होम्योपैथी मे है नपुंसकता की कारगर चिकित्सा // Effective treatment of impotence in homeopathy




   इस रोग में व्यक्ति को भोगेच्छा होती ही नहीं है और यदि भोगेच्छ होती भी है तो उसमें इतनी शक्ति नहीं रहती कि वह स्त्री के साथ भोग् कर सके । पूर्व में अत्यधिक भोग करना, पौष्टिक पदार्थों का अभाव, काम क्रिया से घृणा आदि कारणों से यह रोग होता है । बहुत से लोग शीघ्रपतन और नपुंसकता को एक ही समझ लेते हैं जो कि गलत है- दोनों ही अलग-अलग होते हैं । इसी प्रकार बहुत से लोग यह समझ लेते हैं कि किसी पुरुष में सन्तान पैदा करने की क्षमता न होने को नपुंसकता कहते हैं- यह विचार भी गलत है क्योंकि सन्तान पैदा कर सकने की क्षमता न होने को बाँझपन कहा जाता है । वास्तव में, नपुसंकता से तात्पर्य भोग की इच्छा या भोग की शक्ति (लिंग में कड़ापन) के अभाव से है । नपुंसकता को नामर्दी भी कहा जाता है ।

शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

नपुंसकता की अमोघ औषधि – डामियाना, एसिड फॉस, अश्वगंधा, एवेना सैटाइवा, स्टेफिसेग्रिया- 

इन पाँचों दवाओं के मूल अर्क (मदर टिंक्चर) की दो-दो ड्राम की मात्रा में लेकर अच्छी तरह मिला लें और इस सारे मिश्रण को किसी काँच की शीशी में भरकर रख लें । इस मिश्रण में से पाँच-पाँच बूंदें आधा कप पानी में मिलाकर लें । इस प्रकार प्रतिदिन तीन बार लेने से कुछ ही दिनों में सैक्स संबंधी सभी प्रकार की कमजोरी निश्चित ही समाप्त हो जाती है और रोगी को बहुत लाभ होता है। इन पाँचों दवाओं का वर्णन इस प्रकार है ।

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डामियाना –

इसे टर्नेरा एफ्रोडिसियाका भी कहते हैं । इसका प्रयोग ही शुक्र-क्षय के कारण होने वाली बीमारियों में होता है। यह दवा लिंग में कड़ापन न होना, पुरुषत्व शक्ति का घट जाना, अत्यधिक मैथुन या इन्द्रिय-दोष आदि पर काम करती है ।

सेलेनियम 6, 30 – 

वीर्य पतला पड़ जाये, आँखें धैस जायें, रोगी क्रमशः कमजोर होता जाये, लिंग में कड़ापन न आये, अनैच्छिक रूप से भी वीर्यपात हो जाता हो- इन सभी लक्षणों वाली नपुंसकता में दें ।

सैबाल सेरुलेटा Q – 

प्रतिदिन पाँच से दस बूंदों को पानी में मिलाकर लेना ही पर्याप्त हैं । इस दवा से शक्ति का अभाव दूर होता है । इस दवा का सेवन करते समय रोगी को ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये और भोग नहीं करना चाहिये । वास्तव में, इस दवा का सेवन प्रारंभ करते ही शक्ति महसूस होगी, यदि उसी समय भोग किया गया तो शक्ति नष्ट हो जायेगी । अतः कुछ दिनों तक भोग से दूर रहते हुये इस दवा का सेवन करें ।

एनाकार्डियम 30, 200 –

 हस्तमैथुन या वेश्याभोग के कारण जो व्यक्ति स्वयं की अयोग्य मान लेते हैं और इसी कारण स्त्री से दूर रहते हैं उन्हें इस दवा का सेवन कुछ दिनों तक लगातार करना चाहिये और सेवन के समय भोग से दूर रहना चाहिये ।

संधिवात (आर्थराईटिज)  के घरेलू,आयुर्वेदिक उपाय

एसिड फॉस – इस दवा का प्रयोग धातु-दौर्बल्य तथा वीर्यक्षयजनित बीमारियों में होता है । जो व्यक्ति हस्तमैथुन या अत्यधिक इन्द्रियचालन करते हैं तथा जिन्हें स्वप्नदोष आदि होने लगता है उनके लिये यह लाभप्रद है ।
लाइकोपोडियम 1M – डॉ० नैश के अनुसार यह नपुंसकता की बहुत कारगर दवा है । अत्यधिक मैथुन, हस्तमैथुन, वृद्धावस्था आदि के कारण आई हुई नपुंसकता में यह दवा लाभप्रद है । नपुंसकता की इससे बढ़कर अन्य दवा नहीं है । यह दीर्घ क्रिया करने वाली औषधि है अतः इसकी उच्वशक्ति की एक मात्रा देकर परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिये । इसे बार-बार या जल्दी-जल्दी दोहराना नहीं चाहिये अन्यथा दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं ।

धतूरा के औषधीय उपयोग

अश्वगन्धा – जिस प्रकार आयुर्वेद चिकित्सा-पद्धति में इसकी जड़ के रस का बड़े ही आदर से मर्दाना  कमजोरी हेतु प्रयोग करते हैं उसी प्रकार होमियोपैथी में भी अश्वगन्धा मूल अर्क का मर्दाना कमजोरी में प्रयोग होता है । इसके प्रयोग से शक्ति प्राप्त होती हैं ।
स्टेफिसेग्रिया – इस दवा की क्रिया प्रमुख रूप से मस्तिष्क एवं जननेन्द्रिय पर होती है। जो युवक हमेशा एकान्त पाकर काम इच्छाओं की पूर्ति (हस्तमैथुन) करते हैं व जिसकी वजह से उनके मस्तिष्क में दुर्बलता आ जाती है- उनके लिये उत्तम है । इसके सेवन से कई प्रकार के गुप्त रोगों में भी यथोचित परिणाम मिलते हैं ।

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एवेना सैटाइवा – यह मूलतः ओट या जाई (जो निम्न किस्म की एक घास होती है और जिसे निर्धन वर्ग के लोग खाते हैं) है परन्तु यह एक शक्तिवर्द्धक टॉनिक भी है । किसी भी प्रकार के शारीरिक क्षय, कमजोरी आदि में इसका मूल अर्क प्रयोग होता है । अनजाने में वीर्य निकल जाना, रति-शक्ति का घट जाना, वीर्यक्षय के कारण कमजोरी आदि स्थितियों में यह दवा बहुत अच्छा काम करती है।

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होम्योपैथिक औषधि बेलाडोना ( Belladonna ) का गुण लक्षण उपयोग


होम्योपैथिक औषधि बेलाडोना ( Belladonna ) का गुण लक्षण उपयोग बेलाडोना होम्योपैथी की एक औषधि है। जो कई तरह के कष्टदायी रोगों को ठीक करती है। बेलाडोना के इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सबसे पहले जानते हैं बेलाडोना क्या है। बेलाडोना को कई वनस्पतियों के जरिए तैयार किया जाता है। इसे सोलेनम मैनियेकम आदि के नाम से भी जाना जाता है। बेलाडोना का पौधा यूरोपीय देशों में उगता है। लेकिन इसकी औषधि आपको किसी भी होम्योपैथी की दुकान में आसानी से मिल सकती है


लक्षण 
(1) शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन 
(2) रक्त-संचय की अधिकता तथा सिर दर्द, प्रलाप, पागलपन 
(3) दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है। 
(4) रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना 
5) प्रकाश, शोर, स्पर्श सहन न कर सकना
 (6) मूत्राशय की उत्तेजितावस्था 
7) असहिष्णु-जरायु से रक्तस्राव
 (8) हिलने-डुलने, शीत, स्पर्शादि से रोग-वृद्धि 
(9) दाईं तरफ प्रभाव करनेवाली औषधि है। 
(10) दोपहर 3 बजे से रात तक रोग-वृद्धि लक्षणों में कमी 
(i) हल्का ओढ़ना पसन्द करना 
(ii) बिस्तर में विश्राम पसन्द 
(iii) गर्म घर में सोना पसन्द लक्षणों में वृद्धि
 (i) छूने से, गंध से, शब्द से
 (ii) वायु की झोंकें से वृद्धि
(iii) हिलने-डोलने से वृद्धि 
(iv) दिन के 3 बजे से रात तक वृद्धि 
(v) सूर्य की गर्मी से रोग-वृद्धि
 (vi) बाल कटवाने से रोग-वृद्धि *
शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन –
 बेलाडोना के शोथ में उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन इसके विशिष्ट लक्षण है। इन तीनों की स्थिति निम्न है: भयंकर उत्ताप – फेफड़े, मस्तिष्क, जिगर, अंतड़ियों अथवा किसी अन्य अंग में शोथ हो तो भयंकर उत्ताप मौजूद होता है। इस रोगी की त्वचा पर हाथ रखा जाय, तो एकदम हटा लेना पड़ता है क्योंकि त्वचा में भयंकर गर्मी होती है। इतनी भयंकर गर्मी के हाथ हटा लेने के बाद भी कुछ समय तक गर्मी की याद बनी रहती है। रोगी के किसी अंग में भी शोथ क्यों न हो, उसे छूने से भयंकर उत्ताप का अनुभव होता है। 
*टाइफॉयड के उत्ताप में बेलाडोना न दे – 
टाइफॉयड में अगर इस प्रकार का उत्ताप मौजूद भी हो, तो भी उसमें बेलाडोना कभी नहीं देना चाहिये। इसका कारण यह है कि औषधि की गति तथा रोग की गति में सम-रसता होना आवश्यक है। बेलाडोना की शिकायतें यकायक, एकदम, बड़े वेग से आती हैं और यकायक ही चली भी जाती हैं। टाइफॉयड यकायक नहीं आता, धीरे-धीरे आता है और धीरे-धीरे जाता है। बेलाडोना की गति और टाइफॉयड की गति में सम-रसता नहीं है, इसलिये इसमें बेलाडोना देने से रोग बढ़ सकता है, घट नहीं सकता। बेलाडोना उसी ज्वर में देना उचित है जिसमें ज्वर यकायक आये, धीमी गति से न आये। बेलाडोना में ताप होता है, बेहद ताप, भयंकर ताप। 

