फटी एड़ियाँ फिर से भरने के कुछ खास उपाय

                                         
जैसे-जैसे सर्दी का मौसम अपने शबाब पर पहुंचता है, पैरों की खूबसूरती को बनाए रखना मुश्किल होता जाता है। पैरों की चमड़ी का सख्त हो जाना और एड़ियों का फटना जैसी समस्याएं इस मौसम में आम तौर पर उभरकर सामने आती हैं। इससे बचने के लिए कुछ बातों का ख्याल रखना आवश्यक है।
क्या है एड़ियां फटने की मुख्य वजह -
एड़ियां फटने की मुख्य वजह शरीर में कैल्शियम और चिकनाई की कमी होती है। एड़ी व तलवों की त्वचा मोटी होती है, इसलिए शरीर के अंदर बनने वाला सीबम यानी कुदरती तेल पैर के तलवों की बाहरी सतह तक नहीं पहुंच पाता। फिर पौष्टिक तत्व व चिकनाई न मिल पानेकी वजह से ही एड़ियां खुरदरी-सी हो जाती हैं और इनमें दरार पड़ने लगती है।
एड़िया ज्यादा फटने से दर्द और जलन तो होती ही है, कभी-कभी खून भी निकल आता है।
अक्सर अनियमित खानपान, विटामिन ई की कमी, कैल्शियम व आयरन की पर्याप्त मात्रा न मिल पाने के कारण एड़ियां फट जाती हैं|

ठंड में फटी एड़ियों से छुटकारा पाने के नुस्खे-
* डेढ़ चम्मच वैसलीन में एक छोटा चम्मच बोरिक पावडर डालकर अच्छी तरह मिला लें और इसे फटी एड़ियों पर अच्छी तरह से लगा लें, कुछ ही दिनों में फटी एड़ियां फिर से भरने लगेंगी।
* अगर एड़ियां ज्यादा फटी हुई हों तो मैथिलेटिड स्पिरिट में रुई के फाहे को भिगोकर फटी एड़ियों पर रखें। ऐसा दिन में तीन-चार बार करें, इससे एड़ियां ठीक होने लगेंगी।
* गुनगुने पानी में थोड़ा शैंपू, एक चम्मच सोड़ा और कुछ बूंदें डेटॉल की डालकर मिला लें। इस पानी में पैरों को 10 मिनट तक भिगोकर रखें। त्वचा फूलने पर मैथिलेटिड स्पिरिट लगाकर एड़ियों को प्यूमिक स्टोन या झांवे से रगड़कर साफ कर लें। इससे एड़ियों की मृत त्वचा साफ हो जाएगी। फिर साफ तौलिए से पोंछकर गुनगुने जैतून या नारियल के तेल से मालिश करें।
*पेट्रोलियम जैली का प्रयोग इसका सबसे आसान तरीका है। इसके लिए डेढ़ चम्मच वैसलीन में एक छोटा चम्मच बोरिक पावडर डालकर अच्छी तरह मिला लें और इसे रात को सोते समय फटी एड़ियों पर अच्छी तरह से लगा लें, ताकि रातभर यह असर कर पाए। कुछ ही दिनों में फटी एड़ियां फिर से भरने लगेंगी।
* अमचूर का तेल, फटी एड़ियों के इलाज के लिए रामबाण औषधी है। यह गाढ़ा होता है जिसे पिघलाकर आप रात में एड़ियों पर लगाएं और सुबह धो लें। कुछ ही दिनों में एड़ियां बिल्कुल चिकनी हो जाएंगी।
*नारियल का तेल
रात को सोने से पहले एक बड़ा चम्मच नारियल तेल लेकर उसे फटी हुई एड़ियों पर लगाइए. चाहें तो इसे हल्का गर्म भी कर सकती है. इसकी मसाज से थकान भी कम होगी. उसके बाद जुराबें पहनकर सो जाएं. सुबह उठकर पैरों पानी से धो लें. करीब 10 दिन तक इस उपाय को लगातार करने से एड़ियां मुलायम हो जाएंगी.
*शहद
शहद एक बहुत अच्छा मॉइश्चराइजर है, जो पैरों को हाइड्रेट रखने के साथ ही उनका पोषण भी करता है. पानी में आधा कप शहद मिलाकर उसमें कुछ देर तक पैर को डुबोकर रखे रहें. लगभग 20 मिनट बाद पैरों को बाहर निकालकर मुलायम तौलिए से हल्के हाथों से पोछ लें. आपके पैर कोमल हो जाएंगे.
* ऑलिव ऑयल
ऑलिव ऑयल के इस्तेमाल से भी एड़ियां कोमल और मुलायम होती हैं. हथेली पर तेल की कुछ मात्रा लेकर हल्के हाथों से मसाज करें. इसके बाद पैरों को आधे घंटे के लिए वैसे ही छोड़ दें. इस प्रक्रिया को हफ्ते में एक बार जरूर करें.
*ग्लिसरीन और गुलाब जल
ज्यादा फटी एड़ियों के लिए यह बेहतरीन उपाय है. दोनों ही चीजें एड़ियों को नमी देकर कोमल बनाती हैं. तीन-चौथाई मात्रा में गुलाब जल और एक-चौथाई मात्रा में ग्लिसरीन लेकर मिश्रण बनाएं और कुछ देर तक एड़ियों पर लगा रहने दें और उसके बाद गुनगुने पानी से उसे साफ कर लें. कुछ दिनों तक ऐसा करने के बाद आपको फर्क दिखना शुरू हो जाएगा.

