11.11.12

बुखार की घरेलु आयुर्वेदिक चिकित्सा



                        ज्वर में उपयोगी घरेलू चिकित्सा                                                                                 -



         बुखार  शरीर का कुदरती सुरक्षा तंत्र है जो  संक्रमण (इन्फ़ेक्शन)  से मुक्ति दिलाता है\ इसलिये बुखार कोई बीमारी नहीं है।  शरीर का बढा हुआ  तापमान रोगाणुओं के प्रतिकूल होता है।  लेकिन ज्वर जब ४० डीग्री  सेल्सियस अथवा १०४ डीग्री फ़ारेनहीट से ज्यादा हो जाता है तो समस्या गंभीर हो जाती है।थर्मामीटर से दिन में कई बार बुखार  नापते रहना उचित है। मुख में जिव्हा के नीचे २ मिनट तक थर्मामीटर रखने पर समान्य तापमान ३७.५ डीग्री सेल्सियस या ९९.५ डीग्री फ़ारेनहीट  होता है।  इससे ज्यादा तापमान होने पर बुखार समझना चाहिये।

     ज्वर आने के कई कारण हो सकते हैं लेकिन  सर्दी-खांसी ,थकावट,,चिंता, रोगाणुओं का संक्रमण और दिमागी तनाव प्रमुख कारण होते हैं। घरेलू चिकित्सा से  ज्वर दूर करना प्रयोजनीय और हितकारी है।

१) ललाट और सिर पर बर्फ़ या पानी की गीली पट्टी रखें। इससे आपके शरीर  का तापमान शीघ्र ही नीचे आ जाएगा।


२)  बुखार में  होने वाले शारीरिक दर्दों के निवारण के लिये हाथ ,पैर, ऊंगलियां गर्दन,सिर ,पीठ  पर सरसों के तैल की मालिश करवानी चाहिये। इससे  शारीरिक  पीडा शांत होगी और सूकून मिलेगा।बिजली चलित मस्राजर  का उपयोग भी किया जा सकता है।










३)  शरीर पर मामूली गरम पानी डालते  हुए  स्नान करें  इससे  शरीर का तापमान बढेगा । शरीर का तापमान ज्यादा होने पर बुखार के रोगाणु नष्ट होंगे। यह प्रक्रिया ज्वर रहित अवस्था में करना है।











४)  बुखार अगर  १०२ डीग्री फ़ारेनहीट से ज्यादा न हो तो यह स्थिति  हानिकारक  नहीं  है।  इससे शरीर के विजातीय पदार्थों का निष्कासन होता है  और शरीर को संक्रमण से लडने में मदद मिलती है।मामूली बुखार होते ही घबराना और गोली-केप्सूल  लेना  उचित नहीं है।

५) बुखार की स्थिति में आईसक्रीम खाना उपयोगी है। इससे तापक्रम सामान्य होने में सहायता मिलती है।

६)  बुखार मे अधिक पसीना होकर शरीरगत जल कम हो जाता है  इसकी पूर्ति के लिये उबाला हुआ पानी और फ़लों का जूस पीते रहना चाहिये। नींबू पानी बेहद लाभकारी है।

७)   ज्वर के रोगी को अधिक मात्रा में  उबला हुआ या फ़िल्टर किया हुआ पानी पीना चाहिये।  इससे अधिक पेशाब और पसीना होकर शरीर की  शुद्धि होगी।जहरीले पदार्थ बाहर निकलेंगे।




८)  चाय बनाते वक्त उसमें  आधा चम्मच दालचीनी का पावडर,,दो बडी ईलायची,  दो चम्मच  सूखे अदरक(सोंठ) का पावडर  डालकर खूब उबालें। दिन में २-३ बार यह काढा बनाकर पियें। बुखार का उम्दा ईलाज है।












९)  तुलसी के १० पती और ४  नग काली मिर्च मुंह में भली प्रकार चबाकर  खाएं। यह बहुत उपयोगी  चिकित्सा है।

१०) रात को सोते वक्त त्रिफ़ला चूर्ण एक चम्मच  गरम जल के साथ लें।  त्रिफ़ला चूर्ण में ज्वर नाशक   गुण होते हैं।  इससे दस्त भी साफ़ होगा बुखार से मुक्ति का उत्तम उपचार है।






११) बुखार के रोगी को भली प्रकार दो तीन कंबल ओढाकर  पैर गरम पानी की बाल्टी में २० मिनिट तक रखना चाहिये। इससे पसीना होने लगेगा और बुखार उतर जाएगा।


१२)   संतरा ज्वर रोगियों के लिये अमृत समान है।  इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढती है,तुरंत उर्जा मिलती है,और बिगडे हुए पाचन संस्थान को ठीक करता है।











१३)  एक चम्मच मैथी के बीज के पावडर  की चाय बनाकर दिन में २ बार पीने से ज्वर  में लाभ होता है।










१४)  एक प्याज को दो भागों में काटें। दोनों  पैर के तलवों पर रखकर पट्टी  बांधें। यह उपचार  रोगी के शरीर का तापमान सामान्य होने में मदद करता है।

 बुखार के रोगी को क्या खाना चाहिये?

  ज्वर रोगी को तरल भोजन देना चाहिये। गाढा भोजन न दें। सहज पचने वाले पदार्थ हितकारी हैं।उबली हुई सब्जियां,दही,और शहद  का उपयोग करना चाहिये।ताजा फ़ल और फ़लों का रस पीना उपादेय है। १५० मिलि की मात्रा में गाय का दूध दिन में ४-५ बार पीना चाहिये।



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24.10.12

शहद और दालचीनी से करें रोगों का निवारण.

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             शहद इस धरती पर एक ऐसा पदार्थ है जो कभी सडता या खराब नहीं होता है। शहद को कभी उबालना नहीं चाहिये , वर्ना इसमें  मौजूद एन्जाईम्स नष्ट हो जाएंगे। लेकिन कुछ उपचार ऐसे हैं जिनमें शहद को गर्म करना पड सकता  है। बहुत दिनों तक ठंडे और अंध्रेरे की जगह में रखा रहने पर शहद जम जाता है और क्रिस्टल्स बन जाते हैं । इसके लिये किसी बर्तन में पानी गर्म करके उसमे शहद का पात्र कुछ समय रख दें । शहद पिघल जाएगा।

          अनुसंधान में यह प्रदशित हुआ है कि शहद और दाल चीनी के    मिश्रण में  मानव शरीर के अनेकों रोगों का निवारण करने की अद्भुत  शक्ति  है। दुनियां के करीब सभी देशों में शहद पैदा होता है। आज के वैग्यानिक इस तथ्य को स्वीकार कर चुके हैं कि शहद कई बीमारियों की अचूक औषधि है। पश्चिम के वैज्ञानिक  कहते हैं कि शहद मीठा जरूर है लेकिन अगर इसे सही मात्रा में सेवन किया जावे तो मधुमेह रोगी भी इससे लाभान्वित सकते हैं।

 हृदय रोगों में उपयोगी है

       शहद और दालचीनी के पावडर का पेस्ट बनाएं और इसे रोटी पर चुपडकर खाएं। घी या जेली के स्थान पर यह पेस्ट इस्तेमाल करें। इससे आपकी धमनियों में कोलेस्टरोल जमा नहीं होगा और हार्ट अटेक से बचाव होगा। जिन लोगों को एक बार हार्ट अटेक का दौरा पड चुका है वे अगर इस उपचार को करेंगे तो अगले हार्ट अटेक से बचे रहेंगे। इसका नियमित उपयोग करने से    द्रुत श्वास की कठिनाई दूर होगी । हृदय की धडकन में शक्ति का समावेश होगा। अमेरिका और कनाडा के कई नर्सिंग होम में प्रयोग किये गये हैं और यह निष्कर्ष आया है कि जैसे-जैसे मनुष्य बूढा होता है, उसकी धमनियां और शिराएं कठोर हो जाती हैं। शहद और दालचीने के मिश्रण से धमनी काठिन्य रोग में हितकारी प्रभाव देखा गया है।

संधिवात रोग


            संधिवात रोगी दो बडे चम्मच  शहद और एक छोटा चम्मच दालचीनी का पावडर एक गिलास मामूली गर्म जल से लें। सुबह और शाम को लेना चाहिये। कोपेनहेगन यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों  ने अपने शौध में कहा है कि चिकित्सकों ने नाश्ते से पूर्व एक बडा चम्मच शहद और आधा छोटा चम्मच दालचीनी के पावडर का मिश्रण गरम पानी के साथ दिया। इस प्रयोग से केवल एक हफ़्ते में ३० प्रतिशत रोगी संधिवात के दर्द से मुक्त हो गये। एक महीने के प्रयोग से जो रोगी संधिवात की वजह से चलने फ़िरने में असमर्थ हो गये थे वे भी चलने फ़िरने लायक हो गये।



  मूत्राषय का संक्रमण

         ब्लाडर इन्फ़ेक्शन होने पर दो बडे चम्मच दालचीनी का पावडर और एक बडा चम्मच शहद मिलाकर गरम पानी के साथ देने से मूत्रपथ के रोगाणु नष्ट हो जाते हैं।


 






  कोलेस्टरोल घटाने के लिये

         बढे हुए कोलेस्टरोल में दो बडे चम्मच शहद और तीन चाय चम्मच दालचीनी पावडर मिलाकर आधा लिटर मामूली गरम जल के साथ लें। इससे सिर्फ़ २ घंटे में खून का कोलेस्टरोल लेविल १० प्रतिशत नीचे आ जाता है। और दिन मे तीन बार लेते रहने से कोलेस्टरोल बढे हुए पुराने  रोगी भी ठीक हो जाते हैं।

