24.2.17

गले की खराश के उपचार,उपाय ,नुस्खे

  

   मौसम बदलते ही गले में खराश होना आम बात है। सामान्य शब्दों में गले में खराश, गले का संक्रमण है। आमतौर पर गले का संक्रमण वायरस या बैक्टीरिया के कारण होता है।
लेकिन ज्यादा गले की खराश वायरस के कारण होती है। यह कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाता है लेकिन यह जितने दिन रहता है काफी कष्ट देता है।
गले में खराश के लक्षण-- 
● 100.5 ड्रिगी F या 38 ड्रिगी सेल्सियस से अधिक बुख़ार होना
 ● गर्दन में सूजन होना
 ● गले में दर्द होन 
●निगलने में कठिनाई होना 
● पेट में दर्द होना 
● भूख न लगना होना
. भाप लेना
कई बार गले के सूखने के कारण भी गले में इंफेक्शन की शिकायत होती है। ऐसे में किसी बड़े बर्तन में गरम पानी करके तौलिया से मुंह ढककर भाप लें। ऐसा करने से भी गले की सिकाई होगी और गले का इंफेक्शन भी खत्म होगा। इस क्रिया को दिन में दो बार किया जा सकता है।
एंटी-इन्‍फ्लेमेटरीज
गले की खराश से निपटने के सबसे कारगर उपायों में से एक शायद आपके पास पहले से मौजूद हो। ये एंटी-इन्‍फ्लेमेटरीज दवायें दर्द तो दूर करती ही हैं साथ ही गले की सूजन और दर्द से भी राहत दिलातीं हैं। इन दवाओं के सेवन के बाद आप पहले से बेहतर महसूस करते हैं साथ ही यह आपके गले में होने वाली परेशानी को कम करने में मदद करती हैं।
जिन व्यक्तियों के गले में निरंतर खराश रहती है या जुकाम में एलर्जी के कारण गले में तकलीफ बनी रहती है, वह सुबह-शाम दोनों वक्त चार-पांच मुनक्का के दानों को खूब चबाकर खा लें, लेकिन ऊपर से पानी ना पिएं। दस दिनों तक लगातार ऐसा करने से लाभ होगा।
तरल पदार्थों का सेवन
हाइड्रेटेड रहें। शरीर में तरल पदार्थों की कमी, आपकी तकलीफ को बढ़ा सकती हैं। आपको बहुत मात्रा में पानी पीना चाहिए। इससे आपका मूत्र हल्‍का पीला अथवा बिल्‍कुल साफ रहेगा। यह आपकी श्‍लेष्‍मा झिल्‍ली को तर और बैक्‍टीरिया और अन्‍य एलर्जी पहुंचाने वाले तत्‍वों को दूर रखेगा। इससे आपका शरीर सर्दियों के लक्षणों से बेहतर तरीके से लड़ सकेगा। आप क्‍या पीना चाहते हैं यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है। पानी सबसे बेहतर है, लेकिन आप चाहें तो फ्रूट जूस भी पी सकते हैं।
.लाल मिर्च 
गले की खराश को ठीक करने के लिए लाल मिर्च भी बेहद फायदेमंद है। उपचार के लिए एक कप गरम पानी में एक चम्मच लाल मिर्च और एक चम्मच शहद मिलाकर पीएं।
*कच्चा सुहागा आधा ग्राम मुंह में रखें और उसका रस चुसते रहें। दो तीन घण्टों मे ही गला बिलकुल साफ हो जाएगा।
चिकन सूप
अगर आप मांसाहारी हैं, तो चिकन सूप आपके लिए काफी फायदेमंद रहेगा। यह गले की खराश और सूजन में काफी मदद करता है। शोरबे में मौजूद सोडियम में सूजन को कम करने वाले तत्त्‍व होते हैं। जब आप बीमार होते हैं, तो सूप का आपको अधिक फायदा मिलता है। जब गले में सूजन और दर्द हो, तो वहां से कुछ भी नीचे नहीं उतरता। ऐसे में सूप के रूप में जरूरी पोषक तत्‍व आपके शरीर में पहुंच जाते हैं। इससे आपको संक्रमण से लड़ने के लिए जरूरी ऊर्जा मिल जाती है।
*सोते समय एक ग्राम मुलहठी की छोटी सी गांठ मुख में रखकर कुछ देर चबाते रहे। फिर मुंह में रखकर सो जाए। सुबह तक गला साफ हो जायेगा। मुलहठी चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर लिया जाय तो और भी अच्छा रहेगा। इससे सुबह गला खुलने के साथ-साथ गले का दर्द और सूजन भी दूर होती है।
कफ ड्रॉप
कफ ड्रॉप को चूसना आपके लिए फायदेमंद हो सकता है। गोली चूसने से सेल्विया का निर्माण होता है, जो गले के अंदर जाकर वहां मौजूद खुशकी को दूर करता है। लेकिन, आपको ध्‍यान रखना चाहिए कि आप सख्‍त कैंडी का इस्‍तेमाल करें। आप ऐसे ब्रॉन्‍ड का इस्‍तेमाल कर सकते हैं, जो मैंथॉल अथवा मिंट से बनीं हों।
*रात को सोते समय सात काली मिर्च और उतने ही बताशे चबाकर सो जायें। बताशे न मिलें तो काली मिर्च व मिश्री मुंह में रखकर धीरे-धीरे चूसते रहने से बैठा गला खुल जाता है।
लौंग
लौंग का इस्तेमाल उपचार के लिए सदियों से होता आ रहा है। गले की खराश के उपचार के लिए लौंग को मुंह में रखकर धीरे धीरे चबाना चाहिए। लौंग एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर होती है जो गले के इंफेक्शन और सूजन को दूर करती है।
लाल मिर्च (Red chilli)-
गले की खराश को ठीक करने के लिए लाल मिर्च भी बेहद फायदेमंद है। उपचार के लिए एक कप गरम पानी में एक चम्मच लाल मिर्च और एक चम्मच शहद मिलाकर पीएं।
 अदरक
अदरक भी गले की खराश की बेहद अच्छी दवा है। अदरक में मौजूद एंटीबैक्टीरियल गुण गले के इंफेक्शन और दर्द से राहत देते हैं। गले की खराश के उपचार के लिए एक कप पानी में अदरक डाल कर उबालें। इसके बाद इसे हल्का गुनगुना करके इसमें शहद मिलाएं। इस पेय को दिन में दो से तीन बार पीएं। गले की खराश से आराम मिलेगा।
गरम पानी और नमक के गरारे
जब गले में खराश होती है तो सांस झिल्ली की कोशिकाओं में सूजन हो जाती है। नमक इस सूजन को कम करता है जिससे दर्द में राहत मिलती है। उपचार के लिए एक गिलास गुनगुने पानी में एक बड़ा चम्मच नमक मिलाकर घोल लें और इस पानी से गरारे करें। इस प्रक्रिया को दिन में तीन बार करें।
बेकिंग सोडा (Baking soda)-
गले की खराश दूर करने के लिए बेकिंग सोडा की चाय बेहद फायदेमंद है। कारण, बेकिंग सोडा में एंटी बैक्टीरियल (antibacterial) गुण होते हैं जो कि जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। इसके लिए एक गिलास गरम पानी में बेकिंग सोडा और नमक मिलाकर दिन में तीन बार गरारे करें।
मसाला चाय
लौंग, तुलसी, अदरक और काली मिर्च को पानी में डालकर उबालें, इसके बाद इसमें चाय पत्ती डालकर चाय बनाएं। इस चाय को गरम गरम ही पीएं। यह भी गले के लिए बेहद लाभदायक उपाय है जिससे गले में तुरंत आराम मिलता है।
लहसुन
लहसुन इंफेक्शन पैदा करने वाले जीवाणुओं को मार देता है। इसलिए गले की खराश में लहसुन बेहद फायदेमंद है। लहसुन में मौजूद एलीसिन जीवाणुओं को मारने के साथ ही गले की सूजन और दर्द को भी कम करता है। उपचार के लिए गालों के दोनों तरफ लहसुन की एक एक कली रखकर धीरे धीरे चूसते रहें। जैसे जैसे लहसुन का रस गले में जाएगा वैसे वैसे आराम मिलता रहेगा।
*काली मिर्च को 2 बादाम के साथ पीसकर सेवन करने से गले के रोग दूर हो जाते हैं।
*पानी में 5 अंजीर को डालकर उबाल लें और इसे छानकर इस पानी को गर्म-गर्म सुबह और शाम को पीने से खराब गले में लाभ होता है।
*गले में खराश होने पर सुबह-सुबह सौंफ चबाने से बंद गला खुल जाता है।

*1 कप पानी में 4-5 कालीमिर्च एवं तुलसी की थोंडी सी पत्तियों को उबालकर काढ़ा बना लें और इस काढ़े को पी जाए।
*रात को सोते समय दूध और आधा पानी मिलाकर पिएं। गले में खराश होने पर गुनगुना पानी पिएं।
*गुनगुने पानी में सिरका डालकर गरारे करने से भी गले के रोग दूर हो जाते है।
*पालक के पत्तों को पीसकर इसकी पट्टी बनाकर गले में बांधे। इस पट्टी को 15-20 मिनट के बाद खोल दें। इससे भी आराम मिलता है।

21.2.17

विदारीकंद के गुण ,औषधीय उपयोग





विदारीकंद (Vidarikand) का प्रयोग निम्नलिखित बीमारियों, स्थितियों और लक्षणों के उपचार, नियंत्रण, रोकथाम और सुधार के लिए किया जाता है:
बाल समस्याओं
त्वचा रोगों
नेत्र संक्रमण
एसिडिटी
रक्ताल्पता
पोस्ट वितरण गर्भाशय दर्द
मासिक धर्म संबंधी विकार
रजोनिवृत्ति सिंड्रोम
गर्भाशय कमजोरी
रक्तस्राव विकार
अत्यधिक गर्मी
आयुर्वेद के द्वारा यौन रोग, यौन दुर्बलता, आंशिक व नपुंसकता का सही रूप से इलाज किया जा सकता है।  

आयुर्वेद के अंदर मुख्य चिकित्सा ग्रंथ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता में संभोग शक्ति को बढ़ाने जैसे कार्य करने के अंदर आने वाला यौन विकार व यौन दुर्बलता से संबंध रखने वाले सभी कारण तथा अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग तरह की औषधि से इलाज करना बताया गया है। यदि यौन दुर्बलता का पूरे भरोसे व शांति के साथ इसका उपचार किया जाए तो इसका सम्पूर्ण इलाज किया जा सकता है।
*शीघ्रपतन की समस्या होने पर 50 ग्राम गोखरू, 50 ग्राम ताल मखाना, 50 ग्राम सतावर, 50 ग्राम विदारीकन्द, 50 ग्राम अश्वगंधा, 50 ग्राम विधारा, 50 ग्राम सफ़ेद चिरमिटी, 100 ग्राम मिश्री को मिलाकार बारीक़ चूर्ण बना लें. इस चूर्ण को 4-5 की मात्रा में सुबह नाश्ते और रात्रि भोजन के बाद लगातार 40 दिनों तक लेने से शीघ्रपतन की समस्या में लाभ मिलता है
*विदारीकन्द का चूर्ण 2.5 ग्राम को गूलर के 15 मिली रस में मिलाकर सुबह शाम दूध से लेने पर दीर्घ आयु पुरुष भी मैथुन में सक्षम हो जाते हैं !
*विदारीकन्द का चूर्ण 2.5 ग्राम को गूलर के 15 मिली रस में मिलाकर सुबह शाम दूध से लेने पर अधिक उम्र वाले पुरुष भी मैथुन में सक्षम हो जाते हैं !
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*लगभग 6 ग्राम की मात्रा में विदारीकन्द के चूर्ण को लगभग 10 ग्राम गाय के घी में और लगभग 20 ग्राम शहद में मिलाकर गाय के दूध के साथ लेने से शरीर में ताकत आती है। इसका सेवन लगातार 40 दिनों तक करना चाहिए।
वे आयुर्वेदिक योग जो यौन दौर्बल्य व नपुंसकता की स्थिति नही आने देते वाजीकारक योग कहलाते हैं।
वैद्यक चमत्कार चिन्तामणि नामक पुस्तक के अनुसार
सुन्दरि विदारिकायाः सम्यक् स्वरसेन भवति चूर्णम।
सर्पिः क्षौद्रसमेतं लीढ्वा रसिको दशांगना समयेत्।।

