25.12.09

बवासीर रोग की सरल चिकित्सा. how to cure piles with home remedies?



       बवासीर आजकल एक आम बीमारी के रूप में प्रचलित है। इस रोग मे गुदे की खून की नसें (शिराएं) फ़ूलकर शोथयुक्त हो जाती हैं,जिससे दर्द,जलन,और कभी कभी रक्तस्राव भी होता है।बवासीर का प्रधान कारण कब्ज का होना है।जिगर मे रक्त संकुलता भी इस रोग कारण होती है। मोटापा, व्यायाम नहीं करना और भोजन में रेशे(फ़ाईबर) की कमी से भी इस रोग की उत्पत्ति होती है।
बवासीर दो प्रकार की होती है-
1. खूनी बवासीर :- अंदर की बवासीर से खून निकलता है इसलिए इसे खूनी बवासीर कहते हैं।
2. बादी-बवासीर :- बाहर की बवासीर में दर्द तो होता है लेकिन उनसे खून नहीं निकलता है इसलिए इसे बादी-बवासीर कहते हैं

बवासीर रोग होने के  कारण :

मलत्याग करते समय में अधिक जोर लगाकर मलत्याग करना।
बार-बार जुलाव का सेवन करना।
बार-बार दस्त लाने वाली दवाईयों का सेवन करना।
उत्तेजक पदार्थों का अधिक सेवन करना।
अधिक मिर्च-मसालेदार भोजन का सेवन करना।
अधिक कब्ज की समस्या होना।
वंशानुगत रोग या यकृत रोग होना।
शारीरिक कार्य बिल्कुल न करना।
शराब का अधिक मात्रा में सेवन करना।
पेचिश रोग कई बार होना।
निम्नस्तरीय चिकनाई रहित खुराक लेना।
घुड़सवारी करना।
गर्भावस्था के समय में अधिक कष्ट होना तथा इस समय में कमर पर अधिक कपड़ें का दबाव रखना।
रात के समय में अधिक जागना।
मूत्र त्याग करने के लिए अधिक जोर लगना।
    मस्से के लिये कई घरेलू ईलाज हैं,लेकिन सबसे महत्वपूर्ण और आधार भूत बात यह है कि रोगी को २४ घंटे में 4-5 लीटर  लिटर पानी पीने की आदत डालनी चाहिये। ज्यादा पानी पीने से शरीर से विजातीय पदार्थ बाहर निकलते रहेंगे और रोगी को कब्ज नहीं रहेगी जो इस रोग का मूल कारण है।
   हरी पत्तेदार सब्जियां,फ़ल और ज्यादा रेशे वाले पदार्थों का सेवन करना जरुरी है।
    बवासीर रोग में निम्न घरेलू  उपचार  परम हितकारी हैं:-
१.) कलमी शोरा और रसोंत बराबर मात्रा में लेकर मूली के रस में पीस लें,यह पेस्ट बवासिर के मस्सो पर लगाने से तुरंत राहत मिलती है।
२)  जमींकंद को भोभर मे भून लें और दही के साथ खाएं।
3)   कमल का हरा पता पीसकर  उसमे, मिश्री  मिलाकर  खाने से बवासीर का खून बंद हो जाता है|
 ४) नाग केशर ,मिश्री और ताजा मक्खन सम भाग मिलाकर खाने से  बवासीर  रोग नियंत्रण में आ जाता है|
५) गुड़ के साठ हरड खाने से  बवासीर में लाभ मिलता है|
६)  बवासीर में  छाछ  अमृत तुल्य है|  छाछ  में सैंधा  नमक मिलाकर लेना उचित है|
७)  मूली के नियमित सेवन से बवासीर ठीक होने के प्रमाण मिले हैं|
८) गेंदे के हरे पत्ते   १० ग्राम,काली मिर्च के ५ दाने मिश्री १० ग्राम सबको ५० मिली पानी में  पीस कर मिला दें |  ऐसा  मिश्रण चार दिन तक लेते रहने से खूनी बवासीर खत्म हो जाती है|
९ )  बिदारीकंद और पीपल समान भाग लेकर  चूर्ण बनालें। ३ ग्राम चूर्ण बकरी के दूध के साथ पियें।
१०)  .कडवी तोरई की जड को पीसकर यह पेस्ट मस्से पर लगाने से लाभ होता है।
११ )  करंज,हरसिंगार.बबूल,जामुन,बकायन,ईमली इन छ: की बीजों की गिरी और काली मिर्च  इन सभी चीजों को बराबर मात्रा में लेकर कूट पीसकर मटर के दाने के बराबर गोलियां बनालें। २ गोली दिन में दो बार छाछ के साथ लेने से बवासिर में अचूक लाभ होता है।
  १२ ) आक के पत्ते और तम्बाखू के पत्ते गीले कपडे मे लपेटकर गरम राख में रखकर सेक लें। फ़िर इन पत्तों को निचोडने से जो रस निकले उसे मस्सों पर लगाने से मस्से समाप्त होते हैं।
१३ ) कनेर के पत्ते,नीम के पत्ते ,सहजन के पत्ते और आक के पत्ते
पीसकर मस्सों पर लगावें जरूर फ़ायदा होगा।
१४ ) चिरायता,सोंठ,दारूहल्दी,नागकेशर,लाल चन्दन,खिरेंटी इन सबको समान मात्रा मे लेकर चूर्ण बनालें। ५ ग्राम चूर्ण दही के साथ लेने से पाईल्स ठीक होंगे।
१५) एलोवेरा( ग्वार पाठा) का गूदा मस्सों पर लगाने से सूजन दूर होती है।
१६ ) विटामिन सी (एस्कोर्बिक एसीड) खून की नलिकाओं को स्वस्थ बनाती है। ५०० एम जी की २ गोली रोज लेना उपकारी है।

