साइटिका की प्राकृतिक चिकित्सा




साइटिका (sciatica) नाडी, जिसका उपरी सिरा लगभग १ इंच मोटा होता है, प्रत्येक नितंब के नीचे से शुरू होकर टाँग के पिछले भाग से गुजरती हुई पाँव की एडी पेर ख़त्म होती है| इस नाडी का नाम इंग्लीश में साइटिका नर्व है| इसी नाडी में जब सूजन ओर दर्द के कारण पीड़ा होती है तो इसे वात शूल अथवा साइटिका का दर्द कहते है| इस रोग का आरंभ अचानक ओर तेज दर्द के साथ होता है| ३० से ५० वर्ष की आयु वर्ग के लोगों को यह रोग होता है| साइटिका का दर्द एक समय मे सिर्फ़ एक ही टाँग मे होता है| सर्दियों के दिनो में रोगियों के दर्द मे बढ़ोतरी होती है| किसी किसी को कफ का प्रकोप भी दिखाई देता है| रोगी को चलने मे कठिनाई होती है| रोगी जब सोता या बैठता है तो टाँग की पूरी नस खींच जाती है ओर बहुत तकलीफ़ होती है|

साइटिका की प्रकृतिक चिकित्सा
१. गरम पानी में १० से १५ मिनिट तक रोज पाँव रखना|
२. आधी बाल्टी पानी उबलने को रखें| इसमें ३० -४० पत्तियाँ नीम की डालकर उबालें| उबलते पानी मे थोड़ा सा मेथी दाना व काला नमक डालें| अब इसे छाने| अब इस गरम पानी को बाल्टी मे डालें व सुहाते सुहाते पानी के अंदर दोनो पैरों को डालकर बैठें व शरीर के चारो तरफ कंबल लपेट लें| कम से कम १० मिनिट तक बैठें| इसके बाद पैर बाहर निकाल कर पोंछ लें| ऐसे सप्ताह मे एक बार ज़रूर करें|
खाद्य चिकित्सा द्वारा उपचार
(१) २५० ग्राम पारिजात के पत्तों को एक लिटर पानी में उबालें| जब लगभग ७०० ग्राम पानी बचे तब उसे छान लें| अब उसमें एक ग्राम केसर पीस के दल दें| ठंडा कर उसे बोतल मे भर लें| इसको रोजाना ५० – ५० ग्राम सुबह ओर शाम लें| यह उपचार कम से कम ३० दिनों तक लगातार करें| ज़रूर लाभ होगा| पानी खत्म होने पर दुबारा बना लें| पारिजात को हारसिंगार भी कहा जाता है|
(२) १०० ग्राम नेगड़ के बीज किसी पंसारी से लाकर कूट पीस लें| १० छोटे पॅकेट बना लें| सुबह सूर्योदय से पहले उठ कर कुल्ला कर मुह सॉफ करें| अब सूजी या आटे का हलवा शुद्ध देसी घी मे बनाएँ| जितना हलवा खा सकते है उसको अलग निकालें ओर इसमें एक पेकेट नेगड़ के चूर्ण की मिला कर खाएँ| खाने के बाद पानी ना पिएं| हो सके तो हलवे मे शक्कर की जगह गुड मिलाएँ| कम से कम १० दिन तक प्रयोग करें|
(३) अजवाइन १० ग्राम, सूखा आँवला २० ग्राम, मेथी दाना २० ग्राम व काला नमक ५ ग्राम लेकर पीसें| रोजाना इसमें से १ चम्मच चूर्ण लें|
(४) प्रतिदिन २ कली लहसुन की व थोड़ी सी अदरक खाने के साथ लें|
(५) काली मिर्च ५ तवे पेर सेंक कर सुबह खाली पेट मक्खन के साथ लें|
(६) हरी मेथी, करेला, लौकी, टिन्डे, पालक, बथुआ का ज़्यादा सेवन करें|
(७) फलों मे पपीता, अंगूर आदि का सेवन करें|
(८) सूखे मेवों मे किशमिश, अंजीर, अखरोट, मुनक्का आदि का सेवन करें|

व्यायाम व योग द्वारा साइटिका का इलाज़
१. कमर के बल सीधे लेटें| दोनों पैरों को बिना घुटना मोड़ें उपर उठाएँ| कम से कम १० से २० बार करें|
२ दोनों पाँवो को मोड़ कर घुटने पेट से लगाकर नाभि को दबाएँ|
३. सीधे लेटकर घुटने मोडते हुए साइकल की तरह चलाएँ|
४. भुजंगासन, वज्रासन, उत्तानपादासन, नौकासन व शवासन करें|

परहेज


१. जहाँ तक हो सके दालों का सेवन ना करें| सिर्फ़ छिलके वाली दाल थोड़ी मात्रा मे खाएँ|
२. तेल, खटाई, मिठाई, दही, आचार, राजमा, छोले आदि का प्रयोग ना करें|
३. तली हुई चीजें ना खाएँ| ठंडे पेय पदार्थ ना पिएं|
विशेष

१. ५ पत्ती तुलसी की रोज सुबह खाएँ|
२. चिंता व क्रोध ना करें|
३. प्रतिदिन पैरों की सरसों के तेल से उपर से नीचे की ओर मालिश करें| इस तरह थोड़े से परिश्रम से आप साइटिका के दर्द से मुक्ति पा सकते है|
विशिष्ट परामर्श-  


संधिवात,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| औषधि से बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त गतिशीलता हासिल करते हैं| बड़े अस्पतालों के महंगे इलाज़ के बावजूद निराश रोगी इस औषधि से आरोग्य हुए हैं|  त्वरित असर औषधि के लिए वैध्य श्री दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं|








 


शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता(इम्यूनिटी) कैसे बढ़ाएँ ?




इम्यूनिटी का अर्थ है, प्रतिरोधक क्षमता जो बीमारियों से हमारी शरीर को बचाती है या उनसे लड़ने हमारी मदद करती है उसी को इम्युनिटी कहते है। इम्यूनिटी खान-पान और नियमित व्यायाम करके फ्रूट्स का सेवन करके बढ़ाई जा सकते है।
इम्युनिटी को स्ट्रांग करने के लिय फ़ास्ट फ़ूड, कोल्ड ड्रिंग्स, जंक फूड्स, डिब्बा बंद सामग्री, ऑयली फूड्स, आचार, आदि का सेवन न करे।
एक ऐसी क्षमता है जो की बहुकोशिकीय जीवों से हानिकारक जीवो का विरोद्द करे। प्रतिरक्षा शरीर की रक्षा तंत्र प्रणाली के रूप में काम करती है। प्रतिरक्षा हमारे शरीर की बाहरी रोगो से लड़ने की क्षमता है, इम्युनिटी भी कई प्रकार की होती है। वर्तमान समय में प्रतिरक्षा प्रत्येक जीव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
इम्युनिटी तीन प्रकार की होती है-
प्राकृतिक प्रतिरक्षा 
अनुकूली प्रतिरक्षा 
निष्क्रिय प्रतिरक्षा 
प्रतिरक्षा बढ़ाने के लिए आपको कई उपायों को स्वीकार करना होगा जैसे की –
तुलसी खाएं
योगा करे
धूम्रपान न करे
शराब न पिएं
उचित नींद लें
रोज़ कसरत करे
स्वस्थ फल और सब्जियां खाएं
अपने हाथो को नियमित रूप से दोहिए खाना खाने और बनाने से पहले।
 एक्टिव इम्युनिटी वो होती है। जो हमारा शरीर खुद किसी बीमारी के लिय प्रतिरक्षा तंत्र को त्यार करता है। उसे एक्टिव इम्युनिटी कहा जाता है।
जब हमारे शरीर पर किसी बीमारी के लिय टिका लगाया जाता है। तो वह प्रतिरोधक तंत्र तेयार करता है। टिका के द्वारा हमारी बॉडी में जो मर्त बैक्टीरिया छोड़े जाते है, तो बॉडी उनकी विपरीत एंटीबाडी तेयार करती है। इसे एक्टिव इम्युनिटी कहते है।
 पैसिव इम्युनिटी वो होती है जिसमे किसी व्यक्ति को बीमारी के दौरान बहार से एंटीबॉडीज दी जाती है। किसी बीमारी के लिय या कृत्रिम रूप से उनकी बॉडी में एन्टीबॉडीस इंजेक्ट किया जाता है, उसे पैसिव इम्युनिटी कहते है।
भरपूर पानी पिए और पोषण युक्त खुराक ले। 8-10 गिलास गर्म पानी के पिए , तुलसी खाएं, हरी सब्जियां, ब्रोकोली, मशरूम, टमाटर, पालक, धनिया, आदि खट्टे फल खाएं। चीनी के बजाय गुड़ का उपयोग करे। काली मिर्च, अदरक, हल्दी लें।
फैटी एसिड के लिए ओमेगा 3 और 6 से भरपूर सप्लीमेंट्स, सीड्स ले।और आप बीजो का भी सेवन कर सकते है जैसे कद्दू के बीज, सूरजमुखी के बीज, और खरबूजे के बीज, आदि इस से हमारी बॉडी को सभी प्रकार के नूट्रेंट और प्रोटीन की पूर्ति होती है।
जो की हमारे डेली रूटीन या रोजमर्रा की जीवन शैली में बहुत ही आवश्यक है। ये हमारी बॉडी को बीमारियों से दूर रखने में मदद करते है व रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते है। और हमारे इम्यूनिटी को मजबूत करते है।
How to boost immunity against Coronavirus-
सुबह खाली पेट गुनगुना पानी पिय।
रोज 40 -50 मिनट एक्सरसाइज करे या योग करे।
उसके बाद सुबह का खाना यानि ब्रेकफास्ट हेल्थी ले। ब्रेकफास्ट में आप फ्रूटस, ड्राई फ्रूट्स, दूध का सेवन करे।
How can I naturally boost my immune system? दोपहर के खाने में सलाद, हरी सब्जिया (ब्रोकली, पालक, दाल, गोबी व मिक्स सब्जिया आदि) और दही व लस्सी लें।
दिन में एक या दो बार ग्रीन टी का सेवन करे।
रात को भोजन हल्का लें। (खिचड़ी, दलिया आदि।) सोने से पहले हल्दी के दूध का सेवन करे।
भोजन करने के पश्चात कुछ कदम अवश्य टहले।
दिन में चार से पांच लीटर पानी पिय। (बॉडी को हाइड्रेटेड रखे।)
दिन में एक बार (मिड डे ) ज्यूस, निम्बू पानी, या नारियल पानी आदि का सेवन रखे।
योग हमारे जीवन का आधार है। जिस प्रकार खाना पीना हमारे शरीर के लिय आवश्यक है,
 Exercise to boost immunity उसी प्रकार योग व एक्सरसाइज भी जीवन शैली के लिय अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रातःकाल रोज योग करने से शरीर स्वस्थ व मजबूत बनता है। हमारी शरीर को बल प्राप्त होता है।
योग करने से भूख अच्छी लगती है। हमारे शरीर सकारत्मक ऊर्जा का प्रवाह होता है।
How to boost the immune system naturally योगा करने से इम्युनिटी (रोगप्रतिरोधक क्षमता) बढ़ती है।
आप स्वस्थ रहने के लिय योग के साथ साथ स्पोर्ट्स या खेल क्रीड़ा भी कर सकते है।

