करेले के जूस के चमत्कारिक स्वास्थ्य लाभ


करेले को इंग्लिश में बिटर गॉर्ड कहते है। यह एक चिकित्सकीय औषधि है जिसका इस्तेमाल बहुत सी दवाइयों में किया जाता है| हालांकि यह टेस्ट में कड़वा होता है और हमारी जुबान को नहीं सुहाता है| लेकिन अगर आप इसके औषधीय गुणों के बारे में जान लेंगे तो इसका सेवन जरूर करेंगे|
करेला खाएं रोग को दूर भगाएं 
करेले में विटामिन्स और एंटी ओक्सिडेन्ट्स मौजूद होते है| रोजाना एक गिलास करेले का जूस पीने से बहुत सी स्वास्थ्य की समस्याएं दूर होती हैं| । इसमें विटामिन A,B और C पाया जाता हैं इसके अलावा करेले में कैरोटीन, पोटैशियम, बीटाकैरोटीन, आइरन, मैग्नीशियम, जिंक और मैगनीज जैसे गुणकारी तत्व भी होते हैं । हमारे शरीर को इन सभी चीजो की बराबर मात्रा में जरुरत होती हैं| करेला रक्त शोधन में भी बहुत आवश्यक हैं। इसके लिए करेले के रस का सेवन किया जाता हैं चाहे तो इसमें काली मिर्च पाउडर और नींबू का रस मिलाकर भी पी सकते है
करेला ब्लड शुगर के लेवल को कम करता है -
 अपने शुगर को नियंत्रित करने के लिए आप तीन दिन तक खाली पेट सुबह करेले का जूस ले सकते हैं| मोमर्सिडीन और चैराटिन जैसे एंटी-हाइपर ग्लेसेमिक तत्वों के कारण करेले का जूस ब्लड शुगर लेवल को मांसपेशियों में संचारित करने में मदद करता है| इसके बीजों में भी पॉलीपेप्टाइड-पी होता है जो कि इन्सुलिन को काम में लेकर मधुमेह रोड़ी  में शुगर लेवल को कम करता है
भूख बढ़ाता है-




 भूख नहीं लगने से शरीर को पूरा पोषण नहीं मिल पाता है जिससे कि स्वास्थ्य से सम्बंधित परेशानियां होती हैं| इसलिए करेले के जूस को रोजाना पीने से पाचन क्रिया सही रहती है जिससे भूख बढ़ती है|
प्रतिरक्षा तंत्र मजबूत करे
जिन लोगो का प्रतिरक्षा तंत्र कमज़ोर है उन्हें करेले के जूस का नियमित रूप से सेवन करना चाहिए| इसमें विटामिन B1, B2, B3, जिंक, मैग्नीशियम पाया जाता है जो शरीर के लिए बहुत आवश्यक तत्व हैं|
अग्नाशय के कैंसर के उपचार में उपयोगी -
 रोजाना एक गिलास करेले का जूस पीने से अग्नाशय का कैंसर पैदा करने वाली कोशिकाएं नष्ट होती हैं| ऐसा इसलिए होता हैं क्यों कि करेले में मौजूद एंटी- कैंसर कॉम्पोनेंट्स अग्नाशय का कैंसर पैदा करने वाली कोशिकाओं में ग्लूकोस का पाचन रोक देते हैं जिससे इन कोशिकाओं की शक्ति ख़त्म हो जाती हैं और ये ख़त्म हो जाती हैं|
पाचन शक्ति बढ़ाये
करेले का जूस कमजोर पाचन तंत्र को सुधारता है और अपच को भी दूर करता है| ऐसा इसलिए होता है क्यों कि यह एसिड के स्त्राव को बढ़ाता है जिससे पाचन शक्ति बढ़ती है| इसलिए अच्छी पाचन क्षमता के लिए सप्ताह में एक बार सुबह करेले का जूस जरूर पिए|
प्राकृतिक रक्त शोधक
करेले का जूस शरीर में खून को साफ़ करता है| यह जहरीले तत्वों को शरीर से बाहर निकालता है और फ्री रेडिकल्स से हुए नुकसान से भी बचाता है| इसलिए ब्लड को साफ़ करने और मुहासों जैसी समस्याओं को दूर करने के लिए एक गिलास करेले का जूस अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल कर ले।
सोराइसिस के लक्षणों को दूर करता है -
एक कप करेले के जूस में एक चम्मच नींबू का जूस मिला लें इस मिश्रण का खली पेट सेवन करें| 3 से 6 महीनें तक इसका सेवन करने से त्वचा पर सोराइसिस के लक्षण दूर होते हैं| यह आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी बढ़ाता है और सोराइसिस को प्राकृतिक रूप से ठीक करने में मदद करता है|
यह लिवर से विषैले पदार्थों को निकालता है -



रोजाना एक गिलास करेले का जूस पीने से लिवर मजबूत होता है क्यों कि यह पीलिया जैसी बिमारियों को दूर रखता है| साथ ही यह लिवर से जहरीले पदार्थों को निकालता है और पोषण प्रदान करता है जिसे लिवर सही काम करता है और लिवर की बीमारियां दूर रहती हैं|
हैजा के उपचार में लाभदायक
हैजा एक बहुत ही खतरनाक बीमारी है जो किसी भी आयु के व्यक्ति को हो सकती है| करेले का जूस इसमें मदद कर सकता है | इसके लिए दो चम्मच करेले के जूस को बराबर मात्रा में सफ़ेद प्याज के रस के साथ प्रतिदिन स्वस्थ हो जाने तक लिया जाना चाहिए|
यह आँखों की नजर बढ़ाता है
लगातार करेले के जूस का सेवन कर आप विभिन्न दृष्टि दोषों को दूर कर सकते हैं| करेले में बीटा- कैरोटीन और विटामिन ए की अधिकता होती है जिससे दृष्टि ठीक होती है| इसके अलावा इसमें उपस्थित विटामिन सी और एंटी-ऑक्सीडेंट्स, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस से होने वाली नजरों की कमजोरी से बचाता है|
त्वचा के रोगों में फायदेमंद
करेले के रस के सेवन से रक्त साफ होता हैं और त्वचा के रोग ठीक हो जाते है | करेले से पाचन क्रिया ठीक होती हैं इस कारण भी चेहरे पर मुंहासे जैसे रोग नहीं होते | करेला पेट साफ़ करने में भी सहायक होता हैं जिससे चर्म रोग नहीं होते| करेले की पत्तियों में भी विशेष गुण होते हैं आप चाहे तो इसका लैप भी बना के लगा सकते है।






हाथ और पैर के सुन्न होने के आयुर्वेदिक घरेलू इलाज



अक्सर जब आप कभी एक ही अवस्था में बैठे रह जाते हैं तो आपके हाथ और पैर सुन्नं पड़ जाते हैं, जिसके कारण आपको कभी कोई भी चीज़ को छूने का एहसास मालूम नहीं पड़ता है। यही नहीं, इसके अलावा आपको प्रभावित स्थान पर दर्द, कमजोरी या ऐठन भी महसूस होती होगी। 
 इसके कई कारण हो सकते हैं जैसे लगातार हाथों और पैरों पर प्रेशर, किसी ठंडी चीज को बहुत देर तक छूते रहना, तंत्रिका चोट, बहुत अधिक थकान, धूम्रपान, मधुमेह, विटामिन या मैग्नीशियम की कमी आदि। अगर यह समस्या कुछ मिनटों तक रहती है तो परेशानी की बात नहीं है, लेकिन अगर यही कई- कई घंटों तक बनी रहे तो आपको डाक्टर के पास जाने की आवश्यकता है।  हाथ -पैर का सुन्न हो जाना बड़ा ही कष्टदायक होता है क्योंकि ऐसे में फिर आपका कहीं मन नहीं लगता। पर आप चाहें तो इस समस्या को घरेलू उपचार से ठीक कर सकते हैं।
गर्म पानी का सेंक-
सबसे पहले प्रभावित जगह पर गर्म पानी की बोतल से सेंक रखें। इससे वहां की ब्लड सप्लाई बढ़ जाएगी। इससे मासपेशियां और नसें रिलेक्स होंगी। एक साफ कपड़े को गर्म पानी में 5 मिनट के लिए भिगोएं और फिर उससे प्रभावित जगह को सेंकें। आप चाहें तो गर्म पानी से स्नान भी कर सकती हैं।
मसाज सबसे अच्छा ऑप्शन-



हाथ या पैर में सुन्‍नपन आने पर मसाज इस समस्‍या से निपटने का सबसे आसान और सरल तरीका है। यह ब्‍लड सर्कुलेशन को बढ़ाता है, जिससे सुन्नता में कमी आती है। इसके अलावा यह मसल्‍स और नसों को प्रोत्‍साहित कर, समग्र कामकाज में सुधार करता है। अपने हाथों में गर्म जैतून, नारियल या सरसों के तेल लेकर इसे सुन्न हिस्‍से में लगाकर 5 मिनट के लिए सर्कुलर मोशन में अपनी उंगलियों से मसाज करें। जरूरत पड़ने पर इस उपाय को दोहराये।
ऑक्सीजन में सुधार करें एक्सरसाइज-
व्यायाम करने से शरीर में ब्लड र्स्कुलेशन होता है और वहां पर आक्सीजन की मात्रा बढ़ती है। रोजाना हाथ और पैरों का 15 मिनट व्यायाम करना चाहिए। इसके अलावा हफ्ते में 5 दिन के लिए 30 मिनट एरोबिक्स करें, जिससे आप हमेशा स्वस्थ बने रहें।एक्सरसाइज शरीर के विभिन्न अंगों में ब्लड सर्कुलेशन और ऑक्सीजन में सुधार करता है, जिससे हाथ और पैर सहित शरीर के किसी भी अंग में सुन्नपन, झनझनाहट को रोकने में मदद मिलती है। इसके अलावा नियमित रूप एक्सरसाइज गतिशीलता में सुधार और कई स्वास्थ्य समस्याओं से बचाता है। 
मैग्नी शियम का सेवन जरूर करें
हरी पत्तेीदार सब्जिेयां, मेवे, बीज, ओटमील, पीनट बटर, ठंडे पानी की मछलियां, सोया बीन, अवाकाडो, केला, डार्क चॉकलेट और लो फैट दही आदि जरूर खाएं। आप रोजाना मैग्नीlशियम 350 एम जी की सपलीमेंट भी ले सकते हैं। 