१७)  पके केले को बीच से चीरकर दो टुकडे कर लें और उसपर कत्था पीसकर छिडक दें,इसके बाद उस केले को खुली जगह पर शाम को रख दें,सुबह  शौच से निवृत्त होने के बाद  उस केले को खालें, केवल  १५ दिन  तक यह उपचार करने से  भयंकर से भयंकर बवासीर समाप्त हो जाती है।
८ ) हारसिंगार के फ़ूल तीन ग्राम काली मिर्च एक ग्राम और पीपल एक ग्राम सभी को पीसकर उसका चूर्ण तीस ग्राम शकर की चासनी में मिला लें,रात को सोते समय पांच छ: दिन तक इसे खायें। इस उपचार से खूनी बवासीर में आशातीत लाभ होता है। कब्ज करने वाले भोजन पदार्थ वर्जित हैं।



१९) दही और मट्ठे के नियमित उपयोग से बवासीर में हितकारी प्रभाव होता है।
२०) प्याज के छोटे छोटे टुकडे करने के बाद सुखालें,सूखे टुकडे दस ग्राम घी में तलें,बाद में एक ग्राम तिल और बीस ग्राम मिश्री मिलाकर रोजाना खाने से बवासीर का नाश होता है|
२१) एक नीबू  लेकर उसे काट लें,और दोनो फ़ांकों पर पांच ग्राम कत्था पीस कर छिडक दें, खुली जगह पर रात भर रहने दें,सुबह  बासी मुंह  दोनो फ़ांकों को चूस लें,कैसी भी खूनी बबासीर दो या तीन हफ़्तों में ठीक हो जायेगी।
२२)   आम की गुठली का चूर्ण  शहद या पानी के साथ एक चम्मच की मात्रा में लेते रहने से खूनी बवासीर ठीक होती है।
२३)  सूखे आंवले का चूर्ण रात को सोते वक्त मामूली गरम जल से  लें । अर्श में लाभ होगा।
२४)  अब मैं यहां खूनी बवासीर  का एक उपचार प्रस्तुत कर रहा हूं जो आश्चर्य जनक  रूप से लाभकारी है और एक ही रोज में खून गिरना बंद कर देता है।  नारियल की जटा को जलाकर भस्म(राख) करलें और एक शीशी में भरलें। करना ये है कि ३ ग्राम  भस्म एक गिलास मट्ठे या दही के साथ उपयोग करें। उपचार खाली पेट लेना है।  ऐसी खुराक दिन मे  तीन बार लेना है। बस एक दिन में ही खूनी बवासीर ठीक करने का यह अनोखा उपचार है।
२५) बवासीर रोग की कारगर  हर्बल चिकित्सा के लिये वैध्य दामोदर  से   098267-95656 पर संपर्क कर सकते हैं।सैंकडों रोगी लाभान्वित हुए हैं|
२६)  मैं होमियोपैथी की मदरटिंचर हेमेमिलिस और बायोकाम्बिनेशन नम्बर सत्रह से बवासीर के अनेक केस ठीक कर चुका हूँ। पाँच-पाँच बूंद हेमेमिलिस आधा कप पानी में मिला कर दिन में तीन बार और बायोकाम्बिनेशन सत्रह की चार-चार गोलियाँ तीन बार लेने से खूनी और साधारण बवासीर ठीक हो जाती है।
२७ मंत्र-चिकित्सा सिस्टम में बवासीर और भगंदर का रामबाण ईलाज मंत्र के माध्यम से करने का निर्देश है:-
रोज रात को पानी रखकर सोवे तथा सुबह उठकर इस मन्त्र से 21 बार अभिमंत्रित करे तथा अभिमंत्रित जल से गुदा को धोना है।ऊंगली गुदा में प्रविष्ट कर मालिश भी करना है।
७ दिवस में फ़र्क नजर आने लगेगा और एक माह में रोग से पूर्णत: मुक्ति मिल जाती है। मंत्र इस प्रकार है--
"ॐ काका कर्ता क्रोरी कर्ता ॐ कर्ता से होय यरसना दश हंस प्रगटे खुनी बादी बवासीर न होय मन्त्र जानकर न बतावे तो द्वादश ब्रहम हत्या का पाप होय लाख पढ़े उसके वंश में न होय शब्द सांचा पिण्ड काचा फुरो मन्त्र इश्वरो वाचा" 