 


गंगाधर चूर्ण के फायदे




पेट खराब होने पर मुख्यतः इस औषधि का उपयोग किया जाता है।

गंगाधर चूर्ण घटक –
नागरमोथा
इंद्रजो
बेलगिरी
लोधर
मोचरस
धाय के फूल
चलिए इन घटकोंको एक एक करके जानते है |
नागरमोथा –

इस में दीपन याने की पाचन शक्ति को बढ़ानेवाले, पाचन भोजन को पचानेवाले गुण मौजूद होते है | नागरमोथा की तासीर शीतल होती है l यह अग्निवर्धक याने की भूक को बढ़ानेवाला होता हैl साथ ही साथ यह मतली, उलटी, बुखार,अतिसार की समस्या को भी ठीक करता है l पेट के कीड़ों को भी नष्ट करता है l
इन्द्र्जो –

इन्द्र्जो को कुटज भी कहा जाता हैl इसमे ग्राही, स्तम्भन, शीतल और पाचन गुण मौजूद होते हैl साथ ही यह कृमिनाशक भी होती हैl आमातिसार रक्तातिसार में विशेष लाभकारी हैl यह पेट की मरोड़ को ठीक करती है , बवसीर के खून को बंद करती हैl

बेलगिरी –

यह विटामिन और पोषक तत्वों से भरपूर होता है l बेल में मौजूद टैनिन और पेक्टिन मुख्य रूप से डायरिया और पेचिश के इलाज में मुख्य भूमिका निभाते है l बेल पाचन प्रक्रिया में सुधार लाता है, पाचन संबंधी विकारों को दूर करता है l
लोध्र –

इसमे ग्राही, शीतल, कफ पित्तशामक, शोथनाशक, अतिसार को काम करनेवाले गुण मौजूद होते है|
मोचरस –

यह कफ पित्तशामक, ग्राही, शीतल, स्निग्ध, पुष्टिकारक और वीर्यवर्धक होता है l मोचरस प्रवाहिका, रक्तातिसार, रक्तवमन, श्वेतप्रदर जैसी समस्याओं का इलाज करता हैl
धाय के फूल –

इसे धातकी भी कहा जाता हैl धातकी पेट के कीड़ों को कम करती है, यह अतिसार को रोकती है l
गंगाधर चूर्ण फायदे –
इस औषधि में सभी घटक आयुर्वेदिक जड़ी बूटियां है।
गंगाधर चूर्ण में एंटी डायरियल गुण मौजूद होते हैं।
यह एक शीतल और स्तंभक औषधि है जो पतले दस्त को रोकती हैl
इस औषधि में शोथ हर गुण मौजूद होते हैं जो पेट की सूजन को कम करते हैं साथ ही यह औषधि भूक को बढ़ाती है पाचन में सुधार करती है।
इसके अलावा यह औषधि वात दोष और कफ दोष को दूर करती है।
अल्सरेटिव कोलाइटिस, मालअब्जॉर्प्शन सिंड्रोम की समस्या का इलाज करने के लिए भी यह लाभकारी हैl
गंगाधर चूर्ण की सेवन विधि और मात्रा
1-3 ग्राम दिन में तीन बार लें।
इसे छाछ, पानी के साथ लें।
इसे भोजन करने के पहले लें।
या डॉक्टर द्वारा निर्देशित रूप में लें।

अदरक सौंठ के स्वास्थ्य लाभ

 


अदरक भारतीय रसोई में मौजूद अद्भुत मसालों में से एक है जो खाने के स्वाद को बढ़ाता है। इस के अलावा, सूखे अदरक जिसे सौंठ या आयुर्वेद में शुंठी कहते है का भी मसाले के रूप में इस्तेमाल होता है। आयुर्वेद में इस के अनेक गुण बताए गये है जो इसे कई बीमारियों के इलाज में कारगर बनाते है। इसीलिए इसका एक नाम महौषधि भी है।

सौंठ के ज्यादातर गुण अदरक के समान ही होते है। इसका स्वाद तीखा और तासीर गर्म या उष्ण होता है। यह कफ और वात दोषों का शमन करती है और ज्यादा मात्रा में सेवन करने पर पित्त को बढ़ाती है।

यह भोजन में स्वाद को बढ़ाती है। भूख और पाचन में सुधार लाती है।

यह आम का पाचन करने में उपयुक्त होने के कारण आमवात में काफी लाभदायक है। सौंठ १ चम्मच, २ चम्मच शहद और २ चम्मच एरंड तेल को मिलाकर सुबह खाली पेट लगातार कुछ दिनों तक लेने से आमवात में जोड़ों के सूजन और दर्द  में फायदा होता है।

कफ नाशक होने से खांसी, श्वास (दमा) जैसे श्वसन मार्ग के विकारों में फायदेमंद है। इस में शहद के साथ सेवन करना चाहिए।

अपने ग्राही गुण के कारण यह आंतों से अतिरिक्त पानी का शोषण करती है और दस्त, पेचिश में उपयुक्त है।

यह मितली, उलटी, जोड़ों के दर्द, मासिक धर्म के समय होने वाले दर्द और वजन कम करने में भी फायदेमंद है।






80 वात रोगों की रामबाण औषधि बनाने की विधि और लाभ




भले ही आपको यकीन न हो, लेकिन सिर्फ एक दवा का प्रयोग कर आप 80 प्रकार के वात रोगों से बच सकते हैं। जी हां, इस दवा का सेवन करने से आप कठिन से कठिन बीमारियों से पूरी तरह से निजात पा सकते हैं। अगर आपको भी होते हैं वात रोग, तो पहले जानिए इस चमत्कारिक दवा और इसकी प्रयोग विधि के बारे में...

