28.6.16

जहरीले जन्तुओं के काटने के उपचार: Poisonous animal bites, home remedies



सांप काटने पर -
१) हींग को अरंड की कोपलों के साथ पीसकर चने के बराबर गोलियां बनाइए तथा सांप के काटने पर दो – दो गोली आधे – आधे घंटे पर गर्म पानी के साथ देने पर लाभ होता है।
२) सांप के काटने पर सौ से दो सौ ग्राम शुद्ध घी पिलाकर उल्‍टी कराने से सांप के विष का असर कम होता है। घी पिलाने के १५ मिनट बाद कुनकुना पानी अधिक से अधिक पिलाएं इससे तुरंत उल्टियां होने लगेंगीं और सांप का विष भी बाहर निकलता जाएगा।


३) सांप के काटने पर ५० ग्राम घी में १ ग्राम फिटकरी पीसकर लगाने से भी जहर दूर होता है।



Bichhoo ka Jahar Utarne Ka Mantra - बिच्छू के जहर के लिए मंत्र
॥ मंत्र ||



ॐ नमो समुन्द्र।
समुन्द्र में कमल।
कमल में विषहर।
बिच्छू कहूं तेरी जात।
गरुड़ कहे मेरी अठारह जात।
छह काला।
छह कांवरा।
छह कूँ कूँ बान।
उतर रे उतर नहीं तो गरुड़ पंख हँकारे आन।
सर्वत्र बिसन मिलाई।
उतर रे बिच्छू उतर।
मेरी भक्ति।
गुरु कि शक्ति।
फुरो मंत्र ईश्वरो वाचा।

विधि: पहले १०८ बार मंत्र का जप करें। फिर शुद्ध गंगा जल, समुन्द्र या किसी भी नदी का जल ले कर सात बार मंत्र जप करतेहुए झाड़ा लगा दें घाव पर हाथ रख कर।

कुत्‍ता काटने पर-
१) जंगली चौलाई की जड़ १२५ ग्राम लेकर पीस लें और पानी के साथ बार बार रोगी को पिलाएं। इससे कुत्‍ते के काटने से पागल हुए रोगी को बचाया जा सकता है।
२) प्‍याज का रस और शहद मिलाकर पागल कुत्‍ते के काटने से हुए घाव पर लगाने से जहर उतरता है।
३) लाल मिर्च पीसकर तुरंत घाव में भर दें। इससे कुत्‍ते का जहर जल जाता है और घाव भी जल्‍दी ठीक हो जाता है।
४) हींग को पानी में पीस कर लगाने से पागल कुत्‍ते के काटने से हुए घाव का जहर उतर जाता है।

ततैया काटने पर- 

* ततैया या बर्रे ने काटा हो तो उस स्‍थान पर खटटा अचार या खटाई मल दें। जलन खत्‍म हो जाएगी।

* काटे हुए स्‍थान पर फौरन मिटटी का तेल लगाएं। जलन शांत हो जाएगी।

 * ततैया के काटने पर उस स्‍थान पर नींबू का रस लगाएं। सूजन और दर्द चला जाएगा।

 *  
मधुमक्‍खी के डंक पर सोडा और सेंधा नमक को चटनी बनाकर लेप करने से दर्द दूर हो जाता है।
* मकड़ी के काटने पर अमचुर को पानी में मिलाकर घाव पर लगाएं। आराम मिलेगा।
* कनखजूरे के काटने पर प्‍याज और लहसुन पीसकर लगाने से उसका जहर उतर जाता है।

 * छिपकली के काटने पर सरसों का तेल राख के साथ मिलाकर घाव पर लगाने से जहर दूर होता है।
नोट- उम्दा इलाज आधुनिक चिकित्‍सा पद्धति में ही है। इसलिए जैसे ही संभव हो मरीज को तुरंत अस्‍पताल में भर्ती कराएं।

27.6.16

नींबू के रस से कई रोगों का ईलाज Lemon juice cures many diseases



नींबू पानी के फायदों को देखते हुए यह अब पश्चिमी देशों के साथ ही हमारे देश में भी काफी लोकप्रिय हो गया है | अब यह ऐसी डाईट थेरपी बन चुकी है जो बेहद सस्ती,सुरक्षित और अपनाने में आसान है| यह डाईट उन लोगों के लिए उपादेय है जो बढे वजन से परेशान हैं और नियमित कसरत नहीं कर सकते हैं|
सुबह और रात सोते वक्त पियें नीबू पानी-
\सुबह उठते ही एक गिलास मामूली गरम पानी में नींबू का रस मिलाकर पियें| इस उपचार के गुण और स्वाद बढाने के लिए दो चम्मच शहद भी मिलाया जा सकता है| इस डाईट प्लान को अपनाते हुए दिन भर भरपूर पानी पीना होता है| आप जितना ज्यादा पानी पीते हैं शरीर के विकार उतनी ही शीघ्रता से दूर होते जाते हैं|नींबू का रस शरीर में जमें कचरे को बाहर निकालता है| गलत खान पान और दिनचर्या के कारण यह कचरा शरीर में जमा होता रहता है|
*नींबू के रस और शहद के मिश्रण से मानव शरीर के अनेकों रोगों का समाधान हो जाता है। नींबू में प्रचुर साईट्रिक एसीड पाया जाता है। यह साईट्रिक एसीड शरीर की चयापचय क्रिया (मेटाबोलिज्म) को बढाकर भोजन को पचाने में मदद करता है। मेटाबोलिज्म को सुधारकर यह शरीर की अनावश्यक चर्बी घटाता है और इस प्रकार मोटापा कम करता है। नींबू रस में शहद मिलाकर लेना बेहद उपकारी उपचार है। शहद में एन्टीआक्सीडेंट तत्व होते हैं जो हमारे इम्युन पावर को ताकतवर बनाते है। रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है।
*पश्चिम के चिकित्सा वैज्ञानिकों का मत है कि थौडी मात्रा में नींबू का रस नियमित लेते रहने से मूत्र पथ में पथरी का निर्माण नहीं होता है। यह पथरी से बचाव का सरल तरीका है। दर असल नींबू का रस हमारे खून में केल्सियम की मात्रा बढने से रोकता है। खून में अनावश्यक केल्सियम बढने से ही केल्सियम आक्सीलेट प्रकार की पथरी बनती है। गुर्दे के खून में मिले हुए केल्सियम को बाहर निकालने में दिक्कत मेहसूस करते हैं।फ़िर यही केल्सियम गुर्दे में जमते रहने से पथरी बन जाती है। शहद में इन्फ़ेक्शन (संक्रमण) रोकने के गुण होते हैं। शहद में केंसर से लडने की प्रवृत्ति होती है। शहद सेवन से बडी आंत का केंसर नहीं होता है।
*चाय बनाने में नींबू रस और शहद का उपयोग करने से गले की खराश दूर होती है और सर्दी-जुकाम से रक्षा होती है।


     

आमाषय के विकार:- एक गिलास गरम पानी में नींबू का रस मिलाकर पीने से आमाषय के कई विकार जैसे- जी मिचलाना,छाती में जलन होना,पेट में उपस्थित रोगाणु नष्ट होते हैं। पाचन प्रणाली पर अनुकूल प्रभाव पडता है। जिन लोगों में अधिक गैस बनने की प्रवृत्ति हो उनके लिये गरम पानी में नींबू का रस मिलाकर पीना रामबाण उपचार है। नींबू पानी के नियमित उपयोग से शरीर में एकत्र विजातीय याने जहरीले पदार्थ बाहर निकलेंगे। खून की सफ़ाई करता है।
 मेरे खयाल से नींबू कब्ज मिटाने का काम भी करता है। हिचकी की बीमारी में भी नींबू रस अच्छा प्रभाव दिखाता है। नींबू का रस लिवर के लिये भी हितकारी है। यह लिवर के टानिक के रूप में काम करता है। इसके प्रयोग से अधिक पित्त निर्माण होकर पाचन क्रिया सुधरती है। नींबू शरीर की श्लेष्मा को नियंत्रित करता है। प्रयोगों में सिद्ध हुआ है कि नींबू का रस पित्ताषय की पथरी को नष्ट करता है।
*नींबू मे कुदरती एंटीसेप्टिक तत्व होते हैं । अनेक प्रकार की चर्म विकृतियों से निजात पाने के लिये नींबू का प्रयोग हितकारी है। इसमें प्रचुर विटामिन सी होता है जिससे त्वचा कांतिमान बनती हैं। खूबसूरती बढती है। *नींबू शरीर के बूढा होने की प्रक्रिया को सुस्त करता है ,चमडी की झुर्रियां मिटाता है। त्वचा के काले धब्बे समाप्त ह्ते हैं। जले हुए स्थान पर नींबू पानी लगाने से जलन का निवारण होता है।
*नींबू का ताजा रस दर्द वाले दांत-दाढ पर भली प्रकार लगाने से पीडा शांत होती है। अगर मसूढों से खून बहता हो तो मसूढों पर नींबू रस की मालिश करने से खून बहना बंद होता है। मुंह की बद्बू का निवारण होता है। पायरिया में हितकारी है।
*कई चिकित्सा शौधों में यह सिद्ध हुआ है कि गरम पानी में नींबू रस मिलाकर पीने से मोटापा घटता है। इसमें थौडा शहद भी मिला सकते हैं।
*नींबू में प्रचुर पोटाशियम होता है। इसीलिये नींबू उच्च रक्तचाप में अति उपयोगी है। जी निचलाने और चक्कर आने में भी उपयोगी है। शरीर और दिमाग के लिये शांतिकारक है।
*नींबू का श्वसन तंत्र पर हितकारी प्रभाव होता है। दमा के मरीज लाभान्वित होते हैं\
*नींबू गठिया और संधिवात में लाभदायक है। दर असल नींबू मूत्रल प्रभाव रखता है। अधिक पेशाब के साथ शरीर का यूरिक एसीड बाहर निकलेगा । यूरिक एसीड गठिया और संधिवात का प्रमुख कारक माना गया है।
गरम पानी में नींबू पीने से सर्दी -जुकाम का निवारण होता है। पसीना होकर बुखार भी उतर जाता है।
*ब्लड शूगर पर नियंत्रण-नींबू पानी से हमारे शरीर का ब्लड शूगर ३० प्रतिशत तक कम किया जा सकता है| अपने आहार में शकर का उपयोग कम ही करें|