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हल्दी में मौजूद कुरकुर्मीन नाम का तत्व पूरे शरीर में ब्लड सर्कुलेशन में सुधार करने में मदद करता है। इसके अलावा, इसमें मौजूद एंटी-इंफ्लेमेंटरी गुण प्रभावित हिस्से में दर्द और परेशानी कम करने में मदद करता है। समस्या होने पर एक गिलास दूध में आधा चम्मच हल्दी मिक्स करके हल्की आंच पर पकाएं। फिर इसमें थोड़ा सा शहद मिलाकर दिन में एक बार पीने से ब्लड सर्कुलेशन में सुधार होता है। आप हल्दी और पानी से बने पेस्ट से प्रभावित हिस्से पर मसाज भी कर सकते हैं।
खूब खाएं Vitamin B फूड-
अगर हाथ-पैरों में झन्न-झन्नाहट सी होती है तो अपने आहार में ढेर सारे विटामिन बी, बी6 और बी12 को शामिल करें। इनके कमी से भी हाथ, पैरों, बाजुओं और उंगलियों में सुन्न पैदा हो जाती है। आपको अपने आहार में अंडे, अवाकाडो, मीट, केला, बींस, मछली, ओटमील, दूध, चीज़, दही, मेवे, बीज और फल शामिल करने चाहिये।
दालचीनी का उपयोग करें-
दालचीनी में केमिकल और न्यूट्रिएंट्स होते हैं जो हाथ और पैरों में ब्लड फ्लो को बढ़ाते हैं। एक्सपर्ट बताते हैं रोजाना 2-4 ग्राम दालचीनी पाउडर को लेने से ब्लड सर्कुलेशन बढ़ता है। इसको लेने का अच्छा तरीका है कि एक गिलास गर्म पानी में 1 चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाएं और दिन में एक बार पिएं। दूसरा तरीका है कि 1 चम्मच दालचीनी और शहद मिला कर सुबह कुछ दिनों तक सेवन करें। 
प्रभावित हिस्‍से को ऊपर उठाएं-
हाथ और पैरों के खराब ब्लड सर्कुलेशन से ऐसा होता है। इसलिए उस प्रभावित हिस्से को ऊपर की ओर उठाइए जिससे वह नॉर्मल हो सके। इससे सुन्न वाला हिस्सा ठीक हो जाएगा। आप अपने प्रभावित हिस्से को तकिए पर ऊंचा कर के भी लेट सकते हैं।



 

आर्थराइटिस(संधिवात) की अचूक औषधि  


स्वीट स्लिम बेल्ट के फायदे और नुकसान


गलत ढंग से आहार-विहार यानी खान-पान, रहन-सहन से जब शरीर पर चर्बी चढ़ती है तो पेट बाहर निकल आता है, कमर मोटी हो जाती है और कूल्हे भारी हो जाते हैं। इसी अनुपात से हाथ-पैर और गर्दन पर भी मोटापा आने लगता है। जबड़ों के नीचे गरदन मोटी होना और तोंद बढ़ना मोटापे के मोटे लक्षण हैं।
मोटापे से जहाँ शरीर भद्दा और बेडौल दिखाई देता है, वहीं स्वास्थ्य से सम्बंधित कुछ व्याधियाँ पैदा हो जाती हैं, लिहाजा मोटापा किसी भी सूरत में अच्छा नहीं होता। बहुत कम स्त्रियाँ मोटापे का शिकार होने से बच पाती हैं। हर समय कुछ न कुछ खाने की शौकीन, मिठाइयाँ, तले पदार्थों का अधिक सेवन करने वाली और शारीरिक परिश्रम न करने वाली स्त्रियों के शरीर पर मोटापा आ जाता है।
विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है की वेट लॉस बेल्ट वज़न कम करने में बहुत उपयोगी साबित होता है। इससे कम समय में शीघ्रता से वज़न कम होती है। इससे आपके शरीर के आकार और संरचना को भी सुडौल बनाने में मदद मिलती है। इससे पीठ दर्द जैसी समस्याओं का भी निदान हो जाता है। इसे पहन कर आप अपने दिनचर्या के अन्य कार्य भी आराम से कर सकते हैं। इसे इस्तेमाल करने के बाद आपके आत्मविश्वास में भी इजाफा होगा और आपकी लाइफस्टाइल भी अच्छी हो जायेगी।

हर व्यक्ति परफेक्ट दिखना चाहता है चाहे वह पुरुष हो या कोई महिला। शरीर की अतिरिक्त चर्बी आपकी सुंदरता को खराब कर सकती हैं। परन्तु इस तरह के स्लिमिंग बेल्ट को महिलाएं कम या बिना मेहनत के अपना वजन कम करने के लिए एक चमत्कार मानती हैं। महिलाएं अपने पेट के मिडसेक्शन का वजन कम करना पसंद करती हैं। और आज के समय में वजन कम करने के लिए स्लिमिंग बेल्ट सबसे अच्छा माना जाता है।
यह आपके जिद्दी वसा के लिए वजन घटाने की बेल्ट के रूप में भी जाना जाता है। आपको बस इस वेट लॉस बेल्ट को अपनी कमर के चारों ओर लपेटने की आवश्यकता होती है। यह बेल्ट सौना के रूप में कार्य करेगी और आपकी चर्बी को दूर करेगी। ये स्लिमिंग बेल्ट टिकाऊ कपड़े से बने होते हैं जिन्हें नियोप्रीन (एक सिंथेटिक रबर) कहा जाता है जो आमतौर पर स्विमवियर में इस्तेमाल किया जाता है।


आज बाजार में विभिन्न प्रकार के स्लिमिंग बेल्ट मिलते हैं। कुछ बेल्ट को 15 से 20 मिनट के लिए पहना जाना चाहिए, जबकि अन्य बेल्ट इस तरह के होते है कि आप उन्हें पूरे दिन भी पहन सकते हैं। स्लिमिंग बेल्ट वाइब्रेटिंग मोड में होते हैं। कुछ डिजाइनर स्लिमिंग बेल्ट आपको बेल्ट के कंपन को नियंत्रित करने के लिए बटन भी देते हैं और कुछ को केवल व्यायाम करते समय उपयोग करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है। कुछ ब्रांड इस तरह के स्लिमिंग बेल्ट को 30 मिनट से कम पहनने की सलाह देते हैं, जबकि अन्य इसे पूरे दिन पहनने का सुझाव भी देते हैं।
स्वीट स्लिम बेल्ट के फायदे
विज्ञान इस बात की पुष्टि करता है कि स्वेट स्लिमिंग बेल्ट कई इंच वजन कम करने में मदद करता है। साथ ही, यह आपके शरीर की मुद्रा को आकार देने, पीठ दर्द से राहत दिलाने और आपकी मुद्रा को सही करने में भी मदद करता है। आप इस बेल्ट को पहनकर भी अपना काम जारी रख सकते है। एक स्लिमिंग बेल्ट का उपयोग करने के साथ ही, आप अपने आत्मविश्वास और जीवन शैली में एक महत्वपूर्ण सुधार देखेंगे। यहाँ एक स्लिमिंग बेल्ट का उपयोग करने के कुछ आश्चर्यजनक लाभ हम आपको बताने जा रहे हैं, जिनमें शामिल है-
स्लिम बेल्ट का लाभ मुद्रा में सुधार
स्वेट स्लिम बेल्ट का लाभ आपको आपकी मुद्रा सुधार में मदद कर सकता है। स्लिमिंग बेल्ट आपको एक बेहतर आसन प्राप्त करने में मदद करता है। वेट लिफ्टिंग के दौरान या डेस्क पर काम करते समय आपको स्लिमिंग बेल्ट पहनना चाहिए। इस बेल्ट को पहनने से आपको जल्द ही आश्चर्यजनक परिणाम देखने को मिलेंगे। यह आपको पतला दिखने और आपकी मुद्रा को सही करने में मदद करेगा। सबसे अच्छा स्लिमिंग बेल्ट एक नरम लेकिन कठोर कपड़े से बना होता है। यदि आप रोजाना एक स्लिमिंग बेल्ट पहनते हैं, तो आपको सीधे बैठना होगा, और यह आपकी मुद्रा को सही करेगा। यह आपके कमर दर्द को कम करने में भी बहुत सहायक होता है।



बेल्ट का उपयोग पीठ दर्द से राहत के लिए
बैक पेन हमें रोजमर्रा के काम करने से रोकता है। यदि आप भी पीठ दर्द से गुजर रहे हैं तो यह स्लिमिंग बेल्ट एक अविश्वसनीय अस्थायी राहत के रूप में साबित हो सकता है। स्लिमिंग बेल्ट आपको लगातार दर्द को कम करने के लिए सही मुद्रा का उपयोग करने की याद दिलाता है। अकेले पसीना निकलने से आपको अपना वजन कम करने में मदद नहीं मिलती है, यह वजन घटाने वाली बेल्ट आपके शरीर द्वारा जारी गर्मी को अवशोषित करती है और आपके पीठ के निचले हिस्से को गर्म रखती और आपको पीठ दर्द से राहत दिलाती है।

