24.6.17

भस्त्रिका प्राणायाम करने की विधि और लाभ

    

भस्त्रिका प्राणायाम भस्त्र शब्द से निकला है जिसका अर्थ होता है ‘धौंकनी’। वास्तविक तौर पर यह प्राणायाम एक भस्त्र या धौंकनी की तरह कार्य करता है। धौंकनी के जोड़े की तरह ही यह ताप को हवा देता है, भौतिक औऱ सूक्ष्म शरीर को गर्म करता है। जहाँ तक बात रही भस्त्रिका प्राणायाम की परिभाषा की तो यह एक ऐसी प्राणायाम है जिसमें लगातार तेजी से बलपूर्वक श्वास लिया और छोड़ा जाता है। जैसे लोहार धौंकनी को लगातार तेजी से चलाता है, उसी तरह लगातार तेजी से बलपूर्वक श्वास ली और छोड़ी जाती है। योग ग्रन्थ हठप्रदीपिका में इस प्राणायाम को विस्तार से समझाया गया है (2/59-65)। दूसरी योग ग्रन्थ घेरंडसंहिता में इसको इस प्रकार व्याख्या किया गया है।

भस्त्रैव लौहकाराणां यथा क्रमेण सम्भ्रमेत्।
तथा वायुं च नासाभ्यामुभाभ्यां चालयेच्छनैः।। – घें. सं. 5/75


इस श्लोक का मतलब होता है जिस तरह लोहार की धौंकनी लगातार फुलती और पिचकती रहती है, उसी तरह दोनों नासिकाओं से धीरे-धीरे वायु अंदर लीजिए और पेट को फैलाइए, उसके बाद गर्जना के साथ इसे तेजी से बाहर फेंकिए।
भस्त्रिका प्राणायाम करने की विधि-
अब बात आती है कि भस्त्रिका प्राणायाम कैसे किया जाए। यहां पर इसको सरल तौर पर समझाया गया है जिसके मदद से आप इसको आसानी से कर सकते है।
सबसे पहले आप पद्मासन में बैठ जाए। अगर पद्मासन में न बैठ पाये तो किसी आराम अवस्था में बैठें लेकिन ध्यान रहे आपकी शरीर, गर्दन और सिर सीधा हो।
शुरू शुरू में धीरे धीरे सांस लें।
और इस सांस को बलपूर्वक छोड़े।
अब बलपूर्वक सांस लें और बलपूर्वक सांस छोड़े।
यह क्रिया लोहार की धौंकनी की तरह फुलाते और पिचकाते हुए होना चाहिए।
इस तरह से तेजी के साथ 10 बार बलपूर्वक श्वास लें और छोड़ें।
इस अभ्यास के दौरान आपकी ध्वनि साँप की हिसिंग की तरह होनी चाहिए।
10 बार श्वसन के पश्चात, अंत में श्वास छोड़ने के बाद यथासंभव गहरा श्वास लें। श्वास को रोककर (कुंभक) करें।
फिर उसे धीरे-धीरे श्वास को छोड़े।
इस गहरे श्वास छोड़ने के बाद भस्त्रिका प्राणायाम का एक चक्र पूरा हुआ।
इस तरह से आप 10 चक्र करें।
भस्त्रिका प्राणायाम के लाभ
पेट की चर्बी कम करने के लिए:
 भस्त्रिका प्राणायाम ही एक ऐसी प्राणायाम है जो पेट की चर्बी को कम करने के लिए प्रभावी है। लेकिन इसकी प्रैक्टिस लगातार जरूरी है।
वजन घटाने के लिए: 
यही एक ऐसी प्राणायाम है जो आपके वजन कम कर सकता है। लेकिन पेट की चर्बी एवम वजन कम करने के लिए यह तब प्रभावी है जब इसको प्रतिदिन 10 से 15 मिनट तक किया जाए।
अस्थमा के लिए: 
भस्त्रिका प्राणायाम अस्थमा रोगियों के लिए बहुत ही उम्दा योगाभ्यास है। कहा जाता है की नियमित रूप से इस प्राणायाम का अभ्यास करने से अस्थमा कम ही नहीं होगा बल्कि हमेशा हमेशा के लिए इसका उन्मूलन हो जायेगा।
गले की सूजन: 
इस योग के अभ्यास से गले की सूजन में बहुत राहत मिलती है।
बलगम से  निजात: 
यह जठरानल को बढ़ाता है, बलगम को खत्म करता है, नाक और सीने की बीमारियों को दूर करता है।
भूख बढ़ाने के लिए: 
इसके प्रैक्टिस से भूख बढ़ाता है।
शरीर को गर्मी देता है :
 हठप्रदीपिका 2/65 के अनुसार वायु, पित्त और बलगम की अधिकता से होनी वाली बीमारियों को दूर करता है और शरीर को गर्मी प्रदान करता है।
नाड़ी प्रवाह के लिए उत्तम: 
यह प्राणायाम नाड़ी प्रवाह को शुद्ध करता है। सभी कुंभकों में भस्त्रिका कुंभक सबसे लाभकारी होता है।
कुंडलिनी जागरण में सहायक: 
यह तीन ग्रंथियों ब्रह्मग्रंथि, विष्णुग्रंथि और रुद्रग्रंथि को तोड़ने के लिए प्राण को सक्षम बनाता है। ये ग्रंथियां सुसुम्ना में होती हैं। ये तेजी से कुंडलिनी जागृत करती हैं। (हठप्रदीपिका 2/66-67)
श्वास समस्या दूर करना: 
यह श्वास से संबंधित समस्याओं को दूर करने के लिए सबसे अच्छा प्राणायाम है।
भस्त्रिका प्राणायाम के सावधानियां
भस्त्रिका प्राणायाम उच्च रक्तचाप वाले व्यक्ति को नहीं करनी चाहिए।
हृदय रोग, सिर चकराना, मस्तिष्क ट्यूमर, मोतियाबिंद, आंत या पेट के अल्सर या पेचिश के मरीजों के ये प्राणायाम नहीं करना चाहिए।
गर्मियों में इसके बाद सितली या सितकारी प्राणायाम करना चाहिए, ताकि शरीर ज्यादा गर्म ना हो जाए।

अनुलोम विलोम प्राणायाम करने की विधि और फायदे



अनुलोम विलोम एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्राणायाम है| इस प्राणायाम में सांस लेने की क्रिया को बार बार किया जाता है| अनुलोम का मतलब होता है सीधा और विलोम का मतलब होता है उल्टा। इस प्राणायाम याने की अनुलोम विलोम में नाक के दाएं छिद्र से सांस को खींचते हैं, और बायीं नाक के छिद्र से सांस को बाहर निकालते है।
अनुलोम विलोम प्राणायम को नाड़ी शोधक प्राणायम के नाम से भी जान जाता है| इस आसान को करने के लिए उम्र का बंधन नहीं है, हर उम्र के व्यक्ति इसका लाभ उठा सकते है| इसे नियमित रूप से करने पर शरीर की सारी नाडि़यां शुद्ध व निरोग रहती हैं। इसके अलावा इस आसान को करने से सर्दी, जुकाम व दमा में भी काफी राहत मिलती है|
अनुलोम विलोम प्राणायाम करने की विधि
अनुलोम विलोम प्राणायम को करने के लिए किसी भी स्तिथि जैसे सुखासन, सिद्धासन या फिर वज्रासन में बैठें।
 
अनुलोम विलोम आसन की शुरुवात हमेशा नाक के बाये छिद्र से करनी है|
सबसे पहले हाथो की उंगलियो की सहायता से नाक का दाया छिद्र बंद करें व बाये छिद्र से लंबी सांस लें|
इसके पश्चात बाये छिद्र को बंद करके, दाये वाले छिद्र से लम्बी सांस को छोड़े|
इस प्रक्रिया को कम से कम 10-15 मिनट तक दोहराइए|
सांस लेते समय आपको अपना ध्यान दोनो आँखो के बीच मे स्थित आज्ञा चक्र पर एकत्रित करना होता है|
बस लम्बी लम्बी साँसे लेते जाइये और मन में ओम मंत्र का जाप करते जाइये|
शुरुवात में इसे योग प्रशिक्षक के निर्देश में किया जाए तो बेहतर है।
यदि आप एनीमिया से पीड़ित है तो इसे करने से पहले चिकित्सक से उचित सलाह ले|
साँस को छोड़ने और लेने का काम सहजता से करे| गलत तरीके से या फिर जल्दी बाजी में इसे करने से उल्टा शरीर को नुकसान होता है|
अनुलोम-विलोम प्राणायाम को करते वक्त तीन क्रियाएँ की जाती है| पूरक, कुम्भक और रेचक। इसको नियमित रूप से 10 मिनट करने पर भी स्वास्थ्य को कई लाभ मिलते है|
नियमित तौर पर इस योग को करने से फेफड़े मजबूत बनते हैं।
अनुलोम विलोम प्राणायाम को करने से एलर्जी और सभी प्रकार की चर्म समस्याए खत्म हो जाती है|
अनुलोम विलोम प्राणायाम करने से शरीर में रक्त का संचार सुधरता है| यह ब्लड प्रेशर की समस्या को दूर करने में सहायक है|
वजन घटाने के लिए भी यह बेहद फायदेमंद है| इस प्राणायाम को करने से शरीर की चर्बी घटती है और मोटापा भी कम होता है|
सर्दियों में शरीर का तापमान कम होने से सर्दी जुखाम जैसी समस्याए होती है, लेकिन यदि इस योग को ठंडी के दिन में किया जाये तो हमारे शरीर का तापमान संतुलित रहता हैं।
इससे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है| और मधुमेह जैसी समस्याए खत्म हो जाती है|
इसे ब्रेन ट्युमर जैसी समस्याए ठीक हो जाती है और यादास्त (मेमोरी) भी बढ़ती है|
इससे सायनस की समस्या ठीक हो जाती है और टाँन्सीलस की परेशानी में भी आराम मिलता है|
इसे करने से आर्थराटीस, कार्टीलेज घीसना जैसी बीमारियाँ भी ठीक हो जाती है|
वृद्धावस्था में अनुलोम विलोम करने से यह आपको स्वस्थ और निरोग रखने में मदद करता है। इसे करने से गठिया और जोड़ो का दर्द ठीक हो जाता है|
सावधानी-यदि आप कमजोर और एनीमिया से पीड़ित है। तो शुरुवात में सांस लेने और छोड़ने में परेशानी आ सकती है| इसलिए शुरुवात में इस क्रिया को 4 से 5 बार ही रखे|

23.6.17

बांझपन का इलाज योग आसन से



माता पिता बनना दुनिया का सबसे बड़ा सुख है| लेकिन बहुत से अभिभावक बांझपन के चलते बच्चे का सुख नहीं उठा पाते है| योग ऐसे पेरेंट्स के लिए बहुत फायदेमंद है जिनकी संतान नहीं है| योग की मदद से गर्भधारण करने की क्षमता बढती है| महिलाओ और पुरुषो में कुछ यौन समस्याओ के चलते गर्भाधान नहीं हो पाता|
पुरुषों और महिलाओं में बांझपन के महत्वपूर्ण कारणों में से कुछ कारण है कम शुक्राणु, शुक्राणुओं की खराब गुणवत्ता, महिलाओं में मासिक धर्म की अनियमितता, ओवेरियन सिस्ट, ट्यूब की रुकावट, आदि|
योग की मदद से इन परेशानियों से निजात पाई जा सकती है| कुछ योग के आसन है जिनका यदि अभ्यास किया जाये तो संतानहीन भी संतान का सुख भोग सकता है| बाबा रामदेव ने इसके लिए कई आसनों के बारे में बताया है तो आइये जानते है
आइये जानते है निःसंतान जोड़ों के लिए उपयोगी महत्वपूर्ण योग आसन
वज्रासन या वज्र मुद्रा
धनुरासन या धनुष मुद्रा
सुखासन या आसान मुद्रा
योग निद्रा
धनुरासन या धनुष मुद्रा


यह आसन जननांग अंगों और शरीर के अन्य भागों में रक्त की आपूर्ति को बढ़ाने में मदद करता है।  

साथ ही साथ यह रक्त से विषाक्त पदार्थों को भी दूर करने में मदद करता है| इसके नियमित अभ्यास से शरीर में यौन हार्मोन का स्तर बढ़ता है|
वज्रासन या वज्र मुद्रा


यह योग आसन अल्पशुक्राणुता का सबसे प्रभावी इलाज है| यह शुक्राणुओं की संख्या कम होने पर या अन्य यौन समस्याओं को ठीक करने के लिए बहुत उपयोगी है। यह आसन यौन अंगों को रक्त की आपूर्ति पूरी करता है और जब रक्त की आपूर्ति पूरी हो जाती है तब यौन अंगों की गतिविधि भी बढ़ जाती है|
इस आसन को तुरंत खाने के बाद करने के लिए कहा जाता है| यह आसन पाचन में मदद करता है और अम्लता जैसी अन्य पाचन समस्याओं में भी मदद करता है| इसलिए इसे खाना खाने के बाद करने के लिए कहा जाता है|
करने की विधि:
वज्रासन करने के लिए किसी समतल स्थान पर घुटनों के बल बैठ जाये| आपके नितम्ब आपके दोनों पैरो के एडियो के ऊपर रहेंगे| अपने दोनों हाथो को अपने झांघो पर रखिये| आपकी पीठ बिलकुल सीधी रहनी चाहिए| अपनी साँसों को सामान्य रहने दे| भोजन के पश्चात खास तौर पर कम से कम पांच मिनट तक इस आसन को करना चाहिए।
सुखासन या आसान मुद्रा


यह आसन शरीर से तनाव और चिंता को कम करने में सहायक है। साथ ही साथ यह विभिन्न रोगों के इलाज के लिए प्रयोग किया जाता है| यह योग आसन का सरलतम रूप है। यह मूड को बढ़ाने में मदद करता है और यौन अंगों की ताकत भी बढ़ जाती है। यह Yoga for Infertility बहुत प्रभावी है|
सुखासन करने की विधि:
सुखासन करने के लिए अपने पैर को लम्बे करके बैठ जाये| फिर पालथी मार ले, अर्थात एक पैर की एडी को दुसरे पैर के घुटनों के निचे और दुसरे पैर की एडी को पहले पैर के घुटनों के निचे| इस योगा का अभ्यास करते वक्‍त आपका सिर और गर्दन दोनों एक सीध में होना चाहिये। आपको झुककर नहीं बैठना है, अपनी रीढ़ की हड्डी को सीधा रखे और उसे बिल्‍कुल भी ना मोड़े। अपने दोनों हाथों को अपने पैरों पर रखें। यदि शुरुवात में आपको इसे करने में कठिनाई आ रही है तो आप टेकने के लिए दिवार का सहारा भी ले सकते है|
योग निद्रा


