फेफड़े को तंदुरुस्त रखने के योग आसन //Yoga posture of keeping lungs fit




    अपने फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए आपको धूम्रपान से दूर रहना चाहिए ये तो आपको मालूम ही होगा। लेकिन इसके अलावा आप अपने फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए योग का सहारा भी ले सकते हैं। योग आपकी छाती की मांसपेशियों को मज़बूत करता है, आपके फेफड़ों की क्षमता को बढ़ाता है और साथ ही, आप बेहतर तरीके से ऑक्सीजन ले सकते हैं। सेलेब्रिटी योग एक्सपर्ट सुनैना रेखी कुछ ऐसे योग के आसन बता रही हैं जिनके लगातार अभ्यास से आप अपने फेफड़ों का स्वास्थ्य बेहतर बना सकते हैं।

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मत्स्यासन

मत्स्यासन शरीर में रक्त के संचरण में मदद करता है जिससे सभी अंगों तक रक्त पहुं पाता है। यह गहरी सांस लेने के लिए प्रेरित करता है जिसकी वजह से फेफड़े स्वस्थ रहते हैं। इस आसन को करने से सांस के सभी रोगों में फायदा होता है।

विधि

• पेट के बल सीधा लेट जाएं।
• पैर सीधे रखें और हाथ बगल में सीधे फैला लें।
• एक-एक करके दोनों तरफ के कूल्हे को उठाकर हाथ उनके नीचे रख लें।
• सांस बाहर छोड़ते हुए अपने शरीर के ऊपरी हिस्से को ऊपर उठाएं।
• अपनी छाती को ऊपर उठाएं और गर्दन को पीछे की तरफ मोड़ दें।
• कुछ सेकेंड्स के लिए इसी मुद्रा में रहें, फिर वापस आराम से लेट जाएं।

योग मुद्रा

योग की इस मुद्रा से रक्त का प्रवाह फेफड़ों की तरफ होता है जिससे फेफड़ों की कोशिकाओं से टॉक्सिन्स बाहर निकल जाते हैं। इस आसन से आपको शारीरिक और मानसिक संतुलन बनाने व ध्यान केंद्रित करने में भी मदद मिलती है।
• अपनी दाएं हाथ की कलाई बाएं हाथ से पीछे ले जाकर पकड़ें।
• अंदर सांस लें, कंधों को खींचकर पीछे की और रखें और छाती को बाहर की ओर ले जाएं।
• अब सांस बाहर निकालते हुए आगे की तरफ झुकें। अपने माथे को दाएं घुटने से छुएं।
• अब सांस अंदर लेते हुए शुरुआती मुद्रा में आ जाएं।
• इस मुद्रा को फिर से बाएं घुटने के साथ करें।

नाड़ी शोधन प्राणायाम


इस गहन श्वसन तकनीक का आपके श्वसन प्रणाली में सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। ऐसा देखा गया है कि इस आसन का अभ्यास करने से अस्थमा के मरीजों को काफी आराम हुआ है।
• रीढ़ की हड्डी और कंधों को सीधा करके बैठें। रखें। गर्दन सीधी और ठोड़ी थोड़ी नीचे झुकी हुई हो। आंखें बंद रखें।
• अब सीधे हाथ की दोनों पहली उंगलियां ललाट पर रखें। गहरी श्वास लेकर अपनी सांसों को सामान्य करें। अपने अंगूठे को दायीं नासिका पर और अंतिम दोनों उंगलियों को बायीं नासिका पर रखें।
• दायीं नासिका को अंगूठे से बंद करके बायीं नासिका से श्वास को अंदर लें। इसके बाद बायीं नासिका को भी बंद करें।
• इस अवस्था को आंतरिक कुंभक कहा जाता है, ऐसा कुछ ही क्षण करें। फिर दायीं नासिका से अंगूठे को हटा कर श्वास को धीमे-धीमे बाहर निकालें, इस समय बायीं नासिका बंद हो।
• अपना ध्यान श्वास पर ही रखें। इसी प्रक्रिया को अब उल्टा करें। बायीं नासिका को बंद करके दायीं से श्वास भरें ओर बायीं निकालें। इसे नाड़ी शोधन प्राणायाम का एक पूरा राउंड कहा जाता है।

अर्ध मत्स्येन्द्रासन

यह आसन विशेष रूप से आपके फेफड़ों की सांस लेने और ऑक्सिजन को अधिक समय तक रोकने की क्षमता को बढ़ाने का काम करता है। साथ ही यह रीढ़ को आराम देता है और पीठ दर्द या पीठ संबंधी परेशानियों से निजात दिलाता है।

विधि

• पैरों को सामने की तरफ फैलाकर बैठ जाएं, रीढ़ तनी हो और दोनों पैर एक-दूसरे से लगे हों।
• अपने बाएँ पैर को मोड़ें और उसकी एड़ी को पुष्टिका के दाएं हिस्से की और ले जाएं।
• अब दाएं पैर को बाएँ पैर की ओर लाएं और बायाँ हाथ दाएं घुटनों पर और दायाँ हाथ पीछे ले जाएं।
• कमर, कन्धों और गर्दन को इस क्रम में दाईं और मोड़ें।

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• लम्बी साँसे लें और छोड़ें।
• शुरुआती मुद्रा में आने के लिए सांस छोड़ना जारी रखें, पहले पीछे स्थित दाएं हाथ को यथावत लाएं, फिर कमर सीधी करें, फिर छाती और अंत में गर्दन।
• अब इसी प्रक्रिया को दूसरी दिशा में करें।

पद्म सर्वांगासन

पद्म सर्वांगासन आपके रक्त को शुद्ध करता है और आपके फेफड़ों में पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन भेजता है। इस आसन को करते हुए आपको सांस लेने की गुणवत्ता पर ध्यान देना चाहिए।

विधि

• सलंब सर्वांगासन से शुरुआत करें।
• जब आप सांस बाहर छोड़ें, घुटने मोड़ लें और वो भी इस प्रकार की आपकी दाहिनी एड़ी बायीं जांघ पर और बाई एड़ी दाहिनी जांघ पर हो।
• सांस अंदर लें और अब पैरों को छत की तरफ फैलाएं। कोशिश करें कि कूल्हे आगे की तरफ हों और घुटने एक दूसरे के करीब।
• कुछ देर इसी मुद्रा में रहें फिर पैर खोल लें और धीरे धीरे शरीर को नीचे की तरफ ले आएं।

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भस्त्रिका प्राणायाम करने की विधि और लाभ


    

      भस्त्रिका प्राणायाम भस्त्र शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है ‘धौंकनी’। वास्तविक तौर पर यह प्राणायाम एक भस्त्र या धौंकनी की तरह कार्य करता है। धौंकनी के जोड़े की तरह ही यह ताप को हवा देता है, भौतिक औऱ सूक्ष्म शरीर को गर्म करता है। जहाँ तक बात रही भस्त्रिका प्राणायाम की परिभाषा की तो यह एक ऐसी प्राणायाम है जिसमें लगातार तेजी से बलपूर्वक श्वास लिया और छोड़ा जाता है। जैसे लोहार धौंकनी को लगातार तेजी से चलाता है, उसी तरह लगातार तेजी से बलपूर्वक श्वास ली और छोड़ी जाती है। योग ग्रन्थ हठप्रदीपिका में इस प्राणायाम को विस्तार से समझाया गया है (2/59-65)। दूसरी योग ग्रन्थ घेरंडसंहिता में इसको इस प्रकार व्याख्या किया गया है।