  आमाषय के रोग

            शहद और दालचीनी के पावडर का मिश्रण लेने से पेट दर्द और पेट के अल्सर जड से ठीक हो जाते हैं। जापान और भारत में किये गये रिसर्च में साबित हुआ है कि दालचीनी और शहद के प्रयोग से उदर की गैस का भी समाधान हो जाता है।



मुहासे


      तीन बडे चम्मच शहद और एक चाय चम्मच दालचीनी पावडर का पेस्ट बनाएं। रात को सोते वक्त चेहरे पर लगाएं। सुबह गरम जल से धोलें ।  दो हफ़्ते के प्रयोग से मुहासे समाप्त होकर चेहरा कांतिमान दिखेगा।




त्वचा विका


    दालचीनी और शहद समाना भाग लेकर मिश्रित कर एक्ज़ीमा,दाद  जैसे चर्म उद्भेद  पर लगाने से अनुकूल परिणाम आते हैं।


  मोटापा निवारण


         एक चाय चम्मच दाल चीनी पावडर  एक गिलास जल में उबालें  फ़िर आंच से उतारकर  इसमें दो बडे चम्मच शहद  मिलाकर सुबह नाश्ते से ३० मिनिट पूर्व   सुहाता गरम पीयें।   ऐसा ही रात को सोने के पहिले करना है। यह उपचार नियमित लेने से शरीर  की अनावश्यक चर्बी समाप्त होती है और अधिक केलोरी वाला भोजन लेने पर भी शरीर में चर्बी नहीं बढती है।







केन्सर



    जापान और आस्ट्रेलिया के वैग्यानिकों ने  आमाषय और  अस्थि  केंसर की बढी हुई स्थिति  को दालचीनी और शहद का उपयोग  से  पूरी तरह काबू  में किया है। ऐसे रोगियों को एक बडा चम्मच शहद और एक चाय  चम्मच  दालचीनी के पावडर  गरम जल के साथ एक माह तक लेना चाहिये।


  बेहरापन



      कम सुनने के रोग में दालचीनी और शहद बराबर मात्रा मे लेने से फ़यदा होता है।  दिन में दो बार लेना हितकर है।


  दीर्घ जीवन 



   लंबी उम्र के लिये  दालचीनी और शहद की चाय नियमित उपयोग करें।  तीन गिलास पानी उबालें । इसमें चार  चाय चम्मच  शहद और एक चाय चम्मच दालचीनी का पावडर मिलाएं। एक चौथाई गिलास चाय हर तीसरे घंटे पीयें।  इससे त्वचा स्वच्छ और झुर्री रहित बनाने में मदद मिलती है। बुढापे को दूर रखने का सर्वोत्तम उपाय है। दीर्घ जीवन की कामना रखने वाले  लोग १०० की उम्र में भी थिरकते दिखेंगे।

   प्रतिरक्षा तंत्र  शक्तिशाली बनाता है


    शहद और दालचीनी के उपयोग से इम्युन सिस्टम ताकतवर बनता है।  खून मे सफ़ेद कणों की   वृद्धि होती  है जो रोगाणु  और वायरस  के हमले से शरीर की सुरक्षा करते  है। जीवाणु और वायरल बीमारियों से लडने की ताकत बढती है।
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1.10.12

कमर दर्द की घरेलू चिकित्सा.


                 

         लगभग ८०% लोग अपने जीवन में कभी न कभी कमर दर्द से  परेशान होते हैं। कमर दर्द नया भी हो सकता है और पुराना रोग भी हो सकता है। नया रोग कमर की मांसपेशियों का  असंतुलित उपयोग करने  से उत्पन्न होता है। रोग पुराना होने पर वक्त बेवक्त कमर दर्द होता रहता है और उसके कारण का पता नहीं चलता है। यह  दर्द कभी-कभी इतना भयंकर होता है कि रोगी तडफ़ उठता है,बैठना-उठना  और यहां तक कि बिस्तर में करवट बदलना भी कठिन हो जाता है।सतही तौर पर देखने पर कमर में होने वाला दर्द भले ही एक सामान्य सी मेडिकल स्थिति लगता है, लेकिन इसे नज़रअंदाज करने से समस्या काफी बढ़ सकती है। 
   शरीर के अंगों  जैसे गुर्दे   में  इन्फ़ेक्शन,पोरुष ग्रंथि की व्याधि,स्त्रियों में पेडू के विकार ,मूत्राषय के रोग  और कब्ज  की वजह से कमर दर्द हो सकता है। गर्भवती स्त्रियों में कमर दर्द आम तौर पर पाया जाता है। गर्भ में बच्चे के बढने से भीतरी अंगों  पर दवाब बढने से कमर दर्द हो सकता है।
   कमर दर्द में लाभकारी घरेलू   उपचार  किसी भी आनुषंगिक दुष्प्रभाव से मुक्त हैं और असरदार भी है। देखते हैं कौन से हैं वे उपचार जो कमर दर्द  राहत पहुंचाते हैं--
   १) नीचे रखी कोई वस्तु उठाते वक्त पहिले अपने घुटने मोडें फ़िर उस वस्तु को उठाएं।
२) भोजन में पर्याप्त लहसुन का उपयोग करें। लहसुन कमर दर्द  का  अच्छा उपचार माना गया है।
३) गूगल कमर दर्द में अति उपयोगी घरेलू चिकित्सा  है। आधा चम्मच गूगल गरम पानी  के साथ सुबह-शाम सेवन करें।
४) चाय  बनाने में ५ कालीमिर्च के दाने,५ लौंग  पीसकर  और थौडा सा सूखे अदरक  का पावडर  डालें।  दिन मे दो बार पीते रहने से कमर दर्द में लाभ होता है।
५)  सख्त बिछोने पर सोयें। औंधे मुंह पेट के बल सोना हानिकारक है।
६)  २ ग्राम दालचीनी का पावडर एक चम्मच  शहद में मिलाकर दिन में दो बार लेते रहने से कमरदर्द में शांति मिलती है।
७) कमर दर्द पुराना हो तो शरीर को गर्म रखें और गरम वस्तुएं खाऎं।
८)  दर्द वाली जगह पर बर्फ़ का प्रयोग करना  हितकारी उपाय है। इससे भीतरी सूजन भी समाप्त होगी। कुछ रोज बर्फ़ का उपयोग करने के बाद गरम सिकाई प्रारंभ कर देने के अनुकूल परिणाम  आते हैं।
९)  भोजन मे टमाटर,गोभी,चुकंदर,खीरा ककडी,पालक,गाजर,फ़लों का प्रचुर उपयोग करें।
१०)  नमक मिलें गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। पेट के बल लेटकर दर्द के स्थान पर तौलिये द्वारा भाप लेने से कमर दर्द में राहत मिलती है।
११) रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन—चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियाँ काली न हो जायें) गर्म कर लें फिर ठंडा कर इसकी पीठ—कमर में मालिश करें।
१२)  कढ़ाई में दो तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। थोड़े मोटे सूती कपड़े में यह गरम नमक डालकर पोटली बांध लें। कमर पर इसके द्वारा सेक करें।
१३) कमर और पीठ के दर्द के निवारण हेतु कुछ योगासनों का विशेष महत्व है। पाठकों की सुवधा के लिये उनका उल्लेख किया जाता है--

कटि चक्रासन :

पहली स्थिति
जमीन पर लेट जाएं व घुटनों को मोड़ते हुए एड़ी को हिप्स से छू दें। हथेलियां सिर के नीचे रखें व कोहनियां जमीन से चिपकी हुई। सांस भरते हुए घुटनों को दाई ओर जमीन से छुएं व चेहरा बाई ओर खींचें, पर कोहनियां जमीन पर रहें। सांस छोड़ते हुए वापस आएं व बाई ओर दोहराएं।


दूसरी स्थिति

जमीन पर लेटी रहें। दाएं पैर के तलवे को बाई जंघा पर चिपका लें व बायां पैर सीधा रखें और दायां घुटना जमीन पर, हथेलियां सिर के नीचे। सांस भरते हुए मुड़ जाएं, पर दाई कोहनी जमीन से चिपकी रहे। जब तक संभव हो, रुकें व सांस छोड़ते हुए वापस दाएं घुटने को दाई ओर जमीन से छू दें। दस बार दोहराएं, फिर बाएं पैर से 10 बार दोहराएं।


सर्पासन 


पेट के बल लेट जाएं। पैरों को पीछे की ओर खींचें व एड़ी-पंजे मिलाए रखें। सांप की पूंछ की तरह। हथेलियों व कोहनियों को पसलियों के पास लाएं। ऐसे कि हथेलियां कंधों के नीचे आ जाएं और सिर जमीन को छुए। आंखें बंद रखें। चेहरा व सीना ऊंचा उठाएं, कमर के वजन पर सांप की तरह। इस स्थिति में जब तक हो सके, बनी रहें। फिर धीरे-धीरे सांस छोड़ते हुए जमीन पर वापस आ जाएं। विश्राम करें, हथेलियां सिर के नीचे टिका दें।
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विशिष्ट परामर्श-
गठिया , संधिवात , कटिवात,साईटिका ,घुटनो की पीड़ा जैसे वात रोगों मे वैध्य श्री दामोदर 98267-95656 की जड़ी- बूटी निर्मित औषधि सर्वाधिक असरदार साबित होती है| बिस्तर पकड़े रोगी भी इस औषधि से दर्द मुक्त होकर चलने फिरने योग्य हो जाते हैं|

5.9.12

अनचाहे मस्से से मुक्ति के उपाय// Remedies for reducing unwanted wart




    
मस्से वैसे तो कोई तकलीफ़ नहीं देते लेकिन खासकर चेहरे के मस्से रंग रूप को विकृत कर देते है। ये त्वचा पर उगते उभरते हैं और अवांछित प्रतीत होते हैं। मस्से गर्दन,हाथ,पीठ ,चिन,पैर आदि किसी भी जगह हो सकते हैं।
मस्से पिगमेंट कोषिकाओं के समूह होते हैं। ये काले भूरे रंग के होते हैं। कुछ मस्से आनुवांशिक होते हैं लेकिन अधिक धूप में रहने से भी मस्से पनप सकते हैं। अधिकतर मस्से केंसर रहित होते हैं।

