रक्त मे यूरिया बढ़ने पर घरेलू आयुर्वेदिक उपचार



आयुर्वेद एक प्राचीन विज्ञान है जिसका उपयोग कई रोगियों के लाभ के लिए किया जा सकता है जो मधुमेह, किडनी की विफलता, हृदय संबंधी बीमारियों और अन्य जैसी पुरानी और दर्दनाक बीमारियों से पीड़ित हैं. आयुर्वेद के मुख्य आधारों में से एक में जड़ी-बूटियों का इस्तेमाल करने के लिए दवाएं और कंक्लेक्शन भी शामिल हैं जो अपने 100% प्राकृतिक तत्वों के साथ राहत देने में मदद करेंगे. मुत्र्रक्रिचांतक चूर्ण, पुर्णनव मंदुर, वरुणदी वटी और कई अन्य दवाओं जैसे डायलिसिस से बचने के लिए और गुर्दे के बेहतर कामकाज की सहायता से रक्त में यूरिया के स्तर को कम करने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है.
सभी स्वस्थ व्यक्तियों के रक्त में यूरिया की कुछ मात्रा हमेशा मिलेगी। फिर भी जब रक्त में यूरिया (Urea In Blood) का स्तर बहुत ज्यादा हो जाता है तो शरीर के कुछ हिस्से में खराबी आने लगती है, जिसके कारण शरीर इस अतिरिक्त यूरिया को सफलतापूर्वक निकालने में सक्षम नहीं हो पाता। यह यूरिया लिवर में बन सकता है, जहां प्रोटीन मेटाबॉलिज्म का कैमिकल संतुलन की प्रक्रिया होती है। रक्त में यूरिया की मात्रा बढ़ जाने से यह तब तक हमारी शरीर के अंगों में संचारित होता है जब तक किड़नी इसे पेशाब के जरिए बाहर नहीं निकाल देती। लेकिन जब यह यूरिया पूरे तरीके से साफ नहीं हो जाता तो यह हमारे रक्त में बना रहता है और हमारी किडनी व अन्य अंगों के साथ-साथ किडनी के रक्त प्रवाह के लिए समस्या खड़ी कर देता है। इसके कारण जलन, हार्ट फेलियर, उल्टी, दस्त के साथ-साथ डायबिटीज जैसी गंभीर भी हो सकती है।
लंबे समय तक यूरिया के रक्त में बने रहने से किडनी डैमेज हो सकती है और प्यास, सिरदर्द, थकान, चक्कर, अंगों में बेचैनी, पेट में दर्द जैसे रक्त में यूरिया की मात्रा ज्यादा होने के लक्षण हैं। अगर आप इस समस्या से परेशान हैं तो हम आपको 4 ऐसे आयुर्वेदिक तरीके बताने जा रहे हैं, जिसके जरिए आप प्राकृतिक तरीके से रक्त में यूरिया के स्तर को कम कर सकते हैं।
हर्बल दवाएं
आयुर्वेद एक प्राचीन विज्ञान है जिसका उपयोग डायबिटीज, किडनी फेलियर, हृदय रोगों और पुराने से पुरानी और दर्दनाक बीमारियों से पीड़ित कई रोगियों के लाभ के लिए किया जा सकता है। आयुर्वेद के मुख्य सिद्धांतों में से एक में दवाओं और मनगढ़ंत बनाने के लिए जड़ी बूटियों का उपयोग शामिल है, जो उनके 100% प्राकृतिक तत्वों के साथ राहत देने में मदद करता है। मुत्रिक्रींतक चूर्ण, पुनर्नवा मंडूर, वरुणादि वटी और कई अन्य दवाओं का उपयोग डायलिसिस से बचने और किडनी के बेहतर तरीके से काम करने और रक्त में यूरिया के स्तर को नीचे लाने के लिए किया जा सकता है
गोखरू
यह एक मूत्रवर्धक औषधि है, जो गुर्दे की कमजोर कोशिकाओं को ताकत देने और उन्हें फिर से ताकतवर बनाने के लिए काम आती है। इसका प्रयोग एक हर्बल टॉनिक के रूप में किया जा सकता है।
पुनर्नवा
इस जड़ी बूटी का नाम दो शब्दों - पुन: और नवा से लिया गया है। पुना: का मतलब फिर से और नवा का मतलब नया होता है। साथ मिलकर यह दोनों ही उपचार किए जा रहे अंग को नए सिरे से काम करने में मदद करते हैं। यह जड़ी-बूटी बिना किसी दुष्प्रभाव के सूजन को कम कर किडनी से अतिरिक्त तरल पदार्थ बाहर निकालने में मदद करते हैं।
हाइग्रोफिला ऑरीकुलता
यह रक्त में यूरिक एसिड की मात्रा करने के लिए एक बेहद ही जरूरी आयुर्वेदिक दवा है।
वरुण
यह एक सामान्य दवा है, जिसका उपयोग गुर्दे के क्षेत्र में मौजूद पथरी को तोड़ने के लिए किया जा सकता है और यहां तक कि मूत्र पथ के संक्रमण के इलाज के लिए भी काम आती है। यह जड़ी बूटी किसी भी तत्व को हटाने में मदद करती है, जो मूत्र पथ को बाधित कर सकती है। इतनी ही नहीं यह किडनी में अतिरिक्त तरल पदार्थ के निर्माण और सूजन को दूर करने का काम करती है।