यह मुद्रा शरीर से हर प्रकार के तनाव को दूर करने में मदद करती है। यह उच्च रक्तचाप से पीड़ित लोगों के लिए एक बहुत अच्छा आसन है। इस आसन के नियमित अभ्यास शरीर की ताकत बढती है और शरीर से तनाव दूर होता है। यह कामेच्छा बढ़ाने में भी मदद करता है|
 

करने की विधि:
इसे करने के लिए समतल जगह पर दरी बिछाएं। फिर ढीले कपड़े पहनकर शवासन की स्थिति में लेट जाएं। जमीन पर आपके पैरो के बीच लगभग एक फुट की दूरी होनी चाहिए। अपनी आँखे बंद कर ले| हथेली की कमर से छह इंच की दुरी होना चाहिए| अब अपने सिर से लेकर पैर तक पूरे शरीर को शिथिल कर दे साथ ही साथ मन और मस्तिष्क से सारे विचार और तनाव को हटादे| इस वक्त आपको पूरी सांस लेना व छोड़ना है|
अपने पुरे शरीर को शांतिमय रखे| कल्पना करें कि आपका पूरा शरीर जैसे की हाथ, पैर, पेट, गर्दन, आंखें सब कुछ शिथिल हो गए हैं। पुरे शरीर को तनाव मुक्त होने का निर्देश देदे| अब स्वयं से मन ही मन कहें कि मैं योग निद्रा का अभ्यास करने जा रहा हूं। ऐसा कम से कम तीन बार दोहराएं और गहरी सांस लेना तथा छोड़ना जारी रखे| ऐसा महसूस करने की आपके शरीर से सारी परेशानिया एवं दर्द बाहर जा रहा है|
अपने मन को दाहिने पैर पर ले जाये और महसूस करे की आपके पैरो की सभी उंगलिया, तलवे, एडी, घुटने शिथिल हो रहे है| ऐसा ही बाये पैर के साथ भी करे| सहज सांस ले और छोड़े|

21.6.17

हड्डियाँ मजबूत करने के योग आसन


  कई लोगों का मानना है कि हड्डियों का कमजोर होना, उम्र से सम्‍बंधित होता है। वास्‍तव में, हड्डियों के कमजोर होने के पीछे सबसे प्रमुख कारण, खाने की बेकार आदतें, शारीरिक व्‍यायाम की कमी, कुछ दवाओं का लगातार सेवन, अधिक धूम्रपान और हड्डियों की आनुवांशिक बीमारी होते हैं।
  शोध में यह बात सामने आई है कि हड्डियों की कमजोरी और ऑस्‍टियोपोरोसिस, पौष्टिक आहार और शारीरिक गतिविधियों के साथ रोकी जा सकती है। किसी भी आयु में हड्डियों को मजबूत बनाएं रखने के लिए योग सबसे अच्‍छा उपाय है।
हाल ही में कोलम्बिया विश्‍वविद्यालय ने न्‍यूयॉर्क में दो साल का अध्‍ययन किया, जिसमें मरीजों की हड्डियों सम्‍बंधी बीमारी पर रिसर्च की गई। इन लोगों को प्रतिदिन 10 मिनट योग करवाया गया, जिससे इन्‍हें काफी लाभ मिला। आप भी ऐसे ही कुछ योगा को कर सकते हैं जिससे आपकी हड्डियों में मजबूती आएं।
वृक्षासन 

इस योग में व्‍यक्ति को पेड़ की तरह खड़े होना होता है। इस आसन को करने से रीढ़, कमर और पेल्विक हड्डी मजबूत बनी रहती है। गठिया की समस्‍या से राहत मिलती है और कमजोर कंधे भी मजबूत हो जाते हैं। साथ ही शरीर का संतुलन भी अच्‍छा बना रहता है।
उत्‍कटासन

इस आसन में व्‍यक्ति को कुर्सी की तरह बनना होता है। इसे करने से शरीर की मांसपेशियां खिंचती है और उनकी सहनशक्ति में बढ़ोत्‍तरी होती है।  
हड्डियों में भी काफी फायदा होता है। कंधे और छाती की हड्डियां, मजबूत हो जाती है।
सेतु बंधासन 

अपनी मांसपेशियों और अंगों को स्‍ट्रेच करते हुए, इस आसन से शरीर की हड्डियों में मजबूती आती है। नई कोशिकाओं का विकास अच्‍छी तरह होता है। बॉडी ब‍िल्डिंग करने वाले लोगों के लिए ये आसन सबसे अच्‍छा होता है
भुजंगासन

 सूर्य नमस्‍कार करते समय भुजंगासन किया जाता है जिससे हड्डियां मजबूत बनती हैं और लोअर-बैक सपोर्ट भी अच्‍छा हो जाता है। इसे करने से कलाईयों की हड्डियों में मजबूती आ जाती है और उंगलियां भी गठिया रहित हो जाती हैं।
अधोमुख शवासन 
इस आसन को करने से पैर, कमर, रीढ़ की हड्डियों पर जोर पड़ता है और वो मजबूत हो जाती हैं। जिन लोगों को गठिया की शिकायत की शुरूआत हुई हो, वो इसे अवश्‍य करें। शरीर के ऊपरी हिस्‍से में भी इसे करने से मजबूती आती है।

19.6.17

शुक्राणुओ में वृद्धि करने के रामबाण उपाय


   वीर्य एक जैविक तरल पदार्थ है, जिसे धातु के नाम से भी जाना जाता है। यह बहोत से शुक्राणुओं के मेल से बना होता है। वीर्य शरीर की बहुत मूल्यवान धातु है। भोजन से वीर्य बनने की प्रक्रिया बड़ी लम्बी है। जो भोजन पचता है, उसका पहले रस बनता है। पांच दिन तक उसका पाचन होकर रक्त बनता है, उसमें से 5-5 दिन के अंतर से मेद, मेद से हड्डी, हड्डी से मज्जा और मज्जा से अंत में वीर्य बनता है। इस प्रकार वीर्य बनने में करीब 30 दिन व 4 घण्टे लग जाते हैं। वैज्ञानिक बताते हैं कि 32 किलो भोजन से 800 ग्राम रक्त बनता है और 800 ग्राम रक्त से लगभग 20 ग्राम वीर्य बनता है।
   भारत के मर्दो के वीर्य में साल दर साल शुक्राणुओं की कमी देखी जा रही है। भारत के मर्दो में अब पहले जैसी बात नही रही। शक्राणु के आकर और संरचना में गड़बड़ियां आ रही है। 1978 में एक सेहतमंद व्यक्ति के वीर्य में शुक्राणुओं की गिनती 6 करोड़ प्रति लीटर पाई जाती थी, 2012 में यह गिनती 6 करोड़ से 2 करोड़ हो गयी थी।
स्वस्थ या हेल्दी शुक्राणु (sperm) का मतलब होता है एक मिलीलीटर वीर्य (semen) के सैम्पूल में 15 मिलियन शुक्राणु की कोशिकाओं का होना। स्वस्थ शुक्राणु में इन लक्षणों के अलावा रूप, संरचना और गतिशीलता भी सामान्य होनी चाहिए। इन सब गुणों में से एक भी गुण में थोड़ा-सी भी कमी अनहेल्दी शुक्राणु के लक्षण हो जाते हैं। इससे आप में नपुंसकता और सेक्स करने के इच्छा में कमी आ जाती है। अतः अनहेल्दी शुक्राणु आपके सेक्स लाइफ के आनंद को पूरी तरह से बरबाद करने में सहायक होता है। अपने जीवनशैली में कुछ सुधार लाकर आप शुक्राणु के क्वालिटी यानि गुणवत्ता और संख्या को बढ़ाने में सक्षम हो सकते हैं-
   सही खाना खायें- 
अगर आप नपुंसक नहीं होना चाहते हैं तो अपने खान-पान पर पहले नजर डालें। अत्यधिक मात्रा में जंक फूड खाने से सबसे पहले आपकी प्रजनन क्षमता (reproductive system) खतरे में पड़ती है। आजकल जंक फूड खाने के अधिक प्रचलन के कारण ही लोगों में नपुंसकता और इरेक्टाइल डिसफंक्शन की समस्या ज़्यादा से ज़्यादा होने लगी है। स्वास्थ्यवर्द्धक खाना या हेल्दी खाना खाने से इस समस्या से कुछ हद तक राहत पाया जा सकता है, जैसे- प्रोटीन, फल, सब्ज़ियों, फाइबर आदि का सेवन।
व्यायाम-
 वैसे तो उम्र के साथ शुक्राणुओं की संख्या कम होने लगती हैं। लेकिन इस समस्या को भी कुछ हद तक नियंत्रण में किया जा सकता है यदि आप युवावस्था में खुद को सक्रिय रखें तो। बहुतमोटा होना या दुबला होना दोनों ही स्थिति में यह आपके सेक्स जीवन को प्रभावित करता है। इससे टेस्टास्टरोन (testosterone) के स्तर में कमी, कामेच्छा में कमी, इरेक्शन कम होने की समस्या आदि होती है। इन सब समस्याओं से लड़ने का एक ही उपाय है वह है नियमित रूप से व्यायाम करना।
 
कम मात्रा में शराब पीयें- 
अध्ययन के अनुसार एक से अधिक बार शराब पीने से शुक्राणुओं के उत्पादन में और सेक्स इच्छा में कमी आ जाती है। साथ ही पुरूषों के सेक्स हार्मोन टेस्टास्टरोन के स्तर में भी कमी आ जाती है। इसलिए सेक्स जीवन को स्वस्थ और सुंदर बनाने के लिए शराब के सेवन के आदत में सुधार लाना ज़रूरी होता है।
ध्रूमपान करना कम करें: 
अगर आप शुक्राणु को स्वस्थ रखना चाहते हैं तो तुरन्त ध्रूमपान करना छोड़ दें। एक पैक सिगरेट पीने से यह वीर्य में कैडमियम (cadmium) के स्तर को बढ़ाकर शुक्राणुओं को अनहेल्दी करता है क्योंकि कैडमियम डी.एन.ए. को क्षति पहुँचाता है यानि इससे शुक्राणुओं के संख्या में कमी आ जाती है।
मनोरंजनात्मक दवाईयों को ना कहें- 
मनोरंजात्मक दवाईयाँ जैसे मैरवान (marijuana) और कोकेन (cocaine) को सेक्स-प्रक्रिया को बूरी तरह से प्रभावित करता है। इससे पुरूषों के लिंग में रक्त का संचार अच्छी तरह से नहीं हो पाता है, शुक्राणुओं के उत्पादन के स्तर में कमी आती है, यानि ये पूरी तरह से सेक्स जीवन को क्षति पहुँचाता है। इसलिए इन दवाईयों से बचकर रहना चाहिए।
तनाव को जीवन से दूर करें- 
 
शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मन को स्वस्थ रखना ज़रूरी होता है। अगर आपका मस्तिष्क ही तनावग्रस्त होगा तो शरीर के दूसरे अंग कैसे सही तरह से कार्य कर पायेंगे। रक्त में उच्च स्तर में स्ट्रेस हार्मोन के कारण शुक्राणुओं की संख्या घट सकती है, गुणवत्ता पर भी बूरा प्रभाव पड़ सकता है।
सेक्स के समय सुरक्षा का ध्यान रखें-
 सेक्स के समय सुरक्षा का ध्यान नहीं रखने पर यौन संचारित रोग (STD) होने की संभावना बढ़ जाती है जो शुक्राणुओं के डी.एन.ए. और संख्या को पहले प्रभावित करता है।
ताप के संपर्क में कम रहें- 
अध्ययन के अनुसार अत्यधिक ताप के संपर्क में रहने से भी शुक्राणुओं के उत्पादन में कमी आती है। अगर पिता बनने की योजना बन रहे हैं तो हॉट बाथटब, हॉट शावर, जकुज़ी (Jacuzzis) आदि से दूर रहें। लंबे समय तक इनका प्रयोग करने से शुक्राणुओं पर बूरा प्रभाव पड़ता है।
शुक्राणुओ में वृद्धि करने के लिए 3 विशेष उपचार-
1. तुलसी के बीज
2. बथुआ
3. दूध और केसर
आएं जाने कैसे करना है इनका प्रयोग
तुलसी के बीज
तुलसी के बीज आधा ग्राम (पीसे हुए), पान के साथ सादे या केवल कत्था चुना लगाये पान के साथ नित्य सुबह एवं शाम खाली पेट खाने से वीर्य पुष्टि एवं रक्त शुध्दि होती है।
विशेष
1. जो लोग पान नही खाते, वे एक भाग तुलसी के बीज का चूर्ण को दो भाग पुराने गुड में मिलाकर ले सकते है।
2. आवश्यकता अनुसार दस से चालीस दिन तक लें। साधारणतया आठ-दस दिनों का प्रयोग पर्याप्त रहता है। अधिक से अधिक चालीस दिन तक प्रयोग किया जा सकता है।
3. तुलसी के बीज अत्यंत उष्ण होने के कारण यह प्रयोग केवल शीतकाल में ही किया जाना चाहिए।
4. इश्तहारी पौरुष बलवर्धक ओषधियों के पीछे भागने वाले यदि नपुंसकत्व रोग-नाशक तुलसी के बीजों का उक्त प्रयोग करें तो पांच सप्ताह में ही उनकी चिंता दुर हो सकती है।

5. इसके अतिरिक्त गैस कफ से उत्पन्न होने वाले अनेक रोग मिट जाते है।
 
परहेज
1. तेल और तली चीजें, अधिक लाल मिर्च, मसालेदार पदार्थ, इमली, अमचूर, तेज खटाईयां व आचार।
2. प्रयोग काल में घी का उचित सेवन करना चाहिए।
3. पेट की शुध्दि पर भी ध्यान देना चाहिए। कब्ज नही होने देनी चाहिए। कब्ज अधिक रहता हो तो प्रयोग से पहले पेट को हल्के दस्तावर जैसे त्रिफला का चूर्ण एक चमच अथवा दो-तीन छोटी हरड़ का चूर्ण गर्म दूध या गर्म पानी के साथ, सोने से पहले अंतिम वास्तु के रूप में लें।
4. सेवन-काल में ब्रह्मचर्य का पालन करना आवश्यक है।
5. ओषधि सेवन के आगे-पीछे कम से कम दो घंटे कुछ न खाएं। खाली पेट सेवन से यह मतलब है।
बथुआ
बथुआ का शाक हरे पत्ते के शाको में सर्वाधिक गुणकारी है। बथुआ शुक्र की वृध्दि करता है। रक्त की शुध्दि करता है। स्मरण शक्ति तेज करता है। आमाशय को बल प्रदान करता है। कब्जनाशक और जठराग्निवर्धक है। गर्मी में बढ़े हुए यकृत को ठीक करता है। पथरी से बचाव करता है। इसे जब तक हरा मिले, हरा सेवन करना चाहिए अन्यथा सुखाकर रख लें। इसको पीसकर अथवा इसके कतरन आटे में गूंधकर रोटी बनाकर खाना भी लाभप्रद है।
दूध और केसर
दूध और केसर शीतकाल में 250 ग्राम औटाये हुए दूध में चार-पांच केसर की पंखुड़ियां अच्छी तरह मिलाकर, मिश्री डालकर, यह दूध प्रात: या रात सोने से पहले पिया जाय तो पुरुषत्व शक्ति में खूब वृध्दि होती है। स्फूर्ति आती है। खून का दौरा बढ़ता है। शरीर की रंगत निखरती है। प्रभाव की द्रष्टि से अत्यंत कामोद्दीपक, उत्तेजिक और बाजीकरण है। इसके सेवन में सर्दी का प्रभाव भी कम पड़ता है। सर्दी से बचाव हो और हाथ-पांव बर्फ की तरह ठंडे होना मिटता है।
शुक्राणु बढ़ाने के अन्य उपाय 
ज्यादा सब्जी और अनाज खाएँ.
दिन भर में ज्यादा पानी पीएँ.
विटामिन C और एंटीअॅक्सीडेंट से भरपूर भोजन करें.
विटामिन C आपकी वीर्य से संबंधित समस्या को कम करेगा और वीर्य के जीवनकाल को बढ़ाएगा.
हर दिन एक ग्लास नारंगी का जूस पिएँ.