*रक्तिमा – 
बेलाडोना के शोथ में दूसरा मुख्य-लक्षण रक्तिमा है। अंग के जिस स्थान पर शोथ हुआ है, वह बेहद लाल दिखाई देता है। लालिमा के बाद इसका रंग हल्का पड़ सकता है, कुछ काला पड़ सकता है, ऐसा भी हो सकता है कि विशेष रूप से पहचाना न जाय परन्तु शुरू में चमकीला लाल होता है। शरीर की गांठों में शोथ होगी तो वह भी लाल रंग की, गला पकेगा तो लाल रंग जैसा, ऐसा जैसे अंगारा हो, फिर उसका रंग फीका पड़ सकता है, परन्तु शुरू में देखते ही लाल रंग होता है।
 *बेहद जलन – 
बेलाडोना के शोथ में तीसरा मुख्य-लक्षण बेहद जलन है। शोथ में, ज्वर में, रक्त-संचय में, टांसिल में बेहद जलन होती है। इतना ही नहीं कि यह जलन हाथ से छूने से अनुभव की जाय, रोगी को अपने आप भी जलन महसूस होती है। उदरशोथ (Gastritis) में पेट में जलन होती है। इस प्रकार उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन-ये तीनों बेलाडोना औषधि में मुख्य स्थान रखते हैं। 
*आंख दुखना जिसमें उत्ताप, रतिमा और जलन हो – 
आंख में गर्मी, रक्तिमा और जलन जो बेलाडोना के लक्षण हैं, उनके मौजूद होने पर यह इसे ठीक कर देता है। आँख से पानी आना, रोशनी में आंख न खोल सकना, आंख में गर्मी लाली और जलन के बाद कभी-कभी आख में ‘टीर’ (Squint) रह जाता है। उसे बेलाडोना औषधि ठीक कर देती है।
 *उत्ताप, रक्तिमा, तथा जलन के लक्षणों में सूजन, आंख दुखना, डिसेन्ट्री, बवासीर तथा गठिया के रोग – 
यह हम कह चुके हैं कि बेलाडोना में तीन लक्षण आधारभूत हैं उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन। इन तीन को ध्यान में रखते हुए यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि शोथ, आँख दुखना, डिसेन्ट्री तथा बवासीर में इसकी कितनी उपयोगिता है। इनके अलावा जहां भी ये तीन लक्षण हों, वही बेलाडोना उपयोगी है। 
*सूजन जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
अगर किसी अंग में सूजन हो जाय, सूजन के स्थान को छुआ तक न जा सके – स्मरण रहे कि स्पर्श के लिये असहिष्णुता बेलाडोना औषधि का चरित्रगत-लक्षण है –
 दर्द हो, ऐसा अनुभव हो कि सूजन का स्थान फूट पड़ेगा, इसके साथ उस स्थान में गर्मी, लाली और जलन हो, तो बेलाडोना औषधि है, सूजन के विषय में स्मरण रखना चाहिये कि अगर सूजन के बाद सूजन पकने लगे तब बेलाडोना लाभ नहीं कर सकता, पकने से पहले की अवस्था तक ही इसकी सीमा है। 
*डिसेन्ट्री जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
रोगी बार-बार जोर लगाता है, मुँह तपने लगता है, चेहरा लाल हो जाता है, सिर और चेहरे पर जलन शुरू हो जाती है, हाथ-पैर ठन्डे और सिर गर्म, बहुत जोर लगाने पर भी बहुत थोड़ा मल – ऐसी डिसेन्ट्री में बेलाडोना लाभप्रद है। 
*बवासीर जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो –
 ऐसी बवासीर जिसमें सख्त दर्द हो, मस्से बेहद लाल हों, सूज रहे हों, छुए न जा सकें, जलन हो, रोगी टांगें पसार कर ही लेट सके – ऐसी बवासीर में बेलाडोना लाभ करेगा। 





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*गठिया जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
गठिये में जब सब या कुछ जोड़ सूज जाते हैं, तब इन जोड़ों में उत्ताप, लाली और जलन होती है। ऐसी गठिये में उत्ताप, रक्तिमा और जलन मौजूद रहते हैं। इसके साथ रोगी स्वयं ‘असहिष्णु’ (Sensitive) होता है और जोड़ों को किसी को छूने नहीं देता। जरा-सा छू जाने से उसे दर्द होता है। वह बिस्तर पर बिना हिले-जुले पड़ा रहना चाहता है। जोड़ों में दर्द के साथ तेज बुखार में वह शान्त पड़ा रहता है। बेलाडोना का रोगी शीत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, कपड़े से लिपटा रहता है, हवा के झोंके से परेशान हो जाता है, गर्मी से उसे राहत मिलती है। 


*रक्त-संचय की अधिकता तथा सिद-दर्द – 
अभी हमने उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन का उल्लेख किया। उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन क्यो होते हैं? इसका कारण रुधिर का किसी जगह एकत्रित हो जाना है। बेलाडोना इस प्रकार रुधिर के किसी अंग-विशेष में संचित हो जाने पर औषधियों का राजा है। यह रक्त-संचय कहीं भी हो सकता है – सिर में, छाती में, जरायु में, जोड़ों में, त्वचा पर-शरीर के किसी भी अंग पर यह संचय हो सकता है। इस प्रकार के रुधिर-संचय में विशेष लक्षण यह है कि यह बड़े वेग से आता है और एकदम आता है। हम अभी देखेंगे कि लक्षणों का वेग से आना और एकदम जाना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। बेलाडोना के रोग वेग से आते हैं और एकदम जाते हैं, इसके रोगों की गतियां मन्द वेग से नहीं चलती। बिजली के से वेग से आना बेलाडोना की विशेषता है। बच्चा जब सोया था तब बिल्कुल ठीक था, परन्तु मध्य-रात्रि में ही एकदम उसे दौरा पड़ गया, हाथ्र-पैर ऐंठने लगे, पेट में दर्द उठ खड़ा हुआ – ये सब एकदम और वेग से आने वाले रक्त-संचय के लक्षण बेलाडोना औषधि के हैं। इन्हीं लक्षणों के कारण हाई-ब्लड प्रेशर की भी यह उत्कृष्ट दवा है। 


*रक्त-संचय से सिरदर्द – 
रक्त की गति जब सिर की तरफ़ चली जाती है तब सिर दर्द होने लगता है। बेलाडोना में भयंकर सिर-दर्द होता है। ऐसा दर्द मानो सिर में कुछ छुरे चल रहे हों। बेलाडोना का रोगी हरकत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, स्पर्श को सहन नहीं कर सकता, रोशनी और हवा को भी नहीं सह सकता। बच्चा बिस्तर पर पड़ा सिर-दर्द से चीखता है, तकिये पर सिर इधर-उधर पटकता है यद्यपि सिर का हिलना सिर-दर्द को और बढ़ाता है। यह सिर-दर्द सिर में रक्त-संचय के कारण होता है। जब ज्वर तेज हो तब ऐसा सिर-दर्द हुआ करता है। रोगी अनुभव करता है कि रुधिर सिर की तरफ दौड़ रहा है। बेलाडोना के सिर दर्द में सिर गरम होता है और हाथ-पैर ठंडे होते हैं, आंखें लाल, कनपटियों की रंगों में टपकन होती है, लेटने से सिर-दर्द बढ़ता है, रोगी पगड़ी से या किसी चीज से सिर को कस कर बांधता है, तब उसे आराम मालूम देता है। 


*रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना –
 बेलाडोना के इन दो लक्षणों को भूला नहीं जा सकता। रोग बड़े वेग से, प्रचंड रूप में आक्रमण करता है, और यह आक्रमण यकायक होता है। 
‘प्रचंडता’ और ‘एकाएकपना’ इस औषधि के मूल में पाया जाता है। किसी प्रकार का दर्द हो, प्रचंड सिर-दर्द, धमनियों का प्रचंड-स्पन्दन, प्रचंड-डिलीरियम, प्रचंड-पागलपन, प्रचंड-ऐंठन। रोग की प्रचंडता और एकाएकपने में एकोनाइट तथा बेलाडोना का सादृश्य है, इसलिये इनकी तुलना कर लेना आवश्यक है। 
*रक्त के सिर की तरफ़ दौर से प्रलाप – 
बेलाडोना में रक्त का सिर की तरफ दौर इतना जबर्दस्त होता है कि रोगी की प्रबल प्रलाप तथा बेहोशी की-सी अवस्था हो जाती है। यद्यपि उसे नींद आ रही होती है तो भी वह सो नहीं सकता। वह सिर को तकिये पर इधर-उधर डोलता रहता है। कभी-कभी वह प्रगाढ़ निद्रा में जा पहुंचता है जिसमें उसे घबराहट भरे स्वप्न आते हैं। वह देखता है हत्याएं, डाकू, आगजनी। वह प्रलाप भी करने लगता है – उसे भूत-प्रेत, राक्षस, काले कुत्ते, भिन्न-भिन्न प्रकार के कीड़े-मकौड़े दिखाई देने लगते हैं। यह सब रक्त का सिर की तरफ दौर होने का परिणाम है। 


*पागलपन – 
जब रक्त का सिर की तरफ दौर बहुत अधिक हो जाता है, तब बेलाडोना में पागलपन की अवस्था आ जाती है। वह अपना भोजन मंगवाता है, परन्तु खाने के बजाय चम्मच को काटने लगता है, तश्तरी को चबाता है, कुत्ते की तरह नाक चढ़ाता और भौंकता है। वह अपना गला घोंटने का प्रयत्न करता है, और दूसरों को कहता है कि वे उसकी हत्या कर दें। हाय-हाय करना – इस औषधि की विशेषता है। ठीक हालत में हो या न हो, वह हाय-हाय किये जाती है। जल्द-जल्द कुछ बड़बड़ाता जाता है जिसका कुछ अर्थ नहीं होता। उसे ऐसे काल्पनिक भयंकर दृश्य दिखाई देते हैं जिनसे जान बचाने के लिये वह भाग या छिप जाना चाहता है। उसका पागलपन उत्कट उन्माद का रूप धारण कर लेता है जिसमें वह तोड़-फोड़, मार-काट, गाली-गलौज करता है। दूसरों पर थूकता है, दांत पीसता, किटकिटाता है। डॉ० नैश ने पागलपन की तीन दवाओं पर विशेष बल दिया है – बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम। इनकी तुलना निम्न प्रकार है।