विधिः 200 ग्राम लहसुन छीलकर पीस लें। अब लगभग 4 लीटर दूध में लहसुन व 50 ग्राम गाय का घी मिलाकर गाढ़ा होने तक उबालें। फिर इसमें 400 ग्राम मिश्री, 400 ग्राम गाय का घी तथा सौंठ, काली मिर्च, पीपर, दालचीनी, इलायची, तमालपात्र, नागकेशर, पीपरामूल, वायविडंग, अजवायन, लौंग, च्यवक, चित्रक, हल्दी, दारूहल्दी, पुष्करमूल, रास्ना, देवदार, पुनर्नवा, गोखरू, अश्वगंधा, शतावरी, विधारा, नीम, सुआ व कौंचा के बीज का चूर्ण प्रत्येक 3-3 ग्राम मिलाकर धीमी आंच पर हिलाते रहें। जब मिश्रण घी छोड़ने लगे लगे और गाढ़ा मावा बन जाए, तब ठंडा करके इसे कांच की बरनी में भरकर रखें।
प्रयोग : प्रतिदिन इस दवा को 10 से 20 ग्राम की मात्रा में, सुबह गाय के दूध के साथ लें (पाचनशक्ति उत्तम हो तो शाम को पुनः ले सकते हैं।)परंतु ध्यान रखें, इसका सेवन कर रहे हैं तो भोजन में मूली, अधिक तेल व घी तथा खट्टे पदार्थों का सेवन न करें और स्नान व पीने के लिए गुनगुने पानी का प्रयोग करें।
इससे पक्षाघात (लकवा), अर्दित (मुंह का लकवा), दर्द, गर्दन व कमर का दर्द,अस्थिच्युत (डिसलोकेशन), अस्थिभग्न (फ्रेक्चर) एवं अन्य अस्थिरोग, गृध्रसी (सायटिका), जोड़ों का दर्द, स्पांडिलोसिस आदि तथा दमा, पुरानी खांसी,हाथ पैरों में सुन्नता अथवा जकड़न, कंपन्न आदि के साथ 80 वात रोगों में लाभ होता है और शारीरिक विकास होता है।

दूध मे हल्दी मिलाकर पीने के स्वास्थ्य लाभ


हल्दी वाला दूध सिर्फ पुरुषों को ही नहीं अपितु सभी मानवों हेतु फायदेमंद हैं जो कि निम्तों प्रकार हैं…

कई बार सुना होगा कि हल्दी का दूध शरीर के लिए अच्छा होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह आपके लाभदायक कैसे है? चलिए, हम बताते हैं। दरअसल, हल्दी में प्राकृतिक एंटीबायोटिक गुण होते हैं और दूध कैल्शियम से भरपूर होता है । जब आप दूध और हल्दी दोनों को एक साथ मिला देते हैं, तो दोनों में मौजूद पोषक तत्व आपके शरीर को बीमारियों और संक्रमण से बचाने के साथ ही भरपूर ऊर्जा भी देते हैं।मिन (curcumin) कंपाउंड यानी पॉलीफेनोल भी होता है, जो आपके शरीर को कई रोगों से बचाने में मदद करता है। करक्यूमिन बीमारियों की रोकथाम के लिए फायदेमंद तो होता है, लेकिन इसे अवशोषित (Absorb) करना शरीर के लिए मुश्किल होता है। इसलिए, इसे काली मिर्च और वसायुक्त खाद्य पदार्थों जैसे दूध और घी के साथ मिलाने की सलाह दी जाती है।

हल्दी का दूध पीने के फायदे

1. पाचन शक्ति को बेहतर करता है हल्दी का दूध

पेट और पाचन शक्ति के ठीक से काम न करने पर इसका असर आपके शरीर पर तेजी से पड़ता है। ऐसे में हल्दी का दूध आपकी आंतों को स्वस्थ रखने और पाचन तंत्र को बेहतर करने में मदद कर सकता है । दरअसल, हल्दी में मौजूद करक्यूमिन एंटी इंफ्लेमेटरी गुण की तरह काम करता है, जो आंत संबंधी बीमारियों को दूर करने में शरीर की सहायता करता है ।

2. जोड़ों का दर्द कम करने में मदद करता है हल्दी का दूध

हर्बल चाय और गोल्डन मिल्क कहलाने वाले हल्दी दूध में मौजूद करक्यूमिन में एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो जोड़ों और गठिया के दर्द को कम कर सकते हैं। साथ ही हल्दी दूध में एंटी-अर्थराइटिस गुण भी पाए जाते हैं, जो जोड़ों की सूजन को कम करने में मदद करते हैं ।

3. अनिद्रा दूर करने के लिए हल्दी का दूध

अनिद्रा की परेशानी लोगों में काफी बढ़ती जा रही है। इस परेशानी को दूर करने के लिए आप हल्दी दूध का सेवन कर सकते हैं। विभिन्न अध्ययनों से यह स्पष्ट भी हुआ है कि करक्यूमिन व्यक्ति में याददाश्त को भी ठीक करता है । ऐसे में जब भी आपको नींद न आए, तो आप हल्दी-दूध पिएं या हर रोज रात को सोने से पहले इसका सेवन करें।

4. कैंसर के खतरे को कम करता है हल्दी का दूध

कैंसर सबसे खतरनाक बीमारी मानी जाती है, जिससे बचाव करना बेहद जरूरी है। ऐसे में आप हल्दी-दूध का सेवन कर सकते हैं। हल्दी-दूध में एंटीइंफ्लेमेटरी गुण होते हैं। हल्दी वाला दूध प्रोस्टेट और पेट के कैंसर के खतरे को कम कर सकता है या उन्हें बढ़ने से रोक सकता है । यह डीएनए को नुकसान पहुंचाने वाले कैंसर कोशिकाओं के प्रभाव को कम करता है और कीमोथेरेपी के दुष्प्रभावों को कम करता है।

5. हड्डी स्वास्थ्य

हड्डियों की मजबूती के लिए कैल्शियम जरूरी होता है। दूध में कैल्शियम होता है, जो आपकी हड्डियों को स्वस्थ और मजबूत रखने में अहम भूमिका निभाता है। हल्दी वाला दूध हड्डियों के नुकसान और ऑस्टियोपोरोसिस (हड्डी संबंधी रोग) की आशंका को कम कर सकता है।

6. डायबिटीज

हल्दी में मौजूद करक्यूमिन रक्त शर्करा के स्तर को कम करने में मदद करता है, इसलिए इसे डायबिटीज के रोकथाम में उपयोगी माना जाता है। इसके अलावा, यह डायबिटीज संबंधी लीवर विकारों को भी रोकने में अहम भूमिका निभाता है । हल्दी में मौजूद करक्यूमिन इंफ्लेमेशन और ऑक्सिडेटिव स्ट्रेस को भी कम करता है। एक अध्ययन के मुताबिक डायबिटीज-1 के मरीजों को 3 माह तक प्रतिदिन 5 ग्राम हल्दी देने से उनका रक्त शर्करा काफी हद तक कम हुआ है ।

7. वजन घटाने के लिए

व्यस्त दिनचर्या, बाहर का खाना, लंबे वक्त तक कुर्सी पर बैठे रहना, व्यायाम न करना, तनाव और ऐसे ही कई कारणों की वजह से लोग मोटापे की समस्या से ग्रसित हो रहे हैं। जैसे-जैसे वजन बढ़ता है, वैसे-वैसे शरीर बीमारियों से घिरता चला जाता है। ऐसे में हल्दी दूध आपकी मदद कर सकता है।

8. सर्दी और खांसी

बदलते मौसम और कमजोर इम्यूनिटी की वजह से सर्दी-जुकाम होना आम बात है। ऐसे में कई बार घरेलू नुस्खे जादू की तरह काम करते हैं और हल्दी-दूध भी उन्हीं में से एक है। हल्दी युक्त दूध अपने एंटीवायरल और एंटी-बैक्टीरियल गुणों के कारण सर्दी और खांसी को ठीक करने के लिए उपयोगी माना जाता है । यह गले की खराश, खांसी और जुकाम से तुरंत राहत देता है। अगर आप हर रोज हल्दी-दूध का सेवन करेंगे, तो जल्द ही ठंड से शरीर को बचा सकते हैं।

9. हृदय स्वास्थ्य

हल्दी में मौजूद करक्यूमिन हमारे शरीर में साइटोकिन्स (एक तरह के प्रोटीन) को हमारे शरीर में निकलने से रोकता है, जिनकी वजह से हृदय संबंधी (कार्डियोवस्कुलर) रोग उत्पन्न होते हैं । वहीं, अदरक के इस्तेमाल से भी हृदय संबंधी बीमारी बढ़ाने वाले जोखिम कारकों को कम किया जा सकता है। अदरक में मौजूद बायोएक्टिव कंपाउंड हानिकारक कोलेस्ट्रोल को कम करके अच्छे कोलेस्ट्रोल को बढ़ाता है।

10. इंफ्लेमेशन

हल्दी दूध में एंटीइन्फ्लेमेटरी गुण होते हैं, जो शरीर को इंफ्लेमेशन से लड़ने में मदद देते हैं। हल्दी में मौजूद करक्यूमिन कंपाउंड इंफ्लेमेशन की वजह से होने वाले गठिया और अन्य बीमारी जैसे चर्म रोग से बचाव करते हैं । इसे आयुर्वेदिक चिकित्सा में ‘प्राकृतिक एस्पिरिन’ के रूप में भी जाना जाता है, जो सूजन और दर्द को ठीक कर सकता है ।