भस्त्रैव लौहकाराणां यथा क्रमेण सम्भ्रमेत्।
तथा वायुं च नासाभ्यामुभाभ्यां चालयेच्छनैः।। – घें. सं. 5/75


इस श्लोक का मतलब होता है जिस तरह लोहार की धौंकनी लगातार फुलती और पिचकती रहती है, उसी तरह दोनों नासिकाओं से धीरे-धीरे वायु अंदर लीजिए और पेट को फैलाइए, उसके बाद गर्जना के साथ इसे तेजी से बाहर फेंकिए।
भस्त्रिका प्राणायाम करने की विधि-
अब बात आती है कि भस्त्रिका प्राणायाम कैसे किया जाए। यहां पर इसको सरल तौर पर समझाया गया है जिसके मदद से आप इसको आसानी से कर सकते है।
सबसे पहले आप पद्मासन में बैठ जाए। अगर पद्मासन में न बैठ पाये तो किसी आराम अवस्था में बैठें लेकिन ध्यान रहे आपकी शरीर, गर्दन और सिर सीधा हो।
शुरू शुरू में धीरे धीरे सांस लें।
और इस सांस को बलपूर्वक छोड़े।
अब बलपूर्वक सांस लें और बलपूर्वक सांस छोड़े।
 
यह क्रिया लोहार की धौंकनी की तरह फुलाते और पिचकाते हुए होना चाहिए।
इस तरह से तेजी के साथ 10 बार बलपूर्वक श्वास लें और छोड़ें।
इस अभ्यास के दौरान आपकी ध्वनि साँप की हिसिंग की तरह होनी चाहिए।
10 बार श्वसन के पश्चात, अंत में श्वास छोड़ने के बाद यथासंभव गहरा श्वास लें। श्वास को रोककर (कुंभक) करें।
फिर उसे धीरे-धीरे श्वास को छोड़े।
इस गहरे श्वास छोड़ने के बाद भस्त्रिका प्राणायाम का एक चक्र पूरा हुआ।
इस तरह से आप 10 चक्र करें।
भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ
पेट की चर्बी कम करने के लिए:
 भस्त्रिका प्राणायाम ही एक ऐसी प्राणायाम है जो पेट की चर्बी को कम करने के लिए प्रभावी है। लेकिन इसकी प्रैक्टिस लगातार जरूरी है।
वजन घटाने के लिए: 
यही एक ऐसी प्राणायाम है जो आपके वजन कम कर सकता है। लेकिन पेट की चर्बी एवम वजन कम करने के लिए यह तब प्रभावी है जब इसको प्रतिदिन 10 से 15 मिनट तक किया जाए।
अस्थमा के लिए: 
भस्त्रिका प्राणायाम अस्थमा रोगियों के लिए बहुत ही उम्दा योगाभ्यास है। कहा जाता है की नियमित रूप से इस प्राणायाम का अभ्यास करने से अस्थमा कम ही नहीं होगा बल्कि हमेशा हमेशा के लिए इसका उन्मूलन हो जायेगा।
गले की सूजन: 
इस योग के अभ्यास से गले की सूजन में बहुत राहत मिलती है।
बलगम से  निजात: 
यह जठरानल को बढ़ाता है, बलगम को खत्म करता है, नाक और सीने की बीमारियों को दूर करता है।
भूख बढ़ाने के लिए: 
इसके प्रैक्टिस से भूख बढ़ाता है।
शरीर को गर्मी देता है :
 हठप्रदीपिका 2/65 के अनुसार वायु, पित्त और बलगम की अधिकता से होनी वाली बीमारियों को दूर करता है और शरीर को गर्मी प्रदान करता है।
नाड़ी प्रवाह के लिए उत्तम: 
यह प्राणायाम नाड़ी प्रवाह को शुद्ध करता है। सभी कुंभकों में भस्त्रिका कुंभक सबसे लाभकारी होता है।
कुंडलिनी जागरण में सहायक: 
यह तीन ग्रंथियों ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि और रुद्रग्रंथि को तोड़ने के लिए प्राण को सक्षम बनाता है। ये ग्रंथियां सुसुम्ना में होती हैं। ये तेजी से कुंडलिनी जागृत करती हैं। (हठप्रदीपिका 2/66-67)
श्वास समस्या दूर करना
यह श्वास से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए सबसे अच्छा प्राणायाम है।
भस्त्रिका प्राणायाम के सावधानियां
भस्त्रिका प्राणायाम उच्च रक्तचाप वाले व्यक्ति को नहीं करनी चाहिए।
हृदय रोग, सिर चकराना, मस्तिष्क ट्यूमर, मोतियाबिंद, आंत या पेट के अल्सर या पेचिश के मरीजों के ये प्राणायाम नहीं करना चाहिए।

अनुलोम विलोम प्राणायाम करने की विधि और फायदे



अनुलोम विलोम एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्राणायाम है| इस प्राणायाम में सांस लेने की क्रिया को बार बार किया जाता है| अनुलोम का मतलब होता है सीधा और विलोम का मतलब होता है उल्टा। इस प्राणायाम याने की अनुलोम विलोम में नाक के दाएं छिद्र से सांस को खींचते हैं, और बायीं नाक के छिद्र से सांस को बाहर निकालते है।
अनुलोम विलोम प्राणायम को नाड़ी शोधक प्राणायम के नाम से भी जान जाता है| इस आसान को करने के लिए उम्र का बंधन नहीं है, हर उम्र के व्यक्ति इसका लाभ उठा सकते है| इसे नियमित रूप से करने पर शरीर की सारी नाडि़यां शुद्ध व निरोग रहती हैं। इसके अलावा इस आसान को करने से सर्दी, जुकाम व दमा में भी काफी राहत मिलती है|
अनुलोम विलोम प्राणायाम करने की विधि
अनुलोम विलोम प्राणायम को करने के लिए किसी भी स्तिथि जैसे सुखासन, सिद्धासन या फिर वज्रासन में बैठें।
 
अनुलोम विलोम आसन की शुरुवात हमेशा नाक के बाये छिद्र से करनी है|
सबसे पहले हाथो की उंगलियो की सहायता से नाक का दाया छिद्र बंद करें व बाये छिद्र से लंबी सांस लें|
इसके पश्चात बाये छिद्र को बंद करके, दाये वाले छिद्र से लम्बी सांस को छोड़े|
इस प्रक्रिया को कम से कम 10-15 मिनट तक दोहराइए|
सांस लेते समय आपको अपना ध्यान दोनो आँखो के बीच मे स्थित आज्ञा चक्र पर एकत्रित करना होता है|
बस लम्बी लम्बी साँसे लेते जाइये और मन में ओम मंत्र का जाप करते जाइये|
शुरुवात में इसे योग प्रशिक्षक के निर्देश में किया जाए तो बेहतर है।
यदि आप एनीमिया से पीड़ित है तो इसे करने से पहले चिकित्सक से उचित सलाह ले|
साँस को छोड़ने और लेने का काम सहजता से करे| गलत तरीके से या फिर जल्दी बाजी में इसे करने से उल्टा शरीर को नुकसान होता है|
अनुलोम-विलोम प्राणायाम को करते वक्त तीन क्रियाएँ की जाती है| पूरक, कुम्भक और रेचक। इसको नियमित रूप से 10 मिनट करने पर भी स्वास्थ्य को कई लाभ मिलते है|
नियमित तौर पर इस योग को करने से फेफड़े मजबूत बनते हैं।
अनुलोम विलोम प्राणायाम को करने से एलर्जी और सभी प्रकार की चर्म समस्याए खत्म हो जाती है|
अनुलोम विलोम प्राणायाम करने से शरीर में रक्त का संचार सुधरता है| यह ब्लड प्रेशर की समस्या को दूर करने में सहायक है|
वजन घटाने के लिए भी यह बेहद फायदेमंद है| इस प्राणायाम को करने से शरीर की चर्बी घटती है और मोटापा भी कम होता है|
 
