6.1.17

पेशाब की समस्याओं की होम्योपैथिक चिकित्सा : Homeopathic treatment of urination problems





मूत्राशय एवं गुर्दे संबंधी रोग अनेक कारणों से हो सकते हैं। विकसित देशों में इन रोगियों की संख्या अधिक पाई जाती है। गुर्दे संबंधी बीमारियां मुख्य रूप से अकारण होने वाले बुखार की स्थिति में, थकान, वजन गिरते जाना, उल्टी होना, जी मिचलाना, कमजोरी एवं रक्तहीनता की परेशानियां होने पर, गुर्दो की कार्यप्रणाली की जांच करना भी आवश्यक है, क्योंकि यह सब गुर्दो की खराबी की वजह से भी हो सकता है।
उच्च रक्तचाप, हृदय का काम करना बंद कर देना, पैरों, चेहरे एवं शरीर की सूजन गुर्दो की खराबी को परिलक्षित करने के लिए पर्याप्त हैं। बिना कारण सिरदर्द रहना, दौरे पड़ना, मूर्छा आना आदि भी गुर्दो की खराबी के कारण हो सकता है। गुर्दो में पथरी के कारण दर्द रहना, मधुमेह होना, सूजन के साथ-साथ उदर में पानी भर जाना गुर्दो की खराबी को ही परिलक्षित करते हैं। पेशाब करते समय दर्द होना, पेशाब न होना, अधिक पेशाब होना, पेशाब में खून आना, पेशाब रोक न पाना, सोते समय पेशाब निकल जाना आदि मूत्राशय से संबंधित परेशानियां हैं।

पेशाब करने में दर्द महसूस होना – 
यह अनेकों कारणों से हो सकता है – पेशाब करने की अचानक इच्छा होना, मूत्राशय के पीछे के झिल्ली की सूजन, पथरी अथवा किसी अनियमित कोशिका-वृद्धि के कारण हो सकती है। अन्य कारण, जिनकी वजह से दर्द के साथ एकदम ही पेशाब की हाजत उठती है, वे हैं –*मूत्राशय में पथरी।
* बुढ़ापे में प्रोस्टेट ग्रंथि के अनियमित रूप से बढ़ जाने के कारण।
* मूत्राशय में कैंसर।
 *स्त्रियों में गर्भाशय में गांठ बनने के कारण या पेट में बच्चा होने पर, मूत्राशय पर दबाव पड़ने के कारण।

*मूत्राशय में सूजन
 *प्रोस्टेट ग्रंथियों की सूजन।
* पेशाब के रास्ते यूरंथ्रा की सूजन।
   *क्षयरोग की वजह से गुर्दे / मूत्राशय में गांठे बनने के कारण।

पेशाब न होना –
 *उल्टियां एवं दस्त होने के कारण।
* अत्यधिक दवाइयों का सेवन, जिनसे बार-बार पेशाब करने जाना पड़ता हो।
* शरीर में पानी की कमी के कारण।
* बुखार एवं पसीना आने से।



प्लाज्मा स्तर (घनत्व) घट जाने के कारण –
* उल्टियां एवं दस्त होने के कारण।
* अत्यधिक दवाइयों का सेवन, जिनसे बार-बार पेशाब करने जाना पड़ता हो।
* हृदय का काम करना बंद करने की स्थिति में (संकुचन के कारण)।

गुर्दे की तात्कालिक अथवा पुरानी बीमारी के कारण
1. मूत्र नलियों का क्षरण।
2. गुर्दों की कार्टिकल सतह का क्षरण।
मूत्र-मार्ग में रुकावट जैसे पथरी इत्यादि के कारण 
पेशाब अधिक होना – .
 * मधुमेह (डायबिटीज मेलीटस)।
 *डायबिटीज इन्सीपिंडस।
* सिर में चोट लगने के कारण।
* गुर्दे की पुरानी खराबी के कारण।
 *मैनीटॉल चिकित्सा के कारण।
* पेशाब नलियों के क्षरण के ठीक होने की स्थिति में।
 *अत्यधिक पानी पीने के कारण।
पेशाब में रक्त आना 
 पोटैशियम की कमी।
 कैल्शियम की अधिकता।
1. गुर्दों 
में किसी लीजन (चोट अथवा पीड़ा) के कारण।
2. मूत्र नलियों अथवा मूत्राशय में चोट अथवा पीड़ा के कारण
3. पेशाब रोक पाने में असंयम
असत्याभास के कारण –
1. अचानक पेशाब निकल जाना।