6.12.09

पित्त पथरी नाशक उपचार . easy remedies for gall stones














     गाल ब्लाडर में पथरी (gallstones) बनना एक भयंकर पीडादायक रोग है। इसे ही पित्त पथरी कहते हैं। पित्ताषय में दो तरह की पथरी बनती है।

प्रथम कोलेस्ट्रोल निर्मित पथरी।

 दूसरी पिग्मेन्ट से बननेवाली पथरी।

      ध्यान देने योग्य है कि लगभग८०% पथरी कोलेस्ट्रोल तत्व से ही बनती हैं।वैसे तो यह रोग किसी को भी और किसी भी आयु में हो सकता है लेकिन महिलाओं में इस रोग के होने की सम्भावना पुरुषों की तुलना में  लगभग  दूगनी हुआ करती है।पित्त लिवर में बनता है और इसका भंडारण गाल ब्लाडर में होता है।यह पित्त वसायुक्त भोजन को पचाने में मदद करता है। जब इस पित्त में कोलेस्ट्रोल और बिलरुबिन की मात्रा  ज्यादा हो जाती है,तो पथरी निर्माण के लिये उपयुक्त स्थिति बन जाती है।
पथरी रोग में मुख्य रूप से पेट के दायें हिस्से में तेज  या साधारण दर्द होता है।भोजन के बाद पेट फ़ूलना,अजीर्ण होना,दर्द और उल्टी होना  इस रोग के प्रमुख लक्षण हैं।

  प्रेग्नेन्सी,मोटापा,मधुमेह,,अधिक बैठे रेहने की जीवन शैली, तेल घी अधिकता वाले भोजन,और शरीरमें खून की कमी से पित्त पथरी रोग होने की सम्भावना बढ जाती है।

     दो या अधिक बच्चों की माताओं में भी इस रोग की प्रबलता देखी जाती है।

      अब मैं कुछ आसान घरेलू नुस्खे प्रस्तुत कर रहा हूं जिनका उपयोग करने से  इस भंयकर रोग से होने वाली पीडा में राहत मिल जाती है और निर्दिष्ट अवधि तक इलाज जारी रखने पर ३ से ४ एम एम  तक की पित्त  पथरी से मुक्ति मिल जाती है।

   १) गाजर और ककडी का रस प्रत्येक १०० मिलिलिटर की मात्रा में मिलाकर दिन में दो बार पीयें। अत्यन्त लाभ दायक  उपचार है।

 २)  नींबू  का रस ५० मिलिलिटर की मात्रा में सुबह खाली पेट पीयें। यह उपाय एक सप्ताह तक जारी रखना उचित है।