18.6.16

पेट के रोगों के उपचार Treatment of diseases of the stomach

                                                                                                    

आधुनिक युग में बदहजमी का रोग पेट की कई बीमारियों के रूप में प्रकट हो रहा है। पेट दर्द होना, मुहं में खट्टा चरका पानी उभरना, अपान वायु निकलना, उलटी होना, जी मिचलाना और पेट मे गैस इकट्ठी होकर निष्काशित नहीं होना इत्यादि लक्षण् प्रकट होते हैं।

भोजन को भली प्रकार चबाकर नहीं खाना पेट रोगों का मुख्य कारण माना गया है। अधिक आहार,अतिशय मद्यपान, तनाव और आधुनिक चिकित्सा की अधिक दवाईयां प्रयोग करना अन्य कारण हैं जिनसे पेट की व्याधियां जन्म लेती है।ज्यादा और बार बार चाय और काफ़ी पीने की आदत से पेट में गेस बनने और कब्ज का रोग पैदा होता है। भूख न लगना ,जी घबराना, चक्कर आना, शिरोवेदना आदि समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं। मुहं का स्वाद बिगड जाता है,जीभ पर मेल की तह जम जाती है, श्वास मे बदबू आती है, बेचेनी मेहसूस होना, अधिक लार पैदा होना, पेट मे जलन होना, इन शिकायतो से यह रोग पहिचाना जाता है। भोजन के बाद पेट मे भारीपन मेहसूस होता है।
इस रोग के इलाज मे खान पीन में बदलाव करना मुख्य बात है।

कचोरी,समोसे,तेज मसालेदार व्यंजन का परित्याग पहली जरूरत है। गलत खान पान जारी रखते हुए किसी भी औषधि से यह रोग स्थायी रूप से ठीक नहीं होगा।
अब मै कुछ ऐसे आसान उपचार आपको बता रहा हूं जिनके प्रयोग से पेट की व्याधियां से मुक्ति मिल जाती है--
१) भोजन से आधा घन्टे पहिले एक या दो गिलास पानी पियें। भोजन के एक घन्टे बाद दो गिलास पानी पीने की आदत बनावें। कुछ ही दिनों में फ़र्क नजर आयेगा।
२) आधा गिलास मामूली गरम जल में मीठा सोडा डालकर पीने से पेट की गेस में तुरंत राहत मिलती है।
3) Gastritis- पेट रोग मे रोगी को पहले २४ घन्टी मे सिर्फ़ नारियल का पानी पीने को देना चाहिये। नारियल के पानी में विटामिन्स और पोषक तत्व मौजूद होते हैं जो आमाषय को आराम देते हैं और रोग मुक्ति में सहायक
हैं।
४) चावल उबालें। इसका पानी रोगी को एक गिलास दिन मे दो बार पिलाएं। बहुत फ़ायदेमंद उपाय है।
५) आलू का रस भी गेस्ट्राइटिज रोग में लाभदायक साबित हुआ है। आधा गिलास आलू का रस भोजन से आधा घन्टे पहिले दिन में दो या तीन बार देना उपकारी है।
६) दो चम्मच मैथी दाना एक गिलास पानी में रात भर भिगोएं। सुबह छानकर इसका पानी पियें। लाभ होगा।
७) रोग की उग्रता में दो या तीन दिन निराहार रहना चाहिये। इस अवधि में सिर्फ़ गरम पानी पियें। ऐसा करने से आमाषय को विश्राम मिलेगा और विजातीय पदार्थ शरीर से निकलेंगे।जिससे आमाशय और आंतों की सूजन मिटेगी।>८) दो या तीन दिन के उपवास के बाद रोगी को अगले तीन दिन तक सिर्फ़ फ़ल खाना चाहिये। सेवफ़ल, तरबूज, नाशपती,अंगूर,पपीता अमरूद आदि फ़ल उपयोग करना उपादेय हैं।
९)  पेट की बीमारियों में मट्ठा,दही प्रचुरता से लेना लाभप्रद है।
१०) रोगी को ३ से ४ लीटर पानी पीना जरूरी है। लेकिन भोजन के साथ पानी नहीं पीना चाहिये। क्योंकि इससे जठर रस की उत्पत्ति में बाधा पडती है।
११) एक बढिया उपाय यह भी है कि भोजन सोने से २-३ घन्टे पहिले कर लें।

१२) मामूली गरम जल मे एक नींबू निचोडकर पीने से बदहजमी दूर होती है।
१३) पेट में वायु बनने की शिकायत होने पर भोजन के बाद १५० ग्राम दही में दो ग्राम अजवायन और आधा ग्राम काला नमक मिलाकर खाने से वायु-गैस मिटती है। एक से दो सप्ताह तक आवश्यकतानुसार दिन के भोजन के पश्चात लें।
१४) दही के मट्ठे में काला नमक और भुना जीरा मिलाएँ और हींग का तड़का लगा दें। ऐसा मट्ठा पीने से हर प्रकार के पेट के रोग में लाभ मिलता है।दही ताजा होना चाहिये।
१५) प्राकृतिक चिकित्सा:-
पेडू की गीली पट्टीलाभ :- पेट के समस्त रोगों,पुरानी पेचिस, बडी आंत में सूजन,,पेट की नयी-पुरानी सूजन,अनिद्रा,बुखार एवं स्त्रियों के गुप्त रोगों की रामबाण चिकित्सा है |इसे रात्रि भोजन के दो घंटे बाद पूरी रात तक लपेटा जा सकता है |
साधन -
१) खद्दर या सूती कपडे की पट्टी इतनी चौड़ी जो पेडू सहित नाभि के तीन अंगुल ऊपर तक आ जाये एवं इतनी लम्बी कि पेडू के तीन-चार लपेट लग सकें |
२) सूती कपडे से दो इंच चौड़ी एवं इतनी ही लम्बी ऊनी पट्टी |

विधि :-उपर्युक्त पट्टियों की विधि से सूती/खद्दर की पट्टी को भिगोकर,निचोड़कर पेडू से नाभि के तीन अंगुल ऊपर तक लपेट दें ,इसके ऊपर से ऊनी पट्टी इस तरह से लपेट दें कि नीचे वाली गीली पट्टी पूरी तरह से ढक जाये | एक से दो घंटा या सारी रात इसे लपेट कर रखें|
विशिष्ट परामर्श-
 
 उदर के  लिवर,तिल्ली,आंत्र संबन्धित विविध रोगों  मे आशुफलदायी जड़ी बूटियों से निर्मित औषधी  के लिए वैध्य श्री दामोदर 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|यह औषधि पित्ताशय की पथरी ,लिवर की सूजन ,पीलिया,तिल्ली बढ़ना ,कब्ज ,पेट मे गैस ,मोटापा,सायटिका  आदि रोगों मे  अत्युत्तम  परिणामकारी है|

17.6.16

वजन बढ़ाने के उपचार ; Weight gain Tips



 दुबले पतले  लोगों के लिये वजन बढाने के उपचार  

                                                                                                                                  
                                                                                                                                             



      भोजन में पौषक तत्वों की कमी  बनी रहने से लोग आहिस्ता-आहिस्ता  कृष काय हो जाते हैं। अधिक दुबले पतले शरीर  मे शक्ति भी कम हो जाती है। नि:शक्त जन अपनी दिनचर्या सही ढंग से संपन्न करने में थकावट मेहसूस करते है।
   इस लेख में कतिपय ऐसे उपचारों की चर्चा की जाएगी जिनसे आप अपने शरीर का वजन बढा सकते हैं|







प्लान करें वेट गेन शेड्यूल

सबसे पहले यह जानना जरूरी है कि आपके बॉडी मास इंडेक्स यानी बीएमआई के हिसाब से यह जानने कि कोशिश करें कि आपकी लंबाई और उम्र के हिसाब से आपका वजन क‌ितना होना चाहिए।
बीएमआई आप इंटरनेट पर भी जोड़ सकते हैं या फिर खुद ही इसका हिसाब लगाएं। इसका फार्मूला है-
बीएमआई = वजन (किलोग्राम) / (ऊंचाई X ऊंचाई (मीटर में))
आमतौर पर 18.5 से 24.9 तक बीएमआई आदर्श स्थिति है इसलिए वजन बढ़ाने के क्रम में ध्यान रखें कि आप इसके बीच में ही रहें।

