20.3.17

होम्योपैथी मे पेट दर्द की औषधियाँ


पेट दर्द के लक्षण  एवं होमियोपैथिक उपचार
• पित्ताशय में पथरी के कारण दर्द – ‘कैल्केरिया कार्ब’।
• दीर्घ स्थायी पेट दर्द – ‘लाइकोपोडियम’, ‘स्टेफिसेग्रिया’।
• पेट दर्द के साथ अत्यधिक गैस बनना – ‘एलोस’, ‘अर्जेण्टमनाइट्रिकम’, ‘बेलाडोना’, ‘कार्बोवेज’, ‘सिनकोना’, ‘लाइकोपोडियम’, ‘मैगफॉस’, ‘नक्सवोमिका’, ‘रेफेनस’।

• पहले सिर दर्द, चक्कर आना, फिर पेट दर्द –‘कोलोसिंथ’, ‘स्पाइजेलिया’।
• बच्चों को पेट दर्द – ‘एथूजा’, ‘कैमीमिला’, ‘सिना’, ‘मैगफॉस’।
• गुस्से के कारण पेट दर्द – ‘कैमोमिला’।
• कार आदि में चलने के कारण – ‘काक्युलस’, ‘काबोंवेज’।
• ठंड लगने से पेट दर्द – ‘एकोनाइट’, ‘कैमोमिला’।
• पनीर खा से पेट दर्द – ‘कोलोसिंथ’।
• सलाद, खीरा आदि खाने के कारण पेट दर्द – ‘सीपा’।
• पेट की गड़बड़ियों के कारण दर्द – ‘काबोंवेज’, ‘चाइना’, ‘पल्सेटिला’ ।
• पेट के ऑपरेशन के बाद दर्द –‘हिपर सल्फ’, ‘स्टेफिसेग्रिया’।

• पैर गीले हो जाने के कारण -‘सीपा’, ‘डोलोकोस’, ‘डल्कामारा’।
• पेट में कीड़ों के कारण दर्द – ‘बिस्मथ’, ‘सिना’, ‘इंडिगो’, ‘नेट्रमफॉस’, ‘मर्कसॉल’।
• जोड़ों एवं मांसपेशियों की सूजन के कारण पेट दर्द – ‘कॉस्टिकम’, ‘डायसकोरिया’।
• लेड, कॉपर आदि धातुओं की विषाक्तता के कारण पेट दर्द – ‘एलूमिना’, ‘नक्सवोमिका’, ‘ओपियम’।
• कड़ी कब्ज होने पर – ‘एलूमिना’, ‘साइलेशिया’, ‘ब्रायोनिया’ व ‘ओपियम’।
• दस्त होने पर – ‘एलोस’, ‘पीडोफाइलम’, ‘कैमोमिला’, ‘कैल्केरिया’, ‘मैगमूर’।
• बार-बार टट्टी की हाजत होने पर – ‘नक्सवोमिका’।

• बवासीर के कारण दर्द – ‘एस्कुलस’, ‘नक्सवोमिका’, ‘कोलोसिंथ’।
• हिस्टीरिया रोग के कारण दर्द – ‘एसाफोइटिडा’, ‘इग्नेशिया’।
• मासिक स्राव संबंधी गड़बड़ियों के कारण दर्द – ‘बेलाडोना’, ‘कैमोमिला’, ‘काक्युलस’, ‘कोलोसिंथ’, ‘पल्सेटिला’, ‘साइक्लामेन’ ।
• नाड़ी संबंधी विकारों के कारण दर्द – ‘एट्रोपीन’, ‘बेलाडोना’, ‘काक्युलस’, ‘कोलोसिंथ’, ‘डायसकोरिया’, ‘मैगफॉस’, ‘नक्सवोमिका’, ‘प्लम्बम मेट’ ।
• गुर्दो की गड़बड़ी के कारण – ‘बरवेरिस’, ‘वल्गेरिस’, ‘लाइकोपोडियम’, ‘टेरेबिंथ सारसापेरिला’, ‘कॅथेरिस’।
आम तौर पर पेट में दर्द होने पर रोगी पहले दर्द से छुटकारा पाना चाहता है। इस अवस्था में ‘मैगफॉस ‘6 अथवा 30 शक्ति में एवं ‘कोलोसिंथ’ 30 शक्ति में एक-दूसरे से 10 मिनट के अन्तर पर तीन-चार बार लेने पर आराम मिलता है।
• दांतों में छेद होना, दांत गिर जाना जैसे लक्षणों के लिए – कैल्केरिया फॉस
• मोतियाबिंद की श्रेष्ठ दवा (बाहरी प्रयोग के लिए) – सिनेरिया मेरिटिमा सक्कस
• मुंह, मसूढे और गले के घाव में व बदबू नष्ट करने के लिए (बाहरी प्रयोग के लिए) – काचलेरिया (इस दवा की क्यू शक्ति की 30 बूंद, 1 कप पानी में मिलाकर कुल्ला करना चाहिए)

