28.6.10

हाई ब्लड प्रेशर के सरल उपचार. How to treat and tackle high blood pressure?

                            उच्च रक्तचाप की  सरल चिकित्सा                                                                                      

                                                                                                                  
 ब्लड प्रेशर का चार्ट -




                 अनियमित दिनचर्या और जीवन शैली की वजह से होने वाला तनाव आज शहरी आबादी और खासकर युवाओं में हाई ब्लड प्रेशर( हाईपरटेंशन) की समस्या के रूप में तेजी से सामने आ रहा है।भारत की लगभग ३० प्रतिशत शहरी आबादी इस रोग की चपेट में बताई गई है। जबकि १० से १२ प्रतिशत ग्रामीण इस रोग से पीडित हैं। चिकित्सा विग्यान में निम्न रक्त चाप की तुलना में उच्च रक्त चाप ज्यादा नुकसानदेह बताया गया है। कारण ये है कि हाई ब्लड प्रेशर से रोगी में अन्य कई तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। ज्यादा रक्त चाप की परिणिति लकवा अथवा हार्ट अटेक में भी होती है। भारत में ३५ वर्ष से ज्यादा के लोगों में यह रोग तेजी से प्रवेश कर रहा है।


Protected by Copyscape DMCA Copyright Detector     दुनिया भर में कई लोगों की मौत के मुख्य कारणों में से हाईपरटेंशन भी एक कारण है। और इसकी वजह है शारीरिक गतिविधियों की कमी। मोटापा, तनाव, खाने पीने में लापरवाही, गंभीर बीमारियाँ, धूम्रपान, नशा  आदि।
   
      रक्त चाप के अधिकतम दवाब को सिस्टोलिक ब्लड प्रेशर कहते हैं। जबकि कम से कम दाब को डायस्टोलिक प्रेशर कहते हैं।आदर्श ब्लड प्रेशर १२०/८० याने ऊंचे में १२० और नीचे में ८० है। युवा वर्ग में अक्सर डायस्टोलिक प्रेशर बढा हुआ पाया जाता है जबकि अधिक उम्र के लोगों में सिस्टोलिक प्रेशर ज्यादा देखने में आता है। उच्च रक्त चाप के चलते रोगी में हृदय संबंधी विकार,किडनी के रोग,नाडी मंडल की तकलीफ़ें आदि कई तरह की जटिलताएं पैदा हो सकती हैं।उच्च रक्त चाप से ब्रेन हेमरेज  जैसी अत्यंत गंभीर समस्या भी उत्पन होते देखी जा रही है।

  चिकित्सा विज्ञान में उच्च रक्त चाप  निम्न रुधिर दाब से ज्यादा खतरनाक माना गया है।

उच्च रक्त चाप के लक्षण


रक्त चाप बढने से तेज सिर दर्द,थकावट,टांगों में दर्द ,उल्टी होने की शिकायत और चिडचिडापन होने के लक्षण  मालूम पडते हैं। यह रोग जीवन शैली और खान-पान की आदतों से जुडा होने के कारण केवल दवाओं से इस रोग को समूल नष्ट करना संभव नहीं है। जीवन चर्या एवं खान-पान में अपेक्षित बदलाव कर इस रोग को पूरी तरह नियंत्रित किया सकता है।

हाई ब्लड प्रेशर के मुख्य कारण


१) मोटापा

२) तनाव(टेंशन)

३) महिलाओं में हार्मोन परिवर्तन

४) ज्यादा नमक उपयोग करना

अब यहां ऐसे सरल घरेलू उपचारों की चर्चा की जायेगी जिनके सावधानीपूर्वक इस्तेमाल करने से बिना गोली केप्सुल लिये इस भयंकर बीमारी  पर पूर्णत: नियंत्रण पाया जा सकता है-

१) सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि रोगी को नमक का प्रयोग बिल्कुल कम कर देना चाहिये। नमक ब्लड प्रेशर बढाने वाला प्रमुख कारक है।

२) उच्च रक्तचाप का एक प्रमुख कारण है रक्त का गाढा होना। रक्त गाढा होने से उसका प्रवाह धीमा हो जाता है। इससे धमनियों और शिराओं में  दवाब बढ जाता है।लहसुन ब्लड प्रेशर ठीक करने में बहुत मददगार घरेलू वस्तु है।यह रक्त का थक्का नहीं जमने देती है। धमनी की कठोरता में लाभदायक है। रक्त में ज्यादा कोलेस्ट्ररोल होने की स्थिति का समाधान करती है।

 ३)  एक बडा चम्मच आंवला का रस और इतना ही शहद मिलाकर सुबह -शाम लेने से हाई ब्लड प्रेशर में लाभ होता है।

४) जब ब्लड प्रेशर बढा हुआ हो तो आधा गिलास मामूली गरम पानी में काली मिर्च पावडर एक चम्मच घोलकर २-२ घंटे के फ़ासले से पीते रहें। ब्लड प्रेशर सही मुकाम पर लाने का बढिया उपचार है।

५) तरबूज का मगज और पोस्त दाना दोनों बराबर मात्रा में लेकर पीसकर मिलालें। एक चम्मच सुबह-शाम खाली पेट पानी  लें।३-४ हफ़्ते तक या जरूरत मुताबिक लेते रहें।
८) पपीता आधा किलो रोज सुबह खाली पेट खावें। बाद में २ घंटे तक कुछ न खावें। एक माह तक प्रयोग से बहुत लाभ होगा।
९) सौंफ़,जीरा,शकर तीनों बराबर मात्रा में लेकर पावडर बनालें। एक गिलास पानी में एक चम्मच मिश्रण घोलकर सुबह-शाम पीते रहें।

१०) उबले हुए आलू खाना रक्त चाप घटाने का श्रेष्ठ उपाय है।आलू में सोडियम(नमक) नही होता है।

११) पालक और गाजर का रस मिलाकर एक गिलास रस सुबह-शाम पीयें। अन्य सब्जीयों के रस भी लाभदायक होते हैं।

१२) नमक दिन भर में ३ ग्राम से ज्यादा न लें।
१४) करेला और सहजन की फ़ली उच्च रक्त चाप-रोगी के लिये परम हितकारी हैं।

१५) फल खाएं- केला,अमरूद,सेवफ़ल ब्लड प्रेशर रोग को दूर करने में सहायक कुदरती पदार्थ हैं।

१६) मिठाई और चाकलेट का सेवन बंद कर दें।

१७) सूखे मेवे :--जैसे बादाम काजू,खारक आदि  उच्च रक्त चाप रोगी  के लिये लाभकारी पदार्थ हैं।