मस्से का उपचार ऐसे करे

१) मस्से पर आलू काटकर उसकी फ़ांक रगडनी चाहिये। कुछ रोज में मस्से झडने लगेगे।
२) जलती हुई अगरबत्ती का गुल मस्से को छुआएं और तुरंत हटालें। लगातार कुछ दिन ऐसा उपचार करने से मस्से सूखकर झड जाते हैं।
३) केले के छिलके का भीतरी हिस्सा मस्से पर रगडें। हितकारी उपचार है।४) प्याज का रस नियमित रूप से मस्से पर लगाते रहने से मस्से दूर होते हैं।
५) एक लहसुन की कली चाकू से काटकर उसे मस्से पर रगडें। धीरे-धीरे मस्से सूखकर झडने लगते हैं।
६) खट्टे सेवफ़ल का रस मस्से पर दिन में तीन बार लगाने और ऊंगली से मालिश करने से मस्से समाप्त होते हैं।
७) मीठा सोडा अरंडी के तेल में मिलाकर पेस्ट जैसा बनाकर रोज रात को सोते वक्त मस्सों पर ऊंगली से लगाने और उस पर पट्टी बांधने और सुबह में पट्टी खोलने के अच्छे परिणाम प्राप्त होते हैं।
८) फ़ूल गोभी का रस लगाने से मस्से नष्ट हो जाते हैं।
९) रात को सोते वक्त और सुबह के समय मस्सों पर शहद लगाने के लाभकारी परिणाम मिले हैं।
१०) विटामिन सी,विटामिन ए और विटामिन ई का नियमित सेवन करने से मस्सों से निजात मिल जाती है और स्वास्थ्य भी उन्नत हो जाता है।
११) पोटेशियम युक्त सेव,केला,अंगूर,आलू,,पालक ,टमाटर का प्रचुर मात्रा में उपयोग करने से मस्से नष्ट होते हैं।




१२) थूहर का दूध या कार्बोलिक एसीड मस्सों पर लगाना कारगर चिक्त्सा मानी गई ह
१३) नागरवेल के पान के डंठल का रस मस्से पर लगाना परम हितक्री उपचार है।
१४) ग्वार पाठा (एलोवेरा) से मस्से की चिकित्सा की जा सकती है। एलोवेरा के रस में रूई का फ़ाया (काटन बाल) एक मिनट के लिये भिगोएं फ़िर इसे मस्से पर रखें और चिपकने वाली पटी (एढीसिव टेप। से स्थिर कर दें। यह प्रक्रिया दिन में कई बार करना उचित है। ३-४ हफ़्ते में मस्से साफ़ हो जाएंगे।
१५) मस्से वाले भाग को पर्याप्त गरम पानी में डुबाकर रखने से मस्से मुलायम हो जाते हैं और मस्से के वायरस भी मर जाते हैं। पानी इतना गरम ना हो कि त्वचा जल जाए।
१६) मस्से वाले भाग को पाईनेपल जूस में रखें। इसमें मस्से नष्ट करने वाले एन्जाईम होते है।
१७) ताजा अंजीर लें। इसे कुचलकर -मसलकर इसकी कुछ मात्रा मस्से पर लगावें और ३० मिनिट तक लगा रहने दें फ़िर गरम पानी से धोलें। ३-४ हफ़्ते में मस्से समाप्त होंगे।
१८) होम्योपैथी में मस्से नष्ट करने की कई कारगर औषधियां हैं जो लक्षणों की समानता के आधार पर व्यवहार में लाई जाती हैं।
नीचे कुछ होम्योपैथिक दवाएं लिख रहा हूं जो मस्से के ईलाज में प्रयुक्त होती हैं :- थूजा 1m ,कास्टिकम 1m, कल्केरिया कार्ब 1m, डल्कामारा 1m, फ़ेरम पिक्रिकम 30, एसिड नाईट्रिक1m, नेट्रम कार्ब6, नेट्रम म्युरियेटिकम6, एन्टिमोनियम6, सीपिया
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30.4.12

मांसाहार और हमारा स्वास्थ्य

                         मांसाहार और हमारा स्वास्थ्य 


                                                                                        
                                                                                             
                                                                                            
      अब यह तथ्य पूर्णत: संदेह से परे है कि मांस खाना मानव शरीर के स्वास्थ्य के लिये बेहद हानिकारक है। मास भक्षण से होने वाली बीमारिया  और स्वास्थ्य संबंधी हानियां इतनी ज्यादा हैं कि उनके उल्लेख  से  तो एक बडा ग्रंथ तैयार हो जाएगा। संक्षेप में गिनाएं तो  मांसाहार से मनुष्य निम्न रोगों से  ग्रसित हो सकता है-

   रक्ताल्पता,छाती का केंसर,अपेंडीसाईटीज, प्रोस्टेट ग्रंथि का केंसर, बडी आंत का केंसर,पित्ताषय में पथरी बनना,गठिया,संधिवात, कब्ज,मोटापा,मधुमेह, बवासिर, हाई ब्लड प्रेशर, हार्ट अटेक  ये वे रोग हैं जो शाकाहारी लोगों की तुलना में मांसाहारियों को ही ज्यादा होते हैं।

   मांस भक्षण से  आपके शरीर में  पशुऒं को खिलाई गई जहरीली दवाएं,हारमोन और रसायनिक पदार्थ भी पहुंच जाते हैं। जानने योग्य बात है कि शाकाहारी लोग मांसाहारी लोगों के तुलना में  २५% कम बीमार पडते हैं और कभी बीमार हो भी गए तो उनकी रिकवरी(स्वास्थ्य लाभ) थौडे समय में हो जाता है।दर असल मानव शरीर  शाकाहार के हिसाब से ही निर्मित हुआ है।  अधिक उम्र के मांसाहारियों का पाचन बिगड जाता है। अत: मांसाहार  शरीर को शक्ति, और उर्जा प्रदान करने के बजाय सुस्ती,बैचेनी,क्रोधऔर दुख: से आक्रांत कर लेता है। मानव और शाकाहारी पशुओं की  वसा और कोलेस्टरोल  पचाने की क्षमता सीमित होती है। धमनियां कठोर होने लगती हैं जिससे रक्त का प्रवाह हृदय के ओर कम हो जाता है। परिणामस्वरूप हार्ट अटेक की संभावना बढ जाती है।

      वैज्ञानिकों का एक समूह यह मत रखता है कि हमारे शरीर के लिय संतृप्त वसा की जरूरत नहीं है। जबकि दूसरे वैज्ञानिक  कहते हैं कि स्वस्थ रहने के लिये संतृप्त वसा बेहद आवश्यक  है। सभी प्रकार की वसा तो  नुकसान देह नहीं होती हैं  लेकिन पशुओं से प्राप्त वसा सीधे  ही  हृदय  पर बुरा असर डालती है। रक्त परिसंचरण तंत्र  पर व्यापक रूप से बुरा असर पडता है। इसके अलावा मांस भक्षण से मोटापा बढता है जो आज के युग की बहुत बडी समस्या है।


   मांसाहार हमारी पाचन संस्थान पर ज्यादा बोझ डालता है। बहुत देर से पचता है। मांस बहुत लंबे समय तक आंतों में  पडा रहता है। यह स्थिति केंसर पनपने के अनुकूल होती है। आंतों में पडे मांस में सडने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है  और सडा हुआ मास आतों की झिल्लियों से चिपक जाता है। ये जहरीले पदार्थ लिवर ,आतों और किडनी में  रोग  उत्पन्न कर देते हैं।।मांस में कई प्रकार के जहरीले तत्व मौजूद होते हैं जो मानव  में  विभिन्न प्रकार के रोग उत्पन्न कर मृत्यु का कारण बनते हैं।

   महिलाओं पर किये गये एक अनुसंधान की रिपोर्ट है कि अधिक मात्रा में मांस खाने वाली महिलाओं में केंसर से मरने का खतरा २०% ज्यादा होता है जबकि   हृदय रोगों की चपेट में आकर मरने का खतरा ५०% अधिक रहता है। इस अध्ययन में यह निष्कर्ष भी सामने आया है कि मांसाहार पर नियंत्रण कर ११॓% पुरुष और १६% महिलाओं को अकाल मौत से बचाया जा सकता है।रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि मांस में सबसे निम्न दर्जे की वसा होती है जो स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है। यह भी कहा गया है कि मांस में केंसर पैदा करने वाले रसायन पाये जाते हैं। जो आहार रोग उत्पन्न करे और मनुष्य की मृत्यु का कारण बने  उसे दर असल आहार की श्रेणी में रखना ही गलत है। क्या स्वाद और संतुष्टि के लिये   जीवन को संकट में डालना उचित है? जबकि फ़लों और सब्जियों से भी यही संतुष्टि  पाकर स्वास्थ्य को उन्नत किया जा सकता है?