अर्थात विदारीकन्द को कूट पीस कर खूब बारीक चूर्ण करके इसे विदारीकन्द के ही रस में भिगो कर सुखा लें इस चूर्ण की एक चम्मच मात्रा में आधा चम्मच देशी घी और घी से तीन गुना यानि कि ढेड़ चम्मच शहद मिला कर चाट लें और ऊपर से एक गिलास मीठा कुनकुना दूध पी लें।इस प्रकार लगातार 60 दिन सेवन करने के उपरान्त यौन दौर्बल्य व नपुंसकता अवस्य ही मिट जाएगी।जो लोग शादी शुदा हैं उनके लिए यह योग नव यौवन प्रदान करने वाला है। यह बहुत ही सस्ता बनाने में सरल व शरीर को मजबूत व टिकाऊ बना देने वाला योग है ।

19.2.17

इमली के गुण,औषधीय उपयोग

   
 भारत में सभी गांवों में खूब ऊंचे, हरे-भरे फली से लदे झाड़ नजर आते है, जो 70-80 फुट तक ऊंचे रहते हैं। चारों ओर इसकी टहनियां होती है। इसके पत्ते हरे, छोटे और संयुक्त प्रकार के होते हैं। ये पत्ते खाने में खट्टे होते हैं। इसके पत्ते और फूल एक ही समय में आते हैं, इनसे झाड़ों की रौनक और भी बढ़ जाती है। इसकी झाड़ लंबी अवधि का दीर्घायु होती है। इसके सभी भागों का औषधि के रूप में उपयोग होता है। इमली का फल कच्चा हरा, पकने के बाद लाल रंग का हो जाता है। पकी इमली का स्वाद खट्टा-मीठा होता है। इसे खाने के बाद दांत तक खट्टे होने लगते हैं। एक इमली के फल में तीन से लेकर दस बीज निकलते हैं। ये बीज काले, चमकदार व बहुत कड़े होते हैं। पकी इमली का प्रयोग खट्टी सब्जी के लिये करते है। इसकी चटनी भी बनाते हैं। इससे सब्जी स्वादिष्ट बन जाती है। एक साल पुरानी इमली के गुण अधिक होते हैं। कच्ची तथा नयी पकी इमली कम गुणकारी होती है। कच्ची इमली खट्टी, भारी व वायुनाशक होती है। पकी इमली एसीडिटी कम करने वाली, कान्स्टीपेशन दूर करने वाली, गर्म तासीर वाली, कफ तथा वायुनाशक प्रकृति की होती है। सूत्री इमली हृदय के लिए हितकारी तथा हल्की तासीर की मानी जाती है। इससे थकान, भ्रम-ग्लानि दूर हो जाती है। इमली पित्तनाशक है, इमली के पत्ते सूजन दूर करने वाले गुणों से भरपूर होते हैं। इमली की तासीर ठंडी होती है। इसे कम प्रमाण में ही सेवन करने का फायदा होता है।
बहुमूत्र या महिलाओं का सोमरोग :
इमली का गूदा ५ ग्राम रात को थोड़े जल में भिगो दे, दूसरे दिन प्रातः उसके छिलके निकालकर दूध के साथ पीसकर और छानकर रोगी को पिला दे । इससे स्त्री और पुरुष दोनों को लाभ होता है । मूत्र- धारण की शक्ति क्षीण हो गयी हो या मूत्र अधिक बनता हो या मूत्रविकार के कारण शरीर क्षीण होकर हड्डियाँ निकल आयी हो तो इसके प्रयोग से लाभ होगा ।
अण्डकोशों में जल भरना :
लगभग ३० ग्राम इमली की ताजा पत्तियाँ को गौमूत्र में औटाये । एकबार मूत्र जल जाने पर पुनः गौमूत्र डालकर पकायें । इसके बाद गरम – गरम पत्तियों को निकालकर किसी अन्डी या बड़े पत्ते पर रखकर सुहाता- सुहाता अंडकोष पर बाँध कपड़े की पट्टी और ऊपर से लगोंट कस दे । सारा पानी निकल जायेगा और अंडकोष पूर्ववत मुलायम हो जायेगें ।
पीलिया या पांडु रोग :
इमली के वृक्ष की जली हुई छाल की भष्म १० ग्राम बकरी के दूध के साथ प्रतिदिन सेवन करने से पान्डु रोग ठीक हो जाता है।
आग से जल जाने पर :
इमली के वृक्ष की जली हुई छाल की भष्म गाय के घी में मिलाकर लगाने से, जलने से पड़े छाले व् घाव ठीक हो जाते है ।
पित्तज ज्वर :
इमली २० ग्राम १०० ग्राम पाने में रात भर के लिए भिगो दे। उसके निथरे हुए जल को छानकर उसमे थोड़ा बूरा मिला दे। ४-५ ग्राम इसबगोल की फंकी लेकर ऊपर से इस जल को पीने से लाभ होता है।


सर्प , बिच्छू आदि का विष :
इमली के बीजों को पत्थर पर थोड़े जल के साथ घिसकर रख ले। दंशित स्थान पर चाकू आदि से छत करके १ या २ बीज चिपका दे। वे चिपककर विष चूसने लगेंगे और जब गिर पड़े तो दूसरा बीज चिपका दें। विष रहने तक बीज बदलते रहे ।
खांसी :
टी.बी. या क्षय की खांसी हो (जब कफ़ थोड़ा रक्त आता हो) तब इमली के बीजों को तवे पर सेंक, ऊपर से छिलके निकाल कर कपड़े से छानकर चूर्ण रख ले। इसे ३ ग्राम तक घृत या मधु के साथ दिन में ३-४ बार चाटने से शीघ्र ही खांसी का वेग कम होने लगता है । कफ़ सरलता से निकालने लगता है और रक्तश्राव व् पीला कफ़ गिरना भी समाप्त हो जाता है 
ह्रदय में जलन :
पकी इमली का रस मिश्री के साथ पिलाने से ह्रदय में जलन कम हो जाती है ।
नेत्रों में गुहेरी होना :
इमली के बीजों की गिरी पत्थर पर घिसें और इसे गुहेरी पर लगाने से तत्काल ठण्डक पहुँचती है ।
चर्मरोग :
लगभग ३० ग्राम इमली (गूदे सहित) को १ गिलाश पानी में मथकर पीयें तो इससे घाव, फोड़े-फुंसी में लाभ होगा ।
उल्टी होने पर पकी इमली को पाने में भिगोयें और इस इमली के रस को पिलाने से उल्टी आनी बंद हो जाती है ।
भांग का नशा उतारने में :
नशा उतारने के लिये शीतल जल में इमली को भिगोकर उसका रस निकालकर रोगी को पिलाने से उसका नशा उतर जाएगा ।
खूनी बवासीर :
इमली के पत्तों का रस निकालकर रोगी को सेवन कराने से रक्तार्श में लाभ होता है ।
अगर किसी को चेचक हो गयी हो तो इमली के पत्ते और हल्दी को पानी में पीस कर शरबत बनाएं और रोगी को चीनी या नमक मिला कर पिला देने से बहुत आराम मिलता है।
शीघ्रपतन :
लगभग ५०० ग्राम इमली ४ दिन के लिए जल में भिगों दे । उसके बाद इमली के छिलके उतारकर छाया में सुखाकर पीस ले । फिर ५०० ग्राम के लगभग मिश्री मिलाकर एक चौथाई चाय की चम्मच चूर्ण (मिश्री और इमली मिला हुआ) दूध के साथ प्रतिदिन दो बार लगभग ५० दिनों तक लेने से लाभ होगा ।
*लगभग ५० ग्राम इमली, लगभग ५०० ग्राम पानी में दो घन्टे के लिए भिगोकर रख दें उसके बाद उसको मथकर मसल लें । इसे छानकर पी जाने से लू लगना, जी मिचलाना, बेचैनी, दस्त, शरीर में जलन आदि में लाभ होता है तथा शराब व् भांग का नशा उतर जाता है । हँ का जायेका ठीक होता है ।
 
वीर्य – पुष्टिकर योग :
इमली के बीज दूध में कुछ देर पकाकर और उसका छिलका उतारकर सफ़ेद गिरी को बारीक पीस ले और घी में भून लें, इसके बाद सामान मात्रा में मिश्री मिलाकर रख लें । इसे प्रातः एवं शाम को ५-५ ग्राम दूध के साथ सेवन करने से वीर्य पुष्ट हो जाता है । बल और स्तम्भन शक्ति बढ़ती है तथा स्व-प्रमेह नष्ट हो जाता है ।
शराब एवं भांग का नशा उतारने में : नशा समाप्त करने के लिए पकी इमली का गूदा जल में भिगोकर, मथकर, और छानकर उसमें थोड़ा गुड़ मिलाकर पिलाना चाहिए ।
*इमली के गूदे का पानी पीने से वमन, पीलिया, प्लेग, गर्मी के ज्वर में भी लाभ होता है ।
ह्रदय की दाहकता या जलन को शान्त करने के लिये पकी हुई इमली के रस (गूदे मिले जल) में मिश्री मिलाकर पिलानी चाहियें ।
कान दर्द कर रहा हो तो इमली के गूदे का दो चम्म्च रस ४ चम्म्च तिल के तेल में मिला कर पका कर रख लीजिये। अब इस तेल को कान में डालिये।
बदन में कहीं खुजली हो रही हो तो इमली केपत्तों का रस लगा सकते हैं।
लू-लगना :
पकी हुई इमली के गूदे को हाथ और पैरों के तलओं पर मलने से लू का प्रभाव समाप्त हो जाता है । यदि इस गूदे का गाढ़ा धोल बालों से रहित सर पर लगा दें तो लू के प्रभाव से उत्पन्न बेहोसी दूर हो जाती है ।
चोट – मोच लगना :
 
इमली की ताजा पत्तियाँ उबालकर, मोच या टूटे अंग को उसी उबले पानी में सेंके या धीरे – धीरे उस स्थान को उँगलियों से हिलाएं ताकि एक जगह जमा हुआ रक्त फ़ैल जाए ।
हड्डी टूट गयी हो तो इमली के गुदे को तिल के तेल के साथ मिला कर पेस्ट बताएं और लेप कर दें ,हर चार घंटे पर लेप बदल दीजिये। ५ दिन यह लेप लगा रहेगा तो हड्डी जुड़ जायेगी।
गले की सूजन :
इमली १० ग्राम को १ किलो जल में अध्औटा कर (आधा जलाकर) छाने और उसमें थोड़ा सा गुलाबजल मिलाकर रोगी को गरारे या कुल्ला करायें तो गले की सूजन में आराम मिलता है ।
सांप या किसी जहरीले जीव ने काट लिटा है तो १६० ग्राम इमली के पत्तों का रस २५ ग्राम सेंधा नमक मिलकर पी लेने से जहर निष्प्रभावी हो जाएगा।
इमली में साइट्रिक एसिड ,टार्टरिक एसिड, पोटैशियम बाई टारटरेट ,फास्फोटिडिक एसिड, इथाइनोलामीन , सेरिन, इनोसिटोल, अल्केलायड, टेमेरिन , केटेचिन, बाल सेमिन, पालीसैकेराइड्स, नॉस्टार्शियम आदि तत्व पाये जाते हैं.यही कारण है कि इमली अधिक खा लेने से तेज़ाब का काम करती है और हमारी त्वचा और गुणसूत्रों को सीधे प्रभावित करती है।

18.2.17

फेफड़ों के स्वास्थ्य के लिए करें ये उपाय

    