11. मस्तिष्क स्वास्थ्य

हल्दी वाले दूध में मौजूद करक्यूमिन आपके मस्तिष्क स्वास्थ्य को बनाए रखने में मदद करता है। यह दिमाग से संबंधित अवसाद और अल्जाइमर (याददाश्त का जाना) के खतरे को कम करने में सहायक साबित हो सकता है। यह पार्किंसंस रोग (दिमागी विकार) को दूर करने में भी मदद कर सकता है ।

12. इम्यूनिटी

हल्दी दूध में मौजूद करक्यूमिन बतौर इम्यूनोमॉड्यूलेटरी एजेंट काम करता है। यह टी कोशिकाओं व बी कोशिकाओं समेत शरीर में मौजूद सभी स्वस्थ कोशिकाओं को बढ़ावा देने में मदद करता है। इन सभी कोशिकाओं की मदद से शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होने में मदद मिलती है। करक्यूमिन शरीर में एंटीबॉडी प्रतिक्रिया को भी बढ़ावा देता है, जिसकी मदद से हमारा शरीर कई बीमारियों जैसे गठिया, कैंसर, हृदय रोग, मधुमेह और अल्जाइमर से बचा रहता है । इसके अलावा, हल्दी वाले दूध के फायदे में आपको ठंड और गले की खराश से भी बचाना शामिल है ।

13. डिटॉक्स

ज्यादातर लोगों को तला-भूना, मसालेदार या फिर जंक फूड खाना बहुत पसंद है, जिसका सीधा असर लिवर पर पड़ता है। इसलिए, बॉडी को डिटॉक्सीफाई यानी शरीर में मौजूद विषाक्तता को हटाना जरूरी हो जाता है। ऐसे में हल्दी-दूध एक प्राकृतिक लिवर डिटॉक्सीफाई की तरह काम करता है, जिससे लिवर की कार्यप्रणाली तेज होती है ।

14. त्वचा स्वास्थ्य

धूल-मिट्टी व प्रदूषण की वजह से त्वचा की चमक लगातार फीकी पड़ने लगती है। साथ ही स्किन संक्रमण का भी खतरा बना रहता है। ऐसे में हल्दी-दूध आपकी त्वचा के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है। दमकती त्वचा के लिए आप हल्दी दूध का सेवन कर सकते हैं या फिर आप हल्दी दूध में रूई भिगोकर चेहरे पर लगा सकते हैं, जिससे आपका चेहरा दमकता रहेगा। इसके अलावा, इसमें मौजूद करक्यूमिन (curcumin) आपको स्किन कैंसर और अन्य संक्रमण से बचाता है। साथ ही त्वचा पर बुरा प्रभाव डालने वाले बैक्टीरिया से भी लड़ने में मदद करता है ।






पुनर्नवारिष्ट के फायदे और उपयोग



पुनर्नवारिष्ट एक आयुर्वेदिक दवा है जिसका उपयोग जिगर और सूजन संबंधी विकारों के इलाज के लिए किया जाता है। यह एक पॉलीहर्बल आयुर्वेदिक फार्मूला है जो शरीर को जिगर, तिल्ली, दिल, मूत्र प्रणाली और गुर्दे की बीमारियों से बचाने में मदद करता है। 5% से 7% प्राकृतिक अल्कोहल से युक्त इस दवा में मौजूद पानी शरीर को घुलनशील हर्बल तत्व भी देता है। इस आयुर्वेदिक दवा में हल्का-एनाल्जेसिक शरीर के सभी प्रकार के दर्द का एक इलाज है।