 *पागलपन में बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम की तुलना – 
इन तीनों को मस्तिष्क के रोगों की औषधि कहा जा सकता है। बेलाडोना में उन्माद की प्रचंडता प्रधान है, हायोसाइमस में प्रचंडता नहीं होती, निरर्थक गुनगुनाना प्रधान होता है, प्रचंडता तो कभी-कभी ही आती है। बेलाडोना का चेहरा लाल, हायोसाइमस का चेहरा पीला और बैठा हुआ होता है। हायोसाइमस कमजोर होता है, और कमजोरी बढ़ती जाती है। इस कमजोरी के कारण उसके उन्माद में प्रचंडता देर तक नहीं रह सकती। हायोसाइमस की शुरूआत प्रचंडता से हो सकती है परन्तु कमजोरी बढ़ने के साथ वह हटती जाती है। स्ट्रैमोनियम में उन्माद की प्रचंडता पहली दोनों औषधियों से अधिक है। वह चिल्ला-चिल्लाकर गाता, ठहाके मारकर हँसता, चिल्लाता, प्रार्थना करने लगता, गालियां बकने लगता-बड़ा बकवादी हो जाता है। उन्माद की प्रचंडता में स्ट्रैमोनियम तीनों से अधिक, फिर बेलाडोना, और सब से कम हायोसाइमस है। प्रचंडता के अतिरिक्त अन्य लक्षणों को भी निर्वाचन के समय ध्यान में रखना चाहिये। उदाहरणार्थ, बेलाडोना प्रकाश को सहन नहीं कर सकता, स्ट्रैमोनियम अन्धेरे को नहीं सहन कर सकता। बेलाडोना अन्धेरा चाहता है, स्ट्रैमोनियम प्रकाश। *दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है – लक्षणों का बड़े वेग से आना, और एकदम आना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। इसी लक्षण का रूप तब स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते हैं कि कोई भी दर्द एकदम आये और एकदम ही चला जाये, तो वह बेलाडोना से ठीक हो जाता है। सर्दी लगी, एकदम दर्द शुरू हुआ, बीमारी ने अपना जितना समय लगाना था लगाया, और दर्द जैसे एकदम आया था वैसे एकदम शान्त हो गया। कभी-कभी यह दर्द कुछ मिनट रहकर ही चला जाता है। स्ट्रैमोनियम में दर्द मीठा-मीठा शुरू होता है, धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, उच्च-शिखर पर जाकर फिर धीरे-धीरे शान्त होता है। मैग्नेशिया फॉस का सिर-दर्द एकाएक आता है, चिरकाल तक बना रहता है और एकाएक ही जाता है। सल्फ्यूरिक ऐसिड में धीरे-धीरे शुरू होता है, पर एकदम जाता है।


 बेलाडोना और एकोनाइट की तुलना – 
ये दोनों औषधियों हृष्ट-पुष्ट शरीर के लोगों के लिये उपयोगी हैं। हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ बच्चा या एक तगड़ा नौजवान यह समझ कर कि उसे सर्दी क्या कर लेगी, ठंड में कम कपड़े पहन कर निकलता है और रात में ही या सवेरे तक शीत के किसी रोग से आक्रान्त हो जाता है। रोग का आक्रमण एकदम होता है और जोर से होता है। दोनों इस बात में समान हैं, परन्तु बेलाडोना में मस्तिष्क में तूफ़ान उठता है, बुखार के साथ असह्य सिर-दर्द हो जाता है, एकोनाइट में रुधिर की गति में तूफान उठता है, छाती या हृदय में दर्द हो जाता है, न्यूमोनिया, खांसी, जुकाम हो जाता है। 
*मूत्राशय की उत्तेजितावस्था – 
बेलाडोना के अतिरिक्त दूसरी कोई औषधि ऐसी नहीं है जो मूत्राशय तथा मूत्र-नाली की उत्तेजितावस्था को शान्त कर सके। पेशाब करने की इच्छा लगातार बनी रहती है। इस औषधि में स्पर्शादि को सहन न कर सकने का जो लक्षण है, उसी का यह परिणाम है। पेशाब बूंद-बूंद कर टपकता है और सारी मूत्र-नाली में दाह उत्पन्न करता है। सारा मूत्र-संस्थान उत्तेजित अवस्था में पाया जाता है। मूत्राशय में शोथ होती है। मूत्राशय में रक्त-संचय और उसके उत्तेजितावस्था होने के कारण उस स्थान को छुआ तक नहीं जा सकता। मानसिक अवस्था भी चिड़चिड़ी हो जाती है। यह अवस्था मूत्राशय में मरोड़ पड़ने की-सी है। मूत्र में रुधिर आता है, कभी-कभी शुद्ध खून। ऐसी अवस्था में पायी जाती है कि मूत्राशय भरा हुआ है परन्तु मूत्र नहीं निकल रहा। शिकायत का केन्द्र स्थूल मूत्राशय की ग्रीवा है जहां मूत्राशय में थोड़ा-सा भी मूत्र इकट्ठा होने पर पेशाब जाने की हाजत होती है, परन्तु दर्द होता है मूत्र नहीं निकलता। 


* प्रकाश, शोर, स्पर्श आदि सहन नहीं कर सकता –
 इस रोगी की पांचों इन्द्रियों में अत्यन्त अनुभूति उत्पन्न हो जाती है। रोगी आंखों से रोशनी, कानों से शब्द, जीभ से स्वाद, नाक से गंध, त्वचा के स्पर्श की अनुभूति साधारण व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक करने लगता है, वह रोशनी, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि को सहन नहीं कर सकता। उसका स्नायु-मंडल उत्तेजित रहता है। स्नायु-मंडल की उत्तेजना बेलाडोना का मुख्य-लक्षण है। ओपियम इससे ठीक उल्टा है। उसमें ‘सहिष्णुता’ (Sensitivity) रहती ही नहीं। बेलाडोना के रोगी में मस्तिष्क में जितना रुधिर संचित होगा उतनी असहिष्णुता बढ़ जायगी। स्पर्श की असहिष्णुता उसमें इतनी होती है कि सिर के बालों में कघी तक नहीं फेर सकता, सिर के बालों को छूने तक नहीं देता। इस प्रकार की असहिष्णुता अन्य औषधियों में भी पायी जाती है। उदाहरणार्थ, हिपर पर रोगी दर्द को इतना अनुभव करता है कि बेहोश हो जाता है, नाइट्रिक ऐसिड का रोगी सड़क पर चलती गाड़ियों की आवाज को सहन नहीं कर सकता, उससे उसकी तकलीफें बढ़ जाता हैं, कॉफिया का रोगी तीन मंजिल ऊपर के मकान पर भी किसी के चलने की आवाज सुन लेता है तो उससे परेशान हो जाता है यद्यपि अन्य किसी को वह आवाज नहीं सुनाई पड़ती, नक्स वोमिका के रोगी के शरीर की पीड़ा लोगों के पैरों की आहट से बढ़ जाती है। बुखार यदि बुखार की वजह से चेहरा और आंख लाल हो गए हों। तो बेलाडोना का सेवन करने से ठीक हो जाता है। पेट दर्द में यदि पेट में भंयकर दर्द हो रहा हो या पेट फूल गया हो। तो बेलाडोना लेने से आपको राहत मिलेगी। सिर व गर्दन दर्द यदि गर्दन उठाने व झुकाने में दर्द हो रहा हो तो बेलाडोना का सेवन करने से आपकी ये समस्या ठीक हो जाती है। सूखी खांसी सूखी खांसी में यदि खांसते-खांसते एैसा लग रहा हो कि दम निकल रहा है और चेहरा लाल हो गया हो तो आप बेलाडोना का सेवन करें। इससे आपकी सूखी खांसी की समस्या ठीक हो जाएगी। किसी भी तरह का दर्द शरीर में यदि किसी भी तरह का दर्द हो रहा हो और वह शांत न हो रहा हो तो बेलाडोना सेवन करने से दर्द ठीक हो जाता है। जीभ की सूजन जीभ का लाल होना, मसूड़ों में दर्द और जीभ की सूजन होने पर बेलाडोना का सेवन करें। मासिक धर्म महिलाओं को मासिक धर्म में अधिक परेशानी हो रही हो या रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो वे बेलाडोना का सेवन करें। गले की सूजन यदि गले में सूजन हो गई हो या गले में संकुचन हो रहा हो तो बेलाडोना के सेवन से लाभ मिलता है। कमर दर्द और गर्दन की अकड़न में बेलाडोना का सेवन करें।


बेलाडोना होम्योपैथी की एक औषधि है। जो कई तरह के कष्टदायी रोगों को ठीक करती है। बेलाडोना के इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सबसे पहले जानते हैं बेलाडोना क्या है। बेलाडोना को कई वनस्पतियों के जरिए तैयार किया जाता है। इसे सोलेनम मैनियेकम आदि के नाम से भी जाना जाता है। बेलाडोना का पौधा यूरोपीय देशों में उगता है। लेकिन इसकी औषधि आपको किसी भी होम्योपैथी की दुकान में आसानी से मिल सकती हैलक्षण
(1) शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन
(2) रक्त-संचय की अधिकता तथा सिर दर्द, प्रलाप, पागलपन
(3) दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है।
(4) रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना
(5) प्रकाश, शोर, स्पर्श सहन न कर सकना
(6) मूत्राशय की उत्तेजितावस्था
(7) असहिष्णु-जरायु से रक्तस्राव

हर प्रकार की खांसी और कफ की समस्या के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार 

(8) हिलने-डुलने, शीत, स्पर्शादि से रोग-वृद्धि
(9) दाईं तरफ प्रभाव करनेवाली औषधि है।
(10) दोपहर 3 बजे से रात तक रोग-वृद्धि
लक्षणों में कमी
(i) हल्का ओढ़ना पसन्द करना
(ii) बिस्तर में विश्राम पसन्द
(iii) गर्म घर में सोना पसन्द
लक्षणों में वृद्धि
(i) छूने से, गंध से, शब्द से
(ii) वायु की झोंकें से वृद्धि
(iii) हिलने-डोलने से वृद्धि
(iv) दिन के 3 बजे से रात तक वृद्धि
(v) सूर्य की गर्मी से रोग-वृद्धि
(vi) बाल कटवाने से रोग-वृद्धि