३)  सूरजमुखी या ओलिव आईल ३० मिलि खाली पेट पीयें।इसके तत्काल बाद में १२० मिलि अन्गूर का रस या निम्बू का रस पीयें।  इसे  कुछ हफ़्तों तक जारी रखने पर अच्छे परिणाम मिलते हैं।
४)  नाशपती का फ़ल खूब खाएं। इसमें पाये जाने वाले रसायनिक तत्व से पित्ताषय के रोग दूर होते हैं।
५)  विटामिन सी याने एस्कोर्बिक एसिड के प्रयोग से शरीर का इम्युन सिस्टम मजबूत बनता है।यह कोलेस्ट्रोल को पित्त में बदल देता है। ३-४ गोली नित्य लें।

2013 में हुए एक अध्ययन के अनुसार, शरीर में भरपूर मात्रा में विटामिन सी पथरी की समस्‍या कम करता है। एक लाल शिमला मिर्च में लगभग 95 मिलीग्राम विटामिन सी होता है, यह मात्रा पथरी को रोकने के लिए काफी होती है। इसलिए अपने आहार में शिमला मिर्च को शामिल करें।
 ६)  पित्त पथरी रोगी भोजन में प्रचुर मात्रा में हरी सब्जीयां और फ़ल शामिल करें। ये कोलेस्ट्रोल रहित पदार्थ है।
७) तली-गली,मसालेदार चीजों का परहेज जरुरी है।
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8) शराब,चाय,काफ़ी एवं शकरयुक्त पेय हानिकारक है।
९) एक बार में ज्यादा भोजन न करें। ज्यादा भोजन से अधिक मात्रा में कोलेस्ट्रोल निर्माण होगा जो हांनिकारक है।
१०) आयुर्वेद में उल्लेखित कतिपय औषधियां इस रोग में लाभदायक साबित हो सकती हैं।कुटकी चूर्ण,त्रिकटु चूर्ण,आरोग्य वर्धनी वटी,फ़लत्रिकादि चूर्ण,जैतुन का तैल ,नींबू का रस आदि औषधियां व्यवहार में लाई जाती हैं। ११)   सर्जरी  में  पित्त पथरी  नहीं निकाली जाती है  बल्कि  पूरे  पित्ताशय को ही  काटकर  निकाल दिया जाता है जिसके  दुष्परिणाम  रोगी को  जीवन भर  भुगतने  पड़ते हैं|  अत: जहां तक हो सके औषधि से  चिकित्सा करना श्रेष्ठ  है|
१२) पुदीने में टेरपेन नामक प्राकृतिक तत्‍व होता है, जो पित्त से पथरी को घुलाने के लिए जाना जाता है। यह पित्त प्रवाह और अन्य पाचक रस को उत्तेजित करता है, इसलिए यह पाचन में भी सहायक होता है। पित्त की पथरी के लिए घरेलू उपाय के रूप में पुदीने की चाय का इस्‍तेमाल करें।
१३)  .हर्बल चिकित्सा  से १० एम एम तक की  पित्त  पथरी   का मनी बेक  गारंटी  के साथ   इलाज करने  वाले वैध्य  श्री दामोदर  से   098267-95656 पर  संपर्क करने का परामर्श दिया जाता है| 


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30.11.09

लीवर बढ जाने(हेपोटोमेगेली) की सरल चिकित्सा.

                                                                                                                                                 

     यकृत  का बढना (hepatomegaly) यकृत में विकार पैदा हो जाने की ओर संकेत करता है। बढे हुए और शोथ युक्त लीवर के कोइ विशेष लक्षण नहीं होते हैं। यह रोग  लीवर के केन्सर,खून की खराबी,अधिक शराब सेवन, और पीलिया के कारण  उत्पन्न हो सकता है। यहां मैं यकृत वृद्धि रोग  के कुछ आसान उपचार  प्रस्तुत कर रहा हूं जिनके समुचित प्रयोग से इस रोग को ठीक किया जा सकता है।




१)   अजवाईन  ३ ग्राम और आधा ग्राम नमक भोजन के बाद पानी के साथ लेने से  लीवर-तिल्ली के सभी रोग ठीक  होते हैं।

२)  .दो सन्तरे का रस खाली पेट एक सप्ताह तक लेने से लीवर सुरक्षित रहता है।









३)  एक लम्बा बेंगन प्रतिदिन कच्चा खाने से लीवर के रोग ठीक होते हैं।









४)  दिन भर में ३ से ४ लिटर पानी पीने की आदत डालें।



५)  एक पपीता रोज सुबह खाली पेट खावें। एक माह तक लेने से लाभ होगा। पपीता खाने के बाद दो घन्टे तक कुछ न खावें।