15.3.17

होम्योपैथी से रोग जड़ से खत्म


    होम्योपैथी में किसी भी रोग के उपचार के बाद भी यदि मरीज ठीक नहीं होता है तो इसकी वजह रोग का मुख्य कारण सामने न आना भी हो सकता है। इसके अलावा मरीज द्वारा रोग के बारे में सही जानकारी न देना उचित दवा के चयन में बाधा पैदा करती है जिससे समस्या का समाधान पूर्ण रूप से नहीं हो पाता। ऐसे में मरीज को उस दवा से कुछ समय तक के लिए तो राहत मिल जाती है लेकिन बाद में यह दवा शरीर पर दुष्प्रभाव छोडऩे लगती है। इस लापरवाही से आमतौर पर होने वाले रोगों का इलाज शुरुआती अवस्था में नहीं हो पाता और वे क्रॉनिक रूप ले लेते हैं व असाध्य रोग बन जाते हैं। मरीज को चाहिए कि वह डॉक्टर को रोग की हिस्ट्री, अपना स्वभाव और आदतों के बारे में पूर्ण रूप से बताए ताकि एक्यूट (अचानक होने वाले रोग जैसे खांसी, बुखार) रोग क्रॉनिक (लंबे समय तक चलने वाले रोग जैसे अस्थमा, टीबी) न बने। चिकित्सकों के अनुसार, अधिकतर मामलों में एलोपैथी रोगों को दबाकर तुरंत राहत देती है लेकिन होम्योपैथी मर्ज को समझ कर उसकी जड़ को खत्म करती है। आमतौर पर होने वाली परेशानियों को छोटी बीमारी समझकर नजरअंदाज न करें क्योंकि एक रोग दूसरी बीमारी का कारण बन सकता है। जानते हैं इनके बारे में।
बुखार
   यह शरीर का नेचुरल प्यूरिफायर है जिससे शरीर में मौजूद विषैले तत्त्व बाहर निकलते हैं। 102 डिग्री तक के बुखार को ठंडी पट्टी रखकर, आराम करके या खाने में परहेज कर ठीक कर सकते हैं लेकिन उचित दवा न लेने से परेशानी बढ़कर असाध्य रोगों को जन्म देती हैं। जैसे बच्चों में इसके लिए सही दवा न दी जाए तो निमोनिया, सांस संबंधी परेशानियों हो सकती हैं। इसके अलावा कई बार दिमाग में बुखार के पहुंचने से बच्चे को दौरे भी आ सकते हैं।
इलाज
  डॉक्टर को सभी लक्षण पूर्ण रूप से बताएं ताकि वे उसी आधार पर सही दवा का चयन कर रोग को शुरुआती स्टेज में ही दूर कर सके। आर्सेनिक (हल्के बुखार के साथ पानी की प्यास ज्यादा व पसीना आने पर), एकोनाइट (तेज बुखार के साथ पानी की प्यास, शरीर में सूखापन), बेलाडोना (तेज बुखार के कारण चेहरा लाल व सिरदर्द), चाइना (गैस बनने व पेट खराब होकर बुखार) आदि दवा से इलाज करते हैं।
गजब का आयुर्वेदिक तिब्बती उपचार, गोल्ड सिल्वर और पर्ल से ठीक हो रहे गंभीर रोग
इलाज
   जुकाम शरीर से गंदगी बाहर निकालता है और यह कुछ समय में खुद ही सही हो जाता है। लेकिन आराम न हो या समस्या कुछ समय के अंतराल में बार-बार प्रभावित करे तो आर्सेनिक (पानी की प्यास के साथ जुकाम), एकोनाइट, बेलाडोना, यूफे्रशिया (जुकाम के साथ आंखें लाल रहना), एलियम सेपा (जुकाम में जलन के साथ नाक बहना), ट्यूबरकुलिनम (जुकाम के साथ गर्मी लगना या भूख ज्यादा) दवाएं देते हैं।
कब्ज : आमतौर पर इस समस्या में हम घरेलू उपाय अपनाते हैं जो लिवर व पेन्क्रियाज की कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं। यह डायबिटीज और आंतों, लिवर व पेट के कैंसर का कारण बनता है। लंबे समय तक कब्ज से पेन्क्रियाज व लिवर पर दबाव बढऩे से इंसुलिन बनने की क्षमता कमजोर हो जाती है।
इलाज : फॉस्फोरस (कुछ भी खाते ही उल्टी), चिलिडोनियम (लिवर के पीछे के भाग में दर्द) देते हैं।
महिला रोगोंं का इलाज
   पुरुषों की तुलना में महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं ज्यादा होती हैं। जिसके चलते उन्हें कई परेशानियों का सामना बार-बार करना पड़ता है। इनमें होम्योपैथी इलाज मददगार है। जानते हैं ऐसी ही कुछ समस्याओं व इलाज के बारे में-