१८) चावल:-  (भूरा) उपयोग में लावें। इसमें नमक ,कोलेस्टरोल,और चर्बी नाम मात्र की होती है। यह उच्च रक्त चाप रोगी के लिये बहुत ही लाभदायक भोजन है। इसमें पाये जाने वाले केल्शियम से नाडी मंडल की भी सुरक्षा हो जाती है।
१९)  अदरक:-   प्याज और लहसून की  तरह अदरक  भी काफी फायदेमंद होता है। बुरा कोलेस्ट्रोल धमनियों की दीवारों पर प्लेक यानी कि कैलसियम युक्त मैल पैदा करता है जिससे रक्त के प्रवाह में अवरोध खड़ा हो जाता है और नतीजा उच्च रक्तचाप के रूप में सामने आता है।  अदरक में   बहुत हीं ताकतवर एंटीओक्सीडेट्स   होते हैं जो कि बुरे कोलेस्ट्रोल को नीचे लाने में काफी असरदार होते हैं। अदरक से आपके रक्तसंचार में भी सुधार होता है, धमनियों के आसपास की मांसपेशियों को भी आराम मिलता है जिससे कि उच्च रक्तचाप नीचे आ जाता है।

२०)  लालमिर्च:- धमनियों के सख्त होने के कारण या उनमे प्लेक जमा होने की वजह से रक्त वाहिकाएं और नसें संकरी हो जाती हैं जिससे कि रक्त प्रवाह में रुकावटें पैदा होती हैं। लेकिन लाल मिर्च से नसें और रक्त वाहिकाएं चौड़ी हो जाती हैं, फलस्वरूप रक्त प्रवाह सहज हो जाता है और रक्तचाप नीचे आ जाता है।







ब्लड प्रेशर कम( Low blood pressure)  रहता हो तो निम्न उपचार हितकारी साबित हुए हैं---

   किशमिश १० नग रात भर पानी में गलाएं। सुबह एक-एक किशमिश  बहुत बारीक चबाकर खाएं। यह उपाय एक दो माह करें।

बादाम ७ नग रात भर पानी में गलाएं। छिलका निकालें।अच्छी तरह पीसकर २५० मिलि दूध के साथ उपयोग करें।

ब्लड प्रेशर ज्यादा गिरने पर चुटकी भर नमक पानी में घोलकर पीयें।

  बोलना बंद करें। सो जाएं। बाईं करवट लेटें। नींद लेना लाभदायक होता है।
...................................................

20.6.10

गठिया रोग के घरेलू,आयुर्वेदिक उपचार . .How to treat and tackle gout problems?



आमवात जिसे गठिया भी कहा जाता है अत्यंत पीडादायक बीमारी है।अपक्व आहार रस याने "आम" वात के साथ संयोग करके गठिया रोग को उत्पन्न करता है।अत: इसे आमवात भी कहा जाता है।
लक्षण- जोडों में दर्द होता है, शरीर मे यूरिक एसीड की मात्रा बढ जाती है। छोटे -बडे जोडों में सूजन का प्रकोप होता रहता है।


यूरिक एसीड के कण(क्रिस्टल्स)घुटनों व अन्य जोडों में जमा हो जाते हैं।जोडों में दर्द के मारे रोगी का बुरा हाल रहता है।गठिया के पीछे यूरिक एसीड की जबर्दस्त भूमिका रहती है। इस रोग की सबसे बडी पहचान ये है कि रात को जोडों का दर्द बढता है और सुबह अकडन मेहसूस होती है। यदि शीघ्र ही उपचार कर नियंत्रण नहीं किया गया तो जोडों को स्थायी नुकसान हो सकता है।
गठिया के मुख्य कारण:--
*महिलाओं में एस्ट्रोजिन हार्मोन की कमी होने पर गठिया के लक्षण प्रकट होने लगते हैं।
*अधिक खाना और व्यायाम नहीं करने से जोडों में विकार उत्पन्न होकर गठिया जन्म लेता है।
*छोटे बच्चों में पोषण की कमी के चलते उनका इम्युन सिस्टम कमजोर हो जाता है फ़लस्वरूप रुमेटाईड आर्थराईटीज रोग पैदा होता है जिसमें जोडों में दर्द ,सूजन और गांठों में अकडन रहने लगती है।
*शरीर में रक्त दोष जैसे ल्युकेमिया होने अथवा चर्म विकार होने पर भी गठिया रोग हो सकता है।
*थायराईड ग्रन्थि में विकार आने से गठिया के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं।
 

*आंतों में पैदा होने वाले रिजाक्स किटाणु शरीर के जोडों को भी दुष्प्रभावित कर सकते हैं।
गठिया के ईलाज में हमारा उद्धेश्य शरीर से यूरिक एसीड बाहर निकालने का प्रयास होना चाहिये। यह यूरिक एसीड प्यूरीन के चयापचय के दौरान हमारे शरीर में निर्माण होता है। प्यूरिन तत्व मांस में सर्वाधिक होता है।इसलिये गठिया रोगी के लिये मांसाहार जहर के समान है। वैसे तो हमारे गुर्दे यूरिक एसीड को पेशाब के जरिये बाहर निकालते रहते हैं। लेकिन कई अन्य कारणों की मौजूदगी से गुर्दे यूरिक एसीड की पूरी मात्रा पेशाब के जरिये निकालने में असमर्थ हो जाते हैं। इसलिये इस रोग से मुक्ति के लिये जिन भोजन पदार्थो में पुरीन ज्यादा होता है,उनका उपयोग कतई न करें। वैसे तो पतागोभी,मशरूम,हरे चने,वालोर की फ़ली में भी प्युरिन ज्यादा होता है लेकिन इनसे हमारे शरीर के यूरिक एसीड लेविल पर कोई ज्यादा विपरीत असर नहीं होता है। अत: इनके इस्तेमाल पर रोक नहीं है। जितने भी सोफ़्ट ड्रिन्क्स हैं सभी परोक्ष रूप से शरीर में यूरिक एसीड का स्तर बढाते हैं,इसलिये सावधान रहने की जरूरत है।

१) सबसे जरूरी और सबसे महत्वपूर्ण यह है कि मौसम के मुताबिक ३ से ६ लिटर पानी पीने की आदत डालें। ज्यादा पेशाब होगा और अधिक से अधिक विजातीय पदार्थ और यूरिक एसीड बाहर निकलते रहेंगे।
२) आलू का रस १०० मिलि भोजन के पूर्व लेना हितकर है।
३) संतरे के रस में १५ मिलि काड लिवर आईल मिलाकर शयन से पूर्व लेने से गठिया में आश्चर्यजनक लाभ होता है।
४) लहसुन,गिलोय,देवदारू,सौंठ,अरंड की जड ये पांचों पदार्थ ५०-५० ग्राम लें।इनको कूट-खांड कर शीशी में भर लें। २ चम्मच की मात्रा में एक गिलास पानी में डालकर ऊबालें ,जब आधा रह जाए तो उतारकर छान लें और ठंडा होने पर पीलें। ऐसा सुबह-शाम करने से गठिया में अवश्य लाभ होगा।
५) लहसुन की कलियां ५० ग्राम लें।सैंधा नमक,जीरा,हींग,पीपल,काली मिर्च व सौंठ २-२ ग्राम लेकर लहसुन की कलियों के साथ भली प्रकार पीस कर मिलालें। यह मिश्रण अरंड के तेल में भून कर शीशी में भर लें। आधा या एक चम्मच दवा पानी के साथ दिन में दो बार लेने से गठिया में आशातीत लाभ होता है।
६) हर सिंगार (पारिजात) के ताजे पती ४-५ नग लें। पानी के साथ पीसले या पानी के साथ मिक्सर में चलालें। यह नुस्खा सुबह-शाम लें ३-४ सप्ताह में गठिया और वात रोग में जबरदस्त लाभ होगा| जरूर आजमाएं।
७) बथुआ के पत्ते का रस करीब ५० मिलि प्रतिदिन खाली पेट पीने से गठिया रोग में जबर्दस्त फ़ायदा होता है। अल सुबह या शाम को ४ बजे रस लेना चाहिये।जब तक बथुआ सब्जी मिले या २ माह तक उपचार लेना उचित है।रस लेने के आगे पीछे १ घंटे तक कुछ न खाएं। बथुआ के पत्ते काटकर आटे में गूंथकर चपाती बनाकर खाना भी हितकारी उपाय है। 