मांसाहारियों में प्रोस्टेट ग्रंथि में केंसर का खतरा ४०% अधिक रहता है।

   स्टडी में बताया गया है  कि मांसभक्षी  को हृदय रोगों से मरने का खतरा शाकाहारी की तुलना में दूगना रहता है। केंसर से मरने का खतरा ६०% ज्यादा रहता है। इसके अलावा ३०% अधिक  खतरा अन्य रोगों से मरने का रहता है।  मोटापा जो कई रोगों का आश्रय स्थल है जैसे हाई ब्लड प्रेशर,डाईबीटीज और पित्ताषय  के रोग  शाकाहारियों  में कम देखने को मिलता है।

      अमेरिका की केंसर सोसायाटी  का मत है कि  आहार में  से मांस हटाकर और शाकाहार को प्रोत्साहित कर अमेरिका में प्रतिवर्ष  ९ लाख  नये  केंसर रोगियों  में से ३५% रोगियों का जीवन बचाया जा सकता है।


      चिकित्सा वैग्यानिक खुलासा प्रमाणित कर चुके हैं कि मांस का नियमित प्रयोग शरीर में विभिन्न रोगों को आसानी से प्रवेश का न्योता है। मांस भक्षण से केंसर,गठिया,टाईफ़ाईड,पेट में अल्सर,पीलिया,सिरदर्द,हृदय रोग,पागलपन और गुदा का भगंदर जैसे रोगों के पैदा होने की प्रबल संभावना रहती है।

     मांस,शराब,गांजा,भांग,अफ़ीम आदि तामसिक भोजन कहलाते हैं। लेकिन आज मांस के व्यंजन उच्च जीवन शैली के प्रतीक माने जाने लगे हैं।यह स्थिति भयावह है। लेकिन देर से ही सही अब अमेरिका,यूरोप,जापान आदि देशों में लोग शाकाहारी भोजन की महत्ता समझने लगे हैं और प्रतिवर्ष ऐसे लोगों की तादाद में इजाफ़ा हो रहा है।विभिन्न शोध रेपोर्टों मे यह निष्कर्ष आया है कि मांसाहार से जटिल रोगों की पैदाईश होती है।मांसाहारी लोगों की रक्त-नलिकाओं में कोलेस्टरोल(चिकनाई) जम जाती है,इससे दिल को पहुंचने वाले खून की आपूर्ति में बाधा आने लगती है।उच्च रक्तचाप की स्थिति बनने लगती है। नतीजतन  हार्ट अटैक और लकवा जैसे रोग हमला करने की जुगत में तैयार रहते हैं।मांसाहारी पुरुषों में प्रोस्टेट- केंसर होने की ज्यादा संभावना रहती है,जबकि मांसाहारी औरतों में गर्भाषय,डिम्बाषय और स्तन का केन्सर होने का खतरा सबसे ज्यादा रहता है।

    चिकित्सा वैज्ञानिकों की शोध में यह तथ्य भी उभरकर आया है कि मांसाहारी लोग शाकाहारी लोगों की बनिस्बत ज्यादा बीमार पडते हैं।जबकि शाकाहारी लोग अगर बीमार पडते भी हैं तो मामूली किस्म के उपचार या ईलाज से वे ठीक हो जाते हैं। एक तथ्य यह भी है कि जहां  मांसाहार जितना कम होगा वहां केंसर रोग उतना ही कम तादाद में मिलता है।

    ध्यान देने योग्य है कि एक किलो मांस में करीब १२-१३ ग्रेन यूरिक एसीड पाया जाता है।यह केमिकल एक प्रकार का जहर है जिसकी मात्रा खून  में अधिक हो जाने पर दिल की जलन,लिवर रोग, टी बी,
 श्वास रोग,रक्ताल्पता,गठिया,हिस्टीरिया आदि भयानक रोग पैदा हो जाते हैं।

       एक वैज्ञानिक ने  यह साबित किया है कि दही और खट्टी छाछ मानव के दीर्घ जीवन के लिये आवश्यक भोजन पदार्थ हैं। इनसे जोडों में जमा हुआ यूरिक एसीड बाहर निकल जाता है।सुचारू रक्त परिसंचरण के लिये यूरिक एसीड को शरीर से बहार निकाला पहला काम है। शाकाहार से शक्ति पैदा होती है जबकि मांसाहार से शरीर में उत्तेजना और दिमाग में हिंसक विचार पैदा होते हैं। मांसाहार शरीर में सुस्ती पैदा करता है और थॊडे से परिश्रम से थकावट मेहसूस होने लगती है।मांसाहारी मानव का शरीर कई जटिल रोगों का आश्रय स्थल बन जाता है।

26.3.12

सब्जी और फ़लों से करें रोगों का ईलाज.



गाजर के गुण:

गाजर मे प्रचुर मात्रा में विटामिन ए होता है। यह विटामिन बीटा केरोटीन के रूप में मौजूद रहता है।लिवर में बीटा केरोटीन विटामिन ए में बदल जाता है।गाजर के रस में केंसर विरोधी तत्व पाये जाते हैं। अनुसंधान में पाया गया है कि गाजर में केंसर को ठीक करने के गुण विद्ध्यमान हैं। यह फ़ेफ़डे,स्तन और बडी आंत के केंसर से बचाव करता है।चर्म विकृतियों में भी गाजर का उपयोग लाभप्रद रहता है। चेहरे पर कांति के लिये गाजर का उपयोग किया जाना चाहिये।गाजर हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है। इसे टोनिक के रूप में व्यवहार करना चाहिये। यह नेत्रों के लिये बेहद फ़ायदेमंद है।बुढापे में आने वाले मोतियाबिंद की रोकथाम करता है। गाजर हमारे शरीर के सेल्स को तंदुरस्त रखते हुए बुढापा आने की गति को धीमा करता है।शरीर की खरोंच,घाव ठीक करने के लिये गाजर को कूटकर लगाना चाहिये। गाजर को मेश करके उसमे थोडा सा शहद मिलाकर फ़ेस पेक की तरह इस्तेमाल करने से चेहरे की खूबसूरती में इजाफ़ा होता है।इसमें संक्रमण (इन्फ़ेक्शन। विरोधी तत्व होते हैं।गाजर में अल्फा केरोटीन और ल्युटीन तत्व होने की वजह से हृदय रोगों से भी बचाव करता है।शरीर को स्वच्छ और विजातीय पदार्थों से मुक्त रखने में गाजर की महती भूमिका हो सकती है।यह लिवर की सहायता करके पित्त दोष का निवारण करता है और चर्बी घटाता है।
सेवफ़ल के गुण:
   सेवफ़ल में प्रचुर मात्रा में पोषक तत्व पाये जाते हैं।
इसमें खनिज तत्व और विटामिन अधिक मात्रा में मौजूद रहते है।
सेवफ़ल में उपस्थित लोह तत्व से शरीर में नया खून बनने में मदद मिलती है।
गुर्दे की पथरी  वाले रोगियों को नियमित रूप से सेवफ़ल  इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है।
सेवफ़ल में कब्ज तोडने की अद्भुत शक्ति है। कच्चे सेवफ़ल के नियमित उपयोग से कब्ज का स्थाई ईलाज हो जाता है।
उबले सेवफ़ल खाने से बच्चों के अतिसार(दस्त लगने) में लाभ होता है।
       हृदय-रोगों में सेवफ़ल अति गुणकारी सिद्ध हुआ है। उच्च रक्तचाप में इसका उपयोग लाभदायक है।इसमें अच्छी मात्रा में पोटेशियम और फ़ास्फ़ोरस पाया जाता और सोडियम नही के बराबर होता है। यही कारण है कि सेवफ़ल हृदय रोगों में  इस्तेमाल करने की सलाह दी जाती है। इसमे पेक्टीन होता है जो  कोलेस्टरोल(एल्डीएल) को घटाता है। दो सेवफ़ल नित्य खाने से कोलेस्टरोल १६ % तक कम हो जाता है।सेवफ़ल में उपस्थित पेक्टीन  शरीर मे गेलेक्टेरुनिक एसीड  उत्पन्न करता है जिससे इन्सुलिन की जरूरत कम हो जाती है।इस प्रकार सेवफ़ल डायबीटीज  में हितकारी  है।इसीलिये तो  कहते हैं"an apple a day keeps doctor away."

चुकंदर के गुण:

पारंपरिक रूप से चुकंदर शरीर में नया खून बनाने वाले फ़ल के रूप में जाना जाता है।
चुकंदर लिवर,पित्ताषय,तिल्ली, और गुर्दे के विकारों को लाभप्रद पाया गया है। इन अंगों के दूषित तत्वों को बाहर निकालने की शक्ति चुकंदर में पाई गई है।
चुकंदर में विटामिन सी पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है।केल्शियम,फ़ास्फ़ोरस और लोह तत्व भी खूब होता है।इसमें पाये जाने वाले आयरन से कब्ज नहीं होती है।
चुकंदर अपने क्षारीय तत्वों की वजह से अम्लपित्त(एसीडीटी) में उपयोगी रहता है।
चुकंदर धमनियों में केल्शियम जमने के रोग में अति उपयोगी है।
चुकंदर ब्लड प्रेशर को सामान्य और नियमित करता है।
चुकंदर के जूस में शहद मिलाकर पीने से आमाषय के अल्सर में लाभ मिलता है।
चुकंदर का जूस और गाजर का जूस बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से पित्ताषय(गाल ब्लाडर) और किडनी के रोग नष्ट होते हैं।
चुकंदर में पाया जाने वाला क्लोरिन लिवर के विजातिय पदार्थों को निष्कासित करने(डिटाक्सीफ़ाई) में मददगार होता है।
चुकंदर में
सोडियम,पोटेशियम,फ़ासफ़ोरस,केल्यशियम,आयोडीन,आयरन,ताम्र,विटामिन-बी१,बी२,बी३,बी६ और विटामिन "सी" पाया जाता है।
इसमें एक शक्तिशाली एन्टिआक्सीडेंट पाया जाता है जिसका नाम है- बीटासायनिन. इसमें केंसर से लडने और प्रतिकार की शक्ति है। चुकंदर के गहरे लाल रंग के लिये बीटासायनिन उत्तरदायी है।
कटहल के गुण:
कटहल के फ़ल में कई प्रकार के महत्वपूर्ण प्रोटीन्स,कार्बोहाईड्रेट्स और विटामिन्स पाये जाते हैं।


