (114 ग्राम हफ्ते में चार बार), डार्क चॉकलेट (रोजाना 100 ग्राम), फल और सब्जियां (दिन में 400 ग्राम), लहसुन (2.7 ग्राम प्रतिदिन), और बादाम (68 ग्राम प्रतिदिन).
शहरी खान-पान के दिशा-निर्देश
अप्रैल, 2011 में पहली बार शहरी खानपान के लिए राष्ट्रीय दिशा-निर्देश बनाए गए. कुछ सिफारिशें निम्न हैं:
कुल ऊर्जा का 50-60 फीसदी कार्बोइड्रेट का सेवन होना चाहिए. पूरा ध्यान चोकर सहित अनाज और पत्तेदार सब्जियों और ताजे फलों से मिलने वाले 20-40 ग्राम प्रतिदिन फाइबर पर होना चाहिए.
प्रोटीन की मात्रा 10-15 फीसदी होनी चाहिए. इसमें सोयाबीन, चना, दालें (शाकाहारियों के लिए) तथा मांसाहारियों के लिए पोल्ट्री और सी फूड हो सकता है. लाल मांस जैसे अत्यधिक सैचुरेटेड फैट वाले भोजन से बचें.
सब्जियों के दो स्त्रोतों में वसा और तेल की मात्रा 10 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिएः मूंगफली, जैतून, सरसों, चावल की भूसी और जिंजली ऑयल्स उपयोग करें|

मक्खन, घी या ट्रांस फैट बिल्कुल नहीं लेने चाहिए
गुड़, शहद से चीनी 10 फीसदी (टेबल शुगर से बचना चाहिए); नमक (आयोडाइज्‍ड) 5 ग्राम प्रतिदिन.
महिलाओं के लिए रोजाना 200-1,500 कैलॉरी की सिफारिश है जबकि पुरुषों के लिए यह मात्रा 1,500 से 1,800 के बीच है.

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

प्रोस्टेट ग्रंथि बढ्ने से मूत्र बाधा की हर्बल औषधि

सिर्फ आपरेशन नहीं ,पथरी की 100% सफल हर्बल औषधि

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यकृत,प्लीहा,आंतों के रोगों मे अचूक असर हर्बल औषधि "उदर रोग हर्बल " चिकित्सकीय  गुणों  के लिए प्रसिद्ध है|पेट के रोग,लीवर ,तिल्ली की बीमारियाँ ,पीलिया रोग,कब्ज  और गैस होना,सायटिका रोग ,मोटापा,भूख न लगना,मिचली होना ,जी घबराना ज्यादा शराब पीने से लीवर खराब होना इत्यादि रोगों मे प्रभावशाली  है|बड़े अस्पतालों के महंगे इलाज के बाद भी  निराश रोगी  इस औषधि से ठीक हुए हैं| औषधि के लिए वैध्य दामोदर से 9826795656 पर संपर्क करें|


गराडू सर्दियों की स्वास्थ्य हितैषी चाट


गराडू सर्दियों में भरपूर ऊर्जा और गर्माहट देता है, भरपूर फाइबर पाचन शक्ति को बढ़ाकर बुरे कोलेस्टोल को कम करता है । इसके एंटी आक्सीडेंट विटामिन सी बुढ़ापे की प्रक्रिया को रोकते है और इससे इम्यूनिटी मजबूत होती है, भरपूत खनिज लवण जैसे लौह, कापर, कैल्शियम, पोटेशियम, मेंगनीज, फास्फोरस होने से हडिडयों को मजबूत करता है । गराडू को ठंड का दुश्मन माना गया है यह मध्यप्रदेश में विशेषतौर पर इंदौर और उज्जैन में बहुत ही मशहूर है इसका उपयोग सुबह नास्ते के रूप में गरमा गरम , कुरकुरे और चटपटे गराडू खाने को आनंद लिया जा सकता है । इंदौर के लोग इसे पहले डीप फ्राय करके- कुरकुरा होने पर जीरावन, कालानमक और लाल मिर्च ऊपर से बुरक  (डालकर) और नीबू निचोड़ कर अखबार वाले कागज में खाते हैं| गराडु ब्लड प्रेशर को कम कर दिल की सेहत को बनाए रखता है, त्वचा और बालों को सुन्दर बनाता है । उबले हुए गराडू को मैश कर शहद के साथ मिलाकर चेहरे पर लगाने से झुर्रिया कम होती है और चेहरे पर निखार आता है। गराडू (Garadu) सर्दियों के मौसम में इंदौर की बहुत ही प्रसिद्ध चाट है जिसे सभी बहुत ही ज्यादा पसंद करते है। यह एक तरह की फूली हुई जड़ (Tuberous Root) होती है जो शकरकंद और रतालू की फैमिली की ही मेम्बर होती है, जो खाने में बहुत ही स्वादिष्ट और हमारे स्वास्थ के लिए बहुत ही पौष्टिक होती है| गराडू की चाट बनाने की जानकारी लिख देते हैं-