चक्कर आना (Vertigo) के कारण लक्षण व उपचार



आपने कभी न कभी महसूस किया ही होगा कि अचानक से आपकी आंखों के आगे अंधेरा-सा छा गया हो, फिर चाहे आप बैठे हों या खड़े हों। साथ ही कभी न कभी आपको ऐसा भी लगा होगा कि अचानक आपका सिर घूमने लगा है। अगर हां, तो यह चक्कर आने के लक्षण हैं। अगर आपको भी बार बार चक्कर आना या सिर चकराने जैसी समस्या हुई है, तो स्टाइलक्रेज का यह लेख खास आपके लिए है। इस लेख में हम आपको बताएंगे कि चक्कर किन कारणों से आते हैं, इसके लक्षण क्या हैं और इनसे राहत पाने के लिए क्या किया जा सकता है।क्‍या आपके साथ भी कभी ऐसा होता है, कि अचानक से आसपास रखी सारी चीजें मानों घूमने लगती हों या आपकी आंखों के सामने एक तेज रौशनी के बाद अंधेरा सा होने लगता हो। आपके आसपास की आवजे आपको सुनाई देना बंद होने लगता हो और आप जमीन पर गिर पड़ते हों। जी हां ऐसा ही कुछ होता है अचानक जब आपको चक्‍कर आ जाता है। अचानक चक्‍कर आने के कई कारण हो सकते हैं जैसे कि ज्‍यादा समय भूखे पेट रहना, कमजोरी या अन्‍य कोई वजह जिसकी वजह से आप अचानक बेहोश गिर पड़ते हैं। वैसे कई बार तो चक्‍कर ज्‍यादा देर बैठे रहने के बाद अचानक उठने पर भी आते हैं, जिसमें आपको लगता है मानो पूरी धरती गोल-गोल घूम रही हो। यह सब मस्तिष्‍क में रक्‍त की पूर्ति की कमी होने के कारण या रक्‍तचाप कम होने के कारण होता है। लेकिन अचानक व बार-बार चक्‍कर आने की स्थिति को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। इस स्थिति में आप अपने घर पर रखी कुछ चीजों का इस्‍तेमाल उपचार के तौर पर कर सकते हैं।वर्टिगो सबसे आम बीमारियों में से एक है। वर्टिगो का अर्थ है चक्कर आने की भावना। इस बीमारी में आपको अपने आस पास की चीजे घूमती हुई लगती हें। इस बीमारी में व्यक्ति को उल्टी और मितली हो सकती हैं। वर्टिगो के कुछ गंभीर मामलों में व्यक्ति बेहोश भी हो सकता है, लेकिन ऐसा हर बार नहीं होता है। वर्टिगो में अक्सर चक्कर आने के कारण मालूम नहीं हो पाते हें। वर्टिगो, प्रकाशस्तंभ के समान नहीं है। वैसे तो यह बीमारी अपने आप ही ठीक हो जाती ही । वर्टिगो का उपचार कारण पर निर्भर करता है। लोकप्रिय उपचारों में कुछ शारीरिक आभ्यास शामिल हैं और यदि आवश्यक हो, तो विशेष दवाएं जिन्हें वेस्टिबुलर ब्लॉकिंग एजेंट (vestibular blocking agents) कहा जाता है दी जातीं हैं।
वर्टिगो का अर्थ है चलते-चलते या अचानक खड़े होने पर चक्कर आना। इसमें व्यक्ति को शारीरिक संतुलन बनाए रखने में समस्या होती है। यह कई स्थितियों का लक्षण है। यह तब हो सकता है जब आंतरिक कान, मस्तिष्क या संवेदी तंत्रिका मार्ग के साथ कोई समस्या उत्पन्न हो रही हो। हम आपको बता दें कि ऊंचाई के डर (fear of heights) को वर्टिगो नहीं कहते। इसे एक्रोफोबिया (Acrophobia) कहा जाता है और वह वर्टिगो से बहुत अलग होता है।
यह अक्सर अधिक ऊंचाई से नीचे देखने के साथ जुड़ा हुआ है लेकिन ऊंचाई से नीचे देखने पर चक्कर आना किसी भी अस्थायी आंतरिक कान या मस्तिष्क में समस्याओं के कारण हो सकता है।
इस बीमारी के कारणों में मिनियर रोग (Meniere’s disease) आंतरिक कान का बिकार (बेनाइन पैरॉक्सिज्मल पोजिशनल वर्टिगो) और तंत्रिका कि सूजन सहित और भी रोग हो सकते हें।
चक्कर आने का कारण –
चक्कर आने के कई कारण हो सकते हैं, नीचे हम इसके कुछ सामान्य कारण बता रहे हैं, जिस वजह से यह समस्या हो सकती है
माइग्रेन : यह ऐसा विकार है, जिसमें गंभीर सिरदर्द होता है। माइग्रेन होने पर सिरदर्द के पहले या सिरदर्द के बाद चक्कर आ सकते हैं।
चिंता या तनाव : चिंता या तनाव भी चक्कर आने का कारण बन सकता है। ऐसे में आपको असामान्य रूप से सांस लेने की समस्या हो सकती है।
लो ब्लड शुगर : सिर में चक्कर आना लो ब्लड प्रेशर के कारण भी हो सकता है। यह आमतौर पर डायबिटीज के मरीजों में देखने को मिलता है।
लो ब्लड प्रेशर : लो ब्लड प्रेशर यानी कम रक्तचाप के कारण चक्कर आना आम है। कम रक्तचाप होने से मस्तिष्क में पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती, जिस कारण चक्कर आने लगते हैं।
अचानक से रक्त प्रवाह होना : जब आप काफी देर से बैठे हो और अचानक से उठो, तो रक्त प्रवाह में तेजी से बदलाव आता है, जिस कारण कभी-कभी चक्कर आ सकते हैं।
डिहाइड्रेशन, गर्मी या थकान : तेज गर्मी में, शरीर में पानी की कमी होने पर या फिर थकान होने पर भी चक्कर आ सकते हैं।
वर्टिगो के लक्षण
वर्टिगो वाले व्यक्ति को यह महसूस होगा कि उनका सिर, या उनके आसपास का वातावरण घूम रहा है या चल रहा है।
वर्टिगो की अन्य स्थितियों का यह एक लक्षण हो सकता है, और इससे संबंधित कई लक्षण एक साथ भी हो सकते है। जिनसे आप वर्टिगो का पता लगा सकते हैं, इसमें शामिल है:
संतुलन बनाने में समस्या
मोशन सिकनेस की भावना
मतली और उल्टी
ठीक से सुनाई न देना
टिनिटस (किसी एक कान में सीटी जैसी आवाज आना)
कान में किसी चीज के होने की भावना
आंखों को नियंत्रित करने में समस्या
सिरदर्द
जी मिचलाना
वर्टिगो बेहोशी की सामान्य भावना नहीं है। यह एक घूर्णी चक्कर जैसा होता है।
कारण के आधार पर, वर्टिगो विभिन्न प्रकार के होते हैं। वर्टिगो के दो मुख्य प्रकार निम्न हैं।
पेरिफेरल वर्टिगो आमतौर पर तब होता है जब आंतरिक कान के संतुलन अंगों में गड़बड़ी होती है। आंतरिक कान या वेस्टिबुलर तंत्रिका (कान का आंतरिक हिस्सा, जो शरीर के संतुलन को नियंत्रित करता है) में एक समस्या के कारण पेरिफेरल वर्टिगो होता है। वेस्टिबुलर तंत्रिका आंतरिक कान को मस्तिष्क से जोड़ती है। ऐसे में, व्यक्ति को अपना संतुलन बनाये रखने में परेशानी होती है।
सेंट्रल वर्टिगो तब होता है जब मस्तिष्क में कोई समस्या होती है, विशेष रूप से सेरिबैलम या मध्य मस्तिष्क में सेरिबैलम हिंदब्रेन (मस्तिस्क का पिछला हिस्सा) है जो मूवमेंट और संतुलन के समन्वय को नियंत्रित करता है। सेंट्रल वर्टिगो मस्तिष्क के एक या एक से अधिक हिस्सों में गड़बड़ी के परिणामस्वरूप होता है, जिसे संवेदी तंत्रिका मार्ग के रूप में जाना जाता है।
परिधीय वर्टिगो
लगभग 93 प्रतिशत वर्टिगो के मामले परिधीय वर्टिगो हैं, जो निम्न में से एक के कारण होता है:
सौम्य पैरॉक्सिस्मल पॉसिबल वर्टिगो आपके सिर की स्थिति में होने वाले परिवर्तनों के कारण होता है। कान के अन्दर के घुमे हुये भाग में तैरते कैल्शियम क्रिस्टल की वजह से यह बीमारी होती हैं।