किडनी फेल रोग की जानकारी और उपचार 

नसों के ब्लाकेज का अनुपम उपचार





नसों की ब्लॉकेज का इलाज : नसों में दर्द बहुत परेशान करने वाली समस्या है। इसके चलते इंसान
चलने फिरने में भी तकलीफ महसूस करता है। इसके अलावा जब रक्त में अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा
बढ़ जाती है तो इससे नसों में खून के स्राव में रुकावट आने लगती है। जिससे हार्ट अटैक और लकवा
का खतरा भी बढ़ जाता है।
अगर आप को भी एसी परेशानी है तो डॉक्टरी जांच जरुर करवानी चाहिए लेकिन इसके साथ-साथ आप
एक घरेलू उपाय अपनाकर नसों की ब्लॉकेज से छु़टकारा पा सकते है।
सामग्री
1 ग्राम दाल चीनी
10 ग्राम काली मिर्च साबुत
10 ग्राम तेज पत्ता
10 ग्राम मगज
10 ग्राम मिश्री
10 ग्राम अखरोट
10 ग्राम अलसी
विधि-
1. सबसे पहले इन सबको मिक्सी में बारीक पीस लें।
2. फिर इसकी 10 पुडियां बना लें।
3. इसे हर रोज सुबह खाली पेट खाएं और ध्यान रहें इसे खाने के बाद 1 घंटे तक कुछ न खाएं।

उबले आलू के स्वास्थ्य लाभ


                                             

आप जानते हैं की आलू हर सब्जी में इस्तेमाल होता है. और आलू के बिना कोई भी सब्जी काफी बेसवाद हो सकती है. आज हम इस पोस्ट में आपको उबला आलू खाने के कुछ ऐसे फायदे बताने वाले हैं जिन्हे जान कर आप हैरान रह जायेंगे. तो फिर चलिए जानते हैं इसके फायदे.
उबला हुआ आलू खाने से होते हैं ये फायदे
उबले हुए आलू में कार्बोहाइड्रेट होता है जो दुबले पतले लोगों को मोटा होने में फायदा देता है. अगर आप वजन बढ़ाना चाहते हैं तो उबले हुए आलू सुबह शाम खाएं.
उबले हुए आलू में मैग्नीशियम होता है जिसके सेवन से रक्तचाप नियंत्रित रहता है.
उबले हुए आलू में कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो पाचन शक्ति को दुरुस्त करने का काम करते हैं. उबला आलू खाने से खाना अच्छी तरह से पचता है.
आपकी जानकारी के लिए बता दें की उबले हुए आलू में जो विटामिन सी, पोटेशियम, विटामिन-बी6 और अन्य खनिज ये सभी आँतों की सूजन को काम करने का काम करते हैं.
अगर आपके मुँह में छाले हो गए हैं तो आपको उबले हुए आलू का सेवन करना चाहिए.
पथरी होने पर उबले हुए आलू का सेवन फायदेमंद होता है.
उबले हुए आलू के अंदर वो सभी पोषक तत्व होते हैं जो दिमाग के विकास के लिए फायदेमंद होते हैं.

मखाना के स्वास्थ्य लाभ


                                                           

मखाना खाने के फायदा : सर्दी के मौसम में ड्राई फ्रूट ज्यादा खाया जाता है। बादाम,किशमिश,पिस्ता,चिलगोजे, अखरोट और मखाने में बहुत से पोषक तत्व पाएं जाते हैं जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। वैसे तो सारे सूखे मेवे गुणों से भरपूर होते हैं लेकिन मखाना ठंड़ में शरीर को बीमारियों से बचाए रखने में बहुत फायदेमंद है। इसमें प्रोटीन,एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन,कैल्शियम,मिनरल्स,न्यूट्रिशियंस और फास्फोरस जैसे तत्व पाए जाते हैं। यह तत्व शरीर के पोषण के लिए बहुत जरूरी है।

मखाना के लाभ

एंटी एजिंग के गुणों से भरपूर मखाने का सेवन करने से समय से पहले आने वाले बुढ़ापे को रोका जा सकता है। इससे झुर्रियां और असमय बालों के सफेद होने की परेशानी से बचा जा सकता है।
मखाना खाने के फायदा : सर्दी के मौसम में ड्राई फ्रूट ज्यादा खाया जाता है। बादाम,किशमिश,पिस्ता,चिलगोजे, अखरोट और मखाने में बहुत से पोषक तत्व पाएं जाते हैं जो शरीर को ऊर्जा प्रदान करते हैं। वैसे तो सारे सूखे मेवे गुणों से भरपूर होते हैं लेकिन मखाना ठंड़ में शरीर को बीमारियों से बचाए रखने में बहुत फायदेमंद है। इसमें प्रोटीन,एंटीऑक्सीडेंट, विटामिन,कैल्शियम,मिनरल्स,न्यूट्रिशियंस और फास्फोरस जैसे तत्व पाए जाते हैं। यह तत्व शरीर के पोषण के लिए बहुत जरूरी है।
डायबिटिज के रोगियों के लिए मखाना बहुत फायदेमंद माना जाता है। इसमें शूगर बहुत कम होती है। स्टार्च और प्रोटीन के गुणों के कारण भी यह डायबिटिज के मरीज के लिए अच्छा माना जाता है।
मखाना खाने से दिल और किडनी की बीमारियों से बचा जा सकता है। यह किडनी को मजबूत बनाने और शरीर में खून का प्रभाव ठीक तरह से चलाने में मददगार है।
कैल्शियम में भरपूर होने के कारण यह हड्डियों को मजबूती प्रदान करने का काम करता है।
औरतों में मासिक चक्र में गड़बड़ी के कारण आने वाली परेशानियों से छुटकारा पाने में भी मखाना मददगार है।
रोजाना मखाना का सेवन करने से शारीरिक कमजोरी दूर होती है और इससे प्रजनन क्षमता में भी सुधार आता है।
दस्त होने पर मखाना भूनकर खाने से राहत मिलती है।
मखाना खाने से पेट से संबंधी समस्याओं से छुटकारा मिलता है।

इन तरीकों से खाएं मखाना

1. मखाने को मक्खन में फ्राई कर सूप के साथ खाने से इसका स्वाद और न्यूट्रीशियंस बढ़ जाते हैं।
2. मखाना,मूंगफली,सरसों के बीज को मिला कर इसमें अपनी पसंद से नमक और मसाला मिला कर चटनी बना लें। इस चटनी को लंच या डिनर के साथ खाएं।
3. मखाने को दूध में उबाल कर इसमें किशमिश और बादाम डालकर खाएं।
4. देसी घी में मखाना डालकर रोस्ट कर लें और इसमें काला नमक मिलाकर चाय और कॉफी के साथ खाएं।
5. मखाने को पनीर की सब्जी में डालकर इसके पोषण तत्व और स्वाद बढ़ जाते हैं।
6. थोडे से मखाने लेकर कुछ देर के लिए इसे दूध में भिगो दें और पेस्ट तैयार कर लें। अब 1 चम्मच पेस्ट को 1 गिलास गर्म दूध में केसर के साथ डालकर पीएं। इससे रात को अच्छी नींद आती है