हरी सब्जियाँ, फलियाँ, अनाज और नारंगी का रस वीर्य की मात्रा बढ़ाता है.
हर दिन कुछ देर धूप में बैठें. यह भी आपके लिए फायदेमंद होगा.
दही, स्लिम दूध, सैल्मन का अधिक मात्रा में सेवन करना आपके लिए फायदेमंद होगा.
 
धूप में निकलने से पहले अपने शरीर पर सनस्क्रीन लगाकर निकलें.
प्याज का नियमित सेवन शुरू करें.
अपने खानपान में एंटीॅआक्सीडेंट, जिनसेंग, अश्वगंधा, कद्दू के बीज, अखरोट, केला को शमिल करें.
धूम्रपान, ड्रग्स, शराब आदि का सेवन करना बंद कर दें.
ऐसे कपड़े पहनें जिनसे आपके अंडकोश पर दबाब न पड़े. ढीले कपड़े जिसमें हवा का प्रवेश हो पहनें.
रात में सोते वक्त अंडरपैंट न पहनें, केवल पायजामा या कोई अन्य ढीला कपड़ा पहनें.
साइकिल का उपयोग करना बंद कर दें, क्योंकि साइकिल चलाने के दौरान अंडकोष को दबाव, धक्का और उछाल सहना पड़ता है.
और वीर्य को इनमें से कुछ भी पसंद नहीं है. बाइक, कार या बस का प्रयोग करें.
मिनरल जिंक का ज्यादा सेवन करें.
हर दिन के भोजन में अखरोट, बीन्स, शुत्कि, चिकन को सम्मिलित करें.
मांस, फल और सब्जियों का नियमित सेवन शरीर में वीर्य की मात्रा को बढ़ाता है.
रेड मीट खाना और दूध पीना शुरू करें.
ड्राईफ्रूट, तिल और अंडे को अपने दैनिक भोजन में शामिल करें.
पनीर का सेवन करना शुरू करें.
तनाव से दूर रहें. तनाव वीर्य उत्पन्न करने वाले हार्मोन को कम कर देता है.
अपने वजन को नियंत्रित रखें, आपका वजन न तो बहुत कम होना चाहिए न तो बहुत अधिक होना चाहिए.
इससे आपके शरीर में शुक्राणुओं की मात्रा बढ़ेगी.
स्टेरॉयड का सेवन न करें, इसका आपके अंडकोश पर बुरा असर पड़ता है.
ऐनेबोलिक स्टेरइड आपके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है.
अगर आप शुक्राणुओं / वीर्य की मात्रा बढ़ाना चाहते हैं, तो आपको हर दिन 8-9 घंटे की भरपूर नींद लेनी होगी.
आपको काम के साथ पर्याप्त आराम भी करना होगा.
जरूरत भर आराम करने और जरूरत भर सोने से शरीर में शुक्राणुओं की मात्रा बढ़ती है.

चिकनगुनिया बुखार के उपचार



  चिकनगुनिया बुखार  एक वायरस बुखार है जो एडीज मच्छर एइजिप्टी के काटने के कारण होता है। चिकनगुनिया और डेंगू के लक्षण लगभग एक समान होते हैं।​ इस बुखार का नाम चिकनगुनिया स्वाहिली भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है ''ऐसा जो मुड़ जाता है'' और यह रोग से होने वाले जोड़ों के दर्द के लक्षणों के परिणामस्वरूप रोगी के झुके हुए शरीर को देखते हुए प्रचलित हुआ है।
चिकनगुनिया के लक्षण 
चिकनगुनिया में जोड़ों के दर्द के साथ बुखार आता है और त्वचा खुश्क हो जाती है। चिकनगुनिया सीधे मनुष्य से मनुष्य में नहीं फैलता है। यह बुखार एक संक्रमित व्यक्ति को एडीज मच्छर के काटने के बाद स्वस्थ व्यक्ति को काटने से फैलता है। चिकनगुनिया से पीड़ित गर्भवती महिला को अपने बच्चे को रोग देने का जोखिम होता है।
जोडों के दर्द का उपाय 
चिकनगुनिया के बुखार के बाद जोड़ों का दर्द कुछ दिन या सप्ताह तक बना रह सकता है। इससे बचने के लिए निम्न उपाय लाभदायक होते हैं:
लहसुन और सहजन की फली 
लहसुन और सजवायन की फली चिकुनगुनिया के इलाज के लिए बहुत बढ़िया है। चिकुनगुनिया में जोड़ों में काफी दर्द होता है, ऐसे में शरीर की मालिश किया जाना बेहद जरूरी है। इसके लिए किसी भी तेल में लहसुन और सजवायन की फली मिलाकर तेल गरम करें और इस तेल से रोगी की मालिश करें।
लौंग और लहसून का तेल 
चिकनगुनिया के दौरान दर्द वाले जोड़ों पर लहसुन को पीसकर उसमें लौंग का तेल मिला लेना चाहिए, फिर इस पेस्ट को कपड़े की सहायता से जोड़ों पर बांधने से आराम मिलता है। इससे चिकुनगुनिया के मरीजों को जोड़ों के दर्द (Chikungunya Joint Pain Remedies) से आराम मिलता है।
विटामिन सी अधिक लें 
चिकनगुनिया के दौरान होने वाले दर्द को दूर करने के लिए विटामिन सी युक्त आहार अधिक लेना चाहिए। इस समय संतरा, कीवी , पपीता, विटामिन सी की गोलियां आदि खाने से काफी आराम मिलता है।
मसाज 
प्राकृतिक तेलों से मसाज करने से भी चिकनगुनिया के दर्द में राहत मिलती है। दर्द वाली जगह पर हल्के गर्म तेलों या कपूर, नारियल और लहसून को मिलाकर बनाए गए तेल की देर तक मसाज करनी चाहिए।
चिकनगुनिया के दौरान जोड़ों के दर्द को दूर करने के अन्य उपाय निम्न हैं:
• पर्याप्त मात्रा में तरल प्रदार्थों, फलों और सब्जियों का सेवन करना चाहिए।
• तुलसी, अदरक या ग्रीन टी का सेवन करना चाहिए।
• जोड़ों पर बर्फ की सेंक से भी काफी राहत मिलती है।
• पपीते के पत्तों को पानी में उबाल कर पीने से भी राहत मिलती है।
• चिकनगुनिया के बुखार के दौरान कभी भी ऐस्प्रिन नहीं लेनी चाहिए।


सामान्य उपचार
अधिक से अधिक पानी पीएं, हो सके तो गुनगुना पानी पीएं।
ज्यादा से ज्यादा आराम करें।
चिकनगुनिया के दौरान जोड़ों में बहुत दर्द होता है
दूध से बने उत्पाद, दूध-दही या अन्य चीजों का सेवन करें।
रोगी को नीम के पत्तों को पीस कर उसका रस निकालकर दें।
रोगी के कपड़ों एवं उसके बिस्तर की साफ-सफाई पर खास ध्यान दें।
करेला व पपीता और गिलोय के पत्तों का रस काफी फायदेमंद माना जाता है।
नारियल पानी पीने से शरीर में होने वाली पानी की कमी दूर होती है और लीवर को आराम मिलता है।
ऐस्प्रिन बुखार होने पर कभी ना लें, इससे काफी समस्या हो सकती है। 
चिकनगुनिया में बच्चों की देखभाल 
बच्चों का खास ख्याल रखें।
बच्चे नाजुक होते हैं और उनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है इसलिए बीमारी उन्हें जल्दी पकड़ लेती है। ऐसे में उनकी बीमारी को नजरअंदाज न करें।
बच्चे खुले में ज्यादा रहते हैं इसलिए इन्फेक्शन होने और मच्छरों से काटे जाने का खतरा उनमें ज्यादा होता है।
बच्चों घर से बाहर पूरे कपड़े पहनाकर भेजें। मच्छरों के मौसम में बच्चों को निकर व टी - शर्ट न पहनाएं। रात में मच्छर भगाने की क्रीम लगाएं।
अगर बच्चा बहुत ज्यादा रो रहा हो, लगातार सोए जा रहा हो, बेचैन हो, उसे तेज बुखार हो, शरीर पर रैशेज हों, उलटी हो या इनमें से कोई भी लक्षण हो तो फौरन डॉक्टर को दिखाएं।
आमतौर पर छोटे बच्चों को बुखार होने पर उनके हाथ - पांव तो ठंडे रहते हैं लेकिन माथा और पेट गर्म रहते हैं इसलिए उनके पेट को छूकर और रेक्टल टेम्प्रेचर लेकर उनका बुखार चेक किया जाता है। बगल से तापमान लेना सही तरीका नहीं है, खासकर बच्चों में। अगर बगल से तापमान लेना ही है तो जो रीडिंग आए, उसमें 1 डिग्री जोड़ दें। उसे ही सही रीडिंग माना जाएगा।
  चिकनगुनिया में जोड़ों में दर्द सिर दर्द  उल्टी  और जी मिचलाने के लक्षण उभर सकते हैं जबकि कुछ लोगों में मसूड़ों और नाक से खून भी आ जाता है। मच्छर काटने के लगभग बारह दिन में चिकनगुनिया के लक्षण उभरते हैं। चिकनगुनिया के उपचार के लिए बहुत से घरेलू नुस्खे हैं जिन्हें अपनाकर चिकनगुनिया से खुद को बचाया जा सकता है।
*पपीते की पत्ती 
पपीते की पत्ती न केवल डेंगू बल्कि चिकनगुनिया में भी उतनी ही प्रभावी है। बुखार में शरीर के प्लेटलेट्स तेजी से गिरते हैं, जिन्हें पपीते की पत्तियां तेजी से बढ़ाती हैं। मात्र तीन घंटे में पपीते की पत्तियां शरीर में रक्त के प्लेटलेट्स को बढ़ा देती हैं। उपचार के लिए पपीते की पत्तियों से डंठल को अलग करें और केवल पत्ती को पीसकर उसका जूस निकाल लें। दो चम्मच जूस दिन में तीन बार लें।
* एप्सम साल्ट 
एप्सम साल्ट की कुछ मात्रा गरम पानी में डालकर उस पानी से नहाएं। इस पानी में नीम की पत्तियां भी मिलाएं। ऐसा करने से भी दर्द से राहत मिलेगी और तापमान नियंत्रित होगा।
 
*अंगूर (Grapes)
अंगूर को गाय के गुनगुने दूध के साथ पीने पर चिकनगुनिया के वायरस मरते हैं लेकिन ध्यान रहे अंगूर बीजरहित हों।
* गाजर
कच्ची गाजर खाना भी चिकनगुनिया के उपचार में बेहद फायदेमंद है। यह रोगी की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाती है साथ ही जोड़ों के दर्द से भी राहत देती है।
* तुलसी और अजवायन 
तुलसी और अजवायन भी चिकनगुनिया के उपचार के लिए बेहद अच्छी घरेलू औषधि हैं। उपचार के लिए अजवायन, किशमिश, तुलसी और नीम की सूखी पत्तियां लेकर एक गिलास पानी में उबाल लें। इस पेय को बिना छानें दिन में तीन बार पीएं।
*लहसुन और सहजन की फली 
लहसुन और सजवायन की फली चिकनगुनिया के इलाज के लिए बहुत बढ़िया है। चिकनगुनिया में जोड़ों में काफी दर्द होता है, ऐसे में शरीर की मालिश किया जाना बेहद जरूरी है। इसके लिए किसी भी तेल में लहसुन और सजवायन की फली मिलाकर तेल गरम करें और इस तेल से रोगी की मालिश करें।
* लौंग 
दर्द वाले जोड़ों पर लहसुन को पीसकर उसमें लौंग का तेल मिलाकर, कपड़े की सहायता से जोड़ों पर बांध दें। इससे भी चिकनगुनिया के मरीजों को जोड़ों के दर्द से आराम मिलेगा, और शरीर का तापमान भी नियंत्रित होगा।

16.6.17

छोटे बच्चों के रोग और उपचार



छोटे बच्चों को बड़ी जल्दी बीमारियां घेरने लगती है। कई बार बच्चे के रोगों का पता भी नहीं चल पाता है कि वह किस समस्या से परेशान है। सामान्य परेशानियां जैसे प्रायः पेट फूलना, चुनचुने लगना, जुकाम, पेट में एठन होना मुख्य समस्याएं हैं जिनके बारे में बच्चे की मां को पता होना चाहिए। इन लक्षणों (symptoms of children’s diseases) के आधार पर पर नवजात बच्चों की बीमारी का पता लगाया जा सकता है।
* बीमारी के शुरूआत में शिशु में चिड़चिड़े पन के साथ रोने लगता है।