सब्जी के तौर पर इस्तेमाल किये जाने वाले कटहल से अचार और पापड भी बनाये जाते हैं। कटहल की पत्तियों की राख में अल्सर को ठीक करने के गुण होते हैं। पके हुए कटहल का गूदा निकालकर भली प्रकार मेश करें,फ़िर उबालकर ठंडा करें,यह मिश्रण पीना जबर्दस्त स्फ़ूर्तिदायक होता है। यह मिश्रण शरीर में टानिक का काम करता है। कटहल के छिलकों से निकलने वाले दूध को गांठनुमा सूजन अथवा कटे-फ़टे चमडे ,घाव पर लगावें तो लाभ होता है।
कटहल की कोंपलों को कूटकर गोली बनालें। इनको चूसने से स्वर भंग और गले के रोगों में फ़ायदा होता है।
इसकी पत्तियों का रस शूगर रोगियों और उच्च रक्तचाप में लाभ पहुंचाता है।
कटहल की जड का काढा बनाकर दमा रोगी को पिलाना लाभप्रद होता है।
इसमें केंसर से लडने के गुण भी हैं।
कटहल से मानव शरीर में प्रोटीन,कर्बोहायड्रेट और विटामिन्स की यथोचित आपूर्ति होती है।
इसमें अति न्यून मात्रा में केलोरी और फ़ेट होते है अत: वजन कम करने वालों के लिये भी उपयोगी है।
कब्ज रोग से परेशान व्यक्ति इसका नियमित इस्तेमाल करके कब्ज से छुटकारा पा सकते हैं।
कटहल की जड का उपयोग कई प्रकार के चर्म रोगों में सफ़लता से किया जा सकता है।
केला के गुण:
केला दुनियं भर में सबसे विस्तृत क्षेत्र में उपयोग होने वाला फ़ल है। इसे छिलका उतारकर या छिलका सहित खाया जा सकता है।
इसमें सोडियम की मात्रा कम और पोटेशियम ज्यादा होने से उच्च रक्तचाप में लाभप्रद फ़ल है। हाई ब्लड प्रेशर की जटिलताओं को भी नियंत्रित करता है। केले में पाया जाने वाला रेशा भी इसमें सहायता करता है। केले में उपस्थित पोटेशियम के प्रभाव से गुर्दों के जरिये केल्शियम की कम हानि होती है और इस प्रकार केला अस्थिक्षरण रोग में लाभ देता है। अतिसार रोग मे केला अत्यंत हितकारी है। इससे ईलेक्ट्रोलाईट्स की पूर्ति होती है और पौषक तत्वों का शरीर में संचय होता है। केले में अम्लता विरोधी तत्वों की मौजूदगी से पेप्टिक अल्सर के रोगियों को केला खाने की सलाह दी जा सकती है।केले में उपस्थित पेक्टीन से आंतों की कार्यकुशलता बढती है और कब्ज रोग में फ़ायदा होता है। कच्चा केला शूगर रोगियों के लिये बेहद लाभ प्रद है। केले के अंदर केरोटोनाईड होता है,इससे विटामिन ए की पूर्ति होती है और रात्री अंधत्व रोग में इस्तेमाल करना प्रयोजनीय है। पर्यात मात्रा में केले का सेवन करते रहने से किडनी के केंसर से बचाव हो सकता है लेकिन प्रोसेस्ड जूस ज्यादा उपयोग करने से किडनी के केंसर की संभावना बढ जाती है।पाईनेपल(अनानास) के गुण:
वैसे तो सभी ताजा फ़लों में प्रचुर मात्रा में एन्जाईम्स होते हैं लेकिन पाईनेपल में एक अद्भुत एन्जाईम होता है जिसे ब्रोमेलैन कहा जाता है।ब्रोमेलैन की उपस्थिति से यह फ़ल शरीर के किसी भाग में आई सूजन में लाभकारी है और पीडानाशक भी है। इसमें विटामिन सी का भंडार है। पाईनेपल चोंट,खरोंच,मोच,मांसपेशी खिंचने,शौथ में हितकारी फ़ल माना गया है।इसके सूजन विरोधी गुण से संधिवात और गठिया रोगी लाभान्वित हो सकते हैं। शल्य क्रिया के बाद की सूजन ठीक करने में भी इसका व्यवहार होना उचित है। ब्रोमैलेन प्रोटीन पचाने में भी सहयोगी रहता है।यहां यह भी बताना उचित होगा कि एन्जाईम्स ताप से नष्ट हो जाते हैं ,इसलिये पाईनेपल या जूस को ऊबालना हानिकारक है|जामुन के गुण:
1) जामुन की गुठली चिकित्सा की दृष्टि से अत्यंत उपयोगी मानी गई है। इसकी गुठली के अंदर की गिरी में 'जंबोलीन' नामक ग्लूकोसाइट पाया जाता है। यह स्टार्च को शर्करा में परिवर्तित होने से रोकता है। इसी से मधुमेह के नियंत्रण में सहायता मिलती है।

२) जामुन के कच्चे फलों का सिरका बनाकर पीने से पेट के रोग ठीक होते हैं। अगर भूख कम लगती हो और कब्ज की शिकायत रहती हो तो इस सिरके को ताजे पानी के साथ बराबर मात्रा में मिलाकर सुबह और रात्रि, सोते वक्त एक हफ्ते तक नियमित रूप से सेवन करने से कब्ज दूर होती है और भूख बढ़ती है।
३) इन दिनों कुछ देशों में जामुन के रस से विशेष औषधियों का निर्माण किया जा रहा है, जिनके माध्यम से सिर के सफेद बाल आना बंद हो जाएँगे।
४) गले के रोगों में जामुन की छाल को बारीक पीसकर सत बना लें। इस सत को पानी में घोलकर 'माउथ वॉश' की तरह गरारा करना चाहिए। इससे गला तो साफ होगा ही, साँस की दुर्गंध भी बंद हो जाएगी और मसूढ़ों की बीमारी भी दूर हो जाएगी।
५) विषैले जंतुओं के काटने पर जामुन की पत्तियों का रस पिलाना चाहिए। काटे गए स्थान पर इसकी ताजी पत्तियों का पुल्टिस बाँधने से घाव स्वच्छ होकर ठीक होने लगता है क्योंकि, जामुन के चिकने पत्तों में नमी सोखने की अद्भुत क्षमता होती है।
६) जामुन यकृत को शक्ति प्रदान करता है और मूत्राशय में आई असामान्यता को सामान्य बनाने में सहायक होता है।
७) जामुन का रस, शहद, आँवले या गुलाब के फूल का रस बराबर मात्रा में मिलाकर एक-दो माह तक प्रतिदिन सुबह के वक्त सेवन करने से रक्त की कमी एवं शारीरिक दुर्बलता दूर होती है। यौन तथा स्मरण शक्ति भी बढ़ जाती है।
८) जामुन के एक किलोग्राम ताजे फलों का रस निकालकर ढाई किलोग्राम चीनी मिलाकर शरबत जैसी चाशनी बना लें। इसे एक ढक्कनदार साफ बोतल में भरकर रख लें। जब कभी उल्टी-दस्त या हैजा जैसी बीमारी की शिकायत हो, तब दो चम्मच शरबत और एक चम्मच अमृतधारा मिलाकर पिलाने से तुरंत राहत मिल जाती है।
९) जामुन और आम का रस बराबर मात्रा में मिलाकर पीने से मधुमेह के रोगियों को लाभ होता है।
१०) गठिया के उपचार में भी जामुन बहुत उपयोगी है। इसकी छाल को खूब उबालकर बचे हुए घोल का लेप घुटनों पर लगाने से गठिया में आराम मिलता है।
जामुन स्वाद में खट्टा-मीठा होने के साथ-साथ स्वास्थ्य के लिए बेहद फायदेमंद है। इसमें उत्तम किस्म का शीघ्र अवशोषित होकर रक्त निर्माण में भाग लेने वाला तांबा पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। यह त्वचा का रंग बनाने वाली रंजक द्रव्य मेलानिन कोशिका को सक्रिय करता है, अतः यह रक्तहीनता तथा ल्यूकोडर्मा की उत्तम औषधि है। इतना ध्यान रहे कि अधिक मात्रा में जामुन खाने से शरीर में जकड़न एवं बुखार होने की सम्भावना भी रहती है। इसे कभी खाली पेट नहीं खाना चाहिए और न ही इसके खाने के बाद दूध पीना चाहिए।
संतरा (नारंगी) के गुण:
नारंगी रंग का दिखने वाला संतरा ठंडा, तन और मन को प्रसन्नता देने वाला फल है। यह जितना खाने में स्‍वादिष्‍ट होता है उतना ही स्‍वास्‍थ्‍य के लिए भी फायदेमंद होता है। एक व्यक्ति को जितनी विटामिन ‘सी’ की आवश्यकता होती है, वह एक संतरें को प्रतिदिन खाते रहने से पूरी हो जाती है। संतरे के सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है, चुस्ती-फुर्ती बढ़ती है, त्वचा में निखार आता है तथा सौंदर्य में वृद्धि होती है। प्रस्तुत है इसके कुछ प्रयोग-
1. संतरे का सेवन जहाँ जुकाम में राहत पहुँचाता है, वहीं सूखी खाँसी में भी फायदा करता है। यह कफ को पतला करके बाहर निकालता है।
2. संतरे में प्रचुर मात्रा में विटामिन सी, लोहा और पोटेशियम काफी होता है। संतरे की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसमें विद्यमान फ्रुक्टोज, डेक्स्ट्रोज, खनिज एवं विटामिन, शरीर में पहुंचते ही ऊर्जा देना प्रारंभ कर देते हैं।
3. संतरे का एक गिलास रस तन-मन को शीतलता प्रदान कर थकान एवं तनाव दूर करता है, हृदय तथा मस्तिष्क को नई शक्ति व ताजगी से भर देता है।
4. पेचिश की शिकायत होने पर संतरे के रस में बकरी का दूध मिलाकर लेने से काफी फायदा मिलता है।
5. संतरे का नियमित सेवन करने से बवासीर की बीमारी में लाभ मिलता है। रक्तस्राव को रोकने की इसमें अद्भुत क्षमता है।
6. तेज बुखार में संतरे के रस का सेवन करने से तापमान कम हो जाता है। इसमें उपस्थित साइट्रिक अम्ल मूत्र रोगों और गुर्दा रोगों को दूर करता है।

