19.5.17

पैरों और टांगों में नसों का ऐंठना फूलना व सूजना के घरेलू उपचार -


पैरों और टांगों में नसों का ऐंठना फूलना व सूजना - टांगों में ऐंठन - नस पर नस का चढ़ जाना - मांस-पेशियाँ में दर्द होना जैसे कि पिंडली में (टांग के पीछे) -
माँस-पेशियों की ऐंठन :
कई लोगों को रात में सोते समय टांगों में एंठन की समस्या होती है। नस पर नस चढ़ जाती है। कई लोगों को टांगों और पिंडलियों में मीठा - 2 दर्द सा भी महसूस होता है। पैरों में दर्द के साथ ही जलन, सुन्न, झनझनाहट या सुई चुभने जैसा एहसास होता है।
ऐसा कई कारणों से होता है। कुछ दिन पहले मैने 'पैरों के तलवों में दर्द - कारण व् निवारण' विषय पर लिखा था।
आज की समस्या - 'ऐंठन' के कारण भी उसी से बहुत सीमा तक मिलते जुलते हैं. मेरे विचार में इसके प्रमुख कारण हैं :
कारण :
- अनियंत्रित मधुमेह (रक्त में शक्कर का स्तर)
- शरीर में जल, रक्तमें सोडियम, पोटेशियम, कैल्शियम, मैग्नीशियम स्तर कम होने
- पेशाब ज्यादा होने वाली डाययूरेटिक दवाओं जैसे लेसिक्स सेवन करने के कारण शरीर में जल, खनिज लवण की मात्रा कम होने
- मधुमेह, अधिक शराब पीने से, किसी बिमारी के कारण कमजोरी, कम भोजन या पौष्टिक भोजन ना लेने से, 'Poly-neuropathy' या नसों की कमजोरी।
- कुछ हृदय रोगी के लिये दवायें जो कि 'Beta-blockers' कहलाती हैं, वो भी कई बार इसका कारण होती हैं।
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कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा सेवन करने से.
- अत्यधिक कठोर व्यायाम करने, खेलने, कठोर श्रम करने से.
- एक ही स्थिति में लंबे समय तक पैर मोड़े रखने के कारण और पेशियों की थकान के कारण हो सकता है।
- पैर की धमनियोंकी अंदरूनी सतह में कोलेस्ट्रॉल जमा होने से, इनके संकरे होने (एथ्रीयो स्कोरोसिस) के कारण रक्त प्रवाह कम होने पर,
- पैरों की स्नायुओं के मधुमेह ग्रस्त होने
- अत्यधिक सिगरेट, तंबाकू, शराब का सेवन करने, पोष्क तत्वों की कमी, संक्रमण से।
घरेलू उपचार :
- आराम करें। पैरों को ऊंचाई पर रखें।
- प्रभाव वाले स्थान पर बर्फ की ठंडी सिकाई करे। सिकाई 15 मिनट, दिन में 3-4 बार करे।
- अगर गर्म-ठंडी सिकाई 3 से 5 मिनट की (दोनों तरह की बदल-2 कर) करें तो इस समस्या और दर्द - दोनों से राहत मिलेगी।
- आहिस्ते से ऎंठन वाली पेशियों, तंतुओं पर खिंचाव दें, आहिस्ता से मालिश करें।
- वेरीकोज वेन के लिए पैरों को ऊंचाई पर रखे, पैरों में इलास्टिक पट्टी बांधे जिससे पैरों में खून जमा न हो पाए।
- यदि आप मधुमेह या उच्च रक्तचाप से ग्रसित हैं, तो परहेज, उपचार से नियंत्रण करें।
- शराब, तंबाकू, सिगरेट, नशीले तत्वों का सेवन नहीं करें।
-सही नाप के आरामदायक, मुलायम जूते पहनें।
- अपना वजन घटाएं। रोज सैर पर जाएं या जॉगिंग करें। इससे टांगों की नसें मजबूत होती हैं।
- फाइबर युक्त भोजन करें जैसे चपाती, ब्राउन ब्रेड, सब्जियां व फल। मैदा व पास्ता जैसे रिफाइंड फूड का सेवन न करें।
- लेटते समय अपने पैरों को ऊंचा उठा कर रखें। पैरों के नीचे तकिया रख लें, इस स्थिति में सोना बहुत फायदेमंद रहता है।
भोजन :
- भोजन में नीबू-पानी, नारियल-पानी, फलों - विशेषकर मौसमी, अनार, सेब, पपीता केला आदि शामिल करें।
- सब्जिओं में पालक, टमाटर, सलाद, फलियाँ, आलू, गाजर, चाकुँदर आदि का खूब सेवन करें।
- 2-3 अखरोट की गिरि, 2-5 पिस्ता, 5-10 बादाम की गिरि, 5-10 किशमिश का रोज़ सेवन करें।
- अगर आप मांसाहारी हैं तो मछली का सेवन लाभदायक है।
- चिकित्सक से परामर्श लें :
पैरों में दर्द के साथ सूजन, लाली हो और बुखार आ रहा हो, पैर नीला या काला हो गया हो या फिर पैर ठंडा या पीला पड़ गया हो और घरेलू उपचार से राहत नहीं मिल पा रही हो, तो ऎसी स्थिति में चिकित्सक से सलाह लेना जरूरी है।
- पैरों के तलवों पर एक्यूप्रेशर रोलर करनें से दर्द से राहत मिलती है। इस क्रिया में पैरों को रोलर पर रखकर धीरे-धीरे घुमाएं। यह क्रिया दिन में 5-7 बार करनी चाहिए। इसे दो मिनट तक करना पर्याप्त रहता है। रोलर करने से पहले तलवों पर हल्का पाउडर लगाएं। इससे एक्यूप्रेशर आसानी से होगा।
मालिश : पैरों को दबाने या मालिश करने से आराम मिलता है। मालिश करते समय दोनों पैरों के तलवों की ओर अंगूठे के बिल्कुल नीचे पड़ने वाले बिंदु पर दबाव दें। अब पैरों के ऊपर छोटी उंगली के नीचे पड़ने वाले तीन बिंदुओं पर दबाव दें। पैरों के नीचे एड़ी पर पड़ने वाले तीन मास्टर बिंदुओं पर प्रेशर दें।
मालिश के लिए कोई भी तेल काम में लिया जा सकता है। दिन में दो-तीन बार 15-15 सेकंड तक प्रेशर करें और मालिश करें। 2-3 सप्ताह में आपको आराम मिलने लगेगा।
बचाव :
खून में ग्लूकोस की मात्रापर नियंत्रण रखें - यानी की मधुमेह को नियंत्रित रखें. मध्यम
- तीव्रता के व्यायाम करें, जिससे पेशियां, हडि्डयां मजबूत हों और जोड़ लचीले।
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संतुलित भोजन का सेवन करें।
- भोजन में वसा का सेवन कम करें।
- खेलने, व्यायाम करने के पहले और बाद में हल्के व्यायाम (वार्मअप, कूल डाउन) करें।
- प्रचुर मात्रा में पानी पीएं, विशेष रूप से व्यायाम करने, खेलने से पूर्व, इनके दौरान और बाद में।
- लंबी यात्रा के दौरान लगातार एक ही मुद्रा में बैठे न रहे। नियमित अंतराल में सीट से खड़े होकर टहलें, शरीर को खिंचाव दें।
- मालिश और रिलेक्सेशन व्यायामों के जरिए मांसपेशियों के खिंचाव व दर्द को काफी हद तक दूर किया जा सकता है।
आयुर्वेदिक औषधियां, होमियोपैथिक औषधियां, फिजियोथेरेपी, एक्यूप्रेशर व व्यायाम आदि सुविधानुसार कुछ भी अपनाया जा सकता है।
आयुर्वेदिक औषधियां :
- अश्वगंधापाक 10-10 ग्राम दूध के साथ सुबह-शाम। अगर ना मिले तो अश्वगंधा का चूर्ण भी लाभदायक है।
- सुबह-शाम ही गुनगुने दूध के साथ किसी भी अच्छी कम्पनी का च्यवनप्राश लें।
- वृहतवात चिंतामणि की एक गोली दिन में किसी भी समय दूध की मलाई के साथ लें।
- महानारायण तेल की मालिश करें व गर्म पानी की बोतल से सिकाई करें।
हड्डी दौर्बल्य के कारण होने वाला दर्द :
- मुक्ताशक्ति भस्म 500 मि.ग्रा. में पर्याप्त मलाई के साथ सुबह-शाम, गर्म दूध के साथ लें।
- इसी के साथ महायोग राज गुग्गुल की 2-2 गोली सुबह-शाम गर्म दूध के साथ लें।
-बलारिष्ट नामक औषधि की 30 मि.ली. खुराक समभाग ताजा जल के साथ सुबह-शाम लेनी चाहिए।
- इसके अलावा सुबह-शाम दो-दो गोली लाक्षादि गुग्गुल की एक चम्मच कैस्टर ऑयल से लेनी चाहिए।
फिजियोथेरेपी :
दर्द मिटाने के लिए फिजियोथेरेपिस्ट हल्के हाथों से मालिश करता है और कशेरुकाओं को उनकी सही जगह पर बैठा देता है। यह उपचार चिकित्सकीय परामर्श के बाद ही योग्य व कुशल फिजियोथेरेपिस्ट से कराना चाहिए।
एक्यूप्रेशर व एक्यूपंक्चर :
पारंगत व्यक्ति से ही यह उपचार कराना चाहिए। कुशल हाथों के द्वारा रोगी के दर्द में काफी आराम मिल सकता है।
होमियोपौथिक उपचार :
लक्षणों की समानता के आधार पर मुख्यरूप से निम्न औषधियों का प्रयोग किया जा सकता है।
चेलीडोनियम: गर्दन में दर्द, कठोरता, घुमाने में दर्द, दाएं कंधे की हड्डी (स्केपुला) पर अंदर एवं नीचे की तरफ लगातार दर्द रहने पर 30 शक्ति औषधि लेनी चाहिए।
जिंकम मेट : कमर दर्द, छूना भी पीड़ादायक, कंधों पर तनाव, रीढ़ की हड्डी में चिड़चिड़ाहट, आखिरी डॉरसल अथवा रीढ़ की प्रथम लम्बर हड्डी में दर्द, गुम चोट जैसा दर्द, एक जगह बैठे रहने पर दर्द, अकड़न, कंधों में टूटन-ऐंठन आदि लक्षण मिलने पर उक्त औषधि 30 शक्ति में दिन में तीन बार 3-3 बूंद लेनी चाहिए। इस औषधि से रोगी को टट्टी-पेशाब के बाद राहत मिलती है।
स्त्रियों को सफेद पानी (श्वेत प्रदर) के साथ कमर दर्द व चिड़चिड़ाहट पर सीपिया 30 तथा एलुमिना 30 शक्ति में देनी चाहिए।
अत्यधिक मैथुन के बाद कमर दर्द रहने पर एग्नस कैस्टस एवं एसिडफॉस औषधियां 30 शक्ति में लेना हितकर रहता है।
यदि चलने-फिरने पर दर्द बढ़ने लगे एवं दबाने पर तथा दर्द वाली सतह पर लेटने से आराम मिले तो ब्रायोनिया 30 शक्ति में, दिन में तीन बार, एक हफ्ते तक लेनी चाहिए।
कालीकार्ब औषधि के रोगी में ब्रायोनिया से विपरीत लक्षण मिलते हैं। अर्थात् रोगी को चलने-फिरने से आराम मिलता है एवं बाईं तरफ अथवा दर्द वाली सतह पर लेटने से परेशानी बढ़ जाती है। ऐसे में कालीकार्ब औषधि 30 शक्ति में लेनी चाहिए।
व्यायाम :
- कैटरपिलर वॉक बेहद लाभकारी व्यायाम है जिसमें मशीनों की जरूरत नहीं होती। इसके लिए जमीन पर पुश-अप पोजीशन में आइए। दोनों हाथ जमीन पर और पैरों का वजन पंजों पर। पहले अपना दायां पैर आगे लेकर आएं, उसके बाद बायां पैर आगे लाएं। याद रहे हथेलियां जमीन पर रहें। इसके बाद हथेलियों के सहारे धीरे-धीरे आगे चलें और बाद में पैरों को भी आगे ले जाएं। फिर पीछे की तरफ मुड़े और दोबारा इस प्रक्रिया को करें। धीरे -धीरे इसको करें और कमरे या जगह के हिसाब से यह एक्सरसाइज करें।
- कॉफ रेजिज एक्सरसाइज ऐड़ी और पंजे के द्वारा की जाती है। इस एक्ससाइज को करने के लिए एक प्लेटफार्म की जरूरत होती है जिस पर आप पंजों के बल कॉफ रेजिज करने की सही पोजीशन में खड़ी हो सकें। यह संभव ना हो तो कुछ बार सीधे खड़े होकर पंजों के बाल खड़े हों और कुछ देर बाद वापिस सामान्य स्थिति में आ जायें। ऐसा 5-10 सेकेंड तक 10 बार तक करने का प्रयास करें।
- किसी कुर्सी पर बैठकर पेहले एक टांग को घुटने से सीधा करें। उसे जमीन के समानान्तर लाने का प्रयास करें, नहीं तो जितना आराम से कर सकते हैं-करें. टांग को 5-10 सेकेंड तक रोकें और धीरे-2 वापिस नीचे ले आयें। ऐसा 10 बार करें। फिर दूसरी टांग से 10 बार करें। 1-2 मिनट आराम करके दोनों टांगों के साथ ऐसा 10 बार करें. इस से आपको घुटनों के दर्द में भी आराम मिलेगा।
- भूमि पर या किसी भी आरामदायक सख्त आसान पर बैठकर टांगें फैला लें. अब एक पैर को एडी और पंजों से बाहिर की ओर फेलाने / खींचने का प्रयास करें (वैसे ही - हाथ से पकड़े बिना). 5-10 सेकेंड बाद ढीला छोड़ दें. दोनों पैरों से 10-10 बार करें। इस से आप को इस समस्या, घुटनों और पैरों के दर्द में भी राहत मिलेगी।
तैरना :
तैरना एक बेहद फायदेमंद व्यायाम साबित हुआ है। तैरने से हमारे पेट, पीठ, बांह, व टांगों की मांसपेशियां मजबूत बनती हैं। पानी हमारे शरीर के गुरुत्वाकर्षी खिंचाव को कम कर देता है, जिसके चलते तैरते समय पीठ पर किसी तरह का तनाव या बोझ नहीं पड़ता। यह सावधानी जरूर रखें कि कुछ निश्चित स्ट्रोक के बाद अपना चेहरा पानी के भीतर जरूर कर लें। हमेशा सिर ऊपर करके तैरने से रीढ़ के अस्थिबंधों में कुछ ज्यादा ही खिंचाव पैदा हो जाता है। इस कारण पीठ दर्द बढ़ भी सकता है।
योग आसन :
उत्तान पादासन :
इस आसन को स्त्री पुरुष समान रूप से कर सकते हैं। छह सात वर्ष के बालक-बालिकाएं भी इसे कर सकते हैं। यह बहुत आसान आसन है एवं अधिक लाभदायक है। करने की शर्त यह कि आपको पेट और कमर में किसी प्रकार का कोई गंभीर रोग न हो। यदि ऐसा है तो किसी योग- चिकित्सक से पूछकर करें।