कान दर्द,कान पकना,बहरापन के उपचार


*शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन –
 बेलाडोना के शोथ में उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन इसके विशिष्ट लक्षण है। इन तीनों की स्थिति निम्न है:
भयंकर उत्ताप – फेफड़े, मस्तिष्क, जिगर, अंतड़ियों अथवा किसी अन्य अंग में शोथ हो तो भयंकर उत्ताप मौजूद होता है। इस रोगी की त्वचा पर हाथ रखा जाय, तो एकदम हटा लेना पड़ता है क्योंकि त्वचा में भयंकर गर्मी होती है। इतनी भयंकर गर्मी के हाथ हटा लेने के बाद भी कुछ समय तक गर्मी की याद बनी रहती है। रोगी के किसी अंग में भी शोथ क्यों न हो, उसे छूने से भयंकर उत्ताप का अनुभव होता है।
*टाइफॉयड के उत्ताप में बेलाडोना न दे – 
टाइफॉयड में अगर इस प्रकार का उत्ताप मौजूद भी हो, तो भी उसमें बेलाडोना कभी नहीं देना चाहिये। इसका कारण यह है कि औषधि की गति तथा रोग की गति में सम-रसता होना आवश्यक है। बेलाडोना की शिकायतें यकायक, एकदम, बड़े वेग से आती हैं और यकायक ही चली भी जाती हैं। टाइफॉयड यकायक नहीं आता, धीरे-धीरे आता है और धीरे-धीरे जाता है। बेलाडोना की गति और टाइफॉयड की गति में सम-रसता नहीं है, इसलिये इसमें बेलाडोना देने से रोग बढ़ सकता है, घट नहीं सकता। बेलाडोना उसी ज्वर में देना उचित है जिसमें ज्वर यकायक आये, धीमी गति से न आये। बेलाडोना में ताप होता है, बेहद ताप, भयंकर ताप।

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*रक्तिमा – 
बेलाडोना के शोथ में दूसरा मुख्य-लक्षण रक्तिमा है। अंग के जिस स्थान पर शोथ हुआ है, वह बेहद लाल दिखाई देता है। लालिमा के बाद इसका रंग हल्का पड़ सकता है, कुछ काला पड़ सकता है, ऐसा भी हो सकता है कि विशेष रूप से पहचाना न जाय परन्तु शुरू में चमकीला लाल होता है। शरीर की गांठों में शोथ होगी तो वह भी लाल रंग की, गला पकेगा तो लाल रंग जैसा, ऐसा जैसे अंगारा हो, फिर उसका रंग फीका पड़ सकता है, परन्तु शुरू में देखते ही लाल रंग होता है।
*बेहद जलन – बेलाडोना के शोथ में तीसरा मुख्य-लक्षण बेहद जलन है। शोथ में, ज्वर में, रक्त-संचय में, टांसिल में बेहद जलन होती है। इतना ही नहीं कि यह जलन हाथ से छूने से अनुभव की जाय, रोगी को अपने आप भी जलन महसूस होती है। उदरशोथ (Gastritis) में पेट में जलन होती है। इस प्रकार उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन-ये तीनों बेलाडोना औषधि में मुख्य स्थान रखते हैं।

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*आंख दुखना जिसमें उत्ताप, रतिमा और जलन हो – 
आंख में गर्मी, रक्तिमा और जलन जो बेलाडोना के लक्षण हैं, उनके मौजूद होने पर यह इसे ठीक कर देता है। आँख से पानी आना, रोशनी में आंख न खोल सकना, आंख में गर्मी लाली और जलन के बाद कभी-कभी आख में ‘टीर’ (Squint) रह जाता है। उसे बेलाडोना औषधि ठीक कर देती है।
*उत्ताप, रक्तिमा, तथा जलन के लक्षणों में सूजन, आंख दुखना, डिसेन्ट्री, बवासीर तथा गठिया के रोग – 
यह हम कह चुके हैं कि बेलाडोना में तीन लक्षण आधारभूत हैं उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन। इन तीन को ध्यान में रखते हुए यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि शोथ, आँख दुखना, डिसेन्ट्री तथा बवासीर में इसकी कितनी उपयोगिता है। इनके अलावा जहां भी ये तीन लक्षण हों, वही बेलाडोना उपयोगी है।
*सूजन जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो –
 अगर किसी अंग में सूजन हो जाय, सूजन के स्थान को छुआ तक न जा सके – स्मरण रहे कि स्पर्श के लिये असहिष्णुता बेलाडोना औषधि का चरित्रगत-लक्षण है – दर्द हो, ऐसा अनुभव हो कि सूजन का स्थान फूट पड़ेगा, इसके साथ उस स्थान में गर्मी, लाली और जलन हो, तो बेलाडोना औषधि है, सूजन के विषय में स्मरण रखना चाहिये कि अगर सूजन के बाद सूजन पकने लगे तब बेलाडोना लाभ नहीं कर सकता, पकने से पहले की अवस्था तक ही इसकी सीमा है।


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*डिसेन्ट्री जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो –
 रोगी बार-बार जोर लगाता है, मुँह तपने लगता है, चेहरा लाल हो जाता है, सिर और चेहरे पर जलन शुरू हो जाती है, हाथ-पैर ठन्डे और सिर गर्म, बहुत जोर लगाने पर भी बहुत थोड़ा मल – ऐसी डिसेन्ट्री में बेलाडोना लाभप्रद है।
*बवासीर जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
ऐसी बवासीर जिसमें सख्त दर्द हो, मस्से बेहद लाल हों, सूज रहे हों, छुए न जा सकें, जलन हो, रोगी टांगें पसार कर ही लेट सके – ऐसी बवासीर में बेलाडोना लाभ करेगा।
*गठिया जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
गठिये में जब सब या कुछ जोड़ सूज जाते हैं, तब इन जोड़ों में उत्ताप, लाली और जलन होती है। ऐसी गठिये में उत्ताप, रक्तिमा और जलन मौजूद रहते हैं। इसके साथ रोगी स्वयं ‘असहिष्णु’ (Sensitive) होता है और जोड़ों को किसी को छूने नहीं देता। जरा-सा छू जाने से उसे दर्द होता है। वह बिस्तर पर बिना हिले-जुले पड़ा रहना चाहता है। जोड़ों में दर्द के साथ तेज बुखार में वह शान्त पड़ा रहता है। बेलाडोना का रोगी शीत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, कपड़े से लिपटा रहता है, हवा के झोंके से परेशान हो जाता है, गर्मी से उसे राहत मिलती है।


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*रक्त-संचय की अधिकता तथा सिद-दर्द – 
अभी हमने उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन का उल्लेख किया। उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन क्यो होते हैं? इसका कारण रुधिर का किसी जगह एकत्रित हो जाना है। बेलाडोना इस प्रकार रुधिर के किसी अंग-विशेष में संचित हो जाने पर औषधियों का राजा है। यह रक्त-संचय कहीं भी हो सकता है – सिर में, छाती में, जरायु में, जोड़ों में, त्वचा पर-शरीर के किसी भी अंग पर यह संचय हो सकता है। इस प्रकार के रुधिर-संचय में विशेष लक्षण यह है कि यह बड़े वेग से आता है और एकदम आता है। हम अभी देखेंगे कि लक्षणों का वेग से आना और एकदम जाना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। बेलाडोना के रोग वेग से आते हैं और एकदम जाते हैं, इसके रोगों की गतियां मन्द वेग से नहीं चलती। बिजली के से वेग से आना बेलाडोना की विशेषता है। बच्चा जब सोया था तब बिल्कुल ठीक था, परन्तु मध्य-रात्रि में ही एकदम उसे दौरा पड़ गया, हाथ्र-पैर ऐंठने लगे, पेट में दर्द उठ खड़ा हुआ – ये सब एकदम और वेग से आने वाले रक्त-संचय के लक्षण बेलाडोना औषधि के हैं। इन्हीं लक्षणों के कारण हाई-ब्लड प्रेशर की भी यह उत्कृष्ट दवा है।
 
*रक्त-संचय से सिरदर्द – 
रक्त की गति जब सिर की तरफ़ चली जाती है तब सिर दर्द होने लगता है। बेलाडोना में भयंकर सिर-दर्द होता है। ऐसा दर्द मानो सिर में कुछ छुरे चल रहे हों। बेलाडोना का रोगी हरकत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, स्पर्श को सहन नहीं कर सकता, रोशनी और हवा को भी नहीं सह सकता। बच्चा बिस्तर पर पड़ा सिर-दर्द से चीखता है, तकिये पर सिर इधर-उधर पटकता है यद्यपि सिर का हिलना सिर-दर्द को और बढ़ाता है। यह सिर-दर्द सिर में रक्त-संचय के कारण होता है। जब ज्वर तेज हो तब ऐसा सिर-दर्द हुआ करता है। रोगी अनुभव करता है कि रुधिर सिर की तरफ दौड़ रहा है। बेलाडोना के सिर दर्द में सिर गरम होता है और हाथ-पैर ठंडे होते हैं, आंखें लाल, कनपटियों की रंगों में टपकन होती है, लेटने से सिर-दर्द बढ़ता है, रोगी पगड़ी से या किसी चीज से सिर को कस कर बांधता है, तब उसे आराम मालूम देता है।
*रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना – 
बेलाडोना के इन दो लक्षणों को भूला नहीं जा सकता। रोग बड़े वेग से, प्रचंड रूप में आक्रमण करता है, और यह आक्रमण यकायक होता है। ‘प्रचंडता’ और ‘एकाएकपना’ इस औषधि के मूल में पाया जाता है। किसी प्रकार का दर्द हो, प्रचंड सिर-दर्द, धमनियों का प्रचंड-स्पन्दन, प्रचंड-डिलीरियम, प्रचंड-पागलपन, प्रचंड-ऐंठन। रोग की प्रचंडता और एकाएकपने में एकोनाइट तथा बेलाडोना का सादृश्य है, इसलिये इनकी तुलना कर लेना आवश्यक है।