मेनोरेजिया : 
इम्युनिटी कमजोर होने से यदि किसी तरह का संक्रमण सेहत को प्रभावित करे तो माहवारी के दौरान अत्यधिक रक्तस्त्राव होना महिलाओं में आम है। इसकी वजह पेल्विक इंफ्लामेट्री डिसऑर्डर (पीआईडी) भी हो सकता है। फेरीनोसा, बोरैक्स, कॉलोफाइलम आदि दवा लेने की सलाह देते हैं।
ल्यूकेरिया :
 शरीर में पोषक तत्त्वों की कमी, पीआईडी आदि से वाइट डिस्चार्ज की समस्या में आर्सेनिक, कैल्केरिया कार्ब, एलेट्रिस जैसी दवाएं कारगर हैं।
मेनोपॉज : 
40-45 वर्ष की उम्र के बाद महिलाओं में माहवारी बंद होने की अवस्था मेनोपॉज होती है। इस दौरान महिलाओं में मानसिक व शारीरिक बदलाव होने पर ग्लोनाइल, कैक्टस, सल्फर, नैट्रम म्यूर आदि दी जाती हैं।
स्केंटी मेन्स्ट्रूएशन :
    क्रॉनिक रोग जैसे टाइफॉयड, टीबी की वजह से खून की कमी से कुछ महिलाओं में माहवारी के दौरान सामान्य से कम व ज्यादा रक्तस्त्राव होता है जो आगे चलकर विभिन्न रोगों को जन्म देता है। यह स्केंटी मेन्स्ट्रूएशन स्थिति होती है। इसके लिए फैरममैट, सीपिया, नैट्रम म्यूर दवाओं से इलाज होता है।
एसिडिटी
   समस्या के लंबे समय तक बने रहने से शरीर में एसिड इकट्ठा होता जाता है जो पेट या किडनी में पथरी, हृदयाघात, हृदय की धमनियों में ब्लॉकेज, कोलेस्ट्रॉल, कमरदर्द, पाइल्स व फिशर जैसी परेशानियों को जन्म देता है। जोड़ों के गैप में एसिड के जाने से अर्थराइटिस भी हो सकता है। दिमाग में एसिड के जाने से बढऩे वाला बीपी पैरालिसिस की वजह बनता है।
इलाज : 
  शुरुआती स्टेज में मरीज को कार्बोवेज (खट्टी डकारें आना), कालीकार्ब, फॉस्फोरस (कुछ भी खाते ही उल्टी), अर्सेनिक (पेट में जलन के बाद बार-बार पानी पीने की इच्छा) आदि दवाएं देते हैं।
सिरदर्द
   यह आम रोग है जिसमें मरीज कई बार मनमर्जी से दवा ले लेता है। ऐसे में दवा लंबे समय तक राहत नहीं देती और पेट की परेशानी व माइग्रेन की आशंका को बढ़ाती है। यदि इसका इलाज उचित दवा से न हो तो दिमाग की कार्यक्षमता प्रभावित होने लगती है जिससे हार्मोन्स के स्त्रावण में गड़बड़ी आती है जिससे थायरॉइड, महिला संबंधी समस्याएं जन्म लेती हैं।
इलाज : 
   बेलाडोना, सेंग्युनेरिया (माइग्रेन), नेट्रम म्यूर (विशेषकर महिलाओं में सिरदर्द), ग्लोनाइन (धूप के कारण सिरदर्द) आदि इस बीमारी को ठीक करते हैं।
जुकाम
अस्थमा, एलर्जी राइनाइटिस, एलोपेसिया (बाल झडऩा), कम उम्र में बाल सफेद होना, आंखें कमजोर होना, मानसिक विकार जैसे तनाव, डिप्रेशन, स्वभाव में बदलाव, गुस्सा आना, क्रोनिक ब्रॉन्काइटिस के अलावा कार्डियक अस्थमा की मूल वजह जुकाम हो सकता है। सर्वाइकल स्पोंडिलाइसिस भी जुकाम से होता है क्योंकि इस दौरान बलगम दिमाग की नसों में जमता रहता है जिससे गर्दन व दिमाग के आसपास के भाग पर दबाव बढ़ता जाता है।
डिसमेनोरिया : 
  कुछेक महिलाओं को माहवारी के दौरान विशेषकर पेट के निचले हिस्से में ज्यादा दर्द रहता है। यह तनाव लेने, मानसिक व शारीरिक कमजोरी व खानपान में असंतुलित भोजन की वजह से भी हो सकता है। ऐसे में एकोनाइट, बेलाडोना, अब्रोमा, एपिस, पल्सेटिल दवा देते हैं।
अनियमितता :
  जिन्हें माहवारी के दौरान रक्तस्त्राव कम या ज्यादा और अनियमित हो तो कैल्केरिया फॉस, कैल्केरिया कार्ब, फैरम फॉस, एलुमिना दवाएं दी जाती हैं।
इन्फैन्टाइल ल्यूकेरिया : विशेषकर 6 से 12 वर्ष की लड़कियों में पेट में कीड़ों की वजह से वाइट डिस्चार्ज की समस्या होती है जो शरीर में कमजोरी का भी कारण बनती है। ऐसे में कैल्केरिया कार्ब, आयोडम, सिपिया दवा से इलाज होता है।