विधि : पीठ के बल भूमि पर चित्त लेट जाएं। दोनों हथेलियों को जांघों के साथ भूमि पर स्पर्श करने दें। दोनों पैरों के घुटनों, एड़ियों और अंगूठों को आपस में सटाए रखें और टांगें तानकर रखें।
अब श्वास भरते हुए दोनों पैरों को मिलाते हुए धीमी गति से भूमि से करीब डेढ़ फुट ऊपर उठाएं अर्थात करीब 45 डिग्री कोण बनने तक ऊंचे उठाकर रखें। फिर श्वास जितनी देर आसानी से रोक सकें उतनी देर तक पैर ऊपर रखें।
फिर धीरे-धीरे श्वास छोड़ते हुए पांव नीचे लाकर बहुत धीरे से भूमि पर रख दें और शरीर को ढीला छोड़कर शवासन करें।
आसन अवधि : इस आसन का प्रात: और संध्या को खाली पेट यथाशक्ति अभ्यास करें। जब आप श्वास को छाती में एक मिनट से दो तीन मिनट तक रोकने का अभ्यास कर लेंगे तब आपका आसन सिद्ध हो जाएगा।
- रोज सर्वागासन करें।

13.5.17

सीने में दर्द के लिए घरेलू नुस्ख़े (Home Remedies For Chest Pain)



  कुछ लोग छाती में होने वाले दर्द के कारण चिंता करने लगते हैं तथा ऐसा मानते हैं कि यह दर्द हार्ट (हृदय) से संबंधित किसी समस्या के कारण है। परंतु यह एक अस्थायी दर्द होता है तथा तब तक रहता है जब तक पेट की गैस निकल नहीं जाती। सीने में दर्द हमेशा हृदय संबंधी समस्‍याओं के कारण नहीं होता है। इसके लिए कई अन्‍य कारण भी हो सकते हैं। हालांकि, सीने में दर्द महसूस होने पर हमेशा चिकित्‍सक से सलाह लेने के लिए कहा जाता है ताकी सीने में दर्द के सही कारणों के बारे में जानकारी हासिल की जा सकें। आमतौर पर सीने में होने वाले इस दर्द को 'एंजाइना' कहा जाता है, जिसे मेडिकल भाषा में एंजाइना पेक्टोरिस कहा जाता है। कोरोनरी डिजीज के चलते दिल तक पहुंचने वाले रक्त की मात्रा कम होने पर एंजाइना की समस्या होती है। सीने में दर्द की कभी भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। एक बार यह जानने के बाद कि दर्द के कारणों में दिल संबंधी गंभीर समस्‍या शामिल नहीं है।
जब सीने में हो दर्द तो अपनायें ये घरेलू उपाय
 
लहसुन
लहसुन समग्र स्‍वास्‍थ्‍य के लिए इस्‍तेमाल किया जाता है, विशेष रूप से हृदय समस्‍याओं के इलाज के लिए तो लहसुन बहुत ही फायदेमंद होता है। लहसुन में पाये जाने वाले कैल्शियम, फास्फोरस, आयरन, थियामिन, राइबोफ्लेविन, नियासिन और विटामिन सी के कारण इसे विटामिन और मिनरल का भंडार कहा जाता है। इसके अलावा इसमें आयोडीन, सल्‍फर और क्‍लोरीन भी पाया जाता है। यह खांसी, अस्‍थमा और कफ आदि के कारण होने वाले सीने में दर्द को दूर करने में मदद करता है। लहसुन की केवल एक कली को नियमित रूप से लेने से कोलेस्‍ट्रॉल के स्‍तर को कम और धमनियों की दीवारों पर पट्टिका का निर्माण रोका जा सकता है, जो एंजाइना या सीने में दर्द का एक प्रमुख कारण है। 
पेट की गैस को कम करने के तरीके 
अपूर्ण पाचन, जल्दी जल्दी खाना खाते समय खाने के साथ हवा निगलने, कब्ज़, तैलीय और प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थ खाने, अधिक फाइबर और स्टार्च युक्त आहार लेने, खाद्य पदार्थों की एलर्जी आदि के कारण आँतों में गैस बन सकती है। कुछ पेय पदार्थ जैसे सोडा युक्त ड्रिंक, सॉफ्ट ड्रिंक या बीयर के कारण भी यह समस्या हो सकती है। गैस निकलना, पेट में दर्द, छाती में दर्द, पेट में सूजन और भूख न लगना छाती में दर्द के लक्षण हैं।
अदरक 
अदरक की जड़ विभिन्न स्‍वास्‍थ्‍य समस्‍याओं के इलाज के लिए बहुत पुराना उपाय है। यह गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल समस्याओं जैसे एसिडिटी, सर्दी और फ्लू और सूजन और गर्भावस्‍था के दौरान होने वाली उल्‍टी और मतली के लिए बहुत ही उपयोगी उपाय है। जब भी आप सीने में दर्द का अनुभव करें तो सूजन को कम करने और खांसी से राहत पाने के लिए अदरक की जड़ की चाय का सेवन करें। इसके अलावा इससे बनी चाय हार्टबर्न के कारण होने वाले सीने में दर्द को दूर करने में भी मददगार होती है।
 
इलायची और जीरा 
गैस के कारण छाती में होने वाले दर्द के लिए यह एक उत्तम घरेलू उपचार है। ये कार्मिनटिव (वातहर) की तरह कार्य करते हैं। ये पेट से गैस निकालते हैं तथा इस फंसी हुई गैस के कारण छाती और पेट में होने वाले दर्द से आराम दिलाते हैं। आप इलायची को पानी में कुछ देर उबालकर इलायची की चाय पी सकते हैं। ये पाचन में भी सहायक होते हैं तथा गैस बनने से भी रोकते हैं।
हल्दी
एक मसाले के रूप में हल्दी का इस्‍तेमाल व्यापक रूप से एशियाई व्यंजनों में किया जाता है और जड़ी बूटी के रूप में इसका इस्‍तेमाल आयुर्वेद और चीनी दवाओं में एंटी-इंफ्लेमेंटरी रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। हल्दी में पाये जाने वाले करक्यूमिन नामक तत्‍व के कारण इसका इस्‍तेमाल पेट फूलना, घाव, सीने में दर्द आदि जैसे विभिन्न रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों से दिल की रक्षा के लिए करक्यूमिन बहुत प्रभावी है। यह तत्‍व कोलेस्ट्रॉल के ऑक्सीकरण रोकने में मदद करता है जो रक्‍तवाहिकाओं को नुकसान पहुंचाकर धमनियों की दीवारों पर प्‍लॉक को मजबूत बनाता है।
तुलसी (Holy Basil)
तुलसी में सिर्फ एंटी बैक्टीरियल गुण ही नहीं बल्कि एंटी इंफ्लामेट्री गुण भी होते हैं। इसके अलावा तुलसी में ऐसे कई कंपाउड पाए जाते हैं जो दिल के सेहत के लिए भी गुणकारी है। तुलसी में Eugenol पाया जाता है जो दिल के सेहत के लिए काफी फायदेमंद है। तुलसी के पत्ते लोग चबा कर खाते हैं और कई लोग चाय और काढ़ा बना कर पीते हैं। अगर छाती में दर्द है तो तुलसी-अदरक का काढ़ा बना कर उसमें शहद की बूंदे डाल कर पी लीजिए काफी फायदा करेगा।


गुड़हल
हिबिस्कस में बहुतायत में एंटीऑक्सीडेंट की मौजूदगी, विशेष रूप से फ्लेवोनॉयड मुक्त कणों को बेअसर कर पूरे स्‍वास्‍थ्‍य को बढ़ावा देने में करता हैं। ये एंटीऑक्सीडेंट धमनियों में वसा के संचय को कम कर हृदय की समस्याओं और सीने में दर्द को रोकने में मदद करता है। साथ ही इस जड़ी बूटी में भरपूर मात्रा में पाया जाने वाला विटामिन सी प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं विशेष रूप से अगर आपको सर्दी और फ्लू से ग्रस्त होने पर खांसी और सीने में तेज दर्द होता है। हिबिस्कस चाय खांसी, सीने में दर्द, गले में खराश और अन्य सांस की समस्याओं को दूर करने में मददगार होती हैं।
*गर्म तरल पदार्थ पीना गर्म तरल पदार्थ जैसे चाय या कॉफ़ी पेट और छाती से प्राकृतिक तरीके से गैस निकालने में सहायक होते हैं। गैस के कारण छाती में होने वाले दर्द से आराम पाने के लिए यह एक प्रभावी उपचार है।
*पपीता गैस के कारण छाती में होने वाले दर्द के लिए यह एक सर्वोत्तम उपचार हैं। यह पेट में गैस बनने से भी रोकता है। अत: यह पाचन के लिए भी अच्छा होता है। यदि आप गैस की समस्या से ग्रस्त हैं तो प्रतिदिन पपीता खाने की आदत डालिए।
*सॉफ्ट ड्रिंक्स न पीयें जैसा कि इनके नाम "कार्बोनेटेड ड्रिंक्स" से ही पता चलता है कि इनमें कार्बन डाई ऑक्साइड गैस होती है। ये पेट और छाती में गैस की समस्या को बढ़ा सकते हैं। अत: इनके वजह से गैस के कारण छाती में होने वाले दर्द की संभावना बढ़ जाती है।
*व्यायाम आपको ऐसे व्यायाम करने चाहिए जो पाचन में सहायक हों। यदि आपकी जीवनशैली निष्क्रिय या गति रहित है तो पाचन अच्छे से नहीं होगा जिसके कारण गैस बन सकती है। अत: हमेशा कोई हल्की फुल्की कसरत करें।
*बेकिंग सोड़ा गुनगुने पानी में थोडा सा बेकिंग सोडा मिलाकर पीयें। यह पेट से गैस निकाल देता है और दर्द से आराम मिलता है।
*दूध से बने पदार्थों का सेवन न करें कुछ लोगों को दूध से बने पदार्थ सहन नहीं होते। इन लोगों को दूध से बने पदार्थ खाने के बाद अपचन और गैस की समस्या हो जाती है। आप वे खाद्य पदार्थ जानते हैं जिनके कारण गैस होती है और उनका उपयोग टालें।