पुनर्नवारिष्ट के लाभ

प्राचीन काल से ही इस दवा का उपयोग किया जाता है, पुनर्नवारिष्ट(Punarnavarishta) आयुर्वेद परंपरा में सबसे प्रसिद्ध दवाओं में से एक है। कई बीमारियों का एक प्रभावी उपचार होने के अलावा इस दवा के कई अन्य लाभ भी हैं:
स्प्लीन और जिगर के विकार में मदद करता है
इसके औषधीय गुण जिगर को स्वस्थ रखने में मदद करते हैं क्योंकि पुनर्नवारिष्ट जिगर का एक टॉनिक है। यह स्प्लेनोमेगाली, हेपेटोमेगाली और हेपेटाइटिस जैसे विकारों से जिगर और स्प्लीन की रक्षा करता है। पुनर्नवारिष्ट एक एंटीवायरल और जीवाणुरोधी है जो कुछ बीमारियों के लिए जिम्मेदार वायरस को मारता है।
एनीमिया को ठीक करने में मदद करता है
पुनर्नवारिष्टएक सप्लीमेंट है जो भूख की हानि और कमजोरी से पीड़ित एनीमिक रोगियों की मदद करता है। यह लाल रक्त कोशिकाओं के बनने में मदद करता है। लेकिन एनेमिक रोगियों को इसके साथ आयरन की खुराक लेना भी जरूरी है।
फैटी लीवर को ठीक करता है
इसमें औषधीय गुण होते हैं जो फैटी लीवर यानि हेपेटिक स्टीटोसिस को ठीक करने में मदद करते हैं। पुनर्नवारिष्ट अल्कोहलिक और एंटी-अल्कोहलिक फैटी लीवर दोनों रोगों के लिए ही प्रभावी है।
गाउट के प्रभाव को कम करता है
पुनर्नवारिष्टगाउट के लिए एक अच्छे उपाय के रूप में काम करता है और खून में यूरिक एसिड के लेवल को नीचे लाता  है। आयुर्वेदिक चिकित्सा गुर्दे के माध्यम से यूरिक एसिड के निकलने को बढ़ाती है और गाउट जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं को रोकती है।
भूख बढ़ाता है
कहा जाता है कि पुनर्नवारिष्ट में हल्के लेक्सेटिव गुण होते हैं जो बदले में भूख बढ़ाते हैं।
त्वचा के रोगों को रोकता है
इसमें कुछ हर्बल गुण होते हैं जिन्हें ल्यूकोडर्मा जैसे त्वचा के रोगों को ठीक करने के लिए जाना जाता है जो कि सफेद धब्बे या पैच की वजह होता है। पुनर्नवारिष्ट इन धब्बों को कम करने में मदद करता है और उपयोग करने के लिए काफी सुरक्षित है।
मूत्र पथ के इन्फेक्शन के उपाय
लोग अक्सर पेशाब करते समय जलन महसूस करते हैं। इस जलन को अक्सर मूत्र पथ का इन्फेक्शन कहा जाता है। पुनर्नवारिष्ट एक प्रभावी दवा है जो मूत्र को पास करते समय सूजन को कम करने में मदद करती है।
पुनर्नवारिष्ट के उपयोग
इसके कई स्वास्थ्य लाभों के अलावा पुनर्नवारिष्ट का भी उपयोग किया जाता है:
एंटी-आर्थ्राइटिक
यह एंटी-आर्थ्राइटिक दवा पुनर्नवारिष्ट गठिया को जन्म देने वाले लक्षणों को रोकने में मदद करता है। गाउट और अन्य गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के प्रभाव को कम करने के लिए प्रभावी यह दवा खून में यूरिक एसिड के स्तर को कम कर सकती है।
एंटी-हाइपरटेंसिव
उच्च रक्तचाप विरोधी गुण होने के कारण यह उच्च रक्तचाप जैसे हृदय रोगों के लक्षणों को कम करने के लिए पुनर्नवारिष्ट प्रभावी है।
एंटी-इंफ्लेमेटरी
एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट के रूप में काम करते हुए, पुनर्नवारिष्ट(Punarnavarishta) मूत्र पथ में इन्फेक्शन के कारण होने वाली जलन को कम करने में मदद करता है।
डियूरेटिक
एक मूत्रवर्धक के रूप में पुनर्नवारिष्ट वाटर रिटेंशन में आराम देने में मदद करता है। यह शरीर से पानी, नमक और विषाक्त पदार्थों को हटाने में प्रभावी पुनर्नवारिष्ट किडनी को स्वस्थ रखने की दिशा में काम करता है।
बिलीरुबिन को कम करता है
पुनर्नवारिष्ट बिलीरुबिन को कम करने के लिए एक सोर्स है जो एक पीला कंपाउंड है जो पित्त और मूत्र में पास होता है।
एनाल्जेसिक
पुनर्नवारिष्ट को एक हल्के-एनाल्जेसिक के रूप में जाना जाता है और इस प्रकार यह शरीर के सभी प्रकार के दर्द से आराम देने के लिए जाना जाता है।
कार्मिनेटिव
गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं में आराम देते हुए पुनर्नवारिष्ट एक बेहतरीन कार्मिनटिव है जो ब्लोटिंग को रोकता है और फैटी लिवर के दर्द को ठीक करता है।
पुनर्नवारिष्ट का उपयोग कैसे करें?
पुनर्नवारिष्ट को हर रोज़ दिन में दो बार दो चम्मच लिया जा सकता है। रोजाना पानी के साथ इसे लेने से अच्छे परिणाम दिखाई देते हैं|
क्या पुनर्नवारिष्टको भोजन से पहले या भोजन के बाद लिया जा सकता है?
पुनर्नवारिष्ट का सेवन पानी के साथ भोजन के बाद किया जा सकता है।
क्या पुनर्नवारिष्टको खाली पेट लिया जा सकता है?
नहीं, खाली पेट पुनर्नवारिष्ट का सेवन न करें।
क्या पुनर्नवारिष्ट को पानी के साथ लिया जा सकता है?
हाँ, पुनर्नवारिष्ट को पानी के साथ लिया जा सकता है।
पुनर्नवारिष्ट की खुराक
सुरक्षित खुराक
पानी (भोजन के बाद) के साथ पुनर्नवारिष्ट के दो बड़े चम्मच लेना सबसे अच्छा माना जाता है। अच्छे परिणाम पाने के लिए इसे दैनिक रूप से दो बार लिया जा सकता है।
वयस्क 15 मि.लि. से 30 मि.लि. (1 से 2 चम्मच)
बच्चे 10 मि.लि.
पुनर्नवारिष्ट के साइड इफ़ेक्ट
इस दवा को 8 वर्ष से कम उम्र के बच्चों को नहीं देना चाहिए। वैसे तो पुनर्नवारिष्ट के कई स्वास्थ्य लाभ हैं लेकिन कुछ दुष्प्रभाव भी हैं जिनके बारे में सावधान रहना चाहिए:
जलन: यदि अधिक मात्रा में लिया जाता है, तो पुनर्नवारिष्ट के कारण पेट में हल्की जलन हो सकती है।
गैस्ट्रिक बेचैनी: पुनर्नवारिष्ट की ज्यादा खुराक गैस्ट्रिक असुविधा का कारण बन सकती है।
गर्भावस्था के लिए उपयुक्त नहीं: गर्भवती और स्तनपान कराने वाली महिलाओं को पुनर्नवारिष्ट के सेवन से बचना चाहिए।
डायरिया से पीड़ित लोगों के लिए यह उपयुक्त नहीं है|
सेंसिटिव पेट वाले लोगों को इससे बचना चाहिए।
पुनर्नवारिष्ट के हानिकारक इंटरेक्शन
पुनर्नवारिष्ट(Punarnavarishta) अन्य दवाओं, विटामिन और हर्बल सप्लीमेंट के साथ इंटरेक्शन कर सकता है इसलिए अपने रोजाना के भोजन में पुनर्नवारिष्ट को शामिल करने से पहले हमेशा डॉक्टर से सलाह लें|
पुनर्नवारिष्ट से सावधानियां और चेतावनी
क्या वाहन चलाने से पहले पुनर्नवारिष्ट का सेवन किया जा सकता है?
गाड़ी चलाने से पहले पुर्ननवृष्टि का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि इस दवा में कुछ मात्रा में प्राकृतिक अल्कोहल होती है जो मदहोश कर सकती है।
क्या पुनर्नवारिष्ट का सेवन अल्कोहल के साथ किया जा सकता है?
नहीं, पुनर्नवारिष्टको शराब के साथ नहीं लेना चाहिए क्योंकि पुनर्नवारिष्ट में पहले से ही प्राकृतिक रूप से पैदा हुई शराब की कुछ मात्रा होती है और शराब उनींदेपन को तेज कर सकती है।
क्या पुनर्नवारिष्ट नशे की लत है?
नहीं, पुनर्नवारिष्ट लत या आदत बनने वाली दवा नहीं है।
क्या पुनर्नवारिष्ट मदहोश कर सकती है?
हां, पुनर्नवारिष्ट आपको उनींदा महसूस करा सकती है।
क्या आप पुनर्नवारिष्ट को अधिक मात्रा में ले सकते हैं?
15 मि.ली. पानी के साथ 30 मि.ली. दवा ली जा सकती है| इस दवा को ज्यादा मात्रा में लेने से ऊपर बताये गये दुष्प्रभाव हो सकते हैं।
पुनर्नवारिष्ट किससे बना है?
पुनर्नवारिष्ट(Punarnavarishta) पुनर्नवा, बाला, पाठा, गिलोय, चित्रक, कंटकरी चतुरजत, सुगंधाबाला, मरिचा, धातकी पुष्पा और गुड़ (गुड़) से बना है।
भंडारण?
पुनर्नवारिष्ट को ठंडी और सूखी जगह पर रखने की सलाह दी जाती है।
जब तक अपनी स्थिति में सुधार ना दिखाई दे तब तक पुनर्नवाविष्ट का उपयोग करने की क्या जरूरत है?
पुनर्नवारिष्ट को नियमित रूप से लेने के एक सप्ताह के भीतर ही परिणाम दिखा सकते हैं और इसका उपयोग डॉक्टर द्वारा तय की जानी चाहिए।
पुनर्नवारिष्ट का उपयोग दिन में कितनी बार करने की जरूरत है?
आदर्श रूप से पुनर्नवारिष्ट को भोजन के बाद दिन में दो बार गुनगुने पानी के साथ लिया जा सकता है।
क्या पुनर्नवारिष्ट का स्तनपान कराने पर कोई प्रभाव पड़ता है?
हाँ, स्तनपान कराने वाली महिलाओं को इस दवा का उपयोग न करने की सलाह दी जाती है।
क्या पुनर्नवारिष्ट बच्चों के लिए सुरक्षित है?
बच्चों के लिए हर रोज़ 10 मि.ली. पुनर्नवारिष्ट का सेवन करना सुरक्षित है। लेकिन 8 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए इस दवा को बिलकुल नहीं लेना चाहिए।
क्या पुनर्नवारिष्ट का गर्भावस्था पर कोई प्रभाव पड़ता है?
यदि गर्भावस्था के दौरान इसे लिया जाए तो इसके दुष्प्रभाव हो सकते हैं। गर्भवती महिलाओं को इस दवा का उपयोग ना करने की सलाह दी जाती है।
क्या पुनर्नवारिष्ट में चीनी है?
हां, पुनर्नवारिष्ट में इसमें कुछ मात्रा में चीनी होती है।
किडनी की पथरी से आराम पाने के लिए कौन सी आयुर्वेदिक दवाएं इस्तेमाल की जाती हैं?
गुर्दे की पथरी से बचाव और आराम पाने के लिए कुछ सबसे अच्छी और सबसे ज्यादा इस्तेमाल की जाने वाली आयुर्वेदिक दवाएँ हैं- चंदनादि चूर्ण, श्वेत परपटी, पाषाणभेद वटी, चन्दनास्वा, पुनर्नवृष्टि, पंचा त्रिनमूल, कषाय, सिरप स्प्लिट स्टोन, वांगा भस्म, चंद्र प्रभा वटी, गोक्षुरादि गुग्गुल और बृहत्यादि कषायम् आदि।
बालों के झड़ने को कैसे रोक सकते हैं और स्वाभाविक रूप से बाल वापस कैसे बढ़ा सकते हैं?
बालों के झड़ने को रोकने और स्वाभाविक रूप से वापस बाल उगाने के सर्वोत्तम तरीकों में से एक आयुर्वेदिक परंपराओं में पाया जाता है। इस उद्देश्य के लिए पुनर्नवारिष्ट सबसे अच्छी प्राकृतिक दवाओं में  से एक है।