डाइट पर दें ध्यान

वजन बढ़ाने का मतलब यह नहीं कि आप जमकर फास्ट फूड या पैटी डाइट पर टूट पड़ें। यहां समझदारी से काम लेना जरूरी है।
थोड़ी-थोड़ी देर पर डाइट लें और अपने भोजन की मात्रा थोड़ी बढ़ाएं। डाइट में कार्बोहाइड्रेट और हेल्दी फैट्स की मात्रा बढ़ाएं। अध‌िक कैलोरी वाली डाइट जैसे रोटियां, रेड मीट, राजमा, सब्जियां, मछली, चिकन, ऑलिव्स और केले जैसे फल आदि की मात्रा बढ़ाएं।

दिन में कम से कम पांच बार थोड़ी-थोड़ी डाइट लें।

कसरत न छोड़ें

वजन बढ़ाने का मतलब यह नहीं कि आप आलस की चादर ओढ़ लें। शरीर को फिट रखने के लिए हर हाल में कसरत जरूरी है।
प्रतिदिन आधा घंटा भी अगर आप कसरत को देंगे तो आपके शरीर का मेटाबॉलिज्म अच्छा होगा, भूख अच्छी तरह लगेगी और आप फिट रहेंगे।
कसरत और हेल्दी डाइट का कांबिनेशन वजन घटाने और बढ़ाने, दोनों के लिए जरूरी है। वेट लिफ्टिंग कसरतें इस मामले में मददगार हैं।

तनाव न लें

वजन सेहतमंद तरीके से बढ़ाना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है जिसका स्ट्रेस लेने से कोई फायदा नहीं है। कसरत और अच्छी डाइट के साथ-साथ रुटीन में आराम का थोड़ा समय निकालें।
सोने और उठने का समय निर्धारित करें जिससे शरीर तेजी से रिकवर होगा। योग और प्राणायाम के जरिए आप तनाव मुक्त होकर अपने शेड्यूल पर कायम रह सकते हैं।
      नाश्ते में बादाम,दूध,मक्खन घी  का पर्याप्त मात्रा में उपयोग करने से आप तंदुरस्त रहेंगे और वजन भी बढेगा।





   भोजन में प्रोटीन की मात्रा बढाएं। दालों में प्रोटीन की मात्रा ज्यादा होती है। अडा,मछली,मीट भी प्रोटीन के अच्छे स्रोत हैं।बादाम,काजू का नियमित सेवन करें।

     बीमारी की अवस्था में,बीमारी के बाद,यात्रा से  या मेहनत  से थके होने पर,,सुबह और शाम के वक्त और उपवास  की अवस्था में अपने पार्टनर से शारीरिक संबंध बनाना हानिकारक है।
   अधिक केलोरी वाला भोजन लेते रहें।
   च्यवनप्राश वजन बढाने की और स्वस्थ रहने की मशहूर आयुर्वेदिक औषधि है। सुबह -शाम दूध के साथ सेवन करते रहें।
    आयुर्वेद में अश्वगंधा और सतावरी  के उपयोग से वजन बढाने का उल्लेख मिलता है।३-३  ग्राम  दोनों रोज सुबह लं का चूर्ण दूध के साथ प्रयोग करें। वसंतकुसुमाकर रस भी काफ़ी असरदार  दवा है।





   रोज सुबह ३-४ किलोमीटर  घूमने का नियम बनाएं। ताजा हवा भी मिलेगी और आपका मेटाबोलिस्म  भी ठीक रह्र्गा।







भोजन खूब अच्छी तरह से चबा चबा कर खाना चाहिये। दांत का काम आंत पर डालना उचित नहीं है।
दोनों वक्त शोच निवृत्ति की आदत डालें।
किशमिश-
५० ग्राम किश मिश रात को पानी में भिगोदे सुबह भली प्रकार चबा चबा कर खाएं। २-३ माह के प्रयोग से वजन बढेगा।
नारियल का दूध - 
यह आहार तेलों का समृद्ध स्रोत है और भोजन के लिए अच्छा तथा स्वादिस्ट जायके के लिए जाना जाता है। नारियल के दूध में भोजन पकाने से खाने में कैलोरी बढ़ेगी। जिससे आपके वजन में वृधि होगी।
मलाई-
 मिल्क क्रीम में आवश्यकता से ज्यादा फैटी एसिड होता है। और ज्यादातर खाद्य उत्पादों की तुलना में अधिक कैलोरी की मात्रा होती है। मिल्क क्रीम को पास्ता और सलाद के साथ खाने से वजन तेजी से बढ़ेगा।
अखरोट -
 अखरोट में आवश्यक मोनोअनसेचुरेटेड फैट होता है जो स्वस्थ कैलोरी को उच्च मात्रा में प्रदान करता है। रोज़ 20 ग्राम अखरोट खाने से वजन तेजी से प्राप्त होगा।
केला- 
तुरंत वजन बढाना हो तो केला खाइये। रोज़ दो या दो से अधिक केले खाने से आपका पाचन तंत्र भी अच्छा रहेगा।
ब्राउन राइस -
 ब्राउन राइस कार्बोहाइड्रेट और फाइबर की एक स्वस्थ खुराक का स्रोत है। भूरे रंग के चावल कार्बोहाइड्रेट का भंडार है इसलिए नियमित रूप से इसे खाने से वजन तेजी से हासिल होगा।
आलू- 
आलू कार्बोहाइड्रेट और काम्प्लेक्स शुगर का अच्छा स्त्रोत है। ये ज्यादा खाने से शरीर में फैट की मात्रा बढ़ जाती है।
बीन्स : 
जो लोग शाकाहारी है और नॉनवेज नहीं खाते उनके लिए बीन्स से अच्छा कोई विकल्प नहीं है। बीन्स के एक कटोरी में 300 कैलोरी होती है। यह सिर्फ वजन बढ़ने में ही मदत नहीं करता बल्कि पौष्टिक भी होता है।
मक्खन : 
मक्खन में सबसे ज्यादा कैलोरी पाई जाती है। मक्खन खाने के स्वाद को सिर्फ बढ़ाता ही नहीं बल्कि वजन बढ़ाने में भी मदद करता है।

13.6.16

केसर रोग मे उपयोगी नुस्खे Domestic drugs useful in cancer

                                                                                                                
केन्सर एक बीमारी नही है,अपितु लगभग १०० रोगों के सम्मिलित समूह का नाम है। इस रोग मे शरीर की कोषिकाओं (Cells) की अनियन्त्रित वृद्धि होने लगती है  और ये अनियमित आकार की कोषिकाएं अपने मूल पैदाईशी स्थान से शरीर के अन्य दूरस्थ भागों को अभिगमन करने लगती हैं। अगर इन  केन्सर सेल्स को समय रहते रोका नहीं गया तो रोगी की मृत्यु  हो जाती है।

    यह रोग वैसे तो हर उम्र में हो सकता है लेकिन आंकडों पर नजर डाली जावे तो ६० प्रतिशत केन्सर रोगी ६५  साल से ज्यादा आयु के लोग होते हैं।
    
      जब जांच कराने के बाद मालूम हो जाये कि केन्सर अस्तित्व में आ चुका है तो रोगी को केन्सर पैदा करने वाली चीजों से परहेज करना चाहिये-  १..तम्बाखू. २..ज्यादा शराब पीना.  ३..अधिक कैफ़िन तत्व युक्त पदार्थ जैसे चाय और काफ़ी. ४..एक्स-रे.  ५..सिर के उपर से गुजरने वाली अतिशक्ति, हाई पावर विद्युत लाईन   ६..भोजन के पदार्थों में रंग मिश्रित करना।

     केन्सर रोगी के शरीर में विजातीय याने अनावश्यक जहरीले द्रव्यों का संग्रह मौजूद रहता है और इस रोग के इलाज में पहली जरूरत इन विजातीय पदार्थों को शरीर से बाहर निकालना है।विजातीय पदार्थों के शरीर से निष्कासन होने से हमारा प्रतिरक्षा तन्त्र मजबूत होता है और शरीर में केन्सर से लडने की ताकत पैदा होती है।

         जहरीले विजातीय पदार्थों के निष्कासन के लिये क्या करें?


१) अदरक का रस दो चम्मच दिन में दो मर्तबा पीयें।
२) अंग्रेजी औषधी Inositol  ८०० एम जी प्रतिदिन लेते रहें।
३) अंग्रेजी दवा ग्लुटाथिओन १५० एम.जी रोज लें।
४) लिपोईक एसिड ६०० एम जी प्रतिदिन लें।
उक्त  दवाएं किसी जानकार चिकित्सक के मार्ग दर्शन में लेना फ़ायदेमंद रहेगा।
केन्सर के ट्युमर का पोषण  बंद करने के लिये निम्न उपचार करें--



१) हल्दी











२)  लहसुन
३)फ़ोलिक एसिड
 ४)अलसी का तेल १५ ग्राम प्रतिदिन
 ५  सेलेनिअम ४०० एम जी  प्रतिदिन
 ६)विटामिन   ई  ८०० एम जी रोज।

        केन्सर से लडने के लिये हम क्या खाएं?