 
आयुर्वेदिक चिकित्सा भी कई मामलों मे फ़लप्रद सिद्ध हो चुकी है।
८) पंचामृत लोह गुगल,रसोनादि गुगल,रास्नाशल्लकी वटी,तीनों एक-एक गोली सुबह और रात को सोते वक्त दूध के साथ २-३ माह तक लेने से गठिया में बहुत फ़ायदा होता है।
९) उक्त नुस्खे के साथ अश्वगंधारिष्ट ,महारास्नादि काढा और दशमूलारिष्टा २-२ चम्मच मिलाकर दोनों वक्त भोजन के बाद लेना हितकर है।
१०) चिकित्सा वैग्यानिकों का मत है कि गठिया रोग में हरी साग सब्जी का प्रचुरता से इस्तेमाल करना बेहद फ़ायदेमंद रहता है। पत्तेदार सब्जियो का रस भी अति उपयोगी रहता है।
11) भाप से स्नान करने और जेतुन के तैल से मालिश करने से गठिया में अपेक्षित लाभ होता है।
१२) गठिया रोगी को कब्ज होने पर लक्षण उग्र हो जाते हैं। इसके लिये गुन गुने जल का एनिमा देकर पेट साफ़ रखना आवश्यक है।
१३) अरण्डी के तैल से मालिश करने से भी गठिया का दर्द और सूजन कम होती है।
१४) सूखे अदरक (सौंठ) का पावडर १० से ३० ग्राम की मात्रा में नित्य सेवन करना गठिया में परम हितकारी है|
१५) चिकित्सा वैज्ञानिकों का मत है कि गठिया रोगी को जिन्क,केल्शियम और विटामिन सी के सप्लीमेंट्स नियमित रूप से लेते रहना लाभकारी है।

१६) गठिया रोगी के लिये अधिक परिश्रम करना या अधिक बैठे रहना दोनों ही नुकसान कारक होते हैं। अधिक परिश्रम से अस्थि-बंधनो को क्षति होती है जबकि अधिक गतिहीनता से जोडों में अकडन पैदा होती है।
१७) गठिया उग्र होने पर किसी भी प्रकार का आटा ३ हफ्ते तक भोजन में शामिल ना करें| बाद में धीरे धीरे उपयोग शुरू करें|
१८) पनीर ,दही,माखन,इमली,कच्चा आम का उपयोग बंद करने से लाभ होता है|
१९) शकर की जगह शहद वापरें|
२०) हल्दी गठिया का दर्द घटाती है और सूजन भी कम करती है|
२१) प्याज,लहसुन और सेवफल का उपयोग हितकारी रहता है|
22) लहसुन की 10 कलियों को 100 ग्राम पानी एवं 100 ग्राम दूध में मिलाकर पकाकर उसे पीने से दर्द में शीघ्र ही लाभ होता है।
23) प्रतिदिन नारियल की गिरी के सेवन से भी जोड़ो को ताकत मिलती है।
24) आलू का रस 100 ग्राम प्रतिदिन भोजन के पूर्व लेना बहुत हितकर है।
25) सुबह के समय सूर्य नमस्कार और प्राणायाम करने से भी जोड़ों के दर्द से स्थाई रूप से छुटकारा मिलता है।
26) गठिया के रोगी 4-6 लीटर पानी पीने की आदत डालें। इससे ज्यादा पेशाब होगा और अधिक से अधिक विजातीय पदार्थ और यूरिक एसीड बाहर निकलते रहेंगे।
27) एक बड़ा चम्मच सरसों के तेल में लहसुन की 3-4 कुली पीसकर डाल दें, इसे इतना गरम करें कि लहसुन भली प्रकार पक जाए, फिर इसे आच से उतारकर मामूली गरम हालत में इससे जोड़ों की मालिश करने से दर्द में तुरंत राहत मिल जाती है।
28) प्रात: खाली पेट एक लहसन कली, दही के साथ दो महीने तक लगातार लेने से जोड़ो के दर्द में आशातीत लाभ प्राप्त होता है।
29) 250 ग्राम दूध एवं उतने ही पानी में दो लहसुन की कलियाँ, 1-1 चम्मच सोंठ और हरड़ तथा 1-1 दालचीनी और छोटी इलायची डालकर उसे अच्छी तरह से धीमी आँच में पकायें। पानी जल जाने पर उस दूध को पीयें, शीघ्र लाभ प्राप्त होगा ।
30) 100 ग्राम लहसुन की कलियां लें।इसे सैंधा नमक,जीरा,हींग,पीपल,काली मिर्च व सौंठ 5-5 ग्राम के साथ पीस कर मिला लें। फिर इसे अरंड के तेल में भून कर शीशी में भर लें। इसे एक चम्मच पानी के साथ दिन में दो बार लेने से गठिया में आशातीत लाभ होता है।
31) अमरूद की 4-5 नई कोमल पत्तियों को पीसकर उसमें थोड़ा सा काला नमक मिलाकर रोजाना खाने से से जोड़ो के दर्द में काफी राहत मिलती है। *काली मिर्च को तिल के तेल में जलने तक गर्म करें। उसके बाद ठंडा होने पर उस तेल को मांसपेशियों पर लगाएं, दर्द में तुरंत आराम मिलेगा।
32) दो तीन दिन के अंतर से खाली पेट अरण्डी का 10 ग्राम तेल पियें। इस दौरान चाय-कॉफी कुछ भी न लें जल्दी ही फायदा होगा।
33) दर्दवाले स्थान पर अरण्डी का तेल लगाकर, उबाले हुए बेल के पत्तों को गर्म-गर्म बाँधे इससे भी तुरंत लाभ मिलता है। 
34) गाजर को पीस कर इसमें थोड़ा सा नीम्बू का रस मिलाकर रोजाना सेवन करें । यह जोड़ो के लिगामेंट्स का पोषण कर दर्द से राहत दिलाता है। 
35) गठिया रोगी को अपनी क्षमतानुसार हल्का व्यायाम अवश्य ही करना चाहिए क्योंकि इनके लिये अधिक परिश्रम करना या अधिक बैठे रहना दोनों ही नुकसान दायक हैं।
36) जेतुन के तैल से मालिश करने से भी गठिया में बहुत लाभ मिलता है। 
37) सौंठ का एक चम्मच पावडर का नित्य सेवन गठिया में बहुत लाभप्रद है।
38) गठिया रोग में हरी साग सब्जी का इस्तेमाल बेहद फ़ायदेमंद रहता है। पत्तेदार सब्जीयो का रस भी बहुत लाभदायक रहता है।
39) दो बडे चम्मच शहद और एक छोटा चम्मच दालचीनी का पावडर सुबह और शाम एक गिलास मामूली गर्म जल से लें। एक शोध में कहा है कि चिकित्सकों ने नाश्ते से पूर्व एक बडा चम्मच शहद और आधा छोटा चम्मच दालचीनी के पावडर का मिश्रण गरम पानी के साथ दिया। इस प्रयोग से केवल एक हफ़्ते में ३० प्रतिशत रोगी गठिया के दर्द से मुक्त हो गये। एक महीने के प्रयोग से जो रोगी गठिया की वजह से चलने फ़िरने में असमर्थ हो गये थे वे भी चलने फ़िरने लायक हो गये।
40) एक चम्मच मैथी बीज रात भर साफ़ पानी में गलने दें। सुबह पानी निकाल दें और मैथी के बीज अच्छी तरह चबाकर खाएं।मैथी बीज की गर्म तासीर मानी गयी है। यह गुण जोड़ों के दर्द दूर करने में मदद करता है।
इससे कैसे बचें-
कुछ उपाय बताता हूँ जिन्हें अपनाकर इसकी चपेट में आने से बचा जा सकता है या इसकी चपेट में आने पर स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
 