12.3.17

शिशु रोगों की घरेलू चिकित्सा नुस्खे


छोटा शिशु जब किसी व्याधि से ग्रस्त होता है, तब बड़ी परेशानी होती है, क्योंकि बच्चा बोल नहीं सकता तो यह बता नहीं पाता कि उसे तकलीफ क्या है। वह सिर्फ रोने की भाषा जानता है और रोए जाता है।
माँ बेचारी परेशान हो जाती है कि बच्चा रो क्यों रहा है, इसे चुप कैसे किया जाए, क्योंकि वह बच्चे को बहलाने और चुप करने की जितनी कोशिश करती है, बच्चा उतना ही रोता जाता है। यहाँ कुछ ऐसी व्याधियों की घरेलू चिकित्सा प्रस्तुत की जा रही है, जो बच्चे के रोने का कारण होती है।

कान दर्द :
छोटा शिशु कान की तरफ हाथ ले जाकर रोता हो तो माँ अपने दूध की 2-2 बूँद कानों में टपका दे। यदि कान दुखने से बच्चा रोता होगा तो चुप हो जाएगा, क्योंकि कान का दर्द मिट चुका होगा। 


बिस्तर में पेशाब
यह आदत कई बच्चों में होती है और बड़े होने तक बनी रहती है | ऐसे बच्चों को 1 कप ठंडे फीके दूध में 1 चम्मच शहद घोल कर सुबहशाम 40 दिन तक पिलाना चाहिए । और तिलगुड़ का एक लड्डू रोज खाने को देना चाहिए | बच्चे को समझा दें कि खूब चबाचबा कर खाए | शहद वाला 1 कप दूध पीने को दें |
सिर्फ 1 लड्डू रोज सवेरे खाना पर्याप्त है | लाभ न होने तक सेवन कराएं और चाहें तो बाद में भी सेवन करा सकते हैं | बच्चे को पेशाब करा कर सुलाना चाहिए और चाय पीना बंद कर देना चाहिए | शाम होने के बाद गरम पेय या शीतल पेय पीने से भी प्रायः बच्चे सोते हुए पेशाब कर देते हैं |
पेट दर्द :
पेट में दर्द होने से शिशु रो रहा हो तो पेट का सेक कर दें और पानी में जरा सी हींग पीसकर पतला-पतला लेप बच्चे की नाभि के चारों तरफ गोलाई में लगा दें, आराम हो जाएगा।
पेट के कीड़े :
छोटे बच्चों को अकसर पेट में कीड़े हो जाने की शिकायत हो जाया करती है। नारंगी के छिलके सुखाकर कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें, वायविडंग को भी कूट-पीसकर महीन चूर्ण कर लें। दोनों को बराबर मात्रा. में लेकर मिला लें।
इस मिश्रण को आधा चम्मच (लगभग 3 ग्राम) गर्म पानी के साथ बच्चे को दिन में एक बार, तीन दिन तक, सेवन करा कर चौथे दिन एक चम्मच केस्टर ऑइल दूध में डालकर पिला दें। दस्त द्वारा मरे हुए कीड़े बाहर निकल जाएँगे।