फेफड़े स्वस्थ्य रखने के उपाय

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जब वायरस, बैक्टीरिया या कभी-कभी फंगी किसी व्यक्ति के फेफड़ों में पहुंच कर विकसित होना शुरू कर देते हैं, तो फेफड़ों में इन्फेक्शन होने लगता है। फेफड़ों में हवा की छोटी-छोटी थैलियां होती हैं जिन्हें 'एयर सैक' (Air sacs) कहा जाता है। फेफड़ों में संक्रमण होने के कारण ये थैलियां मवाद या अन्य द्रव भर जाती हैं, जिसके कारण मरीज को सांस लेने में दिक्कत होने लगती है।
फेफड़ों में संक्रमण होने के लक्षणों में मुख्य रूप से छाती में दर्द होना और बार-बार खांसी होना आदि शामिल हैं। फेफड़ों में इन्फेक्शन के कारण होने वाली खांसी सामान्य खांसी से अलग प्रकार की होती है। फेफड़ों में इन्फेक्शन का परीक्षण डॉक्टर के द्वारा किया जाता है और परीक्षण के दौरान वे मरीज से उसकी पिछली मेडिकल स्थिति के बारे में पूछते हैं। फेफड़ों में इन्फेक्शन का पता लगाने के लिए छाती का एक्स रे और सीटी स्कैन करवाने की आवश्यकता भी पड़ सकती है।
सामान्य स्वच्छता बनाए रखने और नियमित रूप से हाथ धोने की आदत से फेफड़ों में संक्रमण होने से बचाव किया जा सकता है। कुछ टीके भी उपलब्ध हैं जो कुछ प्रकार के फेफड़ों के संक्रमण होने का खतरा कम कर देते हैं। लंग इन्फेक्शन का इलाज एंटीबायोटिक या एंटीफंगल दवाओं के साथ किया जाता है। लंग इन्फेक्शन में होने वाली खांसी व दर्द को नियंत्रित करने के लिए पेनकिलर दवाएं और कफ सिरप भी दी जाती हैं। बहुत अधिक बुरा इंफेक्शन होने पर ऑक्सीजन और इसी तरह के दूसरे लाइफ सपोर्ट सिस्टम वाले ट्रीटमेंट भी रोगी को दिए जाते हैं।अगर शरीर के प्रमुख अंगों की बात की जाए तो इस दृष्टि से फेफड़ों की अहमियत सबसे ज्य़ादा है क्योंकि इन्हीं की वजह से हम सांस ले पाते हैं। नाक और सांस की नलियों के साथ मिलकर ये शरीर के भीतर शुद्ध ऑक्सीजन पहुंचाने और कॉर्बनडाइऑक्साइड को बाहर निकालने का काम करते हैं। भले ही ये शरीर के भीतर होते हैं पर प्रदूषण का सबसे ज्य़ादा असर इन्हीं पर ही पड़ता है। चिंताजनक बात यह है कि मेडिकल साइंस के क्षेत्र में अभी कोई ऐसी तकनीक उपलब्ध नहीं है, जिससे किडनी, लिवर या हार्ट की तरह लंग्स को भी टांस्प्लांट किया जा सके। इसीलिए हमें इनका विशेष ध्यान रखने की ज़रूरत होती है।
हमारे शरीर को जीवित रखने के लिए प्रत्येक कोशिका को शुद्ध ऑक्सीजन की ज़रूरत होती है। इसे पूरा करने जि़म्मेदारी हमारे श्वसन-तंत्र पर होती है, जो नाक, सांस की नलियों और फेफड़ों के साथ मिलकर सांस लेने और छोडऩे की प्रक्रिया को संचालित करता है।
सांस लेने के दौरान नाक के ज़रिये हवा फेफड़ों तक पहुंचती है। उसमें मौज़ूद धूल-कण और एलर्जी फैलाने वाले बैक्टीरिया के कुछ अंश नाक के भीतर ही फिल्टर हो जाते हैं पर इतना ही काफी नहीं है। फेफड़ों में अत्यंत बारीक छलनी की तरह छोटे-छोटे असंख्य वायु तंत्र होते हैं, जिन्हें एसिनस कहा जाता है। फेफड़े में मौज़ूद ये वायु तंत्र हवा को दोबारा फिल्टर करते हैं। इस तरह ब्लड को ऑक्सीजन मिलता है और हार्ट के ज़रिये शरीर के हर हिस्से तक शुद्ध ऑक्सीजन युक्त ब्लड की सप्लाई होती है।
इसके बाद बची हुई हवा को फेफड़े दोबारा फिल्टर करके उसमें मौज़ूद नुकसानदेह तत्वों को सांस छोडऩे की प्रक्रिया द्वारा शरीर से बाहर निकालने का काम करते हैं। अगर लंग्स अपना काम सही तरीके से न करें तो दूषित वायु में मौज़ूद बैक्टीरिया और वायरस रक्त में प्रवेश करके दिल सहित शरीर के अन्य प्रमुख अंगों को भी नुकसान पहुंचा सकते हैं।
वातावरण में मौज़ूद वायरस और बैक्टीरिया की वजह से फेफड़े में संक्रमण और सूजन की समस्या होती है, जिसे न्यूमोनिया कहा जाता है। सांस का बहुत तेज़ या धीरे चलना, सीने से घरघराहट की आवाज़ सुनाई देना, खांसी-बुखार आदि इसके प्रमुख लक्षण हैं। छोटे बच्चों और बुज़ुर्गों का इम्यून सिस्टम बहुत कमज़ोर होता है। इसलिए अकसर उनमें यह समस्या देखने को मिलती है। प्रदूषण फेफड़े का सबसे बड़ा दुश्मन है। ज्य़ादा स्मोकिंग करने वाले लोगों के फेफड़े और सांस की नलियों में नुकसानदेह केमिकल्स का जमाव होने लगता है।
आमतौर पर सांस की नलियां भीतर से हलकी गीली होती हैं लेकिन धुआं, धूल और हवा में मौज़ूद प्रदूषण की वजह से इनके भीतर मौज़ूद ल्यूब्रिकेंट सूखकर सांस की नलियों की भीतरी दीवारों से चिपक जाता है। इससे व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ होती है। चालीस वर्ष की आयु के बाद लोगों को यह समस्या ज्य़ादा परेशान करती है क्योंकि उम्र बढऩे के साथ व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता कमज़ोर पड़ जाती है।
बदलते मौसम में हानिकारक बैक्टीरिया ज्य़ादा सक्रिय होते हैं और उनसे लडऩे के लिए इम्यून सिस्टम को ज्य़ादा मेहनत करनी पड़ती है। इसलिए कुछ लोगों को इस दौरान भी सांस लेने में परेशानी होती है। ज्य़ादा गंभीर स्थिति में ब्रेन तक ऑक्सीजन पहुंचने के रास्ते में भी रुकावट आती है तो ऐसी अवस्था सीपीओडी यानी क्रॉनिक ऑब्स्ट्रक्टिव पल्मोनरी डिज़ीज़ कहा जाता है। ऐसी स्थिति में मरीज़ को नेब्युलाइज़र द्वारा दवा देने की ज़रूरत होती है और डॉक्टर पल्स ऑक्सीमीटर द्वारा यह जांचते हैं कि ब्रेन को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीज़न मिल रही है या नहीं?
अगर ब्रेन में ऑक्सीजन सैचुरेशन 90 प्रतिशत से कम हो तो व्यक्ति को अलग से ऑक्सीजन देने की आवश्यकता होती है। ऐसे हालात में उसे कुछ समय के लिए हॉस्पिटल में एडमिट कराने की भी नौबत आ सकती है। कुछ विशेष स्थितियों में सीपीओडी के गंभीर मरीज़ों के लिए घर पर ही पल्स ऑक्सीमीटर, ऑक्सीजन सिलिंडर या कंसंट्रेटर रखने की ज़रूरत पड़ती है। उन उपकरणों का इस्तेमाल बहुत आसान होता है और इनकी मदद से मरीज़ के लिए सांस लेने की प्रक्रिया आसान हो जाती है।