* आर्थराइटिस के कारण कार्टिलेज को नुकसान पहुंचता है। यह 70 प्रतिशत पानी से बने होते हैं, इसलिए ढेर सारा पानी पिएं।
* कैल्शियम युक्त खाद्य पदार्थों जैसे दूध, दुग्ध उत्पादों, ब्रोकली, सामन मछली,
*पालक, राजमा, मूंगफली, बादाम, टोफू आदि का सेवन करें।
*जोड़ों के स्वास्थ्य के लिए विटामिन सी और डी बहुत जरूरी हैं। इसलिए विटामिन सी और डी से भरपूर खाद्य पदार्थों जैसे स्ट्रॉबेरी, संतरे, कीवी, अनन्नास, फूलगोभी, ब्रोकली, *पत्ता गोभी, दूध, दही, मछिलयों आदि का सेवन करें।
*कुछ समय धूप में भी बिताएं। यह विटामिन डी का बेहतरीन स्त्रोत है।
* वजन को नियंत्रण में रखें। वजन अधिक होने से जोड़ों जैसे घुटनों, टखनों और कूल्हों पर दबाव पड़ता है।
*नियमित रूप से व्यायाम करके आर्थराइटिस के खतरे को कम किया जा सकता है, लेकिन ऐसे व्यायाम करने से बचें, जिससे जोड़ों पर अधिक दबाव पड़ता है।
*शराब और धूम्रपान का सेवन जोड़ों को नुकसान पहुंचाता है। आर्थराइटिस से पीड़ित लोग अगर इनका सेवन बंद कर दें तो उनके जोड़ों और मांसपेशियों में सुधार आ जाता है और दर्द में भी कमी होती है।
*स्वस्थ लोग भी धूम्रपान न करें। यह आपको रूमेटाइड आर्थराइटिस का शिकार बना सकता है।
*अधिक मात्रा में फल और सब्जियों का सेवन करें। ये ऑस्टियो आर्थराइटिस से बचाते हैं।
* अदरक और हल्दी को भोजन में प्रमुखता से शामिल करें, क्योंकि ये जोड़ों की सूजन को कम करने में सहायता करते हैं।
*आरामतलबी से बचें।
* सूजन बढ़ाने वाले पदार्थ जैसे नमक, चीनी, अल्कोहल, कैफीन, तेल, दूध व दुग्ध उत्पादों, ट्रांस फैट और लाल मांस का इस्तेमाल कम करें या न करें।
गठिया का दर्द दूर करने का आसान उपाय-
* एक लिटर पानी तपेली या भगोनी में आंच पर रखें। इस पर तार वाली जाली रख दें। एक कपडे की चार तह करें और पानी मे गीला करके निचोड लें । ऐसे दो कपडे रखने चाहिये। अब एक कपडे को तपेली से निकलती हुई भाप पर रखें। गरम हो जाने पर यह कपडा दर्द करने वाले जोड पर ३-४ मिनिट रखना चाहिये। इस दौरान तपेली पर रखा दूसरा कपडा गरम हो चुका होगा। एक को हटाकर दूसरा लगाते रहें। यह उपक्रम रोजाना १५-२० मिनिट करते रहने से जोडों का दर्द आहिस्ता आहिस्ता समाप्त हो जाता है। बहुत कारगर उपाय है।

विशिष्ट परामर्श-

विशिष्ट परामर्श::
संधिवात,,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त होकर चल फिर सकने योग्य हो जाते हैं|औषधि के लिए वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क करने की सलाह दी जाती है|






19.6.10

उपवास (फ़ास्टिंग) क्यों और कैसे करें?



    विधि पूर्वक उपवास के माध्यम से शरीर की स्वयं का ईलाज करने की आंतरिक शक्ति को अधिकतम कार्यक्षम बनाया जा सकता है।संपूर्ण विश्राम अवस्था में शरीर में पानी अथवा फ़लों के रस के अलावा कुछ नहीं लेना उपवास कहलाता है।
     गंभीर रोगों से ग्रसित व्यक्ति को जीवन शैली में वांछित बदलाव करना जरूरी होता है। उपवास करने के बाद जीवन शैली में बदलाव करना आसान हो जाता है। उपवास की सबसे उत्तम और सुरक्षित विधि फ़लों के रस पर आधारित उपवास है। केवल पानी पर आधारित उपवास भी प्रचलित है और बहुत वर्षों पुराना उपवास का विधान है। लेकिन उपवास संबंधी विशिष्ट चिकित्सकों का मत है कि फ़लों के रस पर आधारित उपवास बनिस्बत सुरक्षित और अधिक कारगर रहता है।
     