चन्दनासव के फायदे और उपयोग




चन्दनासव, शुक्रमेह, पेशाब में जलन, हृदय रोग, ताकत की कमी, इम्युनिटी की कमी, वज़न गिरना, पाचन की कमजोरी आदि में दी जाने वाली आयुर्वेदिक दवा है। चंदनासव एक स्वास्थ्य टॉनिक है। इस दवा तासीर में ठंडी है और शरीर में गर्मी को कम करती है।
चन्दनासव शुक्रमेहनाशक (पेशाब के साथ वीर्य जाना), बलकारक, पौष्टिक, ह्रद्य (ह्रदय पौष्टिक) और अत्यंत अग्निवर्धक है। पुराने सुजाक (Gonorrhoea) के रोगियों के लिये हितकारक है। इसके सेवन से रक्त में उत्पन्न मूत्रविष, मूत्र में जलन, मूत्र का अवरोध और मूत्रकृच्छ आदि विकार शांत हो जाते है।
चन्दनासव शीतवीर्य, बल्य, मूत्रल, जलन का शमन करने वाला और पित्तशामक है। तथा मूत्रमार्ग की दोषदुष्टि को नष्ट करता है। इसका उपयोग पुराने और नये सुजाक में उत्तम होता है। इसके योग से बार-बार मुत्रोत्सर्ग होते रहने से सुजाक के पूय (Puss) का शोधन होता रहता है। सुजाक की प्रथम अवस्था में मूत्रप्रसेक नलिका की श्लैष्मिक कला में प्रदाह (Irritation) होता है वह इस आसव के सेवन से कम होता है। फिर जलन सहित वेदना भी कम हो जाती है, तथा निमित्त कारण जो किटाणु (Gonococcus) है, उनका बल कम होता जाता है। यद्यपि किटाणु नष्ट होते है या नहीं, यह अभी निश्चित नहीं हुआ, तथापि इस आसव के योग से सुजाक की तीव्र अवस्था और चिरकारी अवस्था में लक्षण कम होते जाते है, यह निःसंदेह है।
चंदनासव में 26 हर्बल अवयव हैं जिनमें सैंडलवुड, सुगंधबाला, निलोफार, गांभारी, मोथा, मुनक्का, और मुलेथी आदि विशिष्ट समय अवधि के लिए गुड़ के समाधान में किण्वित होते हैं। ये घटक मूत्र रोगों के लक्षणों से छुटकारा पाने के लिए मूत्रवर्धक और एंटीसेप्टिक एजेंट के रूप में कार्य करते हैं।
चंदनासव गुर्दे की पथरी, पेशाब में दर्द, और हेमेटुरिया या मूत्र में रक्त से पीड़ित लोगों के लिए उपयोगी है। यह अनैच्छिक वीर्य हानि, गोनोरिया, जीवाणु यौन संक्रमित बीमारियों में भी उपयोगी है।
चन्दनासव के चिकित्सीय उपयोग |
चन्दनासव मुख्य रूप से पेशाब सम्बन्धी रोगों की दवा है। इसे निम्न रोगों में ले सकते हैं:
पेशाब में जलन बर्निंग मिक्टुरिशन
पथरी सिस्टिटिस
गोनोरिया
शुक्रमेह
मूत्र पथ विकार
नर प्रजनन प्रणाली के विकार
चन्दनासव के फायदे | 
चन्दनासव में चंदन है जो इसे तासीर में ठंडा आसव बनाता है । यह उत्कृष्ट पित्तशामक, जलन को कम करने वाला, शीतल, बनाता है। जलन कम करने के कारण इसे पेशाब की जलन में देते हैं। सिफलिस के शुरुआती चरणों में में भी इसे दिया जाता है। यह रक्त पित्त, रक्त प्रदर, श्वेतप्रदर में भी लाभप्रद है।
पेशाब रोगों में करे फायदा
चन्दनासव को पीने से पेशाब की जलन कम होती है। गुर्दे, मूत्राशय, या मूत्रमार्ग में संक्रमण में इसे पीने से फायदा होता है। जीवाणुरोधी गुण होने से यह बैक्टीरिया के खिलाफ कार्य करते हैं और संक्रमण को साफ़ करते हैं।
शुक्रमेह में करे लाभ
परंपरागत रूप से चन्दनासव का प्रयोग शुक्रमेह में किया जाता है। शुक्रमेह इस दवा का मुख्य संकेत है तथा इसे इंग्लिश में स्पर्मेटोरिया कहते हैं। धात गिरना, धात की समस्या, आदमियों का प्रमेह, गुप्त रोग, या धातु रोग आदि इसके अन्य नाम हैं। शुक्रमेह को पुरुषों का प्रमेह कहते है।
शुक्रमेह अर्थात वीर्य का अपने आप निकल जाना होता है। इस रोग में रोगी को पेशाब करते समय वीर्य भी निकल जाता है। इस रोग के वही कारण होते हैं जो स्वप्नदोष रोग होने के होते हैं।
ताकत में करे सुधार
चन्दनासव का उपयोग ताकत में सुधार के लिए भी किया जाता है। यह एक प्राकृतिक कार्डियक टॉनिक है। यह पाचन शक्ति में भी सुधार करता है। दीपक और पाचक होने से यह स्वास्थ्य को सही करने में सहयोगी है।
शरीर में गर्मी करे कम
चन्दनासव अतिरिक्त शरीर गर्मी से राहत देता है।
पाचन को बढाए
चन्दनासव, आसव है तथा इसमें दीपक और पाचक गुण है। इसे पीने से पाचक रसों का स्राव होता है जिससे पाचन ठीक से होने लगता है। यह पेट फूलना, सूजन, कब्ज, मतली, उल्टी, और अपचन से राहत प्रदान करता है।
दिल को दे ताकत
चन्दनासव, में हृदय को ताकत देने के गूं है।
चन्दनासव की खुराक और लेने का तरीका | 
चन्दनासव को आमतौर पर भोजन के बाद 12 – 24 मिलीलीटर, या आयुर्वेदिक डॉक्टर द्वारा निर्देशित खुराक में लिया जाता है। यदि कम डोज़ में सुधार नहीं हो रहा तो दवा की उपरी खुराक ली जा सकती है।
चन्दनासव की खाना खाने के बाद दिन में दो बार, पानी की बराबर मात्रा मिला कर लेना चाहिए।
7 साल से ऊपर के बच्चों में, इस दवा का उपयोग कम खुराक में करना सुरक्षित है।
चन्दनासव आमतौर पर 1 – 2 महीने ले सकते हैं तथा इसका उपयोग 3 से 4 महीने तक सुरक्षित रूप से किया जा सकता है।
चन्दनासव के नुकसान |
चन्दनासव काफी सुरक्षित दवा है।
डायबिटीज वाले मरीजों को इस दवा का उपयोग करते समय सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि इस दवा में मौजूद गुड़ और चीनी रक्त शर्करा के स्तर को बढ़ा सकती है।
गर्भावस्था और स्तनपान
गर्भावस्था में नहीं लें।
चन्दनासव दवा के निर्माता
बैद्यनाथ
डाबर
एवीपी
कोट्टाक्कल
आर्य वैद्य साला इत्यादि।
चन्दनासव के घटक द्रव्य | 
सफ़ेद चंदन 48 ग्राम
रक्त चन्दन 48 ग्राम
सुगंधबाला 48 ग्राम
गम्भारी 48 ग्राम
नागरमोथा 48 ग्राम
रास्ना 48 ग्राम
पर्पट 48 ग्राम
कचूर 48 ग्राम
मुलेठी 48 ग्राम
पटोलपत्र 48 ग्राम
कांचनारत्वक 48 ग्राम
मोचरस 48 ग्राम
आम्रत्वक 48 ग्राम
पद्मकाष्ठ 48 ग्राम
मंजिष्ठ 48 ग्राम
पाठा 48 ग्राम
पिप्पली 48 ग्राम
न्यग्रोध 48 ग्राम
चिरायता 48 ग्राम
प्रियंगपुष्प 48 ग्राम
लोध्रत्वक 48 ग्राम
नीलकमल पुष्प 48 ग्राम
द्राक्षा 960 ग्राम
धातकी पुष्प 768 ग्राम
गुड 2.4 किलो
शक्कर 4.8 किलो
मात्रा: 10 से 20 ml समान जल मिलाकर सुबह-शाम।