   फेफड़े हमारे शरीर के बेहद महत्त्वपूर्ण अंग होते हैं। क्योंकि जीवित रहने के लिए सांस लेना जरूरी है और सांस लेने के लिए स्वस्थ फेफड़े होना आवश्यक है। यदि अपने फेफड़ों की सही देखभाल करें तो ये जीवन भर हमारा बेहतर साथ दे सकते हैं। अगर फेफड़ों पर बाहर से किसी प्रकार का हमला न हो तो वे काफी टिकाऊ बने रहते हैं। यदि कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो हमारे फेफड़े तब तक स्वस्थ रहते हैं जब तक हम खुद किसी तरह धूम्रपान आदि से इन्हें मुसीबत में न डालें। ऐसे कुछ तरीके हैं जिनकी मदद से हम अपने फेफड़ों को हमेशा स्वस्थ रख सकते हैं। क्यों हैं गंभीर विषय विश्व भर में सैकड़ों लाखों लोग हर साल फेफड़े संबंधी रोग जैसे टीबी, अस्थमा, निमोनिया, इन्फ्लुएंजा, फेफड़े का कैंसर और फेफड़े संबंधी कुछ अन्य दीर्घ प्रतिरोधी विकारों से पीडि़त हैं। और दुखद है कि इनके कारण लगभग 1 करोड़ लोग मृत्यु को प्राप्त होते हैं। फेफड़ों के रोग हर देश व सामाजिक समूह के लोगों को प्रभावित करते हैं, लेकिन खासतौर पर गरीब, बूढे़ और कमजोर व्यक्तियों पर ये जल्दी असर डालते हैं। फेफड़ों में फैलने वाले इन संक्रमणों के बारे में लोगों के बीच जानकारी का काफी अभाव है।
प्रदूषित वातावरण-
घर के भीतर का प्रदूषण जैसे- लकड़ी, कंडे या कोयले को जला कर खाना पकाना, धूम्रपान, तंबाकू आदि का सेवन ऐसे कई कारणों से फेफड़े संबंधी रोगियों की संख्या दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है। लेकिन यदि उचित जीवन शैली और धूम्रपान मुक्त वातावरण बनाया जाए तो फेफड़े संबंधी संक्रमणों को काफी हद तक कम किया जाना संभव है।
ब्रीदिंग एक्सरसाइज जरूर करें
ब्रीदिंग एक्सरसाइज करने से फेफड़ों को मजबूत बनाया जा सकता है और उनसे ज्यादा काम लिया जा सकता है। साथ ही आपका हृदय स्वास्थ्य जितना अच्छा होगा आपके फेफड़ों को हृदय और मासपेशियों को ऑक्सीजन देने के लिए ब्रीदिंग एक्सरसाइज ठीक रहती है।
धूम्रपान न करें -


  धूम्रपान करना फेफड़ों को सबसे ज्यादा हानि पहुंचाता है। बात जब धूम्रपान की आती है तो इसकी कोई सुरक्षित दहलीज नहीं है। कोई जितना अधिक धूम्रपान करेगा, फेफड़ो का कैंसर और सीओपीडी जिसके अंदर दीर्घकालिक फेफड़ों का सूजन और एफिसेमा आता है, होने का खतरा उतना ही अधिक होगा। लेकिन केवल सिगरेट बंद कर देना काफी नहीं है, मारिजुआना पाइप या सिगार भी फेफड़ों के लिए उतना ही घातक होते हैं। पानी-फेफड़ों की सेहत को दुरुस्त बनाए रखने के लिए पानी बेहद जरूरी होता है। पानी से फेफड़े हाइड्रेट, गीले बने रहते हैं और फेफड़ों की गंदगी इसी गीलेपन की वजह से बाहर निकल पाती है और फेफड़े सेहतमंद बने रहते हैं। इसलिए गर्मी हो या ठंड पर्याप्त मात्रा में पानी पीते रहना चाहिए।
घर को स्वच्छ रखें-वायु प्रदूषण सिर्फ बाहर होने वाली समस्या नहीं है। घर में भी कई चीजें हैं जैसे लकड़ी से जलने वाले स्टोव, अंगीठी, मोल्ड, मोमबत्तियां और एयर फ्रेशनर भी वायु प्रदूषण का कारण बन सकते हैं। इसलिए, यहां पर तीन तरह के उपाय जरूरी हैं, पहला स्रोत को हटाना, दूसरा वेंटिलेशन को बढ़ाना और तीसरा वायु को स्वच्छ रखने का बंदोबस्त करना।
पौष्टिक भोजन करें-
वे खाद्य पदार्थ जिसमें एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं फेफड़ों के लिए बेहद फायदेमंद होता है। जो लोग फूलगोभी, ब्रोकली, बंदगोभी खाते हैं उनमें फेफड़ो का कैंसर होने की आशंका ये चीजें न खाने वाले लोगों की तुलना में काफी कम होती है।
काम करते समय सावधानी–
कई काम जैसे निर्माण, बालों की स्टाइलिंग व जस्टिंग आदि में गंदगी भीतर जाने की वजह से फेफड़ों पर खतरा होता है। तो ऐसा कोई भी काम करते समय अपने मुंह और नाक को ठीक तरह से ढक कर ही काम करें।
मौसम के अनुरूप देखभाल-उमस भरे या बहुत ठंडे मौसम में फेफड़ों को स्वस्थ रखने या उससे संबंधित परेशानी से राहत पाने के लिए खूब पानी पिएं। फेफड़ों से संबंधित किसी तरह की परेशानी हो तो बहुत खट्टी या ठंडी चीजें न खाएं। इसके सेवन से फेफड़ों में सूजन की आशंका रहती है। शरीर को एकदम सर्दी से गर्मी या गर्मी से सर्दी में ले जाने से भी बचें।
वायु प्रदूषण से बचें-
ज्यादातर गर्मी के महीने में कुछ जगहों में ओजोन और दूसरे प्रदूषक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकते हैं। फेफड़ों की समस्या से जूझ रहे लोग ज्यादातर वायु प्रदूषण से संवेदनशील होते हैं। इसलिए बाहर जाएं तो मेडिकेटिड मास्क का उपयोग करें और शरीर को समय -समय पर डिटॉक्सिफाई करते रहें।
फेफड़ों को स्वस्थ रखने के लिए उपयोगी जड़ी बूटियां – फेफड़ों का काम वातावरण से ऑक्सीजन लेना है. कार्बन डाइऑक्साइड को वातावरण में वापिस छोड़ना है. साथ ही यह शुद्ध रक्त धमनी द्वारा दिल में पहुंचता है. जहां से यह फिर से शरीर के विभिन्न अवयवों में पम्प किया जाता है. यही कारण है कि फेफड़ों का स्वस्थ रहना जरूरी है. बहुत से हर्ब्स ऐसे है जिनके सेवन से फेफड़ों को स्वस्थ रखा जा सकता हैं.
तुलसी
तुलसी के सूखे पत्‍ते, कत्‍था, कपूर और इलायची समान मात्रा में ले ल‍ीजिए। इसमें नौ गुना चीनी मिलाकर बराबर मात्रा में पीस लें। इस मिश्रण की चुटकी भर मात्रा दिन में दो बार खायें। इससे फेफड़ों में जमा कफ निकल जाता है।
एचिनासा Echinacea
एचिनासा एक एंटी माइक्रोबियल हर्ब है। जो रोगों से लड़ने के लिए जाना जाता है और शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाता है। एचिनासा सफेद रक्त कोशिका के उत्पादन द्वारा काम करता है।
शहतूत के पत्‍ते


शहतूत के पत्‍ते चबाने से फेफड़ों के रोग, फेफड़ों की जलन, सिरदर्द और खांसी आदि दूर होती है।
मेंहदी
एचिनासा की तरह मेंहदी में भी एंटी माइक्रोबियल हर्ब होते हैं। इसमें मौजूद शक्तिशाली तेल में एंटीसेप्टिक, एंटीबैक्‍टीरियल और एंटी-फंगल गुण होते हैं। हर्बल चिकित्सक जुकाम, गले में खराश, फ्लू, खांसी, ब्रोंकाइटिस और छाती में संक्रमण को समाप्त करने के लिए मेंहदी का इस्तेमाल करते हैं।
अंजीर
फेफड़े की परेशानियों को दूर करने में अंजीर काफी मदद करती है। 5 अंजीर को एक गिलास पानी में उबाल लीजिये। दिन में दो बार इसका सेवन करने से फेफड़ों की गंदगी साफ होती है और उन्‍हें शक्ति मिलती है।
लहसुन
लहसुन को कफनाशक समझा जाता है। भोजन के बाद लहसुन का सेवन करने से छाती साफ रहती है और कई रोगों से रक्षा होती है।
मुनक्‍का
मुनक्‍का के ताजे और साफ 15 दाने रात में 150 मिलीलिटर पानी में भिगो दें। सुबह बीज निकालकर फेंक दें। गूदे को खूब अच्‍छी तरह चबा-चबाकर खायें। बचे हुए पानी को पी लें। एक महीने तक इसका सेवन करने से फेफड़े मजबूत होते हैं।
शहद
रोजाना सुबह एक चम्‍मच शहद का सेवन करें। एक दो महीने तक इसका सेवन करने से फेफड़ों के रोग दूर होते हैं और फेफड़े मजबूत बनते हैं।
अंगूर
अंगूर फेफड़े के सभी प्रकार के रोगों को दूर रखता है। खांसी और दमे जैसी बीमारियों में अंगूर कासेवन बहुत फायदा पहुंचाता है। हां अगर आपको डायबिटीज है तो इसका अधिक सेवन न करें।


मुलहठी
खांसी और खराश में मुलहठी के फायदे आप जानते ही हैं। यह फेफड़ों के लिए बहुत लाभदायक होती है। पान में डालकर मुलहठी का सेवन करने से कफ नाश होता है।
कैसे होता है फेंफड़ा खराब : फेंफड़े मुख्यत: धूम्रपान, तम्बाकू और वायु प्रदूषण के अलावा फंगस, ठंडी हवा, भोजन में कुछ पदार्थ, ठंडे पेय, धुएँ, मानसिक तनाव, इत्र और रजोनिवृत्ति जैसे अनेक कारणों से फेंफड़ा.
एक्ट्रा एफर्ट : इसके बाद यदि आप करना चाहें तो ब्रह्ममुद्रा 10 बार, कन्धसंचालन 10 बार (सीधे-उल्टे), मार्जगसन 10 बार, शशकासन 2 बार (10 श्वास-प्रश्वास के लिए), वक्रासन 10 श्वास के लिए, भुजंगासन 3 बार(10 श्वास के लिए), धनुरासन 2 बार (10 श्वास-प्रश्वास के लिए), पाश्चात्य प्राणायाम (10 बार गहरी श्वास के साथ), उत्तानपादासन 2 बार, 10 सामान्य श्वास के लिए, शवासन 5 मिनट, नाड़ीसांधन प्राणायाम 10-10 बार एक. स्वर से, कपालभाति 50 बार, भस्त्रिका कुम्भक 10 बार, जल्दी-जल्दी श्वास-प्रश्वास के बाद कुम्भक यथाशक्ति 3 बार दोहराना था।

सावधानी-
 सभी प्राणायाम, बंध या आसन का अभ्यास स्वच्छ व हवायुक्त स्थान पर करना. करना चाहिए। पेट, फेंफड़े, गुदा और गले में किसी भी प्रकार का गंभीर रोग हो तो योग चिकित्सक की सलाह लें।