   छोटे बच्चों की गुदा में चुरने कीड़े हो जाते हैं, जो गुदा में काटते हैं, जिस से बच्चा रोता है, सोता नहीं | मिट्टी के तेल में जरा सी रुई डुबो कर इस फाहे को बच्चे की गुदा में फंसा देने से चुरने कीड़े मर जाते हैं और बच्चे को आराम मिल जाता है |
काग ( कउआ) का गिरना
पहचान – इस रोग में गले के पास अंदर की तरफ जो काग होता है, उसमे सूजन आ जाती है तथा भयानक दर्द होता है |
* यदि प्यास भी बहुत लगती हो तो पीपल की छाल को जलाकर थोड़े पानी में बुझाकर पानी पिलाये | इससे प्यास भी जाती रहेगी और काग को भी लाभ होगा |
*काली मिर्च और चूल्हे की मिट्टी पीसकर अंगूठे पर लगाकर काग को उठा देने से वह फिर से नही गिरता |
दस्त ठीक न होना – 
सौफ को अच्छी प्रकार पीस कर छानकर उसमे शक्कर मिलाकर खिलायें | इससे दस्त साफ़ जायेगा|
खांसी – 
 दानेदार मक्के का भुट्टा जलाकर उसमे शहद या नमक मिलाकर खिलाने से खांसी ठीक हो जाती है |
बच्चों का सूखा रोग–
आज कल यह रोग बच्चो में प्राय: देखा जाता है | इसके लिए अद्भुत औषधि यह है कि रविवार या मंगलवार के दिन बंन भोगी की पत्तिया उखाड़ लावे और उस पत्ती को दोनों हाथों से मल-मल के उसके अर्क को बच्चो के कानो में चार बूंद टपकावे तथा सिर के तालू पर, हाथ पैर के उंगलियों के नहो में तथा पैर के तालू में अच्छी तरह लगा दे और थोड़ा पूरे शरीर में लगा दे | इससे सुखा रोग अवश्य दूर हो जाएगा |
बच्चों की मिर्गी –
 बारह दिन तक काली मिर्च गाय के दूध में भिगोवे रखे फिर निकाल कर सुखा दे | जब मिर्गी का दौरा हो तो पानी में घिसकर उसका हुलास दे | इससे दौरा बंद हो जायेगा |
बच्चों की आँखों में सुर्खी–
 फिटकरी भूनकर तीन मासा फिटकरी में एक तोला गाय का मक्खन मिला दे | मक्खन को पानी से सात बार धो लें | सोते समय आँखों पर दो-तीन बार लेप करे | इससे सुर्खी जाती रहेगी और आंख साफ़ हो जायेगी
 
बच्चों का डब्बा रोग
1. मूंगे को गरम करके दोनों भौहों के बीच में दाग देने से तुरंत फायदा होता है |
2. पेट के ऊपर बकायन के पत्ते गरम करके बाँधने से शीघ्र लाभ होगा |
3. पेट के ऊपर अंडी का तेल मलने से बच्चे की पसली चलनी बंद हो जाएगी |
काली खांसी – 
तवे की स्याही खुरच कर पानी में मिलाने से काली खांसी जाती रहती है|
बुखार – दिन में तीन बार एक एक रत्ती सत्त-गिलोय दें | इससे हर प्रकार का बुखार जाता रहेगा |
बच्चों के दांत – 
शहद के साथ भुना हुआ सुहागा मिलाकर मसूढ़ों पर मलने और चटाने से दांत आसानी से निकलते है |