8.5.17

गांठ किसी भी प्रकार की हो ,करें ये घरेलू आयुर्वेदिक उपचार


    शरीर के किसी भी हिस्से में उठने वाली कोई भी गठान या रसौली एक असामान्य लक्षण है जिसे गंभीरता से लेना आवश्यक है। ये गठानें पस या टीबी से लेकर कैंसर तक किसी भी बीमारी की सूचक हो सकती हैं। गठान अथवा ठीक नहीं होने वाला छाला व असामान्य आंतरिक या बाह्य रक्तस्राव कैंसर के लक्षण हो सकते हैं। ज़रूरी नहीं कि शरीर में उठने वाली हर गठान कैंसर ही हो। अधिकांशतः कैंसर रहित गठानें किसी उपचार योग्य साधारण बीमारी की वजह से ही होती हैं लेकिन फिर भी इस बारे में सावधानी बरतनी चाहिए। इस प्रकार की किसी भी गठान की जाँच अत्यंत आवश्यक है ताकि समय रहते निदान और इलाज शुरू हो सके।
आपके शरीर मे कहीं पर भी किसी भी किस्म की गांठ हो। उसके लिए है ये चिकित्सा चाहे किसी भी कारण से हो सफल जरूर होती है। कैंसर मे भी लाभदायक है।
 

आप ये दो चीज पंसारी या आयुर्वेद दवा की दुकान से ले ले:-
कचनार की छाल
गोरखमुंडी
वैसे यह दोनों जड़ी बूटी बेचने वाले से मिल जाती हैं पर यदि कचनार की छाल ताजी ले तो अधिक लाभदायक है। कचनार (Bauhinia purpurea) का पेड़ हर जगह आसानी से मिल जाता है। इसकी सबसे बड़ी पहचान है - सिरे पर से काटा हुआ पत्ता । इसकी शाखा की छाल ले। तने की न ले। उस शाखा (टहनी) की छाल ले जो 1 इंच से 2 इंच तक मोटी हो । बहुत पतली या मोटी टहनी की छाल न ले। गोरखमुंडी का पौधा आसानी से नहीं मिलता इसलिए इसे जड़ी बूटी बेचने वाले से खरीदे ।
कैसे प्रयोग करे :-
कचनार की ताजी छाल 25-30 ग्राम (सुखी छाल 15 ग्राम ) को मोटा मोटा कूट ले। 1 गिलास पानी मे उबाले। जब 2 मिनट उबल जाए तब इसमे 1 चम्मच गोरखमुंडी (मोटी कुटी या पीसी हुई ) डाले। इसे 1 मिनट तक उबलने दे। छान ले। हल्का गरम रह जाए तब पी ले। ध्यान दे यह कड़वा है परंतु चमत्कारी है। गांठ कैसी ही हो, प्रोस्टेट बढ़ी हुई हो, जांघ के पास की गांठ हो, काँख की गांठ हो गले के बाहर की गांठ हो , गर्भाशय की गांठ हो, स्त्री पुरुष के स्तनो मे गांठ हो या टॉन्सिल हो, गले मे थायराइड ग्लैण्ड बढ़ गई हो (Goiter) या LIPOMA (फैट की गांठ ) हो लाभ जरूर करती है। कभी भी असफल नहीं होती। अधिक लाभ के लिए दिन मे 2 बार ले। लंबे समय तक लेने से ही लाभ होगा। 20-25 दिन तक कोई लाभ नहीं होगा निराश होकर बीच मे न छोड़े।

6.5.17

मूत्र रोगों के घरेलू आयुर्वेदिक उपचार / Domestic Ayurvedic treatment of urinary diseases


मूत्र रोग के उपचार के लिए सबसे पहले लक्षण की ओर ध्यान देना चाहिए . उसी के आधार पर सही कारण का पता चल पायेगा . इसके बाद ही उपचार करना चाहिए . बच्चों में यह बहुत कम और बड़ों में अधिकाँश होता है . वृद्धावस्था में इसकी संभावना बढ़ जाती है . अगर सुरुआत में इसके लक्षणों पर ध्यान न दिया जाए तो सामान्य संक्रमण से लेकर पुरुष ग्रंथि तक में कैंसर की सम्भावना बन सकती है . महिलाओं में मूत्र रोग संक्रमण गर्भाशय तक पहुँच सकता है . इसके बहुत घातक परिणाम हो सकते हैं जीवन दूभर हो सकता है . इस लेख में हम लक्षणों से सुरुआत कर कारण और मूत्र रोग के घरेलु एवं आयुर्वेदिक उपचार पर बात करेंगे .
मूत्र रोग संक्रमण के सामान्य लक्षण
पेशाब का बूँद बूँद कर होना और खुलकर न होना .
कमर और उसके आस पास और आगे पीछे दर्द होना .
पेशाब के साथ,पहले या बाद में खून का आना , इससे पेशाब हलके लाल या काले रंग की हो जाती है .
अत्यधिक दुर्गन्ध युक्त पेशाब होना
थकान के साथ बुखार आना .
भूंख न लगना और कब्ज महसूस होना .
मूत्र त्यागते समय मूत्र मार्ग में पीड़ा और जलन होना .
बार बार प्यास लगना .
थोड़ी थोड़ी देर पर पेशाब लगना .
गर्भवती स्त्रियों में मूत्राशय दब जाने से प्रदाह हो जाना .

 
मूत्र रोग के विभिन्न कारण-
बच्चों में अधिकतर पेशाब के बार बार होने और खुलकर न होने की समस्या आती है . ऐसा मीठा (शक्कर ) ज्यादा खा लेने और पर्याप्त पानी न पीने से होता है . ऐसा बड़ों में भी संभव है .
युवावस्था में सही समय पर मूत्र त्याग न करना और रोके रखना मूत्राशय और मूत्र नली में संक्रमण का कारण बन सकता है . जैसे आप किसी जरुरी मीटिंग में हों तो पेशाब लगने पर रोक लेते हैं और मीटिंग के ख़तम होने का इन्तजार करते हैं .
युवा लड़कियों और महिलाओं में घर से बहार होने पर शर्म और संकोचवश सही समय पर मूत्र त्याग न करना .
मुत्रेंद्रिय की साफ़ सफाई का ध्यान न रखना .
मधुमेह ( डायबिटीज ) रोगियों के मूत्र रोग बहुत जल्द हो जाते हैं .
सम्भोग के समय पेट पर अत्यधिक दबाव पड़ने से बैक्टीरिया मूत्राशय में आ सकते हैं , ऐसा महिलाओं में अधिकार होता है .
आनुवांशिक क्षय रोग होना , चिंता एवं तनाव होना , हिस्टीरिया (महिलाओं में ) , शराब पीना , सर्दी लगना , लीवर की समस्याएँ भी इसका कारण हो सकती है .
प्राप्त लक्षणों के आधार पर इसका उपचार किया जा सकता है और कारणों को ध्यान में रखकर सावधानियां / परहेज भी ध्यान में रखने चाहिए . इसके घरेलु और आयुर्वेदिक उपचार आगे दिए गए हैं .
मूत्र रोगों के  उपचार-
एक लीटर पानी में ४० ग्राम प्याज के टुकड़े काट कर मिला लें . इसे तब तक उबालें तब तक मिश्रण तिहाई रह जाए . इसे छान लें और शहद मिलाकर दिन में ३ बार पिलायें . इससे पेशाब खुलकर और बिना रुकावट आने लगता है . अगर पेशाब आना रुक गया है तो फिर से आने लगता है .
*२०० मिली खीरे या ककड़ी के रस में एक बड़ा चम्मच नीम्बू का रस और एक चम्मच शहद मिला कर पीने से मूत्र रोग में आराम मिलता है . इसे हर ३ घंटे के बाद लें .


*गर्म दूध में गुड मिलाकर पीने से पेशाब खुलकर आने लगता है . इसे दिन में २ बार एक एक गिलास लें .
*अगर दर्द हो रहा हो तो हर १५ मिनट पर पानी या तरल पदार्थ दें .
*गुर्दे की खराबी की वजह से अगर पेशाब न बन रहा हो तो ६० ग्राम मूली का रस दे , इससे जलन और दर्द में भी रहत मिलती है .
*पानी खूब पिए जिससे शरीर में पानी की कमी न होने पाए . सामान्य रूप से दुर्गन्ध युक्त मूत्र , पीला मूत्र और जलन इससे काबू में रहते हैं . सर्दियों में ८ और गर्मियों में १६ गिलास पानी जरुर पियें .
*मूली के पत्तों का रस १०० मिली की मात्रा में दिन में ३ बार देने पर मूत्र रोग में बहुत लाभ होता है .
*पेशाब रुक रुक कर आ रहा हो तो शलगम और कच्ची मूली काट कर खाएं . रस भी पी सकते हैं .
*आधा गिलास गाजर के रस में आधा गिलास पानी मिलाकर दिन में दो बार पीने से पेशाब की जलन में राहत मिलती है .
*दिन में २ बार ५० ग्राम कच्चा नारियल खाने से मूत्र साफ़ होता है .
*आधा गिलास मट्ठा लें , उसमें आधा गिलास जौ का माड़ मिलाएं . इस मिश्रण में ५ मिली नीम्बू का रस मिलाकर पीने से मूत्र के रास्ते के सभी रोग नष्ट होते हैं .
 
*केले के तने का रस ४ चम्मच और २ चम्मच घी मिलाकर दिन में २ बार पीने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है . यह मूत्र रुक जाने पर बेहतरीन उपाय है .
*नीबू के बीजों को पीसकर नाभि के ऊपर रखकर ठंडा पानी डालने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है .
*नीम्बू अपनी अम्लीय और क्षारीय दोनों प्रकृति के कारण मूत्राशय में उपस्थित जीवाणुओं को ख़तम कर देता है . नीम्बू का रस पीने से रक्तयुक्त पेशाब में लाभ होता है .
*जीरा और चीनी सामान मात्रा में लेकर पीस लें . इसे २ चम्मच दिन में ३ बार लेने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है .
*१२५ मिली पलक के रस में नारियल का पानी मिलाकर पीने से पेशाब की जलन में लाभ होता है .
ताज़ी भिन्डी को बारीक काटकर दो गुने पानी में उबाल लें . तिहाई रह जाने पर छान लें . यह काढ़ा दिन में दो बार पीने पर प्रदाह में होने वाले पेट दर्द में लाभकारी है .
*आधा गिलास चावल के माड़ में स्वादानुसार चीनी मिलकर दो बार पीने पर रुका पेशाब खुलकर आने लगता है 
*पेशाब के समय दर्द हो रहा है और रक्त भी आ रहा है तो सोंठ को पीस – छान कर दूध में मिसरी के साथ पिलाने पर लाभ होता है .
*सौंफ को पानी के साथ उबालकर ठंडा कर लें . इसे दिन में ३ बार थोडा थोडा पीने से मूत्र रोग में रहत मिलती है .
*छोटी इलायची को पीसकर दूध के साथ लेने से मूत्र जी जलन में लाभ के साथ मूत्र खुलकर आता है .
*पेशाब में खून आना , दर्द , बेचैनी और जलन में धनियाँ बहुत गुणकारी है . रात में खाली हांडी में आधा किलो उबलता पानी डालकर उसमें ३० ग्राम अधकचरा कुटा धनियाँ डाल दें . सुबह इसे मसलकर छान लें और इसमें ३० ग्राम बताशे डाल कर मिला दें . इसके पांच हिस्से करके दिन में पांच बार पिलायें .
*पेशाब बार बार होने पर ३ दाना मुनक्का, २ दाना पिस्ता और ५ दाना काली मिर्च कुचलकर सुबह शाम खाने से इस समस्या से छुटकारा मिलता है .