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*रक्त के सिर की तरफ़ दौर से प्रलाप – 
बेलाडोना में रक्त का सिर की तरफ दौर इतना जबर्दस्त होता है कि रोगी की प्रबल प्रलाप तथा बेहोशी की-सी अवस्था हो जाती है। यद्यपि उसे नींद आ रही होती है तो भी वह सो नहीं सकता। वह सिर को तकिये पर इधर-उधर डोलता रहता है। कभी-कभी वह प्रगाढ़ निद्रा में जा पहुंचता है जिसमें उसे घबराहट भरे स्वप्न आते हैं। वह देखता है हत्याएं, डाकू, आगजनी। वह प्रलाप भी करने लगता है – उसे भूत-प्रेत, राक्षस, काले कुत्ते, भिन्न-भिन्न प्रकार के कीड़े-मकौड़े दिखाई देने लगते हैं। यह सब रक्त का सिर की तरफ दौर होने का परिणाम है।
*पागलपन –
 जब रक्त का सिर की तरफ दौर बहुत अधिक हो जाता है, तब बेलाडोना में पागलपन की अवस्था आ जाती है। वह अपना भोजन मंगवाता है, परन्तु खाने के बजाय चम्मच को काटने लगता है, तश्तरी को चबाता है, कुत्ते की तरह नाक चढ़ाता और भौंकता है। वह अपना गला घोंटने का प्रयत्न करता है, और दूसरों को कहता है कि वे उसकी हत्या कर दें। हाय-हाय करना – इस औषधि की विशेषता है। ठीक हालत में हो या न हो, वह हाय-हाय किये जाती है। जल्द-जल्द कुछ बड़बड़ाता जाता है जिसका कुछ अर्थ नहीं होता। उसे ऐसे काल्पनिक भयंकर दृश्य दिखाई देते हैं जिनसे जान बचाने के लिये वह भाग या छिप जाना चाहता है। उसका पागलपन उत्कट उन्माद का रूप धारण कर लेता है जिसमें वह तोड़-फोड़, मार-काट, गाली-गलौज करता है। दूसरों पर थूकता है, दांत पीसता, किटकिटाता है। डॉ० नैश ने पागलपन की तीन दवाओं पर विशेष बल दिया है – बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम। इनकी तुलना निम्न प्रकार है।


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*पागलपन में बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम की तुलना – 
इन तीनों को मस्तिष्क के रोगों की औषधि कहा जा सकता है। बेलाडोना में उन्माद की प्रचंडता प्रधान है, हायोसाइमस में प्रचंडता नहीं होती, निरर्थक गुनगुनाना प्रधान होता है, प्रचंडता तो कभी-कभी ही आती है। बेलाडोना का चेहरा लाल, हायोसाइमस का चेहरा पीला और बैठा हुआ होता है। हायोसाइमस कमजोर होता है, और कमजोरी बढ़ती जाती है। इस कमजोरी के कारण उसके उन्माद में प्रचंडता देर तक नहीं रह सकती। हायोसाइमस की शुरूआत प्रचंडता से हो सकती है परन्तु कमजोरी बढ़ने के साथ वह हटती जाती है। स्ट्रैमोनियम में उन्माद की प्रचंडता पहली दोनों औषधियों से अधिक है। वह चिल्ला-चिल्लाकर गाता, ठहाके मारकर हँसता, चिल्लाता, प्रार्थना करने लगता, गालियां बकने लगता-बड़ा बकवादी हो जाता है। उन्माद की प्रचंडता में स्ट्रैमोनियम तीनों से अधिक, फिर बेलाडोना, और सब से कम हायोसाइमस है। प्रचंडता के अतिरिक्त अन्य लक्षणों को भी निर्वाचन के समय ध्यान में रखना चाहिये। उदाहरणार्थ, बेलाडोना प्रकाश को सहन नहीं कर सकता, स्ट्रैमोनियम अन्धेरे को नहीं सहन कर सकता। बेलाडोना अन्धेरा चाहता है, स्ट्रैमोनियम प्रकाश।
*दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है – 
लक्षणों का बड़े वेग से आना, और एकदम आना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। इसी लक्षण का रूप तब स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते हैं कि कोई भी दर्द एकदम आये और एकदम ही चला जाये, तो वह बेलाडोना से ठीक हो जाता है। सर्दी लगी, एकदम दर्द शुरू हुआ, बीमारी ने अपना जितना समय लगाना था लगाया, और दर्द जैसे एकदम आया था वैसे एकदम शान्त हो गया। कभी-कभी यह दर्द कुछ मिनट रहकर ही चला जाता है। स्ट्रैमोनियम में दर्द मीठा-मीठा शुरू होता है, धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, उच्च-शिखर पर जाकर फिर धीरे-धीरे शान्त होता है। मैग्नेशिया फॉस का सिर-दर्द एकाएक आता है, चिरकाल तक बना रहता है और एकाएक ही जाता है। सल्फ्यूरिक ऐसिड में धीरे-धीरे शुरू होता है, पर एकदम जाता है।

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बेलाडोना और एकोनाइट की तुलना – 
ये दोनों औषधियों हृष्ट-पुष्ट शरीर के लोगों के लिये उपयोगी हैं। हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ बच्चा या एक तगड़ा नौजवान यह समझ कर कि उसे सर्दी क्या कर लेगी, ठंड में कम कपड़े पहन कर निकलता है और रात में ही या सवेरे तक शीत के किसी रोग से आक्रान्त हो जाता है। रोग का आक्रमण एकदम होता है और जोर से होता है। दोनों इस बात में समान हैं, परन्तु बेलाडोना में मस्तिष्क में तूफ़ान उठता है, बुखार के साथ असह्य सिर-दर्द हो जाता है, एकोनाइट में रुधिर की गति में तूफान उठता है, छाती या हृदय में दर्द हो जाता है, न्यूमोनिया, खांसी, जुकाम हो जाता है।


*मूत्राशय की उत्तेजितावस्था –
 बेलाडोना के अतिरिक्त दूसरी कोई औषधि ऐसी नहीं है जो मूत्राशय तथा मूत्र-नाली की उत्तेजितावस्था को शान्त कर सके। पेशाब करने की इच्छा लगातार बनी रहती है। इस औषधि में स्पर्शादि को सहन न कर सकने का जो लक्षण है, उसी का यह परिणाम है। पेशाब बूंद-बूंद कर टपकता है और सारी मूत्र-नाली में दाह उत्पन्न करता है। सारा मूत्र-संस्थान उत्तेजित अवस्था में पाया जाता है। मूत्राशय में शोथ होती है। मूत्राशय में रक्त-संचय और उसके उत्तेजितावस्था होने के कारण उस स्थान को छुआ तक नहीं जा सकता। मानसिक अवस्था भी चिड़चिड़ी हो जाती है। यह अवस्था मूत्राशय में मरोड़ पड़ने की-सी है। मूत्र में रुधिर आता है, कभी-कभी शुद्ध खून। ऐसी अवस्था में पायी जाती है कि मूत्राशय भरा हुआ है परन्तु मूत्र नहीं निकल रहा। शिकायत का केन्द्र स्थूल मूत्राशय की ग्रीवा है जहां मूत्राशय में थोड़ा-सा भी मूत्र इकट्ठा होने पर पेशाब जाने की हाजत होती है, परन्तु दर्द होता है मूत्र नहीं निकलता।

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* प्रकाश, शोर, स्पर्श आदि सहन नहीं कर सकता – 
इस रोगी की पांचों इन्द्रियों में अत्यन्त अनुभूति उत्पन्न हो जाती है। रोगी आंखों से रोशनी, कानों से शब्द, जीभ से स्वाद, नाक से गंध, त्वचा के स्पर्श की अनुभूति साधारण व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक करने लगता है, वह रोशनी, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि को सहन नहीं कर सकता। उसका स्नायु-मंडल उत्तेजित रहता है। स्नायु-मंडल की उत्तेजना बेलाडोना का मुख्य-लक्षण है। ओपियम इससे ठीक उल्टा है। उसमें ‘सहिष्णुता’ (Sensitivity) रहती ही नहीं। बेलाडोना के रोगी में मस्तिष्क में जितना रुधिर संचित होगा उतनी असहिष्णुता बढ़ जायगी। स्पर्श की असहिष्णुता उसमें इतनी होती है कि सिर के बालों में कघी तक नहीं फेर सकता, सिर के बालों को छूने तक नहीं देता। इस प्रकार की असहिष्णुता अन्य औषधियों में भी पायी जाती है। उदाहरणार्थ, हिपर पर रोगी दर्द को इतना अनुभव करता है कि बेहोश हो जाता है, नाइट्रिक ऐसिड का रोगी सड़क पर चलती गाड़ियों की आवाज को सहन नहीं कर सकता, उससे उसकी तकलीफें बढ़ जाता हैं, कॉफिया का रोगी तीन मंजिल ऊपर के मकान पर भी किसी के चलने की आवाज सुन लेता है तो उससे परेशान हो जाता है यद्यपि अन्य किसी को वह आवाज नहीं सुनाई पड़ती, नक्स वोमिका के रोगी के शरीर की पीड़ा लोगों के पैरों की आहट से बढ़ जाती है।
बुखार
यदि बुखार की वजह से चेहरा और आंख लाल हो गए हों। तो बेलाडोना का सेवन करने से ठीक हो जाता है।
पेट दर्द में
यदि पेट में भंयकर दर्द हो रहा हो या पेट फूल गया हो। तो बेलाडोना लेने से आपको राहत मिलेगी।
सिर व गर्दन दर्द
यदि गर्दन उठाने व झुकाने में दर्द हो रहा हो तो बेलाडोना का सेवन करने से आपकी ये समस्या ठीक हो जाती है।

पथरी की अचूक हर्बल औषधि से डाक्टर की बोलती बंद!