11.3.17

लकवा (पैरालिसिस): घरेलु उपचार,चिकित्सा



पुरादेवऽसुरायुद्धेहताश्चशतशोसुराः।
हेन्यामान्यास्ततो देवाः शतशोऽथसहस्त्रशः।

जीवन मे चाहे धन, एश्वर्य, मान, पद, प्रतिष्ठा आदि सभी कुछ हो, परंतु शरीर मे बीमारी है तो सब कुछ बेकार है ओर जीवन भी नीरस है। ऐसी ही एक बीमारी है पक्षाघात, जिससे पीड़ित व्यक्ति जीवनभर सारे परिवार पर बोझ बन जाता है।
लकवा को आयुर्वेद में पक्षाघात रोग भी कहते हैं। इस रोग में रोगी के एक तरफ के सभी अंग काम करना बंद कर देते हैं जैसे बांए पैर या बाएं हाथ का कार्य न कर पाना। साथ ही इन अंगों की दिमाग तक चेतना पहुंचाना भी निष्क्रिय हो जाता है। और इस रोग की वजह से अंगों का टेढापन, शरीर में गरमी की कमी और कुछ याद रखने की क्रिया भी नष्ट हो जाती है। लकवा रोग में इंसान असहाय सा हो जाता है। और दूसरों पर हर काम के लिए निर्भर होना पड़ता है। आयुर्वेद में लकवा के प्रभाव को कम करने के अनेक उपाय दिए गए हैं।
*ज्यादातर प्रौढ़ आयु के बाद ही होता है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से बनने लगती है।
*युवावस्था में की गई गलतियाँ-भोग-विलास में अति करना, मादक द्रव्यों का सेवन करना, आलसी रहना आदि कारणों से शरीर का स्नायविक संस्थान धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, इस रोग के आक्रमण की आशंका भी बढ़ती जाती है।
*जब एक या एकाधिक मांसपेशी समूह की मांसपेशियाँ कार्य करने में पूर्णतः असमर्थ हों तो इस स्थिति को पक्षाघात या लकवा मारना कहते हैं। पक्षाघात से प्रभावी क्षेत्र की संवेदन-शक्ति समाप्त हो सकती है या उस भाग को चलना-फिरना या घुमाना असम्भव हो जाता है। यदि दुर्बलता आंशिक है तो उसे आंशिक पक्षाघात कहते हैं।