7. दिल के मरीज को संतरे का रस शहद मिलाकर देने से आश्चर्यजनक लाभ मिलता है।
8. संतरे के सेवन से दाँतों और मसूड़ों के रोग भी दूर होते हैं।
9. छोटे बच्चों के लिए तो संतरे का रस अमृततुल्य है। उन्हें स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट बनाने के लिए दूध में चौथाई भाग मीठे संतरे का रस मिलाकर पिलाने से यह एक आदर्श टॉनिक का काम करता है।
10. जब बच्चों के दाँत निकलते हैं, तब उन्हें उल्टी होती है और हरे-पीले दस्त लगते हैं। उस समय संतरे का रस देने से उनकी बेचैनी दूर होती है तथा पाचन शक्ति भी बढ़ जाती है।
11. पेट में गैस, अपच, जोड़ों का दर्द, उच्च रक्तचाप, गठिया, बेरी-बेरी रोग में भी संतरे का सेवन बहुत कुछ लाभकारी होता है।
12. गर्भवती महिलाओं तथा यकृत रोग से ग्रसित महिलाओं के लिए संतरे का रस बहुत लाभकारी होता है। इसके सेवन से जहाँ प्रसव के समय होने वाली परेशानियों से मुक्ति मिलती है, वहीं प्रसव पीड़ा भी कम होती है। बच्चा स्वस्थ व हृष्ट-पुष्ट पैदा होता है|
13. संतरे के सूखे छिलकों का महीन चूर्ण गुलाब जल या कच्चे दूध में मिलाकर पीसकर आधे घंटे तक लेप लगाने से कुछ ही दिनों में चेहरा साफ, सुंदर और कांतिमान हो जाता है। कील मुँहासे-झाइयों व साँवलापन दूर होता है।
14. संतरे के ताजे फूल को पीसकर उसका रस सिर में लगाने से बालों की चमक बढ़ती है। बाल जल्दी बढ़ते हैं और उसका कालापन बढ़ता है।
आम के गुण:
आम सिर्फ स्वाद में ही नम्बर वन नहीं है, यह अनेक गुणों का भी खजाना है। आइये जानते हैं कि आम किन-किन घातक बीमारियों में मिटाने में हमारी मदद कर सकता है|
1. शहद के साथ पके आम के सेवन से क्षयरोग एवं प्लीहा के रोगों में लाभ होता है तथा वायु और कफ दोष दूर होते हैं।2. यूनानी चिकित्सकों के अनुसार, पका आम आलस्य को दूर करता है तथा मूत्र संबंधी रोगों का सफाया करता है।
3. प्राकृतिक रूप से पका हुआ आम क्षयरोग यानी टीबी को मिटाता है, गुर्दे एवं बस्ति (मूत्राशय) खोई हुई शक्तियों को लौटाता है।
4. जिन लोगों को शुक्रप्रमेह शारीरिक विकारों और वातादि यानी वायु संबंधी दोषों के कारण संतानोत्पत्ति न होती हो उनके लिए पका आम किसी वरदान से कम नहीं है। मतलब कि संतान सुख से वंचित दंपत्ती के लिये आम बेहद लाभदायक होता है।
5. प्राकृतिक रूप से पके हुए ताजे आम के सेवन से पुरूषों में शुक्राणुओं की कमी, नपुंसकता, दिमागी कमजोरी आदि रोग दूर होते हैं।६) कच्चे और पके दोनों तरह के आम कई तरह की किस्मों में मिलते हैं । कच्चे आम में गैलिक एसिड के कारण खटास होती है। आम के पकने के साथ उसका रंग भी सफेद से पीला हो जाता है। यही पीले रंग का कैरोटीन हमारे शरीर में जाकर विटामिन 'ए' में परिवर्तित हो जाता है। इसमें विटामिन 'सी' भी काफी होता है।
कच्चा आम-
कच्चे आम में बहुत से गुण पाए जाते हैं। कच्चे आम को आग में भूनकर पानी में मसलकर आम का पन्ना बनाते हैं। फिर इसमे भुना हुआ जीरा, सेंधानमक और कालीमिर्च डालते हैं। इस पन्ना को पीने से लू लगने के रोग में आराम आता है। आम के पन्ना को शरीर पर मलने से ठण्डक मिलती है।
७) पका आम
मीठे और पके आम शरीर में वीर्य को बढ़ाने वाले, ताकत पैदा करने वाले, त्वचा को निखारने वाले, ठंडे और पित्त को सन्तुलित रखने वाले होते हैं।
८) आमरस-
आम का रस भारी- ताकत बढ़ाने वाला, वात को हरने वाला, दस्त लाने वाला, प्यास को कम करने वाला और शरीर में कफ की मात्रा को बढ़ाने वाला होता है। अगर आम के रस को निकालकर उसमे बराबर मात्रा में दूध और सफेद बूरा या इच्छानुसार मिश्री मिलाकर कपड़े में छानकर इस्तेमाल किया जाए तो ये बहुत ही स्वादिष्ट आम का रस बन जाता है।
९) दूध और मिश्री मिला हुआ आम का रस शरीर के अन्दर से पित्त को समाप्त करता है। ये पुष्टिदायक, रुचिकारक और वीर्य तथा बल को बढ़ाने वाला होता है। ये आम का रस स्वाद में मीठा और तासीर में ठंडा होता है। आम का रस यक्ष्मा (टी.बी) के रोगियों के लिए बहुत ही लाभकारी है। इसको पीने से बुखार तथा खांसी जैसे रोग दूर हो जाते हैं। यक्ष्मा (टी.बी ) के रोगी की सांस जब चढ़ने लगती है, बलगम में खून आता हो तो ऐसे समय में रोगी को आम का रस देने से बहुत लाभ होता है।