2. मूत्राशय की निष्क्रियता।
3. मूत्राशय की ग्रीवा पर अवरोध को प्रकट करते हुए उक्त संक्रमण हो सकता हैं।
प्रोस्टेट ग्रंथि का बढ़ जाना – लगभग 60 या 70 वर्ष के पुरुषों में मूत्राशय के निकास द्वार पर स्थित प्रोस्टेट ग्रंथि जब आकार में बढ़ जाती है, तो मूत्र के सामान्य प्रवाह में रुकावट डालने लगती है जिससे रोगी को पेशाब बूंद-बूंद होना, मूत्र की धार दूर तक जाना, रात को बार-बार मूत्र को उठना जैसे प्रारंभिक लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं। इस दशा को बहुत-से रोगी अनदेखा करके टालते रहते है और फिर एक दिन अचानक पूर्णरूपेण पेशाब रुक जाने के कारण डाक्टरों के पास आते हैं, तो कैथेटर (नली) द्वारा पेशाब उतारने के अलावा और कोई चारा नहीं बचता। बार-बार कैथेटर डालने से मूत्रतंत्र में संक्रमण का खतरा बढ़ जाता है।
पेशाब रोग की होमियोपैथिक रेमेडीज-
लक्षणों की समानता के आधार पर उपरोक्त वर्णित बीमारियों एवं रोग लक्षणों के लिए निम्न होमियोपैथिक औषधियां अत्यधिक कारगर एवं सफल सिद्ध रही हैं –

हेमेमिलिस : बार-बार पेशाब की हाजत के साथ ही पेशाब में खून आना (काले रंग का रक्त स्राव, स्त्रियों में उपनियमित माहवारी) मूल अर्क में 5-10 बूंद औषधि दिन में तीन बार नियमित रूप से लेने पर आराम मिलता है। 30 शक्ति में भी ले सकते हैं।
एपिस : पेशाब में जलन व दुखन, कम मात्रा में कतरे आना, बार-बार हाजत, चुभन जैसा दर्द, गाढ़े पीले रंग का पेशाब, पेशाब की हाजत होने पर रोक पाना मुश्किल, आखिरी बूंद पर अत्यधिक जलन एवं दर्द महसूस होना आदि लक्षण मिलने पर 30 शक्ति में सेवन करना लाभप्रद रहता है।
सैबेलसैरुलाटा : रात्रि में हर वक्त पेशाब करने की हाजत रहना, पेशाब करने में दिक्कत महसूस होना, प्रोस्टेट ग्रंथि बढ़ी हुई, रात में सोते-सोते अपने आप पेशाब हो जाना आदि लक्षण मिलने पर मूल अर्क में 10 बूंद दवा दो-तीन बार सेवन करने पर तात्कालिक लाभ मिलता है।
जिन स्त्रियों में स्तन का विकास ढंग से नहीं हो पाता, उनके स्तन विकास के लिए उपरोक्त दवा (सैबेलसैरुलाटा) अत्यंत उपयोगी है। साथ ही ऐसी स्त्रियों को जैतून के तेल से सुबह शाम स्तन-गोलाई में मालिश भी करनी चाहिए।