सूखी खांसी
सूखी खांसी में यदि खांसते-खांसते एैसा लग रहा हो कि दम निकल रहा है और चेहरा लाल हो गया हो तो आप बेलाडोना का सेवन करें। इससे आपकी सूखी खांसी की समस्या ठीक हो जाएगी।
किसी भी तरह का दर्द
शरीर में यदि किसी भी तरह का दर्द हो रहा हो और वह शांत न हो रहा हो तो बेलाडोना सेवन करने से दर्द ठीक हो जाता है।
जीभ की सूजन
जीभ का लाल होना, मसूड़ों में दर्द और जीभ की सूजन होने पर बेलाडोना का सेवन करें।
मासिक धर्म
महिलाओं को मासिक धर्म में अधिक परेशानी हो रही हो या रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो वे बेलाडोना का सेवन करें।
गले की सूजन
यदि गले में सूजन हो गई हो या गले में संकुचन हो रहा हो तो बेलाडोना के सेवन से लाभ मिलता है।
कमर दर्द और गर्दन की अकड़न में बेलाडोना का सेवन करें।

वृषण (अंडकोश)में सूजन और दर्द के घरेलू आयुर्वेदिक इलाज // Pain in Testicles






अंडकोष क्‍या है


अंडकोष यानी टेस्टिस पुरुषों में पायी जाने वाली एक थैली है। अंडकोष की थैली के अंदर दो अंडकोष होते हैं। अंडकोष लाखों छोटे-छोटे शुक्राणु कोशिकाएं पैदा करते हैं और उन्हें सुरक्षित रखते हैं। इसके अलावा ये टेस्टोस्टेरॉन हार्मोन भी बनाते हैं, एक ऐसा हार्मोन जिसके कारण लड़के शुक्राणु पैदा करते हैं। साथ ही टेस्‍टोस्‍टेरॉन मांसपेशियों और बालों के लिए जरूरी होता है। इसे मर्दाना हार्मोन भी कहते हैं।


*प्रोस्टेट बढ़ने से मूत्र रुकावट की अचूक  औषधि*


अंडकोष को इंग्लिश में Scrotum कहा जाता है जो की एक पतली थैली के रूप में आदमी के लिंग के नीचे स्थित होती है| इस थैली में दो बहुत ही जरुरी अंग पाए जाते हैं जिन्हें हम testicles कहते हैं और जिनमें वीर्य का उत्पादन होता है| वैसे तो अंडकोष मोटी और मजबूत त्वचा का बना होता है लेकिन फिर भी कई प्रकार के रोग या बीमारी इसे ग्रसित कर सकते हैं और उनमें से सबसे ज्यादा पुरुषों को अंडकोष में दर्द और सूजन का सामना करना पड़ता है| अंडकोष में दर्द और सूजन right या left side अथवा दोनों और हो सकता है| पुरुष को अपने जीवन की किसी भी अवस्था में इस दर्द और सुजन का सामना करना पड़ सकता है|

*पित्ताश्मरी(Gallstone) की अचूक औषधि*

अंडकोष का दर्द धीरे और लम्बे समय तक भी हो सकता है और कई लोगों में ये दर्द बहुत जयादा तेज भी हो सकता है| सही समय पर इस समस्या का निदान न होने पर गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं| इसलिए यदि आपके अंडकोष में तेज दर्द और सूजन है तो आपको तुरंत किसी अच्छे urologist से मिलकर उसका इलाज करवा लेना चाहिए| लेकिन यदि आपकी प्रॉब्लम जयादा सीरियस नहीं है तो आप कुछ घरेलु नुस्खे अपनाकर pain और swelling को कम कर सकते हैं| लेकिन सबसे पहले अंडकोष में दर्द और सूजन करने वाले कारणों के बारे में थोड़ी जानकारी बढ़ा ली जाये|


किडनी फेल रोग की अचूक औषधि



वो कारण जो अंडकोष में दर्द और सुजन के लिए जिम्मेदार होते हैं

अंडकोष में दर्द और सूजन के कुछ प्रचलित कारणों में से कुछ नीचे दिए गये हैं | जरुरी नहीं की आपकी बीमारी के लिए ये ही कारण जिमेदार हों| इसलिए सही कारण का पता लगाने के लिए डॉक्टर से मिलना अनिवार्य हैं|
Inguinal hernia – इसे groin hernia भी कहते हैं| इसमें छोटी आंत या fatty tissue का कुछ भाग आपके अंडकोष में आकर दर्द और सूजन पैदा करता है| यह हर्निया अकसर भारी बोझ उठाने के कारण होता है| अकसर लोग gym में सीधे ही भारी भरकम बोझ उठा लेते हैं और हर्निया का शिकार हो जाते हैं|


सोरायसिस(छाल रोग) के आयुर्वेदिक उपचार 

Torsion – इस कंडीशन में आपकी स्पेर्मटिक कोर्ड मुड जाती है या ट्विस्ट हो जाती है और जिसके कारण आपके testes की और जाने वाला रक्त प्रवाह बाधित हो जाता है| इसमें रोगी को बहुत तेज दर्द होता है| समय रहते इसका इलाज न हो तो permanent damageभी हो सकता है| यह एक आपातकालीन स्तिथि होती है|
Epididymitis – इसमें आपकी epididymis में inflammation या सोअज हो जाती है| Epididymis एक तुबे जैसी संरचना होती है जो की आपके दोनों testes के पीछे की और स्थित होती है| Epididymitis में रोगी को अंडकोष में असहनीय दर्द होता है| epididymis में inflammation होने के कई कारण हो सकते हैं जैसे चोट लग जाना, बैक्टीरिया द्वारा संक्रमण. sexually transmitted disease जैसे chlamydia and gonorrhea आदि| Epididymitis ज्यादातर 18 से 36 वर्ष के लोगों में ज्यादा देखने को मिलता है|


गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि


Orchitis – 

इस रोग में आपके testes में inflammation हो जाता है जो की बैक्टीरियल या वायरल संक्रमण के कारण होता है| ये inflammation एक ओर या दोनों ओर हो सकता है| इसमें अंडकोष में सुजन और दर्द रहने लगता है| यह ज्यादातर 45 या उससे बड़ी उम्र के पुरषों में अधिक देखने को मिलता है|
इनके अलावा अंडकोष में सूजन, दर्द और irritation के कई और कारन होते हैं जैसे अंडकोष में पानी भरना, हर्निया सर्जरी के बाद भी दर्द कुछ महीनों तक रहता है| इनके अलावा prostatitis, गांठ का होना, पथरी और मम्प्स होना भी दर्द और सूजन के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं|


अंडकोष में सूजन और दर्द का इलाज / निदान


देखिये चूँकि यह पुरषों की बहुत ही sensitive स्थान होता है इसलिए कभी भी खुद डॉक्टर बनने की कोशिश नहीं करनी चाहिए खास कर तब जब तेज दर्द और दुसरे लक्षण जैसे चक्कर आना, जी मिचलाना, बुखार होना या गुप्तांग से गड़े पदार्थ का स्त्राव या लिंग से खून आना आदि हों | सही समय पर सही कारण का पता चलना और सटीक इलाज आपको आगे होने वाली परेशानी से बचा सकता है| लेकिन यदि आपको लगता है की आपकी प्रॉब्लम सीरियस नहीं है और बस हल्का फुल्का दर्द महसूस हो रहा है तो आपको कुछ घेरलू नुस्खे और सावधानियाँ अपनाकर उस दर्द से मुक्ति पा सकते हैं| नीचे कुछ जरुरी बातें बताई गयी हैं|


शीघ्र पतन? घबराएँ नहीं ,करें ये उपचार 

घरेलू आयुर्वेदिक उपाय 



बर्फ से सेकें
यदि अंडकोष में दर्द हो रहा हो तो बर्फ के टुकड़े से इसकी सिंकाई कीजिए, इससे आपको आराम मिलेगा। बर्फ के टुकड़े से अंडकोष की सिंकाई 10-15 मिनट तक करने से दर्द कम हो जाता है। यह एक प्रकार का अस्‍थायी उपचार है जिसमें तुरंत आराम मिलता है।खेलों में चोट से बचने के लिए protective कप और supporter जरुर पहने|
Epididymitis, पथरी, और संक्रमण की स्तिथि में अपने डॉक्टर से जरुरी दर्द निवारक दवा जैसे brufen, aspirin, paracetamol आदि और एंटीबायोटिक्स लिखवाकर नियमित रूप से लें|
कम कोलेस्ट्रॉल वाला खाना खाइए और दिन भर में ढेर सारा पानी पीजिये|
STD से बचने के लिए संभोग से पहले जरुरी सावधानियाँ बरतें|


हाथ पैर और शरीर का कांपना कारण और उपचार

हल्दी का लेप अंडकोष के बढ़ने यानि सूजन को कम करने में आपकी मदद कर सकता है|
अदरक के रस में शहद मिलकर पिने से लाभ मिलता है इसी प्रकार टमाटर, सेंधा नामक और अदरक का सलाद के रूप में सेवन करने से भी फायदा होता है|
अंडकोष में दर्द और सुजन से ग्रसित लोगों को डॉक्टर सबसे पहले आराम लेने की सलाह जरूर देता हैं| आपको सभी कार्य छोड़कर कुछ दिन bed rest लेना चाहिए| कोई ऐसा काम न करें जिससे आपके अंडकोष पर pressure पड़े|
गरम पानी से स्‍नान
टेस्टिकल्‍स के दर्द को कम करने के लिए गरम पानी से स्‍नान कीजिए। इसके अलावा बॉथ टब में पानी गरम करके आप थोड़ी देर तक बॉथ टब में रहने से भी दर्द कम हो जाता है। हल्‍के गरम पानी से सिंकाई भी कर सकते हैं।सामान्य दर्द और सुजन को आप बर्फ की सहायता से ख़तम कर सकते हैं| आपको बर्फ का टुकड़ा रुमाल या तौलिए में लपेटना है और दर्द वाली जगह पर कुछ मिनट्स के लिए लगाना है| ऐसा आपको हर 2 घंटे के 

अन्तराल में करना है|


वीर्य की मात्रा बढ़ाने और गाढ़ा करने के उपाय 

यौन बीमारियों से बचाव
टेस्टिक्‍स में दर्द के लिए यौन संचारित बीमारियां भी जिम्‍मेदार हैं। यदि इनसे बचा जाये तो इसके कारण टेस्टिस में होने वाले दर्द से बचाव संभव है। इसलिए यौन संबंध बनाते वक्‍त ध्‍यान रखें और कंडोम का इस्‍तेमाल करें।

डॉक्टर या किसी जानकार की सलाह के अनुसार सही नाप का supporter या लंगोट का इस्तेमाल करें| इससे आपके अंडकोष को प्रयाप्त सहारा मिलेगा और दर्द में राहत|
कभी भी भारी भरकम बोझ न उठाएं और यदि जरुरी हो तो अपने फॅमिली members की मदद लें|

होम्योपैथिक उपाय -

अंडकोष की सूजन व दर्द(TESTICLES ORCHITIS AND NEURALGIA)

परिचय-

प्रमेह एवं गर्मी रोग के कारण अंडकोष और उसे ढकने वाली झिल्ली में सूजन व जलन पैदा होती है। अंडकोष में जलन होने पर पेशाब करते समय सफेद रंग का पदार्थ निकलता है। धीरे-धीरे अंडकोष सूजकर कठोर व बड़ा हो जाता है। वैसे तो अंडकोष फुल जाने पर किसी तरह का कष्ट नहीं होता है लेकिन सूजन अधिक दिनों तक रहने से अंडकोष पक जाता है।