                   अंकुरित गेहूं याने जुवारे २० ग्राम  पीसकर रस बनाकर प्रतिदिन पीयें। इससे नया खून बनेगा और केन्सर से लडने की ताकत बढेगी।





लहसुन और प्याज प्रचुर मात्रा में सेवन करना केन्सर रोग में हितकारी उपाय है।




पत्तेदार हरी सब्जीयां,लाल मिर्च, अंगूर बैर,गाजर इन भोजन पदार्थों में एन्टि ओक्सीडेन्ट तत्व होते हैं जो केन्सर के विरुद्ध लडाई में मददगार होते हैं।

      इनके अलावा केन्सर रोगी को निम्न पदार्थों का प्रचुर मात्रा में सेवन करने की सलाह दी जाती है--फ़ूल गोभी. पत्तागोभी, ब्रोकली,  आलू, मक्का, भूरे चावल ,मछली,अखरोट और सेव फ़ल।
      सबसे जरूरी बात ये है कि केंसर  के सेल्स याने कोषिकाओं का  पोषण बंद करना चाहिये जिससे केन्सर की कोषिकाएं भूखे मरकर समाप्त होने लगे।  इसके  लिये निम्न बातों पर ध्यान दें---
१)  शकर एसा पदार्थ है जिससे केन्सर को पोषण मिलता है। अत: शकर का उपयोग करना छोड दें, इसकी जगह थौडी मात्रा में शहद या  गुड ले सकते हैं।
  २)  दूध मे श्लेष्मा होती है।  आंतों में मौजूद श्लेष्मा केन्सर कोषिकाओं का पोषण करती है अत: दूध और दूध से बने पदार्थ उपयोग में न लाएं।  हां,सोयाबीन का दूध ले सकते हैं। इस  उपचार से केन्सर के सेल्स भूखों मरेंगे और समाप्त होने लगेंगे।
 ३) केन्सर सेल्स अम्लीय वातावरण में तेजी से पनपते हैं। मंसाहार अम्लीय गुण वाला होता है। इसलिये केन्सर रोगी मांसाहार छोड दें।
४)  काफ़ी,चाय,चाकलेट में ज्यादा मात्रा में केफ़िन तत्व होता है जो केन्सर को बढावा देता है,अत: इनका त्याग आवश्यक है।
५)  केन्सर सेल्स का आवरण मजबूत प्रोटीन से बना होता है  जब मांसाहार से परहेज करेंगे तो शरीर मे अधिक मात्रा में एन्जाईम उत्पादन होंगे और ये एन्जाईम केन्सर सेल्स की दीवारो पर चोट कर उन्हें नष्ट करेंगे।और ये एन्जाईम हमारे शरीर के स्वस्थ्य सेल्स को ताकत देंगे  जिससे वे केन्सर के सेल्स को नष्ट कर सकेंगे।
६)  केन्सर के सेल्स भरपूर आक्सीजन युक्त वातावरण में जीवित नहीं रह सकते। अत: शरीर में      आक्सीजन का प्रवाह बढाने के लिये योग और  प्राणायाम करने लाभदायक रहेंगे।
   कच्चा भोजन फ़ायदेमंद है-

      केन्सर रोगी के भोजन में ८० प्रतिशत सब्जियों का रस जरूरी है। अनाज के बीज,सूखे मेवे और कुछ फ़ल भी ले सकते हैं।  बाकी २० प्रतिशत भोजन पकाया हुआ या उबाला हुआ लेना चाहिये। यह केन्सर रोगी का आदर्श भोजन विधान है।


  ताजा सब्जीयों में ऐसे एन्जाईम होते हैं जो शीघ्र ही  हमारी कोशिकाओं की  गराई तक पहुंच जाते हैं  जिससे स्वस्थ सेल्स का निर्माण होता है  । सभी तरह की सब्जीयों का  रस पियें और कच्ची सब्जियां भी भरपूर तादाद में इस्तेमाल करें।








      एक ताजा शोध में यह प्रमाणित हुआ है कि तुलसी और पुदिने में ऐसे रासायनिक तत्व काफ़ी मात्रा में पाये जाते हैं जिनमें केन्सर उत्पादक फ़्री रेडिकल्स से लडने की शक्ति मौजूद रहती है।

   करेला का जूस केंसर में लाभदायक है--

वैसे तो करेला मधुमेह रोग में बहुत बढ़िया असर दिखाता है और शुगर का लेविल शीघ्र ही सामान्य हो जाता है, लेकिन नए अनुसंधान में यह साबित हुआ है कि इससे केंसर रोग की रोक-थाम की जा सकती है| करेले में एक रसायन पाया गया है जो केंसर युक्त कोशिकाओं को ग्लूकोस इस्तेमाल करने से रोकता है| केंसर की कोशिकाएं ग्लूकोज नहीं मिलने से बेदम होने लगती है और धीरे धीरे नष्ट हो जाती हैं| वैज्ञानिकों ने पाया है कि करेले का जूस सिर,गले और आंतों के केंसर में उपकारी है|   

वैसे तो केन्सर का कारगर ईलाज जैसी कोई बात अभी तक इस दुनियां में नहीं है लेकिन मेरे बताये कुदरती उपचारों से केन्सर रोगी की जीवन रेखा में ईजाफ़ा होगा और क्वालिटी आफ़ लाईफ़ में भी सुधार होगा।मन मजबूत बनाकर निर्देशों के मुताबिक अपनी जीवनशैली निर्धारित करें।

12.6.16

साईटिका(कटिस्नायुशूल) रोग की चिकित्सा : Simple treatment of sciatica

    

 साईटिका नर्व (नाड़ी) शरीर की सबसे लंबी नर्व होती है। यह नर्व कमर की हड्डी से गुजरकर जांघ के पिछले भाग से होती हुई पैरोँ के पिछले हिस्से मेँ जाती है। जब दर्द इसके रास्ते से होकर गुजरता है, तब ही यह साईटिका का दर्द कहलाता है। यह दर्द सामान्यत: पैर के निचले हिस्से की तरफ फैलता है। ऐसा दर्द स्याटिक नर्व में किसी प्रकार के दबाव, सूजन या क्षति के कारण उत्पन्न होता है। इसमें चलने-उठने-बैठने तक में बहुत तकलीफ होती है। 
    यह दर्द अक्सर लोगों में 30 से 50 वर्ष की उम्र में होता है| यह समझ लेना आवश्यक है कि साईटिका किसी रोग का नाम नहीं है अपितु गद्ध्रसी नाडी मे विकार आ जाने से शरीर में पैदा होने वाले लक्षण समूह इस रोग को परिभाषित करते हैं ।साईटिका  नाडी के विस्तार -स्थलों में भयानक दर्द होने को ही रिंगणबाय या गद्धृसी वात कहा जाता है। साईटिका हमारे शरीर की सबसे बडी नर्व(नाडी) है जो हमारी ऊंगली के बराबर मोटी होती है। कमर की जगह स्थित रीढ की हड्डी की जगह पर असहनीय दर्द होता है। रीढ की ४ थी और ५ वीं कशेरुका की जगह से साईटिका नाडी निकलती है। यह नाडी आगे चलकर कूल्हे,जांघ,घुटने ,टांग के पीछे के भाग में होती हुई पैर तक फ़ैली हुई होती है। आम तौर पर यह रोग शरीर के दायें अथवा बायें एक साईड को ही प्रभावित करता है। दर्द धीमा,तेज अथवा जलन वाला हो सकता है। झुनझुनी और सुन्नपन के लक्षण  भी देखने को मिलते हैं। बैठने और खडे होने में तकलीफ़ मालूम पडती है। खांसने और छींक आने पर दर्द तेज हो जाता है।
     साईटिका नाडी के ऊपर दवाब की वजह से यह रोग होता है। इस नाडी की स्थायी क्षति या इसकी वजह से लकवा पड जाना बहुत कम मामलों में देखने मे आता है | फ़िर भी धड और टांगों की अतिशय कमजोरी अथवा मूत्राषय और अंतडियों की कार्य प्रणाली में ज्यादा खराबी आ जाने पर तुरंत सुविज्ञ  चिकित्सक से संपर्क करना चाहिये। अन्य लक्षण- कमर के निचले हिस्से मेँ दर्द के साथ जाँघ व टांग के पिछले हिस्से मेँ दर्द। पैरोँ मेँ सुन्नपन के साथ मांसपेशियोँ मेँ कमजोरी का अनुभव। पंजोँ मेँ सुन्नपन व झनझनाहट। 

बचाव: :
प्रतिदिन सामान्य व्यायाम करेँ।
 वजन नियंत्रण मेँ रखेँ।
 पौष्टिक आहार ग्रहण करेँ।
 रीढ़ की हड्डी को चलने-फिरने और उठते-बैठते समय सीधा रखेँ। 
भारी वजन न उठाएं।
साईटिका रोग के उपचार लिख देता हूँ-
१) आलू का रस ३०० ग्राम नित्य २ माह तक पीने से साईटिका रोग नियंत्रित होता है। इस उपचार का प्रभाव बढाने के लिये आलू के रस मे गाजर का रस भी मिश्रित करना चाहिये.
 २) कच्ची लहसुन का उपयोग सियाटिका रोग में अत्यंत गुणकारी है। २-३ लहसुन की कली सुबह -शाम पानी से निगल जावें। विटामिन बी १, तथा बी काम्प्लेक्स का नियमित प्रयोग सियाटिका रोग को काफ़ी हद तक नियंत्रित कर लेता है। भोजन में ये विटामिन हरे मटर ,पालक,कलेजी,केला,सूखे मेवे,और सोयाबीन में प्रचुरता से मिल जाता है।
जल चिकित्सा इस रोग में कारगर साबित हो चुकी है। एक मिनिट ठंडे पानी के फ़व्वारे के नीचे नहावें। फ़िर ३ मिनिट गरम जल के फ़व्वारे में नहावें। दूसरा तरीका यह है कि कपडे की पट्टी ठंडे जल में डुबोकर निचोडकर(कोल्ड काम्प्रेस) प्रभावित भाग पर १ मिनिट रखें फ़िर गरम जल में डुबोई सूती कपडे की पट्टी प्रभावित हिस्से पर रखे।ऐसा करने से प्रभावित हिस्से में रक्त संचार बढ जाता है। और रोगी को चेन आ जाता है।