आवश्यक सामग्री
गराडू (garadu)- 500 ग्राम
नीबू का रस डेढ़ चम्मच
नमक स्वादानुसार
तेल  तलने के लिए
जिरालू मसाला 2 चम्मच
हरा धनियाँ  2 चम्मच (बारीक कटा हुआ)
गराडू की चाट बनाने की विधि-
गराडू की चाट बनाने के लिए सबसे पहले गराडू को अच्छी तरह से धोकर कुकर में करीब 2-3 सीटी आने तक उबाल लें, अब जब कुकर का प्रेशर खत्म हो जाये तब गराडू को एक छलनी में निकाल कर ठंडा होने दें। जब गराडू ठंडा हो जाए तब उसके छिलके कर छील लें। अब इन छीले हुए गराडू को छोटे छोटे टुकड़ो में काट लें। और एक कढ़ाही में तेल डालकर गर्म करने रखें, जब तेल गर्म हो जाए तब गराडू के पीस डालकर क्रिस्पी ब्राउन होने तक डीप फ्राई करें और तले हुए गराडू को पेपर पर निकाल लें जिससे एक्स्ट्रा तेल पेपर सोंख लें। अब गराडू के पीस को सर्विंग प्लेट में निकाल लें और इसके ऊपर से जिरालू मसाला , नीबू का रस , नमक और लाल मिर्च पाउडर डालकर अच्छे से मिला लें और कटे हुए हरे धनिये से गार्निश गरमा गर्म सर्व करें। स्वादिष्ट गराडू की चाट तैयार है।
जिरालू मसाला वैसे तो आसानी से बाज़ार में मिल जाता है पर इसे घर पर भी आप बहुत ही आसानी से बना सकते है। इसे बनाने के लिए –
भुना जीरा पाउडर 2 चम्मच
सौंठ पावडर 1 चम्मच
लाल मिर्च पाउडर आधा चम्मच
हींग 1 चुटकी
काला नमक आधा चम्मच
सेंधा नमक आधा चम्मच
हल्दी पाउडर चौथाई चम्मच
इन सभी मसालो को अच्छी तरह से मिला कर एक Airtight container में भरकर रख लें और आवश्यकता होने पर आसानी से इस्तेमाल कर सकते है।


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मुंह के छालों से छुटकारा के उपचार


         
                                     
      अजीर्ण व पेट में कब्ज होने की अवस्था में अक्सर हमारे मुँह में छाले हो जाया करते हैं। अमाशय व आँतों में सूजन व घाव होने पर मुँह में छालों की उत्पत्ति हो जाया करती है। पेट की गर्मी की वजह से भी मुँह में छाले हो जाते हैं अक्सर जब मुँह में छाले हो जाते है तो कुछ भी खाना-पीना व गटकना तक मुश्किल हो जाया करता है। कई बार जीभ पर भी छाले हो जाया करते हैं। ऐसी हालत में कुछ भी न खाते बनता है न उगलते ही बनता है।

