8.2.17

कनेर के गुण लाभ उपयोग :Benefits of using kaner

  




    कनेर का पेड़ भारत में लगभग हर जगह देखा जा सकता है। यह सदाहरित झाड़ी है जो हिमालय में नेपाल से लेकर पश्चिम के कश्मीर तक, गंगा के ऊपरी मैदान और मध्यप्रदेश में बहुतायत से पाई जाती है। अन्य प्रदेशों में यह कम पाई जाती है। परंतु संपूर्ण भारत में अपने  दिखावटी फूलों के लिए यह दिन प्रतिदिन लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। यह चारदीवारी के किनारे या बाग में उगाया जाता है। कनेर के फूलों के गुच्छे मई से अक्टूबर तक बहुतायत में खिलते रहते हैं। इसे रेगिस्तान का गुलाब भी कहते हैं।
कनेर के पौधे की संरचना :-
 कनेर का पौधा एक झाड़ीनुमा होता है | इसकी ऊंचाई 10 से 12 फुट की होती है | कनेर के पौधे की शखाओं पर तीन – तीन के जोड़ें में पत्ते लगे हुए होते है | ये पत्ते 6 से ९ इंच लम्बे एक इंच चौड़े और नोकदार होते है | पीले कनेर के पौधे के पत्ते हरे चिकने चमकीले और छोटे होते है | लेकिन लाल कनेर और सफेद कनेर के पौधे के पत्ते रूखे होते है |
कनेर के पौधे को अलग – अलग स्थान पर अलग अलग नाम से जाना जाता है | जैसे :-
१. संस्कृत में :- अश्वमारक , शतकुम्भ , हयमार ,करवीर
२. हिंदी में :- कनेर , कनैल
३. मराठी में :- कणहेर
४. बंगाली में :- करवी
५. अरबी में :- दिफ्ली
६. पंजाबी में :- कनिर
७. तेलगु में :- कस्तूरीपिटे
आदि नमो से जाना जाता है |
औषधि के रूप में सफेद कनेर का प्रयोग ही सबसे अधिक होता है। कनेर के पेड़ को कुरेदने या तोड़ने से एक सफेद द्रव्य निकलता है जिसका प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि कनेर के पेड़ इतने जहरीले होते हैं कि सांप भी इसके आस-पास नहीं आते।


गुण-
कनेर का रस कटु, तीखा, कषैला, लघु, रूखा व गर्म होता है। इसका पका फल कडुवा होता है। यह कुष्ठ, त्वचा रोग, घाव, खुजली, कीड़े, बुखार, पामा, गर्मी, वात रोग, लकवा एवं उपदंश रोग को दूर करता है। इसका प्रयोग कुत्ते के जहर को उतारने और आंखों के रोग दूर करने के लिए भी किया जाता है।
विभिन्न रोगों में उपचार-
घाव:
कनेर के सूखे हुए पत्तों का चूर्ण बनाकर घाव पर लगाने से घाव जल्द भर जाते हैं।
फोड़े-फुंसियां:
कनेर के लाल फूलों को पीसकर लेप बना लें और यह लेप फोड़े-फुंसियों पर दिन में 2 से 3 बार लगाएं। इससे फोड़े-फुंसियां जल्दी ठीक हो जाते हैं।
दाद:
कनेर की जड़ को सिरके में पीसकर दाद पर 2 से 3 बार नियमित लगाने से दाद रोग ठीक होता है।
*कनेर के पत्ते, आंवला का रस, गंधक, सरसों का तेल और मिट्टी के तेल को मिलाकर मलहम बना लें। इस मलहम को दाद पर लगाने से दाद खत्म होता है।
लाल या सफेद फूलों वाली कनेर की जड़ को गाय के पेशाब में घिसकर लगाने से दाद ठीक होता है। इसका लेप बवासीर व कुष्ठ रोग को ठीक करने के लिए भी किया जाता है।
सांप, बिच्छू का जहर:
सफेद कनेर की जड़ को घिसकर डंक पर लेप करने या इसके पत्तों का रस पिलाने से सांप या बिच्छू का जहर उतर जाता है।