*सेब खाने से रात में बार बार पेशाब जाने से आराम मिलता है .
*मसूर की दाल खाने से बार बार पेशाब में आराम मिलता है .
*२५ ग्राम अजवाइन , ५० ग्राम काला तिल और १०० ग्राम गुड मिलाकर इसे 8 ग्राम की मात्रा में सुबह शाम लेने से पेशाब में जलन और बहुमूत्र जैसे रोग ठीक हो जाते हैं .
*बरगद के पेड़ के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीने से पेशाब में जलन और रूकावट से छुटकारा मिलता है .
*सात दिनों तक पके केले का नाश्ता करें . इससे पेशाब खुलकर आएगा और मूत्र विकार दूर होंगे .
*सुबह शाम तिल के लड्डू खाने से बार बार पेशाब की समस्या से छुटकारा मिलता है .
*चमेली के पत्तों का रस पीने से मूत्र विकार दूर होता है .
*बिस्तर पर पेशाब करने की आदत पड़ने पर रोज छुहारा खाना चाहिए .
*सौंफ के रस में थोड़ी हींग डालकर पीने से पेशाब की रूकावट दूर होती है .
*आधा कप नाशपाती का रस रोजाना पीने से कुछ ही दिनों में सभी मूत्र रोग दूर हो जाते हैं .
*१०० ग्राम पीसी हल्दी, २५० ग्राम काले टिल और १०० ग्राम पुराने गुड को कूटकर और तवे पर सुखा भून लें . इसे रोजाना एक चम्मच सुबह के समय पानी के साथ लेने पर सभी मूत्र रोग दूर हो जाते हैं .
*फालसे खाने और उसका शरबत पीने से पेशाब की जलन दूर हो जाती है .
*अन्नानास का रस व शरबत पीने से पेशाब की जलन की समस्या से छुटकारा मिलता है .
*दालचीनी के सेवन से रुका हुआ पेशाब खुल जाता है और पेशाब में पस आना बंद हो जाता है . इसके लिए तीन बार आधा चम्मच दालचीनी पावडर पानी के साथ फांकना लाभकारी होता है .
*२ चम्मच दालचीनी पावडर और १ चम्मच शहद को हलके गर्म पानी में घोल लें . इसके सेवन से मूत्राशय के रोग नष्ट हो जाते हैं .
*जामुन की गुठली का चूर्ण रोजाना १-२ चम्मच ठन्डे पानी से लेने पर पेशाब में सुगर जाना बंद हो जाता है .
*खीरे या ककड़ी के बीजों के साथ काली मिर्च मिलाकर पीने से रुका हुआ पेशाब फिर से आने लगता है .
*पेशाब में जलन होने पर ठन्डे पानी में नीम्बू का रस मिलकर पीने से लाभ होता है .
*हरी दूब की जड़ का काढ़ा पीने से पेशाब के समय होने वाले कष्ट और जलन से छुटकारा मिलता है .
*हरी दूब को मिसरी के साथ पीसकर और छानकर पीने से पेशाब में खून आना बंद हो जाता है .
*पीसी इलायची शहद के साथ खाने पर पेशाब करते समय होने वाला दर्द और जलन दूर होता है . छोटी पीसी इलायची को नारियल के पानी , निर्मली और शक्कर मिलकर पीने से जल्दी लाभ होता है .
*बड़ी इलायची और शोरे को १० -१० ग्राम की मात्र में पीसकर ४ – ४ ग्राम दूध के साथ सुबह शाम खाने से पेशाब की जलन से छुटकारा मिलता है .
*तेजपत्ता का चूरन खाने से मूत्र में सुगर का जाना बंद हो जाता है और खून में सुगर की मात्र कम हो जाती है .
*बबूल की कच्ची फली को चाय में सुखा लें . उसके बाद घी में तलकर चूर्ण बना लें . इस चूर्ण को ३ -३ ग्राम की मात्रा में लेने पर बहुमूत्र में लाभ मिलता है .
*तरबूज के बीचों को गर्म पानी में पीसकर और छानकर पीने से पेशाब करने में कष्ट या जलन से छुटकारा मिलता है और पथरी में भी लाभ होता है ..
*अंगूर के रस में शहद मिलाकर पीने से बार बार पेशाब आना कम होता है .
*गन्ने का रस रोज पीने से पेशाब की रूकावट दूर होती है .
*सीताफल की जड़ को पानी में घिसकर पीने से रुका हुआ पेशाब आने लगता है .
*एक पका केला खाकर आंवले के रस में चीनी मिलाकर पीने से पेशाब आने लगता है .
*१० ग्राम धनिये को रात में पानी में भिगोकर और छानकर पीने से पेशाब की पेशाब की जलन दूर होती है .
*हरे धनिये के पत्तों के रस में २ चम्मच रस मिलकर पीने से मूत्र रोग में लाभ होता है .



25.4.17

गर्मी के मौसम मे क्या खाएं

   बदलती ऋतुओं के अनुसार शरीर में स्वाभाविक रासायनिक परिवर्तन होते हैं और इस परिवर्तन में ऋतूचर्यानुसार खाध्य पदार्थों का सेवन किया जाए तो वात-पित्त-कफ के उभार से होने वाले रोगों से बचा जा सकता है| यहाँ मैं गर्मी की ऋतू में अच्छी सेहत के लिए सेहतमंद दिन चर्या की बात करूँगा-
   
गर्मियां में बहुत जरूरी है कि हम अपने खानपान का पूरा ध्यान रखें. खासतौर पर ऐसा खान-पान होना चाहिए तो कि शरीर को ठंडा करे.खुबानी यानी एप्रीकॉट में बीटा-कैराटीन होता है, जिसमें एंटी ऑक्सीडेंट्स होते हैं. ये कैंसर और हृदय रोगों की रोकथाम के लिए बहुत अच्छा है. इसे त्वचा के लिए भी बहुत अच्छा माना जाता है, क्योंकि इससे त्वचा ऑयली नहीं होती.

  अल सुबह उठते ही २-३ गिलास पानी पीना चाहिए| इसके बाद शौच,दन्त सफाई,आसान और प्राणायाम नियमित रूप से करें| अब रात को पानी भिगोये हुए ११ बादाम को छिलके उतारकर पीसकर एक गिलास दूध के साथ पीएं| इसके नियमित प्रयोग से शारीरिक तंदुरुस्ती मिलती है और आंतरिक उष्मा शांत होती है| गर्मी के मौसम में तले भुने,गरिष्ठ और ज्यादा मसालेदार पदार्थों की बजाय फल फ्रूट ,हरी सब्जियों के सलाद और जूस का ज्यादा इस्तेमाल करना बेहद फायदेमंद रहता है| इससे गर्मी की वजह से पसीना होने से होने वाली पानी कमी का पुनर्भरण भी होता रहता है|
   गर्मियों में शरीर को ठंडा रखने के लिए छाछ बहुत ही अच्छी होती है. इसमें लैक्ट‍िक एसिड पाया जाता है, जो कि स्कीम मिल्क से ज्यादा स्वास्थ्यवर्धक होता है. ये शरीर में चुस्ती लाता है. इसे खाने के बाद लिया जाता है, क्योंकि ये पाचन में बहुत मददगार है. इसमें अध‍ि‍क मात्रा में कैल्श्‍िायम, पोटैश‍ियम और जिंक होता है
   *आम सबको बहुत पसंद आता है और गर्मियों में खूब मिलता है. इसे भरपूर मात्रा में विटामिन सी और आयरन पाया जाता है. ये गर्भवती महिलाओं के लिए भी बहुत अच्छा है.

  
 *ग्रीष्म ऋतू में बाजारू चीजें खाने से बचने की सलाह दी जाती है| इस मौसम में शारीरिक कमजोरी        ,अपच,दाद,पेचिश,सीने में जलन.खूनी बवासीर ,मुहं की बदबू आदि रोगों से बचने का सरल उपचार भी लिख देता हूँ| खाली पेट,नींबू का रस आंवले का रस और हरे धनिये का रस मिश्री मिलाकर पीने से कई रोगों से बचाव हो सकता है| दोपहर और सांयकालीन भोजन में चावल के साथ अरहर,मूंग,उडद की दाल और हरी पत्तीदार सब्जियों का समावेश करें| छाछ व् दही का सेवन करना हितकारी है| रात का भोजन ना करें तो ज्यादा अच्छा|
तरबूज गर्मियों में शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है. गर्मियों के मौसम में इसका अध‍िक सेवन शरीर के लिए फायदेमंद होता है. इसमें सोड‍ियम, पोटैश‍ियम और विटामिन बी भी पाया जाता है.
कॉर्न यानी भुट्टे में विटामिन सी, मैगनेश‍ियम, फॉसफोरस और फोलेट पाया जाता है. इसमें फाइबर भी होता है, जो कि पाचन के लिए बहुत अच्छा होता है.
गर्मी में घर से बाहर निकलने के पाहिले २ गिलास पानी जरूर पी लेना चाहिए| टमाटर,तरबूज,खरबूज,खीरा ककड़ी,गन्ने का रस और प्याज का उपयोग करते रहना चाहिए| इन चीजों से पेट की सफाई होती है और अंदरूनी गर्मी शांत होती है|
नारियल पानी गर्मियों के लिए सबसे बेहतर है. इसमें बहुत अध‍ि‍क मात्रा में कैल्‍िशयम, क्लोराइड और पोटैशि‍यम पाया जाता है.
गन्ने का रस- गर्मी में गन्ने का रस सेहत के लिये बहुत अच्छा होता है| इसमें विटामिन्स और मिनरल्स होते हैं| इसे पीने से ताजगी बनी रहती है| लू नहीं लगती है| बुखार होने पर गन्ने का रस पीने से बुखार जल्दी उतर जाता है| एसीडीटी की वजह से होने वाली जलन में गन्ने का रस राहत पहुंचाता है| गन्ने के रस में नीम्बू मिलाकर पीने से पीलिया जल्दी ठीक होता है| गन्ने के रस में बर्फ मिलाना ठीक नहीं है|
कटहल गर्मियों में खूब पाया जाता है और ये बढ़े हुए ब्लडप्रेशर को कम करने में मददगार है.


योगर्ट में प्रोटीन की मात्रा अध‍िक और वसा कम होता है. ये वजन घटाने में भी बहुत मददगार है. ये पाचन तंत्र को भी बहुत मजबूत बनाता है.
आम पन्ना - कच्चे आम को पानी में उबालकर उसका गूदा निकाल लें| इसमें शकर,भुना जीरा,धनिया,पुदीना,नमक मिलाकर पीयें| गर्मी की बीमारियाँ दूर होंगी
खीरे को भी गर्मियों के लिए बहुत परफेक्ट माना जाता है. इसमें पानी की मात्रा बहुत अधिक होती है. ये ऑयली त्वचा को ठीक करता है. खीरा गर्मियों में होने वाले गैस, एसीडिटी, सीने में जलन की समस्याओं को भी दूर करता है.
ठंडाई- गर्मी में ठंडाई काफी लाभ दायक होती है| इसे बनाने के लिये खस खस और बादाम रात को भिगो दें|सुबह इन्हें मिक्सर में पीसकर ठन्डे दूध में मिलाएं| स्वाद अनुसार शकर मिलाकर पीएं| गर्मी से मुक्ति मिलेगी|
पुदीने का शरबत- गर्मी में पुदीना बेहद फायदेमंद रहता है| पुदीने को पीसकर स्वाद अनुसार नमक,चीनी जीरा मिलाएं| इस तरह पुदीने का शरबत बनाकर पीने से लू.जलन,बुखार ,उल्टी व गैस जैसी समस्याओं में काफी लाभ होता है|

24.4.17

गर्मियों में रहे सावधान! धूप,लू और बीमारियों से बचने के उपाय

   

   गर्मी के आगमन के साथ ही कई तरह की परेशानियां शुरू हो जाती हैं। लोग इससे बचने के लिए तरह-तरह के उपाय करने लगते हैं। बढ़ती गर्मी में सबसे बड़ी समस्या होती है धूप की। इससे बचने के लिए पूरे शरीर को ढंकने के साथ ही कई और उपाय करने में जुट जाते हैं। अब गर्मी के कारण रोजमर्रा के कामों को तो छोड़ा नहीं जा सकता है, आपके शरीर में पानी की कमी न हो। ऐसे कौन से उपाय हैं जिन्हें अपनाकर आप तेज गर्मी से राहत पा सकते हैं।
   गर्मी में होने वाली गर्मी से थकावट, लू लगना, पानी की कमी, फूड पॉयजनिंग आम बीमारियां हैं। अगर हम कुछ सावधानियां बरतें तो इन बीमारियों से बचा जा सकता है।गर्मी के मौसम में हवा के गर्म थपेड़ों और बढ़े हुए तापमान से लू लगने का खतरा बढ़ जाता है, खासकर धूप में घूमनेवालों, खिलाड़ियों, बच्चों, बूढ़े और बीमारों को लू लगने का डर ज्यादा रहता है। लू लगने पर उसके इलाज से बेहतर है, हम लू से बचे रहें यानी बचाव इलाज से बेहतर है।
*चश्मा पहनकर बाहर जाएं। चेहरे को कपड़े से ढक लें।
*घर से पानी या कोई ठंडा शरबत पीकर निकलें, जैसे आम पना, शिकंजी, खस का शर्बत आदि। साथ में भी पानी लेकर चलें।