16.2.17

खिरनी के गुण फायदे उपचार

    
    ग्रीष्म ऋतु में निंबोली के समान आकार में दिखाई देने वाला एक फल बाजारों में ग्रामीणों द्वारा बेचते हुए देखा जा सकता है उसे खिरनी कहते है वास्तव में खिरनी लोक में प्रचलित नाम है आयुर्वेद में खिरनी का नाम क्षिरिणी है इसी का अपभ्रंश नाम खिरनी हो गया क्षिरिणी का अर्थ क्षीर (दूध) युक्त इसके फलों एवं पत्तों को तोड़ने पर दूध निकलता है गुणों के आधार पर यह फलों का राजा है एवं प्राचीनकाल में राजाओं द्वारा इसका सेवन किया जाता था अत: इसे आयुर्वेद में राजदान, राजफल एवं फलाध्यक्ष (फलों का राजा ) आदि नाम से भी जाना जाता है सेपोटेसी कुल के इस वृक्ष का वानस्पतिक नाम मनीलकरा हेक्सेंड्रा है एवं इसके विशाल वृक्षों को मध्य प्रदेश के मांडू क्षेत्रों में देखा जा सकता है जो की राजाओं का स्थान था आजकल इसके बीजों को उगाकर जब वह दो से ढाई फुट का हो जाए तब उसे काटकर उस में चीकू की कलम प्रत्यारोपित की जा रही है जिससे बहुत स्वादिष्ट चीकू का फल उत्पन्न होता है ।
खिरनी या माइमोसॉप्स हेक्जैंड्रा (Mimosops hexandra) ४०-५० फुट ऊँचा घना वृक्ष है, जो उत्तरी भारत में स्वत: उगता है, अथवा उगाया जाता है। इसमें पीले छोटे फल लगते हैं, जो खाने में काफी मीठे और स्वादिष्ठ होते हैं। वृक्ष की छाल औषधि के कार्य में आती है। बीज से तेल निकाला जाता है। इसकी लकड़ी बहुत मजबूत होती है।
खिरनी का पेड़ भारत में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, महाराष्ट्र, तमिलनाडु आदि जगहों में होता है। खिरनी का पेड़ बहुत बड़ा होता है। इसके फल नीम के फल जैसे होते है। उन्हें खिरनी कहते हैं। खिरनी बहुत मीठा और गरम होता है और इसमें दूध भी होता है। खिरनी के पेड़ की लकड़ी मजबूत और चिकनी होती है।
खिरनी के पेड़ पर सितम्बर से दिसम्बर के महीनों में फूल उगते हैं और अप्रैल से जून के महीनें में फल लगते हैं। बारीश आने पर इसका मौसम पूरा होता है। बरसात की छीटे पड़ते ही इसके फल में कीड़े पड़ जाते हैं। खिरनी का पेड़ काफी सालों तक टिका रहता है खिरनी के पेड़ कई हजारों साल पुराने तक देखे गये हैं।आयुर्वेदानुसार इसके फल शरीर में शीतलता लाते है मधुर स्निग्ध एवं पचने में भारी होता है ।
फल धातुवर्धक , शुक्रजनन , क्षय रोग , वात रोग नाशक होता है ।
मद , मूर्छा , मोह , भ्रांति , दाह, तृषा , (प्यास) को नष्ट करता है इसके फल पित्त नाशक होने से रक्त पित्त रोग में लाभ पहुंचाते है
फल शरीर को मोटा करने वाले होते है अत: दुर्वल व्यक्तियों के लिए यह हितकारी है ।
इसके फलों में प्रोटीन ०.४८%, वसा २०४२%, कार्बोहाईड्रेट २७.७७ % खनिज लवन ०.७५ % , इसके अतिरिक्त कैल्शियम ०.८३ % फास्फोरस १७ एवं लौह ०.८२ मि.ग्रा./१०० ग्रा.होता है कुछ विटामिन्स जैसे ए, बी,एवं सी भी पाए जाते है इसके बीजों से निकलने वाले तेल को खाद्य तेल के रूप में भी प्रयोग किया जाता है इसकी छाल का काढ़ा ज्वर नाशक होता है इसके पके फलों को सुखाने पर वे ड्रायफ्रूट का अच्छा विकल्प हो सकते है तो आप भी खिरनी का सेवन करे एवं राजा बन जाइए और कम से कम एक पौधा जरुर लगाइए ।
मानसिक असंतोष, नींद में स्त्री और जल से भय आदि स्वप्न, जल से होने वाले पेट संबंधित रोग, मातृप्रेम में कमी हो तो ऐसा जातक चंद्र ग्रह से पीडित होगा। इन्हें खिरनी की जड़ को सफेद कपड़े में बांधकर किसी भी पूर्णमाशी को सायंकाल गले में धारण करना चाहिए।यदि चंद्र अनिष्ट फल दे रहा हो तो सोमवार को खिरनी की जड़ सफेद डोरे में बांध कर धारण करें

13.2.17

श्वास रोग :कारण और उपचार

    

कई बार आप लोगों ने देखा होगा कोई बीमारी ना होते हुए भी सांस फूलने लगती है ये कोई जरुरी नहीं है की सांस केवल मोटे व्यक्ति की ही फूले ऐसा किसी भी व्यक्ति के साथ हो सकता है फिर चाहे वो पतला इंसान ही क्यों न हो . इसके पीछे का जो कारण है वो आज आपको बताते हैं अक्‍सर ऐसा होता है कि बिना किसी बीमारी के भी काम करते हुए सांस फूलने लगती है या सीढ़ियां चढ़ने से सांस फूल जाती है। कई लोग सोचते हैं कि मोटे लोगों की सांस जल्दी फूलती है, लेकिन ऐसा नहीं है। कई बार पतले लोगों की सांस भी थोड़ा चलने पर ही फूलने लगती है। दिल्ली मुम्बई और Industrial area में सांस फूलने की समस्या गंभीर रूप ले चुकी है।
  गहरी सांस न ले पाना, सांसें तेज चलना, सांस लेने में परेशानी होना कुछ ऐसी बातें हैं, जिनका सामना कभी-कभार सबको करना पड़ता है। लेकिन लंबे समय तक इस स्थिति का बने रहना ठीक नहीं। यह जानना जरूरी हो जाता है कि ऐसा क्यों हो रहा है। ये किन रोगों का हो सकता है संकेत, बता रही हैं वंदना भारती
    लगातार अधिक शारीरिक श्रम करने पर सांसें चढ़ने लगती हैं। जल्दबाजी व तनाव की स्थिति में भी सांसें उखड़ जाती हैं, पर ऐसी स्थितियों में सांसों की गति जल्द ही सामान्य भी हो जाती है। कई बार नियमित व्यायाम व जीवनशैली में सुधार करके भी आराम मिल जाता है। पर यदि हर समय सांस लेने में परेशानी हो रही हो तो ध्यान देना जरूरी है। आइये जानते हैं उन रोगों के बारे में, जिनकी वजह से सांस लेने में परेशानी हो सकती है...
फेफड़ों की समस्याएं-
   सांस नली के जाम होने पर या फेफड़ों में छोटी-मोटी परेशानी होने पर सांसें छोटी आने लगती हैं। किसी प्रोफेशनल की मदद से इस स्थिति से जल्दी ही राहत पाई जा सकती है। लेकिन यदि ऐसा लंबे समय से है तो यह किसी दूसरी बीमारी का लक्षण हो सकता है, जैसे -
निमोनिया : 
   यह बीमारी स्ट्रेप्टोकोकस निमोनिया नाम के एक कीटाणु की वजह से होती है। दरअसल यह बैक्टीरिया श्वास नली में एक खास तरह का तरल पदार्थ उत्पन्न करता है, जिससे फेफड़ों तक पर्याप्त ऑक्सीजन नहीं पहुंच पाती और रक्त में ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। खून में ऑक्सीजन की कमी के चलते होठ नीले पड़ जाते हैं, पैरों में सूजन आ जाती है और छाती अकड़ी हुई सी लगती है।
अस्थमा :-
    सांस नली में सूजन आने की वजह से वो संकरी हो जाती है, जिससे सांस लेने में परेशानी होती है। सांस लेते समय घरघराहट और खांसी रहती है।
क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पलमोनरी डिजीज (सीओपीडी): इस स्थिति में सांस नली बलगम या सूजन की वजह से संकरी हो जाती है। सिगरेट पीने वालों, फैक्टरी में रसायनों के बीच काम करने वालों और प्रदूषण में रहने वाले लोगों को यह खासतौर पर होती है।
पलमोनरी एम्बोलिज्म : 
   इसमें फेफड़ों तक जाने वाली धमनियां वसा कोशिकाओं, खून के थक्कों, ट्यूमर सेल या तापमान में बदलाव के कारण जाम हो जाती हैं। रक्त संचार में आए इस अवरोध के कारण सांस लेने और छोड़ने में परेशानी होती है। छाती में दर्द भी होता है।
बेचैनी भी हो सकती है वजह -
    बेचैन रहना या बात-बात पर चिंता करना भी सांस को असामान्य बना देता है। दरअसल बेचैनी हाईपरवेंटिलेशन की वजह से होती है यानी जरूरत से ज्यादा सांस लेना। सामान्य स्थिति में हम दिन में 20,000 बार सांस लेते और छोड़ते हैं। ओवर-ब्रीदिंग में यह आंकड़ा बढ़ जाता है। हम ज्यादा ऑक्सीजन लेते हैं और उसी के अनुसार कार्बन डाईऑक्साइड भी छोड़ते हैं। शरीर को यही महसूस होता रहता है कि हम पर्याप्त सांस नहीं ले रहे। कई बार सांस व रोगों के बारे में बहुत सोचते रहने पर भी ऐसा होता है। पैनिक अटैक में ऐसा ही होता है। सांसों पर नियंत्रण रखने की बहुत अधिक कोशिश करने तक से ऐसा हो जाता है।
हो सकती है एलर्जी -
   कई लोगों का प्रतिरक्षी तंत्र संवेदनशील होता है, जिससे उन्हें प्रदूषण, धूल, मिट्टी, फफूंद और जानवरों के बाल आदि से एलर्जी रहने लगती है। ऐसे लोगों को एलर्जन के संपर्क में आने व मौसम में बदलाव आने पर एलर्जी का अटैक पड़ने लगता है। सांस लेने में परेशानी होती है। सीने में जकड़न आने लगती है। सांस फूलने लगता है। बेहतर है कि चिकित्सक से संपर्क करें। कुछ टैस्ट के जरिए डॉक्टर एलर्जी के कारकों को जानते हैं। इसके अलावा जीवनशैली पर गौर करके भी एलर्जी के कारकों को समझने में मदद मिल सकती है।
हृदय रोगों से जुड़े हो सकते हैं तार- 
   दिल की बीमारियों के चलते भी सांस लेने में तकलीफ हो सकती है। दिल के रोग मसलन, एन्जाइना, हार्ट अटैक, हार्ट फेल्योर, जन्मजात दिल में परेशानी या एरीथमिया आदि में ब्रेथलेसनेस होती है। दिल की मांसपेशियां कमजोर होने पर वे सामान्य गति से पंप नहीं कर पातीं। फेफड़ों पर दबाव बढ़ जाता है और व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ होती है। ऐसे लोग रात में जैसे ही सोने के लिए लेटते हैं, उन्हें खांसी आने लगती है और सांस लेने में तकलीफ होने लगती है। इसमें पैरों या टखनों में भी सूजन आ जाती है। सामान्य से ज्यादा थकान रहती है।
 