सर्दियों में शरीर का तापमान कम होने से सर्दी जुखाम जैसी समस्याए होती है, लेकिन यदि इस योग को ठंडी के दिन में किया जाये तो हमारे शरीर का तापमान संतुलित रहता हैं।
इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है| और मधुमेह जैसी समस्याए खत्म हो जाती है|
इसे ब्रेन ट्युमर जैसी समस्याए ठीक हो जाती है और यादास्त (मेमोरी) भी बढ़ती है|
इससे सायनस की समस्या ठीक हो जाती है और टाँन्सीलस की परेशानी में भी आराम मिलता है|
इसे करने से आर्थराटीस, कार्टीलेज घीसना जैसी बीमारियाँ भी ठीक हो जाती है|
वृद्धावस्था में अनुलोम विलोम करने से यह आपको स्वस्थ और निरोग रखने में मदद करता है। इसे करने से गठिया और जोड़ो का दर्द ठीक हो जाता है|
सावधानी-यदि आप कमजोर और एनीमिया से पीड़ित है। तो शुरुवात में सांस लेने और छोड़ने में परेशानी आ सकती है| इसलिए शुरुवात में इस क्रिया को 4 से 5 बार ही रखे|
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माता पिता बनना दुनिया का सबसे बड़ा सुख है| लेकिन बहुत से अभिभावक बांझपन के चलते बच्चे का सुख नहीं उठा पाते है| योग ऐसे पेरेंट्स के लिए बहुत फायदेमंद है जिनकी संतान नहीं है| योग की मदद से गर्भधारण करने की क्षमता बढती है| महिलाओ और पुरुषो में कुछ यौन समस्याओ के चलते गर्भाधान नहीं हो पाता|
पुरुषों और महिलाओं में बांझपन के महत्वपूर्ण कारणों में से कुछ कारण है कम शुक्राणु, शुक्राणुओं की खराब गुणवत्ता, महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता, ओवेरियन सिस्ट, ट्यूब की रुकावट, आदि|
योग की मदद से इन परेशानियों से निजात पाई जा सकती है| कुछ योग के आसन है जिनका यदि अभ्यास किया जाये तो संतानहीन भी संतान का सुख भोग सकता है| बाबा रामदेव ने इसके लिए कई आसनों के बारे में बताया है तो आइये जानते है
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वज्रासन या वज्र मुद्रा
धनुरासन या धनुष मुद्रा
सुखासन या आसान मुद्रा
योग निद्रा
धनुरासन या धनुष मुद्रा


यह आसन जननांग अंगों और शरीर के अन्य भागों में रक्त की आपूर्ति को बढ़ाने में मदद करता है।  

साथ ही साथ यह रक्त से विषाक्त पदार्थों को भी दूर करने में मदद करता है| इसके नियमित अभ्यास से शरीर में यौन हार्मोन का स्तर बढ़ता है|
वज्रासन या वज्र मुद्रा


यह योग आसन अल्पशुक्राणुता का सबसे प्रभावी इलाज है| यह शुक्राणुओं की संख्या कम होने पर या अन्य यौन समस्याओं को ठीक करने के लिए बहुत उपयोगी है। यह आसन यौन अंगों को रक्त की आपूर्ति पूरी करता है और जब रक्त की आपूर्ति पूरी हो जाती है तब यौन अंगों की गतिविधि भी बढ़ जाती है|
इस आसन को तुरंत खाने के बाद करने के लिए कहा जाता है| यह आसन पाचन में मदद करता है और अम्लता जैसी अन्य पाचन समस्याओं में भी मदद करता है| इसलिए इसे खाना खाने के बाद करने के लिए कहा जाता है|


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करने की विधि:
वज्रासन करने के लिए किसी समतल स्थान पर घुटनों के बल बैठ जाये| आपके नितम्ब आपके दोनों पैरो के एडियो के ऊपर रहेंगे| अपने दोनों हाथो को अपने झांघो पर रखिये| आपकी पीठ बिलकुल सीधी रहनी चाहिए| अपनी साँसों को सामान्य रहने दे| भोजन के पश्चात खास तौर पर कम से कम पांच मिनट तक इस आसन को करना चाहिए।
सुखासन या आसान मुद्रा


यह आसन शरीर से तनाव और चिंता को कम करने में सहायक है। साथ ही साथ यह विभिन्न रोगों के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है| यह योग आसन का सरलतम रूप है। यह मूड को बढ़ाने में मदद करता है और यौन अंगों की ताकत भी बढ़ जाती है। यह Yoga for Infertility बहुत प्रभावी है|
सुखासन करने की विधि:
सुखासन करने के लिए अपने पैर को लम्बे करके बैठ जाये| फिर पालथी मार ले, अर्थात एक पैर की एडी को दुसरे पैर के घुटनों के निचे और दुसरे पैर की एडी को पहले पैर के घुटनों के निचे| इस योगा का अभ्यास करते वक्‍त आपका सिर और गर्दन दोनों एक सीध में होना चाहिये। आपको झुककर नहीं बैठना है, अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखे और उसे बिल्‍कुल भी ना मोड़े। अपने दोनों हाथों को अपने पैरों पर रखें। यदि शुरुवात में आपको इसे करने में कठिनाई आ रही है तो आप टेकने के लिए दिवार का सहारा भी ले सकते है|


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योग निद्रा

यह मुद्रा शरीर से हर प्रकार के तनाव को दूर करने में मदद करती है। यह उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों के लिए एक बहुत अच्छा आसन है। इस आसन के नियमित अभ्यास शरीर की ताकत बढती है और शरीर से तनाव दूर होता है। यह कामेच्छा बढ़ाने में भी मदद करता है|

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हड्डियाँ मजबूत करने के योग आसन// Yoga posture to strengthen bones



  कई लोगों का मानना है कि हड्डियों का कमजोर होना, उम्र से सम्‍बंधित होता है। वास्‍तव में, हड्डियों के कमजोर होने के पीछे सबसे प्रमुख कारण, खाने की बेकार आदतें, शारीरिक व्‍यायाम की कमी, कुछ दवाओं का लगातार सेवन, अधिक धूम्रपान और हड्डियों की आनुवांशिक बीमारी होते हैं।
  शोध में यह बात सामने आई है कि हड्डियों की कमजोरी और ऑस्‍टियोपोरोसिस, पौष्टिक आहार और शारीरिक गतिविधियों के साथ रोकी जा सकती है। किसी भी आयु में हड्डियों को मजबूत बनाएं रखने के लिए योग सबसे अच्‍छा उपाय है।