* बहुत ज्यादा पसीना आया हो तो फौरन ठंडा पानी न पीएं। सादा पानी भी धीरे-धीरे करके पीएं।
* रोजाना नहाएं और शरीर को ठंडा रखें।
*घर को ठंडा रखने की कोशिश करें। खस के पर्दे, कूलर आदि का इस्तेमाल करें।
* बाजार से कटे हुए फल न लें।
*तेज गर्म हवाओं में बाहर जाने से बचें। नंगे बदन और नंगे पैर धूप में न निकलें।
* घर से बाहर पूरे और ढीले कपड़े पहनकर निकलें, ताकि उनमें हवा लगती रहे।
*ज्यादा टाइट और गहरे रंग के कपड़े न पहनें।
* सूती कपड़े पहनें। सिंथेटिक, नायलॉन और पॉलिएस्टर के कपड़े न पहनें।
*खाली पेट बाहर न जाएं और ज्यादा देर भूखे रहने से बचें।
*धूप से बचने के लिए छाते का इस्तेमाल करें। इसके अलावा, सिर पर गीला या सादा कपड़ा रखकर चलें।
*आयुर्वेद के अनुसार आमतौर पर लोग कफ, पित्त, वायु या इनमें से कोई दो प्रकृतियों वाले होते हैं। हम ठंडी तासीर या प्रकृति की चीजों का इस्तेमाल करते हैं तो हमारे शरीर का मेटाबॉलिज्म या चयापचय सिस्टम ठंडा होना शुरू हो जाता है और शरीर में ठंडक आने लगती है। चावल, जौ का पानी, केला, छाछ, दही, लस्सी आदि लेने से शरीर को ठंडक मिलती है। दूध की लस्सी भी ले सकते हैं। ज्यादातर सब्जियों की तासीर ठंडक देने वाली होती है। इनमें लौकी और तोरी सबसे ठंडी होती हैं। कफ प्रकृति वालों को लौकी, तोरी या इनका जूस ज्यादा नहीं लेना चाहिए। आम व लीची को छोड़कर ज्यादातर फल ठंडक देनेवाले होते हैं जैसे कि मौसमी, संतरा, आडू, चेरी, शरीफा, तरबूज, खरबूजा आदि। खीरा व ककड़ी भी गर्मियों के लिहाज से अच्छे हैं। सौंफ, इलायची, कच्चा प्याज, आंवला, धनिया, पुदीना और हरी मिर्च की तासीर भी ठंडी होती है। लू से बचाव के लिए कई तरह के पेय पदार्थों का इस्तेमाल किया जा सकता है, जैसे कि ठंडाई, आम पना, शिकंजी, लस्सी, नारियल पानी आदि के साथ-साथ खस, ब्राह्मी,चंदन, बेल, फालसा, गुलाब, केवड़ा, सत्तू के शर्बत आदि का सेवन करें।


हीट एग्जाशन गर्मी की एक साधारण बीमारी है जिसके दौरान शरीर का तापमान 37 डिग्री सेल्सियस से 40 डिग्री सेल्सियस तक होता है। चक्कर आना, अत्यधिक प्यास लगना, कमजोरी, सिर दर्द और बेचैनी इसके मुख्य लक्षण हैं। इसका इलाज तुरंत ठंडक देना और पानी पीकर पानी की कमी दूर करना है। अगर हीट एग्जॉशन का इलाज तुरंत न किया जाए तो हीट-स्ट्रोक हो सकता है, जो कि जानलेवा भी साबित हो सकता है।
में शरीर का तापमान 40 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ जाता है, जो कि अंदरुनी अंगों की कार्यप्रणाली को नष्ट कर सकता है। हीट-स्ट्रोक के मरीजों को शरीर का तापमान बहुत ज्यादा होता है, त्वचा सूखी और गर्म होती है, शरीर में पानी की कमी, कन्फयूजन, तेज या कमजोर नब्ज, छोटी-धीमी सांस, बेहोशी तक आ जाने की नौबत आ जाती है। हीट-स्ट्रोक से बचने के लिए दिन के सबसे ज्यादा गर्मी वाले समय में घर से बाहर मत निकलें। अत्यधिक मात्रा में पानी और जूस पीएं, ताकि शरीर में पानी की कमी न हो। ढीले-ढाले और हल्के रंग के कपड़े पहने।
*फूड पॉयजनिंग गर्मियों में आम तौर पर हो जाती है। गर्मियों में अगर खाना साफ-सुथरे माहौल में न बनाया जाए तो उसके दूषित होने का खतरा बढ़ जाता है। इसके साथ ही पीने का पानी भी दूषित हो सकता है। अत्यधिक तापमान की वजह से खाने में बैक्टीरीया बहुत तेजी से पनपते हैं, जिससे फूड पॉयजनिंग हो जाती है। सड़क किनारे बिकने वाले खाने-पीने के सामान भी फूड पॉयजनिंग के कारण बन सकते हैं। फूड पॉयजनिंग से बचने के लिए बाहर जाते वक्त हमेशा अपना पीने का पानी घर से ले के चलें। बाहर खुले में बिक रहे कटे हुए फल खाने से परहेज करें। गर्मी में शरीर में पानी की कमी से बचने के और शरीर में पानी की मात्रा को पर्याप्त बनाए रखने के लिए अत्यधिक मा़त्रा में तरल पदार्थ पिएं। खास तौर खेल-कूद की गतिविधियों के दौरान इस बात का ध्यान रखें। प्यास लगने का इंतजार न करें। हमेशा घर में बना हुआ नींबू पानी और ओआरएस का घोल आस-पास ही रखें। एल्कोहल और कैफीन युक्त पेय पदार्थों का परहेज करें, इनके सेवन से भी शरीर में पानी की कमी होती है।

15.4.17

एकोनाइट (Aconite Nap ) के लक्षण औषधीय उपयोग

लक्षण 
* शीत से शोथ की प्रथमावस्था में एकाएकपना और प्रबलता
*जलन और उत्ताप
*अत्यन्त प्यास
* शीत द्वारा दर्द-स्नायु-शूल
*भय के कारण बीमारियां
*घबराहट तथा बेचैनी
* खुश्क-शीत को कारण यकायक रोग

लक्षणों में कमी (Better)
* खुली हवा से रोग में कमी


लक्षणों में वृद्धि (Worse)
* बिछौने से उठने पर रोग-वृद्धि
*रोगाक्रान्त अंग की तरफ लेटने से
* शाम तथा आराम के समय
* गर्म कमरे में रोग-वृद्धि
*सड़क पार करने से भय खाता है – इसका रोगी सड़क पार करते हुए डरता हैं कि कहीं मोटर की लपेट में न आ जाय। वैसे तो सब – कोई मोटर की लपेट में आते हुए डरेगा, परन्तु एकोनाइट का रोगी बहुत दूर से आती हुई मोटर से भी भय खा जाता है।
*भीड़ में जाने से डरना – रोगी भीड़ में जाने से, समाज में जाने से डरता है, बाहर निकलने में भय खाता है।
मृत्यु की तारीख बतलाता है – इस रोगी का चेहरा घबराया हुआ रहता है। रोगी अपने रोग से इतना घबरा जाता हैं कि जीवन की आशा छोड़ देता है समझता है कि उसकी मृत्यु निश्चित है। कभी-कभी अपनी मृत्यु की तारीख तक की भविष्यववाणी करता है। डॉक्टर के आने पर कहता है: डाक्टर, तुम्हारा इलाज व्यर्थ है, मैं शीघ्र ही अमुक तारीख को मर जाने वाला हूँ। घड़ी को देख कर कहता है कि जब घड़ी की सूई अमुक स्थान पर आ जायगी तब मैं मर जाऊँगा।


* भय के कारण बीमारियां – एकोनाइट का मुख्य तथा प्रबल लक्षण ‘भय’ है। किसी भी रोग में ‘भय’ अथवा ‘मृत्यु के भय’ के उपस्थित रहने पर इसका प्रयोग आवश्यक हैं। मैटीरिया मैडिका की किसी अन्य औषधि में भय का लक्षण इतना प्रधान नहीं है जितना इस औषधि में। उदाहरणार्थ –
*प्रथम प्रसूति-काल में लड़की डर के मारे रोती है – जब नव-विवाहिता लड़की प्रथम बार गर्भवती होती हैं तब माँ को पकड़ कर रोती है, कहती है: इतने बड़े बच्चे को कैसे जानूंगी, मैं तो मर जाऊंगी। उसे एकोनाइट 200 की एक खुराक देने से ही उसका भय जाता रहता है और चित्त शान्त हो जाता है।
*भय से किसी रोग का श्रीगणेश – जब किसी बीमार का श्रीगणेश भय से हुआ हो तब एकोनाइट लाभप्रद है।
*भूत-प्रेत का डर – बच्चों को अकारण भूत-प्रेत का भय सताया करता है। अन्य कारणों से भी बच्चे, स्त्रियां तथा अनेक पुरुष अकारण भय से परेशान रहते हैं। इन अकारण-भयों को यह औषधि दूर कर देती है।
*भय में एकोनाइट तथा अर्जेन्टम नाइट्रिकम की तुलना – इन दोनों औषधियों में मृत्यु-भय है। दोनों रोगी कभी-कभी अपने मृत्यु-काल की भविष्यवाणी किया करते हैं। दोनों भीड़ से डरते हैं, घर से निकलने से डरते हैं। अर्जेन्टम नाइट्रिकम की विशेषता यह है कि अगर कुछ काम उसे करना हो, तो उससे पहले ही उसका चित्त घबरा उठता है। किसी मित्र को मिलना हो, तो जब तक मिल नहीं लेता तब तक घबड़ाया रहता है: गाड़ी पकड़नी हो तो जब तक गाड़ी पर चढ़ नहीं जाता तब तक परेशान रहता है;  

अगर व्याख्यान देने उसे जाना है तो घबराहट के कारण उसे दस्त आ जाता है, शरीर में पसीना फूट पड़ता है। आगामी आने वाली घटना को सोच कर घबराये रहना, उस कारण दस्त आ जाना, पसीना फूट पड़ना, उस कारण नींद न आना अर्जेन्टम नाइट्रिकम का विशेष लक्षण है। ऊंचे-ऊंचे मकानों को देखकर उसे चक्कर आ जाता है। एकोनाइट ठंड से बचता है, अर्जेन्टम नाइट्रिकम ठंड को पसन्द करता है। अर्जेन्टम नाइट्रिकम ठंडी हवा, ठंडे पेय, बर्फ, आइसक्रीम पसन्द करता है। पल्सेटिला की तरह बन्द कमरे में उसका जी घुटता है, एकोनाइट में ऐसा नहीं होता। अर्जेन्टम का भय ‘पूर्व-कल्पित भय’ (Anticipatory) है, एकोनाइट का भय हर समय रहने वाला भय है।
*भय में एकोनाइट तथा ओपियम की तुलना – भय से किसी रोग का उत्पन्न हो जाना एकोनाइट तथा ओपियम इन दोनों में है, परन्तु भय से उत्पन्न रोगी प्रारंभिक अवस्था में एकोनाइट लाभ करता है, परन्तु जब भय दूर न होकर हृदय में जम जाय और रोगी अनुभव करे कि जब से मैं डर गया हूँ तब से यह रोग मेरा पीछा नहीं छोड़ता, तब ओपयिम अच्छा काम करता है। इस लक्षण के साथ ओपियम के अन्य लक्षणों को भी देख लेना चाहिये।

12.4.17

आयुर्वेदिक अवलेह पाक

   आयुर्वेदिक औषधियों की जानकारी के क्रम में आपका परिचय विभिन्न प्रकार के पाक, घृत व अवलेह से कराया जा रहा है। यहां दी गई सभी प्रकार की दवाएं चाटकर सेवन की जाने वाली हैं।
च्यवनप्राश अवलेह (अष्टवर्गयुक्त) : सप्त धातुओं को बढ़ाकर शरीर का काया कल्प करने की प्रसिद्ध औषधि। फेफेड़े के विकार, पुराना श्वास, खांसी, शारीरिक क्षीणता, पुराना बुखार, खून की कमी, कैल्शियम की कमी, क्षय, रक्तपित्त, रक्त क्षय, मंदाग्नि, धातु क्षय आदि रोगों की प्रसिद्ध औषधि। इसमें स्वाभाविक रूप से विटामिन 'सी' पर्याप्त मात्रा में होता है। बल, वीर्यवर्धक है। मात्रा 10 से 25 ग्राम (2-4 चम्मच) दूध के साथ सुबह-शाम
कुष्मांड (खंड) अवलेह : रक्तपित्त, कांस, श्वास, उल्टी, प्यास व ज्वर, नाशक, मुंह, नाक, गुदा इन्द्रियों आदि से खून आने पर लाभकारी। नेत्रों को हितकारी, बल, वीर्यवर्धक एवं पौष्टिक। स्वर शुद्ध करता है। मात्रा 15 ग्राम सुबह-शाम चाटना चाहिए।
 