४)  लहसुन की खीर इस रोग के निवारण में महत्वपूर्ण है। १०० ग्राम दूध में ४ लहसुन की कली चाकू से बारीक काटकर डालें। इसे उबालें। उतारकर ठंडी करके पीलें। यह उपचार  २-३ माह तक जारी रखने से सियाटिका रोग को उखाड फ़ैंकने में भरपूर मदद मिलती है। लहसुन में एन्टी ओक्सीडेन्ट तत्व होते हैं जो शरीर को स्वस्थ रखने हेतु मदद गार होते है 
५)  हरे पत्तेदार सब्जियों का भरपूर उपयोग करना चाहिये। लेकिन लहसुन में खून को पतला रखने के तत्व पाये जाते हैं अत: जिन लोगों की रक्त स्राव की प्रवृति हो वे यह नुस्खा अपने चिकित्सक की सलाह के बाद ही इस्तेमाल करें।
 ६)  सरसों के तेल में लहसुन पकालें। दर्द की जगह इस तेल की मालिश करने से फ़ोरन आराम लग जाता है।
* साईटिका रोग को ठीक करने में नींबू का अपना महत्व है। नींबू के रस में दो चम्मच शहद मिलाकर नियमित पीने से आशातीत लाभ होता है। 
७) आहार मेँ विटामिन सी, ई, बीटा कैरोटिन (हरी सब्जियोँ व फलोँ मेँ) और कैल्शियम का सेवन उपयोगी है। कैल्शियम दूध मेँ पर्याप्त मात्रा मेँ पाया जाता है। इसी तरह कान्ड्राइटिन सल्फेट व ग्लूकोसामीन (इन पोषक तत्वोँ की गोलियाँ दवा की दुकानोँ पर उपलब्ध हैँ) का सेवन भी लाभप्रद है। वहीँ आइसोफ्लेवान (सोयाबीन मेँ मिलता है) और विटामिन बी12 (बन्दगोभी व ऐलोवेरा मेँ) आदि का पर्याप्त मात्रा मेँ प्रयोग करने से ऊतकोँ (टिश्यूज) का पुन: निर्माण होता है।
 ८) रोग उग्र होने पर रोगी को संपूर्ण विश्राम कराना चाहिये। लेकिन बाद में रोग निवारण के लिये उपयुक्त व्यायाम करते रहना जरुरी है\

सायटिका का होम्योपैथिक उपचार
एलोपैथी में जहां सायटिका दर्द का उपचार केवल दर्द निवारक दवाइयां एवं ट्रेक्शन है वहीं पर होम्यापैथी में रोगी के व्यक्तिगत लक्षणों के आधार पर दवाईयों का चयन किया जाता है जिससे इस समस्या का स्थाई समाधान हो जाता है। सायटिका रोग के उपचार में प्रयुक्त होने वाली औषधियां इस प्रकार हैं।
कोलोसिन्थ-
रोगी के चिड़चिड़े स्वभाव के कारण क्रोध आ जाता हो, गृध्रसी बायी ओर का पेशियों में खिंचाव व चिरने-फाड़ने जैसा दर्द विशेषकर दबाने या गर्मी पहुंचाने से राहत मालूम हो।
नेफाइलियम
पुरानी गृध्रसी वात आराम करने से पैरों की पिंडलियों मं ऐंठन होने की अनुभूति के साथ सुन्नपन व दर्द अंगों को ऊपर की ओर खींचने एवं जांघ को उदर तक मोड़ने से राहत हो।
रसटॉक्स
ठंड व सर्द मैसम में रोग बढ़ने की प्रवृत्ति, अत्यधिक बेचैनी के साथ निरन्तर स्थिति बदलते रहने का स्वभाव, गृध्रसी वात का जो दर्द चलने-फिरने से आराम होता है एवं आराम करने से ज्यादा, साथ ही सन्धियों एवं कमर में सूजन के साथ दर्द होता हो।
 

ब्रायोनिया-

अत्यधिक चिड़चिड़ापन, बार-बार गुस्सा आने की प्रवृत्ति, पुराने गृध्रसी वात, दोनों पैर में सूई की चुभन तथा चीड़फाड़ किए जाने जैसा दर्द हो जो चलने फिरने से बढ़ता हो एवं आराम करने से घटता हो, साथ ही पैरों के जोड़ सूजे हुए, लाल व गर्म हो, जिसमें टीस मारने जैसा जलन युक्त दर्द हो।
गुएकम-
सभी तरह के वात जैसे गठिया व आमवाती दर्द जो खिंचाव के साथ फाड़ती हुई महसूस हो, टखनों मे दर्द जो ऊपर की ओर पूरे पैरों में फैल जाया करता हो, साथ ही पैरों के जोड़ सूजे हुए, दर्दनाक व दबाव के प्रति असहनीय, गर्मी बर्दास्त न हो।
लाइकोपोडियम-
सायटिका जो विशेषकर दायें पैर में हो, दर्द कमर से लेकर नीचे पैर तक हो एवं पैरों में सुन्नपन व खिंचाव के साथ दर्द महसूस हो, साथ ही साथ रोगी को बहुत पुरानी वात व गैस हो व भूख की कमी महसूस हो।
आर्निका माॅन्ट-
बहुत पुरानी चोट जिनके वजह से रोग प्रार्दुभाव स्थान में लाल सूजन व कुचलने जैसा दर्द हो साथ ही रोग ठंड व बरसात से बढ़े, आराम व गर्माहट से घटे।


कास्टिकम-
दाहिने पैर में रोग की शुरुआत, रोग वाली जगह का सुन्न व कड़ा होना, ऐसा मालूम होता हो कि जैसे वहां की मांसपेशियां एक साथ बंधी हुई हो साथ ही नोच-फेंकने जैसा दर्द होता रहे।
ट्यूबरकुलिनम-
जिन रोगियों के वंश में टी.बी. का इतिहास हो, साथ ही उनको सायटिका दर्द भी पुराना हो। इसके अतिरिक्त बेलाडोना, जिंकमेट, लीडमपाल, फेरमफॅास, आर्सेनिक एल्बम, कैमोमिला, कैल्मिया, अमोनियम मेयोर, कॉली बाइक्रोम, नेट्रसल्फ आदि औषधियों का प्रयोग रोगी के लक्षणों के आधार पर किया जाता है।
सावधानियां
सायटिका रोग के सम्बन्ध में अनेक भ्रान्तियां व्याप्त हैं। कुछ तथाकथित चिकित्सक चीरा लगाकर गन्दा खून निकालकर सायटिका के इलाज का दावा करते हैं जो कि गलत है क्योंकि इस रोग का खून के गन्द होने से कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकार के इलाज से आपकी समस्या बढ़ सकती है। सायटिका रोगी को निम्न सावधानियां अपनानी चाहिए।
रोगी को बिस्तर पर आराम करना चाहिए।
रोगी को नियमित रूप से व्यायाम एवं टहलना चाहिए।
रोगी को हल्का भेजन लेना चाहिए।
अस्वास्थ्यप्रद वातावरण एव सीलन भरे गन्दे मकान में नहीं रहना चाहिए। 
विशिष्ट परामर्श-  

संधिवात,,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त होकर चल फिर सकने योग्य हो जाते हैं||औषधि के लिए वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क करने की सलाह दी जाती है|

7.6.16

किडनी फेल रोगी के लिए उपयोगी जानकारी How to tackle kidney failure disease



हमारे शरीर के हानिकारक पदार्थो को शरीर से छानकर बाहर निकलने का काम किडनी का ही होता है! किडनी हमारे शरीर के लिए रक्त शोधक का काम करती है, हम जो कुछ भी खाते है उसमे से विषैले तत्वों और नुकसान पहुचने वाले पदार्थो को यूरिनरी सिस्टम (मूत्राशय) के जरिये बाहर निकाल देती है जिससे के शरीर ठीक तरीके से काम कर सके और जहरीले तत्व कोई हानि नहीं पंहुचा सके!
हमें देश में दिन प्रति दिन ये बीमारी विकराल रूप से बड रही है और इस बीमारी की वजह से लोग अपनी जान से हाथ धो बैठते है! दुख की बात तो ये है के इस बीमारी का बहुत देर से पता चलता है जब तक किडनी 60-65% तक ख़राब हो चुकी होती है! इस रोग में बहूत सावधानी बरतनी पड़ती है!
किडनी फेल क्यों होती है?
हमारे शरीर के रक्त को शोधित करने का काम करने वाली किडनी खून में से हानिकारक पदार्थो को मूत्र के माध्यम से अनावश्यक व जहरीले तत्व बहार कर देती है!
किडनी रोग के लक्षण क्या है!
इस रोग का पता वैसे तो जल्दी नहीं लग पता लेकिन अगर सावधानी रखी जाए और लक्षणों पर गौर किया जाए तो निम्न लक्षण के जरिये इसका पता चलता है-
*हाथ पैर व आँखों के नीचे का भाग में सुजन आ जाती है!
*रोगी को भूख नहीं लगती है और शरीर में खून की कमी होने लगती है!
*शरीर में खुजली होना, बार बार मूत्र आना, कमजोरी महसूस होती है!-
*सांसे फूलने लगती है और हाजमा भी खराब रहता है!
 