 ६)  कडवी सहजन की फ़ली,करेला, गाजर,पालक और हरी सब्जीयां प्रचुर मात्रा में भोजन में शामिल करें।







७)  शराब  पीना लीवर रोगी के लिये बेहद नुकसान कारक है।  शराब पीना यकृत रोग में मौत को बुलावा देने के समान है। रोग से मुक्ति पाना है तो शराब को छोडना ही होगा।








 ८)  चाय-काफ़ी  पीना हानिकारक है। भेंस के दूध की जगह गाय या बकरी का दूध प्रयोग करें।










९)  मछली,अण्डे और दालें लाभप्रद हैं।

 १०)  भोजन कम मात्रा में लें।



 तली-गली,मसालेदार चीजों से परहेज करें।







११)  मुलहठी में लिवर को ठीक रखने के गुण  हैं। पान खाने वाले मुलहटी पान में शामिल करें।




१२)  आयुर्वेदिक मत से कुमारी आसव इस  रोग की महौषधि है।

१३)  होमियोपेथी के चिकित्सक चाईना,ब्रायोनिया, फास्फोरस आदि औषधियां मिलाकर या सिंगल रेमेडी सिद्धात के मुताबिक चिकित्सा करते हैं।

यकृत वृद्धि  के उपचार का विडियो -

25.11.09

लकवा (पक्षाघात )की घरेलू चिकित्सा. easy methods to treat paralysis


         लकवा रोग की सरल घरेलू चिकित्सा

                                                                                                      


       आधुनिक चिकित्सा  विज्ञान  के मतानुसार लकवा मस्तिष्क के रोग के कारण प्रकाश में आता है।इसमें अक्सर शरीर का दायां अथवा बायां हिस्सा प्रभावित होता है। मस्तिषक  की नस में रक्त का थक्का जम जाता है या  मस्तिष्क की  किसी  रक्त वाहिनी  से रक्तस्राव होने लगता है। शरीर के किसी एक हिस्से  का स्नायुमंडल अचानक  काम करना बंद कर देता है याने उस भाग  पर नियंत्रण नहीं रह जाता है।दिमाग में चक्कर आने  और बेहोश होकर गिर पडने  से अग क्षतिग्रस्त हो सकते हैं।
   हाईब्लड प्रेशर  भी लकवा का कारण  हो सकता है।  सिस्टोलिक ब्लड  प्रेशर २२० से ज्यादा होने पर लकवा की भूमिका तैयार हो  सकती है।
पक्षाघात तब लगता है जब अचानक मस्तिष्क के किसी हिस्से मे रक्त आपूर्ति रुक जाती है या मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के आस-पास की जगह में खून भर जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के हृदय में जब रक्त आपूर्ति का आभाव होता तो कहा जाता है कि उसे दिल का दौरा पड़ गया है उसी तरह जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो जाता है या मस्तिष्क में अचानक रक्तस्राव होने लगता है तो कहा जाता है कि आदमी को मस्तिष्क का दौरा पड़ गया है।

शरीर की सभी मांस पेशियों का नियंत्रण केंद्रीय तंत्रिकाकेंद्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) की प्रेरक तंत्रिकाओं से, जो पेशियों तक जाकर उनमें प्रविष्ट होती हैं,से होता है। अत: स्पष्ट है कि मस्तिष्क से पेशी तक के नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग में, या पेशी में हो, रोग हो जाने से पक्षाघात हो सकता है। सामान्य रूप में चोट, अबुद की दाब और नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग के अपकर्ष आदि, किसी भी कारण से उत्पन्न प्रदाह का परिणाम आंशिक या पूर्ण पक्षाघात होता है।




  










पक्षाघात होने का मुख्य कारण है मस्तिष्क में रक्त ले जाने वाली नलिकाओं में रुकावट। इस रुकावट के कई कारण हैं
l उच्च रक्तचाप l
 मधुमेह l
धूम्रपान l
रक्त में बढ़ी हुई वसा/चर्बी l
 हृदय रोग l
 कोकेइन इत्यादि मादक पदार्थों का सेवन l
 संघर्षयुक्त जीवनशैली l
 अत्यधिक आरामदायक जीवन व व्यायाम की कमी l
खान-पान में विटामीन की कमी l
मोटापा l
वंशानुगत टी.बी.या अन्य संक्रमित रोगों का अनुचित या अधूरा उपचार।

