14.1.17

किस ऋतु में क्या खाएँ? : What to eat in what season?

    आज लोग पर्याप्त पौष्टिक भोजन कर रहे हैं, परंतु उसका लाभ नहीं हो रहा है। अच्छा खाने के बाद भी रोग हो रहे हैं। इसका कारण है कि भोजन लेने का तरीका और समय सही नहीं है। उन्हें यही नहीं पता कि किस समय और क्या खाना उचित है।
दही का वर्षा ऋतु में सेवन न करें। वर्षा ऋतु को पित्त का संचय काल माना गया है। इसमें स्वाभाविक रूप से पित्त बनता है। अम्ल गुण वाला होने के कारण से दही पित्त को बढ़ाता है। इसलिए वर्षा ऋतु में दही का सेवन करने से पित्तज रोग होने की संभावना बढ़ जाएगी। पित्तज रोग यानी चर्म रोग, एसिडिटी, शरीर में उष्णता बढ़ना आदि हैं। इसके अतिरिक्त रात में कभी भी दही का सेवन नहीं किया जाना चाहिए। दही स्रोतों में रूकावट पैदा करने वाला है। अच्छे स्वास्थ्य के लिए स्रोतों का निर्बाध होना आवश्यक है ताकि रस, रक्त, मांस, मेद, हड्डी, मज्जा, वीर्य आदि के पोषण की प्रक्रिया चलती रहती है। स्रोतों के बाधित होने से आम का संचय होता है जिससे भूख घटना, जुकाम, खांसी, मोटापा, मधुमेह आदि होने की संभावना बढ़ जाती है। आज जो मधुमेह बढ़ रहा है, उसका एक बड़ा कारण दही का बढ़ता उपयोग है। पंजाब में इसलिए मधुमेह के रोगी अधिक पाए जाते हैं। हालांकि राजस्थान जैसे जांगल प्रदेशों में दही का प्रयोग लाभकारी है। थोड़ा बहुत स्थान का भी प्रभाव रहता है, परंतु ये सर्वसामान्य नियम हैं, इसका ध्यान रखना चाहिए।दही खाना ही हो तो उसे छाछ का रूप दे दें। इसमें थोड़ा पानी मिला लें और उसमें सैंधा या काला नमक मिला लें। फिर यह लाभकारी हो जाएगा। दही पथ्य नहीं है, छाछ पथ्य है। दही में पेट के लिए लाभकारी वैक्टीरिया होते हैं, परंतु उनका लाभ लेने और नुकसानों से बचने के लिए दही में कुछ न कुछ जैसे पानी, शक्कर, शहद, घी, आंवला या मंूग का सूप आदि कुछ अवश्य मिलाएं।
अब जानते हैं किस ऋतु मे क्या आहार होना चाहिए-



शिशिर ऋतु (जनवरी से मार्च)
इस मौसम में घी, सेंधा नमक, मूँग की दाल की खिचड़ी, अदरक व कुछ गरम प्रकृति का भोजन करना चाहिए।
कड़वे, तिक्त, चटपटे, ठंडी प्रकृति के व बादीकारक भोजन से परहेज रखें।
बसंत ऋतु (मार्च से मई)
इस मौसम में जौ, चना, ज्वार, गेहूँ, चावल, मूँग, अरहर, मसूर की दाल, बैंगन, मूली, बथुआ, परवल, करेला, तोरई, अदरक, सब्जियाँ, केला, खीरा, संतरा, शहतूत, हींग, मेथी, जीरा, हल्दी आँवला आदि कफनाशक पदार्थों का पदार्थों का सेवन करें।
गन्ना, आलू, भैंस का दूध, उड़द, सिंघाड़ा, खिचड़ी व बहुत ठंडे पदार्थ, खट्टे, मीठे, चिकने, पदार्थों का सेवन हानिकारक है। ये कफ में वृद्धि करते हैं।
ग्रीष्म ऋतु (जून से जुलाई)
पुराना गेहूँ, जौ, सत्तू, भात, खीर, दूध ठंडे पदार्थ, कच्चे आम का पना, बथुआ, करेला, परवल, ककड़ी, तरबूज आदि का सेवन वाँछनीय है।


तिक्त, नमकीन, चटपटे, गरम व रूखे पदार्थों का सेवन न करें।
वर्षा ऋतु (अगस्त से सिम्बर)
पुराने चावल, पुराना गेहूँ, खीर, दही, खिचड़ी, व हल्के पदार्थों का सेवन करना चाहिए। बरसात में पाचन शक्ति कमजोर रहती है अतः कम मात्रा में भोजन करने से शरीर स्वस्थ रहता है।
शरद ऋतु (अक्टूबर से नवम्बर)
शीत ऋतु में जठराग्नि प्रबल होती है, खाया हुआ आसानी से पच जाता है, गरिष्ठ भोजन भी पचकर शरीर को शक्ति प्रदान करते हैं।
गर्म दूध, घी, गुड़, मिश्री, चीनी, खीर, जलेबी, आँवला, नीबू, जामुन, अनार, नारियल मुनक्का, गोभी तथा शक्ति प्रदान करने वाले पदार्थों का सेवन करें।
हेमंत ऋतु ( दिसम्बर से जनवरी)
सभी प्रकार के आयुर्वेदिक रसायन, बाजीकारक पदार्थ, दूध, खोए से बने पदार्थ, आलू, जलेबी, नया चावल, छाछ, अनार, तिल, जमीकंद, बथुआ तथा जो भी सेहत बनाने वाले पदार्थ हों, ले सकते हैं। वैसे भी शीत ऋतु सेहत बनाने हेतु सर्वोत्तम मानी गई है। पौष्टिक व विटामिन्स से भरपूर पदार्थ लेना चाहिए।
पुराना अन्न, मोठ, कटु, रूखे, शीतल प्रकृति के पदार्थ न लें। भोजन अल्प मात्रा में न करें

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