किडनी के रोग को चार  भागो में बाटा गया है !
इस रोग के चरणों को पहचानने के लिए इसे विभिन्न भागो में बांटा गया है, जिसके जरिये रोगी की स्थिति का पता चलता है और उसी के हिसाब से उसका इलाज सही प्रकार से किया जा सकता है!-
किडनी रोग का पहला चरण-
नार्मल क्रीयेटीनिन, एक पुरुष के 1 डेसिलीटर खून में .6-1.2 मिलीग्राम और एक महिला के खून में 0.5-1.1 मिलीग्राम EGFR (Estimated Glomerular Filtration rate) सामान्यत: ९० या उससे ज्यादा होता है!
दूसरा चरण ( Second Stage):
इस stage में EGFR कम हो जाता है जो 90% - 60% तक हो जाता है, लेकिन फिर भी क्रीयेटीनिन सामान्य ही रहता है! लेकिन मूत्र में प्रोटीन ज्यादा आने लगता है!
तीसरा चरण-
इस stage में EGFR और घट जाता है जो 60-30 के बीच हो जाता है और क्रीयेटीनिन बढ़ जाता है! इस चरण में ही किडनी रोग के लक्षण दिखाई पड़ने लगते है, पेशाब में यूरिया बढ़ने से खुजली होने लगती है, मरीज एनेमिया से भी ग्रसित हो सकता है!
चौथा चरण -
इस चरण में EGFR 30-50 तक आ जाता है और थोरी सी भी लापरवाही खतरनाक हो सकती है इसमे क्रीयेटीनिन भी 2-4 के बीच हो जाता है! अगर सावधानी नहीं बरती गई तो डायलेसिस या फिर ट्रांसप्लांट की जरूरत पड़ सकती है!
पाचवां चरण-
इसमे EGFR 15 से नीचे (कम ) हो जाता है तथा क्रीयेटीनिन 4-5 या अधिक होता है इसमे मरीज को डायलेसिस या ट्रांसप्लांट तक करानी पड़ जाती है!
किडनी रोग का इलाज क्या है?
इसके इलाज में रोगी को रीनल रिप्लेसमेंट की जरूरत पड़ती है, वैसे तो पूर्णता: इलाज किडनी ट्रांसप्लांट के द्वारा ही हो सकता है! परन्तु जब तक मरीज का ट्रांसप्लांट नहीं हो जाता है तब तक डायलेसिस के जरिये ही काम लिया जा सकता है! वैसे तो डॉक्टर्स का कहना है के खाने पिने में लापरवाही ना की जाए और खाना ठीक प्रकार से लिया जाए तो डायलेसिस से भी काम चल जाता है! इसमे रोगी को अपना खाना डाइट चार्ट के हिसाब से लेना चाहिए और रोजाना बिना किसी प्रकार के लापरवाही किये नियमित तरीके से रूटीन फॉलो करते हुए डायलेसिस समय समय पर करवाता रहे तो वो काफी लम्बे समय तक (कई सालो तक) जीवित रह सकता है!


किडनी ट्रांसप्लांट स्थाई इलाज व उपाय है 
डायलेसिस तो अस्थाई इलाज है इस बीमारी का पूर्णता: ठीक होने ले लिए किडनी ट्रांसप्लांट जरूरी होता है इस रोग में! इसके लिए मरीज को किडनी प्रदान करने वाले किसी डोंनर (Donner) की जरूरत होती है जिसका ब्लड ग्रुप मरीज के साथ मिलना जरूरी होता है! इसमे ट्रांसप्लांट के वक़्त दोनों व्यक्तियों का (मरीज और किडनी डोंनर) के शरीर से टिश्यू लेकर उसका मिलान किया जाता है!
इस बीच कई दुसरे जरूरी टेस्ट भी किये जाते है! जिससे ये पता चलता है के ट्रांसप्लांट के लिए डोंनर और मरीज दोनों के लिए सब ठीक है के नहीं! ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया के बाद किडनी प्रदान करने वाला यक्ति तो केवल कुछ दिन में ही अपनी जिंदगी सामान्य तरीके से जीना शुरू कर देता है, लेकिन रोगी को फिर भी कुछ समय तक सावधानी की जरूरत पड़ती है!
किडनी के इलाज में कितना खर्चा आता है?
सबसे बेहतर और सुरक्षित साधन केवल सावधानी ही है इसमे रोगी को हर stage में सावधान रहने की जरूरत है! किडनी के इलाज में बहूत खर्चा आता है ये महंगा होता है! यहाँ तक की सरकारी अस्पताल में भी इलाज का खर्चा 2 से 3 लाख तक आ जाता है वो भी तब जब किडनी किसी ब्रेन डेड व्यक्ति से लिया गया हो, जबकि प्राइवेट या निजी हॉस्पिटल में 7-8 लाख तक खर्च करने पड़ सकते है! और अगर ब्लड ग्रुप मैच नहीं करता है तो खर्चा और बढ़ जाता है!
किडनी डायलेसिस पर कितना पैसा खर्च होता है? 
एक बार डायलेसिस में कम से कम 2,000 रूपए से 3,000 रूपए तक का खर्चा आता है जो हर महीने लगभग कम से कम 20,000 रूपए से 30,000 रूपए तक खर्च हो जाते है! डायलेसिस में रोगी को संक्रमण
का विशेष ध्यान रखना पड़ता है!
किडनी के रोग से बचाव के उपाय क्या है?
हालाँकि इस बीमारी का देर से पता चलता है लेकिन व्यक्ति अगर अपने जीवन में स्वस्थ को लेकर शुरू से ही सजग रहे तो इस बीमारी से बचा जा सकता है!
गहरे रंग के साग सब्जी खाने चाहिए उनमे मेगनीसियम अधिक होता है, मेगनीसियम किडनी के लिए बहूत फायदेमंद होता है!
प्रोटीन, नमक, और सोडियम कम मात्र में खाए!
30 साल की उम्र से ही ब्लड प्रेशर और सुगर की नियमित जाँच करते रहना चाहिए
नियमित व्यायाम करे, अपने वजन को बढ़ने न दे, खाना समय पर और जितनी भूख हो उतनी ही खाएं, बाहर का खाना ना ही खाए तो बेहतर है, सफाई के खाने में विशेष ध्यान रखे, तथा पोषक तत्वों  से भरपूर भोजन करें!
अंडे के सफ़ेद वाले भाग को ही खाए उसमे किडनी को सुरक्षित रखने वाले तत्व जैसे के फोस्फोरस और एमिनो एसिड होते है
मछली  खाए इसमे ओमेगा 3 फैटी एसिड किडनी को बीमारी से रक्षा करता है!
प्याज, स्ट्राबेरी, जामुन, लहसुन इत्यादी फायेदेमंद होते है ये मूत्र के संक्रमण से बचाते है तथा लहसुन में उपस्थित एंटी ओक्सिडेंट एवं एंटी क्लोटिंग तत्व दिल की रख्षा करता है और कोलेस्ट्रोल को कम करता है तथा किडनी के लिए फायदेमंद होता है!
 
किडनी मरीजो की जीवन शैली -
किडनी के रोगों में क्रोनिक नेफराईटीस बड़ी वजह हुआ करती थी लेकिन अब शूगर बड़ी वजह माना जाता है और उसके बाद इस बीमारी की बड़ी वजहों में हाइपरटेंशन व क्रोनिक नेफराईटीस का नंबर आता है!
किडनी की हर stage को लोग डायलेसिस से जोड़ देते है जबकि शरीर को डायलेसिस की जरूरत लगभग 95% डैमेज होने के बाद ही पड़ती है
इस रोग में हर व्यक्ति को अत्यधिक पानी पीने की सलाह नहीं दी जा सकती कुछ केसेस में ये हिदायत बिलकुल नहीं देनी चाहिए, एसोसिएटेड हार्ट डिजीज में और मरीज को लीवर के कुछ रोगों में केवल सिमित मात्र में ही पानी पीना चाहिए, इसलिए अपने डॉक्टर से इसके बारे में सलाह जरूर ले.


विशिष्ट सलाह-  
 
 


बढे हुए क्रिएटनिन के लेविल को नीचे लाने और गुर्दे की क्षमता बढ़ाने में हर्बल औषधि सर्वाधिक सफल होती हैं| वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क किया जा सकता है| दुर्लभ जड़ी-बूटियों से निर्मित यह औषधि कितनी आश्चर्यजनक रूप से फलदायी है ,इसकी एक केस रिपोर्ट पाठकों की सेवा मे प्रस्तुत कर रहा हूँ -






केस रिपोर्ट  


रोगी का नाम -     राजेन्द्र द्विवेदी 
इलाज से पूर्व की जांच रिपोर्ट -
जांच रिपोर्ट  दिनांक- 2/9/2017 
ब्लड यूरिया-   181.9/ mg/dl
S.Creatinine -  10.9mg/dl


















हर्बल औषधि प्रारंभ करने के 12 दिन बाद 
जांच रिपोर्ट  दिनांक - 14/9/2017 
ब्लड यूरिया -     31mg/dl
S.Creatinine  1.6mg/dl

6.6.16

एसिडिटी(अम्लता) की सरल चिकित्सा How to cure Acidity?