बादाम पाक (केशर व भस्मयुक्त) : दिल और दिमाग को ताकत देता है। नेत्रों को हितकारी तथा शिरा रोग में लाभकारी। शरीर को पुष्ट करता है और वजन बढ़ाता है। सर्दियों में सेवन करने योग्य उत्तम पुष्टि दायक है। सभी आयु वालों के लिए पौष्टिक आहार। मात्रा 10 से 20 ग्राम प्रातः-सायं दूध से।
चित्रक हरीतिकी : पुराने और बार-बार होने वाले सर्दी-जुकाम (नजला) की अनुभूत दवा है। पीनस, श्वास, कास तथा उदर रोगों में गुणकारी एवं अग्निवर्धक। मात्रा 3 से 6 ग्राम सुबह-शाम।
वासावलेह : सभी प्रकार की खांसी, श्वास, दमा, क्षय, रक्तपित्त, पुरानी खांसी के साथ खून आना, फेफेड़ों की कमजोरी आदि रोगों को नष्ट करता है। मात्रा 10 से 25 ग्राम सुबह-शाम दूध के साथ।
मूसली पाक (केशरयुक्त) : अत्यंत पौष्टिक है। असंयमजनित रोगों को दूर कर शरीर को पुष्ट बनाता है। बल, वीर्यवर्धक, बाजीकारक एवं शक्तिदायक। शरद ऋतु में शक्ति संचय हेतु उपयुक्त। मात्रा 10 से 15 ग्राम प्रातः-सायं दूध से।
ब्रह्म रसायन : शारीरिक व मानसिक दुर्बलता दूर कर नवशक्ति का संचार करने वाला अपूर्व रसायन। श्वास, कास में लाभप्रद तथा दिमागी कार्य करने वालों के लिए उपयुक्त। मात्रा 3 से 10 ग्राम गर्म दूध के साथ सुबह-शाम लेना चाहिए।

20.3.17

होम्योपैथी मे पेट दर्द की औषधियाँ


पेट दर्द के लक्षण  एवं होमियोपैथिक उपचार
• पित्ताशय में पथरी के कारण दर्द – ‘कैल्केरिया कार्ब’।
• दीर्घ स्थायी पेट दर्द – ‘लाइकोपोडियम’, ‘स्टेफिसेग्रिया’।
• पेट दर्द के साथ अत्यधिक गैस बनना – ‘एलोस’, ‘अर्जेण्टमनाइट्रिकम’, ‘बेलाडोना’, ‘कार्बोवेज’, ‘सिनकोना’, ‘लाइकोपोडियम’, ‘मैगफॉस’, ‘नक्सवोमिका’, ‘रेफेनस’।

• पहले सिर दर्द, चक्कर आना, फिर पेट दर्द –‘कोलोसिंथ’, ‘स्पाइजेलिया’।
• बच्चों को पेट दर्द – ‘एथूजा’, ‘कैमीमिला’, ‘सिना’, ‘मैगफॉस’।
• गुस्से के कारण पेट दर्द – ‘कैमोमिला’।
• कार आदि में चलने के कारण – ‘काक्युलस’, ‘काबोंवेज’।
• ठंड लगने से पेट दर्द – ‘एकोनाइट’, ‘कैमोमिला’।
• पनीर खा से पेट दर्द – ‘कोलोसिंथ’।
• सलाद, खीरा आदि खाने के कारण पेट दर्द – ‘सीपा’।
• पेट की गड़बड़ियों के कारण दर्द – ‘काबोंवेज’, ‘चाइना’, ‘पल्सेटिला’ ।
• पेट के ऑपरेशन के बाद दर्द –‘हिपर सल्फ’, ‘स्टेफिसेग्रिया’।


• पैर गीले हो जाने के कारण -‘सीपा’, ‘डोलोकोस’, ‘डल्कामारा’।
• पेट में कीड़ों के कारण दर्द – ‘बिस्मथ’, ‘सिना’, ‘इंडिगो’, ‘नेट्रमफॉस’, ‘मर्कसॉल’।
• जोड़ों एवं मांसपेशियों की सूजन के कारण पेट दर्द – ‘कॉस्टिकम’, ‘डायसकोरिया’।
• लेड, कॉपर आदि धातुओं की विषाक्तता के कारण पेट दर्द – ‘एलूमिना’, ‘नक्सवोमिका’, ‘ओपियम’।
• कड़ी कब्ज होने पर – ‘एलूमिना’, ‘साइलेशिया’, ‘ब्रायोनिया’ व ‘ओपियम’।
• दस्त होने पर – ‘एलोस’, ‘पीडोफाइलम’, ‘कैमोमिला’, ‘कैल्केरिया’, ‘मैगमूर’।
• बार-बार टट्टी की हाजत होने पर – ‘नक्सवोमिका’।

• बवासीर के कारण दर्द – ‘एस्कुलस’, ‘नक्सवोमिका’, ‘कोलोसिंथ’।
• हिस्टीरिया रोग के कारण दर्द – ‘एसाफोइटिडा’, ‘इग्नेशिया’।
• मासिक स्राव संबंधी गड़बड़ियों के कारण दर्द – ‘बेलाडोना’, ‘कैमोमिला’, ‘काक्युलस’, ‘कोलोसिंथ’, ‘पल्सेटिला’, ‘साइक्लामेन’ ।
• नाड़ी संबंधी विकारों के कारण दर्द – ‘एट्रोपीन’, ‘बेलाडोना’, ‘काक्युलस’, ‘कोलोसिंथ’, ‘डायसकोरिया’, ‘मैगफॉस’, ‘नक्सवोमिका’, ‘प्लम्बम मेट’ ।
• गुर्दो की गड़बड़ी के कारण – ‘बरवेरिस’, ‘वल्गेरिस’, ‘लाइकोपोडियम’, ‘टेरेबिंथ सारसापेरिला’, ‘कॅथेरिस’।
आम तौर पर पेट में दर्द होने पर रोगी पहले दर्द से छुटकारा पाना चाहता है। इस अवस्था में ‘मैगफॉस ‘6 अथवा 30 शक्ति में एवं ‘कोलोसिंथ’ 30 शक्ति में एक-दूसरे से 10 मिनट के अन्तर पर तीन-चार बार लेने पर आराम मिलता है।
• दांतों में छेद होना, दांत गिर जाना जैसे लक्षणों के लिए – कैल्केरिया फॉस
• मोतियाबिंद की श्रेष्ठ दवा (बाहरी प्रयोग के लिए) – सिनेरिया मेरिटिमा सक्कस
• मुंह, मसूढे और गले के घाव में व बदबू नष्ट करने के लिए (बाहरी प्रयोग के लिए) – काचलेरिया (इस दवा की क्यू शक्ति की 30 बूंद, 1 कप पानी में मिलाकर कुल्ला करना चाहिए)

15.3.17

होम्योपैथी से रोग जड़ से खत्म


    होम्योपैथी में किसी भी रोग के उपचार के बाद भी यदि मरीज ठीक नहीं होता है तो इसकी वजह रोग का मुख्य कारण सामने न आना भी हो सकता है। इसके अलावा मरीज द्वारा रोग के बारे में सही जानकारी न देना उचित दवा के चयन में बाधा पैदा करती है जिससे समस्या का समाधान पूर्ण रूप से नहीं हो पाता। ऐसे में मरीज को उस दवा से कुछ समय तक के लिए तो राहत मिल जाती है लेकिन बाद में यह दवा शरीर पर दुष्प्रभाव छोडऩे लगती है। इस लापरवाही से आमतौर पर होने वाले रोगों का इलाज शुरुआती अवस्था में नहीं हो पाता और वे क्रॉनिक रूप ले लेते हैं व असाध्य रोग बन जाते हैं। मरीज को चाहिए कि वह डॉक्टर को रोग की हिस्ट्री, अपना स्वभाव और आदतों के बारे में पूर्ण रूप से बताए ताकि एक्यूट (अचानक होने वाले रोग जैसे खांसी, बुखार) रोग क्रॉनिक (लंबे समय तक चलने वाले रोग जैसे अस्थमा, टीबी) न बने। चिकित्सकों के अनुसार, अधिकतर मामलों में एलोपैथी रोगों को दबाकर तुरंत राहत देती है लेकिन होम्योपैथी मर्ज को समझ कर उसकी जड़ को खत्म करती है। आमतौर पर होने वाली परेशानियों को छोटी बीमारी समझकर नजरअंदाज न करें क्योंकि एक रोग दूसरी बीमारी का कारण बन सकता है। जानते हैं इनके बारे में।
बुखार
   यह शरीर का नेचुरल प्यूरिफायर है जिससे शरीर में मौजूद विषैले तत्त्व बाहर निकलते हैं। 102 डिग्री तक के बुखार को ठंडी पट्टी रखकर, आराम करके या खाने में परहेज कर ठीक कर सकते हैं लेकिन उचित दवा न लेने से परेशानी बढ़कर असाध्य रोगों को जन्म देती हैं। जैसे बच्चों में इसके लिए सही दवा न दी जाए तो निमोनिया, सांस संबंधी परेशानियों हो सकती हैं। इसके अलावा कई बार दिमाग में बुखार के पहुंचने से बच्चे को दौरे भी आ सकते हैं।
इलाज
  डॉक्टर को सभी लक्षण पूर्ण रूप से बताएं ताकि वे उसी आधार पर सही दवा का चयन कर रोग को शुरुआती स्टेज में ही दूर कर सके। आर्सेनिक (हल्के बुखार के साथ पानी की प्यास ज्यादा व पसीना आने पर), एकोनाइट (तेज बुखार के साथ पानी की प्यास, शरीर में सूखापन), बेलाडोना (तेज बुखार के कारण चेहरा लाल व सिरदर्द), चाइना (गैस बनने व पेट खराब होकर बुखार) आदि दवा से इलाज करते हैं।
गजब का आयुर्वेदिक तिब्बती उपचार, गोल्ड सिल्वर और पर्ल से ठीक हो रहे गंभीर रोग
इलाज
   जुकाम शरीर से गंदगी बाहर निकालता है और यह कुछ समय में खुद ही सही हो जाता है। लेकिन आराम न हो या समस्या कुछ समय के अंतराल में बार-बार प्रभावित करे तो आर्सेनिक (पानी की प्यास के साथ जुकाम), एकोनाइट, बेलाडोना, यूफे्रशिया (जुकाम के साथ आंखें लाल रहना), एलियम सेपा (जुकाम में जलन के साथ नाक बहना), ट्यूबरकुलिनम (जुकाम के साथ गर्मी लगना या भूख ज्यादा) दवाएं देते हैं।
कब्ज : आमतौर पर इस समस्या में हम घरेलू उपाय अपनाते हैं जो लिवर व पेन्क्रियाज की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं। यह डायबिटीज और आंतों, लिवर व पेट के कैंसर का कारण बनता है। लंबे समय तक कब्ज से पेन्क्रियाज व लिवर पर दबाव बढऩे से इंसुलिन बनने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
इलाज : फॉस्फोरस (कुछ भी खाते ही उल्टी), चिलिडोनियम (लिवर के पीछे के भाग में दर्द) देते हैं।
महिला रोगोंं का इलाज
   पुरुषों की तुलना में महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं ज्यादा होती हैं। जिसके चलते उन्हें कई परेशानियों का सामना बार-बार करना पड़ता है। इनमें होम्योपैथी इलाज मददगार है। जानते हैं ऐसी ही कुछ समस्याओं व इलाज के बारे में-
मेनोरेजिया : 
इम्युनिटी कमजोर होने से यदि किसी तरह का संक्रमण सेहत को प्रभावित करे तो माहवारी के दौरान अत्यधिक रक्तस्त्राव होना महिलाओं में आम है। इसकी वजह पेल्विक इंफ्लामेट्री डिसऑर्डर (पीआईडी) भी हो सकता है। फेरीनोसा, बोरैक्स, कॉलोफाइलम आदि दवा लेने की सलाह देते हैं।
ल्यूकेरिया :
 शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी, पीआईडी आदि से वाइट डिस्चार्ज की समस्या में आर्सेनिक, कैल्केरिया कार्ब, एलेट्रिस जैसी दवाएं कारगर हैं।
मेनोपॉज : 
40-45 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं में माहवारी बंद होने की अवस्था मेनोपॉज होती है। इस दौरान महिलाओं में मानसिक व शारीरिक बदलाव होने पर ग्लोनाइल, कैक्टस, सल्फर, नैट्रम म्यूर आदि दी जाती हैं।
स्केंटी मेन्स्ट्रूएशन :
    क्रॉनिक रोग जैसे टाइफॉयड, टीबी की वजह से खून की कमी से कुछ महिलाओं में माहवारी के दौरान सामान्य से कम व ज्यादा रक्तस्त्राव होता है जो आगे चलकर विभिन्न रोगों को जन्म देता है। यह स्केंटी मेन्स्ट्रूएशन स्थिति होती है। इसके लिए फैरममैट, सीपिया, नैट्रम म्यूर दवाओं से इलाज होता है।
एसिडिटी
   समस्या के लंबे समय तक बने रहने से शरीर में एसिड इकट्ठा होता जाता है जो पेट या किडनी में पथरी, हृदयाघात, हृदय की धमनियों में ब्लॉकेज, कोलेस्ट्रॉल, कमरदर्द, पाइल्स व फिशर जैसी परेशानियों को जन्म देता है। जोड़ों के गैप में एसिड के जाने से अर्थराइटिस भी हो सकता है। दिमाग में एसिड के जाने से बढऩे वाला बीपी पैरालिसिस की वजह बनता है।
इलाज : 
  शुरुआती स्टेज में मरीज को कार्बोवेज (खट्टी डकारें आना), कालीकार्ब, फॉस्फोरस (कुछ भी खाते ही उल्टी), अर्सेनिक (पेट में जलन के बाद बार-बार पानी पीने की इच्छा) आदि दवाएं देते हैं।
सिरदर्द
   यह आम रोग है जिसमें मरीज कई बार मनमर्जी से दवा ले लेता है। ऐसे में दवा लंबे समय तक राहत नहीं देती और पेट की परेशानी व माइग्रेन की आशंका को बढ़ाती है। यदि इसका इलाज उचित दवा से न हो तो दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है जिससे हार्मोन्स के स्त्रावण में गड़बड़ी आती है जिससे थायरॉइड, महिला संबंधी समस्याएं जन्म लेती हैं।
इलाज : 
   बेलाडोना, सेंग्युनेरिया (माइग्रेन), नेट्रम म्यूर (विशेषकर महिलाओं में सिरदर्द), ग्लोनाइन (धूप के कारण सिरदर्द) आदि इस बीमारी को ठीक करते हैं।
जुकाम
अस्थमा, एलर्जी राइनाइटिस, एलोपेसिया (बाल झडऩा), कम उम्र में बाल सफेद होना, आंखें कमजोर होना, मानसिक विकार जैसे तनाव, डिप्रेशन, स्वभाव में बदलाव, गुस्सा आना, क्रोनिक ब्रॉन्काइटिस के अलावा कार्डियक अस्थमा की मूल वजह जुकाम हो सकता है। सर्वाइकल स्पोंडिलाइसिस भी जुकाम से होता है क्योंकि इस दौरान बलगम दिमाग की नसों में जमता रहता है जिससे गर्दन व दिमाग के आसपास के भाग पर दबाव बढ़ता जाता है।
डिसमेनोरिया : 
  कुछेक महिलाओं को माहवारी के दौरान विशेषकर पेट के निचले हिस्से में ज्यादा दर्द रहता है। यह तनाव लेने, मानसिक व शारीरिक कमजोरी व खानपान में असंतुलित भोजन की वजह से भी हो सकता है। ऐसे में एकोनाइट, बेलाडोना, अब्रोमा, एपिस, पल्सेटिल दवा देते हैं।
अनियमितता :
  जिन्हें माहवारी के दौरान रक्तस्त्राव कम या ज्यादा और अनियमित हो तो कैल्केरिया फॉस, कैल्केरिया कार्ब, फैरम फॉस, एलुमिना दवाएं दी जाती हैं।
इन्फैन्टाइल ल्यूकेरिया : विशेषकर 6 से 12 वर्ष की लड़कियों में पेट में कीड़ों की वजह से वाइट डिस्चार्ज की समस्या होती है जो शरीर में कमजोरी का भी कारण बनती है। ऐसे में कैल्केरिया कार्ब, आयोडम, सिपिया दवा से इलाज होता है।