पेट की मांशपेशियों को बनाये टाइट
जिन लोगों की टमी पे बहुत ज्यादा फैट हैं और पेट बहुत बड़े साइज के हैं वो लोग ये जान कर खुश हो जाएंगे की वेट लॉस बेल्ट के माध्यम से वो अपने मोटे पेट को आसानी से कम कर सकते हैं।
बस अपने पेट के चारो तरफ बेल्ट को बाँध लें और बेल्ट की स्विच को ऑन कर दें।
आप देखेंगे की तुरंत आपके पेट की छवि से पसीने की शक्ल में वज़न निकलने लगेगा।
आप अपने कपड़ों के अंदर भी इसे पहन कर अपने पेट की मांशपेशियों को सख़्त बना सकते हैं।
बेल्ट का फेब्रिक आपके पेट की मांशपेशियों में कम्पन्न पैदा करता है और फिर इसे आराम, क्रिया पेट का व्यायाम हो जाता है।
इस बेल्ट का बेहतर परिणाम सही आहार के सेवन और बेहतर एक्सरसाइज कर के पाया जा सकता है।
आपको बेल्ट पहनते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए बेल्ट के दोनों सिरे बेल्ली बटन पर जाकर मिलें।
ये एक सबसे कारगर उपाय है शरीर के अतिरिक्त छवि को घटाने के लिए। 
जिन लोगों में वसा उनके टमी और बड़े आकार के एब्डोमेन में होता हैं, उनके लिए स्लिमिंग बेल्ट एक अच्छा उपाय हो सकता है क्योकि यह बेल्ट आपको अतिरिक्त वसा से छुटकारा पाने और पेट की मांसपेशियों को कसने में मदद करेगा। इसका उपयोग करने के लिए अपनी कमर के चारों ओर स्लिमिंग बेल्ट लपेटें और इसे चालू करें, अब आप देखेंगे कि यह आपके पेट से अतिरिक्त वसा को कैसे बाहर निकालता है। इसे अपने कपड़ों के नीचे आराम से समायोजित करें, यह आपके पेट की मांसपेशियों को मजबूत करेगा। यह स्लिमिंग बेल्ट आपके शरीर के केवल कुछ विशिष्ट क्षेत्र को ही लक्षित करता है।
थाई, हिप्स और आर्म्स पर भी कर सकते हैं इसे इस्तेमाल
वेट लॉस बेल्ट को पुरे शरीर के वज़न को घटाने के लिए बनाया गया है।
इसका उपयोग आप शरीर के दूसरे भागों जैसे थाई, हिप्स और आर्म्स की चर्वी घटाने में भी कर सकते है।
जब आपका शरीर आराम अवस्था में हो तब आप वेट लॉस बेल्ट का इस्तेमाल अपने जाँघों पर कर के अपनी चर्वी घटा सकते हैं।
अपने जाँघों के चारो तरफ इस बेल्ट को बाँध कर आप वहां के हिस्से को गर्म कर सकते हैं, और इस गर्मी से आपकी जाँघों और हिप्स की छवि घट सकती है। इससे आप स्लिम नज़र आने लगेंगी।


इससे आपके पैरों में रक्तसंचार भी बेहतर तरीके से होने लगेगा।
वेट लॉस बेल्ट से आपके शरीर का मेटाबॉलिज्म भी बेहतर होता है।
स्लिम बेल्ट का लाभ शरीर के अन्य भागों के लिये
स्लिमिंग बेल्ट को शरीर में वसा को कम करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। आप बेल्ट को शरीर के विभिन्न हिस्सों जैसे जांघों, हाथ और कूल्हों के आसपास उपयोग कर सकते हैं। जब आपका शरीर आराम कर रहा होता है, तो आप कुछ क्षेत्रों से वसा कम करने के लिए इस बेल्ट का उपयोग अपनी जांघों के आसपास भी कर सकते हैं। जांघों के चारों ओर बेल्ट लपेटने से आपको अधिक गर्मी बनाए रखने में मदद मिलेगी। यह गर्मी जांघों और कूल्हों को मजबूत बनाने में भी मदद करेगी। अपने पैरों में रक्त परिसंचरण में सुधार करना सबसे अच्छा होता है। स्लिमिंग बेल्ट शरीर के चयापचय को बढ़ाने में भी मदद करता है।
स्लिम बेल्ट के नुकसान
जिस तरह स्वेट स्लिम बेल्ट के कई तरह के फायदे के बारे में आपने जाना उसी तरह इस स्लिमिंग बेल्ट के कई नुकसान और दुष्प्रभाव भी होते है। स्लिमिंग बेल्ट आपके शरीर के वजन को कम करने में मदद करती है, लेकिन इस गैजेट के कुछ साइड इफेक्ट्स भी हैं जो आप अनुभव कर सकते हैं। यदि आप कुछ घंटों के लिए इस स्लिमिंग बेल्ट का उपयोग करते हैं, तो यह आपके शरीर में कुछ स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न कर सकता है। यह एक तरह का हीटिंग पैड है जो आपकी कमर के आसपास आराम से फिट बैठता है। स्लिमिंग बेल्ट का उपयोग करने के ऐसे दुष्प्रभाव होते हैं जो अगली बार इस बेल्ट का उपयोग करने से पहले आपको दो बार सोचने पर मजबूर कर सकता है। इस बेल्ट से होने वाली कुछ समस्याओं में शामिल हैं-
स्लिमिंग बेल्ट का नुकसान असामान्य त्वचा संक्रमण
स्लिमिंग बेल्ट का उपयोग करके, आप अपने आप को ताजा और प्राकृतिक हवा तक पहुँचने से रोक देते हैं। यह त्वचा के संक्रमण, लालिमा, मुँहासे, जलने या गंभीर त्वचा जलन का परिणाम हो सकता है। इस बेल्ट का उपयोग लंबे सत्र तक करने से आपके शरीर में चकत्ते भी हो सकते हैं। शुष्क त्वचा या अधिक पसीने के कारण भी त्वचा में संक्रमण हो सकता है। लगातार पसीने से आपको सबसे ज्यादा खुजली हो सकती है और यह आपके कोर्सेट को नुकसान पहुंचा सकता है। त्वचा का संक्रमण कई बार गंभीर हो सकता है क्योंकि जैसा कि हमने पहले बताया कि यह स्लिमिंग बेल्ट न्योप्रीन से बना होता है जिससे आपके शरीर को तीव्रता से पसीना आता है।
ऐसी त्वचा की समस्याओं से बचने के लिए, सिर्फ 20 मिनट के लिए ही बेल्ट का उपयोग करने का प्रयास करें। इसके अलावा, यह स्लिमिंग बेल्ट गर्भवती महिलाओं के लिए बिलकुल भी उपयुक्त नहीं है।
स्लिम बेल्ट के साइड इफेक्ट्स इलेक्ट्रिक शॉक
स्लिमिंग बेल्ट का उपयोग करते समय आपको बहुत सावधान रहना चाहिए। यदि स्विच ऑन करते समय आपके हाथ गीले होते हैं, तो आपको गंभीर बिजली के झटके लग सकते हैं। इस बेल्ट का उपयोग करते समय आपको बहुत सावधान रहना चाहिए क्योंकि यह बिजली पर काम करता है। अत्यधिक उपयोग आपको शरीर के उन विशेष भागों में छोटे-छोटे बिजली के झटके भी पहुँचा सकता है जहाँ आपने स्लिमिंग बेल्ट को लपेटा है। विशेषज्ञ हमेशा ही सावधानी और उत्कृष्ट देखभाल के साथ इस स्लिमिंग बेल्ट का उपयोग करने का सुझाव देते है।
स्लिम बेल्ट के दुष्प्रभाव से हो सकता है डीहाइड्रेशन
जब आप स्लिमिंग बेल्ट पहनते हैं तो आपको बहुत पसीना आता है। इसलिए आपको पानी की कमी के कारण खतरनाक निर्जलीकरण भी हो सकता है। यदि डीहाइड्रेशन की समस्या को अनुपचारित छोड़ दिया जाता है, तो यह अन्य गंभीर स्वास्थ्य स्थितियों को जन्म दे सकता है। आमतौर पर, हल्के और मध्यम निर्जलीकरण के लक्षणों में शामिल हैं-
बहुत अधिक प्यास लगना
सिरदर्द होना
कम मूत्र उत्पादन और अधिक पीलापन
रूखी त्वचा
शुष्क मुँह
सिर चकराना
नींद और आलस आना
आँसू ना निकलना


स्लिमिंग बेल्ट का नुकसान असंतुलित इलेक्ट्रोलाइट स्तर
अत्यधिक पसीना आमतौर पर इलेक्ट्रोलाइट स्तरों में असंतुलन का कारण बनता है, जिससे मांसपेशियों में ऐंठन हो सकती है। यदि आप स्लिमिंग बेल्ट पहनने के बाद किसी भी समय इस तरह की समस्या का अनुभव करते हैं, तो इसे तुरंत उपयोग करना बंद करें और इलेक्ट्रोलाइट युक्त स्पोर्ट्स ड्रिंक और नारियल पानी लें, या अपने डॉक्टर से सलाह करें।
स्लिमिंग बेल्ट का नुकसान आतंरिक भागों पर जोखिम
लंबे समय तक स्लिमिंग बेल्ट पहनने से संभावित पाचन और आंतरिक अंगों को नुकसान पहुँच सकता है और कई जोखिम पैदा हो सकते है। इसमें शामिल है-
एसिड रिफ्लक्स
ऑर्गन डिसप्लेस
हार्ट बर्न और अपच
अपर्याप्त ऑक्सीजन का सेवन
स्लिम बेल्ट के साइड इफ़ेक्ट शरीर के तापमान में वृद्धि
स्लिमिंग बेल्ट आपके शरीर के अंदर गर्मी को बनाए रखता है और आपको सामान्य से अधिक पसीना आता है। इसके अलावा, यह उच्च तापमान पर स्लिमिंग बेल्ट का उपयोग करने पर हीट स्ट्रोक और थकान के खतरे को भी बढ़ाता है।
क्या स्लिमिंग बेल्ट वजन कम करने में मदद करती है
वास्तव में, जो वजन हम स्लिमिंग बेल्ट के माध्यम से कम करते हैं, वह केवल तरल पदार्थ के अलावा और कुछ नहीं होता है, जिसका अर्थ है कि स्लिमिंग बेल्ट के माध्यम से प्राप्त परिणाम केवल अल्पकालिक और कम समय के लिए ही होते हैं। परन्तु इसके परिणाम उपयोगकर्ता के द्वारा भिन्न भी हो सकते हैं। इसलिए, दीर्घकालिक परिणामों को प्राप्त करने के लिए, आपको नियमित रूप से व्यायाम और संतुलित आहार के माध्यम से वसा का सेवन कम करके खुद को स्वस्थ बनाना चाहिए।