मोटापा घटाने की बारी -
    शोधकर्ताओं का दावा है कि मोटापा बढ़ते ही सांस की पूरी प्रणाली प्रभावित हो जाती है। सांस के लिए मस्तिष्क से आने वाले निर्देश का पैटर्न बदल जाता है। वजन में इजाफा और सक्रियता की कमी रोजमर्रा के कामों को प्रभावित करने लगते हैं। थोड़ा सा चलने, दौड़ने या सीढि़यां चढ़ने पर परेशानी होती है। सांस लेने में परेशानी होना वजन कम करने और व्यायाम को जीवनशैली में शामिल करने का भी संकेत है।
अन्य कारण
शरीर में कैंसर कोशिकाओं के कारण सांस नली पर दबाव बढ़ता है और सांस लेने में परेशानी होती है। गर्भाशय व लिवर कैंसर में पेट में तरल पदार्थ जमा हो जाते हैं, जिससे पेट में सूजन आ जाती है। डायफ्राम पर पड़ा दबाव फेफड़ों को खुलने नहीं देता और सांस लेने में परेशानी होती है।
   शरीर में खून की कमी यानी एनीमिया होने की स्थिति में भी सांस लेने में परेशानी की समस्या होती है। इस दौरान रक्त कोशिकाओं में हीमोग्लोबिन नामक प्रोटीन कम हो जाता है, जिससे ऑक्सीजन फेफड़ों से शरीर के सब हिस्सों तक नहीं पहुंच पाती। शरीर में लाल रक्त कोशिकाओं के निर्माण में कमी का कारण शरीर में आयरन, विटामिन बी-12 या प्रोटीन की कमी होना है।
गठिया, किडनी की समस्या, विटामिन डी की कमी व अधिकता के कारण भी सांस लेने में परेशानी महसूस होती है। लंबे समय तक सांस लेने में परेशानी होने पर चिकित्सक से संपर्क करना जरूरी है। खुद से दवाओं का सेवन न करें।
ये उपाय देंगे राहत की सांस
*बाहर का काम सुबह-सुबह या शाम को सूरज ढलने के बाद करें। इस वक्त प्रदूषण का स्तर कम होता है।
*किसी फैक्ट्री या व्यस्त सड़क के आसपास व्यायाम न करें।
चलें, खेलें और दौड़ें। सप्ताह में कम से कम तीन दिन आधे घंटे की दौड़ लगाएं या पैदल चलें।
*वजन कम करने पर ध्यान दें। अमेरिकी डायबिटीज एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार मोटापा फेफड़े को सही ढंग से काम करने से रोकता है।
*देर तक बैठे रहते हैं या अकसर हवाई यात्रा करते हैं तो थोड़ी देर पर उठ कर टहलते रहें। सूजन का ध्यान रखें।
*यदि अस्थमा है तो इनहेलर साथ रखें।
*कम दूरी वाले कामों के लिए वाहन का इस्तेमाल न करें।
*घर के वेंटिलेशन का रखें खास ध्यान। कार्पेट, तकिए और गद्दों पर धूप लगाएं। परदों की साफ-सफाई करें। रसोई और बाथरूम में लगाएं एग्जॉस्ट फैन। एसी का इस्तेमाल कम करें।
*धूम्रपान न करें, सिगरेट पीने वालों से दूरी बनाएं।
*खाने में ब्रोकली, गोभी, पत्ता गोभी, केल (एक प्रकार की गोभी), पालक और चौलाई को शामिल करें।
अचानक सांस लेने में परेशानी होने पर
व्यायाम करते हुए अनजाने ही सांस रोक लेना। इससे सांस लेने और छोड़ने की प्रक्रिया पूरी नहीं होती। जल्द ही थकावट होने लगती है। ब्लड प्रेशर बढ़ जाता है। व्यायाम करते समय कंधों को आरामदायक स्थिति में रखें। नाक से सांस लें और मुंह से छोड़ें।
सांस ढंग से न लेना यानी फेफड़ों की क्षमता का पूरा उपयोग न करना। सांस लेना, पर ढंग से छोड़ना नहीं, जिससे फेफड़ों में कार्बन डाईऑक्साइड एकत्रित हो जाती है। पूरी सांस लें और छोड़ें। सांस लेने के साथ पेट बाहर की ओर व छोड़ते समय भीतर की ओर जाना चाहिए।
   *सिर के नीचे तकिया न रखें, इससे सांस नली पर असर पड़ता है। व्यक्ति को हवादार जगह में ले जाएं। तुरंत चिकित्सक से संपर्क करें। इस बीच व्यक्ति की सांस और धड़कन की जांच करते रहें।
*व्यक्ति के पहने कपड़ों को ढीला कर दें।
*छाती या गले पर कोई खुली चोट है तो उसे तुरंत ढक दें।
गलतियां जो हम हर रोज करते हैं
*हर समय मोबाइल, लैपटॉप व कंप्यूटर पर लगे रहना सर्विकल स्पाइन पर जोर डालता है। कमर दर्द होता है। कंधे झुक जाते हैं। अपने पॉस्चर का ध्यान रखें।
 
*व्यक्ति को तुरंत खाने या पीने की कोई चीज न दें। अगर छाती में चोट है तो उसे हिलाएं नहीं।
*इन संकेतों को न करें नजरअंदाज
होठ, उंगलियां और नाखूनों का नीला पड़ना।
सीने में दर्द होना। खांसी के साथ खून आना।
धड़कन असामान्य रूप से चलना। पसीना छूटना।
कुत्ते की आवाज सी खांसी आना, सांस लेने में सीटी जैसी आवाज आना। जल्दी-जल्दी बुखार आना। ' पीला या हरा बलगम आना, अचानक भूख खत्म हो जाना व पैरों में सूजन रहना।
हमेशा भ्रमित रहना, चक्कर आना व नींद अधिक या कम आना।
चक्कर आना और बेहाशी जैसा महसूस होना।
चेहरे, जीभ और गले में सूजन रहना।
जरूरत से ज्यादा लार निकलना।
सांस के साथ घरघराहट की आवाज आना।दमा रोग से पीड़ित रोगी को गर्म बिस्तर पर सोना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी रीढ़ की हड्डी की मालिश करवानी चाहिए तथा इसके साथ-साथ कमर पर गर्म सिंकाई करवानी चाहिए। इसके बाद रोगी को अपनी छाती पर न्यूट्रल लपेट करवाना चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से कुछ ही दिनों में दमा रोग ठीक हो जाता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी के लिए कुछ सावधानियां:-
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को ध्रूमपान नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी की अवस्था और खराब हो सकती है।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में लेसदार पदार्थ तथा मिर्च-मसालेदार चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*रोगी व्यक्ति को धूल तथा धुंए भरे वातावरण से बचना चाहिए क्योंकि धुल तथा धुंए से यह रोग और भी बढ़ जाता है।
*रोगी व्यक्ति को मानसिक परेशानी, तनाव, क्रोध तथा लड़ाई-झगड़ों से बचना चाहिए।
इस रोग से पीड़ित रोगी को शराब, तम्बाकू तथा अन्य नशीले पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ये पदार्थ दमा रोग की तीव्रता को बढ़ा देते हैं।
  * दमा रोग से पीड़ित रोगी को सप्ताह में 2-3 बार सुबह के समय में कुल्ला-दातुन करना चाहिए। इसके बाद लगभग डेढ़ लीटर गुनगुने पानी में 15 ग्राम सेंधानमक मिलाकर धीरे-धीरे पीकर फिर गले में उंगुली डालकर उल्टी कर देनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*  दमा रोग से पीड़ित रोगी को भोजन में नमक तथा चीनी का सेवन बंद कर देना चाहिए।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को सुबह के समय में रीढ़ की हड्डी को सीधे रखकर खुली और साफ स्वच्छ वायु में 7 से 8 बार गहरी सांस लेनी चाहिए और छोड़नी चाहिए तथा कुछ दूर सुबह के समय में टहलना चाहिए।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को चिंता और मानसिक रोगों से बचना चाहिए क्योंकि ये रोग दमा के दौरे को और तेज कर देते हैं।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेट को साफ रखना चाहिए तथा कभी कब्ज नहीं होने देना चाहिए।
   *दमा रोग से पीड़ित रोगी को धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के साथ नहीं रहना चाहिए तथा धूम्रपान भी नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से इस रोग का प्रकोप और अधिक बढ़ सकता है।
  * दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने पेड़ू पर मिट्टी की पट्टी और उसके बाद गुनगुने जल का एनिमा लेना चाहिए। फिर लगभग 10 मिनट के बाद सुनहरी बोतल का सूर्यतप्त जल लगभग 25 मिलीलीटर की मात्रा में प्रतिदिन पीना चाहिए। इस प्रकार की क्रिया को प्रतिदिन नियमपूर्वक करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपने रोग के होने के कारणों को सबसे पहले दूर करना चाहिए और इसके बाद इस रोग को बढ़ाने वाली चीजों से परहेज करना चहिए। फिर इस रोग का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार कराना चाहिए।
*इस रोग से पीड़ित रोगी को कभी घबराना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दौरे की तीव्रता (तेजी) बढ़ सकती है।
*1 कप गर्म पानी में शहद डालकर प्रतिदिन दिन में 3 बार पीने से दमा रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
  * दमा रोग से पीड़ित रोगी को रात के समय में जल्दी ही भोजन करके सो जाना चाहिए तथा रात को सोने से पहले गर्म पानी को पीकर सोना चाहिए तथा अजवायन के पानी की भाप लेनी चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।

 
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को अपनी छाती पर तथा अपनी रीढ़ की हड्डी पर सरसों के तेल में कपूर डालकर मालिश करनी चाहिए तथा इसके बाद भापस्नान करना चाहिए। ऐसा प्रतिदिन करने से रोगी का रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
   * दमा रोग को ठीक करने के लिए प्राकृतिक चिकित्सा के अनुसार कई प्रकार के आसन भी हैं जिनको करने से दमा रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है। ये आसन इस प्रकार हैं- योगमुद्रासन, मकरासन, शलभासन, अश्वस्थासन, ताड़ासन, उत्तान कूर्मासन, नाड़ीशोधन, कपालभांति, बिना कुम्भक के प्राणायाम, उड्डीयान बंध, महामुद्रा, श्वास-प्रश्वास, गोमुखासन, मत्स्यासन, उत्तानमन्डूकासन, धनुरासन तथा भुजांगासन आदि।
दमा रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को कम से कम 10 मिनट तक कुर्सी पर बैठाना चाहिए क्योंकि आराम करने से फेफड़े ठंडे हो जाते हैं। इसके बाद रोगी को होंठों से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में हवा खींचनी चाहिए और धीरे-धीरे सांस लेनी चाहिए। इस प्रकार से प्रतिदिन उपचार करने से यह रोग कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है
*दमा रोग से पीड़ित रोगी का प्राकृतिक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी व्यक्ति को प्रतिदिन नींबू तथा शहद को पानी में मिलाकर पीना चाहिए और फिर उपवास रखना चाहिए। इसके बाद 1 सप्ताह तक फलों का रस या हरी सब्जियों का रस तथा सूप पीकर उपवास रखना चाहिए। फिर इसके बाद 2 सप्ताह तक बिना पका हुआ भोजन करना चाहिए। इसके बाद साधारण भोजन करना चाहिए।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को नारियल पानी, सफेद पेठे का रस, पत्ता गोभी का रस, चुकन्दर का रस, अंगूर का रस, दूब घास का रस पीना बहुत अधिक लाभदायक रहता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी यदि मेथी को भिगोकर खायें तथा इसके पानी में थोड़ा सा शहद मिलाकर पिएं तो रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
*दमा रोग से पीड़ित रोगी को कभी भी दूध या दूध से बनी चीजों का सेवन नहीं करना चाहिए।
*तुलसी तथा अदरक का रस शहद मिलाकर पीने से दमा रोग में बहुत लाभ मिलता है।
दमा रोग से पीड़ित रोगी को 1 चम्मच त्रिफला को नींबू पानी में मिलाकर सेवन करने से दमा रोग बहुत जल्दी ही ठीक हो जाता हैं।


11.2.17

सुबह -सुबह दौड़ने के नायाब स्वास्थ्य लाभ

     
 खुद को फिट रखने के लिए जो चीज सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है वह है अच्छी डाइट के साथ नियमित रूप से व्यायाम करना। दिन में समय निकालकर जो व्यक्ति व्यायाम करता है वह पूरे दिन फिट और ऊर्जावान रहता है। अगर आप व्यायाम करते हैं दौड़ना ना भूले वह भी सुबह-सुबह। ऐसा माना गया है कि फिट रहने के लिए दौड़ना एक बहुत ही अच्छा व्यायाम है।
    दौड़ना एक उच्च तीव्रता वाला कार्डियोवास्कुलर (दिल और रक्त वाहिकाओं) वर्कआउट है जिसके कई शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य और फिटनेस लाभ हैं। यह सबसे अधिक आसानी से किया जाने वाला एरोबिक व्यायाम है। दौड़ने से श्वसन (फेफड़ों) फिटनेस में सुधार होता है। यह दिल के दौरे के जोखिम कम करता है और इसी तरह बहुत सी दिल और फेफड़ों की बीमारियों और कुछ तरह के कैंसरों के खतरे को कम कर देता है।
आजकल लोग समय की कमी के कारण कहे या आलस के कारण कहे दौड़ना ही नहीं चाहते हैं। जब दिमाग में फिट रहने का सनक चढ़ता है तब कुछ दिन आप सुबह दौड़ने के बाद फिर उसी आलसीपन में डूब जाते हैं।
  यदि आप सुबह दौड़ते हैं तो इससे न केवल आप खुद को फिट रख पाते हैं बल्कि बहुत सारी बीमारियों को भी दूर भगा सकते हैं। गांव में तो लोग ऐसा करते हैं लेकिन शहरों में काम और थकान का बहाना बनाकर इससे दूर भागते हैं। अक्सर देखा गया है कि दो दोस्त जब भी वजन घटाने की बात करते हैं जिम या दौड़ने की चर्चा जरूर करते हैं लेकिन आलसीपन उन्हें ऐसा नहीं करने देती। इसलिए वह न तो जल्दी उठ पाते हैं और न ही सुबह दौड़ने का ख्वाब पूरा कर पाते हैं। आइए जानते हैं सुबह दौड़ने के फायदों के बारे में
 