उपवास के दौरान शरीर में एकत्रित विजातीय पदार्थ( टाक्सिक मेटर) भस्म होने लगते हैं और शरीर से बाहर निकलने लगते हैं। इस निष्कासन की प्रक्रिया को सहारा देने के लिये हम पानी के बजाय फ़लों का क्षारीय( अल्केलाईन) रस इस्तेमाल करते हैं। इससे यूरिक एसीड व अन्य विजातीय पदार्थ आसानी से निष्कासित होंगे। हां ,ज्यूस में जो शर्करा होती है उससे हृदय को भी शक्ति मिलती रहेगी। हरी सजियों के रस में और फ़लों के रस में जो विटामिन, मिनरल्सऔर सूक्ष्म पौषक तत्व होते हैं वे हमारे शरीर की प्रणालियों को चुस्त-दुरुस्त बनाने में जुट जाते हैं। सभी ज्यूस ताजे फ़लों और सब्जियों से निकालकर तुरंत पीना चाहिए।फ़्रीज में रखे ज्यूस लाभदायक नहीं होते हैं।
उपवास शुरू करने के पहिले एनीमा लगाकर आंतों की भली प्रकार सफ़ाई कर लेना चाहिये।अवशिष्ट पदार्थ आंतों में जमे रहेंगे तो पेट में गेस बनने से तकलीफ़ होगी। बाद में उपवास की अवधि में एक दिन छोडकर एनीमा व्यवहार में लाना चाहिये।जब प्यास लगे तो मामूली गरम जल पर्याप्त मात्रा में पीना चाहिये। आप चाहें तो ज्यूस में पानी मिलाकर डायलुट करके पी सकते हैं। दिन भर में कुल तरल ६ से ८ गिलास (ज्यूस और पानी) पीना उत्तम है|
उपवास के दौरान शरीर में उपस्थित विजातीय पदार्थों को बाहर निकालने में काफ़ी ऊर्जा खर्च होती है। इसलिये रोगी को संपूर्ण विश्राम की सलाह दी जाती है। मानसिक तनाव तो बिल्कुल भी नहीं रहना चाहिये। केवल चहल कदमी करने की अनुमति रहती है।

18.6.10

मिर्गी रोग : सरल उपचार. Epilepsy: simple treatment.

  


मिर्गी एक नाडीमंडल संबंधित रोग है जिसमें मस्तिष्क की विद्युतीय प्रक्रिया में व्यवधान पडने से शरीर के अंगों में आक्षेप आने लगते हैं। दौरा पडने के दौरान ज्यादातर रोगी बेहोंश हो जाते हैं और आंखों की पुतलियां उलट जाती हैं। रोगी चेतना विहीन हो जाता है और शरीर के अंगों में झटके आने शुरू हो जाते हैं। मुंह में झाग आना मिर्गी का प्रमुख लक्षण है।
दुनिया भर में पांच करोड़ से ज्यादा लोग मिर्गी के शिकार हैं और यह समस्या लगातार बढ़ रही है। भारत समेत दुनिया के तमाम देशों में मिर्गी की बीमारी आम है। शायद यही कारण है कि इस बार ′वर्ल्ड फेडरेशन ऑफ न्यूरोलॉजी′ ने ′विश्व मस्तिष्क दिवस′ पर मिर्गी को थीम बनाया है। यह रोग दिमाग में इलेक्ट्रिकल एक्टिविटी (विद्युत प्रवाह) की गड़बड़ी के कारण होता है। मिर्गी आने का कारण जेनेटिक होने के अलावा सिर में चोट लगना, इन्फेक्‍शन, ट्यूमर, कोई सदमा, मानसिक तनाव, स्ट्रोक आदि हो सकता है।
यदि किसी बच्चे को मिर्गी की शिकायत है, तो कोई मानसिक कमी भी इसका कारण हो सकती है। आमतौर पर मिर्गी आने पर रोगी बेहोश हो जाता है। यह बेहोशी चंद सेकेंड, मिनट या घंटों तक हो सकती है। दौरा समाप्त होते ही मरीज सामान्य हो जाता है।
यदि किसी की बेहोशी दो-तीन मिनट से ज्यादा है, तो यह जानलेवा भी हो सकती है। उसे तुरंत डॉक्टर को दिखाना चाहिए । कुछ लोग मिर्गी आने पर रोगी को जूता, प्याज आदि सुंघाते हैं, इसका मिर्गी के इलाज से कोई संबंध नहीं है।
आधुनिक चिकित्सा विज्ञान में मिर्गी की लाक्षणिक चिकित्सा की जाती है और जीवन पर्यंत दवा-गोली पर निर्भर रहना पडता है। लेकिन रोगी की जीवन शैली में बदलाव करने से इस रोग पर काफ़ी हद तक काबू पाया जा सकता है।
 