 

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पैर व टखनों में सूजन व दर्द के आयुर्वेदिक हर्बल उपचार




चलते हुए अक्‍सर आपका पैर अक्‍सर मुड़ जाता है। जरा सी चूक से कई बार पैरों में मोच आ जाती है। टखने में मोच सामान्‍य है और यह किसी को भी हो सकती है। ऐसा नहीं है कि सिर्फ खिलाडि़यो को ही पैर में मोच आती है। आम आदमी को भी ऐसी समस्‍या आ सकती है। अचानक पैर मुड़ने से टखने में मोच अथवा चोट लग सकती है। जब पैर मुड़ने से टखने के जोड़ को सहारा देने वाला उत्तक क्षतिग्रस्‍त हो जाता है, तो मोच की समस्‍या आती है। हालांकि इसे एक सामान्‍य समस्‍या समझा जाता है, लेकिन सही देखभाल के अभाव में यह समस्‍या काफी बड़ी भी हो सकती है।
पैर व टखनों में सूजन की समस्या- पैरों में मोच आना यूं तो एक सामान्‍य समस्‍या है, जिसके कारण आप कई बार हिल भी नहीं पाते। ऐसे हालात में किसी व्‍यक्ति के लिए चलना फिरना भी मुहाल हो जाता है। पैर व टखनों की सूजन एक दर्दभरी समस्या है। ये समस्या किसी भी उम्र में हो सकती है। इस स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को काफी तकलीफ का सामना करना पड़ता है। इसमें पैर, खासतौर पर टखनों और एड़ियों के आसपास सूजन, लालिमा और जलन हो जाती है। ये सूजन की समस्या किसी भी मौसम में हो सकती है लेकिन सर्दियों में ये समस्या और अधिक बढ़ जाती है। इसके अलावा, कई और कारणों से ये सूजन की समस्या होती हैं। लेकिन, ऐसे में आप कुछ घरेलू उपाय आजमा सकते हैं। जो कारगर तो हैं ही साथ ही सुरक्षित भी हैं पैर या टखने की चोट के कारण भी उस स्थान पर सूजन की समस्या हो सकती है। सबसे आम है टखने की मोच। ये तब होती है जब टखना गलत तरह से मुड़ जाता है। मोच या पैर की अन्य चोटों के कारण आई सूजन की समस्या से निपटने के लिए आराम सबसे अधिक जरूरी है। बर्फ की सिकाई और टखने को कंप्रैशन बेंडेज से बांधने से इस समस्या में राहत मिल सकती है। अगर ऐसा करने से भी आराम न हो, और सूजन बढ़ जाए तो चिकित्सक के पास जरूर जाएं।
इन्फेक्शन- पैर व टखनों में सूजन इन्फेक्शन का एक लक्षण भी हो सकता है। जिन लोगों को डायबिटीज या पैर की अन्य नर्व संबंधी समस्या होती है, उन्हें पैर के इन्फेक्शन का जोखिम अधिक होता है। अगर आपको डायबिटीज है, तो आपको अपने पैरों में होने वाले फफोलों और दर्द पर ध्यान देने की जरूरत है। दिल, लीवर या किडनी में खराबी कई बार टखने व पैर की सूजन दिल, लीवर या किडनी की किसी बीमारी के लक्षण के रूप में प्रकट होता है। सूजा हुआ टखना दिल के दौरे का संकेत हो सकता है। अगर किडनी सही से काम न कर रही हों, तो भी पैर सूज सकते हैं। लीवर की बीमारी में अल्बमिन कहलाने वाले उस प्रोटीन के उत्पादन पर प्रभाव पड़ता है जो खून को दूसरे टीशू में फैलने से रोकता है। इस प्रोटीन के कम निर्माण से फ्लूड लीकेज बढ़ जाती है जो गुरुत्वाकर्षण के नियम के कारण पैरों में अधिक पहुंचता है, और उससे सूजन हो जाती है। किसी गंभीर समस्या से बचने के लिए पैर की सूजन के साथ चेस्ट पेन होने पर डॉक्टर से संपर्क करें।
खून का थक्का- पैरों की नसों में होने वाले खून के थक्के पैरों तक आने वाले खून के बहाव को उल्टा दिल तक वापस भेज देते हैं। इस वजह से भी टखने व पैर सूज जाते हैं। ये खून के थक्के यानी ब्लड क्लॉट या तो सुपरफीशियल होते हैं जो त्वचा के नीचे ही नसों में होते हैं, या फिर गहरे हो सकते हैं। गहरे खून के थक्के पैरों की कुछ और मुख्य नसों को ब्लॉक कर सकते हैं। ये खून के थक्के जानलेवा भी हो सकते हैं अगर ये दिल या फेफड़ों तक पहुंच जाएं। अगर आपके एक पैर में सूजन है और साथ में दर्द भी, बुखार और पैर का रंग भी बदल रहा है तो फौरन चिकित्सक के पास जाएं। 
सर्दी से सूजन- सर्दियों में पैरों, खासतौर पर पैर की उंगलियों पर लाल निशान बनने या खुजली के साथ सूजन आने की समस्या काफी आम है। चिलब्लेंस नामक यह बीमारी सर्दियों में नंगे पैर घूमने या तापमान में अचानक बदलाव से होती है। हालांकि सर्दियों में यह सामान्य बीमारी है, लेकिन ध्यान नहीं देने पर कष्टदायक हो सकती है। यह एक कनेक्टिव टिश्यूज डिजीज है। साधारण उपाय करके इससे बचा जा सकता है। सर्दी से बचाव रखें, दस्ताने व मोजे पहने। धूप में ही बाहर निकलें, सिंकाई करें। दवाओं के साइड इफेक्ट्स कई दवाओं के साइड इफेक्ट की वजह से भी पैर व टखनों में सूजन हो जाती है। कैल्शियम चैनल ब्लॉकर, जो कि एक प्रकार की ब्लड प्रैशर की दवा है, उसका साइड इफेक्ट पैरों की सूजन ही होता है। इसके अलावा, एंटीडिप्रेसेंट्स खाने वाले लोगों को कई बार सूजन की इस समस्या का सामना करना पड़ता है। डायबिटीज की दवाएं भी पैर व टखने की सूजन का कारण हो सकती हैं। अगर आपको शक होता है कि आपकी सूजन का कारण आपके द्वारा खाए जाने वाली दवा ही है तो इस बारे में अपने डॉक्टर से बात करें।
गर्भावस्था की समस्या- गर्भावस्था में टखने और पैर की सूजन आम समस्या है। हालांकि अचानक सूजन आया, या अत्यधिक सूजन आना किसी गंभीर समस्या की वजह से हो सकती है। ब्लड प्रेशर के बढ़ जाने, या गर्भावस्था के 20 हफ्तों के बाद यूरीन में प्रोटीन बढ़ जाने से ये समस्या हो सकती है। अगर टखने और पैर की सूजन के साथ साथ, पेट में दर्द, सिरदर्द, बार-बार मूत्र त्यागने, उल्टी व मतली की समस्या भी हो तो तुंरत चिकित्सक की सलाह लें।
मोच के लिए घरेलू नुस्‍खे :- छोटी मोच को पूरी तरह ठीक होने में महीना भर या उससे कुछ ज्‍यादा वक्‍त लग जाता है। जल्‍द और बेहतर आराम पाने के लिए आप कुछ घरेलू उपाय भी आजमा सकते हैं- आपकी जिस टखने में मोच आयी है, उसे पूरा आराम दें। आपको चाहिए कि आप उस पैर पर अधिक वजन न डालें। लेटते समय अपने पैर को तकियों के ऊपर रखें। काम करते समय ऐसी शारीरिक गतिविधियां न करें, जिनसे आपकी टखने पर अधिक जोर पड़ने की संभावना हो। इसके बाद आप अपनी टखने के जोड़ पर आइस पैक लगायें। इससे सूजन और दर्द कम करने में मदद मिलेगी। इस आइस पैक को करीब 10 मिनट तक यूं ही छोड़ दें। इसके बाद आप उसे चोटिल हिस्‍से पर बांध सकते हैं। याद रखें ज्‍यादा टाइट न बांधें। आप अपनी टखने पर गर्म पट्टी भी बांध सकते हैं। यह काफी मददगार होती है। इससे आपकी टखने स्थिर रहती है। इससे टखने को और नुकसान नहीं होता। इससे सूजन भी कम होती है और आपको आराम होता है। हर्ब और मसाले, जैसे अदरक, हल्‍दी, काली मिर्च, तुलसी के पत्ते, अजमोद, मेंहदी, इलायची और लौंग आदि सूजन कम करने में काफी उपयोगी होते हैं। आप इन्‍हें मोच और सूजन पर लगा सकते हैं। इससे काफी आराम मिलेगा। रोटी को एक ओर से पकाइये, अब उस पर सरसों का तेल और हल्‍दी लगाइये। इससे मोच की सिंकाई करें। इससे आपको काफी फायदा होगा। गर्म दूध में थोड़ी सी हल्‍दी डालकर पीने से अंदरूनी चोट और सूजन में फायदा होता है।