कनकासव के फायदे व उपयोग




श्वास एवं कास की एक प्रशिद्ध आयुर्वेदिक दवा है | कफज विकार जैसे श्वांस, खांसी, अस्थमा, सीने में कफ जमना आदि में इस दवा का प्रयोग किया जाता है | आयुर्वेद में आसव – अरिष्ट कल्पना के तहत इस आयुर्वेदिक सिरप का निर्माण किया जाता है | कनकासव सिरप का मुख्य घटक “कनक” अर्थात धतुरा है , इसके साथ ही वासा, कंटकारी एवं मधुक आदि कुल 14 घटक द्रव्य पड़ते है |
दमा, टीबी, रक्तपित, जीर्णज्वर आदि रोगों में इसका आमयिक प्रयोग किया जाता है | वैसे अस्थमा एवं क्षय रोग की यह उत्तम दवा है | इसमें धतूरे एवं वासा आदि के गुण होने के कारण दमे जैसे रोग के लिए अत्यंत लाभदायक सिद्ध होती है |
अगर आप कनकासव खरीदने की सोच रहें है तो बाजार में यह कई कंपनियों की उपलब्ध है | जैसे – बैद्यनाथ कनकासव, पतंजलि, डाबर, धुतपापेश्वर एवं श्री मोहता आदि फार्मेसी इसका निर्माण करती है | 
कनकासव के घटक द्रव्य 
इसके निर्माण में कुल 14 घटक द्रव्यों की आवश्यकता होती है | यहाँ हमने भैषज्य रत्नावली के अनुसार इसके घटक द्रव्यों की सूचि दी है | आयुर्वेदिक ग्रन्थ भैषज्य रत्नावली के हिक्का / श्वास चि. 115-119 में इसका वर्णन मिलता है |
इसके निर्माण में प्रयुक्त होने वाले औषध द्रव्य निम्न है –
धतुर (शा. मू. प. फ) -192 ग्राम
मुलेठी – 96 ग्राम
पिप्पली – 96 ग्राम
वासा – 96 ग्राम
कंटकारी – 96 ग्राम
नागकेशर – 96 ग्राम
भ्रंगी – 96 ग्राम
सौंठ – 96 ग्राम
तालिश पते – 96 ग्राम
धातकी पुष्प – 768 ग्राम
मुन्नका – 960 ग्राम
शहद – 2 . 400 किलोग्राम
शक्कर – 4. 800 किलोग्राम
जल – 24. 576 किलोग्राम
कनकासव बनाने की विधि 
इसका निर्माण आयुर्वेद की आसव कल्पना विधि से ही किया जाता है | आसव कल्पना द्रव्यों को संधानित करने की ही प्रक्रिया होती है, जिसमें औषध द्रव्यों का बैगर क्वाथ निर्माण किये सीधा ही संधान किया जाता है | इस आयुर्वेदिक सिरप के निर्माण के लिए सबसे पहले ऊपर बताये गए क्रम संख्या 1 से 10 तक के द्रव्यों को लेकर इनका यवकूट (जौ के सामान) चूर्ण कर लिया जाता है |
मुन्नका (दाख) को भी कूटकर रख लिया जाता है | अब संधान पात्र (मिटटी का घड़ा) में शुद्ध जल डालकर उसमे शर्करा एवं शहद को अच्छी तरह मिला लिया जाता है | फिर बाकी सभी द्रव्यों के चूर्ण को डालकर पात्र का मुख अच्छी तरह बंद कर दिया जाता है | महीने भर तक इस पात्र को रख दिया जाता है | अंत में संधान परिक्षण से परीक्षित करके (उचित संधान होने पर) बोतलों में भर कर रखा जाता है |
इस प्रकार से कनकासव का निर्माण होता है | आयुर्वेद की आसव कल्पना के तहत बनी सभी दवाओं का निर्माण इसी प्रकार से होता है बस उनके द्रव्यों का परिवर्तन होता रहता है |
आयुर्वेदिक आसव एवं अरिष्ट में अंतर
आपने आयुर्वेद की बहुत सी दवाओं के नाम सुने होंगे | जैसे अशोकारिष्ट, द्राक्षारिष्ट, दश्मुलारिष्ट , चन्दनासव, कनकासव, द्राक्षासव आदि | इनमें से कुछ के नाम के अंत में अरिष्ट शब्द लगा है एवं कुछ के नाम के अंत में आसव शब्द आया है | इन दोनों प्रकार की दवाओं के निर्माण में कुछ भिन्नता होती है | आसव एवं अरिष्ट में क्या अंतर है ?
आसव विधि के तहत तैयार होने वाली सिरप में इसके घटकों का सीधा ही प्रयोग होता है अर्थात पहले क्वाथ का निर्माण नही किया जाता | लेकिन अरिष्ट नाम आने वाली सभी आयुर्वेदिक दवाओं में इसके घटक द्रव्यों से पहले क्वाथ का निर्माण किया जाता है अर्थात संधान (किण्वन की विधि) में क्वाथ का ही प्रयोग होता है |
कनकासव की खुराक या सेवन विधि 
इसका सेवन भोजन करने के पश्चात 12 से 24 मिली की मात्रा में करना चाहिए | सेवन करते समय बराबर मात्रा में गुनगुने जल का प्रयोग किया जाना चाहिए | रोग एवं रोगी की प्रकृति के आधार पर वैद्य इसकी खुराक निर्धारित करते है | अत: सेवन से पहले निपुण वैद्य से परामर्श लेना आवश्यक है |
कनकासव के फायदे या स्वास्थ्य लाभ / Health Benefits of Kankasava in Hindi
अस्थमा रोग में यह सर्वाधिक उपयोगी है |
खांसी एवं जमे हुए कफ में इसके सेवन से लाभ मिलता है |
टी.बी. रोग में भी इसका सेवन फायदेमंद होता है |
यह छाती में जमे हुए कफ एवं संक्रमण को दूर करने में लाभदायक आयुर्वेदिक दवा है |
रक्तपित की समस्या में इसका आमयिक प्रयोग बताया गया है |
जीर्ण ज्वर एवं क्षतक्षीण में भी इसका सेवन बताया गया है |
पाचन को सुधारती है |
आमपाचन का कार्य करती है |

कनकासव के फायदे उपयोग-
कनकासव फेफड़ों में जमे हुए कब को बाहर निकाल कर खांसी को ठीक करता है ।
वृद्धजनों में फेफड़ों की कमजोरी की वजह से होने वाला अस्थमा में
राजयक्ष्मा ट्यूबरक्लोसिस के रोगी भी इसका उपयोग करके स्वास्थ्य लाभ ले सकते हैं ।
पथरी के कारण होने वाले दर्द में भी कनकासव का प्रयोग किया जाता है । क्योंकि इसमें दर्द निवारक एवं सुजन को कम करने वाले गुण पाए जाते हैं ।
चिकित्सक अपने युक्ति के अनुसार कई रोगों में इसका प्रयोग करते हैं । जैसे उदरशूल

खादिरारिष्ट के फायदे

 


खादिरारिष्ट एक पाली हर्बल तरल आयुर्वेदिक दवा है। इसे वैकल्पिक रूप से खादिरारिष्टटम और खादिरारिष्ट नामों से भी पुकारा जाता है। इस हर्बल तरल बनाने की प्रक्रिया के दौरान फर्मेंटेशन के कारण इस आयुर्वेदिक तरल में 5 से 10% अल्कोहल होता है। खादिरारिष्ट तरल गहरे भूरे रंग का होता है और यह बिना किसी झाग के साफ हो जाता है। इसका स्वाद कसैला होता है। यह आयुर्वेदिक फार्मूला त्वचा, खून और आंतों पर एक शक्तिशाली प्रभाव डालता है और विशेष रूप से इन अंगों से संबंधित विकारों का इलाज करता है।

त्वचा के लिए लाभ

मुँहासे या दाने का उपचार

  • खादिरारिष्ट मुंहासों में बैक्टीरिया के बढने को रोकता है और ठीक होने को तेज करता है। यह खून को साफ़ करता है, विषाक्त पदार्थों के बनने को कम करता है और मुँहासे को रोकने वाले बैक्टीरिया के विकास को रोकता है।
  • खादिरारिष्ट मवाद से भरे गांठ या सिस्टिक घावों, व्हाइटहेड्स और ब्लैकहेड्स के खिलाफ भी प्रभावी है।
  • यह तेल के बनने को कम करता है जो मुंहासों और फुंसियों का मुख्य कारण है।

एटोपिक डर्माटाईटिस का इलाज करता है

खादिरारिष्ट एटोपिक त्वचा की सूजन या एक्जिमा का इलाज करता है, खासकर जब यह खुजली, त्वचा से रिसाव, पपड़ीदार त्वचा, पपड़ी के बनने आदि जैसे लक्षणों के साथ बनी रहती है।

खून को साफ़ करता है

  • खादिरारिष्ट में खून साफ़ करने वाले गुण होते हैं जो त्वचा की स्थिति और पुराने त्वचा रोगों जैसे ल्यूकोडर्मा, कुष्ठ रोग, दाद, सोरायसिस आदि का इलाज करते हैं।
  • त्वचा के रोगों के इलाज में खादिरारिष्ट के मुख्य तत्व खदिरा की प्रभावशीलता का 1969 में डॉ. ओझा जैसे कई वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया।

एंटी इंफ्लेमेटरी एक्टिविटी

खादिरारिष्ट के इंफ्लेमेटरी गुण त्वचा की कई समस्याओं को ठीक कर सकते हैं|

एक शोध लेख जो 1973 में इंडियन जर्नल ऑफ फार्माकोलॉजी में पब्लिश हुआ था उसमें दवादारु के एंटी इंफ्लेमेटरी कार्रवाई दिखाई गई थी जो खादिरारिष्ट का दूसरा सबसे प्रचुर घटक है।

खादिरारिष्ट के स्वास्थ्य लाभ

सांस संबंधी समस्याओं का समाधान करता है

यह अस्थमा, जुकाम जैसी सांस की समस्याओं का समाधान करता है। यह उन लक्षणों को दूर करने में उपयोगी है जैसे वायुमार्ग का संकुचित होना, ब्रोन्कियल कंजेशन, सांस की तकलीफ आदि।

अच्छा पाचन स्वास्थ्य

खादिरारिष्ट एक रेचक के रूप में काम करता है और कब्ज के उपचार में भी मदद करता है क्योंकि यह मल को नरम बनाता है। यह अपने कृमिनाशक गुणों के कारण आंतों के टैपवर्म, राउंडवर्म को खत्म करने के लिए भी प्रभावी है।

लिवर के विकार का इलाज करता है

खादिरारिष्ट विषाक्त पदार्थों को हटाकर जिगर को साफ करता है। यह पीलिया और स्प्लेनोमेगाली के उपचार में भी सहायक है। यह जिगर को अल्कोहल के विषैले प्रभावों से बचाता है और इसमें मौजूद लिवर सिरोसिस और लीवर कार्सिनोमा रोकता है।