फेफड़ों में इन्फेक्शन होने से श्वसन तंत्र खराब होना, फेफड़ों संबंधी अन्य गंभीर समस्याएं पैदा होना और यहां तक की हार्ट फेलियर जैसी गंभीर समस्याएं हो सकती हैं। फेफड़ों का इन्फेक्शन क्या होता है? फेफड़ों में संक्रमण होने की स्थिति को लंग इन्फेक्शन कहा जाता है। यह संक्रमण फेफड़ों में हवा की छोटी-छोटी थैलियों में भी हो सकता है, जिस स्थिति को 'निमोनिया' कहा जाता है। इसके अलावा संक्रमण फेफड़ों के बड़े श्वसनमार्गों में भी हो सकता है, जिसे 'ब्रोंकाइटिस' कहा जाता है।

फेफड़ों में संक्रमण होने के  लक्षण 

खांसी - फेफड़ों में संक्रमण के कारण होने वाली खांसी में अधिक मात्रा में बलगम आने लगता है। बलगम अधिक मात्रा में बनने के साथ-साथ गाढ़ा भी हो जाता है और उसके रंग में भी बदलाव आ सकता है। कई बार बलगम से बदबू भी आती है। सांस फूलना। सांसे तेज होना। छींक आना। तेज बुखार। सिरदर्द । मांसपेशियों में दर्द। हृदय की धड़कनें तेज होना। बंद नाक। घरघराहट होना।

फेफड़ों में इन्फेक्शन क्यों होता है? 

बैक्टीरिया और वायरस, फेफड़ों में इन्फेक्शन पैदा करने वाले मुख्य दो कारण हैं। मरीज के सांस लेने के दौरान ये रोगाणु फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं और फेफड़ों में हवा की छोटी-छोटी थैलियों में जमा हो जाते हैं। फेफड़ों में पहुंचने के बाद ये रोगाणु विकसित होने लग जाते हैं और इनकी संख्या भी बढ़ने लग जाती है। फेफड़ों का संक्रमण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी फैल सकता है। ये रोगाणु मरीज के खांसने, बोलने और छींकने पर हवा में फैल जाते हैं और उस हवा में सांस लेने के कारण स्वस्थ आदमी के फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं। मरीज के द्वारा संक्रमित की गई किसी वस्तु को छूने से भी स्वस्थ व्यक्ति के फेफड़ों में इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है। अगर आप खुद को सीओपीडी, न्यूमोनिया और टीबी जैसी गंभीर बीमारियों से बचाना चाहते हैं तो स्मोकिंग से दूर रहें। मॉर्निंग वॉक के लिए मास्क पहन कर जाएं। कार का शीशा हमेशा बंद रखें। बच्चों को इन्फेक्शन से बचाने के लिए घर में सफाई का पूरा ध्यान रखें। वैसे आजकल न्यूमोनिया से बचाव के लिए लिए वैक्सीन भी उपलब्ध हैं। डॉक्टर की सलाह पर परिवार के सभी सदस्यों का वैक्सिनेशन ज़रूर करवाएं। चेस्ट की फिजि़योथेरेपी और ब्रीदिंग एक्सराइज़ से भी राहत मिलती है। अनुलोम-विलोम की क्रिया भी फेफड़ों को स्वस्थ बनाए रखने में मददगार होती है। इसके बावज़ूद अगर सांस लेने में तकलीफ हो तो बिना देर किए डॉक्टर से सलाह लें।

फेफड़ों में इन्फेक्शन होने का खतरा कब बढ़ता है? 

धूम्रपान करना - 

धूम्रपान करने से आपके शरीर की प्राकृतिक रक्षा क्षमता कमजोर हो जाती है, जो निमोनिया का कारण बनने वाले बैक्टीरिया और वायरस से सुरक्षा प्रदान करती है। सेकेंड हैंड स्मोक - किसी दूसरे व्यक्ति के धूम्रपान करने से निकलने वाले धुएं के संपर्क में आने से भी लंग इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। 

व्यावसायिक कारक -

 काम के दौरान धूल या अन्य औद्योगिक रसायनों के संपर्क में आने से फेफड़ों में इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है। 

प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर करने वाले रोग -

 एड्स और डायबिटीज जैसे कुछ रोग हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर देते हैं, जिससे फेफड़ों में इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है।
 बचपन - 
खासकर से बच्चों में लंग इन्फेक्शन होने का खतरा अधिक होता है क्योंकि वे दूसरे बच्चों के संपर्क में आते रहते हैं जो वायरस से संक्रमित हो सकते हैं। बच्चे अक्सर अपने हाथों को नियमित रूप से नहीं धोते। छोटे बच्चों की प्रतिरक्षा प्रणाली भी कमजोर होती है, जिससे उनमें किसी भी संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है। 

वृद्धावस्था - 

अधिक उम्र होने पर शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर होने लग जाती है, जिससे फेफड़ों में इन्फेक्शन होने का खतरा बढ़ जाता है। ऑपरेशन या चोट - यदि हाल ही में किसी प्रकार का ऑपरेशन होना या किसी प्रकार की चोट लगने से भी संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है।