* मां का दूध भी न पीना। या पीने के बाद उल्टी कर देना।
* मल त्याग न कर पाना।
*बच्चे के किसी भाग में दर्द होना और उस भाग का लाल और कड़ा होना तथा उसे छूने पर बच्चे का रोना। समय रहते रोगों के लक्षणों की पहचान से बच्चे को रोगों से बचाया जा सकता है।
* शिशु में बेचैनी का बढ़ना।
* शिशु का सुस्त और निढाल सा होना।
*मां की गोद में भी न आना।
* बच्चे की त्वचा का शुष्क होना।
कब्ज
शिशु को समय पर शैच का न आना।
मल का सख्त और उसका कठिनता से निकलना।
कारण
शिशु का दूध अधिक पीना या कम पीने की वजह से कब्ज होती है।
पेट में विकार होने से भी कब्ज हो सकती है।
इलाज
शिशु को गुनगुना जल पीलाएं।
उपर के दूध में छुआरा या मुनक्का उबाल कर बच्चे को दे सकते हो।
देशी जन्म घुटी बच्चे को देनी चाहिए।
शिुशु को पालक का साग मसलकर खिलाना चाहिए।
बच्चों को दस्त संबंधी रोग सबसे अधिक होते हैं। एैसी अवस्था में बच्चे को दूध भी नहीं पच पाता है। बच्चों के दस्त दो प्रकार के होते हैं।
पहले प्रकार के दस्त
इस प्रकार के दस्त में बच्चे को शैच में ही सफेद रंग की बुंदकिया होती है।
कभी शैच राख के रंग की तरह होता है।
कारण
दूध अधिक मात्रा में पी जाना।
दूध में चिकनाई का अधिक होना।
उपचार
एैसे में दूध की मात्रा कम कर दें।
दूध में थोड़ा पानी मिलाकर दूध को हल्का कर देना चाहिए।
दस्त के दूसरे प्रकार
लक्षण
दस्तों का झागदार होना।
कारण
दूध में चीनी अधिक डालना।
 

दूध में उबला पानी मिलाकर शिशु को पिलाना चाहिए।
दस्त के तीसरे प्रकार
लक्षण
तीसरी प्रकार के दस्त में बच्चों को पतले और हरे रंग के दस्त होते हैं।
कारण
बच्चे को डिब्बे या भैंस का दूध हजम नहीं होना।
शिशु के द्वारा कम मात्रा में दूध सेवन करना भी दस्त का कारण बन सकता है।
उपचार
भैसं का दूध शिशु को न दें। मां का दूध का सेवन कराएं
शिशु के दूध की मात्रा बढ़ा दें और बच्चे की मां को दलिये का सेवन करना चाहिए।
पेट में पीड़ा होना
लक्षण
पेट का फूल जाना।
पेट में पीड़ा या शूल रहना।
कारण
दूध में शक्कर या प्रोटीन की ज्यादा मात्रा होना इस रोग का कारण बनती है।
इलाज
शिशु को बकरी का दूध का सेवन कराएं।
शिशु के पेट की सिकाई करें।
शिशु को दूध में शक्कर डालकर देना चाहिए।
शिशु को दूध में पानी मिलाकर देना चाहिए।
ऐठन होना
ऐठन होने पर शिशु का चेहरा पीला पड़ जाता है। और शिशु की मांसपेशियों में खिंचाव आने लगता है।
उपचार
शिशु को दूसरे बच्चों से दूर रखें।
शिशु के कपड़ों को ढीला कर लें।
शिशु को ठंड से बचायें।
सूखा रोग
इस रोग में शिशु पीला पड़ जाता है। और उसकी त्वचा पर झुर्रियां या सिकुड़ने आदि पड़ने लगती है। सूखा रोग में शिशु का वजन कम हो जाता है साथ ही वह हड्डियों का ढांचा मात्र लगने लगता हैं। शिशु के स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने लगता है। इसका सबसे बड़ा कारण है विटामिन सी की शरीर में कमी। इस रोग से बचाव में शिशु का विटामिन सी वाले पदार्थ देते रहना चाहिए।
शिशु का उल्टी होना
शिशु को यदि उल्टी हो रही हो तो उसे नियमित रूप से ओआरएस का घोल पिलाएं। सबसे पहले आप ओआरएस के घोल को उबाल कर ठंडा करके शिशु को पिलाते रहें। आप केवल 24 घंटे तक एक घोल का इस्तेमाल कर सकते हैं। उसके बाद दूसरा घोल बनाकर शिशु को दें।
किस तरह से करें शिशु की देखभाल बीमारी में
मां को चाहिए कि वे अपने बच्चे को स्तनपान करवाती रहे।
दांत निकलने से बच्चे को होने वाली परेशानियों को दूर करने के लिए बच्चे को सुबह के समय में शहद चटाएं। शहद बच्चे को हर प्रकार की समस्या से बचाता है।
बच्चे की तेल से मालिश करें। दो साल से कम उम्र के बच्चे की मालिश रात को सोने से पहले जैतून के तेल से करें।
बुखार होने पर बच्चे को खूब पानी दें। उल्टी होने पर भी बच्चे को पानी जरूर दें। शरीर में पानी कम कमी से बच्चे की जान को खतरा हो सकता है।
बच्चे को मोटे कपड़े ना पहनाएं। जितना हो सके हल्के कपड़ो को ही बच्चे को पहनाएं।
बुखार के समसय में गीले मोंजों को बच्चे के पैरों पर रख दें। और मोजे सूखने पर दोबारा इस क्रिया को दोहराएं।

15.6.17

एस्प्रिन के फायदे नुकसान



    एस्पिरिन, जिसे एसिटाइलसैलिसाइलिक एसिड, भी कहते हैं, एक सैलिसिलेट औषधि है, जो अकसर हल्के दर्दों से छुटकारा पाने के लिये दर्द निवारक के रूप में, ज्वर कम करने के लिये, ज्वरशामक के रूप में, और शोथ-निरोधी दवा के रूप में प्रयोग में लाई जाती है। यह भी पाया गया है कि हृदयाघात के तुरंत बाद थोड़ी मात्रा में एस्पिरिन देकर एक और हृदयाघात या हृदय के ऊतक की मृत्यु का जोखम कम किया जा सकता है।
    यह गोली कैंसर से भी बचाव करती है, इसका पता अभी फिलहाल की रिसर्च में पता चला है। एस्पिरिन को 16 साल की कम उम्र के बच्‍चे नहीं खा सकते क्‍योंकि यह रेइज़ सिंड्रोम के जोखम का कारण बनती है। एस्पिरिन के, विशेषकर अधिक मात्रा में लेने पर, मुख्य अवांछित दुष्प्रभावों में आमाशय व आंतों में छाले, आमाशय में रक्तस्राव और कानों में आवाज आना शामिल हैं। आप इसे खाएंगे या नहीं यह आपको खुद ही सोचना पड़ेगा।  
एस्पिरिन को खाने के अच्‍छे और बुरे प्रभाव-
हार्ट अटैक दूर करे: 
हार्ट अटैक के रोगी को जब भी हार्ट अटैक का दौरा पड़ने लगता है, वह एस्पिरीन की एक गोली को मुंह में रख लेता है, जिससे दर्द गायब हो जाता है।
सिरदर्द भगाए: 
एस्पिरिन खाने से चाहे जितना भयानक दर्द हो वह गायब हो जाता है। इससे बेहतरीन और तुरंत प्रभाव डालने वाली दवा कोई नहीं है।
मुंहासे से मुक्‍ती: 
इस गोली में एक एसिड होता है जिसे अगर गोली को पीस कर मुंहसो पर लगाया जाए तो, वे सूख जाते हैं और जल्‍द ठीक हो जाते हैं।
बुखार के मामले में:
 अगर आपको बुखार और पूरे बदन में दर्द महसूस हो तो इसकी एक गोली खाने से आपको बेहतर लगेगा
लीवर डैमेज से बचाए: अच्‍छा प्रभाव चूहे पर रिसर्च की गई और पता चला कि एस्पिरिन की एक गोली उन्‍हें लीवर की खराबी से बचा सकती है। यह खासकर उन लोगों के लिये अच्‍छा है जो शराब पीते हैं।
रूसी मिटाए: 
 अपने शैंपू के साथ एस्‍पिरिन की 1 गोली को पीस कर मिलाइये और सिर धो लीजिये। इससे रूसी मिट जाएगी।
एस्परीन के दुष्प्रभाव-
 
अस्‍थमा के रोगियों के लिये हानिकारक:
 जिसे भी सांस का रोग हो, उसे एस्‍पिरिन नहीं लेनी चाहिये क्‍योंकि ये फेफड़ों में ऐठन पैदा कर देती है।
एलर्जी पैदा करती है: 
कुछ लोगों को कई चीजों से एलर्जी होती है। एस्‍पिरीन से भी कई लोगों को एलर्जी हो जाती है।
बच्‍चों के लिये ठीक नहीं :
जो बच्‍चे 16 साल की उम्र के नीचे हैं उन्‍हें यह नहीं खिलानी चाहिये। इसे देने से लीवर और दिमाग में सूजन पैदा हो सकती है, जो कि बहुत खतरनाक होती है।
आमाशय में रक्तस्राव :
खराब प्रभाव इसके लगातार सेवन से अंदरूनी ब्‍लीडिंग शुरु हो जाती है। क्‍योंकि यह खून को बहुत पतला कर देता है तो जिसे ब्‍लड क्‍लाटिंग की समस्‍या है उन्‍हें यह नहीं खाना चाहिये।



14.6.17

पेरासीटामोल टैबलेट का उपयोग और साइड इफेक्ट



सामान्यतः दर्द निवारक रूप में पेरासीटामोल दवा का उपयोग किया जाता हैजोकि सीमित रूप से दर्द को कम करने में सक्रिय भूमिका निभाता है। यह केलपोल,क्रोसीन नाम से भी जानी जाती है| यह मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी में प्रोस्टाग्लैंडीन के उत्पादन को कम करके काम करता है। चोट और कुछ बीमारियों के फलस्वरूप शरीर द्वारा प्रोस्टैग्लैंडिंस का उत्पादन होता है, जोकि तंत्रिका को संवेदित करता है, जिसके कारण दर्द का एहसास होता है। प्रोस्टाग्लैंडीन इन संवेदीकरण के उत्पादन को कम करता है और पेरासिटामोल बुखार को कम कर देता है जिससे मस्तिष्क के उस क्षेत्र को प्रभावित किया जा सकता है जो हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करता है।
यह एनलजेसिक और एन्टिपाईरेटिक ड्रग है। एनलजेसिक दर्द निवारक दवाओं के लिए उपयोग किया जाता है और एन्टिपाईरेटिक से संबंध उन दवाओं से है, जो बुखार के कारण शारीरिक तापमान को नियंत्रित करने में सहायता प्रदान करते है।
चिकित्सा संबंधी उपयोग
शरीर में होने वाले दर्द
कान दर्द
जुकाम-बुखार व फ्लू
जोड़ो का दर्द
मासिक चक्र के दौरान होने वाले दर्द
टीकाकरण के दौरान होने वाले बुखार व दर्द के निवारण हेतु इसका इस्तेमाल किया जाता है।
दांतो का दर्द,
सिरदर्द (माइग्रेन सहित)
 

प्रयोग विधि व मात्रा
कालपोल के सेवन के प्रयोग करने से पहले, अपने चिकित्सक से अवश्य इसका परामर्श प्राप्त करे व उनको अपनी वर्तमान दवाओं, अनिर्देशित उत्पादों (जैसे: विटामिन, हर्बल सप्लीमेंट आदि), एलर्जी, पहले से मौजूद बीमारियों और वर्तमान स्वास्थ्य स्थितियों (जैसे: गर्भावस्था, आगामी सर्जरी आदि) के बारे में जानकारी प्रदान करें। कुछ स्वास्थ्य सम्बन्धी परिस्थितियां के मौजूद होने के कारण आपको दवा के दुष्प्रभावों का प्रभाव का सामना न करना पड़े इसके लिए अपने चिकित्सक के निर्देशों के अनुसार दवा का सेवन करें या उत्पाद पर प्रिंट किये गए निर्देशों का पालन करें। प्रत्येक दवा की खुराक आपकी वर्तमान स्वास्थ्य स्थिति पर आधारित होती है। यदि आपकी स्थिति में कोई सुधार नहीं होता है या यदि आपकी हालत ज्यादा खराब हो जाती है तो अपने चिकित्सक को बताएं। जिससे आप उचित समय पर इलाज प्राप्त कर सकें व गंभीर परिणामों से बच सके।
व्यस्क इसका सेवन 500 MG-1 GM तक 4-6 घंटे के समय अंतराल पर कर सकते है।
बच्चों के वजन अनुसार उन्हें दवा की खुराक दी जाती है।
सेवन की गई दवा की एक से दूसरी खुराक के दौरान कम से कम 4 घंटे का अंतराल अवश्य होना चाहिए।
दुष्प्रभाव
पेरासिटामोल के अत्यधिक सेवन के दुष्परिणाम हो सकते हैं अत: इसका अत्यधिक सेवन अनेक गंभीर समस्याओ का कारण बन सकता है।
लिवर सम्बन्धी समस्या
मस्तिष्क सम्बन्धी विकार
त्वचा की समस्या जैसे त्वचा का लाल पड़ना
एलर्जी
श्वसन सम्बन्धी समस्या जैसे सांसो की कमी
सूजन विशेष रूप से चेहरे पर
मितली का होना
गुर्दे की समस्या
जो व्यक्ति मादक पदार्थों का सेवन करते है उन्हें विशेष रूप से इस बात की सावधानी रखनी चाहिए की इसकी अत्यधिक मात्रा उनके लिए गंभीर समस्या का कारण बन सकती है, ऐसे व्यक्तियों को 2 gm से अधिक सेवन से बचना चाहिए ।