हार्ट का टॉनिक

खादिरारिष्ट ट्राइग्लिसराइड को कम करने और एचडीएल की गतिविधि को बढ़ाने में सहायक है जो दिल को स्वस्थ बनाए रखने में सहायक है। यह हाइपरट्रिग्लिसराइडिमिया और हाइपरकोलेस्ट्रोलेमिया और अन्य हृदय विकारों जैसी स्थितियों का भी इलाज करता है।

खादिरारिष्ट के उपयोग

खादिरारिष्ट के असंख्य लाभ हैं और इसका उपयोग कई तरह की स्वास्थ्य समस्याओं को ठीक करने के लिए किया जाता है। यहाँ खादिरारिष्ट के कुछ उपयोग बताये गए हैं जिन पर जरूर ध्यान देना चाहिए।

एंटी-माइक्रोबियल

खादिरारिष्ट एक आयुर्वेदिक एजेंट है जो सूक्ष्मजीवों को मारने से रोकने में मदद करता है। यह मानव शरीर को विभिन्न बीमारियों और हानिकारक बैक्टीरिया से बचाने में मदद करता है।

एंटीऑक्सीडेंट

खादिरारिष्ट एक एंटीऑक्सिडेंट के रूप में काम करता है जो शरीर से हानिकारक मुक्त कणों को हटाने में मदद करता है। यह इन्फेक्शन के खतरे को कम करने में मदद करता है और मेटाबोलिज्म को कण्ट्रोल करता है।

एंटी इंफ्लेमेटरी

यह मानव शरीर में एक एंटी-इंफ्लेमेटरी एजेंट के रूप में काम करता है। खादिरारिष्ट एक एंटी-इंफ्लेमेटरी पदार्थ है जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को दर्द के लक्षण को रोकने के लिए प्रभावित करता है।

डेटोक्सिफायर

खादिरारिष्ट खून को साफ़ करने में मदद करता है जो पुराने त्वचा के रोगों जैसे दाद, सोरायसिस, ल्यूकोडर्मा का इलाज करने में मदद करता है। यह खून को डेटोक्स करता है जो त्वचा पर मुहांसों के प्रकोप को कम करने में मदद मिलती है।

कृमिनाशक

कृमिनाशक होने के नाते खादिरारिष्ट शरीर में पलने वाले परजीवी कीड़े और अन्य परजीवियों को बाहर निकालने में मदद करता है। यह शरीर से आंतों के टैपवर्म और राउंडवर्म के विकास को भी खत्म करता है।

खादिरारिष्ट के अन्य औषधीय उपयोग

  • एंटी-एलर्जिक
  • एंटी-प्रुरिटिक्स
  • हेप्टोप्रोटेक्टिव
  • एंटी-हिस्टामिनिक
  • खादिरारिष्ट का उपयोग कैसे करें

    खादिरारिष्ट की अधिकतम खुराक 60 मि.ली. से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। खादिरारिष्ट को काम करने के लिए पानी और खुराक के साथ लेना चाहिए।

  • क्या खादिरारिष्ट भोजन से पहले या बाद में लिया जा सकता है?

    भोजन के बाद गर्म पानी के साथ खादिरिष्ट का सेवन करना चाहिए।

    क्या खादिरारिष्ट को खाली पेट लिया जा सकता है?

    खादिरारिष्ट को खाली पेट नहीं लेना चाहिए। लेकिन खादिरारिष्ट लेने के बारे में अपने आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह लेना उचित है।

    क्या खादिरारिष्ट को पानी के साथ लिया जा सकता है?

    हां, खादिरारिष्ट को इसकी तय की गयी खुराक में गर्म पानी के साथ लिया जा सकता है।

  • खादिरारिष्ट की खुराक

    इसे भोजन के तुरंत बाद गुनगुने पानी में मिलाकर लिया जा सकता है।

    बच्चे5 से 10 मि.ली. (1 से 2 चम्मच)
    वयस्क10 से 20 मि.ली. (2 से 4 चम्मच)
    वृद्धावस्था10 से 20 मि.ली. (2 से 4 चम्मच)

    खादिरारिष्ट की अधिकतम खुराक 60 मि.ली. से ज्यादा नहीं होनी चाहिए।

  • खादिरिष्ट के प्रभाव

    हल्की जलन और खुजली

    खादिरारिष्ट को यदि जरूरी मात्रा से ज्यादा लिया जाए तो शरीर में हल्की जलन और खुजली पैदा हो सकती है। भोजन के बाद खादिरारिष्ट ना लेने से इससे बचा जा सकता है।

    गैस्ट्रिटिस बेचैनी

    कुछ लोगों में यह गैस्ट्रिटिस असुविधा का कारण हो सकती है जो इसकी ज्यादा खुराक लेने के कारण संभव होता है।

    सीने की जलन

    ज्यादा मात्रा में इसका सेवन करने पर खादिरारिष्ट सीने में जलन पैदा कर सकता है।

    गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलायें ना लें

    गर्भवती या स्तनपान कराने वाली महिलाओं को खादिरारिष्ट लेने से बचना चाहिए। इनका सेवन करने से पहले उन्हें आयुर्वेद चिकित्सक से सलाह करनी चाहिए।

     खादिरारिष्ट से बचाव और चेतावनी

    क्या गाड़ी चलाने से पहले खादिरारिष्ट लिया जा सकता है?

    हां, गाड़ी चलाने से पहले खादिरारिष्ट लिया जा सकता है।

    क्या खादिरारिष्ट को शराब के साथ लिया जा सकता है?

    खादिरारिष्ट को केवल चिकित्सकीय देखरेख में ही लिया जाना चाहिए। शराब के साथ इसे नहीं लेना चाहिए।

    क्या खादिरारिष्ट नशे की लत है?

    खादिरारिष्ट नशे की लत नहीं है। लेकिन डॉक्टर की सलाह के बिना किसी भी आयुर्वेदिक दवा को खुद नहीं लेना चाहिए।

    क्या खादिरारिष्ट मदहोश कर सकता है?

    खादिरारिष्ट नीरस महसूस नहीं करा सकते। यदि आप इसे लेने के बाद मदहोशी का अनुभव करते हैं तो ऐसे मामले में अपने डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।

    क्या आप खादिरारिष्ट को ज्यादा मात्रा में ले सकते हैं?

    खादिरारिष्ट की अधिकतम खुराक हर रोज़ 60 मि.ली. से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। खादिरारिष्ट को गैस्ट्रिक समस्या और पेट दर्द जैसे दुष्प्रभाव हो सकते हैं।


     खादिरारिष्ट के बारे में महत्वपूर्ण प्रश्न उत्तर

    दाद का आयुर्वेदिक इलाज क्या है?

    खादिरारिष्ट में एंटी-इंफ्लेमेटरी और एंटी-बैक्टीरियल गुण होते हैं जो दाद को ठीक करने में मदद करते हैं। यह त्वचा पर जलन, खुजली और पपड़ी के बनने को कम करने में भी मदद करता है।

    पिंपल्स और मुंहासों के लिए सबसे अच्छी आयुर्वेदिक दवा क्या है?

    खादिरारिष्ट त्वचा पर तेल के बनने को कम करने में मदद करता है जो मुंहासों और मुँहासे का मुख्य कारण है। यह शरीर से विषाक्त पदार्थों को कम करता है और त्वचा पर बैक्टीरिया की बढने को कम करता है।

    सोरायसिस के लिए सबसे अच्छी आयुर्वेदिक दवा कौन सी है?

    सोरायसिस के लिए एलो वेरा और खादिरारिष्ट सबसे अच्छी आयुर्वेदिक दवा हैं। उनमे खून साफ़ करने वाले गुण होते हैं जो पुरानी त्वचा रोगों जैसे ल्यूकोडर्मा, कुष्ठ रोग, सोरायसिस आदि का इलाज कर सकते हैं।

    ल्यूकोडर्मा के लिए सबसे अच्छा इलाज क्या है?

    मंजिष्ठा, एलो वेरा, त्रिफला और खादिरिष्ट कुछ आयुर्वेदिक दवाएं हैं जो ल्यूकोडर्मा के इलाज में मदद करती हैं। वे प्रतिरक्षा प्रणाली को संतुलित करने में मदद करते हैं और त्वचा रोगों को तेज करते हैं

  • आयुर्वेदिक दवा खादिरारिष्ट पारंपरिक रूप से पीलिया, एनीमिया और भूकंप के झटके ठीक करने के साथ हृदय रोगों के लिए प्रयोग किया जाता है। यूरोपियन जर्नल ऑफ़ फ़ार्मास्यूटिकल एंड मेडिकल रिसर्च ने हृदय रोगों को ठीक करने में खादिरारिष्ट की हृदय संबंधी गतिविधियों के मूल्यांकन पर एक अध्ययन किया। इस अध्ययन के कारण ने हृदय की स्थिति के इलाज में खादिरारिष्ट की भूमिका को प्रमाणित किया।