पक्षाघात से बचाव का तरीका -
 नियमित रूप ये दवा का सेवन कर रक्तचाप पर नियंत्रण रखना चाहिए। वजन पर नियंत्रण रखने से, नियमित व्यायाम से, भोजन मंे नमक व चर्बी के परहेज से व नियमित जीवन-शैली से भी उच्च रक्तचाप पर नियंत्रण रखा जा सकता है परन्तु दवा का सेवन नियमपूर्वक करना चाहिए। बहुत से लोग दवा तभी लेते हैं जब उन्हें लगता है कि रक्तचाप बढ़ गया है- यह सर्वथा अनुचित है। रक्तचाप बढ़ने के अधिकतर लोगों में कोई लक्षण नहीं होते- इसीलिए जिसे भी उच्च रक्तचाप का रोग हो उसे प्रतिदिन दवा का सेवन करना चाहिए। आजकल बहुत से योगी जन साधारण में यह प्रचार करते हैं कि योग से उच्च रक्तचाप सहित सभी रोगों का पूर्ण उपचार संभव है।

योग करना निश्चय ही शरीर व मन दोनों के लिए हितकर है परन्तु साथ-साथ नियमित रूप से रक्तचाप-ब्लड प्रेशर की जांच कराते रहना चाहिए और यदि दवा छोड़ने के लंबे अंतराल के उपरांत भी रक्तचाप नहीं बढ़ता तो ही स्वयं को पूर्णतया रोग-मुक्त मानना चाहिए। सामान्यत: योग के नियमित अभ्यास से रक्तचाप कुछ तो कम होता है अपितु इसके साथ-साथ दवा का नियमित सेवन भी करते रहने होता है। बहुत से लोग योगाभ्यास प्रारंभ करते ही सब दवाएं बंद कर देते हैं व कहते हैं कि 'जब हमें कोई लक्षण नहीं तो रक्तचाप की जांच क्यों कराएं?' यह व्यवहार निश्चित तौर पर अवांछनीय है व इससे स्वयं को ही हानि होती है।

उच्च रक्तचाप के अलावा मधुमेह/शुगर की बीमारी से भी हृदय-रोग व पक्षाघात होने की संभावना बढ़ जाती है। शुगर की नियमित जांच, दवाओं के नियंत्रित सेवन व भोजन में उचित परहेज से मधुमेह को नियंत्रण में रखा जा सकता है। जितना अच्छा नियंत्रण होगा, उतनी ही कम संभावना होगी पक्षाघात होने की। मीठे के परहेज के साथ-साथ तली हुई चीजों- मक्खन, मलाई, घी आदि पदार्थों का सेवन भी कम करना चाहिए।

 भोजन में पत्तेदार व हरी सब्जियां, फल व पानी की मात्रा पर्याप्त होनी चाहिए। नियमित व्यायाम व अत्यधिक आरामदायक जीवनशैली के परित्याग से भी मधुमेह व उच्च रक्तचाप के रोगी स्वस्थ रह सकते हैं। दिनचर्या में नियम व धैर्य से भी शरीर व मन चिंतामुक्त रहता है व पक्षाघात की संभावना को कम किया जा सकता है।
जिन्हें पहले पक्षाघात/हृदय रोग हो चुका हो, उन्हें तो उपरोक्त दिये हुए सुझावों को कुंजी मान कर चलना चाहिए व साथ ही नियमित रूप से दवाओं का सेवन करना चाहिए। इनमें मुख्यत: रक्त को पतला करने की दवा-एस्प्रिन के अलावा रक्तचाप व रक्त की चर्बी नियंत्रित करने वाली दवाइयां। जिन्हें टी.बी. या अन्य संक्रमित रोग हो उन्हें नियमित रूप से उचित दवा का सेवन करना चाहिए।

कई रोगियों में पक्षाघात अचानक होता है परन्तु अन्य लोगों में पक्षाघात से कुछ दिन/हफ्ते पहले कुछ चेतावनी के चिन्ह आने लगते हैं। इन चेतावनी-चिन्हों में कुछ मिनट/घंटे के लिए व्यक्ति के शरीर का एक हिस्सा/अंग कमजोर/सुन्न पड़ जाता है, या बोलने में रुकावट आने लगती है या कुछ कम दिखाई देने लगता है या चक्कर-उल्टी-चलने में लड़खड़ाहट के लक्षण होने लगते हैं। ऐसे लक्षण होते हैं जब मस्तिष्क की नलिका पूर्ण रूप से अवरुद्ध रहे। ये रुकावट स्वयं ही दूर हो जाती है व लक्षण ठीक हो जाते हैं। ये चिन्ह इस बात की चेतावनी देते हैं कि भविष्य में वही नलिका पूर्ण-रूप से बंद हो सकती है व समय रहते उचित चिकित्सा से ऐसा होने से रोका जा सकता है।