12.3.17

शिशु रोगों की घरेलू चिकित्सा नुस्खे


छोटा शिशु जब किसी व्याधि से ग्रस्त होता है, तब बड़ी परेशानी होती है, क्योंकि बच्चा बोल नहीं सकता तो यह बता नहीं पाता कि उसे तकलीफ क्या है। वह सिर्फ रोने की भाषा जानता है और रोए जाता है।
माँ बेचारी परेशान हो जाती है कि बच्चा रो क्यों रहा है, इसे चुप कैसे किया जाए, क्योंकि वह बच्चे को बहलाने और चुप करने की जितनी कोशिश करती है, बच्चा उतना ही रोता जाता है। यहाँ कुछ ऐसी व्याधियों की घरेलू चिकित्सा प्रस्तुत की जा रही है, जो बच्चे के रोने का कारण होती है।

कान दर्द :
छोटा शिशु कान की तरफ हाथ ले जाकर रोता हो तो माँ अपने दूध की 2-2 बूँद कानों में टपका दे। यदि कान दुखने से बच्चा रोता होगा तो चुप हो जाएगा, क्योंकि कान का दर्द मिट चुका होगा। 


बिस्तर में पेशाब
यह आदत कई बच्चों में होती है और बड़े होने तक बनी रहती है | ऐसे बच्चों को 1 कप ठंडे फीके दूध में 1 चम्मच शहद घोल कर सुबहशाम 40 दिन तक पिलाना चाहिए । और तिलगुड़ का एक लड्डू रोज खाने को देना चाहिए | बच्चे को समझा दें कि खूब चबाचबा कर खाए | शहद वाला 1 कप दूध पीने को दें |
सिर्फ 1 लड्डू रोज सवेरे खाना पर्याप्त है | लाभ न होने तक सेवन कराएं और चाहें तो बाद में भी सेवन करा सकते हैं | बच्चे को पेशाब करा कर सुलाना चाहिए और चाय पीना बंद कर देना चाहिए | शाम होने के बाद गरम पेय या शीतल पेय पीने से भी प्रायः बच्चे सोते हुए पेशाब कर देते हैं |
पेट दर्द :
पेट में दर्द होने से शिशु रो रहा हो तो पेट का सेक कर दें और पानी में जरा सी हींग पीसकर पतला-पतला लेप बच्चे की नाभि के चारों तरफ गोलाई में लगा दें, आराम हो जाएगा।
पेट के कीड़े :
छोटे बच्चों को अकसर पेट में कीड़े हो जाने की शिकायत हो जाया करती है। नारंगी के छिलके सुखाकर कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें, वायविडंग को भी कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। दोनों को बराबर मात्रा. में लेकर मिला लें।
इस मिश्रण को आधा चम्मच (लगभग 3 ग्राम) गर्म पानी के साथ बच्चे को दिन में एक बार, तीन दिन तक, सेवन करा कर चौथे दिन एक चम्मच केस्टर ऑइल दूध में डालकर पिला दें। दस्त द्वारा मरे हुए कीड़े बाहर निकल जाएँगे।
   छोटे बच्चों की गुदा में चुरने कीड़े हो जाते हैं, जो गुदा में काटते हैं, जिस से बच्चा रोता है, सोता नहीं | मिट्टी के तेल में जरा सी रुई डुबो कर इस फाहे को बच्चे की गुदा में फंसा देने से चुरने कीड़े मर जाते हैं और बच्चे को आराम मिल जाता है |
काग ( कउआ) का गिरना
पहचान – इस रोग में गले के पास अंदर की तरफ जो काग होता है, उसमे सूजन आ जाती है तथा भयानक दर्द होता है |
* यदि प्यास भी बहुत लगती हो तो पीपल की छाल को जलाकर थोड़े पानी में बुझाकर पानी पिलाये | इससे प्यास भी जाती रहेगी और काग को भी लाभ होगा |
*काली मिर्च और चूल्हे की मिट्टी पीसकर अंगूठे पर लगाकर काग को उठा देने से वह फिर से नही गिरता |
दस्त ठीक न होना – 
सौफ को अच्छी प्रकार पीस कर छानकर उसमे शक्कर मिलाकर खिलायें | इससे दस्त साफ़ जायेगा|
खांसी – 
 दानेदार मक्के का भुट्टा जलाकर उसमे शहद या नमक मिलाकर खिलाने से खांसी ठीक हो जाती है |
बच्चों का सूखा रोग–
आज कल यह रोग बच्चो में प्राय: देखा जाता है | इसके लिए अद्भुत औषधि यह है कि रविवार या मंगलवार के दिन बंन भोगी की पत्तिया उखाड़ लावे और उस पत्ती को दोनों हाथों से मल-मल के उसके अर्क को बच्चो के कानो में चार बूंद टपकावे तथा सिर के तालू पर, हाथ पैर के उंगलियों के नहो में तथा पैर के तालू में अच्छी तरह लगा दे और थोड़ा पूरे शरीर में लगा दे | इससे सुखा रोग अवश्य दूर हो जाएगा |
बच्चों की मिर्गी –
 बारह दिन तक काली मिर्च गाय के दूध में भिगोवे रखे फिर निकाल कर सुखा दे | जब मिर्गी का दौरा हो तो पानी में घिसकर उसका हुलास दे | इससे दौरा बंद हो जायेगा |
बच्चों की आँखों में सुर्खी–
 फिटकरी भूनकर तीन मासा फिटकरी में एक तोला गाय का मक्खन मिला दे | मक्खन को पानी से सात बार धो लें | सोते समय आँखों पर दो-तीन बार लेप करे | इससे सुर्खी जाती रहेगी और आंख साफ़ हो जायेगी
 
बच्चों का डब्बा रोग
1. मूंगे को गरम करके दोनों भौहों के बीच में दाग देने से तुरंत फायदा होता है |
2. पेट के ऊपर बकायन के पत्ते गरम करके बाँधने से शीघ्र लाभ होगा |
3. पेट के ऊपर अंडी का तेल मलने से बच्चे की पसली चलनी बंद हो जाएगी |
काली खांसी – 
तवे की स्याही खुरच कर पानी में मिलाने से काली खांसी जाती रहती है|
बुखार – दिन में तीन बार एक एक रत्ती सत्त-गिलोय दें | इससे हर प्रकार का बुखार जाता रहेगा |
बच्चों के दांत – 
शहद के साथ भुना हुआ सुहागा मिलाकर मसूढ़ों पर मलने और चटाने से दांत आसानी से निकलते है |

11.3.17

लकवा (पैरालिसिस): घरेलु उपचार,चिकित्सा



पुरादेवऽसुरायुद्धेहताश्चशतशोसुराः।
हेन्यामान्यास्ततो देवाः शतशोऽथसहस्त्रशः।

जीवन मे चाहे धन, एश्वर्य, मान, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ हो, परंतु शरीर मे बीमारी है तो सब कुछ बेकार है ओर जीवन भी नीरस है। ऐसी ही एक बीमारी है पक्षाघात, जिससे पीड़ित व्यक्ति जीवनभर सारे परिवार पर बोझ बन जाता है।
लकवा को आयुर्वेद में पक्षाघात रोग भी कहते हैं। इस रोग में रोगी के एक तरफ के सभी अंग काम करना बंद कर देते हैं जैसे बांए पैर या बाएं हाथ का कार्य न कर पाना। साथ ही इन अंगों की दिमाग तक चेतना पहुंचाना भी निष्क्रिय हो जाता है। और इस रोग की वजह से अंगों का टेढापन, शरीर में गरमी की कमी और कुछ याद रखने की क्रिया भी नष्ट हो जाती है। लकवा रोग में इंसान असहाय सा हो जाता है। और दूसरों पर हर काम के लिए निर्भर होना पड़ता है। आयुर्वेद में लकवा के प्रभाव को कम करने के अनेक उपाय दिए गए हैं।
*ज्यादातर प्रौढ़ आयु के बाद ही होता है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से बनने लगती है।
*युवावस्था में की गई गलतियाँ-भोग-विलास में अति करना, मादक द्रव्यों का सेवन करना, आलसी रहना आदि कारणों से शरीर का स्नायविक संस्थान धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, इस रोग के आक्रमण की आशंका भी बढ़ती जाती है।
*जब एक या एकाधिक मांसपेशी समूह की मांसपेशियाँ कार्य करने में पूर्णतः असमर्थ हों तो इस स्थिति को पक्षाघात या लकवा मारना कहते हैं। पक्षाघात से प्रभावी क्षेत्र की संवेदन-शक्ति समाप्त हो सकती है या उस भाग को चलना-फिरना या घुमाना असम्भव हो जाता है। यदि दुर्बलता आंशिक है तो उसे आंशिक पक्षाघात कहते हैं।