मिनियर रोग (Meniere) एक आंतरिक कान का विकार है जो शरीर के संतुलन और हमारी सुनने कि क्षमता को प्रभावित करता है।
तीव्र परिधीय वेस्टिबुलोपैथी (एपीवी) आंतरिक कान की सूजन है, जो अचानक चक्कर की शुरुआत का कारण बनती हैं।
एक और प्रकार का वर्टिगो होता है, जिसे सेंट्रल वर्टिगो (central vertigo) कहा जाता है। यह दिमाग के निचले या पिछले हिस्से (सेरिबैलम) में समस्या होने पर होता है। इसके कारण पेरिफेरल वर्टिगो (Peripheral Vertigo) के कारण से कुछ अलग हो सकते हैं, जैसे
केंद्रीय वर्टिगो के कारण
आघात
दिमाग के मध्य भाग में एक ट्यूमर
माइग्रेन
मल्टीपल स्क्लेरोसिस
वर्टिगो को मोशन सिकनेस के समान लगता है, या जैसे कमरा घूम रहा है।
सिर से जुड़ी बीमारी के कारण वर्टिगो के निम्न लक्षण हो सकते हैं
जी मिचलाना
उल्टी
सरदर्द
चलते समय ठोकर खाना
वर्टिगो का निदान
वर्टिगो के प्रकार को निर्धारित करने के लिए टेस्ट
हेड-थ्रस्ट टेस्ट( Head-thrust test): आप परीक्षार्थी की नाक पर नज़र डालते हैं, और परीक्षार्थी एक त्वरित सिर की तरफ गति करता है और आँख की गति को देखता है।
रोमबर्ग परीक्षण (Romberg test): आप एक जगह पैरों के बल खड़े होते हैं और आँखें खुली होती हैं, फिर अपनी आँखें बंद करें और संतुलन बनाए रखने की कोशिश करें।
फुकुदा-ऊंटबर्गर परीक्षण (Fukuda-Unterberger tes)t: आप से अपनी आंखों को बंद कर के जगह-जगह मार्च करने के लिए कहा जाता है।
डिक्स-हिलपाइक परीक्षण: आप एक कुर्सी पर बेठ कर अपनी दाएं तथा बाए झुकते हें अब एक डॉक्टर आपके चक्कर के बारे में अधिक जानने के लिए आपकी आंख की चाल को देखेगा जिससे यह पता चलता हें आप को वर्टिगो कि समस्या हें कि नहीं।
वर्टिगो के लिए इमेजिंग परीक्षणों में शामिल हैं
सीटी स्कैन
एमआरआई
वर्टिगो का इलाज
वर्टिगो का उपचार कारण पर निर्भर करता है। कुछ प्रकार के वर्टिगो बिना उपचार के टीक हो जाते हैं, लेकिन किसी भी अंतर्निहित समस्या के कारण वर्टिगो होने पर चिकित्सा ध्यान देने की आवश्यकता हो सकती है, उदाहरण के लिए, एक जीवाणु संक्रमण जिसमें एंटीबायोटिक चिकित्सा की आवश्यकता होगी।
ड्रग्स कुछ लक्षणों को राहत दे सकता है, उदाहरण के लिए, मोशन सिकनेस और मतली को कम करने के लिए एंटीहिस्टामाइन या एंटी-इमीटिक्स (antihistamines or anti-emetics) दवाएं शामिल हो सकतीं हैं।
मध्य कान के संक्रमण से जुड़े एक तीव्र वेस्टिबुलर विकार वाले मरीजों को स्टेरॉयड, एंटीवायरल ड्रग्स या एंटीबायोटिक दवाइयां दी जा सकती हैं।
न्यस्टागमस एक अनियंत्रित आंख मूवमेंट है, आमतौर पर एक साइड से दसरी साइड की ओर। यह तब हो सकता है जब किसी व्यक्ति को मस्तिष्क या आंतरिक कान की शिथिलता के कारण चक्कर आता है।
कभी-कभी, अंतरंगनीय सौम्य पैरॉक्सिस्मल पोजीटिअल वर्टिगो (BPPV) के रोगियों के इलाज के लिए आंतरिक सर्जरी की जाती है। सर्जन उस क्षेत्र को अवरुद्ध करने के लिए आंतरिक कान में एक हड्डी प्लग (bone plug) लगाता है जहां से वर्टिगो (सिर का चक्कर) को उत्पन्न किया जाता है।
वेस्टिबुलर ब्लॉकिंग एजेंट (VBA) सबसे लोकप्रिय प्रकार की दवा है। वेस्टिबुलर ब्लॉकिंग एजेंटों में शामिल हैं:
एंटीहिस्टामाइन (प्रोमेथाज़िन, बिटाहिस्टिन)
बेंज़ोडायजेपाइन (डायजेपाम, लॉराज़ेपम)
एंटीमेटिक्स (प्रोक्लोरेरज़ीन, मेटोक्लोप्रमाइड)
वर्टिगो के जोखिम कारक
वर्टिगो के जोखिम को बढ़ाने वाले कारकों में शामिल हैं:
हृदय रोगों, विशेष रूप से पुराने वयस्कों में
हाल ही में कान के संक्रमण, जो भीतरी कान में असंतुलन का कारण बनता है
सिर का आघात
एंटीडिप्रेसेंट्स और एंटीसाइकोटिक्स जैसी दवाएं
सावधानियां
जो कोई भी वर्टिगो या अन्य प्रकार के चक्कर का अनुभव करता है, उसे ड्राइविंग या सीढ़ी का उपयोग नहीं करना चाहिए। गिरने से बचने के लिए घर में अनुकूलन करना एक अच्छा विचार हो सकता है। धीरे-धीरे उठने से समस्या दूर हो सकती है। लोगों को ऊपर की ओर देखते समय ध्यान रखना चाहिए और सिर की स्थिति में अचानक बदलाव नहीं करना चाहिए।
वर्टिगो के घरेलू उपचार
तुलसी और साइप्रस का तेल
वर्टिगो के लक्षण जैसे सिरदर्द से छुटकारा दिलाने में तुलसी मदद कर सकती है। तुलसी और साइप्रस के तेल कि दो –दो बुँदे ले मलें और माथे में रख दे क्योंकि तुलसी एक दर्द निवारक ओषधि हैं। इसलिए यह सिर दर्द से छुटकारा दिलाने में मदद करती है।
*पकने के बाद सूखी हुई लौकी को डण्ठल की तरफ से काट दें, ताकि अन्दर का खोखलापन दिखाई दे। अगर सूखा गूदा हो तो उसे निकाल दें। अब इसमें ऊपर तक पानी भर कर 12 घण्टे तक रखें फिर हिलाकर पानी निकाल कर साफ कपड़े छान लें। इस पानी को ऐसे बर्तन में भरें, जिसमें आप अपनी नाक डुबो सकें। नाक डुबोकर जोर से सांस खींचें, ताकि पानी नाक से अन्दर चढ़ जाए। पानी खींचने के बाद नाक नीची करके आराम करें। इस उपाय से चक्कर आने की समस्या सदा के लिए खत्म हो जाती है।
पेपरमिंट ऑयल
तीन से चार बूंद पेपर मेंट ऑयल ओर एक चम्मस बादाम का तेल ले अब दोनों को मिला ले और फिर इसे अपनी गर्दन तथा माथे पर लगाये इससे आपको सिर दर्द ठीक हो जायेगा।
अदरक
वर्टिगो के घरेलू उपचार में अदरक बहुत लाभदायक होता है। अदरक का एक टुकड़ा, शक्कर, आधा चम्मच चाय पत्ती और एक कप दूध इन सभी को एक वर्तन में लेकर गरम करे और छानकर पिए। इससे आपको उल्टी, जी मिचलाना आदि से राहत मिलेगी।
*चक्कर आने पर तुलसी के रस में चीनी मिलाकर सेवन करने से या तुलसी के पत्तों में शहद मिलाकर चाटने से चक्कर आना बंद हो जाता है।
*चक्कर आने पर धनिया पाउडर दस ग्राम तथा आंवले का पाउडर दस ग्राम लेकर एक गिलास पानी में भिगो कर रख दें। सुबह अच्छी तरह मिलाकर पी लें। इससे चक्कर आने बंद हो जाते है।
*सिर चकराने पर आधा गिलास पानी में दो लौंग डालकर उसे उबाल लें और फिर उस पानी को पी लें। इस पानी को पीने से लाभ मिलता है।
*10 ग्राम आंवला, 3 ग्राम काली मिर्च और 10 ग्राम बताशे को पीस लें। 15 दिनों तक रोजाना इसका सेवन करें चक्कर आना बंद हो जाएगा।
*जिन लोगों को चक्कर आते हैं उन्हें दोपहर के भोजन के 2 घंटे पहले और शाम के नाश्ते में फलों का जूस पीना चाहिए। रोजाना जूस पीने से चक्कर आने बंद हो जाएंगे। लेकिन ध्यान रखें कि जूस में किसी प्रकार का मीठा या मसाला नहीं डालें सादा जूस पियें। जूस की जगह चाहें तो ताजे फल भी खा सकते हैं।