कुछ निर्देश और हिदायतों का पालन करना मिर्गी रोगी और उसके परिवार जनों के लिये परम आवश्यक है। शांत और आराम दायक वातावरण में रहते हुए नियंत्रित भोजन व्यवस्था अपनाना बहुत जरूरी है।
भोजन भर पेट लेने से बचना चाहिये। थोडा भोजन कई बार ले सकते हैं।
रोगी को सप्ताह मे एक दिन सिर्फ़ फ़लों का आहार लेना उत्तम है। थोडा व्यायाम करना भी जीवन शैली का भाग होना चाहिये।
मिर्गी रोगी की चिकित्सा ऐसे करें---
१) अंगूर का रस मिर्गी रोगी के लिये अत्यंत उपादेय उपचार माना गया है। आधा किलो अंगूर का रस निकालकर प्रात:काल खाली पेट लेना चाहिये। यह उपचार करीब ६ माह करने से आश्चर्यकारी सुखद परिणाम मिलते हैं।
२) एप्सम साल्ट (मेग्नेशियम सल्फ़ेट) मिश्रित पानी से मिर्गी रोगी स्नान करे। इस उपाय से दौरों में कमी आ जाती है और दौरे भी ज्यादा भयंकर किस्म के नहीं आते है।
३) मिट्टी को पानी में गीली करके रोगी के पूरे शरीर पर प्रयुक्त करना अत्यंत लाभकारी उपचार है। एक घंटे बाद नहालें। इससे दौरों में कमी होकर रोगी स्वस्थ अनुभव करेगा।
४) विटामिन ब६ (पायरीडाक्सीन) का प्रयोग भी मिर्गी रोग में परम हितकारी माना गया है। यह विटामिन गाजर,मूम्फ़ली,चावल,हरी पतीदार सब्जियां और दालों में अच्छी मात्रा में पाया जाता है। १५०-२०० मिलिग्राम विटामिन ब६ लेते रहना अत्यंत हितकारी है।
५) मानसिक तनाव और शारिरिक अति श्रम रोगी के लिये नुकसान देह है। इनसे बचना जरूरी है।
6) मिर्गी रोगी को २५० ग्राम बकरी के दूध में ५० ग्राम मेंहदी के पत्तों का रस मिलाकर नित्य प्रात: दो सप्ताह तक पीने से दौरे बंद हो जाते हैं। जरूर आजमाएं।
7) रोजाना तुलसी के २० पत्ते चबाकर खाने से रोग की गंभीरता में गिरावट देखी जाती है
पेठा मिर्गी की सर्वश्रेष्ठ घरेलू चिकित्सा में से एक है। इसमें पाये जाने वाले पौषक तत्वों से मस्तिष्क के नाडी-रसायन संतुलित हो जाते हैं जिससे मिर्गी रोग की गंभीरता में गिरावट आ जाती है। पेठे की सब्जी बनाई जाती है लेकिन इसका जूस नियमित पीने से ज्यादा लाभ मिलता है। स्वाद सुधारने के लिये रस में शकर और मुलहटी का पावडर भी मिलाया जा सकता है।
९) १०० मिलि दूध में इतना ही पानी मिलाकर उबालें दूध में लहसुन की ४ कुली चाकू से बारीक काटक्रर डालें ।यह मिश्रण रात को सोते वक्त पीयें। कुछ ही रोज में फ़ायदा नजर आने लगेगा।
१०) गाय के दूध से बनाया हुआ मक्खन मिर्गी में फ़ायदा पहुंचाने वाला उपाय है। दस ग्राम नित्य खाएं।
११) होम्योपैथी की औषधियां मिर्गी में हितकारी सिद्ध हुई हैं।कुछ होम्योपैथिक औषधियां है--
क्युप्रम,आर्टीमेसिया,साईलीशिया,एब्सिन्थियम,हायोसायमस,एगेरिकस,स्ट्रामोनियम,कास्टिकम,साईक्युटा विरोसा,ईथुजा| इन दवाओं का लक्षणों के मुताबिक उपयोग करने से मिर्गी से मुक्ति पाई जा सकती है
१२) तुलसी की पत्तियों के साथ कपूर सुंघाने से मिर्गी के रोगी को होश आ जाता है।
१३) राई पीसकर चूर्ण बना लें। जब रोगी को दौरा पड़े तो सुंघा दें इससे रोगी की बेहोशी दूर हो जायगी।
१४) मिर्गी के रोगी के लिए
शहतूत का रस लाभदायक होता है। सेब का जूस भी मिर्गी के रोगी को लाभ पहुंचता है।
१५) मिर्गी के रोगी के पैरों तलवों में
आक की आठ-दस बूंदे रोजाना शाम के समय मलें। ऐसा 2 महीनों तक रोजाना करें। इससे काफी लाभ मिलेगा।
१६) तुलसी के पत्तों को पीसकर शरीर पर मलने से मिरगी के रोगी को लाभ होता है।
१७) तुलसी के पत्तों के रस में जरा सा सेंधा नमक मिलाकर 1 -1 बूंद
नाक में टपकाने से मिरगी के रोगी को लाभ होता है।
१८) मिरगी के रोगी को ज़रा सी हींग को निम्बू के साथ चूसने से लाभ होता है|
१९) निम्न मंत्र का विधिपूर्वक उच्चारण करने से मिर्गी रोग नष्ट होने की बात मंत्र चिकित्सा सिस्टम में उल्लेखित है।यह मंत्र १०,००० बार जपने से सिद्ध होता है। मंत्र शक्ति में विश्वास रखने वाले यह उपाय अवश्य आजमाएं।
"ओम हाल हल मंडिये पुडिये श्री रामजी
फ़ूंके वायु ,सुखे,सुख होई,ओम ठाह ठाह स्वाहा".

15.6.10

मोतियाबिंद और कमजोर नजर के सरल उपचार.



                                                                                                             
Protected by Copyscape DMCA Copyright Detector
      नेत्र रोगों में कुदरती पदार्थों से ईलाज करना फ़ायदेमंद रहता है। कम उम्र में चश्मा लगना आजकल आम बात होती जा रही है|  लेकिन ऐसा नहीं है कि  किसी कारण से एक बार चश्मा लग गया तो  वह उतर नहीं सकता | ऐनक लगने  के प्रमुख कारण आँखों की भली प्रकार देख रेख नहीं करना,पोषक तत्वों की कमी, या आनुवांशिक हो सकता है| इनमें से  आनुवांशिक को छोडकर  अन्य कारण से लगा चश्मा  सही देख भाल ,व् खान पान का ध्यान रखने के आलावा देशी उपचार के द्वारा  उतारा जा सकता है|
      मोतियाबिंद बढती उम्र के साथ अपना तालमेल बिठा लेता है। अधिमंथ बहुत ही खतरनाक रोग है जो बहुधा आंख को नष्ट कर देता है। आंखों की कई बीमारियों में नीचे लिखे सरल उपाय करने हितकारी सिद्ध होंगे-
१) सौंफ़ नेत्रों के लिये हितकर है। मोतियाबिंद रोकने के लिये इसका पावडर बनालें। एक बडा चम्मच भर सुबह शाम पानी के साथ लेते रहें। नजर की कमजोरी वाले भी यह उपाय करें।
२) विटामिन ए नेत्रों के लिये अत्यंत फ़ायदेमंद होता है। इसे भोजन के माध्यम से ग्रहण करना उत्तम रहता है। गाजर में भरपूर बेटा केरोटिन पाया जाता है जो विटामिन ए का अच्छा स्रोत है। गाजर कच्ची खाएं और जिनके दांत न हों वे इसका रस पीयें। २०० मिलि.रस दिन में दो बार   लेना हितकर माना गया है। इससे आंखों की रोशनी भी बढेगी। मोतियाबिंद वालों को गाजर  का उपयोग  अनुकूल परिणाम  देता है।
 
३) आंखों की जलन,रक्तिमा और सूजन हो जाना नेत्र की अधिक प्रचलित व्याधि है। धनिया इसमें उपयोगी पाया गया है।सूखे धनिये के बीज १० ग्राम लेकर ३०० मिलि. पानी में उबालें। उतारकर ठंडा करें। फ़िर छानकर इससे आंखें धोएं। जलन,लाली,नेत्र शौथ में तुरंत असर मेहसूस होता है।\
४) आंवला नेत्र की कई बीमारियों में लाभकारी माना गया है। ताजे आंवले का रस ५  मिलि. इतने ही शहद में मिलाकर रोज सुबह लेते रहने से आंखों की ज्योति में वृद्धि होती है। मोतियाबिंद रोकने के तत्व भी इस  उपचार   में मौजूद हैं।
५) भारतीय परिवारों में खाटी भाजी की सब्जी का चलन है।इसका अंग्रेजी  नाम  इन्डियन सोरेल है|  खाटी भाजी के पत्ते के रस की कुछ बूंदें आंख में सुबह शाम डालते रहने से कई नेत्र समस्याएं हल हो जाती हैं। मोतियाबिंद रोकने का भी यह एक बेहतरीन उपाय है।
६)  अनुसंधान में साबित हुआ है कि कद्दू के फ़ूल का रस  दिन में दो बार आंखों में लगाने से मोतियाबिंद में लाभ होता है। कम से कम दस मिनिट आंख में लगा रहने दें।
७) घरेलू चिकित्सा के जानकार विद्वानों का कहना है कि शहद  आंखों में दो बार लगाने से मोतियाबिंद नियंत्रित होता है।
८)   लहसुन की २-३ कुली रोज चबाकर  खाना आंखों के लिये  हितकर है।  यह हमारे नेत्रों के लेंस को स्वच्छ करती है।
९) पालक  का नियमित उपयोग करना मोतियाबिंद में लाभकारी पाया गया है। इसमें एंटीआक्सीडेंट तत्व होते हैं। पालक में पाया जाने वाला बेटा केरोटीन नेत्रों के लिये परम हितकारी  सिद्ध होता है।  ब्रिटीश मेडीकल रिसर्च में पालक का मोतियाबिंद नाशक  गुण प्रमाणित हो चुका है।
१०)   एक और सरल उपाय बताते हैं| अपनी  दोनों हथेलियां आपस में  रगडें  कि कुछ  गर्म हो जाएं|  फिर  आंखों पर ऐसे रखें कि ज्यादा दबाव मेहसूस न हो।  हां, हल्का सा दवाब लगावे। दिन में चार-पांच  बार और हर बार आधा मिनिट के लिये करें।  आंखों की रोशनी बढाने का नायाब तरीका है|
११)  किशमिश ,अंजीर और खारक पानी में रात को भिगो दें और सुबह खाएं । मोतियाबिंद  और ज्योति  बढाने की  अच्छी घरेलू दवा है।
१२)  भोजन के साथ सलाद ज्यादा मात्रा में शामिल करें । सलाद पर थोडा सा जेतून का तेल  भी  डालें। इसमें प्रतिरक्षा तंत्र को मजबूत करने  के गुण   हैं  जो नेत्रों के लिये भी हितकर है।
 