वजन घटाता है यदि आप अतिरिक्त किलो घटाना चाहते हैं, तो दौड़ना शुरू कर दीजिए। दौड़ना व्यायाम का एक उत्कृष्ट रूप है, क्योंकि यह कैलोरी को जला देता है, लेकिन चोटों से बचने के लिए धीमी गति से शुरू करें।
पाचन में सुधार 
दौड़ना पाचन में सुधार करने में मदद करता है और यह भूख बढ़ाता है। यह कैलोरी को जला देता है इसलिए आपको दौड़ने के बाद भूख लगने लगेगी। तो यह सुनिश्चित करें कि आप एक स्वस्थ नाश्ता ले रहे हैं।
तनाव कम करता है:-
दौड़ना व्यायाम का एक आरामदायक रूप है, क्योंकि यह स्वास्थ्य को बढ़ा देता है और आपके तनाव के स्तर को कम करने में मदद करता है।
हड्डियों को मजबूत करता है नियमित रूप से दौड़ने से ऑस्टियोपोरोसिस और गठिया जैसी हड्डी से संबंधित रोगों के खतरे कम होते हैं, और यह आपकी हड्डियों और मांसपेशियों को मजबूत बनाने में मदद करता है। दौड़ना हमारे पैरों और कमर की हड्डी के घनत्व में सुधार लाने में मदद करता है
प्रतिरक्षा स्वास्थ्य को बढ़ाता है 
यदि आप नियमित रूप से जॉगिंग करते हैं, तो आप एलर्जी, सर्दी, खांसी, फ्लू आदि जैसी स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त नहीं होंगे. नियमित रूप से दौड़ने से आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली बढ़ती है और यह रोगों के सभी प्रकार का प्रतिरोध करता है।
दिल के स्वास्थ्य को सुधारता है रक्तसंचार को बढ़ाते, रक्तचाप को बनाए रखते, और विभिन्न हृदय संबंधी रोगों के खतरे को कम करते हुए दौड़ने से दिल का स्वास्थ्य सुधरता है।

चर्बी को जलाता है 
 
दौड़ना अधिक वसा कोशिकाओं को जलाने में मदद करता है और शरीर को दुबला पतला बना देता है। यह आपके चयापचय को भी बढ़ा देता है और आपको अवांछित वसा से छुटकारा पाने में मदद करता है।
दौड़ने से मिलती है ज्यादा संभोग शक्ति
जो लोग नियमित तौर पर दौड़ लगाते हैं, उनका यौन जीवन उन लोगों की अपेक्षा ज्यादा सक्रिय होता है जो दौड़ नहीं लगाते।
एक शोध के मुताबिक 10 में से एक दौड़ लगाने वाले (जागर्स) ने कहा कि वे अपने दैनिक जीवन में कम से कम एक बार यौन संबंध स्थापित करते हैं, जबकि तीन प्रतिशत जागर्स का कहना है कि वे दिन में दो बार संभोग का लुत्फ उठाते हैं।
समाचार पत्र ‘द टेलीग्राफ’ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक शोध के दौरान उन लोगों से भी बात की गई, जो दौड़ नहीं लगाए। ऐसे चार में से एक व्यक्ति का कहना था कि वह महीने में एक बार या फिर उससे भी कम बार यौन संबंध स्थापित करता है।
यह शोध 1000 जागर्ज और इतने ही उन लोगों पर किया गया, जो दौड़ नहीं लगाते हैं। शोध कराने वाली संस्था-स्यू रायडर केयर ने पाया कि 10 में से एक पुरुष जागर्स ने स्वीकार किया कि वे कसरत के दौरान यौन क्रिया के बारे में सोचते हैं।
दूसरी ओर, सिर्फ पांच प्रतिशत महिलाओं ने माना कि वे दौड़ने या फिर कसरत के दौरान यौन क्रिया के बारे में सोचती हैं। कसरत करने वाली कुल महिलाओं में से आधी यही सोचने में व्यस्त रहती हैं कि उन्हें कसरत से कितना लाभ हो रहा है।
सहनशक्ति में बढ़ोत्तरी
ऐसा माना गया है कि जो लोग सुबह दौड़ते हैं उनके सहनशक्ति में इजाफा होता है। वह छोटी-छोटी समस्याओं का बहुत ही आसानी से हल निकाल लेते हैं। अगर आप भी अपनी सहनशक्ति को बढ़ाना चाहते हैं तो नियमित रूप से दौड़ लगाइए।
मस्तिष्क के स्वास्थ्य में सुधार लाता है:-
दौड़ना पूरे शरीर में प्रवाह को बढ़ावा देने में मदद करता है। इस के कारण, आपके दिमाग को अधिक ऑक्सीजन और पोषक तत्व मिलते हैं, जो आपको काम पर ध्यान केंद्रित करने के लिए सक्षम बनाते हैं।
बेहतर नींद लेने में मदद करता है 
यदि आपको ठीक से नींद नहीं आती है, तो आप दिन के दौरान दौड़ने की कोशिश करें। दौड़ना अच्छी नींद बढ़ाने में मदद करता है, क्योंकि आपका शरीर थक जाता है और आप रात को बाधारहित, गहरी नींद ले सकेंगे।
 
मधुमेह के खतरे को कम करता है 
अध्ययनों से पता चला है कि नियमित रूप से दौड़ना टाइप -2 मधुमेह के खतरे को कम करने में मदद करता है।
आज मधुमेह एक ऐसी बीमारी बन गई है जिसकी चपेट में आने वाले मरीजों की संख्या में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। इसका मुख्य कारण नियमित रूप से व्यायाम न करना हो सकता है। अगर आप सुबह-सुबह दौड़ लगाते भी हैं तो इससे मधुमेह पर नियंत्रण पाया जा सकता है तथा इंसुलिन बनने की प्रक्रिया में भी सुधार सकता है।
ऊर्जा बढ़ाता है:-
सुबह उठते ही आपको थकान होने लगती है, इसीलिए सुबह की थकान को दूर करने के लिए आपको रोज दौड़ना शुरू कर देना चाहिए। आपको दौड़ने को अपने रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्‍सा बनाना चाहिए। इससे आपकी ऊर्जा का स्‍तर बढ़ेगा और आप दिन भर अधिक क्षमता से काम कर पाएंगे।
उच्च रक्तचाप और अस्थमा
जो लोग उच्च रक्तचाप और अस्थमा से पीड़ित हैं उन्हें भी धीरे-धीरे ही सही, सुबह दौड़ना चाहिए। दौड़ने से अस्थमा रोगियों के लिए फायदा यह है कि इससे फेफड़े मजबूत होते हैं तथा श्वसन प्रक्रिया में सुधार होता है। इसके अलावा इससे धमनियों का व्यायाम होता है और रक्तचाप नियंत्रित रहता है।
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10.2.17

टिंडे खाने के फायदे :Tinda vegetable Benefits

 
   गोल और हरे रंग सी दिखने वाली सब्जी टिंडा, जिसे बेबी पंपकिन और एप्पल गॉर्ड के नाम से भी जाना जाता है। यह साउथ एशिया में खासतौर पर इस्तेमाल किया जाता है। बहुत सारे लोगों को इसका स्वाद कुछ खास पसंद नहीं होता, इसलिए ये सब्जी कम ही उपयोग में आती है। लेकिन इसमें सेहत से जुड़े कई सारे फायदे छिपे होते हैं जिन्हें जानने के बाद इसे ज्यादातर लोग जरूर खाना पसंद करेंगे।समस्त भारत में पंजाब,उत्तर प्रदेश ,राजस्थान एवं महाराष्ट्र में सब्जी के रूप में इसकी खेती की जाती है | आयुर्वेदीय प्राचीन ग्रंथों में इसका उल्लेख प्राप्त नहीं होता | इसके फलों में प्रोटीन,वासा,खनिज द्रव्य तथा कार्बोहायड्रेट पाया जाता है | आईये जानते हैं टिंडे के कुछ औषधीय गुणों के बारे में -
* टिंडे का रस निकालकर मिश्री मिलाकर पीने से प्रदर तथा प्रमेह में लाभ होता है |
* टिंडे को पीसकर लगाने से आमवात में लाभ होता है |
*टिंडे के बीज तथा पत्तों को पीसकर सूजन पर लगाने से सूजन मिटती है |
* पके हुए टिंडे के बीजों को निकालकर मेवे के रूप में सेवन करने से यह पौष्टिक तथा बलकारक होता है |
* टिंडे के डण्ठल की सब्जी बनाकर खाने से कब्ज में लाभ होता है |
* टिंडे की सब्जी बनाकर सेवन करने से मूत्रदाह तथा मूत्राशय शोथ का शमन होता है |
*एंटी-एंजिंग के लिए-
टिंडे में केरोटिन की मात्रा होती है जो चेहरे पर दिखने वाले दाग-धब्बे और झुर्रियों को दूर रखती है। साथ ही स्किन इन्फेक्शन से भी बचाती है। उम्र बढ़ने के साथ चेहरे पर बारीक लाइनें बनने लगती हैं, जो असमय बुढ़ापे का कारण होती हैं। इन्हें दूर तो नहीं किया जा सकता, लेकिन कम जरूर किया जा सकता है।
* कैंसर से बचाता है-
टिंडे में 24 मिलीग्राम फॉस्फोरस, 0.4 मिलीग्राम थियामिन, 0.08 मिलीग्राम रिबोफ्लेविन की मात्रा होती है जो बॉडी को हेल्दी रखने के साथ ही उसे कई प्रकार के कैंसर से बचाती है। खासतौर पर महिलाओं को होने वाले ब्रेस्ट और प्रोटेस्ट कैंसर से
*पाचन सही रखता है-
टिंडे में मौजूद फाइबर की मात्रा पाचन क्रिया को सही रखने में बहुत मददगार होती है। इसकी सब्जी गैस, अपच, कब्ज जैसी समस्याओं को भी दूर रखती है। इसके सेवन से पेट की अंदरूनी सफाई भी होती है। गर्मियों में मसालेदार खाने के कारण होने वाली एसिडिटी, डायरिया और डिहाइड्रेशन की प्रॉब्लम को भी टिंडा दूर रखता है।
* मोटापा कम करे-
टिंडे में 94 प्रतिशत पानी की मात्रा होती है, जो मोटापा कम करने में सहायक होती है। तो ब्रेकफास्ट छोड़ने और ओवरइटिंग के कारण बढ़ने वाले मोटापे को रोकने के लिए, रोजाना सुबह इसका जूस पीकर वजन को काफी हद तक कंट्रोल किया जा सकता है।
*दिल की बीमारी से रखे दूर-
टिंडे के प्रति 100 ग्राम में 21 कैलोरी होती है। हार्ट हेल्थ के लिए बैलेंस डाइट का होना सबसे ज्यादा जरूरी है। क्योंकि प्रोटीन, विटामिन, कार्बोहाइड्रेट किसी की भी ज्यादा मात्रा दिल की बीमारियों का कारण बन सकती है।
*हाई ब्लड प्रेशर के लिए-
हाई ब्लड प्रेशर वाले रोगियों को टिंडे के रस का सेवन करना चाहिए। यह उनके लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। इसमें ऐसे बहुत सारे तत्व मौजूद होते हैं जो कोलेस्ट्रॉल लेवल को कम करते हैं जिससे ब्लड प्रेशर नॉर्मल रहता है।
* सूजन से राहत-
जोड़ों की समस्या होने पर सुबह-सुबह उनमें सूजन आना आम बात होती है। यहां तक कि चोट आदि के कारण भी शरीर पर नीले निशान पड़ जाते हैं और उनमें सूजन आ जाती है। तो इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए टिंडे का ज्यादा-से-ज्यादा इस्तेमाल फायदेमंद रहेगा।