शहद
चक्कर आने पर शहद काफी प्रभावी तरीके असर डालता है। आपको बता दें कि जब शरीर में ब्लड शुगर का स्तर कम होने लगता है, तो चक्कर आने लगते हैं। ऐसे में शहद का सेवन करना चाहिए, जिसमें प्राकृतिक शर्करा होती है। शहद आपको ऊर्जा प्रदान करती है। इससे ब्लड शुगर लेवल नियंत्रित रहता है
लोबान तेल
लोबान तेल कि कुछ बुँदे ले ओर अपने कंधे कि मसाज करें। इससे आपको सिर दर्द तथा अकडन से छुटकारा मिलेगा।
बादाम
बादाम पौष्टिक गुणों से भरपूर है। एक स्वस्थ शरीर के लिए नियमित रूप से बादाम का सेवन काफी फायदेमंद साबित हो सकता है। बादाम में प्रचुर मात्रा में विटामिन-ई व विटामिन-बी होता है, जो आपको ऊर्जा प्रदान करता है। ऊर्जा से भरपूर बादाम चक्कर आने से राहत दिलाता है
पर्याप्त मात्रा में नींद लेना
नींद की कमी से वर्टिगो की भावनाओं को ट्रिगर किया जा सकता है। यदि आप पहली बार वर्टिगो का अनुभव कर रहे हैं, तो यह तनाव या नींद की कमी का परिणाम हो सकता है। यदि आप यह सोच रहे हैं कि आप क्या कर सकते हैं तो एक छोटी झपकी ले सकते हैं, इससे आपकी चक्कर की भावनाओं को कम किया जा सकता है।
*नारियल का पानी रोज पीने से भी चक्कर आने बंद हो जाते है।
*चाय व कॉफ़ी कम पीनी चाहिए। अधिक चाय व कॉफ़ी पीने से भी चक्कर आते हैं।
*20 ग्राम मुनक्का घी में सेंककर सेंधा नमक डालकर खाने से चक्कर आने बंद हो जाते है।
*खरबूजे के बीजों को पीसकर घी में भुन लें। अब इसकी थोड़ी थोड़ी मात्रा सुबह शाम लें, इससे चक्कर आने की समस्या में बहुत लाभ होता है।

आंवला
चक्कर आने पर आंवले का सेवन लंबे समय से किया जा रहा है। आंवले में विटामिन-ए और विटामिन-सी प्रचुर मात्रा में होता है। इससे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। इसके अलावा, इससे रक्त संचार भी दुरुस्त रहता है, जिससे चक्कर आने की समस्या से राहत मिलती है
क्या करें?
आप आंवले का पेस्ट बनाकर इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए आप 10 ग्राम आंवला लें। उसमें तीन काली मिर्च और कुछ बताशे मिलाकर पीस लें। इस पेस्ट का आप 15 दिन तक रोजाना सेवन करें। इससे आपकी चक्कर आने की समस्या धीरे-धीरे कम होगी।
इसके अलावा, आप आंवले का मुरब्बा या आंवला कैंडी का सेवन भी नियमित रूप से कर सकते हैं।
नींबू
चक्कर आने पर नींबू का सेवन करना काफी प्रभावी होता है। इसमें विटामिन-सी होता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है। इसके अलावा, नींबू शरीर को हाइड्रेट रखता है, जिससे चक्कर आने के दौरान राहत मिलती है
क्या करें?
चक्कर आने पर एक गिलास पानी में आधा नींबू निचोड़ लें।
इस पानी में एक चम्मच चीनी डालें और इस मिश्रण को पी लें।
सलाद में नींबू का सेवन करने से भी आपको आराम मिलेगा

पर्याप्त पानी पीना
कभी-कभी सिर का चक्कर निर्जलीकरण के कारण होता है। ऐसा होने पर सोडियम का सेवन कम करने से मदद मिल सकती है। लेकिन हाइड्रेटेड रहने का सबसे अच्छा तरीका है जिसमे कि आप बस भरपूर मात्रा में पानी पिएं। अपने पानी के सेवन पर नजर रखें और गर्म, नम स्थितियों और पसीने से तर स्थितियों के बारे में जानने की कोशिश करें जो आपको अतिरिक्त तरल पदार्थ खो सकते हैं। जब आप निर्जलित हो जाते हैं, तब अतिरिक्त पानी पीने की योजना बनाएं। बस इस बात से अवगत रहें कि आप कितना पानी पी रहे हैं, आप देखतें हैं कि यह वर्टिगो को कम करने में आपकी मदद करता है।
वर्टिगो उतना खतरनाक बीमारी नहीं है, लेकिन अगर यह होता रहता है तो यह एक अंतर्निहित स्थिति का लक्षण है। घर पर वर्टिगो का इलाज करना अल्पकालिक समाधान के रूप में काम कर सकता है। लेकिन अगर आपको लगातार चक्कर आना जारी है, तो इसका कारण पता लगाना महत्वपूर्ण है। आपका सामान्य चिकित्सक इसकी जाँच करने में सक्षम हो सकता है, या आपको आगे की जाँच के लिए एक कान, नाक और गले के विशेषज्ञ या न्यूरोलॉजिस्ट के लिए भेजा जा सकता है।
स्वस्थ आहार लें
अगर आपको चक्कर आने की समस्या है और चक्कर की दवा से बचना चाहते हैं, तो जरूरी है कि आप स्वस्थ खानपान लें। एक स्वस्थ खानपान आपको कई समस्याओं से दूर रखने में मदद करता है। खाना ऐसा खाएं, जो जरूरी पोषक तत्वों से भरपूर हो। अपने आहार में आयरन, विटामिन-ए, फाइबर व फोलेट से भरपूर खाद्य पदार्थ लें। नीचे हम बता रहे हैं कि चक्कर आने से बचने के लिए आपको अपने खानपान में क्या शामिल करना चाहिए :
विटामिन-सी : चक्कर से बचने के लिए विटामिन-सी लेना जरूरी है। इसके लिए आप संतरे, नींबू व अंगूर जैसी चीजों का सेवन करें।
आयरन : जैसा कि हमने बताया शरीर में खून की कमी होने से भी चक्कर आते हैं। ऐसे में आयरन की जरूरत होती है। आप आयरन युक्त चीजें जैसे पालक, सेब व खजूर आदि का सेवन करें।
फोलिक एसिड : फोलिक एसिड का सेवन करना भी जरूरी है। इसके लिए आप हरी सब्जियों जैसे – ब्रोकली, अनाज, मूंगफलियां व केले को अपने खानपान में शामिल करें।

दूध पीने के साथ न खाएं ये आहार // Do not eat this diet with drinking milk


                       

दूध में विटामिन, खनिज, प्रोटीन, स्वस्थ वसा और एंटीऑक्सिडेंट सहित पोषक तत्वों की एक विस्तृत श्रृंखला होती है। दूध प्रोटीन का एक समृद्ध स्रोत है जिसमें सभी नौ आवश्यक अमीनो एसिड होते हैं। यह उम्र से संबंधित मांसपेशियों के नुकसान को कम करने और व्यायाम के बाद मांसपेशियों की मरम्मत को बढ़ावा देने में मदद कर सकता है। दूध में मौजूद विभिन्न प्रकार के पोषक तत्व जो हड्डियों के स्वास्थ्य को लाभ पहुंचाते हैं, जैसे कैल्शियम, विटामिन डी, फॉस्फोरस और मैग्नीशियम। अध्ययनों से पता चलता है कि दूध और डेयरी उत्पादों का सेवन ऑस्टियोपोरोसिस को रोक सकता है और फ्रैक्चर के जोखिम को कम कर सकता है।
अगर आप रोजाना दूध पीएंगे तो आपको ये सारे फायदे आसानी से मिल जाएंगे। मगर दूध पीने से पहले कुछ बातों का ध्‍यान रखना जरूरी होता है। एक्‍सपर्ट की मानें तो कुछ ऐसे आहार हैं जिन्‍हें दूध पीने से पहले सेवन नहीं करना चाहिए। ये आपके स्‍वास्‍थ्‍य के लिए हानिकारक हो सकते हैं।
दूध पीने से पहले न खाएं ये फूड
उड़द की दाल के खाने के बाद न पीएं दूध
उड़द की दाल खाने के बाद दूध का सेवन करने से आपका डाइजेशन खराब हो सकता है। दोनों एक साथ सेवन करना हानिकारक है। दाल खाने के बाद दूध पीने से आपको पेट में दर्द, उलटी और शरीर में भारीपन महसूस हो सकता है।
मूली और जामुन का सेवन न करें
अगर आप मूली और जामुन खा रहे हैं तो इसके तुरंत बाद दूध का सेवन कभी न करें। मूली और जामुन के सेवन के बाद दूध पीना आपके लिए खतरनाक हो सकता है। ऐसा करने से आपको त्वचा संबंधी कई तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ सकता है। यही नहीं, इसके अलावा चेहरे पर खुजली होने के साथ चेहरे पर झुर्रियां पड़ने की भी संभावना बढ़ जाती है।
. दूध पीने से पहले करेले और भिंडी का सेवन न करें
दूध पीने से पहले कभी भी करेले और भिंडी की सब्जी का भी सेवन नहीं करना चाहिए। इन सब्जियों को खाने के बाद दूध पीने से आपके चेहरे पर काले धब्बे पड़ने शुरू हो सकते हैं जिसकी वजह से आपके चेहरे रंग बेरंग हो सकता है। आप चेहरा खराब हो सकता है।
दूध कब कब नहीं पीना चाहिए?
खाना खाने के बाद
दूध अपने आप में एक संपूर्ण आहार होता है इसलिए भोजन करने के तुरंत बाद दूध पीना दोबारा भोजन करने के बराबर माना जाता है। क्योंकि दूध को पचाने में काफी समय लगता है। और अगर भोजन के बाद दूध पी लिया जाए तो इससे शरीर भारी लगने लगता है। पेट ज्यादा भरा हुआ महसूस होता है। और भोजन पचने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है।
यदि भोजन करने के बाद तुरंत दूध पीना ही हो तो, भोजन और दूध की मात्रा दोनों आधी आधी कर ले। उदाहरण के लिए अगर आप 4 रोटी और एक गिलास दूध पीना चाहते हैं तो, इस स्थिति में रोटी की मात्रा 2 कर दें, और दूध भी केवल आधा गिलास पिए। केवल ऐसा करने से ही आपका भोजन ठीक तरह से पच पाएगा। लेकिन इससे भी बेहतर तरीका यह है कि भोजन करने और दूध पीने के बीच में कम से कम 2 घंटे का अंतराल रखें।
खट्टे फल के बाद न पीएं दूध
दूध पीने से पहले खट्टे फलों का सेवन नहीं करना चाहिए। अगर आप खट्टे फल खाने के बाद दूध पीते हैं तो आपको वोमेटिंग या उल्‍टी की शिकायत हो सकती है। अगर आप ऐसे फलों का सेवन करते हैं तो दूध पीने में 2 घंटे का गैप जरूर दें।
प्याज और बैगन
दूध का केमिकल कंपाउंड प्याज और बैगन के भी विरोध होता है। इसलिए अगर आप भोजन में बैगन और सलाद के लिए कच्चे प्याज का सेवन करते हैं तो कम से कम दो घंटे के बाद ही दूध का सेवन करें। इन दोनों के साथ दूध का मिश्रण होने से अलग-अलग तरह के स्किन एलर्जी और त्वचा रोग होने की संभावना काफी बढ़ जाती है।
मछली खाने के बाद न पीएं दूध
मछली खाना सेहत के लिए फायदेमंद हो सकता है। यह त्‍वचा और बालों की सेहत के लिए भी फायदेमंद है। मगर इसे खाने के तुरंत बाद दूध कभी नहीं पीना चाहिए। ऐसा करने से आपकी पाचन क्रिया खराब हो सकती है। इससे आपको कई तरह की परेशानी हो सकती है। फूड पॉइजनिंग, पेट दर्द और शरीर पर सफेद धब्बे हो सकते हैं।
दही के साथ
दूध में जब मिलाया जाता है तो दही दूध के साथ केमिकल रिएक्शन करके उसे भी दही में बदल देता है। और जब हम इन दोनों का साथ में या एक के बाद एक का सेवन करते हैं। तो यह प्रक्रिया हमारे पेट में शुरू हो जाती है। जिससे हमारे पाचन में गड़बड़ी होने की संभावना काफी ज्यादा बढ़ जाती है।