3.6.17

जटामांसी के गुण उपयोग फायदे



   यह हिमालय प्रदेश के 10 हजार से 18 हजार फीट की ऊँचाई तक भूटान में पाई जाती हे। इसका क्षुप बहुर्षाय होता है। इसकी जड़ कठिन तथा अनेक शाखाओ से युक्त होती हे तथा ये 6-7 अंगुल तक लम्बे सघन रोमो से आवृत रहती है। जो जटा रूप धारण कर लेती है। जड़ के अंतिम भाग में दो से सात-आठ की संख्या में पत्र होते है जो 6 से 7 इंच तक लम्बे होते है , मध्य में 1 इंच मोटा होता है । जड़ की और अत्यंत संकुचित होती है। काण्डपत्र 1 से 4 इंच तक लम्बे होते हे।
डण्डियो के अंत में सफेद या कुछ गुलाबी रंग के छोटे छोटे फूलो के गुच्छे लगते हे । फल छोटे , गोल , सफेद एवम् रोयेदार होते हे। इसका भौमिक तना तथा मूल जो की रोमो से आवृत होता है एवम् शुष्क होने से गहरे धूसर रंग के या रक्ताभ भूरे रंग के हो जाते है और ये विशिष्ट सुगन्ध वाले होते हे। इनका उपयोग तेलो को सुगन्धित बनाने व रंगने के भी कम में लेते है।
जटामांसी के चमत्कारी लाभ
अनिद्रा : ये धीमे लेकिन प्रभावशाली ढंग से काम करती है। अनिद्रा की समस्या होने पर सोने से एक घंटा पहले एक चम्मच जटामांसी की जड़ का चूर्ण ताजे पानी के साथ लेने से लाभ होता है।
बाल काले और लंबे करना : जटामांसी के काढ़े से अपने बालों की मालिश कर सुबह-सुबह रोज लगायें और 2 घंटे के बाद नहा लें इसे रोज करने से फायदा पहुंचेगा।
सूजन और दर्द : 
अगर आप सूजन और दर्द से परेशान हैं तो जटामांसी चूर्ण का लेप तैयार कर प्रभावित भाग पर लेप करें। ऐसा करने से दर्द और सूजन दोनों से राहत मिलेगी।
बिस्तर पर पेशाब करना :
 जटामांसी और अश्वगंधा को बराबर मात्रा में लेकर पानी में डालकर काफी देर तक उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े को छानकर बच्चे को 3 से 4 दिनों तक पिलाने से बिस्तर में पेशाब करने का रोग समाप्त हो जाता है।
बेहोशी : 
जटामांसी को पीसकर आंखों पर लेप की तरह लगाने से बेहोशी दूर हो जाती है।
दांतों का दर्द : 
यदि कोई व्यक्ति दांतों के दर्द से परेशान है तो, जटामांसी की जड़ का चूर्ण बनाकर मंजन करें। ऐसा करने से दांत के दर्द के साथ- साथ मसूढ़ों के दर्द, सूजन, दांतों से खून, मुंह से बदबू जैसी समस्याएं भी दूर हो जाती हैं।
पेट में दर्द : 
जटामांसी और मिश्री एक समान मात्रा में लेकर उसका एक चौथाई भाग सौंफ, सौंठ और दालचीनी मिलाकर चूर्ण बनाएं और दिन में दो बार 4 से 5 ग्राम की मात्रा में रोजाना सेवन करें। ऐसा करने से पेट के दर्द में आराम मिलता है।
निद्राचारित या नींद में चलना :
 लगभग 600 मिलीग्राम से 1.2 ग्राम जटामांसी का सेवन सुबह और शाम को सेवन करने से इस रोग में बहुत लाभ मिलता है।
तेज दिमाग :
 जटामांसी दिमाग के लिए एक रामबाण औषधि है, यह धीमे लेकिन प्रभावशाली ढंग से काम करती है। इसके अलावा यह याददाश्त को तेज करने की भी अचूक दवा है। एक चम्मच जटामांसी को एक कप दूध में मिलाकर पीने से दिमाग तेज होता है।
रक्तचाप : 
जटामांसी औषधीय गुणों से भरी जड़ीबूटी है। एक चम्मच जटामांसी में शहद मिलाकर इसका सेवन करने से ब्लडप्रेशर को ठीक करके सामान्य स्तर पर लाया जा सकता है।
 
हिस्टीरिया : 
जटामांसी चूर्ण को वाच चूर्ण और काले नमक के साथ मिलाकर दिन में तीन बार नियमित सेवन करने से हिस्टीरिया, मिर्गी, पागलपन जैसी बीमारियों से राहत मिलती है।
रक्तपित्त : 
जटामांसी का चूर्ण 600 मिलीग्राम से 1.20 ग्राम नौसादर के साथ सुबह-शाम खाने से रक्तपित्त और खून की उल्टी ठीक होती है।
ज्यादा पसीना आना : 
जटामांसी के बारीक चूर्ण से मालिश करने से ज्यादा पसीना आना कम हो जाता है।
बवासीर : 
जटामांसी और हल्दी समान मात्रा में पीसकर प्रभावित हिस्से यानि मस्सों पर लेप करने से बवासीर की बीमारी खत्म हो जाती है। इसके अलावा जटामांसी का तेल मस्सों पर लगाने से मस्से सूख जाते हैं।
मासिक धर्म में विकार :
 20 ग्राम जटामांसी, 10 ग्राम जीरा और 5 ग्राम कालीमिर्च मिलाकर चूर्ण बनाएं। एक- एक चम्मच की मात्रा में दिन में तीन बार सेवन करें। इससे मासिक धर्म के दौरान दर्द में आराम मिलता है।
शरीर कांपना : यदि किसी व्यक्ति के हाथ- पैर या शरीर कांपता है तो उसे जटामांसी का काढ़ा बनाकर रोजाना सुबह शाम सेवन करना चाहिए या फिर जटामांसी के चूर्ण का दिन में तीन बार सेवन करना चाहिए। इससे शरीर कंपन की समस्या दूर हो जाती है।
मुंह के छाले : 
जटामांसी के टुकड़े मुंह में रखकर चूसते रहने से मुंह की जलन एवं पीड़ा कम होती है।
नपुंसकता : यदि कोई यक्ति नपुंसकता की गंभीर समस्या से परेशान है तो जटामांसी, जायफल, सोंठ और लौंग को समान मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण का रोजाना दिन में तीन बार सेवन करने से नपुंसकता से छुटकारा मिलता है।
चेहरा साफ करना : 
जटामांसी की जड़ को गुलाबजल में पीसकर चेहरे पर लेप की तरह लगायें। इससे कुछ दिनों में ही चेहरा खिल उठेगा।
सिर दर्द : 
अक्सर तनाव और थकान के कारण सिर दर्द की परेशानी हो जाती है। इससे छुटकारा पाने के लिए जटामांसी, तगर, देवदारू, सोंठ, कूठ आदि को समान मात्रा में पीसकर देशी घी में मिलाकर सिर पर लेप करें, सिर दर्द में लाभ होगा।
 सावधानियाँ
गुर्दों को हानि : 
जटामांसी का ज्यादा उपयोग करने से गुर्दों को हानि पहुंच सकती है और पेट में कभी भी दर्द शुरू हो सकता है।
दस्त : 
जटामांसी का जरुरत से ज्यादा इस्तेमाल करने से बचें नहीं तो उल्टी, दस्त जैसी बीमारियां आपको परेशान कर सकती हैं।
एलर्जी : 
जटामांसी के अत्यधिक उपयोग से एलर्जी हो सकती है। यदि आपकी त्वचा संवेदनशील है तो जटामांसी का इस्तेमाल करने से पहले डॉक्टर की सलाह जरूर लें|

30.5.17

होम्योपैथी मे है नपुंसकता की कारगर चिकित्सा



   इस रोग में व्यक्ति को भोगेच्छा होती ही नहीं है और यदि भोगेच्छ होती भी है तो उसमें इतनी शक्ति नहीं रहती कि वह स्त्री के साथ भोग् कर सके । पूर्व में अत्यधिक भोग करना, पौष्टिक पदार्थों का अभाव, काम क्रिया से घृणा आदि कारणों से यह रोग होता है । बहुत से लोग शीघ्रपतन और नपुंसकता को एक ही समझ लेते हैं जो कि गलत है- दोनों ही अलग-अलग होते हैं । इसी प्रकार बहुत से लोग यह समझ लेते हैं कि किसी पुरुष में सन्तान पैदा करने की क्षमता न होने को नपुंसकता कहते हैं- यह विचार भी गलत है क्योंकि सन्तान पैदा कर सकने की क्षमता न होने को बाँझपन कहा जाता है । वास्तव में, नपुसंकता से तात्पर्य भोग की इच्छा या भोग की शक्ति (लिंग में कड़ापन) के अभाव से है । नपुंसकता को नामर्दी भी कहा जाता है ।
नपुंसकता की अमोघ औषधि – डामियाना, एसिड फॉस, अश्वगंधा, एवेना सैटाइवा, स्टेफिसेग्रिया- इन पाँचों दवाओं के मूल अर्क (मदर टिंक्चर) की दो-दो ड्राम की मात्रा में लेकर अच्छी तरह मिला लें और इस सारे मिश्रण को किसी काँच की शीशी में भरकर रख लें । इस मिश्रण में से पाँच-पाँच बूंदें आधा कप पानी में मिलाकर लें । इस प्रकार प्रतिदिन तीन बार लेने से कुछ ही दिनों में सैक्स संबंधी सभी प्रकार की कमजोरी निश्चित ही समाप्त हो जाती है और रोगी को बहुत लाभ होता है। इन पाँचों दवाओं का वर्णन इस प्रकार है ।
 
डामियाना – इसे टर्नेरा एफ्रोडिसियाका भी कहते हैं । इसका प्रयोग ही शुक्र-क्षय के कारण होने वाली बीमारियों में होता है। यह दवा लिंग में कड़ापन न होना, पुरुषत्व शक्ति का घट जाना, अत्यधिक मैथुन या इन्द्रिय-दोष आदि पर काम करती है ।
सेलेनियम 6, 30 – वीर्य पतला पड़ जाये, आँखें धैस जायें, रोगी क्रमशः कमजोर होता जाये, लिंग में कड़ापन न आये, अनैच्छिक रूप से भी वीर्यपात हो जाता हो- इन सभी लक्षणों वाली नपुंसकता में दें ।
सैबाल सेरुलेटा Q – प्रतिदिन पाँच से दस बूंदों को पानी में मिलाकर लेना ही पर्याप्त हैं । इस दवा से शक्ति का अभाव दूर होता है । इस दवा का सेवन करते समय रोगी को ब्रह्मचर्य से रहना चाहिये और भोग नहीं करना चाहिये । वास्तव में, इस दवा का सेवन प्रारंभ करते ही शक्ति महसूस होगी, यदि उसी समय भोग किया गया तो शक्ति नष्ट हो जायेगी । अतः कुछ दिनों तक भोग से दूर रहते हुये इस दवा का सेवन करें ।
एनाकार्डियम 30, 200 – हस्तमैथुन या वेश्याभोग के कारण जो व्यक्ति स्वयं की अयोग्य मान लेते हैं और इसी कारण स्त्री से दूर रहते हैं उन्हें इस दवा का सेवन कुछ दिनों तक लगातार करना चाहिये और सेवन के समय भोग से दूर रहना चाहिये ।
एसिड फॉस – इस दवा का प्रयोग धातु-दौर्बल्य तथा वीर्यक्षयजनित बीमारियों में होता है । जो व्यक्ति हस्तमैथुन या अत्यधिक इन्द्रियचालन करते हैं तथा जिन्हें स्वप्नदोष आदि होने लगता है उनके लिये यह लाभप्रद है ।
लाइकोपोडियम
1M – डॉ० नैश के अनुसार यह नपुंसकता की बहुत कारगर दवा है । अत्यधिक मैथुन, हस्तमैथुन, वृद्धावस्था आदि के कारण आई हुई नपुंसकता में यह दवा लाभप्रद है । नपुंसकता की इससे बढ़कर अन्य दवा नहीं है । यह दीर्घ क्रिया करने वाली औषधि है अतः इसकी उच्वशक्ति की एक मात्रा देकर परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिये । इसे बार-बार या जल्दी-जल्दी दोहराना नहीं चाहिये अन्यथा दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं ।
अश्वगन्धा – जिस प्रकार आयुर्वेद चिकित्सा-पद्धति में इसकी जड़ के रस का बड़े ही आदर से मदीना कमजोरी हेतु प्रयोग करते हैं उसी प्रकार होमियोपैथी में भी अश्वगन्धा मूल अर्क का मर्दाना कमजोरी में प्रयोग होता है । इसके प्रयोग से शक्ति प्राप्त होती हैं ।
स्टेफिसेग्रिया – इस दवा की क्रिया प्रमुख रूप से मस्तिष्क एवं जननेन्द्रिय पर होती है। जो युवक हमेशा एकान्त पाकर काम इच्छाओं की पूर्ति (हस्तमैथुन) करते हैं व जिसकी वजह से उनके मस्तिष्क में दुर्बलता आ जाती है- उनके लिये उत्तम है । इसके सेवन से कई प्रकार के गुप्त रोगों में भी यथोचित परिणाम मिलते हैं ।
एवेना सैटाइवा – यह मूलतः ओट या जाई (जो निम्न किस्म की एक घास होती है और जिसे निर्धन वर्ग के लोग खाते हैं) है परन्तु यह एक शक्तिवर्द्धक टॉनिक भी है । किसी भी प्रकार के शारीरिक क्षय, कमजोरी आदि में इसका मूल अर्क प्रयोग होता है । अनजाने में वीर्य निकल जाना, रति-शक्ति का घट जाना, वीर्यक्षय के कारण कमजोरी आदि स्थितियों में यह दवा बहुत अच्छा काम करती है।