लाइकोपोडियम : किसी शीशी में पेशाब को भर कर रखने से तली में रेत के लाल कण जम जाएं और पेशाब बिलकुल साफ रंग का रहे, यह इस दवा का मुख्य लक्षण है। ये लाल कण लिथिक एसिड के होते हैं जिसे यूरिक एसिड भी कहते हैं। यदि रेत कणों को शुरू में ही बाहर न निकाल दिया जाए, तो ये घनीभूत होकर गुर्दे में ही पथरी बन जाते हैं। लाइकोपोडियम 30 शक्ति की 4-6 गोलियां सुबह-शाम चूसनी चाहिए। यह गुर्दे के दर्द की भी दवा है, बशर्ते दर्द दाहिनी तरफ होता हो। पेशाब होने से पहले कमर में दर्द होना और पेशाब धीरे-धीरे होना भी लाइकोपोडियम के लक्षण हैं। कुछ दिन बाद इस की 200 शक्ति की 4 – 6 गोलियों की एक खुराक ले लेने से मूत्र पथरी बनने की सम्भावना भी समाप्त हो जाती है।
केप्सिकम : पेशाब करते समय जलन रहती है। जैसी जलन लाल मिर्च खाने से होती है, वैसी ही भयंकर जलन रोगी महसूस करता है। पाखाना करते समय भी ऐसी ही जलन रहती है। खांसी होने पर, खांसते समय रोगी के सिर में भयंकर दर्द उठता है, धसक-सी लगती है। 30 शक्ति में, दिन में 3 बार 7 दिन तक खानी चाहिए।
सारसापेरिला : पेशाब के समय असह्य कष्ट होना, गर्म चीजों के सेवन से कष्ट बढ़ना, बैठक पेशाब करने में तकलीफ के साथ-साथ बूंद-बूंद करके पेशाब उतरना, खड़े होकर करने पर पेशाब आसानी से होना, पेशाब में सफेद पदार्थ का निकलना और पेशाब का मटमैला होने की स्थिति में 6 शक्ति में लें।
केंथेरिस : मूत्र-मार्ग का संक्रमण, बार-बार पेशाब जाना, असंयम, पेशाब रोक पाने में असमर्थ, पेशाब रोकने पर दर्द, बूंद-बूंद करके पेशाब होना, पेशाब से पहले एवं पेशाब के बाद में जलन रहना, हर वक्त पेशाब की इच्छा, जेलीयुक्त पेशाब आदि लक्षण मिलने पर दवा 30 शक्ति में प्रयोग करनी चाहिए।
नाइट्रिक एसिड : थोड़ा पेशाब होना, घोड़े के बदबूदार पेशाब जैसी दुर्गंध, जलन, चुभन पेशाब में खून एवं सफेद पदार्थ (एल्ब्युमिन) आना, ठंडा पेशाब, साथ ही किसी चौपहिया गाड़ी में चलने पर सारी परेशानियां दूर हो जाती हैं, तो 30 शक्ति में औषधि का सेवन करना चाहिए।
यूकेलिप्टस : गुर्दो का संक्रमण, इन्फ्लूएंजा, पेशाब में रक्त, पेशाब में मवाद आता है, किंतु जांच कराने पर यूरिया कम मात्रा में मिलता है। पेशाब की थैली (ब्लैडर) में ऐसा अहसास होता है कि पक्षाघात हो गया है, पेशाब निकालने की ताकत चुक चुकी है। यूरेथरा (मूत्रमार्ग) में संकुचन आ जाना, मूत्र-मार्ग में घातक जीवाणु संक्रमण, जिसके कारण कोशिका व ऊतकक्षय होने लगता है,पेशाब की बार-बार हाजत आदि लक्षण मिलने पर 10-20 बूंद मूल अर्क लाभ मिलने तक दिन में दो-तीन बार लेते रहना चाहिए।
इक्विजिटम : ब्लैडर (पेशाब की थैली) में हर वक्त हलका दर्द एवं भारीपन, ऐसा अहसास जैसे थैली भरी हुई है, किंतु पेशाब करने के बाद भी राहत न मिलना, बार-बार पेशाब की हाजत, साथ ही अत्यधिक दर्द होना, बूंद-बूंद कर पेशाब होना, तीक्ष्ण जलन, कटने जैसा दर्द महसूस होना, पेशाब रोक पाना असम्भव, बच्चों द्वारा रात्रि में बिस्तर में ही पेशाब कर देना, बूढ़ी औरतों में भी यही बीमारी रहती है। पेशाब में म्यूकस स्राव (चिकनाहट) गर्भावस्था के दौरान एवं बच्चा पैदा होने के बाद स्त्रियों में पेशाब होने में दिक्कत होना व दर्द होना आदि लक्षण मिलने पर मूल अर्क कुनकुने पानी में सेवन करने पर अत्यधिक लाभ मिलता है।
टेरेबिंथ : पेशाब में रक्त, रुक-रुक कर जलन के साथ पेशाब होना, गुर्दो का संक्रमण, पीठ दर्द, मूत्र-मार्ग में स्थायी जलन एवं दर्द, पेशाब में बनकशा पुष्पों (बैंगनी पुष्प) की गंध आदि लक्षण मिलने पर 6 × शक्ति में सेवन करना लाभप्रद रहता है।

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