धतूरा के औषधीय गुण उपयोग // Medicinal properties of Dhatura


यूं तो ईश्वर को अपनी बनाई सभी वनस्पतियां प्रिय हैं, लेकिन धतूरा इसके औषधीय गुणों के कारण शिवजी को विशेष प्रिय है। धतूरा ऐसा पौधा है, जो जड़ से लेकर तना तक औषधि गुणों से परिपूर्ण होता है। आयुर्वेद पद्धति में धतूरा का बहुत महत्व है। औषधि गुणों की खान माने जाने वाले धतूरा की जड़, फल, फूल, पत्ता औषधि गुणों से युक्त हैं। पैर में सूजन हो जाने पर इसके पत्ते को पीसकरलगाना काफी उपयुक्त माना जाता है। सांस के रोगों और जोड़ों के दर्द में भी यह लाभदायक होता है। बुखार, सायटिका, गठिया, पेट में गैस आदि तमाम रोगों में धतूरा का शोधन कर बनाई दवा से रोगों से मुक्ति मिलती है
धतूरा एक विषैले घटक के रूप में जाना जात है लेकिन फिर भी धतूरा के फायदे होते हैं। भारत में धतूरा का उपयोग विभिन्‍न प्रकार की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं को दूर करने के लिए उपयोग किया जाता है। हालांकि धतूरा का आ‍ध्‍यात्मिक महत्‍व भी होता है। इसे शिवजी की पूजा में उपयोग किया जाता है। औषधीय गुणों से भरपूर होने के कारण धतूरा के सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य लाभों में अस्थमा को दूर करने, बुखार को कम करने, दिल की रक्षा, दर्द को खत्म करने, प्रजनन क्षमता बढ़ाने, बालों के स्वास्थ्य को बढ़ावा देने, स्वस्थ नींद को प्रेरित करने और प्रसव पीड़ा को कम करने की क्षमता शामिल है। धतूरा एक मादक या नशीला खाद्य पदार्थ होता है। जिसका औषधीय उपयोग करने पर लाभ होते हैं। लेकिन आवश्‍यकता से अधिक इस्‍तेमाल करने पर यह हानिकार भी हो सकता है।
धतूरा एक खरपतवार है जिसके सुंदर फूल देखकर आप आकर्षित हो सकते हैं। लेकिन सावधान रहें क्‍योंकि धतूरा की लगभग 9 अलग-अलग प्रजातियां होती हैं जिनमें से कुछ जहरीले भी होते हैं। पारंपरिक रूप से धतूरा का उपयोग नशीली दवाओं के निर्माण में किया जाता है। धतूरा की बड़ी मात्रा में विषाक्त हो सकती है, छोटी मात्रा में जब उचित रूप से इसे लिया जाता है तो इसके औषधीय प्रभाव भी हो सकते हैं।
धतूरा आमतौर पर कैनबिस (स्मोक्ड) के साथ सेवन किया जाता है या शक्ति बढ़ाने के लिए शराब में जोड़ा जाता है। धतूरा में विभिन्न अल्कलॉइड, खनिज और कार्बनिक यौगिक हैं, जो इस पौधे के प्रभावों को इतना दिलचस्प बनाते हैं।
धतूरा के अन्य नाम-
धतूरा एक खरपतवार है जो सामान्‍य रूप से उस जगह आसानी से मिल जाता है जहां कचरा या कूड़ा एकत्र किया जाता है। धतूरा को अलग-अलग स्‍थानों पर कई नामों से जाना जाता है। जैसे कि मदन, उन्‍मत्‍त, शिवप्रिय, महामोही, कृष्‍ण धतूरा, खरदूषण, शिवशेखर, सविष, धुतूरा, सादा धुतूरा, धोत्रा ततूर, दतुरम आदि। इसकी कई प्रजातियां होने के कारण केवल कुछ प्र‍जातियों का औषधीय उपयोग किया जाता है। क्‍योंकि कुछ प्रजातियां बेहद जहरीली होती हैं।
धतूरा का पौधा
धतूरा का पौधा मध्‍यम आकार का पौधा होता है जिसके सभी अंगों का औषधीय उपयोग किया जाता है। इसके पत्‍ते बड़े डंठल वाले नोकदार और अंडाकार जैसे होते हैं। धतूरा के फूल की आकृति किसी घंटी के आकार की तरह दिखाई देती है। इसके फूल में 5 पंखुडियां होती हैं। हालांकि प्र‍जाति के अनुसार धतूरा के फूलों के रंग अलग-अलग होते हैं। धतूरा का फल गोल और कांटे युक्‍त होता है। हालांकि इसके फल में लगे कांटे नरम होते हैं। धतूरा के पत्‍ते और फलों के सूखे बीजों का विशेष रूप से औषधीय प्रयोजनों के लिए उपयोग‍ किया जाता है। धतूरा के बीज काले भूरे रंग के होते हैं। धतूरा के साबुत बीजों में किसी प्रकार की गंध नहीं होती है लेकिन इनका स्‍वाद कड़वा होता है।
धतूरा की तासीर
धतूरा की तासीर गर्म होती है जिसके कारण ही इसका उपयोग विभिन्‍न प्रकार की औषधीयों में किया जाता है। गर्म तासीर होने के कारण इसका उपयोग नशीले प्रभाव के लिए भी किया जाता है।
अपने औषधीय गुणों और पोषक तत्‍वों की मौजूदगी के कारण धतूरा का उपयोग करने से कई प्रकार के स्‍वास्‍थ्‍य लाभ प्राप्त हो सकते हैं। आइए धतूरा के इन आकर्षक स्वास्थ्य लाभों में से कुछ पर ध्यान दें। और जाने धतूरा के औषधीय लाभ क्‍या हैं।
आँख दुखना-
धतूरे के पत्तों का अर्क कान में डालने से आँख का दुखना बंद हो जाता है। हालांकि धतूरे में जहर होता है और इसका ज्यादा इस्तेमाल आपके लिए खतरनाक साबित हो सकता है लेकिन फिर भी धतूरा काफी गुणकारी है। बता दे की इसकी जड़, पत्तियां यहां तक की फल का इस्तेमाल भी औषधी बनाने में किया जाता है। पैरों में सूजन होने पर धतूरे की पत्तियों को पीसकर लगाने से सूजन काफी कम हो जाती है साथ ही इसके अलावा बुखार और गैस संबंधित कुछ दवाओं में धतूरे का इस्तेमाल कर बनाई गई दवा भी लाभकारी साबित होती है।
गंजापन -
अक्सर लोग उम्र से पहले ही गंजेपन का शिकार बन जाते हैं, आपको जानकार हैरानी होगी की इस गुणकारी धतूरे के रस को नियमित रुप से सिर पर लगाने से बाल जल्दी आने शुरु हो जाते हैं। 250 मिली ग्राम सरसों का तेल, 60 मिलीग्राम गंधक और 500 ग्राम धतूरे के पत्तों के रस को धीमी आंच पर पकाएं। पकने के बाद जितना तेल बचे उसमें से दो से तीन बूंदे कान में डालें। ऐसा करने पर कान के दर्द में फायदा होगा। यदि शरीर के किसी भी हिस्से में सूजन हो तो बस धतूरे के पत्तों को हल्का गुनगुना कर सूजन वाले स्थान पर बाँध दें निश्चित लाभ मिलेगा।
 श्वसन संस्थान के रोगों मे -
श्वसन संबंधी समस्‍याओं के लिए धतूरा के लाभ होते हैं। इस समस्‍या के उपाय में धतूरा का उपयोग गांजा (cannabis) के समान धूम्रपान के रूप में किया जाता है। धतूरा में एंटीस्‍पास्‍मोडिक (antispasmodic) प्रभाव होते हैं। जिसके कारण यह अस्‍थमा (asthma) के उपचार में प्रभावी होता है। धतूरा का उपयोग करने पर यह श्वसन पथ को शांत करने और उन्‍हें बंद होने और खांसी आने से रोकता है। धतूरा के एंटीस्‍पास्‍मोडिक प्रभाव शरीर के अन्‍य हिस्‍सों पर भी अपना प्रभाव डालते हैं। जिनमें मांसपेशियों को आराम दिलाना शामिल है।
मूड को सुधारे
अब तक के ज्ञात धतूरा के लाभों में यह प्रमुख लाभ है जो मूड को सुधारने (improve mood) और तनाव (stress) को कम करने में प्रभावी होता है। धतूरा का सेवन करने से शरीर में ऐसे हार्मोनों को उत्‍तेजित करने में मदद मिलती है जो तनाव को कम करने और मन को शांत करने में सहायक होते हैं।
जो लोग नियमित रूप से तनाव से ग्रस्त हैं, उनके लिए शरीर में हार्मोन का निर्माण खतरनाक हो सकता है। धतूरा की छोटी मात्रा में धूम्रपान पारंपरिक रूप से मूड में सुधार और अवसाद के लक्षणों से राहत के लिए किया जाता है।
इस तरह के लाभ प्राप्‍त करने के लिए धतूरा की बहुत ही कम मात्रा को धूम्रपान के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए। क्‍योंकि अधिक मात्रा में इसका उपयोग करने पर यह नुकसानदायक हो सकता है।
धतूरे के बीज दिल के लिए फायदेमंद
शरीर और मन को शांत करने के लिए धतूरा के फायदे जाने जाते हैं। शरीर और मन को शांत करके, यह हृदय प्रणाली को भी आराम दे सकता है। धतूरे के बीज के फायदे दिल के लिए भी होते हैं। यह हृदय प्रणाली को भी आराम दिलाने में सहायक होते हैं। धतूरा उन लोगों के लिए अधिक फायदेमंद होता है जो दिल की अनियंत्रित धड़कन से ग्रसित हैं। जिन लोगों की हृदय गति अचानक तेज या धीमी हो जाती है उनके लिए यह एक प्रभावी औषधी माना जाता है। इसका सेवन करने से रक्तचाप को कम करने (reducing blood pressure) में और एथेरोस्‍क्‍लेरोसिस (atherosclerosis), दिल के दौरे और स्‍ट्रोक (heart attacks, and strokes) की संभावना को भी कम करने में मदद मिलती है। इस तरह से हृदय रोगियों के लिए धतूरा फायदेमंद होता है। लेकिन फिर भी इसका अधिक मात्रा में सेवन करने से बचना चाहिए।
 गठिया दूर-
धतूरा के पंचांग का रस निकालकर उसको तिल के तेल में पकायें, जब तेल शेष रह जाये तो इस तेल को मालिश करके ऊपर धतूरा के के पत्‍ते बांध देने से गठिया दूर होता है।
बालों के लिए
यदि आप बाल झड़ने से परेशान हैं तो धतूरा के बीज का तेल उपयोग कर सकते हैं। यदि आपके पास धतूरे का तेल उपलब्‍ध नहीं है तो सबसे अच्‍छा है कि आप धतूरे के बीजों को पीस कर पाउडर बना लें। फिर इस पाउडर को पानी के साथ मिलाकर एक पेस्‍ट तैयार करें और अपने सिर पर लगाएं। इस मिश्रण को बालों में लगाने से यह बालों के स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देता है और नए बालों को उगने में मदद करता है। लेकिन आपको सलाह दी जाती है कि यदि आप बालों के लिए धतूरा उपयोग करना चाहते हैं तो इसका सेवन न करें बल्कि इसके बीजों को पीसकर अपने बालों में लगाएं।
बुखार कम करे
आयुर्वेद में बुखार के लक्षणों को कम करने के लिए धतूरा के फल का उपयोग किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि धतूरा के औषधीय गुण बुखार के लक्षणों को कम कर सकते हैं। परंपरागत रूप से यह मलेरिया के प्रभाव को कम करने में उपयोग किया जाता है। मलेरिया का उपचार करने के लिए आप धतूरे के फल को आग में जलाएं और इसके बाद इसकी बहुत ही कम मात्रा का सेवन करें। चूंकि धतूरा एक विषैला फल है इसलिए इसका सेवन करने से पहले किसी अनुभवी व्‍यक्ति या आयुर्वेद जानकार से सलाह लेकर ही इसका सेवन करें।
कान का दर्द 
कान के दर्द को दूर करने के लिए सरसो के तेल और गंधक के साथ थोड़े से धतूरे के पत्ते का रस मिलाये फिर इसे धीमी आंच पर पकाले और कान में दो बुँदे डाले।
प्रजनन क्षमता बढ़ाएं धतूरा के बीज-
प्रजनन क्षमता को बढ़ाने के लिए पारंपरिक रूप से धतूरा के बीजों का उपयोग प्राचीन समय से किया जा रहा है। पारंपरिक चिकित्‍सा में धतूरा के सबसे लोकप्रिय उपयोगों में से एक यौन ऊर्जा, कामेच्‍छा और प्रजनन क्षमता को बढ़ावा देना है। हालांकि इसके वैज्ञानिक सबूत नहीं हैं। लेकिन ऐसा माना जाता है कि धतूरा का उपयोग धूम्रपान के रूप में करने से यह प्रजनन क्षमता को बढ़ा सकता है। इसके अलावा धतूरा के बीजों को दूध या पानी के साथ सेवन करने प्रजनन आंगों में रक्‍त संचार को भी बढ़ाया जा सकता है। जिससे यौन शक्ति में वृद्धि होती है। यदि आप भी अपनी यौन क्षमता को बढ़ाना चाहते हैं तो धतूरा का उपयोग कर सकते हैं। लेकिन आपको सलाह दी जाती है किसी अनुभवी व्‍यक्ति या आयुर्वेदिक सलाहकार से परामर्श लेकर ही इसका उपयोग करें।
अनिद्रा का इलाज
जो लोग अनिद्रा की समस्‍या से परेशान हैं वे धतूरा के लाभ प्राप्‍त कर सकते हैं। धतूरा में मौजूद शामक गुण (sedative qualities of datura) अच्‍छी नींद लेने में सहायक होते हैं। इसके अलावा यह हमारी आंतरिक नसों को आराम दिलाने, हार्मोनल रिलीज को प्रेरित करने, सूजन और दर्द को कम करने में भी सहायक होते हैं। धतूरा प्रभावी रूप से अनिद्रा या अन्य नींद की गड़बड़ी से पीड़ित लोगों के लिए आरामदायक नींद दे सकता है। यदि आपको भी पर्याप्‍त नींद लेने में परेशानी हो रही है तो आप भी धतूरा का सेवन कर लाभ प्राप्‍त कर सकते हैं।
गर्भावस्‍था के लिए
गर्भावस्‍था या गर्भवती महिला के लिए भी धतूरा के फायदे होते हैं। यदि आप एक विशेष रूप से दर्दनाक गर्भावस्था या प्रसव से पीड़ित हैं, तो एक सामयिक तरीके से धतूरा का उपयोग बहुत उपयोगी हो सकता है। विशेष रूप से यह प्रसव पीड़ा को कम करने में मदद कर सकता है। इस दौरान सामयिक तरीके से धतूरा का उपयोग बहुत ही उपयोगी होता है। प्रसव के बाद जब बच्‍चा मां के शरीर पर सीधे तौर पर निर्भर नहीं होता है तब इस फल का बहुत ही कम मात्रा में सेवन किया जाना चाहिए। इसके अलावा इस दौरान दर्द और मानसिक तनाव से राहत पाने के लिए धतूरा के फल का धुंआ भी लिया जा सकता है।
प्रतिरक्षा शक्ति बढ़ाने मे-
आप अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ानें के लिए धतूरे का इस्‍तेमाल कर सकते हैं। धतूरा में एस्‍कॉर्बिक एसिड (ascorbic acid) की अच्‍छी मात्रा होती है। इसके अलावा इनमें एंटीऑक्‍सीडेंट (antioxidants) भी उच्‍च मात्रा में होते हैं जिसके कारण यह रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाने में सहायक होते हैं। इसमें मौजूद औषधीय गुण और घटक रक्‍त की श्‍वेत रक्‍त कोशिकाओं के उत्‍पादन को उत्‍तेजित करता है और शरीर के विभिन्‍न प्रणालियों में मौजूद मुक्‍त कणों को बेअसर करते है। जिससे संक्रमण से लड़ने की शक्ति को बढ़या जा सकता है। इस प्रकार धतूरा का सेवन करने से आप अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सकते हैं।
गर्भधारण करने में मदद-
जिन औरतो को गर्भधारण करने में दिक्कत आती है वो धतूरे के फल का 2.5 ग्राम चूर्ण लेकर उसमें आधा चम्‍मच गाय का दूध मिला कर रोज शहद के साथ चाटना चाहिए इससे जल्द गर्भधारण करने में मदद मिलेगी।
अन्य लाभ
धतूरा फल और इसके बीज के अन्‍य स्‍वास्‍थ्‍य लाभ इस प्रकार हैं –
आयुर्वेद में धतूरा के बीजों का उपयोग अस्‍थमा और हड्डियों को स्‍वस्‍थ रखने के लिए किया जाता है।
गठिया की ऐंठन और दर्द के लिए भी धतूरा के बीजों का उपयोग लाभकारी होता है।
धतूरे के बीजों और पत्तियों का उपयोग एंटीमेटिक, एंटीस्‍पास्‍मोडिक, हिप्नोटिक और मादक के रूप में भी किया जाता है।
त्‍वचा के ऊपरी हिस्‍सों में मौजूद फोड़े और फुंसीयों के उपचार के लिए धतूरा के बीजों का इस्‍तेमाल उपयोगी होता है।