१३)  पाठकों , अब मैं  वो उपचार बता रहा हूँ  जिससे कई लोगों  के चश्मे  उतर गए हैं|  नेत्र  ज्योति वर्धक इस उपचार की जितनी भी प्रशंसा  की जाय थोड़ी है|  इसमें तीन पदार्थ जरूरी हैं|  बड़ी सौंफ,मिश्री और बादाम |  तीनों बराबर मात्रा में १००-१०० ग्राम  लेकर महीन पीस लें |  कांच के बर्तन  में  भर कर  रखें|  रात को सोते वक्त  1० ग्राम चूर्ण  एक गिलास  गरम दूध के साथ  लें|  यह प्रयोग ४०-५० दिन तक निरंतर करना है|
१४) सूरज मुखी के बीजों का सेवन करना  आंखों के लिए सेहतमंद रहता है| इसमें विटामिन सी,विटामिन ई,बीता केरोटीन और एंटीआक्सीडेंटस होते है जो  आंखों  की  कमजोरी  दूर करते हैं|
१५)  दूध व् अन्य डेयरी   उत्पाद  का पर्याप्त मात्रा में उपयोग करना नेत्र  विकारों में फायदेमंद  रहता है|  इन चीजों से आखों को उचित पोषण मिलता है|
१६) केवल बादाम का सेवन भी  आँखों  के लिए बहुत फायदेमंद  होता है|  रोजाना चलते फिरते  ८-१० बादाम  खाने से जरूरी मात्रा में विटामिन ई  प्राप्त होने से आँखें  स्वस्थ  रहती हैं|  बादाम में प्र्प्तीं,रेशा,वसा,विटामिन और मिनरल  पर्याप्त मात्रा में होते हैं| आयुर्वेद में उल्लेख है कि बादाम को भिगोकर खाने के बजाय अंकुरित करके  खाना ज्यादा  लाभप्रद होता है| अंकुरित करने के लिये बादाम १२ घंटे पानी में भिगोएँ | छानकर  बादाम सुखालें| कांच के जार में  रखें और अंकुरित होने के लिये ३- ४ दिन फ्रीज में रखें|
   रात को नो  बादाम भिगोएँ ,सुबह पीसकर पानी में घोलकर पी जाएँ|  इससे आँखे स्वस्थ रहती हैं| और निरंतर  उपयोग से आँखों का चश्मा  भी उतर जाएगा|
१७) आँखों को स्वस्थ रखने के लिए सोया मिल्क ,दही,मूंगफली,खुबानी का उचित मात्रा में सेवन करना लाभ दायक है|
 
१८)  एक शौध के अनुसार  हरे पतेदार सब्जियों में केरोटिन नामक पिगमेंट  की ऐसी मात्रा मौजूद रहती है जिसमें आँखों की  रोशनी  तेज करने की क्षमता  होती है| विशेषज्ञों  के  अनुसार  यह  कुदरती केरोटीनाईड  आँख की पुतली पर सकारात्मक प्रभाव  डालता है और आँखों की रोशनी सुरक्षित रखने के अलावा  अनेक नेत्र रोगों से भी बचाव करता है|
 १९)  एक चने के दाने बराबर फिटकरी  को सेककर इसे १०० ग्राम गुलाब जल में डालें  और रोजाना सोते वक्त २-बूँदें आँख में डालने से  चश्मे का नंबर  कम हो जाता है|
२०)  बिल्व पत्र  का ३० मिली रस पीने और २-४ बूँद रस आँखों में  काजल की तरह लगाने से  रतौंधी  रोग में लाभ होता है|  अंगूर का रस भी आँखों के लिए वरदान तुल्य माना गया है|
२१)  इलायची  आँखों के लिये बहुत लाभदायक होती है\ रात को सोने से पहले  २ इलायची पीसकर दूध में डालें| अच्छी तरह  उबालकर  फिर मामूली गरम  हालत में पी जायें|  इससे आँखों की रोशनी बढ़ती है|
२२) अनुलोम-विलोम प्राणायाम करते रहने से  नेत्र ज्योति  बढ़ती है|
२३)  हल्दी की  गांठ को तुवर की दाल में उबालकर  फिर छाया में सुखाकर रखलें|   इसे पानी में घिसकर सूर्यास्त से पूर्व  आँखों में काजल की तरह लगाएं | आँखे स्वस्थ रहती हैं और आँखों की लालिमा भी  दूर होती है|                                 
                                             
      ---------------------------------------------------------------------------------------

8.6.10

पैरों का शौथ (oedema of feet) के घरेलू उपचार



पांवों मे सूजन रोग का घरेलू ईलाज और उपचार कैसे करें?
१. सबसे पहली और महत्व पूर्ण बात यह है कि नमक का उपयोग बंद कर दें। नमक सेवन करते रहने से हालत ज्यादा बिगड जाएगी।
२. सरसों के तेल की मालिश से लाभ होता है।
३. नित्य पकाये हुए चावल खाना चाहिये।
४. सूजन की जगह ककडी की चीरें रखें और उसके ऊपर आलू की चीरें रखकर पट्टी बांधें। बढिया उपाय है।
५. भोजन में प्रोटीन की प्रधानता रखनी चाहिये।दालों का भरपूर उपयोग करें।वसा युक्त भोजन पदार्थ भी उपयोग करना हितकारी है।
६. कर्बोहाईड्रेट प्रधानता वाले पदार्थों में पानी एकत्र करने के गुण होते हैं इसलिये ऐसे पदार्थों का उपयोग न्युनतम करें।  