कब न खाएँ :
भूखे पेट आम न खाएँ। इसके अधिक सेवन से रक्त विकार, कब्ज और पेट में गैस बनती है। कच्चा आम अधिक खाने से गला दर्द, अपच, पेट दर्द हो सकता है। कच्चा आम खाने के तुरंत बाद पानी न पिएँ। मधुमेह के रोगी आम से परहेज करें। खाने से पहले आम को ठंडे पानी या फ्रिज में रखें, इससे इसकी गर्मी निकल जाएगी।
करेला के गुण:
एक असाध्य बीमारी है मधुमेह ‘डायबिटीज’ । करेला मधुमेह के रोगियों के लिए ‘अमृत’ तुल्य है। 100 मिली. के रस में इतना ही पानी मिलाकर दिन में तीन बार लेने से लाभ होता है और प्रात: चार किलोमीटर टहलना चाहिए तथा मिठाई खाने से परहेज रखना चाहिए। करेला मधुमेह के अलावा अन्य शारीरिक तकलीफों में भी लाभदायक है। जैसे-
कब्ज : नित्य करेला सेवन करने से कब्ज दूर होता है। यह एक अनुपम सब्जी है और इसमें ज्यादा तेल-मसाले नहीं डालने चाहिए।
पीलिया : ताजा करेले का रस सुबह-शाम पीने से लाभ होता है।
दमा : दमा के मरीज भी करेले का रस सुबह खाली पेट लेकर राहत पा सकते हैं। सब्जी भी ज्यादा खानी चाहिए।
पथरी : पथरी गुर्दे की हो या मूत्राशय की, इसे तोड़कर बाहर निकालने की क्षमता करेला रखता है। करेले का रस दिन में दो बार और दोनों समय भोजन में करेले की सब्जी खानी चाहिए।
खूनी बवासीर : मस्से फटने से रक्तस्राव होता है जिसे खूनी बवासीर कहा जाता है। रोगी नित्य दिन में दो समय करेले के रस में दो चम्मच शक्कर मिलाकर पिये तो लाभ होगा।
पाचन शक्ति : यदि पाचन शक्ति कमजोर हो तो किसी भी प्रकार करेले का नित्य सेवन करने से पाचन शक्ति मजबूत होती है। करेला स्वयं भी शीघ्र पचता है।
खून की शुध्दि : करेला खून की शुध्दि करने में पूरी तरह सक्षम है। यदि त्वचा-रोग हो तो भी रक्त-शुध्दि हेतु करेले का रस कुछ दिनों तक आधा-आधा कप पीना लाभदायक है। इस प्रकार कड़ुवा करेला अनेकों रोगों में औषधि रूप में काम आ सकता है बशर्ते उसे उसी रूप में लिया जाये- रस या सब्जी बनाकर।
लौकी के गुण:
सब्जी के रुप में खाए जाने वाली लौकी हमारे शरीर के कई रोगों को दूर करने में सहायक होती है। यह बेल पर पैदा होती है और कुछ ही समय में काफी बड़ी हो जाती है। वास्तव में यह एक औषधि है और इसका उपयोग हजारों रोगियों पर सलाद के रूप में अथवा रस निकालकर या सब्‍जी के रुप में एक लंबे समय से किया जाता रहा है।
लौकी को कच्‍चा भी खाया जाता है, यह पेट साफ करने में भी बड़ा लाभदायक साबित होती है और शरीर को स्‍वस्‍य और शुद्ध भी बनाती है। लंबी तथा गोल दोनों प्रकार की लौकी वीर्य वर्धक , पित्‍त तथा कफनाशक और धातु को पुष्ट करने वाली होती है। आइए इसके औषधीय गुणों पर एक नज़र डालते हैं-
1. हैजा होने पर 25 एम.एल. लौकी के रस में आधा नींबू का रस मिलाकर धीरे-धीरे पिएं। इससे मूत्र बहुत आता है।
2.खांसी, टीबी, सीने में जलन आदि में भी लौकी बहुत उपयोगी होती है।
3.हृदय रोग में, विशेषकर भोजन के पश्चात एक कप लौकी के रस में थोडी सी काली मिर्च और पुदीना डालकर पीने से हृदय रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
4.लौकी में श्रेष्‍ठ किस्म का पोटेशियम प्रचुर मात्रा में मिलता है, जिसकी वजह से यह गुर्दे के रोगों में बहुत उपयोगी है और इससे पेशाब खुलकर आता है।
5.लौकी श्‍लेषमा रहित आहार है। इसमें खनिज लवण अच्‍छी मात्रा में मिलते है।
6.लौकी के बीज का तेल कोलेस्‍ट्रॉल को कम करता है तथा हृदय को शक्‍ति देता है। यह रक्‍त की नाडि़यों को भी तंदुरस्त बनाता है। लौकी का उपयोग आंतों की कमजोरी, कब्‍ज, पीलिया, उच्‍च रक्‍तचाप, हृदय रोग, मधुमेह, शरीर में जलन या मानसिक उत्‍तेजना आदि में बहुत उपयोगी है।
टमाटर के गुण:
टमाटर स्वादिष्ट होने के साथ पाचक भी होता है। पेट के रोगों में इसका प्रयोग औषधि की तरह किया जा सकता है। जी मिचलाना, डकारें आना, पेट फूलना, मुँह के छाले, मसूढ़ों के दर्द में टमाटर का सूप अदरक और काला नमक डालकर लिया जाए तो तुरंत फायदा होता है।
टमाटर के सूप से शरीर में स्फूर्ति आती है। पेट भी हल्का रहता है। सर्दियों में गर्मागर्म सूप जुकाम इत्यादि से बचाता है। अतिसार, अपेंडिसाइटिस और शरीर की स्थूलता में टमाटर का सेवन लाभदायक है। रक्ताल्पता में इनका ‍निरंतर प्रयोग फायदा देता है।
टमाटर की खूबी है कि इसके विटामिन गर्म करने से भी नष्ट नहीं होते। बेरी-बेरी, गठिया तथा एक्जिमा में इसका सेवन आराम देता है। ज्वर के बाद की कमजोरी दूर करने में इससे अच्छा कोई विकल्प नहीं। मधुमेह के रोग में यह सर्वश्रेष्ठ पथ्य है।
टमाटर में विटामिन 'सी' होता है, जो कि इम्युनिटी के स्तर को बढ़ाता है जिससे साधारण सर्दी और कफ की शिकायत नहीं होती। गॉल स्टोन और लिवर कन्जेशन में भी टमाटर का सेवन कारगर है। हम कह सकते हैं कि टमाटर पोषक तत्वों का खजाना है, क्योंकि इसमें पाए जाने वाला विटामिन 'ए' आँखों और त्वचा के लिए व पोटेशियम मांसपेशियों में होने वाली ऐंठन में भी फायदा पहुँचाता है।
टमाटर में जो लाल रंग का तत्व होता,उसे लायकोपिन कहते हैं,यह तत्व शरीर को विजातीय पदार्थों(टाक्सीन्स) से मुक्त करने में सहायक है।लायकोपिन शरीर को फ़्री रेडिकल्स से मुक्त करने के मामले में बीटा केरोटीन(एन्टी ओक्सीडेन्ट) से भी आगे है।
अनुसंधान में पाया गया है कि टमाटर के नियमित सेवन से प्रोस्टेट केंसर से बचाव होता है।इसराईल के वैग्यानिकों के अनुसार टमाटर फ़ेफ़डे,बडी आंत और गर्भाषय के केंसर से बचाव करता है।और सबसे सुखप्रद तथ्य ये कि टमाटर सेवन करने से व्यक्ति लंबे समय तक बुढापे की चपेट मे नहीं आता है।
पपीता के गुण:
पपीता न केवल एक स्वादिष्ट फ़ल है बल्कि इसमे उपस्थित औषधीय  गुणों का विशेष महत्व है।

पपीते में उच्च मात्रा में पोटेशियम तत्व पाया जाता है और इसके गूदे में भरपूर विटामिन" ए " मिलता है। पपीता के बीज और पत्तियां अपने कीटाणुनाशक गुणों के चलते  आंतों में निवास करने वाले किटाणुओं  को मारने के लिये प्रयोग किये जा सकते हैं।इसके नियमित उपयोग से कब्ज  रोग का ईलाज  हो जाता है।इसमें पाये जाने वाले पापैन(प्रोटीन) का हमारे शरीर के पाचन संस्थान को चुस्त-दुरस्त रखने  का उत्तरदायित्व है। पपीते का जूस नियमित पीने से बडी आंत की सफ़ाई होती है और  उसमें स्थित संक्रमण,श्लेष्मा और पीप  का  निष्कासन होने लगता है। ऐसे घाव जो अन्य चिकित्सा से ठीक न हो रहे हों पपीता का छिलका   उन घावों पर कुछ रोज  लगाकर अच्छे परिणाम की उम्मीद रखना चाहिये। पपीता में सूजन विरोधी  और केंसर से बचाने  के गुण मौजूद हैं।इस सूजन विनाशक गुण के चलते पपीता उन लोगों के लिये फ़ायदेमंद है जो शौथ,संधिवात ,गठिया रोग से पीडित  है।

     पपीता उदर रोगों में लाभकारी है। आमाषय को स्वच्छ करता है। एक ताजा अध्ययन का निष्कर्ष है कि ३-४ रोज सिर्फ़ पपीता खाने से आमाषय और आंतों  को आशातीत लाभ मिलता है।

   कच्चा पपीता खाने से मासिक धर्म के विकार नष्ट होते हैं। मासिक धर्म खुलकर और नियमित आने लगता है। पपीता उन लोगों के लिये अमृत समान है जो सर्दी,खासी,फ़्लु से बार-बार परेशान रहते हैं। पपीता  का उपयोग करने से हमारे शरीर का इम्युन सिस्टम मजबूत होता है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता में इजाफ़ा होता है।गर्भवतियों में सुबह की मिचली नियंत्रित करने के लिये पपीता का सेवन हितकारी है।

   धमनियों के कठोर  होने के दोष को निवारण करने में पपीता उपयोगी है। शूगर रोगियों की हृदय की बीमारियों में पपीता अत्यंत हितकारी है।पपीता  का रेशा खराब कोलेस्टरोल(एल्डीएल) का स्तर घटाता है और इस प्रकार हृदय की सुरक्षा करता है।

इसके नियमित सेवन से अंगों और ग्रंथियों में केंसर की रोकथाम और बचाव होता है।

कद्दू(काशीफ़ल) के गुण:
                                                                                           




        कद्दू में मुख्य रूप से बीटा केरोटीन पाया जाता है, जिससे विटामिन ए मिलता है। पीले और संतरी कद्दू में केरोटीन की मात्रा अपेक्षाकृत ज्यादा होती है। बीटा केरोटीन एंटीऑक्सीडेंट होता है जो शरीर में फ्री रैडिकल से निपटने में मदद करता है। कद्दू ठंडक पहुंचाने वाला होता है। इसे डंठल की ओर से काटकर तलवों पर रगड़ने से शरीर की गर्मी खत्म होती है। कद्दू लंबे समय के बुखार में भी असरकारी होता है। इससे बदन की हरारत या उसका आभास दूर होता है।


     कद्दू के बीज भी बहुत गुणकारी होते हैं। कद्दू व इसके बीज विटामिन सी और ई, आयरन, कैलशियम मैग्नीशियम, फॉसफोरस, पोटैशियम, जिंक, प्रोटीन और फाइबर आदि के भी अच्छे स्रोत होते हैं। यह बलवर्धक, रक्त एवं पेट साफ करता है, पित्त व वायु विकार दूर करता है और मस्तिष्क के लिए भी बहुत फायदेमंद होता है। प्रयोगों में पाया गया है कि कद्दू के छिलके में भी एंटीबैक्टीरिया तत्व होता है जो संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं से रक्षा करता है।

      कद्दू का रस भी सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। यह मूत्रवर्धक होता है और पेट संबंधी गड़बड़ियों में भी लाभकारी रहताहै। यह खून में शर्करा की मात्रा को नियंत्रित करने में सहायक होता है और अग्नयाशय को भी सक्रिय करता है। इसी वजह से चिकित्सक मधुमेह के रोगियों को कद्दू के सेवन की सलाह देते हैं।

  प्रोस्टेट ग्रंथि बढने के रोग में  ३० ग्राम कद्दू के बीज(छिलका रहित)  तवे पर  सेक लें और खाएं। ऐसा दिन में तीन बार करें। इन बीजों में फ़ायटोस्टरोल तत्व की उपस्थिति से  प्रोस्टेट ग्रंथि सिकुडकर मूत्र बिना रुक्कावट खुलकर आने लगता है।

प्याज  के  गुण:

      कुछ   चीजें ऐसी हैं कि जिन्हे   हम     अनजाने में  खाते है लेकिन वे हमारे स्वास्थ्य  के  लिये   फ़ायदेमंद होती हैं।साधारण तौर पर हम प्याज   का उपयोग खाने को रुचिकर बनान के हिसाब से  करते हैं। लेकिन जानने योग्य यह है कि प्याज गर्म तासीर वाला होता है और स्वास्थ्य संबंधी      कईे परेशानियों को दूर करने वाला साबित होता है।