 आईसीयू में होना - 

यदि कुछ समय पहले आप इंटेंसिव केयर यूनिट में भर्ती थे, तो उससे फेफड़ों में इन्फेक्शन का खतरा बढ़ जाता है।

 फेफड़ों में इन्फेक्शन होने से रोकथाम  

कुछ उपाय अपना कर फेफड़ों में इन्फेक्शन होने से रोकथाम की जा सकती है: 

पर्याप्त नींद लें - 

संक्रमण जैसी स्थितियों से निपटने के लिए पूरी नींद लेना और आराम करना जरूरी होता है। तनाव को कम करें - ऐसा कुछ काम ना करें जिनसे आपको तनाव होता है, यदि आपको तनाव है तो उसको ठीक करने की कोशिश करें। 

स्वच्छ पानी पिएं - 

जिन क्षेत्रों में स्वच्छ पानी उपलब्ध ना हो वहां पर बोतल बंद पानी या अन्य पेय पदार्थ ही पीने चाहिए। 

स्वस्थ आहार खाएं - 

अच्छा व स्वस्थ आहार संक्रमण से लड़ने में शरीर की मदद करता है। समय-समय पर सभी प्रकार के स्वस्थ भोजन खाने चाहिए। 

खूब मात्रा में तरल पदार्थ पिएं -

 दिन में कम से कम 8 गिलास तरल पदार्थ पीने चाहिए, इनमें पानी, फलों से रस व अन्य स्पोर्ट्स ड्रिंक शामिल हैं। विभिन्न प्रकार के तरल पदार्थों पीने से पहले डॉक्टर की सलाह लेना और भी बेहतर है।

 धूम्रपान छोड़ दें - 

तंबाकू आपके फेफड़ों को कमजोर बना देता है, जिससे वे संक्रमण से नहीं लड़ पाते।
    धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों में लंग इन्फेक्शन होने के जोखिम सामान्य व्यक्ति से अधिक पाए जाते हैं। 

अपने हाथों को अच्छे से धोएं - 

ऐसे बहुत सारे रोगाणु हैं, जो हाथों के माध्यम से ही हमारे शरीर के अंदर जाते हैं और संक्रमण फैलाते हैं। अपने हाथों को रोजाना दिन में कई बार साबुन के साथ अच्छे से धोना चाहिए। यदि आप हाथ धोने में समर्थ नहीं हैं तो अल्कोहल युक्त सेनिटाइजर्स का उपयोग कर सकते हैं।

 अपनी आंखों को ना रगड़ें -

 ऐसा करने से हाथों पर उपस्थित रोगाणु आंख की अश्रु नलिकाओं (Tear ducts) से होते हुए श्वसनमार्गों तक जा सकते हैं। 

सीढ़ियों का इस्तेमाल करें - 

नियमित रूप से रोजाना 30 मिनट शारीरिक गतिविधि करने से फेफड़ों में दबाव कम हो जाता है और ऑक्सीजन प्राप्त करने की क्षमता में भी सुधार होता है। शारीरिक रूप से गतिशील रहने से मेटाबॉलिज्म में भी सुधार होने लगता है। फ्लू का टीका लगवाएं - हर साल फ्लू के खिलाफ सुरक्षा प्रदान करने वाला टीका लगवाएं

हवा का ध्यान रखें -

 जिन लोगों के फेफड़ों में इन्फेक्शन है, उनको हवा में पार्टिकुलेट (Particulates) नामक प्रदूषण की मात्रा का विशेष रूप से ध्यान रखना चाहिए। प्रदूषित हवा में पार्टिकुलेट एक प्रकार का सूक्ष्म कण होता है जो कठोर या तरल भी हो सकते हैं। जब हवा अधिक प्रदूषित हो, तो उस दौरान जितना हो सके कम घर से बाहर निकलना चाहिए।
अन्य वायु प्रदूषणों से भी बचना चाहिए, जैसे तंबाकू, लकड़ी और तेल का धुंआ, वाहनों से निकलने वाला धुंआ व अन्य औद्योगिक प्रदूषण आदि। ये सभी प्रकार के प्रदूषण फेफड़ों के अंदर जाकर उन्हें क्षतिग्रस्त कर सकते हैं। इसके अलावा पराग आदि से होने वाली एलर्जी से भी बचाव रखना चाहिए।फफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए एंटी ऑक्सीडेंट तत्वों से भरपूर रंग-बिरंगे फलों और हरी पत्तेदार सब्जि़यों का पर्याप्त मात्रा में सेवन करें। विटमिन सी युक्त खट्टे फल भी इम्यून सिस्टम की सक्रियता बढ़ाकर फेफड़ों को मज़बूती देते हैं।

विभिन्न शारीरिक दर्दों से निजात पाने के उपाय




आयुर्वेद में दर्द का इलाज 

आयुर्वेद में दर्द के इलाज में खान-पान पर भी विशेष ध्यान दिया जाता है। खाने में कोई भी गरिष्ठ चीज जैसे कि बैंगन, आलू, उड़द दाल सहित सभी साबुत दालें, ठंडी चीजें मना होती हैं। दर्द के हिसाब से पंचकर्म, पोटली मसाज आदि दी जाती है।
- अगर मरीज सर्वाइकल से पीड़ित है तो उसे ग्रीवा वस्ती थेरपी से ठीक किया जाता है जिसमें उड़द और गेहूं के आटे को गूंथ कर गर्दन में पीछे गोल कर रखा जाता है औऱ फिर गोल घेरे के अंदर दर्दनिवारक गुनगुने तेल से थेरपी दी जाती है। यह काम पूरा एक घंटे का होता है। हर सात दिन पर यह थेरपी दी जाती है।
- घुटने और कमर के दर्द के लिए जानू वस्ती और कटि वस्ती थेरपी का इस्तेमाल किया जाता है। लीफ डिटॉक्स थेरपी भी इन दर्द में कारगर साबित होती है।
- हर थेरपी के लिए 2000 से 3000 रुपये तक का खर्च आता है।
-आयुर्वेद में दवा, मालिश और लेप को मिलाकर विटामिन डी की कमी से होनेवाले दर्द का इलाज किया जाता है। आमतौर पर इलाज का नतीजा सामने आने में 3 महीने लग जाते हैं।
- पूरे शरीर पर तेल की धारा डालते हैं। इसके लिए क्षीरबला तेल, धनवंतरम तेल आदि का इस्तेमाल किया जाता है। इसे 40 मिनट रोजाना और 5 दिन लगातार करते हैं। इससे हड्डियां मजबूत होती हैं।
- महिलाएं सुबह और शाम शतावरी की एक-एक टैब्लेट लें। वैसे तो किसी भी उम्र में ले सकते हैं लेकिन मिनोपॉज के बाद जरूर लें।
- रोजाना एक चम्मच मेथी दाना भिगोकर खाएं। मेथी दर्दनिवारक है और हड्डियों के लिए अच्छी है।
- एक कप गुनगुने दूध में एक चम्मच हल्दी डालकर पिएं।
- रोजाना एक चम्मच बादाम का तेल (बादाम रोगन) एक कप दूध में डालकर पिएं।