७. गर्भवती स्त्री के पैरों में सूजन होने पर पत्ता गोभी के पत्ते लगाकर पट्टी बंधना हितकर है।सोने से पहिले पैरों पर ठंडे पानी की धार लगाना लाभप्रद रहता हैं।
८. रेशे वाले पदार्थ भी सूजन बढाने में सहायक होते हैं हरी सब्जीयां और फ़लों का उपयोग कम कर देना चाहिये।
९. धूम्रपान और शराब सेवन से शौथ रोग उग्र हो जाता है। अत: ये पदार्थ त्याज्य हैं।
१०. सोते वक्त अपने पैरों को शरीर से ऊंचा रखें। पांव के नीचे तकिया रखना उपकारी है।
११. धनिये के बीज ३-४ चम्मच दो कप पानी में तब तक ऊबालें कि आधा रह जाए। रोजाना पीयें। बहुत लाभदायक उपचार है। आजमाएं।
१२. अधिक मात्रा में पानी पीने से भी परहेज करना चाहिये। ज्यादा पानी पीने से सूजन ज्यादा बढेगी।
१३. शौथ अपने आप में कोई रोग नहीं है बल्कि यह संकेत देता है कि हमारे शरीर के सिस्टम ठीक से काम नहीं कर रहे हैं। इसे गंभीरता से लेना चाहिये। कुछ ही दिनों में नियंत्रण नहीं होने पर कुशल चिकित्सक से संपर्क करना चाहिये। गुर्दे और हृदय की गंभीर बीमारियों से भी शरीर में सूजन आने लगता है।
१४.. आयुर्वेदिक चिकित्सा में पुनर्नवासव का उपयोग लाभप्रद माना गया है।

4.6.10

संधिवात (आर्थराईटिज) की चिकित्सा के सरल तरीके ..how to treat and tackle arthritis patient?


  

  संधिवात रोग में शरीर के जोडों और अन्य भागों में सूजन आ जाती है और रोगी दर्द से परेशान रहता है। चलने फ़िरने में तकलीफ़ होती है।यह रोग शरीर के तंतुओं में विकार पैदा करता है,प्रतिरक्छा प्रणाली कमजोर हो जाती है,जोड शोथ युक्त हो जाते हैं,हिलने डुलने में कष्ट होता है।कलाई,घुटनों और ऊंगली ,अंगूठे में संधिवात का रोग ज्यादा देखने में आता है। कभी-कभी बुखार आ जाता है।भूख नहीं लगना भी इस रोग का लक्षण है। समय पर ईलाज नहीं करने पर आंखों,फ़ेफ़डों,हृदय व अन्य अंग दुष्प्रभावित होने लगते हैं।
संधिवात के कारण
- १)आनुवांशिक कारण
२)खान-पान की असावधानियां
३) जोडों पर ज्यादा शारीरिक दवाब पडना
४) जोडों का कम या जरूरत से अधिक उपयोग करना
५) स्नायविक तंतुओं में विकार आ जाना और मेटाबोलिस्म में व्यवधान पड जाना।
६) सर्द वातावरण में शरीर रखने का कुप्रभाव
७)बुढापा और हार्मोन का असुंतुलन

संधिवात रोगी क्या करें और क्या न करें-
१) सबसे महत्वपूर्ण सलाह यह है कि रोगी २४ घंटे में मौसम के अनुसार ४ से ६ लिटर पानी पीने की आदत डालें। शरीर के जोडों में यूरिक एसीड जमा हो जाता है और इसी से संधिवात रोग जन्म लेता है। ज्यादा पानी पीने से ज्यादा पेशाब होगा और यूरिक एसीड बाहर निकलता रहेगा।
२) फ़ल और हरी सब्जीयां अपने आहार में प्रचुरता से शामिल करें।इनमें भरपूर एन्टीओक्सीडेन्ट तत्व होते हैं जो हमारे इम्युन सिस्टम को ताकतवर बनाते हैं।रोजाना ७५० ग्राम फ़ल या सब्जियां या दोनों मिलाकर उपयोग करते रहें।इनका रस निकालकर पियेंगे तो भी वही लाभ प्राप्त होगा।
 
३)ताजा गाजर का रस और नींबू का रस बराबर मात्रा में मिश्रण कर १५ मिलि प्रतिदिन लें।
४) ककडी का रस पीना भी संधिवात में लाभकारी है।
५) संधिवात रोगी को चाहिये कि सर्दी के मौसम में धूप में बैठे।
६) शकर का उपयोग हानिकारक होता है।
७) चाय,काफ़ी,मांस से संधिवात रोग उग्र होता है इसलिये जल्दी ठीक होना हो तो इन चीजों का इस्तेमाल न करें।
८) तला हुआ भोजन,नमक,शकर तेज मिर्च-मसाले,शराब छोडेंगे तो जल्दी ठीक होने के आसार बनेगे
९) संधिवात रोगी के लिये यह जरूरी है कि हफ़्ते में दो दिन का उपवास करें।
१०) काड लिवर आईल ५ मिलि की मात्रा में सुबह शाम लेने से संधिवात में फ़ोरन लाभ मिलता है।
 
११) पर्याप्त मात्रा में केल्शियम और विटामिन डी की खुराकें लेते रहें। ये विटामिन भोजन के माध्यम से लेंगे तो ज्यादा बेहतर रहेगा।
१२) तीन नींबू का रस और ४० ग्राम एप्सम साल्ट आधा लिटर गरम पानी में मिश्रित कर बोतल में भर लें। दवा तैयार है। ५ मिलि दवा सुबह शाम पीयें। यह नुस्खा बेहद कारगर है।

१३) मैने साईटिका रोग में आलू का रस पीने का ईलाज बताया है। संधिवात में भी आलू का रस अशातीत लाभकारी है। २०० मिलि रस रोज पीना चाहिये।
१४) ज्यादा सीढियां चढना हानिकारक है।
१५)अपने काम और विश्राम के बीच संतुलन बनाये रखना जरूरी है।
१६) अदरक का रस पीना संधिवात के दर्द में शीघ्र राहत पहुंचाता है।
१७) अलसी के बीज मिक्सर में चलाकर पावडर बनालें। २० ग्राम सुबह और २० ग्राम शाम को पानीके साथ लें। इसमे ओमेगा फ़ेट्टी एसीड होता है जो इस रोग में अत्यंत हितकर माना गया है।इससे कब्ज का भी निवारण हो जाता है।

विशिष्ट परामर्श-

विशिष्ट परामर्श::
संधिवात,,कमरदर्द,गठिया, साईटिका ,घुटनो का दर्द आदि वात जन्य रोगों में जड़ी - बूटी निर्मित हर्बल औषधि ही अधिकतम प्रभावकारी सिद्ध होती है| रोग को जड़ से निर्मूलन करती है| बिस्तर पकड़े पुराने रोगी भी दर्द मुक्त होकर चल फिर सकने योग्य हो जाते हैं|औषधि के लिए वैध्य दामोदर से 98267-95656 पर संपर्क करने की सलाह दी जाती है|