  रक्त दोष दूर करने के लिये प्याज के ५० ग्राम रस में १०ग्राम मिश्री और २ ग्राम जीरा सफ़ेद भुना हुआ  मिलालें।

  अजीर्ण याने बदहजमे की शिकायत हो तो प्याज के छोटे छोट टुकडे काट लें उसमें नींबू  निचोड लें और भोजन के सार्थ सेवन करें।

बच्चों को बदहजमी   होने पर उनको प्याज के रस की ३-४ बूंदे चटानी चाहिये।प्याज पीसकर बालों में लगा्ने से खोपडी  के बाल काले उगने लगेगे। जिस जगह सिर के बाल उड गये हों वहां प्याज का रस ऊंगली से मालिश करें , वहां बाल उगने लगेंगे।

  प्याज मं क्वेरसेटिन नामक एन्टिओक्सीडेंट प्रचुरता से पाया जाता  है जो आमाषय के केंसर की रोक थाम करता है। यह लाल और पीले प्याज में   पाया जाता    है ,सफ़ेद प्याज में नहीं मिलता है। प्याज का यह एन्टिओक्सीडेंट रक्तवहा नलिकाओं में खून   के थक्के जमने स रोकता है,खून को    पतला करता है,खराब कोलेस्टरोल कम करता है और बढिया कोलेस्टरोल का स्तर ऊंचा करता है। दमा रोगी और पुरानी  खासी        के मरीज प्याज के सेवन  से लाभान्वित   होते हैं। धमनी  काठिन्य रोग में प्याज  सेवनीय   है।

            प्याज   सूजन विरोधी गुण रखता है,संक्रमण  में    एन्टिबायोटिक  के  रूप   मे काम करता है। प्याज में केंसर से लडने की की क्षमता है।

विनम्र सूचना--
पाठकगण अवगत हों कि http://rajnaveen15.blogspot.in एक चोर ब्लागर है,इसने   मेरा उकत आर्टिकल  कापी पेस्ट कर अपने ब्लाग पर लगा लिया है।






20.3.12

थाईरायड ग्रथि के रोग:हाईपर थायराई्डिस्म या हाईपो थाईराईडिस्म



              स्वस्थ शरीर  में थाईराईड ग्रंथि टी३ और टी४ हारमोन  स्रवित करती है जो शरीर के विभिन्न  क्रिया-कलापों  को प्रभावित करते हैं। ये हारमोन शरीर की चयापचय क्रिया को प्रभावित  कर  रोगी के वजन ,रोगी को गर्मी,सर्दी कितनी लगती है और हमारे शरीर में कितनी केलरी दहन होती है इन सभी  बातों को नियंत्रित करने की क्षमता संपन्न होते हैं।

      हाईपर थायराईडिस्म रोग  में थाईराईड ग्रंथि बढ जाती है।ग्रंथि से अधिक मात्रा में हार्मोन्स का स्राव होने लगता है। ये हार्मोन्स हृदय  की गति बढा देते हैं ,इतना ही नहीं ये हार्मोन्स शरीर् के अन्य अंगों को भी प्रभावित उनकी क्रियाशीलता में अभिवृद्धि  कर देते हैं।
   पुरुषों की बनिस्बत स्त्रियों में यह रोग ज्यादा पाया जाता है।रजोनिवृति के समय, मानसिक तनाव,गर्भावस्था के समय और यौवनारंभ के समय यह रोग अधिक प्रभावशाली हो जाता है।

      रोग लक्षण:-
       इस रोग से पीड़ित रोगी का वजन कम होने लगता है, शरीर में अधिक कमजोरी मेहसूस होने लगती है, गर्मी सहन नहीं होती है, शरीर से अधिक पसीना आने लगता है, अंगुलियों में  कंपकपी होने लगती है तथा घबराहट होने लगती है। इस रोग के कारण रोगी का हृदय बढ़ जाता है, रोगी व्यक्ति को पेशाब बार-बार आने लगता है, याददाश्त कमजोर होने लगती है, भूख नहीं लगती है तथा उच्च रक्तचाप का रोग हो जाता है।  इस रोग के कारण रोगी के बाल भी झड़ने लगते है। इस रोग की गिरफ़्त में आने पर  स्त्रियों के मासिकधर्म में गड़बड़ी होने लगती है।अन्य लक्षण इस  प्रकार हैं-




घबराहट,बैचेनी

नींद न आना,निद्राल्पता

श्वास में कठिनाई

आंतों की अधिक क्रियाशीलता.

ज्यादा थकावट मेहसूस होना

हृदय की चाल बढ जाना.

हाथों में कंपन्न होना

स्त्रियों में मासिक धर्म की मात्रा कम होना या मासिक धर्म बंद हो जाना.

पर्याप्त खाना खाने के बावजूद  शरीर का वजन गिरते जाना।

मांसपेशियों  में कमजोरी मेहसूस होना

त्वचा का गर्म और आर्द्र रहना


हायपो थायराईडिस्म  याने थायराइड का सिकुड़ना-

इस रोग  में थायराईड ग्रन्थि के द्वारा कम हारमोन बनने लगती है।

थायराइड के सिकुड़ने का लक्षण:-

           रोगी व्यक्ति का वजन बढ़ने लगता है तथा उसे सर्दी लगने लगती है। रोगी को कब्ज  की शिकायत रहने लगती है।रोगी के बाल की चमक  खत्म होकर रुखे-सूखे हो जाते हैं।  रोगी की कमर में दर्द, नब्ज की गति धीमी हो जाना, जोड़ो में अकड़न तथा चेहरे पर सूजन हो जाना आदि लक्षण प्रकट हो जाते हैं।

थायराईड ग्रंथि  के रोगों के होने का कारण:-
     १)  थायराईड के  रोग अधिकतर शरीर में आयोडीन की कमी के कारण होते हैं।
२) यह रोग उन व्यक्तियों को भी हो जाता है जो अधिकतर पका हुआ भोजन करते हैं तथा प्राकृतिक भोजन बिल्कुल नहीं करते हैं। प्राकृतिक भोजन करने से शरीर में आवश्यकतानुसार आयोडीन मिल जाता है लेकिन पके हुए खाने में आयोडीन नष्ट हो जाता है।
    ३)मानसिक, भावनात्मक तनाव, गलत तरीके से खान-पान  की वजह से भी रोग उत्पन्न होता है।

    थायराईड रोगों का प्राकृतिक और घरेलू पदार्थों से   उपचार:-
    १)  थायराईड रोगों का उपचार करने के लिए रोगी व्यक्ति को कुछ दिनों तक फलों का रस (नारियल पानी, पत्तागोभी, अनानास, संतरा, सेब, गाजर, चकुन्दर, तथा अंगूर का रस) पीना चाहिए तथा इसके बाद 3 दिन तक फल तथा तिल को दूध में डालकर पीना चाहिए। इसके बाद रोगी को सामान्य भोजन करना चाहिए जिसमें हरी सब्जियां, फल तथा सलाद और अंकुरित दाल अधिक मात्रा में हो। इस प्रकार से कुछ दिनों तक उपचार करने से   रोग ठीक हो जाता है।

    २)  इस रोग से पीड़ित रोगी को कम से कम एक  वर्ष तक फल, सलाद, तथा अंकुरित भोजन का सेवन करना चाहिए।

    ३)  सिंघाड़ा, मखाना तथा कमलगट्टे का सेवन करना भी लाभदायक होता है।


    ४)  घेंघा रोग को ठीक करने के लिए रोगी को 2 दिन के लिए उपवास रखना चाहिए और उपवास के समय में केवल फलों का रस पीना चाहिए। रोगी को एनिमा क्रिया करके पेट को साफ करना चाहिए। इसके बाद प्रतिदिन उदरस्नान तथा मेहनस्नान करना चाहिए।












      ५) थायराइड रोगों से पीड़ित रोगी को तली-भुनी चीजें, मैदा, चीनी, चाय, कॉफी, शराब, डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।
      ६) एक कप पालक के रस में एक बड़ा चम्मच शहद मिलाकर फिर चुटकी भर जीरे का चूर्ण मिलाकर प्रतिदिन रात के समय में सोने से पहले सेवन करने से थायराइड रोग ठीक हो जाता है।




      ७) कंठ के पास गांठों पर भापस्नान देकर दिन में 3 बार मिट्टी की पट्टी बांधनी चाहिए और रात के समय में गांठों पर हरे रंग की बोतल का सूर्यतप्त तेल लगाना चाहिए।८)  इस रोग को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को उन चीजों का भोजन में अधिक प्रयोग करना चाहिए जिसमें आयोडीन की अधिक मात्रा हो।
      ९) एक गिलास पानी में 2 चम्मच साबुत धनिये को रात के समय में भिगोकर रख दें तथा सुबह के समय में इसे मसलकर उबाल लें। फिर जब पानी चौथाई भाग रह जाये तो खाली पेट इसे पी लें तथा गर्म पानी में नमक डालकर गरारे करें। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से थायराइड रोग ठीक हो जाता है।
      १०) थायराईड रोगों को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति को अपने पेट पर मिट्टी की गीली पट्टी करनी चाहिए तथा इसके बाद एनिमा क्रिया करके अपने पेट को साफ करना चाहिए और इसके बाद
      कटिस्नान करना चाहिए। इस प्राकृतिक चिकित्सा से रोग निवारण में आशातीत सफ़लता मिलती है।
      ११)  इस रोग से पीड़ित रोगी को अधिक से अधिक आराम करना चाहिए ताकि थकावट न आ सकें और रोगी व्यक्ति को पूरी नींद लेनी चाहिए। मानसिक, शारीरिक परेशानी तथा भावनात्मक तनाव यदि रोगी व्यक्ति को है तो उसे दूर करना चाहिए और फिर प्राकृतिक चिकित्सा से अपना उपचार कराना चाहिए।

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