सिर्फ आपरेशन से ही नहीं ,घरेलू आयुर्वेदिक तरीके से पाएँ बवासीर से छुटकारा // How to cure piles with home remedies?




    बवासीर आजकल एक आम बीमारी के रूप में प्रचलित है। इस रोग मे गुदे की खून की नसें (शिराएं) फ़ूलकर शोथयुक्त हो जाती हैं,जिससे दर्द,जलन,और कभी कभी रक्तस्राव भी होता है।बवासीर का प्रधान कारण कब्ज का होना है।जिगर मे रक्त संकुलता भी इस रोग कारण होती है। मोटापा, व्यायाम नहीं करना और भोजन में रेशे(फ़ाईबर) की कमी से भी इस रोग की उत्पत्ति होती है।
बवासीर दो प्रकार की होती है-
1. खूनी बवासीर :- अंदर की बवासीर से खून निकलता है इसलिए इसे खूनी बवासीर कहते हैं।
2. बादी-बवासीर :- बाहर की बवासीर में दर्द तो होता है लेकिन उनसे खून नहीं निकलता है इसलिए इसे बादी-बवासीर कहते हैं।

बवासीर रोग होने के कारण :
मलत्याग करते समय में अधिक जोर लगाकर मलत्याग करना।
बार-बार जुलाव का सेवन करना।
बार-बार दस्त लाने वाली दवाईयों का सेवन करना।

उत्तेजक पदार्थों का अधिक सेवन करना।
अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन का सेवन करना।
अधिक कब्ज की समस्या होना।
वंशानुगत रोग या यकृत रोग होना।
शारीरिक कार्य बिल्कुल न करना।
शराब का अधिक मात्रा में सेवन करना।
पेचिश रोग कई बार होना।
निम्नस्तरीय चिकनाई रहित खुराक लेना। 

घुड़सवारी करना।
गर्भावस्था के समय में अधिक कष्ट होना तथा इस समय में कमर पर अधिक कपड़ें का दबाव रखना।
रात के समय में अधिक जागना। 

मूत्र त्याग करने के लिए अधिक जोर लगना। मस्से के लिये कई घरेलू ईलाज हैं,लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और आधार भूत बात यह है कि रोगी को २४ घंटे में 4-5 लीटर लिटर पानी पीने की आदत डालनी चाहिये। ज्यादा पानी पीने से शरीर से विजातीय पदार्थ बाहर निकलते रहेंगे और रोगी को कब्ज नहीं रहेगी जो इस रोग का मूल कारण है।
हरी पत्तेदार सब्जियां,फ़ल और ज्यादा रेशे वाले पदार्थों का सेवन करना जरुरी है।
बवासीर रोग में घरेलू उपचार-१.) कलमी शोरा और रसोंत बराबर मात्रा में लेकर मूली के रस में पीस लें,यह पेस्ट बवासिर के मस्सो पर लगाने से तुरंत राहत मिलती है।
२) जमींकंद को भोभर मे भून लें और दही के साथ खाएं।

3) कमल का हरा पता पीसकर उसमे, मिश्री मिलाकर खाने से बवासीर का खून बंद हो जाता है|
४) नाग केशर ,मिश्री और ताजा मक्खन सम भाग मिलाकर खाने से बवासीर रोग नियंत्रण में आ जाता है|
५) गुड़ के साथ हरड खाने से बवासीर में लाभ मिलता है|
६) बवासीर में छाछ अमृत तुल्य है| छाछ में सैंधा नमक मिलाकर लेना उचित है|
मूली के नियमित सेवन से बवासीर ठीक होने के प्रमाण मिले हैं|
८) गेंदे के हरे पत्ते १० ग्राम,काली मिर्च के ५ दाने मिश्री १० ग्राम सबको ५० मिली पानी में पीस कर मिला दें | ऐसा मिश्रण चार दिन तक लेते रहने से खूनी बवासीर खत्म हो जाती है|

९ ) बिदारीकंद और पीपल समान भाग लेकर चूर्ण बनालें। ३ ग्राम चूर्ण बकरी के दूध के साथ पियें।
१०) .कडवी तोरई की जड को पीसकर यह पेस्ट मस्से पर लगाने से लाभ होता है।


गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 


११ ) करंज,हरसिंगार.बबूल,जामुन,बकायन,ईमली इन छ: की बीजों की गिरी और काली मिर्च इन सभी चीजों को बराबर मात्रा में लेकर कूट पीसकर मटर के दाने के बराबर गोलियां बनालें। २ गोली दिन में दो बार छाछ के साथ लेने से बवासिर में अचूक लाभ होता है।

१२ ) आक के पत्ते और तम्बाखू के पत्ते गीले कपडे मे लपेटकर गरम राख में रखकर सेक लें। फ़िर इन पत्तों को निचोडने से जो रस निकले उसे मस्सों पर लगाने से मस्से समाप्त होते हैं।
१३ ) कनेर के पत्ते,नीम के पत्ते ,सहजन के पत्ते और आक के पत्ते
पीसकर मस्सों पर लगावें जरूर फ़ायदा होगा।

१४ ) चिरायता,सोंठ,दारूहल्दी,नागकेशर,लाल चन्दन,खिरेंटी इन सबको समान मात्रा मे लेकर चूर्ण बनालें। ५ ग्राम चूर्ण दही के साथ लेने से पाईल्स ठीक होंगे।
१५) एलोवेरा( ग्वार पाठा) का गूदा मस्सों पर लगाने से सूजन दूर होती है।
१६ ) विटामिन सी (एस्कोर्बिक एसीड) खून की नलिकाओं को स्वस्थ बनाती है। ५०० एम जी की २ गोली रोज लेना उपकारी है।
१७) पके केले को बीच से चीरकर दो टुकडे कर लें और उसपर कत्था पीसकर छिडक दें,इसके बाद उस केले को खुली जगह पर शाम को रख दें,सुबह शौच से निवृत्त होने के बाद उस केले को खालें, केवल १५ दिन तक यह उपचार करने से भयंकर से भयंकर बवासीर समाप्त हो जाती है।

१ ८ ) हरसिंगार के फ़ूल तीन ग्राम काली मिर्च एक ग्राम और पीपल एक ग्राम सभी को पीसकर उसका चूर्ण तीस ग्राम शकर की चासनी में मिला लें,रात को सोते समय पांच छ: दिन तक इसे खायें। इस उपचार से खूनी बवासीर
में आशातीत लाभ होता है। कब्ज करने वाले भोजन पदार्थ वर्जित हैं। 
१९) दही और मट्ठे के नियमित उपयोग से बवासीर में हितकारी प्रभाव होता है।
२०) प्याज के छोटे छोटे टुकडे करने के बाद सुखालें,सूखे टुकडे दस ग्राम घी में तलें,बाद में एक ग्राम तिल और बीस ग्राम मिश्री मिलाकर रोजाना खाने से बवासीर का नाश होता है|
२१) एक नीबू लेकर उसे काट लें,और दोनो फ़ांकों पर पांच ग्राम कत्था पीस कर छिडक दें, खुली जगह पर रात भर रहने दें,सुबह बासी मुंह दोनो फ़ांकों को चूस लें,कैसी भी खूनी बबासीर दो या तीन हफ़्तों में ठीक हो जायेगी।
२२) आम की गुठली का चूर्ण शहद या पानी के साथ एक चम्मच की मात्रा में लेते रहने से खूनी बवासीर ठीक होती है।

२३) सूखे आंवले का चूर्ण रात को सोते वक्त मामूली गरम जल से लें । अर्श में लाभ होगा।
२४) अब मैं यहां खूनी बवासीर का एक उपचार प्रस्तुत कर रहा हूं जो आश्चर्य जनक रूप से लाभकारी है और एक ही रोज में खून गिरना बंद कर देता है। नारियल की जटा को जलाकर भस्म(राख) करलें और एक शीशी में भरलें। करना ये है कि ३ ग्राम भस्म एक गिलास मट्ठे या दही के साथ उपयोग करें। उपचार खाली पेट लेना है। ऐसी खुराक दिन मे तीन बार लेना है। बस एक दिन में ही खूनी बवासीर ठीक करने का यह अनोखा उपचार है।
२५) बवासीर रोग की कारगर हर्बल चिकित्सा के लिये वैध्य दामोदर से 098267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं।सैंकडों रोगी लाभान्वित हुए हैं|
२६) मैं होमियोपैथी की मदरटिंचर हेमेमिलिस और बायोकाम्बिनेशन नम्बर सत्रह से बवासीर के अनेक केस ठीक कर चुका हूँ। पाँच-पाँच बूंद हेमेमिलिस आधा कप पानी में मिला कर दिन में तीन बार और बायोकाम्बिनेशन सत्रह की चार-चार गोलियाँ तीन बार लेने से खूनी और साधारण बवासीर ठीक हो जाती है।
२७) मंत्र-चिकित्सा सिस्टम में बवासीर और भगंदर का रामबाण ईलाज मंत्र के माध्यम से करने का निर्देश है:- रोज रात को पानी रखकर सोवे तथा सुबह उठकर इस मन्त्र से 21 बार अभिमंत्रित करे तथा अभिमंत्रित जल से गुदा को धोना है।ऊंगली गुदा में प्रविष्ट कर मालिश भी करना है। ७ दिवस में फ़र्क नजर आने लगेगा और एक माह में रोग से पूर्णत: मुक्ति मिल जाती है। मंत्र इस प्रकार है--