कफ निकालने के आयुर्वेदिक घरेलू उपाय



कफ निकालने के घरेलू उपाय जुकाम और अन्‍य ऊपरी श्वसन संक्रमण के लक्षणों को कम कर सकते हैं। कफ का आना कोई गंभीर स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या नहीं है लेकिन कफ बनने का कारण लोगों की असुविधा का कारण बन सकता है। लेकिन यदि समय पर कफ का इलाज या कफ निकालने के लिए घरेलू उपाय समय पर न लिए जाएं तो गंभीर स्थिति बन सकती है। कफ (बलगम) निकालने के उपाय अपनाकर आप ब्रोन्कियल नलियों को अवरूद्ध होने और जलन को रोक सकते हैं। कफ निकालने के घरेलू उपाय आमतौर पर गले की सफाई, लगातार खांसी, नाक से पानी आना, सांस लेने में दिक्‍कत और शारीरिक कमजोरी आदि को दूर कर सकते है।
कफ एक मोटा और चिपचिपा पदार्थ होता है जिसे बलगम भी कहा जाता है। कफ अक्‍सर बीमार होने या जुकाम होने के दौरान गले में जमा हो जाता है। संक्रमण और प्रतिरक्षा शक्ति में कमी कफ बनने का कारण हो सकता है। हालांकि कफ या बलगम झिल्‍ली आपके श्वसंन तंत्र की रक्षा करने और स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ाने में सहायक होते हैं। मानव शरीर में कफ मुंह, नाक, गला, साइनस और फेफड़ों आदि में मुख्‍य रूप से होता है। कफ चिपचिपा होता है ताकि यह धूल एलर्जी और वायरस आदि को बीच में ही रोक ले। सामान्‍य रूप से कफ पतला होता है लेकिन यदि कफ अधिक गाढ़ा है तो यह जांच कराने योग्‍य है।
छाती में कफ जमने का कारण
बीमार होने के दौरान सीने में सूजन और जकड़न का अनुभव होता है। ऐसा छाती में कफ जमने का कारण होता है। छाती में कफ जमना और इसके अन्‍य लक्षणों में घरघराहट, नींद लेने में कठिनाई, गले में खराश आदि हैं। कफ का निकलना भी अक्‍सर खांसी के साथ होता है। हालांकि छाती में कफ जमना सामान्‍य है लेकिन कुछ स्थितियों में अधिक मात्रा में कफ का जमाव चिंता का कारण बन सकता है। छाती में कफ जमने के कारणों में शामिल हैं :
एसिड रिफ्लेक्‍स (acid reflux)
एलर्जी (allergies)
दमा (asthma)
बैक्‍टीरियल और वायरल संक्रमण (bacterial and viral infections)
क्रोनिक ब्रोंकाइटिस (chronic bronchitis)
क्रोनिक ऑब्‍सट्रक्टिव पल्‍मोनरी डिसीज (COPD)
सिस्टिक फाइब्रोसिस (cystic fibrosis)
कफ निकालने के घरेलू उपाय
कफ या बलगम अक्‍सर खांसी के साथ आता है। आप छाती और गले में जमा कफ निकालने के घरेलू उपाय से इस समस्‍या को दूर कर सकते हैं। खांसी और बलगम आने का प्रमुख कारण वायरस या संक्रमण होता है। हालांकि यह कुछ दिनों में सामान्‍य रूप से ठीक हो जाता है। हालांकि आप इसके इलाज के लिए अपने डॉक्‍टर से संपर्क कर सकते हैं। सामान्‍य रूप से डॉक्‍टर कफ का कोई इलाज नहीं कर सकते हैं। कफ का इलाज करने के लिए आप घरेलू उपाय अपना सकते हैं। 
शहद और नीबू का इस्तमाल करें
एक कप गर्म पानी लेकर उसमें एक चम्मच शहद और 2 चम्मच नीबू का रस मिलाकर इस मिश्रण को गर्म – गर्म पिएँ इससे आपका गला साफ़ होगा और नया बलगम बनाना बंद होगा |
गर्म पानी से स्नान
श्वसन तंत्र में ऊपरी संक्रमण को दूर करने के लिए आप भाप और गर्म शॉवर का उपयोग कर सकते हैं। भाप लेना बलगम का इलाज कर सकता है। कफ और खांसी के घरेलू उपचार के लिए भी भाप लेना सबसे अच्‍छा तरीका होता है। ऐसा करने पर आप अपने श्वसन तंत्र को शुष्‍क होने से बचा सकते हैं। इसके अलावा स्‍टीम शॉवर लेने से छाती में जमा बलगम को निकालने में भी मदद मिलती है। इसके लिए आप कम से कम 5 मिनिट तक भाप लें या गर्म शॉवर का उपयोग करें। आप अपनी स्थिति और आवश्‍यकता के अनुसार दोहरा भी सकते हैं। ऐसा करने से आपको कफ संबंधी समस्‍याओं से राहत मिल सकती है।
मेन्थॉल अथवा युकलिप्टुस की बूदों को लें
यह बूदें आपके गले में जमे बलगम को ढीला करने में बहुत उपयोगी है | इनमे से किसी कि भी दो बूंदे दिन में तीन बार अपने मुंह में डालें |
बच्‍चों का कफ निकालने के उपाय विटामिन C
सर्दी, खांसी और कफ जैसी समस्‍याएं बच्‍चों को सबसे अधिक होती हैं। लेकिन यह समस्‍याएं किसी भी उम्र में किसी भी व्‍यक्ति को हो सकती हैं। ऐसा मुख्‍य रूप से कमजोर प्रतिरक्षा शक्ति के कारण होता है। लेकिन यदि आप स्‍वयं और अपने बच्‍चों को पर्याप्‍त मात्रा में विटामिन सी का सेवन कराते हैं तो इस समस्‍या से बचा जा सकता है। विटामिन सी एक एंटीऑक्‍सीडेंट है जो फ्री रेडिकल्‍स के प्रभाव को कम करने और वायरल संक्रमण से लड़ने में सहायक होता है। विटामिन सी का पर्याप्‍त सेवन आपकी प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। कफ निकालने के उपाय में आप संतरे या नारंगी का सेवन कर सकते हैं। इसके लिए नियमित रूप से प्रतिदिन 2 से 3 गिलास संतरे का जूस पीने पर आपको कफ और सर्दी के लक्षणों को दूर करने में मदद मिल सकती है।
अदरक की चाय
अदरक में एंटीऑक्‍सीडेंट और एंटी-इंफ्लामेटरी गुण होते हैं। जिसके कारण नियमित रूप से अदरक की चाय का सेवन करने पर यह प्रतिरक्षा को मजबूत करने के साथ ही मौजूद संक्रमण और विषाणुओं के प्रभाव को कम करने में सहायक होता है। अदरक की चाय का सेवन करना आपके शरीर को हाइड्रेट रखने और गले की सूजन को दूर करने में मदद कर सकता है। आप कफ नाशक के रूप में अदरक की चाय का उपयोग कर सकते हैं।
नमक का पानी
यदि आप अधिक मात्रा में कफ निकलने जैसी समस्‍या से परेशान हैं तो नमक के पानी का उपयोग करें। नमक का पानी कफ निकालने का तरीका है जो बहुत ही प्रभावी है। इसके लिए आप गर्म पानी में नमक को मिलाएं और गरारे करें। ऐसा करने से कफ आसानी से निकल सकता है। इसके अलावा गले में होने वाले दर्द और सूजन संबंधी समस्‍याओं को दूर करने में भी नमक का पानी बहुत ही प्रभावी होता है। नमक में मौजूद गुण और एंटीऑक्‍सीडेंअ बैक्‍टीरिया को नष्‍ट करने में मदद करते हैं जो आपके गले के संक्रमण का प्रमुख कारण होते हैं। बलगम का इलाज करने के लिए आप 1 गिलास गुनगुने पानी में ½ चम्‍मच नमक घोलें और इस पानी से गरारे करें। आप इस उपाय को दिन में अपनी सुविधा के अनुसार कई बार कर सकते हैं।
लौंग की चाय
अध्‍ययनों से पता चलता है कि थाइम और लौंग (thyme and clove) दोनो में रोगाणुरोधी गुण होते हैं। इन दोनों औषधीयों के तेल टिंचर्स के रूप में काम करते हैं जो ऊपरी श्वसन संक्रमण को रोकने में प्रभावी होते हैं। कफ का इलाज करने के लिए आप उबलते पानी में अजवाइन फूल और लौंग की पत्तियां या लौंग को मिलाएं और 10 मिनिट तक पकाएं। इसके बाद इस पेय पदार्थ को ठंडा होने दें और फिर इसका सेवन करें। दिन में 1-2 कप लौंग की चाय पीने से कफ की मात्रा को कम किया जा सकता है।
.लहसुन खाने की आदत डालें
लहसुन भी अदरक की तरह बलगम में बहुत ही लाभदायक होता है | यह प्रकृति का बहुत ही शक्तिशाली उत्पाद है यह बलगम के जीवाणुओं को बहुत ही प्रभाशाली ढंग से ख़त्म करता है | इसका प्रयोग अगर आप कच्चा करेंगे तो ज्यादा असरदायक होता है | इसकी कलियों का सेवन रोजाना सुबह उठाकर खाली पेट रोजाना लें जिससे यह बलगम के बहने से पहले ही ख़त्म कर देगा 
हाइड्रेट रहें
किसी भी प्रकार की स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍या या संक्रमण से ग्रसित होने की स्थिति में हाइड्रेट रहना बहुत ही फायदेमंद होता है। यदि आप सर्दी से या कफ जैसी समस्‍या से परेशान हैं तब शरीर में पानी की कमी होना आम है। लेकिन यह पानी की कमी आपके शरीर को अन्‍य नुकसान भी पहुंचा सकता है। ऐसी स्थिति में आप अपने शरीर में पानी की कमी को पूरा करने के लिए नियमित रूप से पानी पीना, स्‍वास्‍थ्‍य वर्धक पेय पदार्थों और अन्‍य जड़ी बूटी युक्‍त चाय या तरल पदार्थ का सेवन कर सकते हैं। ऐसा करने से आपके गले की सूजन और चिड़चिड़ाहट आदि को रोका जा सकता है। साथ ही औषधीय जड़ी बूटी युक्‍त चाय का सेवन आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली को भी मजबूत करने में सहायक होता है।
नींबू का रस
कफ के जमा होने से जकड़न, जलन, सूजन और दर्द जैसी समस्‍याएं हो सकती हैं। लेकिन गले में बलगम का इलाज नींबू के रस से किया जा सकता है। नींबू का रस गले में जमा बलगम को ढ़ीला और कमजोर करने में सहायक होता है। जिससे कफ को आसानी से बाहर किया जा सकता है। इसके अलावा नींबू के रस में विटामिन सी होता है जो जीवाणुरोधी है।
बलगम का इलाज करने के लिए आप 1 गिलास गर्म पानी में 2 चम्‍मच नींबू का रस और 1 बड़ा चम्‍मच शहद मिलाएं। इस मिश्रण का सेवन दिन में कम से कम 2-3 बार करें। ऐसा करने पर कफ उत्‍पादन को कम किया जा सकता है। इसके अलावा विकल्‍प के रूप में आप नींबू के टुकड़े में काली मिर्च पाउडर और नमक को छिड़कें और फिर नींबू को चूसें। ऐसा करने से कफ आसानी से आपके गले से बाहर निकल सकता है।
हल्‍दी
हल्‍दी में एंटीसेप्टिक गुण होते हैं जो बलगम के उत्‍पादन करने वाले बैक्‍टीरिया को नष्‍ट करने में सहायक होते हैं। इसके अलावा हल्‍दी का नियमित सेवन हमारी प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। कफ दूर करने के घरेलू उपाय में आप हल्‍दी का इस्‍तेमाल कर सकते हैं।
1 गिलास गर्म दूध में 1 चम्‍मच हल्‍दी पाउडर मिलाएं। इस मिश्रण को रात में सोने से पहले और सुबह के समय खाली पेट सेवन करें। इसके अलावा आप दिन में 2-3 बार 1 गिलास गर्म पानी में 1 चम्‍मच हल्‍दी पाउडर को घोल कर सेवन करें। यह भी आपको कफ दूर करने में मदद कर सकता है।
लाल मिर्च
लाल मिर्च नाक, गले और छाती में जमा होने वाले कफ को आसानी से दूर करने में मदद करती है। ऐसा इसलिए है क्‍योंकि लाल मिर्च की तासीर गर्म होती है इसके अलावा अपनी उत्‍तेजक प्रकृति के कारण यह सीने में दर्द को कम करने में भी सहायक होती है।
सर्दी या बलगम के लक्षणों को कम करने के लिए आप 1 चौथाई लाल मिर्च पाउडर, ¼ अदरक का पेस्‍ट, 1 चम्मच शहद और 2 बड़े चम्‍मच सेब के सिरका को मिलाकर सेवन करें। इस मिश्रण का सेवन करने से कफ के उत्‍पादन को कम करने में मदद करता है।
चिकन सूप
गर्म चिकन सूप भी कफ का इलाज करने में मदद कर सकता है। गर्म चिकन सूप आपके वायुमार्ग को मॉइस्‍चराइज करने में मदद करता है और कफ की स्थिरता को पतला करेगा। साथ ही यह गले की सूजन और दर्द को भी प्रभावी रूप से दूर करने में मदद कर सकता है। आप अपने गले से कफ को दूर करने के लिए कम से कम दिन में 2 से 3 बार चिकन सूप का सेवन करें। चिकन सूप को अधिक प्रभावी बनाने के लिए आप इसमें लहसुन औरी अदरक को भी शामिल कर सकते हैं।
जमा कफ निकाले शहद
शहद में एंटीवायरल, जीवाणुरोधी और एंटीफंगल गुण होते हैं जो कफ के कारण गले के दर्द, सूजन और अन्‍य समस्‍याओं को दूर करने में प्रभावी होते हैं। शहद कफ निकालने का सबसे अच्‍छा घरेलू उपाय है साथ ही प्रतिरक्षा शक्ति को बढ़ाने में सहायक होता है। कफ का इलाज करने के लिए आपको शहद का नियमित सेवन करना चाहिए।
1 चम्‍मच शहद में 1 चुटकी कालीमिर्च पाउडर मिलाएं। काली मिर्च गले के संक्रमण को दूर करने में मदद करती है। जबकि शहद श्‍लेष्‍म झिल्‍ली को शांत करता है। नियमित रूप से 1 सप्‍ताह तक दिन में दो बार इस मिश्रण का सेवन करने पर यह कफ को प्रभावी रूप से कम कर सकता है।
प्‍याज का रस
प्‍याज में एंटीबायोटिक और एंटी-इंफ्लामेटरी गुण होते हैं। जिसके कारण गले के संक्रमण को दूर करने में प्‍याज का रस प्रभावी होता है। इसके अलावा प्‍याज में मौजूद अन्‍य घटक प्रतिरक्षा प्रणाली को भी स्‍वस्‍थ रखने में सहायक होते हैं। आप कफ निकालने के लिए प्‍याज के रस का उपयोग कर सकते हैं।
इसके लिए आप मध्‍ययम आकार की प्‍याज लें और इसे अच्‍छी तरह से धो कर साफ कर लें। फिर इस प्‍याज को बारीक काट लें। बारीक कटी हुई 2 चम्‍मच प्‍याज लें और इसमें 2 चम्‍मच चीनी मिला कर कुछ देर के लिए रख दें। ऐसा करने पर प्‍याज और चीनी के मिश्रण से एक तरल पदार्थ प्राप्त होता है। इस तरल पदार्थ की 1 चम्‍मच मात्रा हर 2 से 3 घंटे के बाद सेवन करें। आप इस मिश्रण 2 से 3 दिनों के लिए फ्रिज में स्‍टोर करके भी रख सकते हैं।
गाजर
कफ और इससे संबंधित अन्‍य समस्‍याओं को दूर करने में गाजर बहुत ही प्रभावी औषधी मानी जाती है। गाजर विटामिन सी का सबसे अच्‍छा स्रोत है। विटामिन सी एंटीऑक्‍सीडेंट का काम करता है जो हमारी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करता है। इसके अलावा गाजर में मौजूद अन्‍य पोषक तत्‍व और विटामिन भी कफ के लक्षणों को कम करने में सहायक होते हैं।
कफ संबंधी समस्‍या को दूर करने के लिए आप 4 से 5 ताजा गाजर का रस निकालें। यदि रस कुछ गाढ़ा हो तो इसे पतला करने के लिए कुछ पानी मिलाएं और 2 चम्‍मच शहद शामिल करें। आप अपने गले और छाती में जमा कफ को निकालने के लिए इस जूस की थोड़ी-थोड़ी मात्रा दिन भर पिएं। यह कफ निकालने का सबसे अच्‍छा उपाय है