हृदय शूल :-
 कनेर के पौधे की जड़ की छाल की 100 से 200 मिलीग्राम की मात्रा को भोजन के बाद खाने से हृदय की वेदना कम हो जाती है |
बवासीर:
कनेर और नीम के पत्ते को एक साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को बवासीर के मस्सों पर प्रतिदिन 2 से 3 बार लगाएं। इससे बवासीर के मस्से सूखकर झड़ जाते हैं।
कनेर की जड़ को ठंडे पानी के साथ पीसकर दस्त के समय जो अर्श (बवासीर) बाहर निकल आते हैं उन पर लगाएं। इससे बवासीर रोग ठीक होता है।
नंपुसकता:
सफेद कनेर की 10 ग्राम जड़ को पीसकर 20 ग्राम वनस्पति घी के साथ पका लें। इस तैयार मलहम को लिंग पर सुबह-शाम लगाने से नुपंसकता दूर होती है।
सफेद कनेर की जड़ की छाल को बारीक पीसकर भटकटैया के रस के साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को 21 दिनों के अंतर पर लिंग की सुपारी छोड़कर बांकी लिंग पर लेप करने से नपुंसकता खत्म होती है।
जोड़ों का दर्द:
लाल कनेर के पत्तों को पीसकर तेल में मिलाकर लेप बना लें और इस लेप को जोड़ों पर लगाएं। इसे लेप को सुबह-शाम जोड़ों पर लगाने से दर्द में आराम मिलता है।
धातुरोग:
सफेद कनेर के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से धातुरोग एवं गर्मी से होने वाले रोग आदि ठीक होता है।
अंडकोष की खुजली:
सफेद या लाल फूल वाली कनेर की जड़ को तेल में पका लें और इस तेल को अंडकोष की खुजली पर लगाएं। इससे अंडकोष की खुजली दूर होती है और फोडे़-फुंसी भी मिट जाते हैं।
अंडकोष की सूजन:
सफेद कनेर के पत्ते को कांजी के साथ पीसकर हल्का गर्म करके अंडकोष पर बांधे। इससे अंडकोष की सूजन दूर होती है।


दांतों का दर्द:
सफेद कनेर की डाल से प्रतिदिन 2 बार दातून करने से दांत का दर्द ठीक होता है और दांत मजबूत होते हैं।
बालों का सफेद होना:
सफेद और लाल कनेर के पत्ते को दूध में पीसकर सिर में लगाने से बालों का सफेद होना (पलित रोग) कम होता है। पीले रंग के फूल वाले कनेर का प्रयोग ज्यादा लाभकारी है।
बालों का गिरना:
कनेर की जड़, दंती व कड़वी तोरई को एक साथ पीसकर केले के रस व तेल के साथ पका लें। इस तैयार लेप को सिर पर लगाने से बालों का गिरना बंद होता है।
अफीम की आदत:
अफीम की आदत छुड़ाने के लिए 100 मिलीग्राम कनेर की जड़ को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ कुछ हफ्ते तक नियमित सेवन कराने से अफीम की आदत छूट जाती है।
कुत्ता काट लेने पर:
सफेद कनेर की जड़ की छाल का बारीक चूर्ण बनाकर 60 मिलीग्राम की मात्रा में 4 चम्मच दूध में मिलाकर दिन में 2 बार एक हफ्ते तक रोगी को पिलाएं। इससे कुत्ते का जहर उतर जाता है।
दर्द व सूजन:
शरीर का कोई भी अंग सूजन जाने पर लाल या सफेद फूल वाले कनेर के पत्तों का काढ़ा बनाकर मालिश करें। इससे सूजन में जल्दी आराम मिलता है।
सूजन और दर्द को दूर करने के लिए लाल या सफेद फूल वाले कनेर की जड़ को गाय के मूत्र में पीसकर लगाएं। इससे सूजन व दर्द ठीक होता है।
उपदंश (सिफिलिस):
लाल फूल वाले कनेर की जड़ को पानी में घिसकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाने से लाभ होता है। इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर घाव को धोना भी लाभकारी होता है।
सफेद कनेर की जड़ को पानी में पीसकर उपदंश पर लगाने से घाव, सूजन, जलन व दर्द ठीक होता है।
कुष्ठ रोग (सफेद दाग):
200 ग्राम कनेर के पत्ते को एक बाल्टी पानी में उबाल लें और इस उबले पानी से नहाएं। इससे कुष्ठ (कोढ़) के जख्म समाप्त होते हैं।
*सफेद या लाल फूल वाले कनेर की जड़ को पीसकर गाय के पेशाब में मिलाकर कुष्ठ (कोढ़) पर लगाने से आराम मिलता है।
*सफेद कनेर के 100 ग्राम पत्ते को 2 लीटर पानी में उबालें। जब यह उबलते-उबलते 1 लीटर बचा रह जाए तो इसे छानकर एक बाल्टी पानी में मिलाकर नहाएं। प्रतिदिन इस तरह पानी तैयार करके कुछ महीनों तक नहाने से कुष्ठ रोग ठीक होता है।
*कनेर की जड़ की छाल का रस निकालकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाने से कोढ़ और अन्य त्वचा रोग समाप्त होते हैं।
*कनेर की जड़ की छाल को पानी के साथ घिसकर कुष्ठ (कोढ़) के दाग पर लगाने से दाग नष्ट होते हैं।
नासूर (पुराना घाव):
कनेर के पत्ते को छाया में सूखा लें और इसका चूर्ण बनाकर जख्म पर छिड़कें। इससे जख्म ठीक होता है।
और भी-