"ॐ काका कर्ता क्रोरी कर्ता ॐ कर्ता से होय यरसना दश हंस प्रगटे खुनी बादी बवासीर न होय मन्त्र जानकर न बतावे तो द्वादश ब्रहम हत्या का पाप होय लाख पढ़े उसके वंश में न होय शब्द सांचा पिण्ड काचा फुरो मन्त्र इश्वरो वाचा"
पुरुष ग्रंथि (प्रोस्टेट) बढ़ने से मूत्र - बाधा का अचूक इलाज 

*किडनी फेल(गुर्दे खराब ) रोग की जानकारी और उपचार*

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गुर्दे की पथरी कितनी भी बड़ी हो ,अचूक हर्बल औषधि

पित्त पथरी (gallstone) की अचूक औषधि 





विशिष्ट परामर्श-
खूनी और बादी बवासीर मे जड़ी बूटी की हर्बल मेडिसीन सर्वाधिक  सफल साबित होती है| पुराना अर्श रोग भी ठीक हो जाता है| आपरेशन से बचाने वाली औषधि है|हर्बल मेडिसीन के लिए वैध्य दामोदर जी से 9826795656 पर संपर्क कर सकते हैं|

लीवर बढ जाने(हेपोटोमेगेली) की आयुर्वेदिक,घरेलू चिकित्सा// Ayurvedic, home remedies for liver (Hepotomegaly)



                                                                                                                                               

 यकृत का बढना (hepatomegaly) यकृत में विकार पैदा हो जाने की ओर संकेत करता है। बढे हुए और शोथ युक्त लीवर के कोइ विशेष लक्षण नहीं होते हैं। यह रोग लीवर के केन्सर,खून की खराबी,अधिक शराब सेवन, और पीलिया के कारण उत्पन्न हो सकता है। यहां मैं यकृत वृद्धि रोग के कुछ आसान उपचार प्रस्तुत कर रहा हूं जिनके समुचित प्रयोग से इस रोग को ठीक किया जा सकता है।
१) अजवाईन ३ ग्राम और आधा ग्राम नमक भोजन के बाद पानी के साथ लेने से लीवर-तिल्ली के सभी रोग ठीक होते हैं।
२) .दो सन्तरे का रस खाली पेट एक सप्ताह तक लेने से लीवर सुरक्षित रहता है।

३) एक लम्बा बेंगन प्रतिदिन कच्चा खाने से लीवर के रोग ठीक होते हैं।
४) दिन भर में ३ से ४ लिटर पानी पीने की आदत डालें।


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५) एक पपीता रोज सुबह खाली पेट खावें। एक माह तक लेने से लाभ होगा। पपीता खाने के बाद दो घन्टे तक कुछ न खावें।
६) कडवी सहजन की फ़ली,करेला, गाजर,पालक और हरी सब्जीयां प्रचुर मात्रा में भोजन में शामिल करें।
७) शराब पीना लीवर रोगी के लिये बेहद नुकसान कारक है। शराब पीना यकृत रोग में मौत को बुलावा देने के समान है। रोग से मुक्ति पाना है तो शराब को छोडना ही होगा
८) चाय-काफ़ी पीना हानिकारक है। भेंस के दूध की जगह गाय या बकरी का दूध प्रयोग करें।

९) मछली,अण्डे और दालें लाभप्रद हैं।
१०) भोजन कम मात्रा में लें।
तली-गली,मसालेदार चीजों से परहेज करें।
११) मुलहठी में लिवर को ठीक रखने के गुण हैं। पान खाने वाले मुलहटी पान में शामिल करें।