आहार नली के ऊपरी हिस्से में अत्यधिक अम्लीय द्रव संचरित होने से खट्टापन और जलन का अनुभव होना एसिडिटी कहलाता है। मुहं में भी जलन और अम्लीयता आ जाती है।
आमाषयिक रस में अधिक हायड्रोक्लोरिक एसिड होने से यह स्थिति निर्मित होती है। आमाषयिक व्रण इस रोग में सहायक की भूमिका का निर्वाह करते हैं।
आमाषय सामान्यत: भोजन पचाने हेतु जठर रस का निर्माण करता है। लेकिन जब आमाषयिक ग्रंथि से अधिक मात्रा में जठर रस बनने लगता है तब हायडोक्लोरिक एसिड की अधिकता से एसिडिटी की समस्या पैदा हो जाती है। बदहजमी .सीने में जलन और आमाषय में छाले इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।
एसिडिटी के प्रमुख कारण निम्न हैं
अधिक शराब का सेवन करना।
अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन-वस्तुएं उपयोग करना मांसाहार.
कुछ अंग्रेजी दर्द निवारक गोलियां भी एसिडिटी रोग उत्पन्न करती हैं।
भोजन के बाद अम्लता के लक्षण बढ जाते हैं.
रात को लेटने पर भी एसिडिटी के लक्षण उग्र हो जाते हैं।
निम्न घरेलू पदार्थों से एसिडिटी का ईलाज निरापद और हितकारी होता है।
१) शाह जीरा अम्लता निवारक होता है। डेढ लिटर पानी में २ चम्मच शाह जीरा डालें । १०-१५ मिनिट उबालें। यह काढा मामूली गरम हालत में दिन में ३ बार पीयें। एक हफ़्ते के प्रयोग से एसिडीटी नियंत्रित हो जाती है।
२) भोजन पश्चात थोडे से गुड की डली मुहं में रखकर चूसें। हितकारी उपाय है।
३) सुबह उठकर २-३ गिलास पानी पीयें। आप देखेंगे कि इस उपाय से अम्लता निवारण में बडी मदद मिलती है।
४) तुलसी के दो चार पत्ते दिन में कई बार चबाकर खाने से अम्लता में लाभ होता है।
५) एक गिलास जल में २ चम्मच सौंफ़ डालकर उबालें।रात भर रखे। सुबह छानकर उसमें एक चम्मच शहद मिलाकर पीयें। एसिडीटी नियंत्रण का उत्तम उपचार है।
६) आंवला एक ऐसा फ़ल जिससे शरीर के अनेकों रोग नष्ट होते हैं। एसिडीटी निवारण हेतु आंवला क उपयोग करना उत्तम फ़लदायी है।
७) पुदिने का रस और पुदिने का तेल पेट की गेस और अम्लता निवारक कुदरती पदार्थ है। इसके केप्सूल भी मिलते हैं।
८) फ़लों का उपयोग अम्लता निवारंण में महती गुणकारी है। खासकर केला,तरबूज,ककडी और पपीता बहुत फ़ायदेमंद हैं।
९) ५ ग्राम लौंग और ३ ग्राम ईलायची का पावडर बनालें। भोजन पश्चात चुटकी भर पावडर मुंह में रखकर चूसें। मुंह की बदबू दूर होगी और अम्लता में भी लाभ होगा।
१०) दूध और दूध से बने पदार्थ अम्लता नाशक माने गये हैं।
११) अचार,सिरका,तला हुआ भोजन,मिर्च-मसालेदार चीजों का परहेज करें। इनसे अम्लता बढती है। चाय,काफ़ी और अधिक बीडी,सिगरेट उपयोग करने से एसिडिटी की समस्या पैदा होती है। छोडने का प्रयास करें।
१२) एक गिलास पानी में एक नींबू निचोडें। भोजन के बीच-बीच में नींबू पानी पीते रहें। एसिडिटी का समाधान होगा।
१४) आधा गिलास मट्ठा( छाछ) में १५ मिलि हरा धनिये का रस मिलाकर पीने से बदहजमी ,अम्लता, सीने मे जलन का निवारन होता है।
१५) सुबह-शाम २-३ किलोमिटर घूमने से तन्दुरस्ती ठीक रहती है और इससे अम्लता की समस्या से निपटने में भी मदद मिलती है।

5.6.16

गुर्दे की पथरी (Kidney Stone) के रामबाण उपचार :Home Remedies to dissolve Kidney Stones


    किडनी,,युरेटर या ब्ला्डर, में पथरी निर्माण होना एक भयंकर पीडादायक रोग है। मूत्र में पाये जाने वाले रासायनिक पदार्थों से मूत्र अन्गों में पथरी बनती है,जैसे युरिक एसिड,फ़स्फ़ोरस केल्शियम और ओ़क्झेलिक एसिड। जिन पदार्थों से पथरी निर्माण होती है उनमें केल्शियम ओक्झेलेट प्रमुख है। लगभग ९० प्रतिशत पथरी का निर्माण केल्शियम ओक्झेलेट से होताहै। गुर्दे की पथरी( kidney stone) का दर्द आमतौर पर बहुत भयंकर होता है। रोगी तडफ़ उठता है। पथरी जब अपने स्थान से नीचे की तरफ़ खिसकती है तब यह दर्द पैदा होताहै। पथरी गुर्दे से खिसक कर युरेटर और फ़िर युरिन ब्लाडर में आती है। पेशाब होने में कष्ट होता
है,उल्टी मितली,पसीना होना और फ़िर ठड मेहसूस होना ,ये पथरी के समान्य लक्षण हैं।नुकीली पथरी से खरोंच लगने पर पेशाब में खून भी आता है।इस रोग में पेशाब थोड़ी मात्रा में कष्ट के साथ बार-बार आता है| रोग के निदान के लिये सोनोग्राफ़ी करवाना चाहिये।वैसे तो विशिष्ठ हर्बल औषधियों से ३० एम एम तक की पथरी निकल जाती है लेकिन ४-५ एम एम तक की पथरी घरेलू नुस्खों के प्रयोग से समाप्त हो सकती हैं। मैं ऐसे ही कुछ सरल नुस्खे यहां प्रस्तुत कर रहा हूं।

 १..तुलसी के पत्तों का रस एक चम्मच एक चम्मच शहद में मिलाकर जल्दी सबेरे लें। ऐसा ५-६ माह तक करने से छोटी पथरी निकल जाती है।
 २) मूली के पत्तों का रस २०० एम एल दिन में २ बार लेने से पथरी रोग नष्ट होता है।
 ३) दो अन्जीर एक गिलास पानी मे उबालकर सुबह के वक्त पीयें। एक माह तक लेना जरूरी है।
 ४) नींबू के रस में स्टोन को घोलने की शक्ति होती है। एक नींबू का रस दिन में १-२ बार मामूली गरम जल में लेना चाहिये।
 ५) पानी में शरीर के विजातीय पदार्थों को बाहर निकालने की अद्भुत शक्ति होती है। गरमी में ४-५ लिटर और सर्द मौसम में ३-४ लिटर जल पीने की आदत बनावें।
 ६) दो तीन सेवफ़ल रोज खाने से पथरी रोग में लाभ मिलता है।
 ७) तरबूज में पानी की मात्रा ज्यादा होती है । जब तक उपलब्ध रहे रोज तरबूज खाएं। तरबूज में पुरुषों के लिये वियाग्रा गोली के समान काम- शक्ति वर्धक असर भी पाया गया है।
 ८) कुलथी की दाल का सूप पीने से पथरी निकलने के प्रमाण मिले है। २० ग्राम कुलथी दो कप पानी में उबालकर काढा बनालें। सुबह के वक्त और रात को सोने से पहिले पीयें।
 ९) शोध में पाया गया है कि विटमिन बी६ याने पायरीडोक्सीन के प्रयोग से पथरी समाप्त हो जाती है और नई पथरी बनने पर भी रोक लगती है। १०० से १५० एम जी की खुराक कई महीनों तक लेने से पथरी रोग का स्थायी समाधान होता है।
 १०. अंगूर में पोटेशियम और पानी की अधिकता होने से गुर्दे के रोगों लाभदायक सिद्ध हुआ है। इसमें अल्बुमिन और सोडियम कम होता है जो गुर्दे के लिये उत्तम है।
 ११. गाजर और मूली के बीज १०-१० ग्राम,गोखरू २० ग्राम,जवाखार और हजरूल यहूद ५-५ ग्राम लेकर पावडर बनालें और ४-४ ग्राम की पुडिया बनालें। एक खुराक प्रत: ६ बजे दूसरी ८ बजे और तीसरी शाम ४ बजे दूध-पानी की लस्सी के साथ लें। बहुत कारगर उपचार है|