किडनी फेल रोगी घबराएँ नहीं ,करें ये प्रभावशाली हर्बल उपचार


        
किडनी फेल्योर क्या है ?
     शरीर मे किडनी का मुख्य कार्य शुद्धिकरण का होता है| लेकिन किडनी के किसी रोग की वजह से जब दोनों गुर्दे अपना सामान्य कार्य करने मे अक्षम हो जाते हैं तो इस स्थिति को हम किडनी फेल्योर कहते हैं| खून मे क्रिएट्नीन और यूरिया की मात्रा की जांच से किडनी की कार्यक्षमता का पता चलता है| वैसे तो किडनी की क्षमता शरीर की आवश्यकता से ज्यादा होती है इसलिए गुर्दे को थोड़ा नुकसान हो भी जाये तो भी खून की जाच मे कोई खराबी देखने को नहीं मिलती है| जब रोग के कारण किडनी 50 प्रतिशत से ज्यादा खराब हो जाती तभी खून की जांच मे यूरिया और क्रिएट्नीन की बढ़ी हुई मात्रा का प्रदर्शन होता है|किडनी वास्तव में रक्त का शुद्धिकरण करने वाली एक प्रकार की 11 सैं.मी. लम्बी काजू के आकार की छननी है जो पेट के पृष्ठभाग में मेरुदण्ड के दोनों ओर स्थित होती हैं। प्राकृतिक रूप से स्वस्थ गुर्दे में रोज 60 लीटर जितना पानी छानने की क्षमता होती है। सामान्य रूप से वह 24 घंटे में से 1 से 2 लीटर जितना मूत्र बनाकर शरीर को निरोग रखती है। किसी कारणवश यदि एक गुर्दा कार्य करना बंद कर दे अथवा दुर्घटना में खो देना पड़े तो उस व्यक्ति का दूसरा गुर्दा पूरा कार्य सँभालता है एवं शरीर को विषाक्त होने से बचाकर स्वस्थ रखता है।
     गुर्दों का विशेष सम्बन्ध हृदय, फेफड़ों, यकृत एवं प्लीहा (तिल्ली) के साथ होता है। ज्यादातर हृदय एवं गुर्दे परस्पर सहयोग के साथ कार्य करते हैं। इसलिए जब किसी को हृदयरोग होता है तो उसके गुर्दे भी बिगड़ते हैं और जब गुर्दे बिगड़ते हैं तब उस व्यक्ति का रक्तचाप उच्च हो जाता है और धीरे-धीरे दुर्बल भी हो जाता है।गुर्दे के रोगियों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती ही जा रही है। इसका मुख्य कारण आजकल के समाज  मे हृदयरोग, दमा, श्वास, क्षयरोग,मधुमेह, उच्च रक्तचाप जैसे रोगों में किया जा रहा अंग्रेजी दवाओं का दीर्घकाल तक अथवा आजीवन सेवन है।
किडनी  अकर्मण्यता  के लक्षण-
1. उल्टी होना   2. भूख न लगाना  3. थकावट और कमजोरी महसूस होना  4. नींद की समस्या होना 5. पेशाब की मात्रा कम हो जाना  6. दिमाग ठीक से काम नहीं करना  7. हिचकी आना 8. मांसपेशयों मे खिंचाव और आक्षेप आना 
 9. पैरों और टखने मे सूजन आना 
 10. लगातार खुजली होने की समस्या 
11. हृदय मे पानी जमा होने पर छाती मे दर्द होना 
 12. हाई ब्ल प्रेशर जिसे से कट्रोल करना कठिन हो|

किडनी खराब करने  वाली 10 आदतें-

1) पेशाब आने पर करने न जाना (रोकना) 2) रोज 8 गिलास से कम पानी पीना 3) बहुत ज्यादा नमक खाना 4) उच्च रक्त चाप के ईलाज मे लापरवाही 5) शुगर के ईलाज मे लापरवाही 6) अधिक मांसाहार करना 7 दर्द नाशक(पेन किलर) दवाएं लगातार लेते रहना 8) ज्यादा शराब पीना 9) काम के बाद जरूरी मात्रा मे आराम नहीं करना 10) कोला , पेप्सी आदि साफ्ट ड्रिंक्स और सोडा पीना 
    हमारे गुर्दे रक्त में उपस्थित अपशिष्ट पदार्थों और जल को फ़िल्टर कर मूत्र के रूप में बाहर निकालने की क्रिया संपन्न करते हैं। हमारी मांसपेशियों में उपस्थित क्रिएटिन फ़ास्फ़ेटस के विखंडन से उर्जा उत्पन होती है और इसी प्रक्रिया में अपशिष्ट पदार्थ क्रिएटनीन बनता है । स्वस्थ गुर्दे अधिकांश क्रिएटनीन को फ़िल्टर कर मूत्र में निष्कासित करते रहते हैं। अगर खून में क्रिएटनीन का स्तर १.५ से ज्यादा हो जाता है तो समझा जाता है कि गुर्दे ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इसलिये खून में क्रिएटनीन की मात्रा का परीक्षण करना जरूरी होता है। अब मैं कुछ ऐसे उपाय बताना चाहूंगा जिनको व्यवहार में लाकर रोगी अपने खून मे क्रिटनीन की मात्रा घटा सकते हैं। ये ऊपाय गुर्दे का कार्य-भार कम करते हैं जिससे खून में उपस्थित क्रिएटनीन का लेविल कम होने में मदद मिलती है। क्रिएटनीन कम करने वाले भोजन में प्रोटीन, फ़ास्फ़ोरस,पोटेशियम,नमक की मात्रा बिल्कुल कम होने पर ध्यान दिया जाता है। जिन भोजन पदार्थों में इन तत्वों की अधिकता हो उनका परहेज करना आवश्यक है।
   जब उच्च प्रोटीन वाले खाद्य पदार्थ उपयोग नहीं किये जाएंगे तो मांसपेशियों में कम क्रिएटीन मौजूद रहेगा अत: क्रिएटनीन भी कम बनेगा। किडनी को भी अपशिष्ट पदार्थ को फ़िल्टर करने में कम ताकत लगानी पडेगी जिससे किडनी की तंदुरस्ती में इजाफ़ा होगा। याद रखने योग्य है कि क्रिएटिन के टूटने से ही क्रिएटनीन बनता है। एक और जहां उच्च क्रिएटनीन लेविल गुर्दे की गंभीर विकृति की ओर संकेत करता है वही शरीर में जल की कमी से समस्या और गंभीर हो जाती है। जल की कमी से रक्तगत क्रिएटनीन में वृद्धि होती है। अत: महिलाओं को २४ घंटे में २.५ लिटर तथा पुरुषों को ३.५ लिटर पानी पीने की सलाह दी जाती है। चाय ,काफ़ी में केफ़ीन तत्व ज्यादा होता है जो गुर्दे के स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है।अत: इनका सर्वथा परित्याग आवश्यक है।     मूत्र प्रणाली में कोई संक्रामक रोग हो जाने से भी रक्तगत क्रिएटनीन बढ सकता है। अत: इस विषय में सावधानी पूर्वक इलाज करवाना चाहिये। उच्च रक्त चाप से गुर्दे को रक्त पहुंचाने वाली नलिकाओं को नुकसान होता है। इससे भी रक्त गत क्रिएटनीन बढ जाता है। अत: ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने के उपाय करना जरूरी है।मेरा ब्लड प्रेशर संबंधी लेख ध्यान से पढें। नमक ३ ग्राम से ज्यादा हानिकारक है।<नियमित २० मिनिट व्यायाम करने और ३ किलोमिटर घूमने से खून में क्रिएटनीन की मात्रा काबू करने में मदद मिलती है।व्यायाम और घूमने के मामले में बिल्कुल आलस्य न करें ।     मधुमेह रोग धीरे -धीरे गुर्दे को नुकसान पहुंचाता रहता है। इसलिये यह रोग भी रक्तगत क्रिएटनीन को बढाने में अपनी भूमिका निर्वाह करता है। खून में शर्करा संतुलित बनाये रखने के उपाय आवश्यक हैं। डायबीटीज पर मेरा लेख पढें और तदनुसार उपाय करें।
   प्रोटीन हमारे शरीर के ऊतकों और मांसपेशियों के निर्माण में उपयोग होता है। इससे रोगों के विरुद्ध लडने में भी मदद मिलती है। जब प्रोटीन शारीरिक क्रियाओं के लिये टूटता है तो इससे यूरिया अपशिष्ट पदार्थ बनता है। अकर्मण्य अथवा क्षतिग्रस्त किडनी इस यूरिया को शरीर से बाहर नहीं निकाल पाती है। खून में यूरिया का स्तर बढने पर क्रिएटनीन भी बढेगा । मांस में और अंडों में किडनी के लिये सबसे ज्यादा हानिकारक प्रोटीन पाया जाता है।अत: किडनी रोगी को ये भोजन पदार्थ नहीं लेना चाहिये। प्रोटीन की पूर्ति थोडी मात्रा में दालो के माध्यम से कर सकते हैं।
* किडनी के सुचारु कार्य नहीं करने से खून में पोटेशियम का लेविल बहुत ज्यादा बढ जाता है। पोटेशियम की अधिकता से अचानक हार्ट अटेक होने की सम्भावना बढ जाती है। अगर लेबोरेटरी जांच में रक्त में पोटेशियम बढा हुआ पाया जाए तो कम पोटेशियम वाला खाना लेना चाहिये। *  पाईनेपल,शिमला मिर्च,पत्ता गोभी,फूल गोभी,लहसुन,प्याज,अंडे की सफेदी,जेतुन का तेल,मछली,, खीरा ककडी,गाजर,सेव,लाल अंगूर और सफ़ेद चावल  कम पोटेशियम वाले भोजन  पदार्थ हैं । * केला,तरबूज,किशमिस,पालक टमाटर, आलू बुखारा ,भूरे  चावल,संतरा,आलू का उपयोग वर्जित है।इनमे अधिक पोटेशियम पाया जाता है।लेकिन अगर पोटेशियम वांछित स्तर का हो तो इन फ़लों का इस्तेमाल किया जा सकता है।