लंबाई बढ़ाने के जबर्दस्त उपाय

रोग और उसमें प्रयोग की जाने वाली औषधियां :-


पल्सेटिला :-


यदि अंडकोष की सूजन की नई अवस्था हो तो इस औषधि का प्रयोग करें। किसी प्रकार की दवाईयों के प्रयोग से गोनोरिया को दबा देने के कारण से अंडकोष सूज गया हो तो पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना हितकारी होता है।यदि अंडकोष बढ़ गया हो, उन्हें छुने से दर्द हो, काला-लाल़ हो गया हो, वीर्य वाहिनी (वीर्य नलिकाएं) में दर्द हो और दर्द जांघों तक फैल रहा हो तो ऐसी स्थिति में उपचार के लिए पल्सेटिला औषधि का प्रयोग किया जा सकता है। अगर गोनोरिया के दबाने से यह रोग हुआ हो और उसके दबने से पहले पीला नीला स्राव हुआ हो तो उपचार के लिए पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है।


ऐकोनाइट :-


यदि अंडकोष में सूजन होने के साथ बुखार रहता हो और रोगी बेचैनी महसूस करता हो तो उसके इस रोग का उपचार ऐकोनाइट औषधि की 30 शक्ति से करना चाहिए। अंडकोष की नई प्रदाह में पल्सेटिला औषधि की 3x या एकोनाइट औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करने से जलन व सूजन दूर होती है विशेषकर बुखार रहने पर।


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बेलाडोना :-


अंडकोष की सूजन में यदि स्नायुमण्डल अत्यंत उत्तेजित हो और तीव्र दर्द हो तो बेलाडोना औषधि का सेवन करना चाहिए।यदि अंडकोष सूज जाने के साथ ही वह गर्म व लाल हो गया हो तो बेलाडोना औषधि का उपयोग करने से सूजन व लाली दूर होती है।


रोडोडेन्ड्रन :-

अंडकोष की पुरानी सूजन की अवस्था में जब अंडकोष की सूजन कठोर होकर सूख जाए और रोगी को ऐसा महसूस हो जैसे कि अंडकोष को कुचल दिया गया हो। ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए रोडोडेन्ड्रन औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना लाभदायक होता है।


ऑरम-मेट :-


अंडकोष की पुरानी सूजन का प्रभाव यदि दाईं ओर की वीर्य वाहिनी (वीर्य नलिकाएं) में हो एवं उसमें दर्द हो तो ऑरम मेट औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।


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क्लेमेटिस :-


गोनोरिया के दब जाने के कारण यदि अंडकोष सूज गया हो तो पहले पल्सेटिला औषधि का सेवन करें। यदि पल्सेटिला औषधि से सूजन दूर न हो तो क्लेमैटिस औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन करें। अंडकोष की सूजन में ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को अधिक कष्ट होता है, सर्दी लगती है, अंडकोष कठोर हो जाता है, दर्द होता है तथा रोग के लक्षण रात को व बिस्तर की गर्मी से बढ़ते हैं। इस तरह के लक्षणों में रोगी को क्लेमैटिस औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन कराना चाहिए।यदि प्रमेह रोग के कारण अंडकोष सूज गया हो और उसमें जलन हो तो क्लेमेटिस औषधि की 3 से 6 शक्ति का सेवन करना चाहिए।


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कोनायम :-

अंडकोष में खून प्रवाहित करने वाली नाड़ियों के अन्दर खून जमा होने के कारण शारीरिक शक्ति कम होना एवं संवेदनशीलता कम होना आदि लक्षण। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए कोनायम औषधि की 30 से 200 शक्ति का उपयोग करना चाहिए।नपुंसकता के करने होने वाले अंडकोष की सूजन व जलन को दूर करने के लिए कोनायम औषधि की 3 शक्ति से उपचार करना चाहिए।


मर्क-बिन :-


उपदंश के कारण यदि अंडकोष की सूजन हुई हो तो उपचार के लिए मर्क-बिन 2x मात्रा का प्रयोग करना लाभकारी होता है।


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स्पंजिया :-


अंडकोषों की सूजन कठोर हो जाने पर स्पंजिया औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है

विशेषकर अंडकोष की पुरानी सूजन की अवस्था में। वीर्य वाहिनी की सूजन व अंडकोष में दर्द होना आदि लक्षणों में स्पंजिया औषधि की 3 से 30 शक्ति का सेवन करना लाभदायक होता है।अंडकोष की पुरानी सूजन की अवस्था में यदि सुई चुभने की तरह दर्द हो तो स्पंजिया औषधि की 2x मात्रा का उपयोग करना फायदेमंद होता है।ऊपर बताए गए औषधियों के अतिरिक्त अंडकोष की सूजन को दूर करने के लिए बीच-बीच में अन्य औषधियों का भी प्रयोग कर सकते हैं जो इस प्रकार हैं- आर्निका की 6, सिलिका की 6, हिपर की 30, सिपिया की 30, सल्फर की 30 या मर्क-3 आदि।

अंडकोष में दर्द होना :-

आरम-मेट :-

अंडकोष में दर्द होने पर ऑरम-मेट औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना हितकारी होता है।स्नायु-शूल की तरह यदि अंडकोष में दर्द हो तो आरम-मेट औषधि की 200 शक्ति का प्रयोग करना उचित होता है।

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हैमामेलिस :-

अंडकोष में दर्द के कारण स्वप्नदोष होना, मन उदास रहना, चिड़चिड़ा हो जाना, स्वास्थ्य सम्बंधी चिंता से खिन्न रहना आदि। इस तरह के लक्षणों में हैमामेलिस औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना हितकारी होता है।अगर रोगी का अंडकोष सूज गया हो तथा बुखार हो गया हो, अंडकोष कड़ा होने के साथ रोगी अच्छा महसूस न कर रहा हो तो उसे हैमामेलिस औषधि की 2x मात्रा सेवन कराना चाहिए तथा हैमामेलिस- मदर टिंचर को 15 गुना अधिक पानी में मिलाकर अंडकोष पर लगाना चाहिए।

अविकसित अंडकोष :-

जिन बच्चों के अंडकोष का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है उसका कद छोटा रह जाता है। ऐसे में अंडकोष का विकास रुक जाने पर ऑरम-मेट औषधि की 3 शक्ति 0.30 ग्राम की मात्रा में सेवन करना चाहिए। इसके सेवन से अंडकोष का पूर्ण विकास होता है।

कान के अंदर बजने वाली घंटी और विभिन्न प्रकार की आवाज को रोकने के उपाय



तेज़ आवाज़ पर संगीत सुनने से कानों में अतिसूक्ष्म धमनियों के सिरे को क्षति पहुंचनें से लगातार घंटी सुनाई देती है जिसे टिनिटस (tinnitus) भी कहतें हैं। टिनिटस धमनियों के क्षतिग्रस्त होने या परिसंचरण तंत्र (circulatory system) में समस्या होने के कारण होता है।[१] हालांकि, कानों में घंटी बजने को रोक थाम कर के बचा जा सकता है, फिर भी कान को क्षति पहुंचने पर भी इसका इलाज किया जा सकता है। दिये गए सलाह और संकेत पढ़ें और लाभ उठाएँ।


टिनिटस के लक्षणों 

में आपके कानों में इस प्रकार की फैंटम (निचले से ऊँचे स्वर की) ध्वनियाँ आती हैं:
घंटी बजना
भिनभिनाहट
दहाड़ना
खटखटाना
फुफकारना
सीटी बजना
जोर से चिल्लाने की आवाज

कारण


कई प्रकार की चिकित्सीय स्थितियाँ टिनिटस उत्पन्न कर सकती हैं या बदतर कर सकती हैं। कई मामलों में, निश्चित कारण कभी मालूम नहीं पड़ता।
भीतरी कान की कोशिकाओं की क्षति।

आपके भीतरी कान में सूक्ष्म नाजुक बालों का होना।
आपके कान के भीतर की नसों को प्रभावित करने वाली चोटें या स्थितियाँ।
श्रवण शक्ति की आयु सम्बन्धी हानि।
उच्च या जोरदार शोर की चपेट।
कान के मैल का अवरोध।
हृदय या रक्तवाहिनियों के रोग।
मस्तिष्क में गठानें (ब्रेन ट्यूमर्स)।
महिलाओं में होने वाले हार्मोन सम्बन्धी परिवर्तन।
थाइरोइड सम्बन्धी असामान्य स्थितियाँ।
माइग्रेन सम्बन्धी सिरदर्द।



कानों में क्षणिक घंटी बजने का उपचार


टिनिटस के लक्षणों को नियंत्रित करने के लिए कुछ सामान्य चीजें हैं, जो आप स्वयं कर सकते हैं। इनमें हैं:
व्यायाम नियमित करें और विश्रांति हेतु समय निकालें।
पार्श्व ध्वनियों का स्तर निम्न रखें जैसे खिड़की का खुला होना या रेडियो का चालू होना।
धनिये के बीजयुक्त प्राकृतिक चाय टिनिटस से उत्पन्न परेशानी को कम करती है।


सिर को थपथपाने के उपाय का प्रयोग करें:

आप किसी संगीत समारोह से घर वापस आ रहें हैं और आपके कानों से घंटी की आवाज़ नहीं बंद हो रही हो, तो यह कौकलिया में छोटे बालों को नुकसान पहुंचने के कारण धमनियों में सूजन, जलन और उत्तेजना उत्पन्न होती है। सिर को थपथपाने से ये लगातार आने वाली कष्टकर आवाज़ बंद हो सकती है।
कानों को अपनी हथेली से बंद करें। उँगलियाँ सिर के पीछे वाले हिस्से पर टिका लें। दोनों हाथों की मध्यमा उंगली सिर के पीछे एक दूसरे के सामने करें।अपनी प्रथमा उंगली को मध्यमा उंगली पर रखें।
चुटकी बजाने के तरीके से, अपनी प्रथमा उंगली को मध्यमा उंगली से सरका कर चुटकी की तरह सिर के नीचे वाले हिस्से पर थपथपाएँ। उँगलियों के सिर पर लाग्ने से ढोल जैसी आवाज़ आती है। ये काफी तेज़ होती है। ये सामान्य है।
ऊपर दिये गए तरीके से आप सिर के पीछे 40 से 50 बार चुटकी बजाएँ। 40 से 50 बार बजाने के बाद देखें कि घंटी कि आवाज़ कम हुई की नहीं।