29.5.17

होम्योपैथिक औषधि बेलाडोना ( Belladonna ) का गुण लक्षण उपयोग


होम्योपैथिक औषधि बेलाडोना ( Belladonna ) का गुण लक्षण उपयोग बेलाडोना होम्योपैथी की एक औषधि है। जो कई तरह के कष्टदायी रोगों को ठीक करती है। बेलाडोना के इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सबसे पहले जानते हैं बेलाडोना क्या है। बेलाडोना को कई वनस्पतियों के जरिए तैयार किया जाता है। इसे सोलेनम मैनियेकम आदि के नाम से भी जाना जाता है। बेलाडोना का पौधा यूरोपीय देशों में उगता है। लेकिन इसकी औषधि आपको किसी भी होम्योपैथी की दुकान में आसानी से मिल सकती है
लक्षण 
(1) शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन 
(2) रक्त-संचय की अधिकता तथा सिर दर्द, प्रलाप, पागलपन 
(3) दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है। 
(4) रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना 
5) प्रकाश, शोर, स्पर्श सहन न कर सकना
 (6) मूत्राशय की उत्तेजितावस्था 
7) असहिष्णु-जरायु से रक्तस्राव
 (8) हिलने-डुलने, शीत, स्पर्शादि से रोग-वृद्धि 
(9) दाईं तरफ प्रभाव करनेवाली औषधि है। 
(10) दोपहर 3 बजे से रात तक रोग-वृद्धि लक्षणों में कमी 
(i) हल्का ओढ़ना पसन्द करना 
(ii) बिस्तर में विश्राम पसन्द 
(iii) गर्म घर में सोना पसन्द लक्षणों में वृद्धि
 (i) छूने से, गंध से, शब्द से
 (ii) वायु की झोंकें से वृद्धि
(iii) हिलने-डोलने से वृद्धि 
(iv) दिन के 3 बजे से रात तक वृद्धि 
(v) सूर्य की गर्मी से रोग-वृद्धि
 (vi) बाल कटवाने से रोग-वृद्धि *शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन –
 बेलाडोना के शोथ में उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन इसके विशिष्ट लक्षण है। इन तीनों की स्थिति निम्न है: भयंकर उत्ताप – फेफड़े, मस्तिष्क, जिगर, अंतड़ियों अथवा किसी अन्य अंग में शोथ हो तो भयंकर उत्ताप मौजूद होता है। इस रोगी की त्वचा पर हाथ रखा जाय, तो एकदम हटा लेना पड़ता है क्योंकि त्वचा में भयंकर गर्मी होती है। इतनी भयंकर गर्मी के हाथ हटा लेने के बाद भी कुछ समय तक गर्मी की याद बनी रहती है। रोगी के किसी अंग में भी शोथ क्यों न हो, उसे छूने से भयंकर उत्ताप का अनुभव होता है। 
*टाइफॉयड के उत्ताप में बेलाडोना न दे – 
टाइफॉयड में अगर इस प्रकार का उत्ताप मौजूद भी हो, तो भी उसमें बेलाडोना कभी नहीं देना चाहिये। इसका कारण यह है कि औषधि की गति तथा रोग की गति में सम-रसता होना आवश्यक है। बेलाडोना की शिकायतें यकायक, एकदम, बड़े वेग से आती हैं और यकायक ही चली भी जाती हैं। टाइफॉयड यकायक नहीं आता, धीरे-धीरे आता है और धीरे-धीरे जाता है। बेलाडोना की गति और टाइफॉयड की गति में सम-रसता नहीं है, इसलिये इसमें बेलाडोना देने से रोग बढ़ सकता है, घट नहीं सकता। बेलाडोना उसी ज्वर में देना उचित है जिसमें ज्वर यकायक आये, धीमी गति से न आये। बेलाडोना में ताप होता है, बेहद ताप, भयंकर ताप। 
*रक्तिमा – 
बेलाडोना के शोथ में दूसरा मुख्य-लक्षण रक्तिमा है। अंग के जिस स्थान पर शोथ हुआ है, वह बेहद लाल दिखाई देता है। लालिमा के बाद इसका रंग हल्का पड़ सकता है, कुछ काला पड़ सकता है, ऐसा भी हो सकता है कि विशेष रूप से पहचाना न जाय परन्तु शुरू में चमकीला लाल होता है। शरीर की गांठों में शोथ होगी तो वह भी लाल रंग की, गला पकेगा तो लाल रंग जैसा, ऐसा जैसे अंगारा हो, फिर उसका रंग फीका पड़ सकता है, परन्तु शुरू में देखते ही लाल रंग होता है।
 *बेहद जलन – 
बेलाडोना के शोथ में तीसरा मुख्य-लक्षण बेहद जलन है। शोथ में, ज्वर में, रक्त-संचय में, टांसिल में बेहद जलन होती है। इतना ही नहीं कि यह जलन हाथ से छूने से अनुभव की जाय, रोगी को अपने आप भी जलन महसूस होती है। उदरशोथ (Gastritis) में पेट में जलन होती है। इस प्रकार उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन-ये तीनों बेलाडोना औषधि में मुख्य स्थान रखते हैं। 
*आंख दुखना जिसमें उत्ताप, रतिमा और जलन हो – 
आंख में गर्मी, रक्तिमा और जलन जो बेलाडोना के लक्षण हैं, उनके मौजूद होने पर यह इसे ठीक कर देता है। आँख से पानी आना, रोशनी में आंख न खोल सकना, आंख में गर्मी लाली और जलन के बाद कभी-कभी आख में ‘टीर’ (Squint) रह जाता है। उसे बेलाडोना औषधि ठीक कर देती है।
 *उत्ताप, रक्तिमा, तथा जलन के लक्षणों में सूजन, आंख दुखना, डिसेन्ट्री, बवासीर तथा गठिया के रोग – 
यह हम कह चुके हैं कि बेलाडोना में तीन लक्षण आधारभूत हैं उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन। इन तीन को ध्यान में रखते हुए यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि शोथ, आँख दुखना, डिसेन्ट्री तथा बवासीर में इसकी कितनी उपयोगिता है। इनके अलावा जहां भी ये तीन लक्षण हों, वही बेलाडोना उपयोगी है। 
*सूजन जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
अगर किसी अंग में सूजन हो जाय, सूजन के स्थान को छुआ तक न जा सके – स्मरण रहे कि स्पर्श के लिये असहिष्णुता बेलाडोना औषधि का चरित्रगत-लक्षण है –
 दर्द हो, ऐसा अनुभव हो कि सूजन का स्थान फूट पड़ेगा, इसके साथ उस स्थान में गर्मी, लाली और जलन हो, तो बेलाडोना औषधि है, सूजन के विषय में स्मरण रखना चाहिये कि अगर सूजन के बाद सूजन पकने लगे तब बेलाडोना लाभ नहीं कर सकता, पकने से पहले की अवस्था तक ही इसकी सीमा है। 
*डिसेन्ट्री जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
रोगी बार-बार जोर लगाता है, मुँह तपने लगता है, चेहरा लाल हो जाता है, सिर और चेहरे पर जलन शुरू हो जाती है, हाथ-पैर ठन्डे और सिर गर्म, बहुत जोर लगाने पर भी बहुत थोड़ा मल – ऐसी डिसेन्ट्री में बेलाडोना लाभप्रद है। 
*बवासीर जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो –
 ऐसी बवासीर जिसमें सख्त दर्द हो, मस्से बेहद लाल हों, सूज रहे हों, छुए न जा सकें, जलन हो, रोगी टांगें पसार कर ही लेट सके – ऐसी बवासीर में बेलाडोना लाभ करेगा। 
 