क्रोनिक किडनी फेल्योर  के कारणों का उपचार - *डायबीटीज और उच्च रक्तचाप  का उचित इलाज | *पेशाब में इन्फेक्शन का  सही उपचार| *किडनी में पथरी  का हर्बल उपचार जो गुर्दे की कार्यक्षमता  बढाता हो| एलौपथिक पद्धति में  किडनी फेल्योर के लिए कोई  स्पेसिफिक  मेडिसिन नहीं है और  शुगर और ब्लड  प्रेशर  नियंत्रण  पर ही ज्यादा  ध्यान देते हैं|
* दामोदर चिकित्सालय रजि. की  हर्बल औषधि क्रोनिक किडनी फेल्योर में वरदान तुल्य  सिद्ध होती है| बढ़ा हुआ क्रिएटनिन और यूरिया  नीचे  आने लगता  है | 
विशिष्ट परामर्श-

किडनी फेल रोगी के बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता  बढ़ाने  में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| इस हेतु वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी कुछ केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -



लेटेस्ट  केस रिपोर्ट -26/10/2020

नाम किडनी फेल रोगी : अमरसिंगजी जुझार सींगजी  यादव 
स्थान : टाटका ,तहसील -सीतामऊ,जिला मंदसौर,मध्य प्रदेश 
इलाज से पहिले की टेस्ट रिपोर्ट 26/10/2020 के अनुसार 

serum Creatinine :7.18mg/dl

Urea                    :129mg/dl 





 यह औषधि लेते हुए 20 दिन बाद की स्थिति-

दिनांक-  15 /11/2020 की रिपोर्ट 

 

Serum creatinine :     2.18 mg/dl

urea:                          69  mg/dl  

तेजी से सुधार होते हुए स्थिति नॉर्मल होती जा रही है|
अभी इलाज जारी है| 


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इस औषधि के चमत्कारिक प्रभाव की एक लेटेस्ट  केस रिपोर्ट प्रस्तुत है-

रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी  
पता-मुन्नालाल मिल्स स्टोर ,नगर निगम के सामने वेंकेट रोड रीवा मध्यप्रदेश 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl


हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl











जांच रिपोर्ट -
 दिनांक -22/9/2017
 हेमोग्लोबिन-  12.4 ग्राम 
blood urea - 30 mg/dl 
सीरम क्रिएटिनिन- 1.0 mg/dl
Conclusion- All  investigations normal 





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 केस रिपोर्ट 2-
रोगी का नाम - Awdhesh 
निवासी - कानपुर 
ईलाज से पूर्व की रिपोर्ट
दिनांक - 26/4/2016
Urea- 55.14   mg/dl
creatinine-13.5   mg/dl 
यह हर्बल औषधि प्रयोग करने के 23 दिन बाद 17/5/2016 की सोनोग्राफी  रिपोर्ट  यूरिया और क्रेयटिनिन  नार्मल -
creatinine 1.34 mg/dl
urea 22  mg/dl















लेटेस्ट  केस रिपोर्ट -26/10/2020

नाम किडनी फेल रोगी : अमरसिंगजी जुझार सींगजी  यादव 
स्थान : टाटका ,तहसील -सीतामऊ,जिला मंदसौर,मध्य प्रदेश 
इलाज से पहिले की टेस्ट रिपोर्ट 26/10/2020 के अनुसार 

serum Creatinine :7.18mg/dl

Urea                    :129mg/dl 





 यह औषधि पीने के 20 दिन बाद की स्थिति-

दिनांक-  15 /11/2020 की रिपोर्ट 

Serum creatinine :     2.18 mg/dl

urea:                          68  mg/dl  




 यह औषधि पीने के 20 दिन बाद की स्थिति-

दिनांक-  15 /11/2020 की रिपोर्ट 

Serum creatinine :     2.18 mg/dl

urea:                          69  mg/dl  

तेजी से सुधार होते हुए स्थिति नॉर्मल होती जा रही है|
अभी इलाज जारी है| 






किडनी के मरीज क्या खाएँ- रोगी की किडनी कितने प्रतिशत काम रही है, उसी के हिसाब से उसे खाना दिया जाए तो किडनी की आगे और खराब होने से रोका जा सकता है :
1. प्रोटीन : 1 ग्राम प्रोटीन/किलो मरीज के वजन के हिसाब से लिया जा सकता है। नॉनवेज खाने वाले 1 अंडा, 30 ग्राम मछली, 30 ग्राम चिकन और वेज लोग 30 ग्राम पनीर, 1 कप दूध, 1/2 कप दही, 30 ग्राम दाल 
2. कैलरी : दिन भर में 7-10 सर्विंग कार्बोहाइड्रेट्स की ले सकते हैं।  1 सर्विंग बराबर होती है - 1 स्लाइस ब्रेड, 1/2 कप चावल या 1/2 कप पास्ता।
3. विटामिन : दिन भर में 2 फल और 1 कप सब्जी लें।
4. सोडियम : एक दिन में 1/4 छोटे चम्मच से ज्यादा नमक न लें। अगर खाने में नमक कम लगे तो नीबू, इलाइची, तुलसी आदि का इस्तेमाल स्वाद बढ़ाने के लिए करें। पैकेटबंद चीजें जैसे कि सॉस, आचार, चीज़, चिप्स, नमकीन आदि न लें।
5. फॉसफोरस : दूध, दूध से बनी चीजें, मछली, अंडा, मीट, बीन्स, नट्स आदि फॉसफोरस से भरपूर होते हैं इसलिए इन्हें सीमित मात्रा में ही लें।
6. कैल्शियम : दूध, दही, पनीर, फल और सब्जियां उचित मात्रा में लें। ज्यादा कैल्शियम किडनी में पथरी का कारण बन सकता है।
7. पोटैशियम : फल, सब्जियां, दूध, दही, मछली, अंडा, मीट में पोटैशियम काफी होता है। इनकी ज्यादा मात्रा किडनी पर बुरा असर डालती है। इसके लिए केला, संतरा, पपीता, अनार, किशमिश, भिंडी, पालक, टमाटर, मटर न लें। सेब, अंगूर, अनन्नास, तरबूज़, गोभी ,खीरा , मूली, गाजर ले सकते हैं।
8. फैट : खाना बनाने के लिए वेजिटेबल या ऑलिव आईल  का ही इस्तेमाल करें। बटर, घी और तली -भुनी चीजें न लें। फुल क्रीम दूध की जगह स्किम्ड दूध ही लें।
 9. तरल चीजें : शुरू में जब किडनी थोड़ी ही खराब होती है तब सामान्य मात्रा में तरल चीजें ली जा सकती हैं, पर जब किडनी काम करना कम कर दे तो तरल चीजों की मात्रा का ध्यान रखें। सोडा, जूस, शराब आदि न लें। किडनी की हालत देखते हुए पूरे दिन में 5-7 कप तरल चीजें ले सकते हैं।
 10. सही समय पर उचित मात्रा में जितना खाएं, पौष्टिक खाएं। 
11. अंकुरित मूंग किडनी खराब रोगी के लिए उत्तम आहार है| अंकुरित मूंग को भली प्रकार उबालकर जीवाणु रहित कर लेना चाहिए|