१२) आयुर्वेदिक मत से कुमारी आसव इस रोग की महौषधि है।
१३) होमियोपेथी के चिकित्सक चाईना,ब्रायोनिया, फास्फोरस आदि औषधियां मिलाकर या सिंगल रेमेडी सिद्धात के मुताबिक चिकित्सा करते हैं|

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लकवा (पक्षाघात )की घरेलू चिकित्सा// Easy methods to treat paralysis



                                                                                                      

       आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के मतानुसार लकवा मस्तिष्क के रोग के कारण प्रकाश में आता है।इसमें अक्सर शरीर का दायां अथवा बायां हिस्सा प्रभावित होता है। मस्तिषक की नस में रक्त का थक्का जम जाता है या मस्तिष्क की किसी रक्त वाहिनी से रक्तस्राव होने लगता है। शरीर के किसी एक हिस्से का स्नायुमंडल अचानक काम करना बंद कर देता है याने उस भाग पर नियंत्रण नहीं रह जाता है।दिमाग में चक्कर आने और बेहोश होकर गिर पडने से अग क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।
हाईब्लड प्रेशर भी लकवा का कारण हो सकता है। सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर २२० से ज्यादा होने पर लकवा की भूमिका तैयार हो सकती है।
पक्षाघात तब लगता है जब अचानक मस्तिष्क के किसी हिस्से मे रक्त आपूर्ति रुक जाती है या मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के आस-पास की जगह में खून भर जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के हृदय में जब रक्त आपूर्ति का आभाव होता तो कहा जाता है कि उसे दिल का दौरा पड़ गया है उसी तरह जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो जाता है या मस्तिष्क में अचानक रक्तस्राव होने लगता है तो कहा जाता है कि आदमी को मस्तिष्क का दौरा पड़ गया है।
शरीर की सभी मांस पेशियों का नियंत्रण केंद्रीय तंत्रिकाकेंद्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) की प्रेरक तंत्रिकाओं से, जो पेशियों तक जाकर उनमें प्रविष्ट होती हैं,से होता है। अत: स्पष्ट है कि मस्तिष्क से पेशी तक के नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग में, या पेशी में हो, रोग हो जाने से पक्षाघात हो सकता है। सामान्य रूप में चोट, अबुद की दाब और नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग के अपकर्ष आदि, किसी भी कारण से उत्पन्न प्रदाह का परिणाम आंशिक या पूर्ण पक्षाघात होता है।


पक्षाघात होने का मुख्य कारण है मस्तिष्क में रक्त ले जाने वाली नलिकाओं में रुकावट। इस रुकावट के कई कारण हैं
उच्च रक्तचाप l
मधुमेह l
धूम्रपान l
रक्त में बढ़ी हुई वसा/चर्बी l
हृदय रोग l
कोकेइन इत्यादि मादक पदार्थों का सेवन l


हर प्रकार की खांसी और कफ की समस्या के घरेलू ,आयुर्वेदिक उपचार

संघर्षयुक्त जीवनशैली l
अत्यधिक आरामदायक जीवन व व्यायाम की कमी l
खान-पान में विटामीन की कमी l
मोटापा l
वंशानुगत टी.बी.या अन्य संक्रमित रोगों का अनुचित या अधूरा उपचार।

पक्षाघात से बचाव का तरीका -
*नियमित रूप ये दवा का सेवन कर रक्तचाप पर नियंत्रण रखना चाहिए। वजन पर नियंत्रण रखने से, नियमित व्यायाम से, भोजन मे नमक व चर्बी के परहेज से व नियमित जीवन-शैली से भी उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण रखा जा सकता है परन्तु दवा का सेवन नियमपूर्वक करना चाहिए। बहुत से लोग दवा तभी लेते हैं जब उन्हें लगता है कि रक्तचाप बढ़ गया है- यह सर्वथा अनुचित है। रक्तचाप बढ़ने के अधिकतर लोगों में कोई लक्षण नहीं होते- इसीलिए जिसे भी उच्च रक्तचाप का रोग हो उसे प्रतिदिन दवा का सेवन करना चाहिए। आजकल बहुत से योगी जन साधारण में यह प्रचार करते हैं कि योग से उच्च रक्तचाप सहित सभी रोगों का पूर्ण उपचार संभव है।