*घरेलू नुस्खे अपनाएं 

- गाय के घी में सेंधा नमक डाल कर दर्द वाली जगह पर मसाज करने से भी काफी फायदा होता है। 
- किसी भी तरह के दर्द से निपटने के लिए एक गिलास गाय के गुनगुने दूध में एक छोटी चम्मच हल्दी और गाय के घी की पांच बूंदे रात में नियमित पीने से फायदा होता है।
- रात में खाना खाने के करीब आधे घंटे बाद करीब आधा गिलास गुनगुना पानी पीने से भी लाभ होता है।
- माइग्रेन में गाय के घी को गुनगुना कर दो-दो बूंदें नाक में डालने से बहुत आराम मिलता है। यह सर्वाइकल के दर्द में भी मदद करता है।
- सोयाबीन, अंडे का पीला हिस्सा, फ्लैक्स सीड्स, सफेद तिल और आवंले का सेवन लाभकारी है। 

*दर्द भगाए योग

- गर्दन, साइटिका और कमर दर्द के लिए भुजंगासन, चक्रासन, शलभासन, धनुरासन कारगर हैं, वहीं ऑफिस में काम के दौरान चलित ताड़ासन यानी हर घंटे बाद 10 कदम आगे और 10 कदम पीछे चलने से बहुत आराम मिलता है। घुटने के दर्द वाले याद रखें कि वज्रासन बिलकुल नहीं करना है।
-अनुलोम-विलोम और कपालभाति काफी फायदेमंद हैं। सोने से पहले शवासन भी कई तरह के दर्द से आराम दिलाता है।

* ऐक्टिव रहें, एक्सरसाइज करें

- हमारा शरीर इस तरह से बना है कि सारे जोड़ चलते रहें। जरूरी है कि हम नियमित एक्सरसाइज करें और जितना मुमकिन हो, चलें। एक्सरसाइज में कार्डियोवस्क्युलर, स्ट्रेंथनिंग और स्ट्रेचिंग को मिलाकर करें। कार्डियो के लिए साइकलिंग, स्वीमिंग या डांस, स्ट्रेंथनिंग के लिए वेट लिफ्टिंग और स्ट्रेचिंग के लिए योग करें। वैसे, वॉक अपनेआप में संपूर्ण एक्सरसाइज है।
- अगर घुटने की समस्या नहीं है तो ब्रिस्क वॉक करें। ब्रिस्क वॉक में मोटेतौर पर 1 मिनट में 40-50 कदम चलते हैं। वैसे नॉर्मल वॉक (1 मिनट में लगभग 80 कदम) करना सबसे सेफ है। इससे घुटनों पर असर नहीं पड़ता। रोजाना कम-से-कम 3 किमी जरूर चलें।
- बीच-बीच में कलाइयों, घुटनों आदि को स्ट्रेच करते रहें। कमर को भी घुमाएं। साथ ही, जितना मुमकिन हो, अपना काम खुद करें और वजन कंट्रोल में रखें।
- जिन्हें पुराने दर्द परेशान करते हैं या सर्दियों में दर्द बढ़ जाता है, उन्हें तो एक्सरसाइज जरूर करनी चाहिए। कसरत से हमारे शरीर में मसल्स ऐक्टिव होती हैं, खून का दौरा बढ़ता है और इससे शरीर कुदरती तौर पर गर्म रहता है। ये लोग खासतौर पर पीटी जैसी एक्सरसाइज करें। ठंड की वजह से सुबह बाहर नहीं निकलना चाहते तो शाम को घूमने जाएं।

* विटामिन डी की कमी 

किसी भी शख्स को महीने में 60,000 यूनिट विटामिन डी की जरूरत होती है। इसके लिए महीने में 4-5 दिन और साल में औसतन 45-50 दिन करीब 80 फीसदी शरीर खुला रखकर 45 मिनट के लिए धूप में बैठें। ऐसा करना मुमकिन न हो तो 25-30 साल की उम्र के बाद हर महीने 60 हजार यूनिट का एक विटामिन डी का सैशे लेना चाहिए। विटामिन डी के अलावा कैल्शियम भी हड्डियों के लिए बहुत जरूरी है। कैल्शियम तभी शरीर में जज्ब हो पाता है, जबकि विटामिन डी का लेवल ठीक हो, यानी अगर विटामिन डी कम है तो कैल्शियम शरीर सोख नहीं पाता और हड्डियां कमजोर हो जाती हैं। शरीर को कैल्शियम अगर पूरा नहीं मिलता तो वह हड्डियों में मौजूद कैल्शियम को इस्तेमाल करना शुरू करता है। फिर हड्डियों में दर्द होने लगता है। शरीर में कैल्शियम का लेवल 8.8 से 10.6 mg/dl होना चाहिए। इसके लिए रोजाना 500 mg यानी 0.5 ग्राम कैल्शियम लेने की जरूरत होती है। कैल्शियम से भरपूर डाइट (दूध और दूध से बनी चीजें, हरी पत्तेदार सब्जियां और ड्राई-फ्रूट्स) लेने से यह जरूरत काफी हद तक पूरी हो जाती है। उम्र बढ़ने के साथ खासकर महिलाओं में कैल्शियम सप्लिमेंट या टैब्लेट लेने की जरूरत पड़ने लगती है। 

*पेनकिलर कितने सेफ ?