लकवा, जिसे फालिज या पक्षाघात कहते हैं,
ध्यान देने योग्य एक बात यह; कि सिर्फ आलसी जीवन जीने से ही नहीं, बल्कि इसके विपरीत अति भागदौड़, क्षमता से ज्यादा परिश्रम या व्यायाम, अति आहार आदि कारणों से भी लकवा होने की स्थिति बनती है।
*ज्यादातर प्रौढ़ आयु के बाद ही होता है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से बनने लगती है।
*युवावस्था में की गई गलतियाँ-भोग-विलास में अति करना, मादक द्रव्यों का सेवन करना, आलसी रहना आदि कारणों से शरीर का स्नायविक संस्थान धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, इस रोग के आक्रमण की आशंका भी बढ़ती जाती है।
*जब एक या एकाधिक मांसपेशी समूह की मांसपेशियाँ कार्य करने में पूर्णतः असमर्थ हों तो इस स्थिति कोया लकवा मारना कहते हैं। पक्षाघात से प्रभावी क्षेत्र की संवेदन-शक्ति समाप्त हो सकती है या उस भाग को चलना-फिरना या घुमाना असम्भव हो जाता है। यदि दुर्बलता आंशिक है तो उसे आंशिक पक्षाघात कहते हैं।
कारण
*पक्षाघात तब लगता है जब अचानक मस्तिष्क के किसी हिस्से मे रक्त आपूर्ति रुक जाती है या मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के आस-पास की जगह में खून भर जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के हृदय में जब रक्त आपूर्ति का आभाव होता तो कहा जाता है कि उसे दिल का दौरा पड़ गया है उसी तरह जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो जाता है या मस्तिष्क में अचानक रक्तस्राव होने लगता है तो कहा जाता है कि आदमी को मस्तिष्क का दौरा पड़ गया है।
शरीर की सभी मांस पेशियों का नियंत्रण केंद्रीय तंत्रिकाकेंद्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) की प्रेरक तंत्रिकाओं से, जो पेशियों तक जाकर उनमें प्रविष्ट होती हैं,से होता है। अत: स्पष्ट है कि मस्तिष्क से पेशी तक के नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग में, या पेशी में हो, रोग हो जाने से पक्षाघात हो सकता है। सामान्य रूप में चोट, अबुद की दाब और नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग के अपकर्ष आदि, किसी भी कारण से उत्पन्न प्रदाह का परिणाम आंशिक या पूर्ण पक्षाघात होता है।
दरअसल मस्तिष्क की धमनी में किसी रुकावट के कारण उसके जिस भाग को खून नहीं मिल पाता है, मस्तिष्क का वह भाग निष्क्रिय हो जाता है। अब यह तो सभी जानते हैं कि हमारे मस्तिष्क की इंद्रियां हमारे शरीर के हर अंग को संचालित करती हैं। वे विविध अंगों से जुड़ी होती हैं, उन्हें कंट्रोल करती हैं।तो इसका मतलब यह हुआ कि यदि दिमाग का कोई भाग प्रभावित हो जाए, तो वह भाग शरीर के जिन अंगों से जुड़ा होता है, उन्हें काम करने के लिए अपना आदेश नहीं भेज पाता है। इसी कारण से वे अंग हिलडुल नहीं सकते, जिस कारण जन्म लेती है लकवे की बीमारी।
 हमारे मस्तिष्क का बायां भाग शरीर के दाएं अंगों पर तथा मस्तिष्क का दायां भाग शरीर के बाएं अंगों पर नियंत्रण रखता है। मस्तिष्क के अलावा यदि व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में कोई दिक्कत आए, तब भी पैरालिसिस का खतरा बना रहता है। क्योंकि इसी रीढ़ की हड्डी की इंद्रियां मस्तिष्क तक जाती हैं। विज्ञान की भाषा में रीढ़ की हड्डी में छोटा दिमाग होने का भी दावा किया जाता है।
जो लोग नशीली चीजों का सेवन करते हैं, वे भी लकवा होने का शिकार हो सकते हैं। इसके साथ ही यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक नशीली दवाइयों का सेवन कर रहा है, तो उसे भी यह रोग जकड़ सकता है। इसके अलावा शराब तथा धूम्रपान का अत्यधिक सेवन करना तो लकवा होने का कारण बन ही सकता है।जो व्यक्ति अधिक मात्रा में गैस पैदा करनेवाले पदार्थों का सेवन करते हैं, अव्यवस्थित व अत्यधिक संभोग करते हैं, विषम आहार का सेवन करते हैं, ज्यादा व्यायाम करते हैं उन्हें भी यह रोग चपेट में ले लेता है। इसके अलावा उल्टी या दस्तों का अधिक होना, मानसिक दुर्बलता, अचानक शॉक लगने आदि कारणों से भी पक्षाघात या लकवा हो जाता है।
लक्षण
लकवा आधे शरीर की नाड़ियों व नसों को सुखाकर रक्त संचरण में व्यापक बाधा पहुंचा देता है। इसके कारण शरीर की संधियों तथा जोड़ों में शिथिलता आ जाती है। ग्रसित अंग स्वयं उठ नहीं पाते, भार उठाने तथा चलने की क्षमता पूर्णत: समाप्त हो जाती है। यदि मुंह लकवाग्रस्त हो जाए तो मुंह के अंग भी स्थिर हो जाते हैं, गरदन एक तरफ झुक जाती है, बोलने की शक्ति नष्ट हो जाती है, आखों में दर्द व फड़कन आ जाती है। शरीर में कपकपी होने लगती है। व्यक्ति कुरूप दिखने लगता है।
 
*सौंठ और उड़द उबालकर इसका पानी पीने से लकवा ठीक होता है। यह परीक्षित प्रयोग है।
* 6 ग्राम कपास की जड़ का चूर्ण, 6 ग्राम शहद में मिलाकर सुहब शाम लेने से लाभ होता है।
*लहसुन की 5-6 काली पीसकर उसे 15 ग्राम शहद में मिलाकर सुबह-शाम लेने से लकवा में आराम मिलता है।
* लकवा रोगी का ब्लड प्रेशर नियमित जांचते रहें। अगर रोगी के खून में कोलेस्ट्रोल का लेविल ज्यादा हो तो उपाय करना वाहिये।खजूर खुछ दिन तक रोज दूध के साथ खाने से लकवा की बीमारी में फायदा होता है.
नासपती, एप्पल,अंगूर इन सबका बराबर मात्र में जूस बनाकर देने से फायदा होता है ये कुछ दिनों उपाय नियमित करने से लकवा की बीमारी दूर होती है.
तुलसी के पत्ते लेकर उबालकर देने से लकवा के रोगी के अंग को बफ देने से लकवा ठीक होने लगता है.
*योग से सब बीमारी से बच सकते है, प्राणायाम और कपालभाति करने से लाभदायी है.
*अंगूरः अंगूर के रस में बग्गूगोशा या नाशपाती का रस मिलाकर रोगी को नियमित रूप से दिन में दो बार पिलाएं|
*काजूः लकवाग्रस्त व्यक्ति को काजू का भरपूर सेवन कराना चाहिए। 
*किशमिशः नियमित रूप से किशमिश के सेवन से इस रोग में काफी लाभ होता है।
सफ़ेद कनेर की जड की छाल और काला धतूरा के पत्ते बराबर वजन में लेकर सरसों के तेल में पकावें। यह तेल लकवाग्रस्त अंगों पर मालिश करें। अवश्य लाभ होगा।
*लहसुन की ५ कली दूध में उबालकर लकवा रोगी को नित्य देते रहें। इससे ब्लडप्रेशर ठीक रहेगा और खून में थक्का भी नहीं जमेगा।
*दूध और केले  में पोटैशियम ,कैल्शियम,और मैग्नेशियम का प्रमाण ज़्यादा है ये कोलेस्ट्रॉल  को कम करता है जिसे लकवा की बीमारी से दूर होती है|
मैग्नीशियम से भरपूर फ़ूड ऐसे आहर जिसमे अधिक  मात्रा में मैग्नीशियम हो , उसको खाने से 30% तक लकवा होने की सम्भावना कम हो जाती है
*कुछ दिनों रोज छुहारों को दूध में भिगोकर रोगी को देते रहने से लकवा ठीक होने लगता है। सौंठ और उड़द को पानी में मिलाकर हल्का गरम करके रोगी को नित्य पिलाने से लकवा ठीक हो जाता है। 
*1 चम्मच काली मिर्च को पीसकर उसे 3 चम्मच देशी घी में मिलाकर लेप बना लें और लकवाग्रसित अंगों पर इसकी मालिश करें.एैसा करने से लकवा ग्रस्त अंगों का रोग दूर हो जाएगा। 6 कली लहसुन को पीसकर उसे 1 चम्मच मक्खन में मिला लें और रोज इसका सेवन करें। तुलसी के पत्तों, दही और सेंधा नमक को अच्छे से मिलाकर उसका लेप करने से लकावा ठीक हो जाता है.
*एक बड़ी जानकारी मिलने के बाद हमको पता चलता है हमारी भागदौड़ वाली लाइफ में जंकफूड सबसे जवाबदार है बाहर का खाने से ५८% लकवा की बीमारी की सम्भावना बढ़ सकती है लकवा से बचने के लिए बाहर का खाना छोड़ दीजिये और ये सब का सेवन करना शुरू करें.
 
*अखरोटः 
अखरोट के तेल की मालिश और सेमल के पत्तों का बफारा लेने से मुंह का लकवा जल्दी ठीक हो जाता है।
रोगी तमाम नशीली चीजों से परहेज करे। भोजन में तेल,घी,मांस,मछली का उपयोग न करे।
*बरसात में निकलने वाला लाल रंग का कीडा वीरबहूटी लकवा रोग में बेहद फ़ायदेमंद है। बीरबहूटी एकत्र करलें। छाया में सूखा लें। सरसों के तेल पकावें।इस तेल से लकवा रोगी की मालिश करें। कुछ ही हफ़्तों में रोगी ठीक हो जायेगा। इस तेल को तैयार करने मे निरगुन्डी की जड भी कूटकर डाल दी जावे तो दवा और शक्तिशाली बनेगी।
*अगर शरीर का कोई अंग या शरीर दायीं तरफ से लकवाग्रस्त है तो उसके लिए व्रहतवातचिंतामणि रस ले। उसमे छोटी-छोटी गोली (बाजरे के दाने से थोड़ी सी बड़ी) मिलेंगी। उसमे से एक गोली सुबह ओर एक गोली साँय को शुद्ध शहद से लेवें।
कुछ दिनों तो रोज छुहारों को दूध में भिगोकर रोगी को देते रहने से लकवा ठीक होने लगता है।
*सौंठ और उड़द को पानी में मिलाकर हल्की आंच में गरम करके रोगी को नित्य पिलाने से लकावा ठीक हो जाता है। >नाशपाती, सेब और अंगूर का रस बराबर मात्रा में एक ग्लिास में मिला लें। और रोगी को देते रहें। कुछ समय तक यह उपाय नित्य करना है तभी फायदा मिलेगा।
*1 चम्मच काली मिर्च को पीसकर उसे 3 चम्मच देशी घी में मिलाकर लेप बना लें और लकवाग्रसित अंगों पर इसकी मालिश करें। एैसा करने से लकवा ग्रस्त अंगों का रोग दूर हो जाएगा।
*करेले की सब्जी या करेले का रस को नित्य खाने अथवा पीने से लकवा से प्रभावित अंगों में सुधार होने लगता है। यह उपाय रोज करना है।
*प्याज खाते रहने से और प्याज का रस का सेवन करते रहने से लकवा रोगी ठीक हो जाता है।
*6 कली लहसुन को पीसकर उसे 1 चम्मच मक्खन में मिला लें और रोज इसका सेवन करें। लकवा ठीक हो जाएगा।
*तुलसी के पत्तोंए दही और सेंधा नमक को अच्छे से मिलाकर उसका लेप करने से लकावा ठीक हो जाता है। ये उपाय लंबे समय तक करना होगा।
गरम पानी में तुलसी के पत्तों को उबालें और उसका भाप लकवा ग्रस्ति अंगों को देते रहने से लकवा ठीक होने लगता है।
*आधा लीटर सरसों के तेल में 50 ग्राम लहसुन डालकर लोहे की कड़ाही में पका लें। जब पानी जल जाए उसे ठंडा होने दें फिर इस तेल को छानकर किसी डिब्बे में डाल लें। और इस तेल से लकवा वाले अंगों पर मालिश करें।
 
*धतूरे के बीजों को सरसों के तेल में मंदी आंच में पका लें और इसे छानकर लकवा से ग्रसित अंग पर मालिश करें।
*लकवा से ग्रसित हिस्से पर बादाम के तेल,सरसों के तेल,निर्गुण्डी का तेल आदि की मालिश करनी चाहिए।
मक्खन और लहसुन
मक्खन और लहसुन भी लकवा की बीमारी में राहत देते हैं। आप मक्खन के साथ लहसुन की चार कलियों को पीसकर सेवन करें।
सोंठ व दालचीनी
एक गिलास दूध में थोड़ी सी दालचीनी और एक चम्मच अदरक का पाउडर मिलाकर उबाल लें। और नियमित इसका सेवन करें। इस कारगर उपाय से लकवा रोग में आराम मिलता है।
लकवा में क्या खाएं क्या ना खाएं।
लकवा होने पर इन चीजों का सेवन जरूर करें
परवल
करेला
गेहूं की रोटी
लहसुन
बाजरे की रोटी
तरोई
फली।
इन फलों का सेवन करें
आम
चीकू
पपीता और
अंजीर।
इसके अलावा सुबह और शाम दूध का सेवन करें।
क्या ना खाएं
तली हुई चीजें
बेसन
चना
दही
चावल
छाछ
और साग का सेवन ना करें।
त्रिफला का सेवन करने से भी लकवा ठीक हो सकता है।
लकवा का सही समय पर इलाज न होने से रोगी एक अपाहिज की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाता है इसलिए समय रहते लकवा का उपचार कराना जरूरी है। आयुवेर्दिक तरीकों से लकवा पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। ये उपाय लंबे समय तक लगातार करने से ही फायदा देगें। इसलिए धैर्य जरूर रखें।