माईग्रेन रोग की जानकारी व उपचार



माइग्रेन की बीमारी काफी दर्दनाक, आवर्ती और गंभीर सिरदर्द की स्थिति है। यह किसी भी उम्र में व्यक्तियों को परेशान कर सकती है। महिलाओं को माइग्रेन होने की संभावना तीन गुना अधिक होती है। यदि कोई व्यक्ति गंभीर सिरदर्द का अनुभव करता है, जिसमें दर्द की आवृति नस के फड़कने के सामान होती है, तो यह माइग्रेन की स्थिति होती है, जिसका तुरंत इलाज किया जाना आवश्यक होता है। माइग्रेन के अनेक कारण हो सकते हैं। यह स्थिति अनेक प्रकार की न्यूरोलॉजिकल समस्याओं के उत्पन्न होने का कारण भी बन सकती है। अतः व्यक्तियों को माइग्रेन को ट्रिगर करने वाले कारकों के बारे में जानने और उनसे परहेज करने की आवश्यकता होती है।
माइग्रेन, गंभीर सिर दर्द की स्थिति है, जिसमें आमतौर पर सिर के एक तरफ गंभीर दर्द, स्पंदन के रूप में उत्पन्न होता है। माइग्रेन में कभी सिर के दाएं तो कभी बाएं हिस्से में अचानक दर्द होने लगता है। जिसे हम सर की गर्मी भी कहते हैं, मानसिक तनाव और कम नींद के कारण होने वाली यह समस्या पुरुषों की बजाए महिलाओं में ज्यादा देखी जाती है। इस रोग की सबसे बड़ी समस्या यह है कि इसमें दिन में अचनाक कभी भी तेज दर्द उभर आता है।
व्यक्तियों में माइग्रेन की स्थिति में उत्पन्न होने वाला दर्द, कई घंटों या दिनों तक बना रह सकता है। दर्द इतना गंभीर हो सकता है कि यह सम्बंधित व्यक्ति की दैनिक गतिविधियों में हस्तक्षेप उत्पन्न कर सकता है। माइग्रेन की बीमारी 15 से 55 वर्ष की आयु के लोगों को अधिक प्रभावित करती है। यह समस्या अक्सर मतली, उल्टी तथा प्रकाश और ध्वनि के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता के साथ उत्पन्न हो सकती है।
कुछ व्यक्तियों में माइग्रेन का सांकेतिक लक्षण औरा (aura) के रूप में जाना जाता है, जो सिरदर्द से पहले या उसके साथ उत्पन्न होता है। आभा (aura) में दृश्य गड़बड़ी शामिल हो सकती है, जैसे प्रकाश की चमक (flashes of light) और blind spots या अन्य गड़बड़ी, जैसे चेहरे के एक तरफ या हाथ या पैर में झुनझुनी और बोलने में कठिनाई इत्यादि।
माइग्रेन की स्थिति लोगों में एक गंभीर, स्थिर सिरदर्द का कारण बन सकती है। सिर का दर्द हल्के रूप में शुरू हो सकता है, और उपचार के बिना अधिक गंभीर हो जाता है।
व्यक्तियों में माइग्रेन का दर्द सबसे अधिक माथे (forehead) को प्रभावित करता है। यह दर्द आमतौर पर सिर के एक तरफ होता है, लेकिन यह दोनों तरफ शिफ्ट हो सकता है।
अधिकांशतः माइग्रेन लगभग 4 घंटे तक रहता है। यदि इलाज न किया जाये या उपचार प्रभावी न हो तो इस स्थिति में 72 घंटे से एक सप्ताह तक बना रह सकता है।
माइग्रेन कई प्रकार का हो सकता है। सबसे सामान्य माइग्रेन के प्रकारों में औरा के साथ माइग्रेन (migraine with aura) और औरा के बिना माइग्रेन (Migraine without aura) प्रमुख हैं।
औरा के साथ माइग्रेन – Migraine with aura in Hindi
इस प्रकार के माइग्रेन को क्लासिक माइग्रेन (classic migraine), जटिल माइग्रेन (complicated migraine) और नकसीर माइग्रेन (hemiplegic migraine) कहा जाता था। माइग्रेन की स्थिति में अनेक व्यक्ति औरा का अनुभव कर सकते हैं। औरा, सिरदर्द शुरू होने की चेतावनी के रूप में कार्य करता है। औरा (aura) का प्रत्येक लक्षण आमतौर पर पाँच मिनट से एक घंटे के बीच रहता है।
जब औरा के साथ माइग्रेन की स्थिति दृष्टि को प्रभावित करती है, तो रोगी ऐसी चीजों को देख सकता है जो कि वास्तव में नहीं हैं। वे अपने सामने की वस्तु के कुछ हिस्सों को भी नहीं देख सकते हैं या हिस्सा गायब हो जाता है, और फिर वापस आता है।
इस प्रकार के माइग्रेन की स्थिति में सिरदर्द शुरू होने से पहले व्यक्ति निम्न प्रकार के लक्षणों को महसूस कर सकता है, जैसे:
डबल विज़न
सुनने की समस्याएं
चक्कर आना
भाषण समस्याएं, इत्यादि।
औरा के बिना माइग्रेन – Migraine without aura in Hindi
इस प्रकार के माइग्रेन की स्थिति में पीड़ित व्यक्ति संवेदना में बिना कोई गड़बड़ी के माइग्रेन का अनुभव करता है। वर्तमान में 70 से 90 प्रतिशत माइग्रेन, औरा के बगैर उत्पन्न होते हैं। यदि इस स्थिति का इलाज नहीं किया जाए या उपचार सफल न हो, तब सिरदर्द का अटैक आमतौर पर 4 से 72 घंटे तक बना रहता है। दर्द स्पंदन के रूप में होता है, तथा सिर हिलाने-डुलाने या झुकाने के दौरान दर्द ओर भी बदतर हो जाता है।
माइग्रेन के अन्य प्रकार
माइग्रेन के अन्य प्रकार हैं:
क्रोनिक माइग्रेन (Chronic migraine) – इस प्रकार के माइग्रेन की स्थिति में माइग्रेन अटैक महीने के 15 दिनों में ट्रिगर होता है। इसे कभी-कभी गंभीर माइग्रेन भी कहा जाता है और दवाओं के अधिक उपयोग करने के कारण हो सकता है।
एक्यूट माइग्रेन (Acute migraine) – एक्यूट माइग्रेन को एपिसोडिक माइग्रेन (episodic migraine) के नाम से भी जाना जाता है, इस प्रकार के माइग्रेन की स्थिति में महीने में 14 दिन तक सिरदर्द होता है।
वेस्टिबुलर माइग्रेन (Vestibular migraine) – वर्टिगो से जुड़े माइग्रेन को वेस्टिबुलर माइग्रेन के रूप में जाना जाता है। माइग्रेन से पीड़ित लगभग 40 प्रतिशत लोगों में कुछ वेस्टिबुलर लक्षण प्रगट होते हैं। वेस्टिबुलर माइग्रेन की स्थिति में संतुलन खोने और चक्कर आने से सम्बंधित लक्षण प्रगट होते हैं।
मासिक धर्म माइग्रेन (Menstrual migraine) – यह तब होता है जब हमले मासिक धर्म चक्र से जुड़े पैटर्न में होते हैं।
हेमार्टेजिक माइग्रेन (Hemiplegic migraine) – यह अस्थायी अवधि के लिए शरीर के एक तरफ की कमजोरी का कारण बनता है।
माइग्रेन के साथ माइग्रेन आभा (Migraine with brainstem aura) – यह एक दुर्लभ प्रकार का माइग्रेन है, जो गंभीर रूप से न्यूरोलॉजिकल क्रियाओं को प्रभावित करता है।
मासिक धर्म माइग्रेन (Menstrual migraine) – मासिक धर्म से संबंधित माइग्रेन की स्थिति, माइग्रेन से पीड़ित महिलाओं में से 60 प्रतिशत महिलाओं को प्रभावित करता है। इस प्रकार का माइग्रेन मासिक धर्म के पहले, दौरान या मासिक धर्म के बाद में और ओव्यूलेशन के दौरान भी उत्पन्न हो सकता है
माइग्रेन के लक्षण
माइग्रेन एक गंभीर सिरदर्द है, जो अक्सर सिर के एक तरफ होता है। माइग्रेन के प्रारंभिक लक्षणों या संकेतों की पहचान कर, व्यक्ति इसको पूर्ण विकसित होने से पहले ही रोकने में सफलता प्राप्त कर सकता है।
यह माइग्रेन अक्सर बचपन, किशोरावस्था या वयस्कता के दौरान शुरू होता है, यह बीमारी चार चरणों के माध्यम से प्रगति कर सकती है, जो इस प्रकार हैं: प्रॉड्रोम (prodrome), औरा (aura), अटैक (attack) और पोस्टड्रोम (post-drome)। प्रत्येक व्यक्ति जो माइग्रेन से पीड़ित होता है, उसे इन सभी चरणों से गुजरना पड़ता है।
प्रॉड्रोम – prodrome
इस स्टेज में सिरदर्द शुरू होने के एक या दो दिन पहले, माइग्रेन के लक्षण प्रगट होने लगते हैं। प्रॉड्रोम माइग्रेन की स्थिति के दौरान निम्न लक्षणों को देखा जा सकता है: जैसे:
कब्ज (Constipation)
मूड में बदलाव या डिप्रेशन
भूख में कमी
गर्दन में अकड़न
चिड़चिड़ापन
थकान या ऊर्जा में कमी का अहसास होना
प्यास और पेशाब में वृद्धि होना
बार-बार जम्हाई आना, इत्यादि।
औरा – Aura
कुछ व्यक्ति, माइग्रेन से ठीक पहले या माइग्रेन के दौरान औरा स्टेज से सम्बंधित लक्षणों को महसूस कर सकते हैं। माइग्रेन की औरा स्टेज में तंत्रिका तंत्र की गड़बड़ी से संबंधित लक्षण उत्पन्न होते हैं। इस स्टेज से सम्बंधित लक्षणों को आमतौर पर देखा जा सकता है। प्रत्येक लक्षण आमतौर पर धीरे-धीरे शुरू होते हैं और 20 से 60 मिनट तक रहते हैं। माइग्रेन औरा के लक्षणों में शामिल हैं:
दृश्य से सम्बंधित समस्याएं, जैसे चमकीले धब्बे (bright spots) या प्रकाश की चमक (light flashes), इत्यादि
अस्थायी रूप से दृष्टि खोना
चेहरे, हाथों या पैरों में चुभन, झुनझुनी या सुन्नता महसूस होना
चेहरे या शरीर के एक तरफ कमजोरी महसूस होना
स्पष्ट रूप से बोलने में कठिनाई होना, इत्यादि।