आमतौर पर किसी भी दर्द को खत्म करने के लिए हम पेनिकलर ले लेते हैं लेकिन यह सही तरीका नहीं है। ऐसा करने से दर्द सिर्फ दब जाता है, खत्म नहीं होता। बहुत दर्द हो तो पैरासिटामॉल 500 एमजी (क्रोसिन, पैरासिटामोल आदि) ले सकते हैं क्योंकि यह सेफ है। जरूरत लगने पर छह घंटे में दोबारा ले सकते हैं। एक दिन में 2 ग्राम तक लेना सेफ है लेकिन 2-3 दिन तक आराम न आए तो डॉक्टर को दिखाएं। दूसरी कोई पेनकिलर लेने से बचें क्योंकि उनका साइड इफेक्ट होता है। वैसे साल में 12 से ज्यादा पेनकिलर न लें, वरना किडनी पर बुरा असर पड़ सकता है।

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उबली हुई मूगफली के स्वास्थ्य लाभ

                                              

    यूं तो मूंगफली भारतीय रसोई का अहम ह‍िस्‍सा है लेकिन ठंड के मौसम में इसकी डिमांड ज्‍यादा बढ़ जाती है। सर्द‍ियों इसे खाने का अपना ही मजा है और खासतौर पर गुड़ के साथ मूंगफली खाने का जायका शानदार होता है।
  * मूंगफली खाने के तमाम फायदे हैं और इनको देखते हुए इसे सस्‍ता बादाम भी कहा जाता है। दरअसल, मूंगफली में बादाम जितने ही पौष्‍टिक तत्‍व पाए जाते हैं। मूंगफली खासतौर पर प्रोटीन का बहुत अच्‍छा सोर्स है और बताया जाता है कि दूध और अंडे की तुलना में इसमें प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्‍यादा होती है। भुनी या तेल में तली हुई मूंगफलियां तो आपने भी खूब खाई होंगी मगर क्या आप उबली हुई मूंगफली खाने के फायदे जानते हैं? आजकल मूंगफलियों का मौसम है। मूंगफली अपने आप में संपूर्ण आहार है। ये एनर्जी और पौष्टिक तत्वों से भरी होती है। मूंगफली खाने से शरीर को सभी जरूरी तत्व मिलते हैं, भूख जल्दी शांत होती है और शरीर में तुरंत एनर्जी आती है। अमेरिकन केमिकल सोसायटी द्वारा हुए एक शोध में पाया गया है कि भूनकर या तलकर खाने के बजाय अगर मूंगफलियों को उबालकर खाया जाए, तो इसके फायदे लगभग 4 गुना बढ़ जाते हैं। यही नहीं उबालने के बाद मूंगफली में पाए जाने वाले एंटीऑक्सीडेंट्स की मात्रा भी बढ़ जाती है। आइए आपको बताते हैं कितनी फायदेमंद हैं उबली हुई मूंगफलियां।

* 100 ग्राम उबली हुई मूंगफलियों में 280 कैलोरीज होती हैं इसलिए इसे खाने से शरीर में तुरंत ऊर्जा आती है। मूंगफली में फैट भी बहुत कम होता है इसलिए इसे खाने से शरीर का वजन बढ़े बिना उसे सभी जरूरी तत्व मिल जाते हैं। अन्‍य नट्स की तुलना में उबली मूंगफली में कैलोरी काफी कम होती है। इसलिए अगर आप वजन कंट्रोल करने की कोशिश कर रहे हैं तो उबली हुई मूंगफलियों को अपने आहार में शामिल करें। अगर कोई पतला-दुबला है तो मूंगफली के सेवन से उसकी सेहत भी अच्छी होती है।

    *उबली मूंगफली में सूखी और तेल में भुनी मूंगफली की तुलना में अधिक फाइबर होता है। ज्यादा फाइबर वाले आहारों के सेवन से आपका खाना अच्छी तरह पचता है और आंतों की सफाई हो जाती है। इसके अलावा मेटाबॉलिज्म अच्छा हो जाता है, जिससे शरीर में जमा हुई एक्सट्रा चर्बी तेजी से बर्न होती है। आहार के माध्‍यम से अधिक फाइबर अपने आहार में शामिल करने से आपको कई तरह के स्‍वास्‍थ्‍य लाभ मिलते हैं। यानी मूंगफली को अपने आहार में शामिल करने से आप भूख नियंत्रण के साथ-साथ कब्‍ज और दिल और डायबिटीज जैसे रोगों के खतरे से बच सकते हैं।

  * मूंगफली में विटामिन बी6 और विटामिन ए होता है इसलिए सर्दियों में रोज सुबह उबली मूंगफली में किशमिश मिलाकर खाने से आंखों की रौशनी बढ़ती है और इसकी कमजोरी दूर होती है। बच्चों को मूंगफली खिलाने से उनकी ग्रोथ ठीक तरह से होती है क्योंकि इसमें एमिनो एसिड और ढेर सारा प्रोटीन होता है।
 * उबली हुई मूंगफली एंटीऑक्‍सीडेंट विटामिन ई का समृद्ध स्रोत है। साथ ही इसमें विटामिन बी-कॉम्‍प्‍लेक्‍स का खजाना है जो मांसपेशियों और अंगों के विकास के लिए महत्वपूर्ण हैं। विटामिन बी शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं, फोलेट और फोलिक एसिड बनाने में मदद करता है जो कई तरह के जन्म दोष को रोकने में मदद करता हैं।
  * मूंगफली में पॉली फेनोलिक एंटी ऑक्सिडेंट और रेस्वेराट्रॉल होता है इसलिए मूंगफली खाने से दिल की बीमारियों, कैंसर, नर्व्स की बीमारियों और इंफेक्शन से बचाव रहता है। इसके अलावा इन तत्वों से शरीर में नाइट्रिक ऑक्साइड ज्यादा बनने लगता है इसलिए इसे खाने से दिल का दौरा पड़ने की संभावना कम हो जाती है।
*    बढ़ती उम्र के लक्षणों को रोकने के लिए भी मूंगफली का सेवन किया जाता है. इसमें मौजूद एंटी-ऑक्सीडेंट बढ़ती उम्र के लक्षणों जैसे बारीक रेखाएं और झुर्रियों को बनने से रोकते हैं।
 * ओमेगा 6 से भरपूर मूंगफली त्वचा को भी कोमल और नम बनाए रखता है। कई लोग मूंगफली के पेस्ट का इस्तेमाल फेसपैक के तौर पर भी करते हैं ताक‍ि त्‍वचा को इसके पूरे फायदे मिल सकें।


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पेट की फेट कैसे कम करें

                                                 