  मुहं के छाले  की घरेलू आयुर्वेदिक चिकित्सा -

1) दिन में कम से कम तीन बार कच्चे दूध से   अच्छी तरह गरारे करते रहने से मुख -छाला  में आशानुरूप लाभ  होता है|
2) गुलाब के फूल,आंवला  ,सौंफ  तीनों  बराबर  मात्रा में लेकर  चूर्ण बनालें | आधा चम्मच चूर्ण  नियमित रूप से  सुबह -शाम पानी के साथ  फक्की   लेने से मुहं के छाले   ठीक  हो जाते हैं|
3) एक गिलास गरम पानी में चुटकी भर काली मिर्च और आधा निम्बू का  रस  मिलाकर दिन में  दो बार पीने से मुंह के चाले  कुछ दिनों में  ठीक हो जाते हैं|
4) शहद में मुलहठी का चूर्ण मिलाकर इसका लेप मुँह के छालों पर करें और लार को मुँह से बाहर टपकने दें।

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5) मुँह में छाले होने पर अडूसा के 2-3 पत्तों को चबाकर उनका रस चूसना चाहिए।
6) कत्था, मुलहठी का चूर्णऔर शहद मिलाकर मुँह के छालों पर लगाना  चाहिए।
7) अमलतास की फली  की मज्जा को धनिये के साथ पीसकर थोड़ा कत्था मिलाकर मुँह में रखने से अथवा केवल गूदे को मुँह में रखने से मुँहके छाले दूर हो जाते हैं।
8)  अमरूद के कोमल पत्तों में कत्था मिलाकर पान की तरह चबाने से मुँह के छाले ठीक हो जाते हैं।
9) अनार के 25 ग्राम पत्तों को 400 ग्राम पानी में ओंटाकर चौथाई भाग शेष रहने पर इस क्वाथ से कुल्ला करने से मुँह के छाले दूर होते हैं।
१०) मुंह के छाले खत्म करने के लिए जामुन के पत्ते लें। इन्हें धोकर पीसें। छानें। इस पानी (रस) से कुल्ले करें।
११) इस रोग से छुटकारा पाने के लिए टमाटर का रस निकालें। इस रस में इतनी ही मात्रा में पानी मिलाएं। इस पानी से कुल्ला करें। आराम होगा।

१२) तुलसी की ताजा पांच पत्तियां लें। इन्हें धोएं। चबाएं। खूब बारीक चबाकर निगलें। इस पर पानी तीन-चार घूंट धीरे-धीरे पी लें। छाले से निजात मिलेगी|
१३) मुंह के छालों को हटाने के लिए बंसलोचन पीसें। छानें। इसे शहद में मिलाएं। मुंह के अंदर अंगुली से लगाएं।
१४) इस रोग के लिए आक के दूध की कुछ बूंदें निकालें। इसे एक चम्मच शहद में मिलाएं। मुंह में लगाने से जरूर लाभ होगा।
१५) मामूली मात्रा में पिसा कपूर तथा एक छोटा चम्मच पिसी मिश्री लें। दोनों को मिलाएं। मुंह में लगाने से फायदा होगा।
१६) थोड़ा-सा हरा पुदीना, इतना ही सूखा धनिया तथा समभाग मिश्री। तीनों को एक साथ मुंह में डालकर चबाएं। पूरा लाभ मिलेगा।



१७) मुंह के छालों से छुटकारा पाने के लिए भोजन करने के बाद छोटी हरड़ चूसें। छालें गायब होने लगेंगे।
१८) यदि तरबूज का मौसम हो तो इसके छिलके जलाएं। राख तैयार करें। इस राख को लगाने से छालें नहीं रहेंगे।
१९) थोड़ा-सा सुहागा फुला लेंबारीक पीसें। इसे दो चम्मच ग्लिसरीन में मिलाएं। इसको लगाने से छाले दूर हो जायेंगे।
२०) मुंह के छाले नष्ट करने के लिए सत्यानाशी की टहनी लें। इसे दातुन की तरह थोड़ा चबाएं। अवश्य आराम आयेगा।

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