इंतज़ार करें: 

बहुत तेज़ आवाज़ में संगीत सुनने के फलस्वरूप कानों में घंटी बजनें लगती है, और कुछ घंटों में बंद हो जाती है। आप उससे ध्यान हटाएँ जैसे कि आराम करें या ऐसी किसी चीज़ से दूर रहें जिससे ये समस्या और न बढ़े।


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कानों मेँ घंटी बजने की दीर्घकालिक बीमारी का उपचार

*चिकित्सक की सलाह लें: 

अधिकतर, टिनीटस (tinnitus) या कान में घंटी बजनें की समस्या किसी अन्य बीमारी के इलाज के फलस्वरूप उत्पन्न हो सकती है। इसका इलाज करने से कानों में घंटी बजना कम ही नहीं बल्कि पूरी तरह भी समाप्त हो सकती है।
*आप अपने चिकित्सक से कानों की मैल (wax) को साफ करवाएँ। वैकल्पिक रूप से, आप भी बड़ी सवधानी के साथ कान का मैल साफ कर सकतें हैं। कानों से मैल साफ करवाने के बाद आपको टिनीटस की बीमारी से आराम मिलेगा।
*चिकित्सक को अपनी रक्त वाहिनी (blood vessels) दिखाएँ। कमजोर हुई रक्त वाहिनियों की अवस्था से टिनीटस की बीमारी और बिगड़ सकती है।


दमा( श्वास रोग) के असरदार उपचार


*चिकित्सक से अपनी दवाई के संबंध में पुनः जांच करवा लें। अगर आप कोई दवाई लेते हैं तो डॉक्टर को
टिनीटस को आवाज़ प्रतिबंधित कर के रोक सकते हैं: विभिन्न प्रकार से आवाज़ को प्रतिबंधित कर, चिकित्सक घंटी की आवाज़ को बंद कर सकतें हैं। इन उपायों में विभिन्न प्रकार के उपकरण और विधियां बताई गई हैं।
व्हाइट नौइज़ मशीन (white noise machine) का उपयोग करें। “व्हाइट नौइज़ मशीन’ गिरती बारिश और हवा बहने जैसी प्रष्ठभूमि वाली आवाज़े निकालती है। ऐसी मशीन से निकली आवाज़ कानों में घंटी बजने की आवाज़ को डूबा सकती है।
*पंखा, नमी करने वाली मशीन (humidifier), नमी कम करने वाली मशीन (dehumidifier) और एयर कनडीशनर (A.C.) भी “व्हाइट नौइज़ मशीन” के समान काम करते हैं।
मासकिंग डिवाइस (कानों को ढकने वाला उपकरण) का प्रयोग करें। इसे कान पर लगा कर निरंतर ध्वनि उत्पन्न की जा सकती है, जिससे परेशान करने वाली घंटी की आवाज़ को दबाया जा सकता है।
कानों में सुनने की मशीन (hearing aids) लगाएँ। टिनीटस के साथ यदि आपको कम सुनाई पड़ता हो, तो इस उपकरण का ज़्यादा असर होता है । ज़रूर बताएं, कहीं यह किसी दवाई के दुष्प्रभाव से तो नहीं हो रहा।
टिनीटस रोग के लक्षण को दवाई लेने से सुधार सकतें हैं: दवाई लेने के बावजूद घंटी की आवाज़ से पूर्ण रूप से छुटकारा नहीं मिलता, बल्कि यदि दवाई प्रभावशाली है, तो घंटी की आवाज़ कम सुनाई पड़ेगी।
डॉक्टर से एंटिडिप्रेसेंट के लिए परामर्श लें। गंभीर टिनीटस के लिए एंटिडिप्रेससेंट काफी कारगर सिद्ध होते हैं, परंतु इसके कुछ अनुचित दुष्प्रभाव होते हैं जैसे कि, मुँह सूखना, आँखों में धुंधलापन छाना, कब्ज़ एवं दिल के रोग।

पेट मे गेस बनने के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार 

एल्प्राज़ोलम लेने के लिए डॉक्टर से परामर्श लें। जनक्स (xanax) के नाम से प्रचलित, टिनिटस बुज़जिंग कम करने में अल्प्राजोलम काफी कारगर सिद्ध होती है, लेकिन इसकी लत लगने के, तथा अन्य दुष्प्रभाव होते हैं।
जिंकगो का प्रयोग करें: भोजन के साथ जिंकगो (ginkgo) के रस का दिन में तीन बार सेवन करने से सिर और गर्दन में खून का बहाव बढ़ जाता है, जिससे रक्तचाप से उत्पन्न घंटी बजना, कम हो जाता है।[३] जिंकगो का प्रयोग दो महीने करने के बाद उसके प्रभाव का आंकलन करें।

टिनिटस की रोकथाम

उन स्थितियों से बचें जिन से कॉक्लिया के क्षतिग्रस्त होने से टिनिटस होता है: क्योंकि टिटिटस का उपचार कठिन होता है, इसलिए इस बीमारी से बचने का सबसे अच्छा तरीका कि इससे बचें, या इसे और बुरा होने न दें। निम्न से टिनिटस के लक्षण बढ़ सकते हैं:
*तेज़ ध्वनि। संगीत के कार्यक्रम इसके प्रमुख दोषी हैं, परंतु हवाईजहाज, निर्माण कार्य, यातायात, गोली की आवाज़, पटाखे इत्यादि तेज़ आवाज़ इसके लिए हानिकारक हो सकते हैं।
*तैरना: तैरते समय पानी और क्लोरीन कान में फंस सकते हैं, जिससे टिनिटस बढ़ जाता है। इससे बचने के लिए तैरते समय कान के प्लग (earplugs) का प्रयोग करें।

वैवाहिक जीवन की मायूसी दूर  करें इन जबर्दस्त  नुस्खों से

*अपने तनाव को दूर करने के लिए बाहर घूमने जाएँ: अगर आप तनाव से ग्रसित हैं तो लगातार कानों में घंटी बजने कि समस्या और भी बढ़ सकती है। अपने तनाव से बचनें के लिए व्यायाम, ध्यान और मालिश द्वारा रोगोपचार किया जा सकता है
*अल्कोहल, कैफीन और निकोटीन का कम से कम सेवन करें: इन सब से धमनियों पे दबाव पड़ने के कारण ये तन जातीं हैं। ये कान के भीतरी भाग में होता है। लक्षण कम करने के लिए तंबाकू, अल्कोहल, कॉफी और कैफीन युक्त चाय का सेवन न करें।

नमक का प्रयोग न करें: 


नमक, शरीर में खून का बहाव, कमजोर करता है, जिससे रक्तचाप और टिनिटस बढ़ सकते हैं।
परामर्श
कान में बजती घंटी को रोकने के लिए शरीर की प्रतिरक्षित व्यवस्था (immune system) को मजबूत करने का प्रयास करना होगा। ये आपको संक्रमण और बीमारियों से बचने में मदद करता है, जिससे कान में परेशान करने वाली ध्वनि कम हो सकती है। स्वास्थ में सुधार का मतलब है टिनिटस में भी सुधार। स्वस्थ जीवनशैली अपनाएं, जिसमें पौष्टिक आहार, निरंतर और उपयुक्त व्यायाम एवं भरपूर निद्रा शामिल हो


पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा  का  अचूक  इलाज 

परहेज और आहारलेने योग्य आहार

रक्तसंचार को बढ़ाने हेतु ढेर सारा ताजा अन्नानास खाएँ।
लहसुन के गंधरहित कैप्सूल लें या उन्हें भोजन में पका लें। लहसुन सूजन घटाने और संचार बढ़ाने इन दोनों कार्यों में सहायक होता है।
अपने कच्चे फल, हरी सब्जियों और पकी दालों (फलियों) के सेवन को बढ़ाएं। यह आहार विटामिनों, एमिनो एसिड्स और वनस्पतिजन्य यौगिकों से समृद्ध होता है जो भीतरी कान की सूजन को कम करने में सहायक होते हैं।
सूखे फल और मेवों का सेवन करें. ये भी टिनिटस को प्राकृतिक रूप से कम करने में लाभकारी होते हैं।इनसे परहेज करें
नमक का प्रयोग कम करें और कैफीनयुक्त पेय पदार्थ ना लें।
धूम्रपान और शराब के प्रयोग को कम करें क्योंकि ये आपके कानों की ध्वनि को प्रभावित करते हैं।
एस्पिरिन (एसिटाइलसेलिसिलिक एसिड) का प्रयोग ना करें जो कि सैलिसिलिक एसिड से बनती है। एस्पिरिन के कारण कुछ लोगों के कानों में घंटी बजने की ध्वनि उत्पन्न होती पाई गई है।

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योग और व्यायाम

अपने मुँह को जितना सम्भव हो खोलें, और फिर अपने हाथ को ठोढ़ी पर रखकर, अपने मुँह को और चौड़ा करें। इस स्थिति में 30 सेकंड रहें।
मुँह को सहायता द्वारा खोलना जबड़े को खोले वाले व्यायाम के समान कार्य करता है। अपना मुँह खोलें, फिर दो उँगलियों से सामने के निचले दांतों जकड़ें। अपने मुँह को कुछ और खोलें और कुछ सेकंड तक इस स्थिति में बने रहें। 10 बार दोहराएँ।
अपने मुँह को ढीला और हल्का खोलें, और अपने जबड़े को दाहिनी तरफ जितना हो सके ले जाएँ। अपनी बाईं मुट्ठी जबड़े के विरुद्ध रखें और 30 सेकंड तक दाहिनी और जबड़े को बनाए रखने के लिए दबाव डालें। इसके बाद दाहिनी मुट्ठी का प्रयोग बाएँ जबड़े पर करें। इसे चार बार दोहराएँ और ऐसा दिन में कुल चार बार करें।
कांच के सामने खड़े हों, दांतों को जोर से भींच लें, मध्य के दोनों दांतों की निचले जबड़े पर स्थिति पर एकाग्र हों। जबड़े को बाएँ या दाएँ घुमाए बिना, दोनों दांतों को केंद्र में रखते हुए, अपने मुँह को धीरे-धीरे खोलें। इसे दिन में 10 बार करें।