किडनी फेल रोग की अचूक औषधि

हाल ही में कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय ने न्‍यूयॉर्क में दो साल का अध्‍ययन किया, जिसमें मरीजों की हड्डियों सम्‍बंधी बीमारी पर रिसर्च की गई। इन लोगों को प्रतिदिन 10 मिनट योग करवाया गया, जिससे इन्‍हें काफी लाभ मिला। आप भी ऐसे ही कुछ योगा को कर सकते हैं जिससे आपकी हड्डियों में मजबूती आएं।
वृक्षासन 

इस योग में व्‍यक्ति को पेड़ की तरह खड़े होना होता है। इस आसन को करने से रीढ़, कमर और पेल्विक हड्डी मजबूत बनी रहती है। गठिया की समस्‍या से राहत मिलती है और कमजोर कंधे भी मजबूत हो जाते हैं। साथ ही शरीर का संतुलन भी अच्‍छा बना रहता है।

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 


उत्‍कटासन

इस आसन में व्‍यक्ति को कुर्सी की तरह बनना होता है। इसे करने से शरीर की मांसपेशियां खिंचती है और उनकी सहनशक्ति में बढ़ोत्‍तरी होती है।  
हड्डियों में भी काफी फायदा होता है। कंधे और छाती की हड्डियां, मजबूत हो जाती है।
सेतु बंधासन 

अपनी मांसपेशियों और अंगों को स्‍ट्रेच करते हुए, इस आसन से शरीर की हड्डियों में मजबूती आती है। नई कोशिकाओं का विकास अच्‍छी तरह होता है। बॉडी ब‍िल्डिंग करने वाले लोगों के लिए ये आसन सबसे अच्‍छा होता है
भुजंगासन

 सूर्य नमस्‍कार करते समय भुजंगासन किया जाता है जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं और लोअर-बैक सपोर्ट भी अच्‍छा हो जाता है। इसे करने से कलाईयों की हड्डियों में मजबूती आ जाती है और उंगलियां भी गठिया रहित हो जाती हैं।
अधोमुख शवासन 
इस आसन को करने से पैर, कमर, रीढ़ की हड्डियों पर जोर पड़ता है और वो मजबूत हो जाती हैं। जिन लोगों को गठिया की शिकायत की शुरूआत हुई हो, वो इसे अवश्‍य करें। शरीर के ऊपरी हिस्‍से में भी इसे करने से मजबूती आती है।

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स्नायु संस्थान की कमज़ोरी के नुस्खे

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शुक्राणुओ में वृद्धि करने के रामबाण उपाय // Measures to increase spermatozoa



   वीर्य एक जैविक तरल पदार्थ है, जिसे धातु के नाम से भी जाना जाता है। यह बहोत से शुक्राणुओं के मेल से बना होता है। वीर्य शरीर की बहुत मूल्यवान धातु है। भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है। जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है। पांच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है, उसमें से 5-5 दिन के अंतर से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से अंत में वीर्य बनता है। इस प्रकार वीर्य बनने में करीब 30 दिन व 4 घण्टे लग जाते हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि 32 किलो भोजन से 800 ग्राम रक्त बनता है और 800 ग्राम रक्त से लगभग 20 ग्राम वीर्य बनता है।
   भारत के मर्दो के वीर्य में साल दर साल शुक्राणुओं की कमी देखी जा रही है। भारत के मर्दो में अब पहले जैसी बात नही रही। शक्राणु के आकर और संरचना में गड़बड़ियां आ रही है। 1978 में एक सेहतमंद व्यक्ति के वीर्य में शुक्राणुओं की गिनती 6 करोड़ प्रति लीटर पाई जाती थी, 2012 में यह गिनती 6 करोड़ से 2 करोड़ हो गयी थी।
स्वस्थ या हेल्दी शुक्राणु (sperm) का मतलब होता है एक मिलीलीटर वीर्य (semen) के सैम्पूल में 15 मिलियन शुक्राणु की कोशिकाओं का होना। स्वस्थ शुक्राणु में इन लक्षणों के अलावा रूप, संरचना और गतिशीलता भी सामान्य होनी चाहिए। इन सब गुणों में से एक भी गुण में थोड़ा-सी भी कमी अनहेल्दी शुक्राणु के लक्षण हो जाते हैं। इससे आप में नपुंसकता और सेक्स करने के इच्छा में कमी आ जाती है। अतः अनहेल्दी शुक्राणु आपके सेक्स लाइफ के आनंद को पूरी तरह से बरबाद करने में सहायक होता है। अपने जीवनशैली में कुछ सुधार लाकर आप शुक्राणु के क्वालिटी यानि गुणवत्ता और संख्या को बढ़ाने में सक्षम हो सकते हैं-
सही खाना खायें- 
अगर आप नपुंसक नहीं होना चाहते हैं तो अपने खान-पान पर पहले नजर डालें। अत्यधिक मात्रा में जंक फूड खाने से सबसे पहले आपकी प्रजनन क्षमता (reproductive system) खतरे में पड़ती है। आजकल जंक फूड खाने के अधिक प्रचलन के कारण ही लोगों में नपुंसकता और इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या ज़्यादा से ज़्यादा होने लगी है। स्वास्थ्यवर्द्धक खाना या हेल्दी खाना खाने से इस समस्या से कुछ हद तक राहत पाया जा सकता है, जैसे- प्रोटीन, फल, सब्ज़ियों, फाइबर आदि का सेवन।
व्यायाम-
 वैसे तो उम्र के साथ शुक्राणुओं की संख्या कम होने लगती हैं। लेकिन इस समस्या को भी कुछ हद तक नियंत्रण में किया जा सकता है यदि आप युवावस्था में खुद को सक्रिय रखें तो। बहुतमोटा होना या दुबला होना दोनों ही स्थिति में यह आपके सेक्स जीवन को प्रभावित करता है। इससे टेस्टास्टरोन (testosterone) के स्तर में कमी, कामेच्छा में कमी, इरेक्शन कम होने की समस्या आदि होती है। इन सब समस्याओं से लड़ने का एक ही उपाय है वह है नियमित रूप से व्यायाम करना।
 
कम मात्रा में शराब पीयें- 
अध्ययन के अनुसार एक से अधिक बार शराब पीने से शुक्राणुओं के उत्पादन में और सेक्स इच्छा में कमी आ जाती है। साथ ही पुरूषों के सेक्स हार्मोन टेस्टास्टरोन के स्तर में भी कमी आ जाती है। इसलिए सेक्स जीवन को स्वस्थ और सुंदर बनाने के लिए शराब के सेवन के आदत में सुधार लाना ज़रूरी होता है।
ध्रूमपान करना कम करें: 
अगर आप शुक्राणु को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो तुरन्त ध्रूमपान करना छोड़ दें। एक पैक सिगरेट पीने से यह वीर्य में कैडमियम (cadmium) के स्तर को बढ़ाकर शुक्राणुओं को अनहेल्दी करता है क्योंकि कैडमियम डी.एन.ए. को क्षति पहुँचाता है यानि इससे शुक्राणुओं के संख्या में कमी आ जाती है।
मनोरंजनात्मक दवाईयों को ना कहें- 
मनोरंजात्मक दवाईयाँ जैसे मैरवान (marijuana) और कोकेन (cocaine) को सेक्स-प्रक्रिया को बूरी तरह से प्रभावित करता है। इससे पुरूषों के लिंग में रक्त का संचार अच्छी तरह से नहीं हो पाता है, शुक्राणुओं के उत्पादन के स्तर में कमी आती है, यानि ये पूरी तरह से सेक्स जीवन को क्षति पहुँचाता है। इसलिए इन दवाईयों से बचकर रहना चाहिए।
तनाव को जीवन से दूर करें- 
 
शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मन को स्वस्थ रखना ज़रूरी होता है। अगर आपका मस्तिष्क ही तनावग्रस्त होगा तो शरीर के दूसरे अंग कैसे सही तरह से कार्य कर पायेंगे। रक्त में उच्च स्तर में स्ट्रेस हार्मोन के कारण शुक्राणुओं की संख्या घट सकती है, गुणवत्ता पर भी बूरा प्रभाव पड़ सकता है।
सेक्स के समय सुरक्षा का ध्यान रखें-
 सेक्स के समय सुरक्षा का ध्यान नहीं रखने पर यौन संचारित रोग (STD) होने की संभावना बढ़ जाती है जो शुक्राणुओं के डी.एन.ए. और संख्या को पहले प्रभावित करता है।
ताप के संपर्क में कम रहें- 
अध्ययन के अनुसार अत्यधिक ताप के संपर्क में रहने से भी शुक्राणुओं के उत्पादन में कमी आती है। अगर पिता बनने की योजना बन रहे हैं तो हॉट बाथटब, हॉट शावर, जकुज़ी (Jacuzzis) आदि से दूर रहें। लंबे समय तक इनका प्रयोग करने से शुक्राणुओं पर बूरा प्रभाव पड़ता है।
शुक्राणुओ में वृद्धि करने के लिए 3 विशेष उपचार-
1. तुलसी के बीज
2. बथुआ
3. दूध और केसर
आएं जाने कैसे करना है इनका प्रयोग
तुलसी के बीज
तुलसी के बीज आधा ग्राम (पीसे हुए), पान के साथ सादे या केवल कत्था चुना लगाये पान के साथ नित्य सुबह एवं शाम खाली पेट खाने से वीर्य पुष्टि एवं रक्त शुध्दि होती है।
विशेष
1. जो लोग पान नही खाते, वे एक भाग तुलसी के बीज का चूर्ण को दो भाग पुराने गुड में मिलाकर ले सकते है।
2. आवश्यकता अनुसार दस से चालीस दिन तक लें। साधारणतया आठ-दस दिनों का प्रयोग पर्याप्त रहता है। अधिक से अधिक चालीस दिन तक प्रयोग किया जा सकता है।
3. तुलसी के बीज अत्यंत उष्ण होने के कारण यह प्रयोग केवल शीतकाल में ही किया जाना चाहिए।
4. इश्तहारी पौरुष बलवर्धक ओषधियों के पीछे भागने वाले यदि नपुंसकत्व रोग-नाशक तुलसी के बीजों का उक्त प्रयोग करें तो पांच सप्ताह में ही उनकी चिंता दुर हो सकती है।

5. इसके अतिरिक्त गैस कफ से उत्पन्न होने वाले अनेक रोग मिट जाते है।
 
परहेज
1. तेल और तली चीजें, अधिक लाल मिर्च, मसालेदार पदार्थ, इमली, अमचूर, तेज खटाईयां व आचार।
2. प्रयोग काल में घी का उचित सेवन करना चाहिए।
3. पेट की शुध्दि पर भी ध्यान देना चाहिए। कब्ज नही होने देनी चाहिए। कब्ज अधिक रहता हो तो प्रयोग से पहले पेट को हल्के दस्तावर जैसे त्रिफला का चूर्ण एक चमच अथवा दो-तीन छोटी हरड़ का चूर्ण गर्म दूध या गर्म पानी के साथ, सोने से पहले अंतिम वास्तु के रूप में लें।
4. सेवन-काल में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है।
5. ओषधि सेवन के आगे-पीछे कम से कम दो घंटे कुछ न खाएं। खाली पेट सेवन से यह मतलब है।
बथुआ
बथुआ का शाक हरे पत्ते के शाको में सर्वाधिक गुणकारी है। बथुआ शुक्र की वृध्दि करता है। रक्त की शुध्दि करता है। स्मरण शक्ति तेज करता है। आमाशय को बल प्रदान करता है। कब्जनाशक और जठराग्निवर्धक है। गर्मी में बढ़े हुए यकृत को ठीक करता है। पथरी से बचाव करता है। इसे जब तक हरा मिले, हरा सेवन करना चाहिए अन्यथा सुखाकर रख लें। इसको पीसकर अथवा इसके कतरन आटे में गूंधकर रोटी बनाकर खाना भी लाभप्रद है।
दूध और केसर
दूध और केसर शीतकाल में 250 ग्राम औटाये हुए दूध में चार-पांच केसर की पंखुड़ियां अच्छी तरह मिलाकर, मिश्री डालकर, यह दूध प्रात: या रात सोने से पहले पिया जाय तो पुरुषत्व शक्ति में खूब वृध्दि होती है। स्फूर्ति आती है। खून का दौरा बढ़ता है। शरीर की रंगत निखरती है। प्रभाव की द्रष्टि से अत्यंत कामोद्दीपक, उत्तेजिक और बाजीकरण है। इसके सेवन में सर्दी का प्रभाव भी कम पड़ता है। सर्दी से बचाव हो और हाथ-पांव बर्फ की तरह ठंडे होना मिटता है।
शुक्राणु बढ़ाने के अन्य उपाय 
ज्यादा सब्जी और अनाज खाएँ.
दिन भर में ज्यादा पानी पीएँ.
विटामिन C और एंटीअॅक्सीडेंट से भरपूर भोजन करें.
विटामिन C आपकी वीर्य से संबंधित समस्या को कम करेगा और वीर्य के जीवनकाल को बढ़ाएगा.
हर दिन एक ग्लास नारंगी का जूस पिएँ.

 
हरी सब्जियाँ, फलियाँ, अनाज और नारंगी का रस वीर्य की मात्रा बढ़ाता है.
हर दिन कुछ देर धूप में बैठें. यह भी आपके लिए फायदेमंद होगा.
दही, स्लिम दूध, सैल्मन का अधिक मात्रा में सेवन करना आपके लिए फायदेमंद होगा.
धूप में निकलने से पहले अपने शरीर पर सनस्क्रीन लगाकर निकलें.