अटैक – Attack
औरा स्टेज के बाद माइग्रेन अटैक की स्थिति उत्पन्न होती है। यह वास्तविक माइग्रेन का सबसे तीव्र या गंभीर चरण (स्टेज) है। माइग्रेन अटैक की स्थिति में उत्पन्न होने वाले लक्षण, आमतौर पर चार से 72 घंटे तक रह सकते हैं। माइग्रेन के लक्षण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भिन्न हो सकते हैं, अटैक की स्थिति में माइग्रेन के कुछ प्रमुख लक्षण निम्न हैं, जैसे:
दर्द आमतौर पर सिर के एक तरफ होता है, लेकिन अक्सर दोनों तरफ महसूस किया जा सकता है
स्पंदन के रूप में दर्द का अनुभव
प्रकाश, ध्वनि और कभी-कभी गंध के प्रति संवेदनशीलता बढ़ जाना
जी मिचलाना और उल्टी की समस्या
चक्कर या बेहोशी आना, इत्यादि।
पोस्टड्रोम – postdrome
माइग्रेन की अटैक स्टेज के बाद, एक व्यक्ति अक्सर पोस्टड्रोम स्टेज का अनुभव करता है। इस स्टेज (चरण) के दौरान, आमतौर पर निम्न लक्षणों को महसूस किया जा सकता है, जैसे
भ्रमित होना
मूड और भावनाओं में परिवर्तन
ख़ामोशी महसूस करना
थकावट और उदासीन महसूस होना
हल्का, सुस्त सिरदर्द बना रहना, इत्यादि।
माइग्रेन का कारण
माइग्रेन का अभी तक कोई भी ज्ञात कारण नहीं है। हालांकि शोधकर्ताओं ने माइग्रेन की बीमारी को ट्रिगर करने वाले कुछ कारकों का पता लगाया है, जिसमें मस्तिष्क रसायनों में परिवर्तन (सेरोटोनिन के स्तर में कमी) और मस्तिष्क की असामान्य गतिविधियों को शामिल किया गया है। इसके साथ ही माइग्रेन के विकास में आनुवांशिकी और पर्यावरणीय कारक की एक अहम् भूमिका रहती है। माइग्रेन का कारण बनने वाले या इस स्थिति को ट्रिगर करने वाले कारकों में निम्न को शामिल किया जा सकता है, जैसे:
हार्मोनल परिवर्तन – हार्मोन के बदलते स्तर के कारण महिलाओं को मासिक धर्म, गर्भावस्था और रजोनिवृत्ति के दौरान माइग्रेन के लक्षणों का अनुभव हो सकता है।
भावनात्मक कारक – तनाव, अवसाद, चिंता, उत्तेजना (उत्सुकता) और सदमा इत्यादि भावनात्मक विकार माइग्रेन का कारण बन सकते हैं।
शारीरिक कारण – थकान और अपर्याप्त नींद, कंधे या गर्दन में तनाव, खराब मुद्रा (आसन) और तीव्र शारीरिक परिश्रम, ये सभी माइग्रेन को ट्रिगर कर सकते हैं। लो ब्लड शुगर और जेट लेग सिंड्रोम (विमान यात्रा से हुई थकान) भी माइग्रेन का कारण बन सकती हैं।
आहार संबंधी कारक – शराब और कैफीन माइग्रेन को ट्रिगर करने में योगदान दे सकते हैं। कुछ विशिष्ट खाद्य पदार्थों भी माइग्रेन के जोखिम को बढ़ा सकते हैं, जिसमें चॉकलेट, पनीर, खट्टे फल और टायरामाइन युक्त खाद्य पदार्थ इत्यादि शामिल हैं।
दवाएं – कुछ नींद की गोलियां, हार्मोन रिप्लेसमेंट थेरेपी (एचआरटी) दवाएं और मिश्रित गर्भनिरोधक गोली (contraceptive pill) आदि को माइग्रेन के संभावित कारकों में शामिल किया गया है।
पर्यावरणीय कारक – कुछ पर्यावरणीय कारक भी माइग्रेन के जोखिम को बढ़ाने में मदद कर सकते हैं, जिनमें शामिल हैं:
तीव्र गंध जैसे- इत्र, पेंट थिनर, सेकंड हैंड स्मोक, इत्यादि
तेज आवाज या शोर,
तापमान में परिवर्तन और तेज रोशनी या सूरज की चकाचौंध, इत्यादि
माइग्रेन अक्सर अज्ञात और अनुपचारित होते हैं। यदि किसी व्यक्ति को नियमित रूप से माइग्रेन के संकेत और लक्षण महसूस होते हैं, तो इसके इलाज के लिए तुरंत डॉक्टर से परामर्श लेना चाहिए, इन लक्षणों में शामिल हैं:
अचानक तीव्र सिर दर्द या दर्द के पैटर्न में बदलाव महसूस होना
बुखार के साथ सिरदर्द
गर्दन में अकड़न
मानसिक भ्रम
दौरे
दोहरी दृष्टि
सुन्नता या बोलने में परेशानी, इत्यादि।
माइग्रेन का इलाज – Migraine treatment in Hindi
वर्तमान में माइग्रेन का कोई भी उपयुक्त इलाज नहीं है। इलाज के माध्यम से माइग्रेन के अटैक को रोकने, और उत्पन्न होने वाले लक्षणों को कम करने का लक्ष्य रखा जाता है, इसके लिए डॉक्टर दर्द निवारक और प्रिवेंटिव मेडिसिन (Preventive medications) की सहायता ले सकता है।
डॉक्टर द्वारा सिफारिश की जाने वाली ओवर-द-काउंटर दवाएं, माइग्रेन से पीड़ित व्यक्तियों में दर्द को कम करने में मदद कर सकती हैं। ओवर-द-काउंटर दवाओं के अंतर्गत एस्पिरिन या इबुप्रोफेन (एडविल, मोट्रिन आईबी) को शामिल किया जा सकता है। अधिक समय तक उपयोग किये जाने पर ये दवाएं सिरदर्द, अल्सर और जठरांत्र संबंधी मार्ग में रक्तस्राव का कारण बन सकती है।
डॉ. द्वारा मरीज के लिए माइग्रेन से राहत प्रदान करने के लिए कैफीन, एस्पिरिन और एसिटामिनोफेन (acetaminophen) दवाओं की सिफारिश की जा सकती है।
डॉक्टर द्वारा माइग्रेन के इलाज में Triptans, Dihydroergotamine दवाओं का भी उपयोग किया जा सकता है।
माइग्रेन की रोकथाम के लिए दवाएं
माइग्रेन को ट्रिगर करने वाली स्थितियों को कम करने वाली दवाओं का उपयोग कर माइग्रेन की रोकथाम और उपचार में सफलता प्राप्त की जा सकती है, इन दवाओं में शामिल हैं:
रक्तचाप कम करने वाली दवाएं – रक्तचाप कम करने वाली दवाओं में प्रोप्रानोलोल (propranolol) और मेटोप्रोलोल टारट्रेट (metoprolol tartrate) जैसे बीटा ब्लॉकर्स शामिल हैं। कैल्शियम चैनल ब्लॉकर्स जैसे- वेरापामिल (verapamil) दवाएं औरा (aura) के साथ उत्पन्न होने वाले माइग्रेन की स्थिति को रोकने में मददगार कर सकती हैं।
एंटीडिप्रेसेंट – एक ट्राइसाइक्लिक एंटीडिप्रेसेंट (एमिट्रिप्टीलिन) ड्रग (tricyclic antidepressant), माइग्रेन को रोकने में सहायक हो सकता है।
एंटी सीज़र दवाएं (Anti-seizure drugs) – वैल्प्रोएट (Valproate (Depacon)) और टोपिरामेट (Topiramate (Topamax)) आदि दवाएं माइग्रेन की आवृति को कम करने में मदद कर सकती हैं, लेकिन ये दवाएं अनेक दुष्प्रभाव जैसे- चक्कर आना, वजन में बदलाव, जी मिचलाना, इत्यादि का कारण बन सकती हैं।
बोटॉक्स इंजेक्शन – बोटोक्स इंजेक्शन कुछ वयस्कों में हर 12 सप्ताह के लिए माइग्रेन को रोकने में मदद कर सकता है।
कैल्सीटोनिन जीन-संबंधी पेप्टाइड (CGRP) मोनोक्लोनल एंटीबॉडी – माइग्रेन का इलाज करने के लिए इन दवाओं का उपयोग किया जा सकता है। इन्हें मासिक इंजेक्शन के रूप में दिया जा सकता है।
माइग्रेन से बचने के घरेलू उपाय
कोई भी व्यक्ति जीवनशैली में बदलाव कर, माइग्रेन की आवृत्ति को रोकने में सफलता प्राप्त कर सकता है, जिसमें शामिल हैं:
पर्याप्त नींद लें
धूम्रपान न करें
सोने और खाने की एक स्वास्थ्य दिनचर्या बनायें
तनाव कम करें
हाइड्रेटेड रहने के लिए अधिक मात्रा में पानी पिए या तरल पदार्थ का सेवन करें
कुछ खाद्य पदार्थों जैसे- शराब और कैफीन से परहेज
नियमित रूप से शारीरिक व्यायाम करें।
जब माइग्रेन के लक्षण शुरू होते हैं, तो शांत, अंधेरे कमरे में जाने की कोशिश करें, आँखें बंद करें और आराम करें।
एक ठंडे कपड़े या बर्फ के पैक को तौलिया में लपेटकर अपने माथे पर या गर्दन के पीछे रखें।
सिरदर्द से सम्बंधित लक्षणों को डायरी में नोट करें, इससे दर्द को बढ़ाने वाले कारकों के बारे में जाननें में सहायता मिलेगी।
माइग्रेन में क्या खाएं
एक स्वस्थ आहार का सेवन कर पीड़ित व्यक्ति माइग्रेन को कम करने में सफलता प्राप्त कर सकता है। एक स्वस्थ माइग्रेन आहार के रूप में ताजे खाद्य पदार्थों को शामिल किया जा सकता है, जो कि निम्न हैं:
फल जैसे- चेरी और क्रैनबेरी
सब्जियां जैसे- समर स्क्वैश (summer squash), शकरकंद, गाजर, और पालक
साबुत अनाज
लीन प्रोटीन (lean proteins), इत्यादि।
माइग्रेन में परहेज
माइग्रेन बीमारी की स्थिति में कुछ खाद्य पदार्थों से परहेज करने की सिफारिश की जाती है, जो माइग्रेन की स्थित को ट्रिगर कर सकती है। इनमें शामिल हो सकते हैं:
शराब या कैफीन युक्त पेय
खाद्य योजक (food additives), जैसे- नाइट्रेट (nitrates), एस्पार्टेम (aspartame), या मोनोसोडियम ग्लूटामेट (monosodium glutamate)
टायरामाइन (tyramine) युक्त खाद्य पदार्थ
खट्टे फल
दुग्ध उत्पाद, चॉकलेट
नट्स
लाइमा बीन्स (lima beans)
नेवी बीन (navy beans)
प्याज
सौकरकूट (sauerkraut)
एज्ड चीज़ (aged cheeses), सॉरेक्राट (sauerkraut) और सोया सॉस (soy sauce), इत्यादि।