अतएव सही जानकारी, उचित जीवन शैली व नियमित जांच-उपचार से पक्षाघात व उसके दुष्परिणामों से बचा जा सकता है
लकवा का  तीव्र आक्रमण होने पर रोगी को किसी अच्छे अस्पताल  में सघन चिकित्सा कक्ष में रखना उचित रहता है।इधर उधर देवी-देवता के चक्कर में समय  नष्ट करना उचित नहीं है। अगर आपकी  आस्था है तो कोई बात नहीं पहिले बडे अस्पताल का ईलाज करवाएं बाद में आस्थानुसार देवी-देवता का आशीर्वाद भी प्राप्त करलें।
     
      लकवा पडने के बाद अगर रोगी हृष्ट-पुष्ट है तो उसे ५ दिन का उपवास कराना चाहिये। कमजोर शरीर वाले के लिये ३ दिन के उपवास करना उत्तम है। उपवास की अवधि में रोगी को सिर्फ़ पानी में शहद मिलाकर देना चाहिये। एक गिलास जल में एक चम्मच शहद मिलाकर देना चाहिये। इस प्रक्रिया से रोगी के शरीर से विजातीय पदार्थों का निष्कासन होगा, और शरीर के अन्गों पर भोजन का भार नहीं पडने से नर्वस सिस्टम(नाडी मंडल) की ताकत पुन: लौटने में मदद मिलेगी।रोगी को सीलन रहित और तेज धूप रहित कमरे मे आरामदायक बिस्तर पर लिटाना चाहिये।

      उपवास के बाद रोगी को कबूतर का सूप देना चाहिये। कबूतर न मिले तो चिकन का सूप दे सकते हैं। शाकाहारी रोगी मूंग की दाल का पानी पियें। रोगी को कब्ज हो तो एनीमा दें।

      लहसुन की  ३  कली पीसकर दो चम्मच शहद में मिलाकर रोगी को चटा दें।

      १० ग्राम सूखी अदरक और १० ग्राम बच पीसलें इसे ६० ग्राम शहद मिलावें। यह मिश्रण रोगी को ६ ग्राम रोज देते रहें।





 लकवा रोगी का ब्लड प्रेशर नियमित जांचते रहें। अगर रोगी के खून में कोलेस्ट्रोल का लेविल ज्यादा हो तो ईलाज करना वाहिये।







   रोगी तमाम नशीली चीजों से परहेज करे। भोजन में तेल,घी,मांस,मछली का उपयोग न करे।



           

बरसात में निकलने वाला लाल रंग  का कीडा वीरबहूटी लकवा रोग में बेहद फ़ायदेमंद है। बीरबहूटी एकत्र करलें। छाया में सूखा लें। सरसों के तेल पकावें।इस तेल से लकवा रोगी की मालिश करें। कुछ ही हफ़्तों में रोगी ठीक हो जायेगा। इस तेल को तैयार करने मे निरगुन्डी की जड भी कूटकर डाल दी जावे तो दवा और शक्तिशाली बनेगी।

     एक बीरबहूटी केले में मिलाकर रोजाना देने से भी लकवा में अत्यन्त लाभ होता है।

        सफ़ेद कनेर की जड की छाल और काला धतूरा के पत्ते बराबर वजन में लेकर सरसों के तेल में पकावें। यह तेल लकवाग्रस्त अंगों पर मालिश करें। अवश्य लाभ होगा।


        लहसुन की ५ कली दूध में उबालकर लकवा रोगी को नित्य देते रहें। इससे ब्लडप्रेशर ठीक रहेगा और खून में थक्का भी नहीं जमेगा।


         लकवा रोगी के परिजन का कर्तव्य है कि रोगी को सहारा देते हुए नियमित तौर पर चलने फ़िरने का व्यायाम कराते रहें। आधा-आधा घन्टे के लिये दिन में ३-४ बार रोगी को सहारा  देकर चलाना चाहिये। थकावट ज्यादा मेहसूस होते ही विश्राम करने दें।