पीलिया और अन्य लिवर विकारों से छुटकारा// Get rid of jaundice and other liver disorders


पीलिया यकृत की विकृति अर्थात यकृत के रोगग्रस्त होने के कारण होने वाला रोग है | यकृत के रोग ग्रस्त होने के बाद सबसे पहले लक्षण के रूप में पीलिया (Jaundice) ही प्रकट होता है | इसमें रोगी के त्वचा, नाखूनों, आँखों, एवं मूत्र में पीले रंग की अधिकता हो जाती है | इसका मुख्य कारण रक्त में पित रस की अधिकता (Bile Juice) होना होता है | वैसे दिखने में यह बहुत ही साधारण सा रोग प्रतीत होता है , लेकिन अगर सही समय पर उपचार एवं उचित आहार न लिए जाएँ तो पीलिया जानलेवा रोग बन जाता है |
पीलिया और अन्य लिवर विकारों से छुटकारा पाने के लिए आयुर्वेदिक उपचार की मदद ली जा सकती है। पीलिया एक बहुत ही आम यकृत विकार है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें बहुत अधिक बिलीरुबिन रक्त में घूल जाता है। (बिलीरुबिन लाल रक्त कोशिकाओं से हीमोग्लोबिन के टूटने से उत्पन्न एक यौगिक है)। पीलिया एक शब्द है जिसका उपयोग त्वचा, श्लेष्मा झिल्ली और आंखों का पीला रंग, रक्त में सीरम बिलीरुबिन की अपर्याप्त समाशोधन और बढ़ी हुई मात्रा के कारण होता है।
पीलिया के लक्षण
पीलिया होने पर निम्नलिखित लक्षण प्रकट होते है |
रोगी की त्वचा, नाख़ून एवं आँखों में पीलापन आने लगता है |
भूख कम लगने लगती है |
चक्कर आना, जी मचलाना एवं उलटी होना |
पेट दर्द होना |
सिरदर्द होना |
पेशाब में पीलापन |
शरीर कमजोर हो जाता है |
रोगी को कब्ज एवं अरुचि जैसी समस्याएँ भी होने लगती है |
अधिकतर शाम के समय रोगी को तीव्र बुखार आती है |

मूली के पत्ते
मूली के कुछ पत्ते लें और एक छलनी की मदद से इसका रस निकालें। लगभग आधा लीटर रस प्रतिदिन पीने से लगभग दस दिनों में रोगी को पीलिया रोग से छुटकारा मिल जाता है।
पपीता के पत्ते
एक चम्मच पपीते के पत्तों के पेस्ट में एक चम्मच शहद मिलाएं। इसे नियमित रूप से लगभग एक या दो सप्ताह तक खाएं। यह पीलिया के लिए एक बहुत प्रभावी घरेलू इलाज है।
गन्ना
गन्ना उचित पाचन और उचित यकृत के कार्य में मदद करता है, जिससे रोगी को पीलिया ( Jaundice) से जल्दी ठीक होने में मदद मिलती है। एक गिलास गन्ने का रस लें और इसमें थोड़ा सा नींबू का रस मिलाएं। बेहतर परिणाम के लिए इस रस को रोजाना दो बार पियें। गन्ने से रस निकालने से पहले गन्ने को अच्छी तरह साफ करना सुनिश्चित करें।
तुलसी के पत्ते
लगभग 10-15 तुलसी के पत्ते लें और इसका पेस्ट बना लें। इसमें आधा गिलास ताजा तैयार मूली का रस मिलाएं। बेहतर परिणाम के लिए लगभग दो से तीन सप्ताह तक इस जूस को रोजाना पिएं।
आंवला
आंवला विटामिन सी का एक अच्छा स्रोत है और Jaundice (पीलिया) के लक्षणों को कम करने में बहुत उपयोगी है।
पीलिया का इलाज जौ
जौ का पानी बनाने के लिए जो को लगभग तीन लीटर पानी में उबालें और इसे लगभग तीन घंटे तक उबालने दें। Jaundice (पीलिया) से जल्दी ठीक होने के लिए इस पानी को दिन भर में जितनी बार पी सकें पीयें।
टमाटर का रस
एक गिलास टमाटर का रस, एक चुटकी नमक और काली मिर्च के साथ मिलाकर सुबह खाली पेट पीना पीलिया के लिए बहुत प्रभावी घरेलू उपाय है।
एलो वेरा के पत्ते
भारतीय एलोवेरा की पत्तियों का गूदा लें और इसे काले नमक और अदरक के साथ मिलाएं। इसे रोज सुबह लगभग दस दिनों तक लें।
चुकंदर और नींबू का रस
एक कप चुकंदर का रस लें और इसमें नींबू का रस बराबर मात्रा में मिलाएं और प्रभावी परिणाम के लिए कुछ दिनों तक नियमित रूप से इसका सेवन करें।
चिकोरी प्लांट
जड़ी बूटी (फल, पत्ते, फूल, बीज और जड़) का एक रस बनाएं। इस रस का एक चम्मच दिन में कई बार लें। इसका प्रयोग कम से कम 15 दिन करें। जिगर की समस्याओं को ठीक करने में पौधे के सभी भाग उपयोगी होते हैं। फूल, बीज और जड़ें उपयोग किए जाने वाले अधिक सामान्य भाग हैं। शिमला मिर्च का रस तिल्ली के बढ़ने, जिगर की सुस्ती का इलाज करने में मदद करता है और यह पित्त के स्वस्थ स्राव को भी बढ़ावा देता है।
पीलिया को जड़ से ख़त्म करे छाछ
पर्याप्त मात्रा में छाछ लें, उसमें भुनी हुई फिटकरी (roasted alum) और थोड़ी सी काली मिर्च मिलाएं। इन्हें अच्छे से मिलाएं। बेहतर परिणाम के लिए दिन में कम से कम तीन बार पियें।
बादाम
बादाम की 8 , दो खजूर और पांच इलायची लें और उन्हें पानी में भिगो दें। इसे रात भर छोड़ दें। सुबह में, छिलके को हटा दें और इसका पेस्ट बनाएं। थोड़ी चीनी और मक्खन मिलाएं। इस मिश्रण को दिन में कई बार लें।
हल्दी
एक गिलास गर्म पानी लें और इसमें एक चुटकी हल्दी मिलाएं। अच्छी तरह से मिलाएं और दिन में तीन या चार बार पिएं।
लौकी के पत्ते
लगभग 7-10 पत्ते लें और इसे एक कप पानी में उबालें और इसे ठंडा होने दें। 10-15 धनिया के बीज लें और इसे आधा लीटर पानी में उबालें। इसे पहले से तैयार काढ़े के साथ मिलाएं। पीलिया के प्रभावी इलाज के लिए दिन में कम से कम तीन बार पियें।
पीलिया का रामबाण इलाज केला
पके केले को मसल लें और थोड़ा शहद मिलाएं और इसे दिन में कम से कम दो बार पीलिया के प्रबंधन में बेहतर परिणाम के लिए लें।
गाजर का रस
ताजा गाजर का रस जूसर की मदद से या क्रशिंग और एक्सट्रैक्टिंग विधि से बनाएं। Jaundice (पीलिया) के प्रभावी इलाज के लिए इस रस को दिन में कई बार पिएं। इसे रोगी के आहार में भी शामिल किया जा सकता है।
बेल के पत्ते
सूखे बेल के पत्ते लें और पीसकर पाउडर बना लें। इसे एक गिलास पानी में मिलाएं। पीलिया के प्रभावी इलाज के लिए इसे दिन में एक बार पियें।
नींबू
नींबू में उपलब्ध एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण पीलिया (jaundice) के इलाज में मदद करता है। यह पित्त नलिकाओं को भी अनब्लॉक करता है, जिससे यह पीलिया के लिए सबसे प्रभावी घरेलू उपाय बन जाता है। 2 नींबू का रस निचोड़ें और इसे एक गिलास पानी में मिलाएं। दिन में तीन बार इस थोड़ा-थोड़ा पीयें, क्योंकि यह जिगर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाता है।
मटर के पत्ते
मटर के पत्तों के रस को कुचलकर रस निकाल लें और पीलिया के इलाज के लिए इस रस का कम से कम 60 मिली प्रतिदिन सेवन करें। इनमें से फलियां भी बहुत पौष्टिक होती हैं और इन्हें आहार में जोड़ा जा सकता है।
पीलिया रोगी का आहार

दवाइयों से ज्यादा आहार की व्यवस्था इस रोग में आराम पहुंचती है | हमेशां रोगी के लिए क्या खाना है और क्या नहीं खाना की एक लिस्ट होनी चाहिए उसी के अनुसार रोगी को आहार देना चाहिए | बहुत से भोजन एसे है जो रोग को कम करने की बजाय और अधिक बढ़ा देतें है | इस रोग में निम्न आहार को अपनाना लाभदायक होता है |
इस रोग में गन्ने का रस लेना सर्वोतम सिद्ध होता है | हमेशां साफ़ एवं स्वच्छ गन्ने का रस सेवन करे , इससे जल्द ही पीलिया कम होने लगता है |
प्रात: के समय गन्ने के रस के साथ नारंगी का जूस भी सेवन करना फायदेमंद होता है |
संतरे का सेवन करे | संतरे का जूस निकाल कर भी सेवन कर सकते है |
पीलिया रोग में कच्चे नारियल का पानी पीना बहुत लाभकारी होता है | नित्य सुबह एवं शाम नारियल के पानी का सेवन करे |
अनार का रस लिया जा सकता है |
डाभ एवं जौ के पानी से भी पीलिया उतरने लगता है |
मूली के साफ़ सुथरे पतों को लेकर इनका जूस निकाल ले | इसका सेवन प्रात: काल के समय करना चाहिए |
दही में पानी मिलाकर इसकी छाछ बना ले एवं सेवन करे |
रात के समय एक गिलास पानी में मुन्नका को भिगों दे | सुबह मुन्नका के बीज निकाल कर इन्हें खालें और ऊपर से बच्चा हुआ पानी पीलें |
अनार , संतरा, अंगूर आदि फलों का सेवन इस रोग में लाभकारी होता है |
पपीता का सेवन करें |
मौसमी, पपीता, चीकू, अनार, संतरा आदि फलों का या इनके रस का सेवन करना चाहिए |
हमेशां पौष्टिक एवं सुपाच्य भोजन लें |
उष्ण, तीक्षण और अम्लीय पदार्थों का त्याग कर दें , अन्यथा रोग को गंभीर होते समय नहीं लगता |
शराब एवं अन्य प्रकार के नशे से दूर रहना ही अच्छा रहता है |