प्याज का नियमित सेवन शुरू करें.
अपने खानपान में एंटीॅआक्सीडेंट, जिनसेंग, अश्वगंधा, कद्दू के बीज, अखरोट, केला को शमिल करें.
धूम्रपान, ड्रग्स, शराब आदि का सेवन करना बंद कर दें.
ऐसे कपड़े पहनें जिनसे आपके अंडकोश पर दबाब न पड़े. ढीले कपड़े जिसमें हवा का प्रवेश हो पहनें.
रात में सोते वक्त अंडरपैंट न पहनें, केवल पायजामा या कोई अन्य ढीला कपड़ा पहनें.
साइकिल का उपयोग करना बंद कर दें, क्योंकि साइकिल चलाने के दौरान अंडकोष को दबाव, धक्का और उछाल सहना पड़ता है.
और वीर्य को इनमें से कुछ भी पसंद नहीं है. बाइक, कार या बस का प्रयोग करें.
मिनरल जिंक का ज्यादा सेवन करें.
हर दिन के भोजन में अखरोट, बीन्स, शुत्कि, चिकन को सम्मिलित करें.
मांस, फल और सब्जियों का नियमित सेवन शरीर में वीर्य की मात्रा को बढ़ाता है.
रेड मीट खाना और दूध पीना शुरू करें.
ड्राईफ्रूट, तिल और अंडे को अपने दैनिक भोजन में शामिल करें.
पनीर का सेवन करना शुरू करें.
तनाव से दूर रहें. तनाव वीर्य उत्पन्न करने वाले हार्मोन को कम कर देता है.
अपने वजन को नियंत्रित रखें, आपका वजन न तो बहुत कम होना चाहिए न तो बहुत अधिक होना चाहिए.
इससे आपके शरीर में शुक्राणुओं की मात्रा बढ़ेगी.
स्टेरॉयड का सेवन न करें, इसका आपके अंडकोश पर बुरा असर पड़ता है.
ऐनेबोलिक स्टेरइड आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.
अगर आप शुक्राणुओं / वीर्य की मात्रा बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको हर दिन 8-9 घंटे की भरपूर नींद लेनी होगी.
आपको काम के साथ पर्याप्त आराम भी करना होगा.
जरूरत भर आराम करने और जरूरत भर सोने से शरीर में शुक्राणुओं की मात्रा बढ़ती है.

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चिकनगुनिया बुखार के उपचार




  चिकनगुनिया बुखार  एक वायरस बुखार है जो एडीज मच्छर एइजिप्टी के काटने के कारण होता है। चिकनगुनिया और डेंगू के लक्षण लगभग एक समान होते हैं।​ इस बुखार का नाम चिकनगुनिया स्वाहिली भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है ''ऐसा जो मुड़ जाता है'' और यह रोग से होने वाले जोड़ों के दर्द के लक्षणों के परिणामस्वरूप रोगी के झुके हुए शरीर को देखते हुए प्रचलित हुआ है।

चिकनगुनिया के लक्षण 

चिकनगुनिया में जोड़ों के दर्द के साथ बुखार आता है और त्वचा खुश्क हो जाती है। चिकनगुनिया सीधे मनुष्य से मनुष्य में नहीं फैलता है। यह बुखार एक संक्रमित व्यक्ति को एडीज मच्छर के काटने के बाद स्वस्थ व्यक्ति को काटने से फैलता है। चिकनगुनिया से पीड़ित गर्भवती महिला को अपने बच्चे को रोग देने का जोखिम होता है।

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जोडों के दर्द का उपाय 

चिकनगुनिया के बुखार के बाद जोड़ों का दर्द कुछ दिन या सप्ताह तक बना रह सकता है। इससे बचने के लिए निम्न उपाय लाभदायक होते हैं:

लहसुन और सहजन की फली 

लहसुन और सजवायन की फली चिकुनगुनिया के इलाज के लिए बहुत बढ़िया है। चिकुनगुनिया में जोड़ों में काफी दर्द होता है, ऐसे में शरीर की मालिश किया जाना बेहद जरूरी है। इसके लिए किसी भी तेल में लहसुन और सजवायन की फली मिलाकर तेल गरम करें और इस तेल से रोगी की मालिश करें।

लौंग और लहसून का तेल 

चिकनगुनिया के दौरान दर्द वाले जोड़ों पर लहसुन को पीसकर उसमें लौंग का तेल मिला लेना चाहिए, फिर इस पेस्ट को कपड़े की सहायता से जोड़ों पर बांधने से आराम मिलता है। इससे चिकुनगुनिया के मरीजों को जोड़ों के दर्द (Chikungunya Joint Pain Remedies) से आराम मिलता है।

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विटामिन सी अधिक लें 

चिकनगुनिया के दौरान होने वाले दर्द को दूर करने के लिए विटामिन सी युक्त आहार अधिक लेना चाहिए। इस समय संतरा, कीवी , पपीता, विटामिन सी की गोलियां आदि खाने से काफी आराम मिलता है।

मसाज 

प्राकृतिक तेलों से मसाज करने से भी चिकनगुनिया के दर्द में राहत मिलती है। दर्द वाली जगह पर हल्के गर्म तेलों या कपूर, नारियल और लहसून को मिलाकर बनाए गए तेल की देर तक मसाज करनी चाहिए।
चिकनगुनिया के दौरान जोड़ों के दर्द को दूर करने के अन्य उपाय निम्न हैं:
• पर्याप्त मात्रा में तरल प्रदार्थों, फलों और सब्जियों का सेवन करना चाहिए।
• तुलसी, अदरक या ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए।
• जोड़ों पर बर्फ की सेंक से भी काफी राहत मिलती है।
• पपीते के पत्तों को पानी में उबाल कर पीने से भी राहत मिलती है।
• चिकनगुनिया के बुखार के दौरान कभी भी ऐस्प्रिन नहीं लेनी चाहिए।

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सामान्य उपचार

अधिक से अधिक पानी पीएं, हो सके तो गुनगुना पानी पीएं।
ज्यादा से ज्यादा आराम करें।
चिकनगुनिया के दौरान जोड़ों में बहुत दर्द होता है
दूध से बने उत्पाद, दूध-दही या अन्य चीजों का सेवन करें।
रोगी को नीम के पत्तों को पीस कर उसका रस निकालकर दें।
रोगी के कपड़ों एवं उसके बिस्तर की साफ-सफाई पर खास ध्यान दें।
करेला व पपीता और गिलोय के पत्तों का रस काफी फायदेमंद माना जाता है।
नारियल पानी पीने से शरीर में होने वाली पानी की कमी दूर होती है और लीवर को आराम मिलता है।
ऐस्प्रिन बुखार होने पर कभी ना लें, इससे काफी समस्या हो सकती है। 

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चिकनगुनिया में बच्चों की देखभाल 

बच्चों का खास ख्याल रखें।
बच्चे नाजुक होते हैं और उनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है इसलिए बीमारी उन्हें जल्दी पकड़ लेती है। ऐसे में उनकी बीमारी को नजर अंदाज न करें।
बच्चे खुले में ज्यादा रहते हैं इसलिए इन्फेक्शन होने और मच्छरों से काटे जाने का खतरा उनमें ज्यादा होता है।
बच्चों घर से बाहर पूरे कपड़े पहनाकर भेजें। मच्छरों के मौसम में बच्चों को निकर व टी - शर्ट न पहनाएं। रात में मच्छर भगाने की क्रीम लगाएं।
अगर बच्चा बहुत ज्यादा रो रहा हो, लगातार सोए जा रहा हो, बेचैन हो, उसे तेज बुखार हो, शरीर पर रैशेज हों, उलटी हो या इनमें से कोई भी लक्षण हो तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं।
आमतौर पर छोटे बच्चों को बुखार होने पर उनके हाथ - पांव तो ठंडे रहते हैं लेकिन माथा और पेट गर्म रहते हैं इसलिए उनके पेट को छूकर और रेक्टल टेम्प्रेचर लेकर उनका बुखार चेक किया जाता है। बगल से तापमान लेना सही तरीका नहीं है, खासकर बच्चों में। अगर बगल से तापमान लेना ही है तो जो रीडिंग आए, उसमें 1 डिग्री जोड़ दें। उसे ही सही रीडिंग माना जाएगा।