 १२) पथरी को गलाने के लिये चौलाई की सब्जी गुणकारी है। उबालकर धीरे-धीरे चबाकर खाएं।दिन में ३-४ बार यह उपक्रम करें।
 १३) बथुआ की सब्जी आधा किलो लें। इसे ८०० मिलि पानी में उबालें। अब इसे कपडे या चाय की छलनी में छान लें। बथुआ की सब्जी भी भी इसमें अच्छी तरह मसलकर मिलालें। काली मिर्च आधा चम्मच और थोडा सा सेंधा नमक मिलाकर पीयें। दिन में ३-४ बार प्रयोग करते रहने से गुर्दे के विकार नष्ट होते हैं और पथरी निकल जाती है।
 १४) प्याज में पथरी नाशक तत्व होते हैं। करीब ७० ग्राम प्याज को अच्छी तरह पीसकर या मिक्सर में चलाकर पेस्ट बनालें। इसे कपडे से निचोडकर रस निकालें। सुबह खाली पेट पीते रहने से पथरी छोटे-छोटे टुकडे होकर निकल जाती है।
 १५) सूखे आंवले बारीक पीसलें। यह चूर्ण कटी हुई मूली पर लगाकर भली प्रकार चबाकर खाने से कुछ ही हफ़्तों में पथरी निकलने के प्रमाण मिले हैं।
 १६) स्टूल पर चढकर १५-२० बार फ़र्श पर कूदें। पथरी नीचे खिसकेगी और पेशाब के रास्ते निकल जाएगी। निर्बल व्यक्ति यह प्रयोग न करें।
 १७) मिश्री,सौंफ,सूखा धनिया सभी ५०-५० ग्राम की मात्रा में लेकर रात को डेढ़ लीटर पानी में भिगोकर रख दीजिए २४ घंटे बाद छानकर सौंफ, धनिया पीसकर यह पेस्ट पुन; तरल मिश्रण में घोलकर पीते रहने से मूत्र पथरी निकल जाती है|
 १८) जवाखार: गाय के दूध के लगभग 250 मिलीलीटर मट्ठे में 5 ग्राम जवाखार मिलाकर सुबह-शाम पीने से गुर्दे की पथरी खत्म होती है। जवाखार और चीनी 2-2 ग्राम की मात्रा में लेकर पीसकर पानी के साथ खाने से पथरी टूट-टूटकर पेशाब के साथ निकल जाती है। इस मिश्रण को रोज सुबह-शाम खाने से आराम मिलता है।
 १९) पालक: 100 मिलीलीटर नारियल का पानी लेकर, उसमें 10 मिलीलीटर पालक का रस मिलाकर पीने से 14 दिनों में पथरी खत्म हो जाती है। पालक के साग का रस 20 से 40 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन सुबह-शाम खाने से पथरी में लाभ मिलता है।
 २०) गोक्षुर: गोक्षुर के बीजों का चूर्ण 3 से 6 ग्राम बकरी के दूध के साथ प्रतिदिन 2 बार खाने से पथरी खत्म होती है।
 २१)/ फिटकरी: भुनी हुई फिटकरी 1-1 ग्राम दिन में 3 बार रोगी को पानी के साथ सेवन कराने से रोग ठीक होता है।
 २२)/ कमलीशोरा: कमलीशोरा, गंधक और आमलासार 10-10 ग्राम अलग-अलग पीसकर मिला लें और हल्की आग पर गर्म करने के 1-1 ग्राम का आधा कप मूली के रस के साथ सुबह-शाम लेने से गुर्दे की पथरी में लाभ मिलता है।
 २३)/ आलू: एक या दोनों गुर्दो में पथरी होने पर केवल आलू खाते रहने पर बहुत लाभ होता है। पथरी के रोगी को केवल आलू खिलाकर और बार-बार अधिक मात्रा में पानी पिलाते रहने से गुर्दे की पथरियां और रेत आसानी से निकल जाती हैं। आलू में मैग्नीशियम पाया जाता है जो पथरी को निकालता है तथा पथरी बनने से रोकता है। 
२४)/ तुलसी: 20 ग्राम तुलसी के सूखे पत्ते, 20 ग्राम अजवायन और 10 ग्राम सेंधानमक लेकर पॉउड़र बनाकर रख लें। यह 3 ग्राम चूर्ण गुनगुने पानी के साथ प्रतिदिन सुबह-शाम सेवन करने से गुर्दे का तेज दर्द दूर होता है। २५)/ पके हुए प्याज का रस पीना पथरी निकालने के लिए बेहद लाभ प्रद उपाय है| दो मध्यम आकार के प्याज लेंकर भली प्रकार छीलें | एक गिलास जल में डालकर मध्यम आंच पर पकाएं| अब इस मिश्रण को मिक्सर में डालकर चलाएं | इस रस को छानकर पियें| ७ दिन तक यह उपचार करने से पथरी के टुकड़े निकल जाते हैं| 
 विशिष्ट  परामर्श- 
      
वैध्य श्री दामोदर 9826795656  की जड़ी बूटी - निर्मित औषधि से 30 एम एम तक के आकार की बड़ी  पथरी  भी  आसानी से नष्ट हो जाती है|  पथरी के भयंकर दर्द और गुर्दे की सूजन,पेशाब मे दिक्कत,जलन को तुरंत समाप्त करने मे यह  औषधि  रामबाण की तरह असरदार है|जो पथरी का दर्द महंगे इंजेक्शन से भी काबू मे नहीं आता ,इस औषधि की कुछ ही खुराक लेने से आराम लग जाता है|  आपरेशन की जरूरत ही नहीं पड़ती||औषधि मनी बेक गारंटी युक्त है|

1.6.16

जामुन के फायदे



जामुन कम समय के लिए आने वाला लेकिन बेहद लाभदायक फल है। यह स्वाद और सेहत से भी भरपूर होता है। इसमें एंटीऑक्सीडेंट्स भरपूर मात्रा में होते हैं। जामुन के सेवन से शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता भी मजबूत होती है।
*यह पाचन तंत्र के लिए भी लाभकारी है। खास बात यह है कि डायबिटीज वाले लोग भी इसका सेवन कर सकते हैं। बस एक बात का ध्यान रखें कि कभी भी खाली पेट जामुन का सेवन न करें।
न ही कभी जामुन खाने के बाद दूध का सेवन करें। साथ ही अधिक मात्रा में भी जामुन खाने से बचें।

*यदि आप अपने चेहरे पर रौनक लाना चाहती हैं तो जामुन के गूदे का पेस्ट बनाकर इसे गाय के दूध में मिलाकर लगाने से निखार आता है।
 *विटामिन सी की कमी को दूर करने के लिए जामुन खाना अच्छा रहता है। बहुत कम लोगों को यह मालूम होगा कि जामुन में विटामिन सी प्रचुर मात्रा में पाया जाता है।
 *जामुन शुगर पेशेंट के लिए काफी फायदेमंद होता है। इसमे कैरोटीन, आयरन, फोलिक एसिड, पोटैशियम, मैग्नीशियम, फॉस्फोरस और सोडियम भी पाया जाता है। इस वजह से यह शुगर का लेवल मेंटेन रखता है।
 जामुन का सिरका बनाकर बराबर मात्रा में पानी मिलाकर सेवन करने से यह न केवल भूख बढ़ाता है, बल्कि कब्ज की शिकायत को भी दूर करता है।
* जामुन में फ्लेवोनॉइड्स, फेनॉल्स, प्रोटीन और कैल्शियम भी पाया जाता है, जो सेहत के लिए लाभकारी होता है।
*ग्लूकोज और फ्रक्टोज के रूप में मिलने वाली शुगर शरीर को हाईड्रेट करने के साथ ही कूल और रिफ्रेश करती है।
*जामुन में फाइटोकेमिकल्स भी प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जो शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं।
* अगर आपको कमजोरी महसूस होती है या आप एनीमिया से पीडित हैं तो जामुन का सेवन आपके लिए 


फायदेमंद रहेगा।
 *यदि आपको एसिडिटी की समस्या रहती है तो काले नमक में भुना जीरा मिलाकर पीस लें। फिर इसके साथ जामुन का सेवन करें। एसिडिटी की समस्या दूर हो जाएगी।
 *यदि आपका बच्चा बिस्तर गीला करता है तो जामुन के बीजों को पीसकर आधा-आधा चम्मच दिन में दो बार पानी के साथ पिलाएं।
जामुन के और भी फायदे हैं-


*जामुन को मधुमेह के बेहतर उपचार के तौर पर जाना जाता है।
*पाचनशक्ति मजबूत करने में जामुन काफी लाभकारी होता है।
*यकृत (लिवर) से जुड़ी बीमारियों के बचाव में जामुन रामबाण साबित होता है।
*अध्ययन दर्शाते हैं कि जामुन में एंटीकैंसर गुण होता है।
*कीमोथेरेपी और रेडिएशन में जामुन लाभकारी होता है।
*हृदय रोगों, डायबिटीज, उम्र बढ़ना और अर्थराइटिस में जामुन का उपयोग फायदेमंद होता है।
*जामुन का फल में खून को साफ करने वाले कई गुण होते हैं।
*जामुन का जूस पाचनशक्ति को बेहतर करने में सहायक होता है।
*जामुन के पेड़ की छाल और पत्तियां रक्तचाप को नियंत्रित करने में कारगर होती हैं।
*कब्ज और उदर रोग में जामुन का सिरका उपयोग करें। जामुन का सिरका गुणकारी और स्वादिष्ट होता है, इसे घर पर ही आसानी से बनाया जा सकता है और कई दिनों तक उपयोग में लाया जा सकता है।
*सिरका बनाने की विधि- काले पके हुए जामुन साफ धोकर पोंछ लें। इन्हें मिट्टी के बर्तन में नमक मिलाकर मुँह साफ कपड़े से बाँधकर धूप में रख दें। एक सप्ताह धूप में रखने के पश्चात इसको साफ कपड़े से छानकर रस को काँच की बोतलों में भरकर रख लें। यह सिरका तैयार है।
मूली, प्याज, गाजर, शलजम, मिर्च आदि के टुकड़े भी इस सिरके में डालकर इसका उपयोग सलाद पर आसानी से किया जा सकता है। जामुन साफ धोकर उपयोग में लें।
*यथासंभव भोजन के बाद ही जामुन का उपयोग करें। जामुन खाने के एक घंटे बाद तक दूध न पिएँ। जामुन पत्तों की भस्म को मंजन के रूप में उपयोग करने से दाँत और मसूड़े मजबूत होते है