गठिया ,घुटनों का दर्द,कमर दर्द ,सायटिका  के अचूक उपचार 
*योग करना निश्चय ही शरीर व मन दोनों के लिए हितकर है परन्तु साथ-साथ नियमित रूप से रक्तचाप-ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहना चाहिए और यदि दवा छोड़ने के लंबे अंतराल के उपरांत भी रक्तचाप नहीं बढ़ता तो ही स्वयं को पूर्णतया रोग-मुक्त मानना चाहिए। सामान्यत: योग के नियमित अभ्यास से रक्तचाप कुछ तो कम होता है अपितु इसके साथ-साथ दवा का नियमित सेवन भी करते रहने होता है। बहुत से लोग योगाभ्यास प्रारंभ करते ही सब दवाएं बंद कर देते हैं व कहते हैं कि 'जब हमें कोई लक्षण नहीं तो रक्तचाप की जांच क्यों कराएं?' यह व्यवहार निश्चित तौर पर अवांछनीय है व इससे स्वयं को ही हानि होती है।

मलेरिया की जानकारी और विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों से इलाज  

उच्च रक्तचाप के अलावा मधुमेह/शुगर की बीमारी से भी हृदय-रोग व पक्षाघात होने की संभावना बढ़ जाती है। शुगर की नियमित जांच, दवाओं के नियंत्रित सेवन व भोजन में उचित परहेज से मधुमेह को नियंत्रण में रखा जा सकता है। जितना अच्छा नियंत्रण होगा, उतनी ही कम संभावना होगी पक्षाघात होने की। मीठे के परहेज के साथ-साथ तली हुई चीजों- मक्खन, मलाई, घी आदि पदार्थों का सेवन भी कम करना चाहिए।
भोजन में पत्तेदार व हरी सब्जियां, फल व पानी की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए। नियमित व्यायाम व अत्यधिक आरामदायक जीवनशैली के परित्याग से भी मधुमेह व उच्च रक्तचाप के रोगी स्वस्थ रह सकते हैं। दिनचर्या में नियम व धैर्य से भी शरीर व मन चिंतामुक्त रहता है व पक्षाघात की संभावना को कम किया जा सकता है।
जिन्हें पहले पक्षाघात/हृदय रोग हो चुका हो, उन्हें तो उपरोक्त दिये हुए सुझावों को कुंजी मान कर चलना चाहिए व साथ ही नियमित रूप से दवाओं का सेवन करना चाहिए। इनमें मुख्यत: रक्त को पतला करने की दवा-एस्प्रिन के अलावा रक्तचाप व रक्त की चर्बी नियंत्रित करने वाली दवाइयां। जिन्हें टी.बी. या अन्य संक्रमित रोग हो उन्हें नियमित रूप से उचित दवा का सेवन करना चाहिए।


कई रोगियों में पक्षाघात अचानक होता है परन्तु अन्य लोगों में पक्षाघात से कुछ दिन/हफ्ते पहले कुछ चेतावनी के चिन्ह आने लगते हैं। इन चेतावनी-चिन्हों में कुछ मिनट/घंटे के लिए व्यक्ति के शरीर का एक हिस्सा/अंग कमजोर/सुन्न पड़ जाता है, या बोलने में रुकावट आने लगती है या कुछ कम दिखाई देने लगता है या चक्कर-उल्टी-चलने में लड़खड़ाहट के लक्षण होने लगते हैं। ऐसे लक्षण होते हैं जब मस्तिष्क की नलिका पूर्ण रूप से अवरुद्ध रहे। ये रुकावट स्वयं ही दूर हो जाती है व लक्षण ठीक हो जाते हैं। ये चिन्ह इस बात की चेतावनी देते हैं कि भविष्य में वही नलिका पूर्ण-रूप से बंद हो सकती है व समय रहते उचित चिकित्सा से ऐसा होने से रोका जा सकता है। अतएव सही जानकारी, उचित जीवन शैली व नियमित जांच-उपचार से पक्षाघात व उसके दुष्परिणामों से बचा जा सकता है
लकवा का तीव्र आक्रमण होने पर रोगी को किसी अच्छे अस्पताल में सघन चिकित्सा कक्ष में रखना उचित रहता है।इधर उधर देवी-
 देवताओं के चक्कर मे समय नष्टके  करना उचित नहीं है। अगर आपकी आस्था है तो कोई बात नहीं पहिले बडे अस्पताल का ईलाज करवाएं बाद में आस्थानुसार देवी-देवता का आशीर्वाद भी प्राप्त करलें।

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