8.2.17

कनेर के गुण लाभ उपयोग :Benefits of using kaner

  




    कनेर का पेड़ भारत में लगभग हर जगह देखा जा सकता है। यह सदाहरित झाड़ी है जो हिमालय में नेपाल से लेकर पश्चिम के कश्मीर तक, गंगा के ऊपरी मैदान और मध्यप्रदेश में बहुतायत से पाई जाती है। अन्य प्रदेशों में यह कम पाई जाती है। परंतु संपूर्ण भारत में अपने  दिखावटी फूलों के लिए यह दिन प्रतिदिन लोकप्रियता प्राप्त कर रहा है। यह चारदीवारी के किनारे या बाग में उगाया जाता है। कनेर के फूलों के गुच्छे मई से अक्टूबर तक बहुतायत में खिलते रहते हैं। इसे रेगिस्तान का गुलाब भी कहते हैं।
कनेर के पौधे की संरचना :-
 कनेर का पौधा एक झाड़ीनुमा होता है | इसकी ऊंचाई 10 से 12 फुट की होती है | कनेर के पौधे की शखाओं पर तीन – तीन के जोड़ें में पत्ते लगे हुए होते है | ये पत्ते 6 से ९ इंच लम्बे एक इंच चौड़े और नोकदार होते है | पीले कनेर के पौधे के पत्ते हरे चिकने चमकीले और छोटे होते है | लेकिन लाल कनेर और सफेद कनेर के पौधे के पत्ते रूखे होते है |
कनेर के पौधे को अलग – अलग स्थान पर अलग अलग नाम से जाना जाता है | जैसे :-
१. संस्कृत में :- अश्वमारक , शतकुम्भ , हयमार ,करवीर
२. हिंदी में :- कनेर , कनैल
३. मराठी में :- कणहेर
४. बंगाली में :- करवी
५. अरबी में :- दिफ्ली
६. पंजाबी में :- कनिर
७. तेलगु में :- कस्तूरीपिटे
आदि नमो से जाना जाता है |
औषधि के रूप में सफेद कनेर का प्रयोग ही सबसे अधिक होता है। कनेर के पेड़ को कुरेदने या तोड़ने से एक सफेद द्रव्य निकलता है जिसका प्रयोग औषधि के रूप में किया जाता है। कुछ लोगों का मानना है कि कनेर के पेड़ इतने जहरीले होते हैं कि सांप भी इसके आस-पास नहीं आते।


गुण-
कनेर का रस कटु, तीखा, कषैला, लघु, रूखा व गर्म होता है। इसका पका फल कडुवा होता है। यह कुष्ठ, त्वचा रोग, घाव, खुजली, कीड़े, बुखार, पामा, गर्मी, वात रोग, लकवा एवं उपदंश रोग को दूर करता है। इसका प्रयोग कुत्ते के जहर को उतारने और आंखों के रोग दूर करने के लिए भी किया जाता है।
विभिन्न रोगों में उपचार-
घाव:
कनेर के सूखे हुए पत्तों का चूर्ण बनाकर घाव पर लगाने से घाव जल्द भर जाते हैं।
फोड़े-फुंसियां:
कनेर के लाल फूलों को पीसकर लेप बना लें और यह लेप फोड़े-फुंसियों पर दिन में 2 से 3 बार लगाएं। इससे फोड़े-फुंसियां जल्दी ठीक हो जाते हैं।
दाद:
कनेर की जड़ को सिरके में पीसकर दाद पर 2 से 3 बार नियमित लगाने से दाद रोग ठीक होता है।
*कनेर के पत्ते, आंवला का रस, गंधक, सरसों का तेल और मिट्टी के तेल को मिलाकर मलहम बना लें। इस मलहम को दाद पर लगाने से दाद खत्म होता है।
लाल या सफेद फूलों वाली कनेर की जड़ को गाय के पेशाब में घिसकर लगाने से दाद ठीक होता है। इसका लेप बवासीर व कुष्ठ रोग को ठीक करने के लिए भी किया जाता है।
सांप, बिच्छू का जहर:
सफेद कनेर की जड़ को घिसकर डंक पर लेप करने या इसके पत्तों का रस पिलाने से सांप या बिच्छू का जहर उतर जाता है।


हृदय शूल :-
 कनेर के पौधे की जड़ की छाल की 100 से 200 मिलीग्राम की मात्रा को भोजन के बाद खाने से हृदय की वेदना कम हो जाती है |
बवासीर:
कनेर और नीम के पत्ते को एक साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को बवासीर के मस्सों पर प्रतिदिन 2 से 3 बार लगाएं। इससे बवासीर के मस्से सूखकर झड़ जाते हैं।
कनेर की जड़ को ठंडे पानी के साथ पीसकर दस्त के समय जो अर्श (बवासीर) बाहर निकल आते हैं उन पर लगाएं। इससे बवासीर रोग ठीक होता है।
नंपुसकता:
सफेद कनेर की 10 ग्राम जड़ को पीसकर 20 ग्राम वनस्पति घी के साथ पका लें। इस तैयार मलहम को लिंग पर सुबह-शाम लगाने से नुपंसकता दूर होती है।
सफेद कनेर की जड़ की छाल को बारीक पीसकर भटकटैया के रस के साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को 21 दिनों के अंतर पर लिंग की सुपारी छोड़कर बांकी लिंग पर लेप करने से नपुंसकता खत्म होती है।
जोड़ों का दर्द:
लाल कनेर के पत्तों को पीसकर तेल में मिलाकर लेप बना लें और इस लेप को जोड़ों पर लगाएं। इसे लेप को सुबह-शाम जोड़ों पर लगाने से दर्द में आराम मिलता है।
धातुरोग:
सफेद कनेर के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से धातुरोग एवं गर्मी से होने वाले रोग आदि ठीक होता है।
अंडकोष की खुजली:
सफेद या लाल फूल वाली कनेर की जड़ को तेल में पका लें और इस तेल को अंडकोष की खुजली पर लगाएं। इससे अंडकोष की खुजली दूर होती है और फोडे़-फुंसी भी मिट जाते हैं।
अंडकोष की सूजन:
सफेद कनेर के पत्ते को कांजी के साथ पीसकर हल्का गर्म करके अंडकोष पर बांधे। इससे अंडकोष की सूजन दूर होती है।


दांतों का दर्द:
सफेद कनेर की डाल से प्रतिदिन 2 बार दातून करने से दांत का दर्द ठीक होता है और दांत मजबूत होते हैं।
बालों का सफेद होना:
सफेद और लाल कनेर के पत्ते को दूध में पीसकर सिर में लगाने से बालों का सफेद होना (पलित रोग) कम होता है। पीले रंग के फूल वाले कनेर का प्रयोग ज्यादा लाभकारी है।
बालों का गिरना:
कनेर की जड़, दंती व कड़वी तोरई को एक साथ पीसकर केले के रस व तेल के साथ पका लें। इस तैयार लेप को सिर पर लगाने से बालों का गिरना बंद होता है।
अफीम की आदत:
अफीम की आदत छुड़ाने के लिए 100 मिलीग्राम कनेर की जड़ को बारीक पीसकर चूर्ण बना लें। यह चूर्ण 2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ कुछ हफ्ते तक नियमित सेवन कराने से अफीम की आदत छूट जाती है।
कुत्ता काट लेने पर:
सफेद कनेर की जड़ की छाल का बारीक चूर्ण बनाकर 60 मिलीग्राम की मात्रा में 4 चम्मच दूध में मिलाकर दिन में 2 बार एक हफ्ते तक रोगी को पिलाएं। इससे कुत्ते का जहर उतर जाता है।
दर्द व सूजन:
शरीर का कोई भी अंग सूजन जाने पर लाल या सफेद फूल वाले कनेर के पत्तों का काढ़ा बनाकर मालिश करें। इससे सूजन में जल्दी आराम मिलता है।
सूजन और दर्द को दूर करने के लिए लाल या सफेद फूल वाले कनेर की जड़ को गाय के मूत्र में पीसकर लगाएं। इससे सूजन व दर्द ठीक होता है।
उपदंश (सिफिलिस):
लाल फूल वाले कनेर की जड़ को पानी में घिसकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाने से लाभ होता है। इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर घाव को धोना भी लाभकारी होता है।
सफेद कनेर की जड़ को पानी में पीसकर उपदंश पर लगाने से घाव, सूजन, जलन व दर्द ठीक होता है।
कुष्ठ रोग (सफेद दाग):
200 ग्राम कनेर के पत्ते को एक बाल्टी पानी में उबाल लें और इस उबले पानी से नहाएं। इससे कुष्ठ (कोढ़) के जख्म समाप्त होते हैं।
*सफेद या लाल फूल वाले कनेर की जड़ को पीसकर गाय के पेशाब में मिलाकर कुष्ठ (कोढ़) पर लगाने से आराम मिलता है।
*सफेद कनेर के 100 ग्राम पत्ते को 2 लीटर पानी में उबालें। जब यह उबलते-उबलते 1 लीटर बचा रह जाए तो इसे छानकर एक बाल्टी पानी में मिलाकर नहाएं। प्रतिदिन इस तरह पानी तैयार करके कुछ महीनों तक नहाने से कुष्ठ रोग ठीक होता है।
*कनेर की जड़ की छाल का रस निकालकर रोगग्रस्त स्थान पर लगाने से कोढ़ और अन्य त्वचा रोग समाप्त होते हैं।
*कनेर की जड़ की छाल को पानी के साथ घिसकर कुष्ठ (कोढ़) के दाग पर लगाने से दाग नष्ट होते हैं।
नासूर (पुराना घाव):
कनेर के पत्ते को छाया में सूखा लें और इसका चूर्ण बनाकर जख्म पर छिड़कें। इससे जख्म ठीक होता है।
और भी-


*कनेर के ताज़े – ताज़े फूल की ५० ग्राम की मात्रा को 100 ग्राम मीठे तेल में पीसकर कम से कम एक सप्ताह तक रख दें | एक सप्ताह के बाद इसमें 200 ग्राम जैतून का तेल मिलाकर एक अच्छा सा मिश्रण तैयार करें | इस तेल की नियमित रूप से तीन बार मालिश करने से कामेन्द्रिय पर उभरी हुई नस की कमजोरी दूर हो जाती है इसके साथ पीठ दर्द और बदन दर्द को भी राहत मिलती है |
*सफेद कनेर की पत्तिया छाया में सुखाकर महीन पीस लें। सिर में जिस भाग में दर्द हो उधर के नथूने में, उसमें से दो चावल के बराबर फूँक दे। इस क्रिया से नाक से खूब पानी गिरेगा और ढेर सारी छीकें आकर, आधासीसी में आराम हो जायेगा। माथे में बलगम या पानी रूक जाने से सिरदर्द होता है, उसमें भी इस क्रिया से लाभ होता है।
*लाल कनेर के फूल और नाम मात्र की अफीम दोनो को मिलाकर, पानी के साथ पीसकर, गर्म करके मस्तक पर लेप करने से, कुछ ही देर में सिर का भयानक दर्द और सर्दी जुकाम ठीक हो जाते हैं।
*कनेर के पत्तों को कड़वे तेल में भूनकर शरीर पर मलने से खुजली शान्त हो जाती है।
कनेर के पत्ते, गंधक, सरसों का तेल, मिêी का तेल इन सबका मरहम बनाकर लगाने से दाद कुछ ही दिनों में साफ हो जाते है।
कृमि रोग:-
 कनेर के पत्तों को तेल में पकाकर घाव पर बांधने से घाव के कीड़े मर जाते है |
सिर दर्द :-
 कनेर के फूल और आंवले को कांजी में पीसकर लेप बनाएं | इस लेप को अपने सिर पर लगायें | इस प्रयोग से सिर का दर्द ठीक हो जाता है |
नेत्र रोग :- 
आँखों के रोग को दूर करने के लिए पीले कनेर के पौधे की जड़ को सौंफ और करंज के साथ मिलाकर बारीक़ पीसकर एक लेप बनाएं | इस लेप को आँखों पर लगाने से पलकों की मुटाई जाला फूली और नजला आदि बीमारी ठीक हो जाती है |
दातुन :- 
सफेद कनेर की पौधे की डाली से दातुन करने से हिलते हुए दांत मजबूत हो जाते है | इस पौधे का दातुन करने से अधिक लाभ मिलता है |
हानिकारक प्रभाव -
कनेर एक प्रकार का जहर है जिसे खाने से फेफड़ों को नुकसान हो सकता है। इसके सेवन से हृदय और श्वास की गति रुक सकती है। अत: इसके प्रयोग औषधि के रूप में करते समय बेहद सावधानी रखनी चाहिए।