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  चिकनगुनिया में जोड़ों में दर्द सिर दर्द  उल्टी  और जी मिचलाने के लक्षण उभर सकते हैं जबकि कुछ लोगों में मसूड़ों और नाक से खून भी आ जाता है। मच्छर काटने के लगभग बारह दिन में चिकनगुनिया के लक्षण उभरते हैं। चिकनगुनिया के उपचार के लिए बहुत से घरेलू नुस्खे हैं जिन्हें अपनाकर चिकनगुनिया से खुद को बचाया जा सकता है।

*पपीते की पत्ती 

पपीते की पत्ती न केवल डेंगू बल्कि चिकनगुनिया में भी उतनी ही प्रभावी है। बुखार में शरीर के प्लेटलेट्स तेजी से गिरते हैं, जिन्हें पपीते की पत्तियां तेजी से बढ़ाती हैं। मात्र तीन घंटे में पपीते की पत्तियां शरीर में रक्त के प्लेटलेट्स को बढ़ा देती हैं। उपचार के लिए पपीते की पत्तियों से डंठल को अलग करें और केवल पत्ती को पीसकर उसका जूस निकाल लें। दो चम्मच जूस दिन में तीन बार लें।

* एप्सम साल्ट 

एप्सम साल्ट की कुछ मात्रा गरम पानी में डालकर उस पानी से नहाएं। इस पानी में नीम की पत्तियां भी मिलाएं। ऐसा करने से भी दर्द से राहत मिलेगी और तापमान नियंत्रित होगा।



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*अंगूर (Grapes)
अंगूर को गाय के गुनगुने दूध के साथ पीने पर चिकनगुनिया के वायरस मरते हैं लेकिन ध्यान रहे अंगूर बीजरहित हों।
* गाजर
कच्ची गाजर खाना भी चिकनगुनिया के उपचार में बेहद फायदेमंद है। यह रोगी की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है साथ ही जोड़ों के दर्द से भी राहत देती है।


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* तुलसी और अजवायन 
तुलसी और अजवायन भी चिकनगुनिया के उपचार के लिए बेहद अच्छी घरेलू औषधि हैं। उपचार के लिए अजवायन, किशमिश, तुलसी और नीम की सूखी पत्तियां लेकर एक गिलास पानी में उबाल लें। इस पेय को बिना छानें दिन में तीन बार पीएं।
*लहसुन और सहजन की फली 
लहसुन और सजवायन की फली चिकनगुनिया के इलाज के लिए बहुत बढ़िया है। चिकनगुनिया में जोड़ों में काफी दर्द होता है, ऐसे में शरीर की मालिश किया जाना बेहद जरूरी है। इसके लिए किसी भी तेल में लहसुन और सजवायन की फली मिलाकर तेल गरम करें और इस तेल से रोगी की मालिश करें।


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* लौंग 
दर्द वाले जोड़ों पर लहसुन को पीसकर उसमें लौंग का तेल मिलाकर, कपड़े की सहायता से जोड़ों पर बांध दें। इससे भी चिकनगुनिया के मरीजों को जोड़ों के दर्द से आराम मिलेगा, और शरीर का तापमान भी नियंत्रित होगा।
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छोटे बच्चों के रोग और उपचार




छोटे बच्चों को बड़ी जल्दी बीमारियां घेरने लगती है। कई बार बच्चे के रोगों का पता भी नहीं चल पाता है कि वह किस समस्या से परेशान है। सामान्य परेशानियां जैसे प्रायः पेट फूलना, चुनचुने लगना, जुकाम, पेट में एठन होना मुख्य समस्याएं हैं जिनके बारे में बच्चे की मां को पता होना चाहिए। इन लक्षणों (symptoms of children’s diseases) के आधार पर पर नवजात बच्चों की बीमारी का पता लगाया जा सकता है।
* बीमारी के शुरूआत में शिशु में चिड़चिड़े पन के साथ रोने लगता है।

* मां का दूध भी न पीना। या पीने के बाद उल्टी कर देना।
* मल त्याग न कर पाना।

फिशर होने के कारण लक्षण और उपचार

*बच्चे के किसी भाग में दर्द होना और उस भाग का लाल और कड़ा होना तथा उसे छूने पर बच्चे का रोना। समय रहते रोगों के लक्षणों की पहचान से बच्चे को रोगों से बचाया जा सकता है।
* शिशु में बेचैनी का बढ़ना।
* शिशु का सुस्त और निढाल सा होना।
*मां की गोद में भी न आना।
* बच्चे की त्वचा का शुष्क होना।
कब्ज
शिशु को समय पर शौच का न आना।
मल का सख्त और उसका कठिनता से निकलना।


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कारण

शिशु का दूध अधिक पीना या कम पीने की वजह से कब्ज होती है।
पेट में विकार होने से भी कब्ज हो सकती है।

इलाज

शिशु को गुनगुना जल पीलाएं।
उपर के दूध में छुआरा या मुनक्का उबाल कर बच्चे को दे सकते हो।
देशी जन्म घुटी बच्चे को देनी चाहिए।
शिुशु को पालक का साग मसलकर खिलाना चाहिए।
बच्चों को दस्त संबंधी रोग सबसे अधिक होते हैं। एैसी अवस्था में बच्चे को दूध भी नहीं पच पाता है। बच्चों के दस्त दो प्रकार के होते हैं।

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पहले प्रकार के दस्त
इस प्रकार के दस्त में बच्चे को शौच में ही सफेद रंग की बुंदकिया होती है।
कभी शौच राख के रंग की तरह होता है।
कारण
दूध अधिक मात्रा में पी जाना।
दूध में चिकनाई का अधिक होना।
उपचार
एैसे में दूध की मात्रा कम कर दें।
दूध में थोड़ा पानी मिलाकर दूध को हल्का कर देना चाहिए।
दस्त के दूसरे प्रकार
लक्षण
दस्तों का झागदार होना।
कारण
दूध में चीनी अधिक डालना।
दूध में उबला पानी मिलाकर शिशु को पिलाना चाहिए।
दस्त के तीसरे प्रकार

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लक्षण
तीसरी प्रकार के दस्त में बच्चों को पतले और हरे रंग के दस्त होते हैं।
कारण
बच्चे को डिब्बे या भैंस का दूध हजम नहीं होना।
शिशु के द्वारा कम मात्रा में दूध सेवन करना भी दस्त का कारण बन सकता है।
उपचार
भैसं का दूध शिशु को न दें। मां का दूध का सेवन कराएं
शिशु के दूध की मात्रा बढ़ा दें और बच्चे की मां को दलिये का सेवन करना चाहिए।

