16.6.17

छोटे बच्चों के रोग और उपचार



छोटे बच्चों को बड़ी जल्दी बीमारियां घेरने लगती है। कई बार बच्चे के रोगों का पता भी नहीं चल पाता है कि वह किस समस्या से परेशान है। सामान्य परेशानियां जैसे प्रायः पेट फूलना, चुनचुने लगना, जुकाम, पेट में एठन होना मुख्य समस्याएं हैं जिनके बारे में बच्चे की मां को पता होना चाहिए। इन लक्षणों (symptoms of children’s diseases) के आधार पर पर नवजात बच्चों की बीमारी का पता लगाया जा सकता है।
* बीमारी के शुरूआत में शिशु में चिड़चिड़े पन के साथ रोने लगता है।

* मां का दूध भी न पीना। या पीने के बाद उल्टी कर देना।
* मल त्याग न कर पाना।
*बच्चे के किसी भाग में दर्द होना और उस भाग का लाल और कड़ा होना तथा उसे छूने पर बच्चे का रोना। समय रहते रोगों के लक्षणों की पहचान से बच्चे को रोगों से बचाया जा सकता है।
* शिशु में बेचैनी का बढ़ना।
* शिशु का सुस्त और निढाल सा होना।
*मां की गोद में भी न आना।
* बच्चे की त्वचा का शुष्क होना।
कब्ज
शिशु को समय पर शैच का न आना।
मल का सख्त और उसका कठिनता से निकलना।
कारण
शिशु का दूध अधिक पीना या कम पीने की वजह से कब्ज होती है।
पेट में विकार होने से भी कब्ज हो सकती है।
इलाज
शिशु को गुनगुना जल पीलाएं।
उपर के दूध में छुआरा या मुनक्का उबाल कर बच्चे को दे सकते हो।
देशी जन्म घुटी बच्चे को देनी चाहिए।
शिुशु को पालक का साग मसलकर खिलाना चाहिए।
बच्चों को दस्त संबंधी रोग सबसे अधिक होते हैं। एैसी अवस्था में बच्चे को दूध भी नहीं पच पाता है। बच्चों के दस्त दो प्रकार के होते हैं।
पहले प्रकार के दस्त
इस प्रकार के दस्त में बच्चे को शैच में ही सफेद रंग की बुंदकिया होती है।
कभी शैच राख के रंग की तरह होता है।
कारण
दूध अधिक मात्रा में पी जाना।
दूध में चिकनाई का अधिक होना।
उपचार
एैसे में दूध की मात्रा कम कर दें।
दूध में थोड़ा पानी मिलाकर दूध को हल्का कर देना चाहिए।
दस्त के दूसरे प्रकार
लक्षण
दस्तों का झागदार होना।
कारण
दूध में चीनी अधिक डालना।
 

दूध में उबला पानी मिलाकर शिशु को पिलाना चाहिए।
दस्त के तीसरे प्रकार
लक्षण
तीसरी प्रकार के दस्त में बच्चों को पतले और हरे रंग के दस्त होते हैं।
कारण
बच्चे को डिब्बे या भैंस का दूध हजम नहीं होना।
शिशु के द्वारा कम मात्रा में दूध सेवन करना भी दस्त का कारण बन सकता है।
उपचार
भैसं का दूध शिशु को न दें। मां का दूध का सेवन कराएं
शिशु के दूध की मात्रा बढ़ा दें और बच्चे की मां को दलिये का सेवन करना चाहिए।
पेट में पीड़ा होना
लक्षण
पेट का फूल जाना।
पेट में पीड़ा या शूल रहना।
कारण
दूध में शक्कर या प्रोटीन की ज्यादा मात्रा होना इस रोग का कारण बनती है।
इलाज
शिशु को बकरी का दूध का सेवन कराएं।
शिशु के पेट की सिकाई करें।
शिशु को दूध में शक्कर डालकर देना चाहिए।
शिशु को दूध में पानी मिलाकर देना चाहिए।
ऐठन होना
ऐठन होने पर शिशु का चेहरा पीला पड़ जाता है। और शिशु की मांसपेशियों में खिंचाव आने लगता है।
उपचार
शिशु को दूसरे बच्चों से दूर रखें।
शिशु के कपड़ों को ढीला कर लें।
शिशु को ठंड से बचायें।
सूखा रोग
इस रोग में शिशु पीला पड़ जाता है। और उसकी त्वचा पर झुर्रियां या सिकुड़ने आदि पड़ने लगती है। सूखा रोग में शिशु का वजन कम हो जाता है साथ ही वह हड्डियों का ढांचा मात्र लगने लगता हैं। शिशु के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने लगता है। इसका सबसे बड़ा कारण है विटामिन सी की शरीर में कमी। इस रोग से बचाव में शिशु का विटामिन सी वाले पदार्थ देते रहना चाहिए।
शिशु का उल्टी होना
शिशु को यदि उल्टी हो रही हो तो उसे नियमित रूप से ओआरएस का घोल पिलाएं। सबसे पहले आप ओआरएस के घोल को उबाल कर ठंडा करके शिशु को पिलाते रहें। आप केवल 24 घंटे तक एक घोल का इस्तेमाल कर सकते हैं। उसके बाद दूसरा घोल बनाकर शिशु को दें।
किस तरह से करें शिशु की देखभाल बीमारी में
मां को चाहिए कि वे अपने बच्चे को स्तनपान करवाती रहे।
दांत निकलने से बच्चे को होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए बच्चे को सुबह के समय में शहद चटाएं। शहद बच्चे को हर प्रकार की समस्या से बचाता है।
बच्चे की तेल से मालिश करें। दो साल से कम उम्र के बच्चे की मालिश रात को सोने से पहले जैतून के तेल से करें।
बुखार होने पर बच्चे को खूब पानी दें। उल्टी होने पर भी बच्चे को पानी जरूर दें। शरीर में पानी कम कमी से बच्चे की जान को खतरा हो सकता है।
बच्चे को मोटे कपड़े ना पहनाएं। जितना हो सके हल्के कपड़ो को ही बच्चे को पहनाएं।
बुखार के समसय में गीले मोंजों को बच्चे के पैरों पर रख दें। और मोजे सूखने पर दोबारा इस क्रिया को दोहराएं।

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