*कनेर के ताज़े – ताज़े फूल की ५० ग्राम की मात्रा को 100 ग्राम मीठे तेल में पीसकर कम से कम एक सप्ताह तक रख दें | एक सप्ताह के बाद इसमें 200 ग्राम जैतून का तेल मिलाकर एक अच्छा सा मिश्रण तैयार करें | इस तेल की नियमित रूप से तीन बार मालिश करने से कामेन्द्रिय पर उभरी हुई नस की कमजोरी दूर हो जाती है इसके साथ पीठ दर्द और बदन दर्द को भी राहत मिलती है |
*सफेद कनेर की पत्तिया छाया में सुखाकर महीन पीस लें। सिर में जिस भाग में दर्द हो उधर के नथूने में, उसमें से दो चावल के बराबर फूँक दे। इस क्रिया से नाक से खूब पानी गिरेगा और ढेर सारी छीकें आकर, आधासीसी में आराम हो जायेगा। माथे में बलगम या पानी रूक जाने से सिरदर्द होता है, उसमें भी इस क्रिया से लाभ होता है।
*लाल कनेर के फूल और नाम मात्र की अफीम दोनो को मिलाकर, पानी के साथ पीसकर, गर्म करके मस्तक पर लेप करने से, कुछ ही देर में सिर का भयानक दर्द और सर्दी जुकाम ठीक हो जाते हैं।
*कनेर के पत्तों को कड़वे तेल में भूनकर शरीर पर मलने से खुजली शान्त हो जाती है।
कनेर के पत्ते, गंधक, सरसों का तेल, मिêी का तेल इन सबका मरहम बनाकर लगाने से दाद कुछ ही दिनों में साफ हो जाते है।
कृमि रोग:-
 कनेर के पत्तों को तेल में पकाकर घाव पर बांधने से घाव के कीड़े मर जाते है |
सिर दर्द :-
 कनेर के फूल और आंवले को कांजी में पीसकर लेप बनाएं | इस लेप को अपने सिर पर लगायें | इस प्रयोग से सिर का दर्द ठीक हो जाता है |
नेत्र रोग :- 
आँखों के रोग को दूर करने के लिए पीले कनेर के पौधे की जड़ को सौंफ और करंज के साथ मिलाकर बारीक़ पीसकर एक लेप बनाएं | इस लेप को आँखों पर लगाने से पलकों की मुटाई जाला फूली और नजला आदि बीमारी ठीक हो जाती है |
दातुन :- 
सफेद कनेर की पौधे की डाली से दातुन करने से हिलते हुए दांत मजबूत हो जाते है | इस पौधे का दातुन करने से अधिक लाभ मिलता है |
हानिकारक प्रभाव -
कनेर एक प्रकार का जहर है जिसे खाने से फेफड़ों को नुकसान हो सकता है। इसके सेवन से हृदय और श्वास की गति रुक सकती है। अत: इसके प्रयोग औषधि के रूप में करते समय बेहद सावधानी रखनी चाहिए।

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