आसानी से पचने योग्य आहार को लेना चाहिए। आमतौर पर पहले 4 से 5 दिनों के लिए तरल आहार की सलाह दी जाती है।
मसाले और वसा के बिना उच्च कार्बोहाइड्रेट आहार लेने की सलाह दी जाती है।
हमेशा उबला हुआ पानी पियें। तरल पदार्थों का एक अच्छा सेवन मूत्र और मल के माध्यम से शरीर से अतिरिक्त बिलीरुबिन को हटाने में मदद करता है। सुनिश्चित करें कि आप साफ, बिना प्रदूषित पानी पीते हैं।
सब्जियों और फलों के रस को कच्चे या स्टीम्ड रूप में लिया जाना चाहिए, क्योंकि वे शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स के संतुलन को विनियमित करने में मदद करते हैं। डिब्बाबंद जूस से बचें।
लगभग एक सप्ताह तक फलों का रस रोगी के लिए बहुत प्रभावी है।
एक बार जब बिलीरुबिन का स्तर कम होने लगता है, तो हल्के खाद्य पदार्थ जैसे फल, दही और दलिया को आहार में जोड़ा जा सकता है। इस समय गाजर और पालक जैसी सब्जियों का भी सेवन कर सकते हैं। दुबले प्रोटीन की कुछ मात्रा जल्दी ठीक होने में मदद करेगी और इसलिए आप अंडे का सेवन भी कर सकते हैं। यह सलाह दी जाती है कि अपने भोजन को छोटे भागों में विभाजित करें और दिन में उन्हें बार बार खाएं।
जैसा कि बिलीरुबिन का स्तर लगभग सामान्य स्तर पर कम हो जाता है, आप अपने आहार में चावल, मछली या दाल जैसे खाद्य पदार्थ शामिल कर सकते हैं। सुनिश्चित करें कि खाद्य पदार्थों को पकाने के लिए किसी तेल का उपयोग नहीं किया गया है। मछली को उबला हुआ या स्टीम्ड हो तो खा सकते हैं। मांस या मुर्गी खाने से बचें क्योंकि इस समय इसे पचाना मुश्किल हो सकता है।
एक बार पीलिया के लक्षण कम हो गए हैं और रोगी को इसके लिए डॉक्टर की मंजूरी मिल गई है, तो जैतून के तेल में पकाए गए खाद्य पदार्थों का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन कोलेस्ट्रॉल से भरपूर खाद्य पदार्थ खाने से बचने की कोशिश करें और जो इस समय पचाने में मुश्किल होते हैं क्योंकि शरीर को अपने सामान्य कामकाज को फिर से हासिल करने के लिए समय की आवश्यकता होती है।
करेला और सहजन की फली (ड्रमस्टिक) पीलिया के रोगियों के लिए बहुत फायदेमंद हैं।
कैल्शियम और अन्य खनिजों जैसे आयरन और मैग्नीशियम से भरपूर खाद्य पदार्थों का सेवन बढ़ाएं।

स्तंभन दोष और हार्ट अटेक मे क्या है संबंध?



इरेक्टाइल डिसफंक्शन (स्तंभन दोष) एक ऐसी समस्या है जिसके कारण यौन क्रिया के दौरान पुरुषों के लिंग में कड़ापन नहीं आ पाता है। पिछले 10-15 सालों में पुरुषों में ये समस्या तेजी से बढ़ी है। हाल में हुई एक रिसर्च में पाया गया है कि इरेक्टाइल डिसफंक्शन के शिकार पुरुषों में हार्ट अटैक की संभावना बहुत ज्यादा होती है। इस रिसर्च के अनुसार इस समस्या के कारण पुरुषों में दिल की बीमारियों की संभावना 59% और स्ट्रोक का खतरा 34% बढ़ जाता है।
ये रिसर्च 150,000 लोगों के पर की गई है और इसे जर्नल ऑफ सेक्शुअल मेडिसन में छापी गई है। रिपोर्ट के अनुसार नपुंसकता के कारण पुरुषों को 50 साल की उम्र के बाद हार्ट अटैक की संभावना कई गुना अधिक बढ़ जाती है।
नपुंसकता हो सकती है हार्ट अटैक का पूर्व संकेत
 शोधकर्ता और Massachusetts’ Brigham and Women’s Hospital के कार्डियोलॉजिस्ट Dr. Ron Blankstein ने बताया, "पुरुषों में हार्ट अटैक के लक्षण दिखने के कई साल पहले ही उनमें नपुंसकता पैदा हो सकती है। कुछ मामलों में तो इरेक्टाइल डिसफंक्शन इस बात का संकेत हो सकता है कि व्यक्ति को कार्डियोवस्कुलर बीमारी होने वाली है।"
इरेक्टाइल डिस्फंक्शन पुरुषों के लिंग से जुड़ी समस्या है। इस बीमारी में पुरुष का लिंग सीमित समय तक ही उत्तेजित रह पाता है। सेक्स के दौरान ज्यादा देर तक लिंग की उत्तेजना न होना ह्रदय रोग भी उत्पन्न कर सकता है, क्योंकि इसका सीधा संबंध हमारे हृदय से है। इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या सीधे तौर पर हृदय की ओर इशारा करती है और जिन्हें हृदय रोग की समस्या पहले से ही है, अगर उन्हें यह रोग हो गया है तो बिना देरी किए इसका इलाज करवाना चाहिए।
क्यों जुड़े हैं दोनों रोग
इरेक्टाइल डिस्फंक्शन का सीधा कनेक्शन हमारे ह्रदय से रक्त प्रवाह के कारण है। खून की नसों में शिथिलता आ जाने के कारण रक्त प्रवाह में कमी आ जाती है जिससे ह्रदय का रक्त प्रवाह ठीक तरह से नहीं हो पाता है और लिंग में भी असामान्य रक्त प्रवाह की समस्या होती है।
इन लोगों को है अधिक खतरा
कुछ ऐसी बीमारियां हैं जिनसे अगर आप ग्रसित हैं और आपको इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या है तो आपके शरीर में हृदय रोग का खतरा कई गुना अधिक हो जाएगा।
डायबिटीज की समस्या
पहले से डायबिटीज की समस्या से पीड़ित रहना ह्रदय के लिए बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। डायबिटीज की समस्या रहने पर अगर इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या उत्पन्न होती है तो आप बहुत जल्दी हार्ट अटैक की समस्या का शिकार हो सकते हैं। डायबिटीज की समस्या होने पर हमारे शरीर का रक्त प्रवाह बहुत धीमा हो जाता है।
उच्च कोलेस्ट्रॉल
लो डेंसिटी प्रोटीन को ही बुरा कोलेस्ट्रोल माना जाता है और यह हमारे हृदय के लिए घातक होता है। इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या होना और शरीर में बुरे कोलेस्ट्रॉल की उच्च मात्रा होना, जल्द ही हार्ट अटैक का कारण बन सकता है। अगर हार्ट अटैक के समस्या से बचना चाहते हैं तो सबसे पहले कोलेस्ट्रॉल की मात्रा को कम करें।
उच्च रक्तचाप
 समय के साथ लंबे समय तक बने रहने वाला उच्च रक्तचाप धमनियों और नसों को नुकसान पहुंचाता है। इससे अर्थओस्कलेरोसिस होने का खतरा बढ़ जाता है।

धूम्रपान
संभोग के दौरान अगर लिंग ज्यादा समय तक उत्तेजित नहीं हो रह पा रहा है तो इसका एक मुख्य कारण धूम्रपान भी है। जो व्यक्ति बहुत अधिक धूम्रपान करते हैं उनका लिंग बहुत कम मिनट के लिए ही उत्तेजित रह पाता है और यह सीधा हमारे हृदय से जुड़ा हुआ है। धूम्रपान करने से हमारा फेफड़ा दूषित हो जाता है और शरीर के अंदर मौजूद ऑक्सीजन भी दूषित हो जाती है। जब यह ऑक्सीजन खून में मिलकर हृदय तक जाती है तब हार्ट अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
टेस्टोस्टेरोन का स्तर
अगर पुरुषों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन का स्तर कम है तो उन्हें हार्टअटैक की समस्या हो सकती है। कई शोधों से यह पता लगाया जा चुका है कि जिन पुरुषों के शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा सामान्य होती है उनका हृदय उन लोगों के हृदय से ज्यादा सुरक्षित रहता है जिनके शरीर में टेस्टोस्टेरोन की मात्रा कम होती है।
अनुवांशिक कारण
अगर आपके माता या पिता में से किसी एक को कम उम्र में ही हृदय रोग की समस्या थी तो यह आपमें भी हो सकती है। मौजूदा समय में भले आपका हृदय पूरी तरह से सुरक्षित हो लेकिन इरेक्टाइल डिस्फंक्शन की समस्या, आने वाले समय में ह्रदय रोग की समस्या उत्पन्न कर सकती है।
50% भारतीय पुरुषों को इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या
आउटलुक इंडिया पर छपी एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में 40 साल से बड़ी उम्र के 50% से ज्यादा पुरुष इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या का शिकार हैं। इस समस्या के कारण ही पुरुषों में हार्ट से जुड़ी बीमारियां (Heart Diseases), हाई ब्लड प्रेशर (Hypertension), धूम्रपान और शराब पीने की लत बढ़ रही है। मेडिकल साइंस में इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या का इलाज उपलब्ध है, मगर ज्यादातर भारतीय इस संबंध में डॉक्टर से या अन्य किसी से बात करने में संकोच करते हैं।
इरेक्टाइल डिसफंक्शन और दिल की बीमारी में क्या है संबंध?
Dr. Ron Blankstein के अनुसार पुरुषों में इरेक्टाइल डिसफंक्शन और हार्ट की बीमारियों के बीच गहरा संबंध है। पुरुषों के लिंग में जो धमनी रक्त प्रवाहित (ब्लड सर्कुलेट) करती है, वो बेहद महीन और पतली होती है। इसका व्यास (Diameter) बहुत कम होता है। यही वो सबसे छोटी Blood Vessels है, जो हार्ट की बीमारियों का पहला संकेत देती है। पुरुषों को इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या ही इस कारण होती है कि उनके लिंग में सही से ब्लड सर्कुलेशन नहीं हो पाता है।

सरल नुस्खे सेहत उपकार //homenaturecure.blogspot.com/ब्लॉग का साईट मेप -सभी आर्टिक्ल्स की लिंक्स