प्रॉपर न्यूट्रिशन और सही एक्सरसाइज के मेल से फैट बर्निंग प्रोसेस हेल्दी तरीके से तेज की जा सकती है। और पेट की चर्बी कम की जा सकती है। एक महीने में पेट की चर्बी कम घटाकर कमर का घेरा 4 इंच तक कम किया जा सकता है। 
क्या आप भी अपनी पेट की चर्बी को छुपाने के लिये ढीले-ढाले कपड़े पहनकर निकलते हैं? लोग अकसर एक्सरसाइज न कर पाने के चलते बढ़े पेट को छुपाने के लिए कई पैंतरे आजमाते हैं, लेकिन आखिर आप किन-किन उपायों से और कब तक अपनी पेट की चर्बी को छुपाते फिरेंगे। अब समय आ गया है कि इस चीज़ से ना भागा जाए और इसका डट कर मुकाबला किया जाए। आप बिना एक्सरसाइज किये भी अपने पेट की चर्बी से छुटकारा पा सकते हैं। आइये जानें कैसे-
*शुगर कम कर दें
शुगर में फ्रक्टोज होता है जो पेट के चारों और फैट बढ़ाता है। कोल्ड ड्रिंक, आर्टीफीशियली फ्लेवर्ड जूस और स्वीट बेवरेज से मोटापे का खतरा 60% तक बढ़ जाता है।

*हमेशा भोजन के थोड़ी देर पहले और बाद में एक या दो कप पानी पीयें। इसके अलावा दिन में भी खूब सारा पानी पीजिये, दिन में लगभग 2 ली‍टर पानी जरुर पीजिये नहीं तो आपका शरीर बॉडी फैट बर्न नहीं कर पाता है। पर्याप्त पानी पीने से चयापचय गति बढ़ती है और भोजन ठीक से हज़म हो पाता है।
*हर रात कम से कम 6 से 8 घंटों की नींद लें। यदि इससे कम समय की नींद लेंगे तो आपका हार्मोन हमेशा ही फैट इकठ्ठा करने की स्‍थिती में रहेगा, जिससे आपका फैट घटाने का सपना भी मुश्किल होता जाएगा। साथ ही तनाव से भी दूर रहें।
*सोने से पहले कम से कम दो घंटे तक भोजन न करें। क्योंकि शरीर इस दौरान खाए भोजन को अच्छी तरह से हज़म नहीं कर पाता है। वहीं भरे पेट सोने से कुछ स्वास्थ्य समस्याएं, जैसे बेचैनी या फिर नींद आने में परेशानी आदि हो सकती हैं।

*डाइट में प्रोटीन की मात्रा बढ़ाएं

सोयाबीन, टोफू, नट्स जैसे फूड्स में प्रोटीन होता है। इन्हें खाने से जल्दी-जल्दी भूख नहीं लगती और कैलोरी इनटेक कम होता है। पेट के चारों ओर फैट जमा नहीं होता।खूब सारा प्रोटीन, फाइबर और अच्‍छी वसा का सेवन करें। इसका अर्थ है कि अपने आहार में खूब सारी सब्‍जियों, मेवे और लीन मीट को शामिल करें। इस प्रकार के आहार से न सिर्फ चर्बी नहीं एकत्रित होती, बल्कि सेहत भी दुरुस्त बनी रहती है। 

*डाइट में कार्बोहाइड्रेट्स की मात्रा कम करें

व्हाइट शुगर, व्हाइट ब्रेड, पास्ता, मैदा जैसे आइटम फैट बढ़ाते हैं। इन्हें कम खाने से पेट का फैट घटाने में काफी मदद मिलती है। हरी सब्जियां ज्यादा खाएं।
*जंक फूड, शुगर उत्‍पाद और तला-भुना आहार कम से कम खाएं। इनका सेवन कर आप कभी पतले नहीं हो सकते उल्‍टा आप मोटापे के अलावा मधुमेह और हाई बीपी जैसी बीमारियों का शिकार बन सकते हैं। साथ ही डिब्ब बंद आहार व सोड़ा आदि का सेवन न करें। 
*चर्बी कम करने के लिए आप के हेल्थ ड्रिंक भी बनाकर रोजाना पी सकते हैं। इसके लिए आप 3-4 गिलास पानी लें और उसमें 3-4 नींबू निचोड़ें, 6-7 तुलसी के पत्ते डालें। अब उसमे खीरे के कुछ टुकड़े डालें, चाहें तो एक खीरे का जूस भी उसमें मिला सकते हैं। अब इस मिश्रण को रातभर के लिए एक बर्तन में ढंक कर रखे दें। सुबह उठकर इसे पीएं। रोजाना इसी टिप को फॉलों करें। इससे ना सिर्फ पेट की चर्बी कम होगी बल्कि चेहरे पर भी जबरदस्त निखार आ जाएगा
*अपने भोजन के भाग के आकार को कम करें, फिर भले ही आपके सामने आपका पसंदीदा भोजन ही क्यों न हो। वैसे भी पेट संबंधी समस्याओं से बचने व मोटापा कम करने के लिए भूख से थोड़ा कम आहार ही लेने चाहिए। छोटे आहार लें, दिन में इस प्रकार के पांच छोटे आहार लिये जा सकते हैं। भोजन करते समय, बड़े निवाले लेने से बचें और छोटे निवाले में अपने भोजन को विभाजित करें। 
*खाने में जीरा जरूर शामिल करें क्योंकि यह पेट की चर्बी घटाने में मददगार है। इसके अलावा सेब, अनानास, खीरा और टमाटर भी पेट की अतिरिक्त चर्बी को कम करने में सहायक होते हैं। जहां अनानास में ब्रोमीलेन नामक एंजाइम होता है जो चर्बी को कम करने में मदद करता है, तो वहीं सेब के अंदर फायबर और बीटा कैरोटीन होता है जो चर्बी घटाता है।

हेल्दी ब्रेकफास्ट जरूर करें

ब्रेकफास्ट अवॉइड करने से भूख ज्यादा लगती है और वजन बढ़ता है। ओटमील, दलिया और हाई प्रोटीन वाला ब्रेकफास्ट पेट का फैट घटाने में हैल्पफुल है।
*ज्यादातर लोगों को बंदगोभी पसंद नहीं होती, लेकिन शायद लोग नहीं जानते कि बंदगोभी चर्बी को कम करने में काफी मदद करती है। अगर बंदगोभी की सब्जी पसंद नहीं है तो इसे सलाद के रूप में खाएं..रोजाना कम से कम एक बार।

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