*गठिया जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
गठिये में जब सब या कुछ जोड़ सूज जाते हैं, तब इन जोड़ों में उत्ताप, लाली और जलन होती है। ऐसी गठिये में उत्ताप, रक्तिमा और जलन मौजूद रहते हैं। इसके साथ रोगी स्वयं ‘असहिष्णु’ (Sensitive) होता है और जोड़ों को किसी को छूने नहीं देता। जरा-सा छू जाने से उसे दर्द होता है। वह बिस्तर पर बिना हिले-जुले पड़ा रहना चाहता है। जोड़ों में दर्द के साथ तेज बुखार में वह शान्त पड़ा रहता है। बेलाडोना का रोगी शीत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, कपड़े से लिपटा रहता है, हवा के झोंके से परेशान हो जाता है, गर्मी से उसे राहत मिलती है। 
*रक्त-संचय की अधिकता तथा सिद-दर्द – 
अभी हमने उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन का उल्लेख किया। उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन क्यो होते हैं? इसका कारण रुधिर का किसी जगह एकत्रित हो जाना है। बेलाडोना इस प्रकार रुधिर के किसी अंग-विशेष में संचित हो जाने पर औषधियों का राजा है। यह रक्त-संचय कहीं भी हो सकता है – सिर में, छाती में, जरायु में, जोड़ों में, त्वचा पर-शरीर के किसी भी अंग पर यह संचय हो सकता है। इस प्रकार के रुधिर-संचय में विशेष लक्षण यह है कि यह बड़े वेग से आता है और एकदम आता है। हम अभी देखेंगे कि लक्षणों का वेग से आना और एकदम जाना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। बेलाडोना के रोग वेग से आते हैं और एकदम जाते हैं, इसके रोगों की गतियां मन्द वेग से नहीं चलती। बिजली के से वेग से आना बेलाडोना की विशेषता है। बच्चा जब सोया था तब बिल्कुल ठीक था, परन्तु मध्य-रात्रि में ही एकदम उसे दौरा पड़ गया, हाथ्र-पैर ऐंठने लगे, पेट में दर्द उठ खड़ा हुआ – ये सब एकदम और वेग से आने वाले रक्त-संचय के लक्षण बेलाडोना औषधि के हैं। इन्हीं लक्षणों के कारण हाई-ब्लड प्रेशर की भी यह उत्कृष्ट दवा है। 
*रक्त-संचय से सिरदर्द – 
रक्त की गति जब सिर की तरफ़ चली जाती है तब सिर दर्द होने लगता है। बेलाडोना में भयंकर सिर-दर्द होता है। ऐसा दर्द मानो सिर में कुछ छुरे चल रहे हों। बेलाडोना का रोगी हरकत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, स्पर्श को सहन नहीं कर सकता, रोशनी और हवा को भी नहीं सह सकता। बच्चा बिस्तर पर पड़ा सिर-दर्द से चीखता है, तकिये पर सिर इधर-उधर पटकता है यद्यपि सिर का हिलना सिर-दर्द को और बढ़ाता है। यह सिर-दर्द सिर में रक्त-संचय के कारण होता है। जब ज्वर तेज हो तब ऐसा सिर-दर्द हुआ करता है। रोगी अनुभव करता है कि रुधिर सिर की तरफ दौड़ रहा है। बेलाडोना के सिर दर्द में सिर गरम होता है और हाथ-पैर ठंडे होते हैं, आंखें लाल, कनपटियों की रंगों में टपकन होती है, लेटने से सिर-दर्द बढ़ता है, रोगी पगड़ी से या किसी चीज से सिर को कस कर बांधता है, तब उसे आराम मालूम देता है। 
*रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना –
 बेलाडोना के इन दो लक्षणों को भूला नहीं जा सकता। रोग बड़े वेग से, प्रचंड रूप में आक्रमण करता है, और यह आक्रमण यकायक होता है। 
‘प्रचंडता’ और ‘एकाएकपना’ इस औषधि के मूल में पाया जाता है। किसी प्रकार का दर्द हो, प्रचंड सिर-दर्द, धमनियों का प्रचंड-स्पन्दन, प्रचंड-डिलीरियम, प्रचंड-पागलपन, प्रचंड-ऐंठन। रोग की प्रचंडता और एकाएकपने में एकोनाइट तथा बेलाडोना का सादृश्य है, इसलिये इनकी तुलना कर लेना आवश्यक है। 
*रक्त के सिर की तरफ़ दौर से प्रलाप – 
बेलाडोना में रक्त का सिर की तरफ दौर इतना जबर्दस्त होता है कि रोगी की प्रबल प्रलाप तथा बेहोशी की-सी अवस्था हो जाती है। यद्यपि उसे नींद आ रही होती है तो भी वह सो नहीं सकता। वह सिर को तकिये पर इधर-उधर डोलता रहता है। कभी-कभी वह प्रगाढ़ निद्रा में जा पहुंचता है जिसमें उसे घबराहट भरे स्वप्न आते हैं। वह देखता है हत्याएं, डाकू, आगजनी। वह प्रलाप भी करने लगता है – उसे भूत-प्रेत, राक्षस, काले कुत्ते, भिन्न-भिन्न प्रकार के कीड़े-मकौड़े दिखाई देने लगते हैं। यह सब रक्त का सिर की तरफ दौर होने का परिणाम है। 
*पागलपन – 
जब रक्त का सिर की तरफ दौर बहुत अधिक हो जाता है, तब बेलाडोना में पागलपन की अवस्था आ जाती है। वह अपना भोजन मंगवाता है, परन्तु खाने के बजाय चम्मच को काटने लगता है, तश्तरी को चबाता है, कुत्ते की तरह नाक चढ़ाता और भौंकता है। वह अपना गला घोंटने का प्रयत्न करता है, और दूसरों को कहता है कि वे उसकी हत्या कर दें। हाय-हाय करना – इस औषधि की विशेषता है। ठीक हालत में हो या न हो, वह हाय-हाय किये जाती है। जल्द-जल्द कुछ बड़बड़ाता जाता है जिसका कुछ अर्थ नहीं होता। उसे ऐसे काल्पनिक भयंकर दृश्य दिखाई देते हैं जिनसे जान बचाने के लिये वह भाग या छिप जाना चाहता है। उसका पागलपन उत्कट उन्माद का रूप धारण कर लेता है जिसमें वह तोड़-फोड़, मार-काट, गाली-गलौज करता है। दूसरों पर थूकता है, दांत पीसता, किटकिटाता है। डॉ० नैश ने पागलपन की तीन दवाओं पर विशेष बल दिया है – बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम। इनकी तुलना निम्न प्रकार है।
 *पागलपन में बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम की तुलना – 
इन तीनों को मस्तिष्क के रोगों की औषधि कहा जा सकता है। बेलाडोना में उन्माद की प्रचंडता प्रधान है, हायोसाइमस में प्रचंडता नहीं होती, निरर्थक गुनगुनाना प्रधान होता है, प्रचंडता तो कभी-कभी ही आती है। बेलाडोना का चेहरा लाल, हायोसाइमस का चेहरा पीला और बैठा हुआ होता है। हायोसाइमस कमजोर होता है, और कमजोरी बढ़ती जाती है। इस कमजोरी के कारण उसके उन्माद में प्रचंडता देर तक नहीं रह सकती। हायोसाइमस की शुरूआत प्रचंडता से हो सकती है परन्तु कमजोरी बढ़ने के साथ वह हटती जाती है। स्ट्रैमोनियम में उन्माद की प्रचंडता पहली दोनों औषधियों से अधिक है। वह चिल्ला-चिल्लाकर गाता, ठहाके मारकर हँसता, चिल्लाता, प्रार्थना करने लगता, गालियां बकने लगता-बड़ा बकवादी हो जाता है। उन्माद की प्रचंडता में स्ट्रैमोनियम तीनों से अधिक, फिर बेलाडोना, और सब से कम हायोसाइमस है। प्रचंडता के अतिरिक्त अन्य लक्षणों को भी निर्वाचन के समय ध्यान में रखना चाहिये। उदाहरणार्थ, बेलाडोना प्रकाश को सहन नहीं कर सकता, स्ट्रैमोनियम अन्धेरे को नहीं सहन कर सकता। बेलाडोना अन्धेरा चाहता है, स्ट्रैमोनियम प्रकाश। *दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है – लक्षणों का बड़े वेग से आना, और एकदम आना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। इसी लक्षण का रूप तब स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते हैं कि कोई भी दर्द एकदम आये और एकदम ही चला जाये, तो वह बेलाडोना से ठीक हो जाता है। सर्दी लगी, एकदम दर्द शुरू हुआ, बीमारी ने अपना जितना समय लगाना था लगाया, और दर्द जैसे एकदम आया था वैसे एकदम शान्त हो गया। कभी-कभी यह दर्द कुछ मिनट रहकर ही चला जाता है। स्ट्रैमोनियम में दर्द मीठा-मीठा शुरू होता है, धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, उच्च-शिखर पर जाकर फिर धीरे-धीरे शान्त होता है। मैग्नेशिया फॉस का सिर-दर्द एकाएक आता है, चिरकाल तक बना रहता है और एकाएक ही जाता है। सल्फ्यूरिक ऐसिड में धीरे-धीरे शुरू होता है, पर एकदम जाता है।
 बेलाडोना और एकोनाइट की तुलना – 
ये दोनों औषधियों हृष्ट-पुष्ट शरीर के लोगों के लिये उपयोगी हैं। हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ बच्चा या एक तगड़ा नौजवान यह समझ कर कि उसे सर्दी क्या कर लेगी, ठंड में कम कपड़े पहन कर निकलता है और रात में ही या सवेरे तक शीत के किसी रोग से आक्रान्त हो जाता है। रोग का आक्रमण एकदम होता है और जोर से होता है। दोनों इस बात में समान हैं, परन्तु बेलाडोना में मस्तिष्क में तूफ़ान उठता है, बुखार के साथ असह्य सिर-दर्द हो जाता है, एकोनाइट में रुधिर की गति में तूफान उठता है, छाती या हृदय में दर्द हो जाता है, न्यूमोनिया, खांसी, जुकाम हो जाता है। 
*मूत्राशय की उत्तेजितावस्था – 
बेलाडोना के अतिरिक्त दूसरी कोई औषधि ऐसी नहीं है जो मूत्राशय तथा मूत्र-नाली की उत्तेजितावस्था को शान्त कर सके। पेशाब करने की इच्छा लगातार बनी रहती है। इस औषधि में स्पर्शादि को सहन न कर सकने का जो लक्षण है, उसी का यह परिणाम है। पेशाब बूंद-बूंद कर टपकता है और सारी मूत्र-नाली में दाह उत्पन्न करता है। सारा मूत्र-संस्थान उत्तेजित अवस्था में पाया जाता है। मूत्राशय में शोथ होती है। मूत्राशय में रक्त-संचय और उसके उत्तेजितावस्था होने के कारण उस स्थान को छुआ तक नहीं जा सकता। मानसिक अवस्था भी चिड़चिड़ी हो जाती है। यह अवस्था मूत्राशय में मरोड़ पड़ने की-सी है। मूत्र में रुधिर आता है, कभी-कभी शुद्ध खून। ऐसी अवस्था में पायी जाती है कि मूत्राशय भरा हुआ है परन्तु मूत्र नहीं निकल रहा। शिकायत का केन्द्र स्थूल मूत्राशय की ग्रीवा है जहां मूत्राशय में थोड़ा-सा भी मूत्र इकट्ठा होने पर पेशाब जाने की हाजत होती है, परन्तु दर्द होता है मूत्र नहीं निकलता। 
* प्रकाश, शोर, स्पर्श आदि सहन नहीं कर सकता –
 इस रोगी की पांचों इन्द्रियों में अत्यन्त अनुभूति उत्पन्न हो जाती है। रोगी आंखों से रोशनी, कानों से शब्द, जीभ से स्वाद, नाक से गंध, त्वचा के स्पर्श की अनुभूति साधारण व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक करने लगता है, वह रोशनी, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि को सहन नहीं कर सकता। उसका स्नायु-मंडल उत्तेजित रहता है। स्नायु-मंडल की उत्तेजना बेलाडोना का मुख्य-लक्षण है। ओपियम इससे ठीक उल्टा है। उसमें ‘सहिष्णुता’ (Sensitivity) रहती ही नहीं। बेलाडोना के रोगी में मस्तिष्क में जितना रुधिर संचित होगा उतनी असहिष्णुता बढ़ जायगी। स्पर्श की असहिष्णुता उसमें इतनी होती है कि सिर के बालों में कघी तक नहीं फेर सकता, सिर के बालों को छूने तक नहीं देता। इस प्रकार की असहिष्णुता अन्य औषधियों में भी पायी जाती है। उदाहरणार्थ, हिपर पर रोगी दर्द को इतना अनुभव करता है कि बेहोश हो जाता है, नाइट्रिक ऐसिड का रोगी सड़क पर चलती गाड़ियों की आवाज को सहन नहीं कर सकता, उससे उसकी तकलीफें बढ़ जाता हैं, कॉफिया का रोगी तीन मंजिल ऊपर के मकान पर भी किसी के चलने की आवाज सुन लेता है तो उससे परेशान हो जाता है यद्यपि अन्य किसी को वह आवाज नहीं सुनाई पड़ती, नक्स वोमिका के रोगी के शरीर की पीड़ा लोगों के पैरों की आहट से बढ़ जाती है। बुखार यदि बुखार की वजह से चेहरा और आंख लाल हो गए हों। तो बेलाडोना का सेवन करने से ठीक हो जाता है। पेट दर्द में यदि पेट में भंयकर दर्द हो रहा हो या पेट फूल गया हो। तो बेलाडोना लेने से आपको राहत मिलेगी। सिर व गर्दन दर्द यदि गर्दन उठाने व झुकाने में दर्द हो रहा हो तो बेलाडोना का सेवन करने से आपकी ये समस्या ठीक हो जाती है। सूखी खांसी सूखी खांसी में यदि खांसते-खांसते एैसा लग रहा हो कि दम निकल रहा है और चेहरा लाल हो गया हो तो आप बेलाडोना का सेवन करें। इससे आपकी सूखी खांसी की समस्या ठीक हो जाएगी। किसी भी तरह का दर्द शरीर में यदि किसी भी तरह का दर्द हो रहा हो और वह शांत न हो रहा हो तो बेलाडोना सेवन करने से दर्द ठीक हो जाता है। जीभ की सूजन जीभ का लाल होना, मसूड़ों में दर्द और जीभ की सूजन होने पर बेलाडोना का सेवन करें। मासिक धर्म महिलाओं को मासिक धर्म में अधिक परेशानी हो रही हो या रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो वे बेलाडोना का सेवन करें। गले की सूजन यदि गले में सूजन हो गई हो या गले में संकुचन हो रहा हो तो बेलाडोना के सेवन से लाभ मिलता है। कमर दर्द और गर्दन की अकड़न में बेलाडोना का सेवन करें।
बेलाडोना होम्योपैथी की एक औषधि है। जो कई तरह के कष्टदायी रोगों को ठीक करती है। बेलाडोना के इस्तेमाल से कई तरह की बीमारियों को ठीक किया जा सकता है। सबसे पहले जानते हैं बेलाडोना क्या है। बेलाडोना को कई वनस्पतियों के जरिए तैयार किया जाता है। इसे सोलेनम मैनियेकम आदि के नाम से भी जाना जाता है। बेलाडोना का पौधा यूरोपीय देशों में उगता है। लेकिन इसकी औषधि आपको किसी भी होम्योपैथी की दुकान में आसानी से मिल सकती हैलक्षण
(1) शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन
(2) रक्त-संचय की अधिकता तथा सिर दर्द, प्रलाप, पागलपन
(3) दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है।
(4) रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना
(5) प्रकाश, शोर, स्पर्श सहन न कर सकना
(6) मूत्राशय की उत्तेजितावस्था
(7) असहिष्णु-जरायु से रक्तस्राव
(8) हिलने-डुलने, शीत, स्पर्शादि से रोग-वृद्धि
(9) दाईं तरफ प्रभाव करनेवाली औषधि है।
(10) दोपहर 3 बजे से रात तक रोग-वृद्धि
लक्षणों में कमी
(i) हल्का ओढ़ना पसन्द करना
(ii) बिस्तर में विश्राम पसन्द
(iii) गर्म घर में सोना पसन्द
लक्षणों में वृद्धि
(i) छूने से, गंध से, शब्द से
(ii) वायु की झोंकें से वृद्धि
(iii) हिलने-डोलने से वृद्धि
(iv) दिन के 3 बजे से रात तक वृद्धि
(v) सूर्य की गर्मी से रोग-वृद्धि
(vi) बाल कटवाने से रोग-वृद्धि
*शोथ तथा ज्वर में भयंकर उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन –
 बेलाडोना के शोथ में उत्ताप, रक्तिमा तथा बेहद जलन इसके विशिष्ट लक्षण है। इन तीनों की स्थिति निम्न है:
भयंकर उत्ताप – फेफड़े, मस्तिष्क, जिगर, अंतड़ियों अथवा किसी अन्य अंग में शोथ हो तो भयंकर उत्ताप मौजूद होता है। इस रोगी की त्वचा पर हाथ रखा जाय, तो एकदम हटा लेना पड़ता है क्योंकि त्वचा में भयंकर गर्मी होती है। इतनी भयंकर गर्मी के हाथ हटा लेने के बाद भी कुछ समय तक गर्मी की याद बनी रहती है। रोगी के किसी अंग में भी शोथ क्यों न हो, उसे छूने से भयंकर उत्ताप का अनुभव होता है।
*टाइफॉयड के उत्ताप में बेलाडोना न दे – 
टाइफॉयड में अगर इस प्रकार का उत्ताप मौजूद भी हो, तो भी उसमें बेलाडोना कभी नहीं देना चाहिये। इसका कारण यह है कि औषधि की गति तथा रोग की गति में सम-रसता होना आवश्यक है। बेलाडोना की शिकायतें यकायक, एकदम, बड़े वेग से आती हैं और यकायक ही चली भी जाती हैं। टाइफॉयड यकायक नहीं आता, धीरे-धीरे आता है और धीरे-धीरे जाता है। बेलाडोना की गति और टाइफॉयड की गति में सम-रसता नहीं है, इसलिये इसमें बेलाडोना देने से रोग बढ़ सकता है, घट नहीं सकता। बेलाडोना उसी ज्वर में देना उचित है जिसमें ज्वर यकायक आये, धीमी गति से न आये। बेलाडोना में ताप होता है, बेहद ताप, भयंकर ताप।
*रक्तिमा – 
बेलाडोना के शोथ में दूसरा मुख्य-लक्षण रक्तिमा है। अंग के जिस स्थान पर शोथ हुआ है, वह बेहद लाल दिखाई देता है। लालिमा के बाद इसका रंग हल्का पड़ सकता है, कुछ काला पड़ सकता है, ऐसा भी हो सकता है कि विशेष रूप से पहचाना न जाय परन्तु शुरू में चमकीला लाल होता है। शरीर की गांठों में शोथ होगी तो वह भी लाल रंग की, गला पकेगा तो लाल रंग जैसा, ऐसा जैसे अंगारा हो, फिर उसका रंग फीका पड़ सकता है, परन्तु शुरू में देखते ही लाल रंग होता है।
*बेहद जलन – बेलाडोना के शोथ में तीसरा मुख्य-लक्षण बेहद जलन है। शोथ में, ज्वर में, रक्त-संचय में, टांसिल में बेहद जलन होती है। इतना ही नहीं कि यह जलन हाथ से छूने से अनुभव की जाय, रोगी को अपने आप भी जलन महसूस होती है। उदरशोथ (Gastritis) में पेट में जलन होती है। इस प्रकार उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन-ये तीनों बेलाडोना औषधि में मुख्य स्थान रखते हैं।
*आंख दुखना जिसमें उत्ताप, रतिमा और जलन हो – 
आंख में गर्मी, रक्तिमा और जलन जो बेलाडोना के लक्षण हैं, उनके मौजूद होने पर यह इसे ठीक कर देता है। आँख से पानी आना, रोशनी में आंख न खोल सकना, आंख में गर्मी लाली और जलन के बाद कभी-कभी आख में ‘टीर’ (Squint) रह जाता है। उसे बेलाडोना औषधि ठीक कर देती है।
*उत्ताप, रक्तिमा, तथा जलन के लक्षणों में सूजन, आंख दुखना, डिसेन्ट्री, बवासीर तथा गठिया के रोग – 
यह हम कह चुके हैं कि बेलाडोना में तीन लक्षण आधारभूत हैं उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन। इन तीन को ध्यान में रखते हुए यह बात आसानी से समझ आ जाती है कि शोथ, आँख दुखना, डिसेन्ट्री तथा बवासीर में इसकी कितनी उपयोगिता है। इनके अलावा जहां भी ये तीन लक्षण हों, वही बेलाडोना उपयोगी है।
*सूजन जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो –
 अगर किसी अंग में सूजन हो जाय, सूजन के स्थान को छुआ तक न जा सके – स्मरण रहे कि स्पर्श के लिये असहिष्णुता बेलाडोना औषधि का चरित्रगत-लक्षण है – दर्द हो, ऐसा अनुभव हो कि सूजन का स्थान फूट पड़ेगा, इसके साथ उस स्थान में गर्मी, लाली और जलन हो, तो बेलाडोना औषधि है, सूजन के विषय में स्मरण रखना चाहिये कि अगर सूजन के बाद सूजन पकने लगे तब बेलाडोना लाभ नहीं कर सकता, पकने से पहले की अवस्था तक ही इसकी सीमा है।
*डिसेन्ट्री जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो –
 रोगी बार-बार जोर लगाता है, मुँह तपने लगता है, चेहरा लाल हो जाता है, सिर और चेहरे पर जलन शुरू हो जाती है, हाथ-पैर ठन्डे और सिर गर्म, बहुत जोर लगाने पर भी बहुत थोड़ा मल – ऐसी डिसेन्ट्री में बेलाडोना लाभप्रद है।
*बवासीर जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
ऐसी बवासीर जिसमें सख्त दर्द हो, मस्से बेहद लाल हों, सूज रहे हों, छुए न जा सकें, जलन हो, रोगी टांगें पसार कर ही लेट सके – ऐसी बवासीर में बेलाडोना लाभ करेगा।
*गठिया जिसमें उत्ताप, रक्तिमा और जलन हो – 
गठिये में जब सब या कुछ जोड़ सूज जाते हैं, तब इन जोड़ों में उत्ताप, लाली और जलन होती है। ऐसी गठिये में उत्ताप, रक्तिमा और जलन मौजूद रहते हैं। इसके साथ रोगी स्वयं ‘असहिष्णु’ (Sensitive) होता है और जोड़ों को किसी को छूने नहीं देता। जरा-सा छू जाने से उसे दर्द होता है। वह बिस्तर पर बिना हिले-जुले पड़ा रहना चाहता है। जोड़ों में दर्द के साथ तेज बुखार में वह शान्त पड़ा रहता है। बेलाडोना का रोगी शीत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, कपड़े से लिपटा रहता है, हवा के झोंके से परेशान हो जाता है, गर्मी से उसे राहत मिलती है।
*रक्त-संचय की अधिकता तथा सिद-दर्द – 
अभी हमने उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन का उल्लेख किया। उत्ताप, रक्तिमा तथा जलन क्यो होते हैं? इसका कारण रुधिर का किसी जगह एकत्रित हो जाना है। बेलाडोना इस प्रकार रुधिर के किसी अंग-विशेष में संचित हो जाने पर औषधियों का राजा है। यह रक्त-संचय कहीं भी हो सकता है – सिर में, छाती में, जरायु में, जोड़ों में, त्वचा पर-शरीर के किसी भी अंग पर यह संचय हो सकता है। इस प्रकार के रुधिर-संचय में विशेष लक्षण यह है कि यह बड़े वेग से आता है और एकदम आता है। हम अभी देखेंगे कि लक्षणों का वेग से आना और एकदम जाना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। बेलाडोना के रोग वेग से आते हैं और एकदम जाते हैं, इसके रोगों की गतियां मन्द वेग से नहीं चलती। बिजली के से वेग से आना बेलाडोना की विशेषता है। बच्चा जब सोया था तब बिल्कुल ठीक था, परन्तु मध्य-रात्रि में ही एकदम उसे दौरा पड़ गया, हाथ्र-पैर ऐंठने लगे, पेट में दर्द उठ खड़ा हुआ – ये सब एकदम और वेग से आने वाले रक्त-संचय के लक्षण बेलाडोना औषधि के हैं। इन्हीं लक्षणों के कारण हाई-ब्लड प्रेशर की भी यह उत्कृष्ट दवा है।
 