3.2.17

करंज के गुण तथा आयुर्वेदिक उपयोग:Ayurvedic treatment using karanj

    

    करंज (Millettia Pinnata) विशाल ,अनेक शाखाओं से युक्त छाया दार पेड़ है. इसकी ऊँचाई और चौडाई दोनों ही खूब होती हैं. इसके कारण ये घनी छाया देते हैं. ये अक्सर नदी, तालाबों के किनारे देखने को मिलते है. ये मुख्यरूप से आंद्र भूमी पर पाए जाते हैं.
करंज का वृक्ष जंगलोँ मेँ होता है। इसकी छाया घनी और ठंडी होती है। करंज की फली लंबी होती है और इसमेँ लंबे व मोटे बीज होते हैँ।
करंज के विभिन्न नाम:
संस्कृत- करंज
हिन्दी- कंजा या कटजरंजा
लैटिन- पोनगेमियालेवा
अंग्रेजी- स्मघलिव्ड पोनगेमिया
गुजराती- कणझी
मराठी- करंज
बंगाली- डहरकरंज
     
इस पर कांटे बहुत होते हैं. इनके बीजों का आवरण कौड़ी के समान सख्त होते हैं. कंटीले होने के कारण लोग इन्हें बाग़ और खेतों की मुंडेरों पर लगाते हैं.
इसके बीजों से तेल निकला जाता है. इसी का मुख्य प्रयोग होता है. इस का फल वात, पित्त, कफ, प्रमेह, दिमांगी रोग, को खतम करता है. इसका तेल योनीदोष, गुल्म, उदावर्त, खुजली, नेत्र रोग, घाव आदि में उपयोग होता है. क
करंज के  औषधीय उपयोग:
*. करंज के बीजोँ का तेल निकालकर चेहरे पर लगाने से मुहाँसे ठीँक होते हैँ।
* दमा के रोगियोँ को करंज के बीजोँ का काढा बनाकर पीना चाहिये।
* करंज का तेल खुजली, जख्म, कोढ व त्वचा के अन्य रोगोँ मेँ लाभकारी होता है।
*यदि चूहा काट लिया हो तो करंज के बीज व छाल एक साथ पीसकर लेप करेँ। इससे चूहा का जहर उतर जाता है।

* करंज के बीजोँ को गर्म पानी मेँ घिसकर थोडा सा गुड मिलाकर नाक से खीँचे। इससे माइग्रेन ठीँक होता है।
* करंज के बीज को सेँककर टुकडा करके खाने से उल्टी बंद हो जाती है।
करंज (Millettia Pinnata) के आयुर्वेदिक उपयोग
अपस्मार में-
 गुड़ के साथ इस का चूर्ण फायदा देता है.
शूल में-
 जो लोग धूम्रपान करते हैं. वो इस विधि को कर सकते हैं. इस के बीजों के साथ तम्बाकू का सेवन करने से शूल का दर्द कम हो जाता है.
कुष्ठ में-

 इसकी छाल को लगाना और इसका तेल लगाना दोनों ही लाभ देते हैं.
अंडवृद्धि पर- 
इसके बीजों को पीस कर लगाने से अंडवृद्धि सूजन, गांठ तथा गण्डमाला पर आराम मिलता है.
पित्त पर-
 इस की नर्म छाल को या इसका जूस पिलाने से आराम आता है.
करँज तेल-
तीक्ष्ण, गरम, कृमिनाशक, रक्तपित्तकारक, तथा नेत्र रोग, वात पीडा, कुष्ठ, कण्डू, व्रण तथा खुजली को नष्ट करता है। इसके लेप से त्वचा विकार दूर होते हैं घृत करँज - चरपरा गर्म तथा व्रण, वात, सर्व प्रकार के त्वचा रोग, अर्श रोग, तथा कुष्ठ रोग को नष्ट करता है।

2.2.17

पनीर खाने के स्वास्थ्य लाभ : The health benefits of eating cheese

    

   दूध में मौजूद सभी पोषक तत्व जैसे प्रोटीन, कैल्शियम, विटामिन बी-2, बी-12, ए व डी सभी पनीर में भी रहते हैं। अभी की खोजों से पता चला है कि पनीर दांतों के लिए भी लाभकारी होता है। उसमें पाए जाने वाले खनिज, लवण, कैल्शियम और फॉस्फोरस दांतों के इनैमल की रक्षा करते हैं।
  पनीर हमारी हड्डियों को भी मजबूती भी देता है। पनीर एक अकेला ऐसा खाद्य है जिसे हर तरह से खाया जा सकता है। चाहे सलाद में प्रयोग करें या सब्जी में और तो और आप इसकी मीठी चीज बनाकर भी इसका इस्तेमाल कर सकती हैं। आइए जानें पनीर के गुणों के बारे मेंं।
पाचन शक्ति बढ़ाए-
पनीर का सेवन करने से शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता बढ़ती है। रोग प्रतिरोधी क्षमता मजबूत होती है तो बीमारियों से लड़ने की शरीर की क्षमता बढ़ जाती है।
गठिया से राहत-
गठिया रोग का सबसे बड़ा कारण कैल्शियम की कमी है। पनीर इस रोग से पीडितों के लिए सबसे अच्छा उपाय है। इस बीमारी का इलाज प्रोटीन, कैल्शियम और उच्च मात्रा में विटामिन और मिनरल्स का सेवन है और ये सभी चीजें पनीर में मौजूद होती है।
तनाव करे कम-
रात को नींद नहीं आती या फिर तनाव से ग्रस्त हैं तो सोने से पहले खाने में पनीर का सेवन करें, नींद अच्छी आएगी। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि पनीर में ट्राईप्टोफन एमिनो एसिड पाया जाता है, जो तनाव कम करने और नींद को बढ़ाने में मददगार साबित होता है।
हड्डियों को बनाए मजबूत-
पनीर में मौजूद कैल्शियम हड्डियों को मजबूत बनाता है। पनीर में विटामिन ए, फास्फोरस और जिंक पाए जाते हैं। विटामिन बी भी पनीर में पाया जाता है, जो शरीर को कैल्शियम प्रदान करता है। खासतौर से बच्चों, गर्भवती महिलाओं और बुजुर्गों की हड्डियों को मजबूत करने में पनीर मदद करता है।
जानलेवा बीमारियों से बचाव-
पनीर बहुत सारी जानलेवा बीमारियों से बचाव भी करता है। जैसे कि कैंसर। पनीर खाने से शरीर में कैंसर के लिए जिम्मेदार सेल्स की ग्रोथ रूक जाती है। इसके अलावा, ये धमनियों की रूकावट को भी रोकता है जिससे कि दिल की कई बीमारियों का जोखिम कम हो जाता है।
    पनीर के इतने फायदों के बावजूद कुछ लोग इसे उतना हेल्दी नहीं मानते। पनीर को मोटापा बढ़ाने वाला आहार भी समझा जाता है। जबकि सही बात ये है कि पनीर में अधिक कैलोरी होती है और ये उन लोगों के लिए अच्छा है जिनका लाइफस्टाइल ऐसा हो जिसमें वो ज्यादा कैलोरी बर्न करते हों। दूसरी बात, पनीर को तैयार करने के तरीके पर खास ख्याल करना चाहिए। इसे काली मिर्च और नमक डालकर ऐसे ही कच्चा खाया जा सकता है। अगर आप इसे किसी डिश में इस्तेमाल कर रहे हैं तो इसे तले नहीं।
प्रोटीन का अच्छा स्रोत-
वेजिटेरियन लोग, जो प्रोटीन के लिए मीट नहीं खाते, पनीर सबसे अच्छा स्रोत है। 100 ग्राम प्रोटीन में 18 ग्राम प्रोटीन होता है जो कि उन लोगों के लिए बहुत अच्छा है जो मसल बिल्डिंग करना चाहते हैं। इसलिए अगर आप वेजिटेरियन है, अपने खाने में नियमित रूप से पनीर को शामिल करना न भूलें।फैट बर्न करने में मददगार
प्रोटीन और कैल्शियम के अलावा, पनीर में लीनोलाइक एसिड (linoleic acid) भी काफी मात्रा में पाया जाता है। ये एक तरह का फैटी एसिड होता है जो शरीर में फैट बर्निंग प्रॉसेस को तेज़ करता है और वज़न कम करने में मदद मिलती है। इसलिए वो लोग जो वजन कम करना चाहते हैं उन्हें अपने डाइट प्लान में पनीर की कोई डिश या फिर कच्चा पनीर शामिल करें 
देर तक देता है ऐनर्जी-
क्योंकि पनीर में काफी मात्रा में प्रोटीन होता है इसलिए ये शरीर में धीरे-धीरे एनर्जी रिलीज़ करता है। इस वजह से न तो ब्लड शुगर लेवल एकदम से बढ़ता है और न ही ये अचानक वाली ऐनर्जी देता है जो तुरंत कम भी हो जाती है। इसे खाने के बाद लंबे वक्त तक भूख का अहसास नहीं होता। इसलिए इसे स्नैक्स में भी लिया जा सकता है।रना चाहिए।
दांत बनाए मज़बूत-
पनीर में प्रोटीन के अलावा कैल्शियम भी होता है। इससे दांत और हड्डियां मज़बूत होती हैं। पनीर हालांकि दूध से बना उत्पाद है लेकिन जब पोषण की बात आती है तो ये दूध से बेहतर होता है। अगर आप दोनों को बराबर मात्रा में लें, तो पनीर में दूध से ज्यादा प्रोटीन होगा।बस,पनीर में कैलोरी थोड़ी ज्यादा होती है। अगर आप अपने दांत और हड्डियां मजबूत बनाना चाहते हैं तो पनीर को खाने में ज़रूर शामिल करें।
*रात के भोजन के साथ आप पनीर जरूर खाएं, लेकिन इस बात का ध्यान दें कि खाने के एक घंटे के बाद आप बिस्तर पर सोने के लिए जाए।
*सोते वक्तर हमारी मांसपेशियां और लंबाई बढ़ जाती है, जिसके लिये हमारे शरीर को प्रोटीन की आवश्यनकता पड़ती है। ऐसे में पनीर खाना आपके लिए अच्छा विकल्प है
*अगर आप संतुलित मात्रा में पनीर को खाते हैं तो कभी भी मोटे नहीं होंगे और आपकी बॉडी का साइज भी सही रहेगा।
कैसे है पनीर का पानी भी लाभकारी -
दूध को फाड़कर या फिर फटे हुए दूध से आप पनीर (Paneer) तैयार कर सकते हैं। इसको बनाते वक्त पानी बच जाता है तो उसे फेके नहीं बल्कि उसे रख लें। यदि आप बॉडी में प्रोटीन की मात्रा को बढ़ाना चाहते हैं तो उस पानी को संतुलित मात्रा में पी सकते हैं।
गठिया रोग से पीड़ित और हड्डियों की मजबूती के लिए फायदेमंद है पनीर. इसके अलावा  दांत को भी मजबूर रखता है और पाचन शक्ति को भी दुरुस्त रखता है। गर्भवती महिलाएं भी पनीर (Paneer) का सेवन कर सकती हैं क्योंकि यह बच्चे के संपूर्ण विकास में लाभदायक है।