पेट में पीड़ा होना

लक्षण
पेट का फूल जाना।
पेट में पीड़ा या शूल रहना।
कारण
दूध में शक्कर या प्रोटीन की ज्यादा मात्रा होना इस रोग का कारण बनती है।
इलाज
शिशु को बकरी का दूध का सेवन कराएं।
शिशु के पेट की सिकाई करें।
शिशु को दूध में शक्कर डालकर देना चाहिए।
शिशु को दूध में पानी मिलाकर देना चाहिए।

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ऐठन होना
ऐठन होने पर शिशु का चेहरा पीला पड़ जाता है। और शिशु की मांसपेशियों में खिंचाव आने लगता है।
उपचार
शिशु को दूसरे बच्चों से दूर रखें।
शिशु के कपड़ों को ढीला कर लें।
शिशु को ठंड से बचायें।

सूखा रोग

इस रोग में शिशु पीला पड़ जाता है। और उसकी त्वचा पर झुर्रियां या सिकुड़ने आदि पड़ने लगती है। सूखा रोग में शिशु का वजन कम हो जाता है साथ ही वह हड्डियों का ढांचा मात्र लगने लगता हैं। शिशु के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने लगता है। इसका सबसे बड़ा कारण है विटामिन सी की शरीर में कमी। इस रोग से बचाव में शिशु का विटामिन सी वाले पदार्थ देते रहना चाहिए।

बिदारीकन्द के औषधीय उपयोग 

शिशु का उल्टी होना
शिशु को यदि उल्टी हो रही हो तो उसे नियमित रूप से ओआरएस का घोल पिलाएं। सबसे पहले आप ओआरएस के घोल को उबाल कर ठंडा करके शिशु को पिलाते रहें। आप केवल 24 घंटे तक एक घोल का इस्तेमाल कर सकते हैं। उसके बाद दूसरा घोल बनाकर शिशु को दें।
किस तरह से करें शिशु की देखभाल बीमारी में
मां को चाहिए कि वे अपने बच्चे को स्तनपान करवाती रहे।
दांत निकलने से बच्चे को होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए बच्चे को सुबह के समय में शहद चटाएं। शहद बच्चे को हर प्रकार की समस्या से बचाता है।
बच्चे की तेल से मालिश करें। दो साल से कम उम्र के बच्चे की मालिश रात को सोने से पहले जैतून के तेल से करें।
बुखार होने पर बच्चे को खूब पानी दें। उल्टी होने पर भी बच्चे को पानी जरूर दें। शरीर में पानी कम कमी से बच्चे की जान को खतरा हो सकता है।

7 दिनों में स्तनों का ढीलापन दूर करने के घरेलु नुस्खे

बच्चे को मोटे कपड़े ना पहनाएं। जितना हो सके हल्के कपड़ो को ही बच्चे को पहनाएं।
बुखार के समसय में गीले मोंजों को बच्चे के पैरों पर रख दें। और मोजे सूखने पर दोबारा इस क्रिया को दोहराएं।
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किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि 

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एस्प्रिन के फायदे नुकसान




    एस्पिरिन, जिसे एसिटाइलसैलिसाइलिक एसिड, भी कहते हैं, एक सैलिसिलेट औषधि है, जो अकसर हल्के दर्दों से छुटकारा पाने के लिये दर्द निवारक के रूप में, ज्वर कम करने के लिये, ज्वरशामक के रूप में, और शोथ-निरोधी दवा के रूप में प्रयोग में लाई जाती है। यह भी पाया गया है कि हृदयाघात के तुरंत बाद थोड़ी मात्रा में एस्पिरिन देकर एक और हृदयाघात या हृदय के ऊतक की मृत्यु का जोखम कम किया जा सकता है।


किडनी फेल रोग की अचूक औषधि

    यह गोली कैंसर से भी बचाव करती है, इसका पता अभी फिलहाल की रिसर्च में पता चला है। एस्पिरिन को 16 साल की कम उम्र के बच्‍चे नहीं खा सकते क्‍योंकि यह रेइज़ सिंड्रोम के जोखम का कारण बनती है। एस्पिरिन के, विशेषकर अधिक मात्रा में लेने पर, मुख्य अवांछित दुष्प्रभावों में आमाशय व आंतों में छाले, आमाशय में रक्तस्राव और कानों में आवाज आना शामिल हैं। आप इसे खाएंगे या नहीं यह आपको खुद ही सोचना पड़ेगा।  
एस्पिरिन को खाने के अच्‍छे और बुरे प्रभाव-

हार्ट अटैक दूर करे: 


हार्ट अटैक के रोगी को जब भी हार्ट अटैक का दौरा पड़ने लगता है, वह एस्पिरीन की एक गोली को मुंह में रख लेता है, जिससे दर्द गायब हो जाता है।

सिरदर्द भगाए

एस्पिरिन खाने से चाहे जितना भयानक दर्द हो वह गायब हो जाता है। इससे बेहतरीन और तुरंत प्रभाव डालने वाली दवा कोई नहीं है।

*वात रोगों के प्राकृतिक ,आयुर्वेदिक घरेलू उपचार

मुंहासे से मुक्ति: 


इस गोली में एक एसिड होता है जिसे अगर गोली को पीस कर मुंहसो पर लगाया जाए तो, वे सूख जाते हैं और जल्‍द ठीक हो जाते हैं।

बुखार के मामले में:


 अगर आपको बुखार और पूरे बदन में दर्द महसूस हो तो इसकी एक गोली खाने से आपको बेहतर लगेगा
लीवर डैमेज से बचाए: अच्‍छा प्रभाव चूहे पर रिसर्च की गई और पता चला कि एस्पिरिन की एक गोली उन्‍हें लीवर की खराबी से बचा सकती है। यह खासकर उन लोगों के लिये अच्‍छा है जो शराब पीते हैं।

रूसी मिटाए: 


 अपने शैंपू के साथ एस्‍पिरिन की 1 गोली को पीस कर मिलाइये और सिर धो लीजिये। इससे रूसी मिट जाएगी।

एस्परीन के दुष्प्रभाव-
 
अस्‍थमा के रोगियों के लिये हानिकारक:


 जिसे भी सांस का रोग हो, उसे एस्‍पिरिन नहीं लेनी चाहिये क्‍योंकि ये फेफड़ों में ऐठन पैदा कर देती है।

एलर्जी पैदा करती है: 

कुछ लोगों को कई चीजों से एलर्जी होती है। एस्‍पिरीन से भी कई लोगों को एलर्जी हो जाती है।

*हाथ पैर और शरीर का कांपना कारण और उपचार

बच्‍चों के लिये ठीक नहीं :
जो बच्‍चे 16 साल की उम्र के नीचे हैं उन्‍हें यह नहीं खिलानी चाहिये। इसे देने से लीवर और दिमाग में सूजन पैदा हो सकती है, जो कि बहुत खतरनाक होती है।

आमाशय में रक्तस्राव :


खराब प्रभाव इसके लगातार सेवन से अंदरूनी ब्‍लीडिंग शुरु हो जाती है। क्‍योंकि यह खून को बहुत पतला कर देता है तो जिसे ब्‍लड क्‍लाटिंग की समस्‍या है उन्‍हें यह नहीं खाना चाहिये।

किडनी फेल (गुर्दे खराब) की हर्बल औषधि

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