*रक्त-संचय से सिरदर्द – 
रक्त की गति जब सिर की तरफ़ चली जाती है तब सिर दर्द होने लगता है। बेलाडोना में भयंकर सिर-दर्द होता है। ऐसा दर्द मानो सिर में कुछ छुरे चल रहे हों। बेलाडोना का रोगी हरकत को बर्दाश्त नहीं कर सकता, स्पर्श को सहन नहीं कर सकता, रोशनी और हवा को भी नहीं सह सकता। बच्चा बिस्तर पर पड़ा सिर-दर्द से चीखता है, तकिये पर सिर इधर-उधर पटकता है यद्यपि सिर का हिलना सिर-दर्द को और बढ़ाता है। यह सिर-दर्द सिर में रक्त-संचय के कारण होता है। जब ज्वर तेज हो तब ऐसा सिर-दर्द हुआ करता है। रोगी अनुभव करता है कि रुधिर सिर की तरफ दौड़ रहा है। बेलाडोना के सिर दर्द में सिर गरम होता है और हाथ-पैर ठंडे होते हैं, आंखें लाल, कनपटियों की रंगों में टपकन होती है, लेटने से सिर-दर्द बढ़ता है, रोगी पगड़ी से या किसी चीज से सिर को कस कर बांधता है, तब उसे आराम मालूम देता है।
*रोग का प्रचंड तथा एकाएक रूप में आना – 
बेलाडोना के इन दो लक्षणों को भूला नहीं जा सकता। रोग बड़े वेग से, प्रचंड रूप में आक्रमण करता है, और यह आक्रमण यकायक होता है। ‘प्रचंडता’ और ‘एकाएकपना’ इस औषधि के मूल में पाया जाता है। किसी प्रकार का दर्द हो, प्रचंड सिर-दर्द, धमनियों का प्रचंड-स्पन्दन, प्रचंड-डिलीरियम, प्रचंड-पागलपन, प्रचंड-ऐंठन। रोग की प्रचंडता और एकाएकपने में एकोनाइट तथा बेलाडोना का सादृश्य है, इसलिये इनकी तुलना कर लेना आवश्यक है।
*रक्त के सिर की तरफ़ दौर से प्रलाप – 
बेलाडोना में रक्त का सिर की तरफ दौर इतना जबर्दस्त होता है कि रोगी की प्रबल प्रलाप तथा बेहोशी की-सी अवस्था हो जाती है। यद्यपि उसे नींद आ रही होती है तो भी वह सो नहीं सकता। वह सिर को तकिये पर इधर-उधर डोलता रहता है। कभी-कभी वह प्रगाढ़ निद्रा में जा पहुंचता है जिसमें उसे घबराहट भरे स्वप्न आते हैं। वह देखता है हत्याएं, डाकू, आगजनी। वह प्रलाप भी करने लगता है – उसे भूत-प्रेत, राक्षस, काले कुत्ते, भिन्न-भिन्न प्रकार के कीड़े-मकौड़े दिखाई देने लगते हैं। यह सब रक्त का सिर की तरफ दौर होने का परिणाम है।
*पागलपन –
 जब रक्त का सिर की तरफ दौर बहुत अधिक हो जाता है, तब बेलाडोना में पागलपन की अवस्था आ जाती है। वह अपना भोजन मंगवाता है, परन्तु खाने के बजाय चम्मच को काटने लगता है, तश्तरी को चबाता है, कुत्ते की तरह नाक चढ़ाता और भौंकता है। वह अपना गला घोंटने का प्रयत्न करता है, और दूसरों को कहता है कि वे उसकी हत्या कर दें। हाय-हाय करना – इस औषधि की विशेषता है। ठीक हालत में हो या न हो, वह हाय-हाय किये जाती है। जल्द-जल्द कुछ बड़बड़ाता जाता है जिसका कुछ अर्थ नहीं होता। उसे ऐसे काल्पनिक भयंकर दृश्य दिखाई देते हैं जिनसे जान बचाने के लिये वह भाग या छिप जाना चाहता है। उसका पागलपन उत्कट उन्माद का रूप धारण कर लेता है जिसमें वह तोड़-फोड़, मार-काट, गाली-गलौज करता है। दूसरों पर थूकता है, दांत पीसता, किटकिटाता है। डॉ० नैश ने पागलपन की तीन दवाओं पर विशेष बल दिया है – बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम। इनकी तुलना निम्न प्रकार है।
*पागलपन में बेलाडोना, हायोसाइमस तथा स्ट्रैमोनियम की तुलना – 
इन तीनों को मस्तिष्क के रोगों की औषधि कहा जा सकता है। बेलाडोना में उन्माद की प्रचंडता प्रधान है, हायोसाइमस में प्रचंडता नहीं होती, निरर्थक गुनगुनाना प्रधान होता है, प्रचंडता तो कभी-कभी ही आती है। बेलाडोना का चेहरा लाल, हायोसाइमस का चेहरा पीला और बैठा हुआ होता है। हायोसाइमस कमजोर होता है, और कमजोरी बढ़ती जाती है। इस कमजोरी के कारण उसके उन्माद में प्रचंडता देर तक नहीं रह सकती। हायोसाइमस की शुरूआत प्रचंडता से हो सकती है परन्तु कमजोरी बढ़ने के साथ वह हटती जाती है। स्ट्रैमोनियम में उन्माद की प्रचंडता पहली दोनों औषधियों से अधिक है। वह चिल्ला-चिल्लाकर गाता, ठहाके मारकर हँसता, चिल्लाता, प्रार्थना करने लगता, गालियां बकने लगता-बड़ा बकवादी हो जाता है। उन्माद की प्रचंडता में स्ट्रैमोनियम तीनों से अधिक, फिर बेलाडोना, और सब से कम हायोसाइमस है। प्रचंडता के अतिरिक्त अन्य लक्षणों को भी निर्वाचन के समय ध्यान में रखना चाहिये। उदाहरणार्थ, बेलाडोना प्रकाश को सहन नहीं कर सकता, स्ट्रैमोनियम अन्धेरे को नहीं सहन कर सकता। बेलाडोना अन्धेरा चाहता है, स्ट्रैमोनियम प्रकाश।
*दर्द एकदम आता है और एकदम ही चला जाता है – 
लक्षणों का बड़े वेग से आना, और एकदम आना बेलाडोना का चरित्रगत-लक्षण है। इसी लक्षण का रूप तब स्पष्ट हो जाता है जब हम देखते हैं कि कोई भी दर्द एकदम आये और एकदम ही चला जाये, तो वह बेलाडोना से ठीक हो जाता है। सर्दी लगी, एकदम दर्द शुरू हुआ, बीमारी ने अपना जितना समय लगाना था लगाया, और दर्द जैसे एकदम आया था वैसे एकदम शान्त हो गया। कभी-कभी यह दर्द कुछ मिनट रहकर ही चला जाता है। स्ट्रैमोनियम में दर्द मीठा-मीठा शुरू होता है, धीरे-धीरे बढ़ता जाता है, उच्च-शिखर पर जाकर फिर धीरे-धीरे शान्त होता है। मैग्नेशिया फॉस का सिर-दर्द एकाएक आता है, चिरकाल तक बना रहता है और एकाएक ही जाता है। सल्फ्यूरिक ऐसिड में धीरे-धीरे शुरू होता है, पर एकदम जाता है।
बेलाडोना और एकोनाइट की तुलना – 
ये दोनों औषधियों हृष्ट-पुष्ट शरीर के लोगों के लिये उपयोगी हैं। हृष्ट-पुष्ट स्वस्थ बच्चा या एक तगड़ा नौजवान यह समझ कर कि उसे सर्दी क्या कर लेगी, ठंड में कम कपड़े पहन कर निकलता है और रात में ही या सवेरे तक शीत के किसी रोग से आक्रान्त हो जाता है। रोग का आक्रमण एकदम होता है और जोर से होता है। दोनों इस बात में समान हैं, परन्तु बेलाडोना में मस्तिष्क में तूफ़ान उठता है, बुखार के साथ असह्य सिर-दर्द हो जाता है, एकोनाइट में रुधिर की गति में तूफान उठता है, छाती या हृदय में दर्द हो जाता है, न्यूमोनिया, खांसी, जुकाम हो जाता है।


*मूत्राशय की उत्तेजितावस्था –
 बेलाडोना के अतिरिक्त दूसरी कोई औषधि ऐसी नहीं है जो मूत्राशय तथा मूत्र-नाली की उत्तेजितावस्था को शान्त कर सके। पेशाब करने की इच्छा लगातार बनी रहती है। इस औषधि में स्पर्शादि को सहन न कर सकने का जो लक्षण है, उसी का यह परिणाम है। पेशाब बूंद-बूंद कर टपकता है और सारी मूत्र-नाली में दाह उत्पन्न करता है। सारा मूत्र-संस्थान उत्तेजित अवस्था में पाया जाता है। मूत्राशय में शोथ होती है। मूत्राशय में रक्त-संचय और उसके उत्तेजितावस्था होने के कारण उस स्थान को छुआ तक नहीं जा सकता। मानसिक अवस्था भी चिड़चिड़ी हो जाती है। यह अवस्था मूत्राशय में मरोड़ पड़ने की-सी है। मूत्र में रुधिर आता है, कभी-कभी शुद्ध खून। ऐसी अवस्था में पायी जाती है कि मूत्राशय भरा हुआ है परन्तु मूत्र नहीं निकल रहा। शिकायत का केन्द्र स्थूल मूत्राशय की ग्रीवा है जहां मूत्राशय में थोड़ा-सा भी मूत्र इकट्ठा होने पर पेशाब जाने की हाजत होती है, परन्तु दर्द होता है मूत्र नहीं निकलता।
* प्रकाश, शोर, स्पर्श आदि सहन नहीं कर सकता – 
इस रोगी की पांचों इन्द्रियों में अत्यन्त अनुभूति उत्पन्न हो जाती है। रोगी आंखों से रोशनी, कानों से शब्द, जीभ से स्वाद, नाक से गंध, त्वचा के स्पर्श की अनुभूति साधारण व्यक्तियों की अपेक्षा अधिक करने लगता है, वह रोशनी, शब्द, गन्ध, स्पर्श आदि को सहन नहीं कर सकता। उसका स्नायु-मंडल उत्तेजित रहता है। स्नायु-मंडल की उत्तेजना बेलाडोना का मुख्य-लक्षण है। ओपियम इससे ठीक उल्टा है। उसमें ‘सहिष्णुता’ (Sensitivity) रहती ही नहीं। बेलाडोना के रोगी में मस्तिष्क में जितना रुधिर संचित होगा उतनी असहिष्णुता बढ़ जायगी। स्पर्श की असहिष्णुता उसमें इतनी होती है कि सिर के बालों में कघी तक नहीं फेर सकता, सिर के बालों को छूने तक नहीं देता। इस प्रकार की असहिष्णुता अन्य औषधियों में भी पायी जाती है। उदाहरणार्थ, हिपर पर रोगी दर्द को इतना अनुभव करता है कि बेहोश हो जाता है, नाइट्रिक ऐसिड का रोगी सड़क पर चलती गाड़ियों की आवाज को सहन नहीं कर सकता, उससे उसकी तकलीफें बढ़ जाता हैं, कॉफिया का रोगी तीन मंजिल ऊपर के मकान पर भी किसी के चलने की आवाज सुन लेता है तो उससे परेशान हो जाता है यद्यपि अन्य किसी को वह आवाज नहीं सुनाई पड़ती, नक्स वोमिका के रोगी के शरीर की पीड़ा लोगों के पैरों की आहट से बढ़ जाती है।
बुखार
यदि बुखार की वजह से चेहरा और आंख लाल हो गए हों। तो बेलाडोना का सेवन करने से ठीक हो जाता है।
पेट दर्द में
यदि पेट में भंयकर दर्द हो रहा हो या पेट फूल गया हो। तो बेलाडोना लेने से आपको राहत मिलेगी।
सिर व गर्दन दर्द
यदि गर्दन उठाने व झुकाने में दर्द हो रहा हो तो बेलाडोना का सेवन करने से आपकी ये समस्या ठीक हो जाती है।
सूखी खांसी
सूखी खांसी में यदि खांसते-खांसते एैसा लग रहा हो कि दम निकल रहा है और चेहरा लाल हो गया हो तो आप बेलाडोना का सेवन करें। इससे आपकी सूखी खांसी की समस्या ठीक हो जाएगी।
किसी भी तरह का दर्द
शरीर में यदि किसी भी तरह का दर्द हो रहा हो और वह शांत न हो रहा हो तो बेलाडोना सेवन करने से दर्द ठीक हो जाता है।
जीभ की सूजन
जीभ का लाल होना, मसूड़ों में दर्द और जीभ की सूजन होने पर बेलाडोना का सेवन करें।
मासिक धर्म
महिलाओं को मासिक धर्म में अधिक परेशानी हो रही हो या रक्तस्राव अधिक हो रहा हो तो वे बेलाडोना का सेवन करें।
गले की सूजन
यदि गले में सूजन हो गई हो या गले में संकुचन हो रहा हो तो बेलाडोना के सेवन से लाभ मिलता है।
कमर दर्द और गर्दन की अकड़न में बेलाडोना का सेवन करें।