लकवा, जिसे फालिज या पक्षाघात कहते हैं,
ध्यान देने योग्य एक बात यह; कि सिर्फ आलसी जीवन जीने से ही नहीं, बल्कि इसके विपरीत अति भागदौड़, क्षमता से ज्यादा परिश्रम या व्यायाम, अति आहार आदि कारणों से भी लकवा होने की स्थिति बनती है।
*ज्यादातर प्रौढ़ आयु के बाद ही होता है, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि बहुत पहले से बनने लगती है।
*युवावस्था में की गई गलतियाँ-भोग-विलास में अति करना, मादक द्रव्यों का सेवन करना, आलसी रहना आदि कारणों से शरीर का स्नायविक संस्थान धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। जैसे-जैसे आयु बढ़ती जाती है, इस रोग के आक्रमण की आशंका भी बढ़ती जाती है।
*जब एक या एकाधिक मांसपेशी समूह की मांसपेशियाँ कार्य करने में पूर्णतः असमर्थ हों तो इस स्थिति कोया लकवा मारना कहते हैं। पक्षाघात से प्रभावी क्षेत्र की संवेदन-शक्ति समाप्त हो सकती है या उस भाग को चलना-फिरना या घुमाना असम्भव हो जाता है। यदि दुर्बलता आंशिक है तो उसे आंशिक पक्षाघात कहते हैं।
कारण
*पक्षाघात तब लगता है जब अचानक मस्तिष्क के किसी हिस्से मे रक्त आपूर्ति रुक जाती है या मस्तिष्क की कोई रक्त वाहिका फट जाती है और मस्तिष्क की कोशिकाओं के आस-पास की जगह में खून भर जाता है। जिस तरह किसी व्यक्ति के हृदय में जब रक्त आपूर्ति का आभाव होता तो कहा जाता है कि उसे दिल का दौरा पड़ गया है उसी तरह जब मस्तिष्क में रक्त प्रवाह कम हो जाता है या मस्तिष्क में अचानक रक्तस्राव होने लगता है तो कहा जाता है कि आदमी को मस्तिष्क का दौरा पड़ गया है।
शरीर की सभी मांस पेशियों का नियंत्रण केंद्रीय तंत्रिकाकेंद्र (मस्तिष्क और मेरुरज्जु) की प्रेरक तंत्रिकाओं से, जो पेशियों तक जाकर उनमें प्रविष्ट होती हैं,से होता है। अत: स्पष्ट है कि मस्तिष्क से पेशी तक के नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग में, या पेशी में हो, रोग हो जाने से पक्षाघात हो सकता है। सामान्य रूप में चोट, अबुद की दाब और नियंत्रणकारी अक्ष के किसी भाग के अपकर्ष आदि, किसी भी कारण से उत्पन्न प्रदाह का परिणाम आंशिक या पूर्ण पक्षाघात होता है।
दरअसल मस्तिष्क की धमनी में किसी रुकावट के कारण उसके जिस भाग को खून नहीं मिल पाता है, मस्तिष्क का वह भाग निष्क्रिय हो जाता है। अब यह तो सभी जानते हैं कि हमारे मस्तिष्क की इंद्रियां हमारे शरीर के हर अंग को संचालित करती हैं। वे विविध अंगों से जुड़ी होती हैं, उन्हें कंट्रोल करती हैं।तो इसका मतलब यह हुआ कि यदि दिमाग का कोई भाग प्रभावित हो जाए, तो वह भाग शरीर के जिन अंगों से जुड़ा होता है, उन्हें काम करने के लिए अपना आदेश नहीं भेज पाता है। इसी कारण से वे अंग हिलडुल नहीं सकते, जिस कारण जन्म लेती है लकवे की बीमारी।
 हमारे मस्तिष्क का बायां भाग शरीर के दाएं अंगों पर तथा मस्तिष्क का दायां भाग शरीर के बाएं अंगों पर नियंत्रण रखता है। मस्तिष्क के अलावा यदि व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी में कोई दिक्कत आए, तब भी पैरालिसिस का खतरा बना रहता है। क्योंकि इसी रीढ़ की हड्डी की इंद्रियां मस्तिष्क तक जाती हैं। विज्ञान की भाषा में रीढ़ की हड्डी में छोटा दिमाग होने का भी दावा किया जाता है।
जो लोग नशीली चीजों का सेवन करते हैं, वे भी लकवा होने का शिकार हो सकते हैं। इसके साथ ही यदि कोई व्यक्ति अत्यधिक नशीली दवाइयों का सेवन कर रहा है, तो उसे भी यह रोग जकड़ सकता है। इसके अलावा शराब तथा धूम्रपान का अत्यधिक सेवन करना तो लकवा होने का कारण बन ही सकता है।जो व्यक्ति अधिक मात्रा में गैस पैदा करनेवाले पदार्थों का सेवन करते हैं, अव्यवस्थित व अत्यधिक संभोग करते हैं, विषम आहार का सेवन करते हैं, ज्यादा व्यायाम करते हैं उन्हें भी यह रोग चपेट में ले लेता है। इसके अलावा उल्टी या दस्तों का अधिक होना, मानसिक दुर्बलता, अचानक शॉक लगने आदि कारणों से भी पक्षाघात या लकवा हो जाता है।
लक्षण
लकवा आधे शरीर की नाड़ियों व नसों को सुखाकर रक्त संचरण में व्यापक बाधा पहुंचा देता है। इसके कारण शरीर की संधियों तथा जोड़ों में शिथिलता आ जाती है। ग्रसित अंग स्वयं उठ नहीं पाते, भार उठाने तथा चलने की क्षमता पूर्णत: समाप्त हो जाती है। यदि मुंह लकवाग्रस्त हो जाए तो मुंह के अंग भी स्थिर हो जाते हैं, गरदन एक तरफ झुक जाती है, बोलने की शक्ति नष्ट हो जाती है, आखों में दर्द व फड़कन आ जाती है। शरीर में कपकपी होने लगती है। व्यक्ति कुरूप दिखने लगता है।
 
*सौंठ और उड़द उबालकर इसका पानी पीने से लकवा ठीक होता है। यह परीक्षित प्रयोग है।
* 6 ग्राम कपास की जड़ का चूर्ण, 6 ग्राम शहद में मिलाकर सुहब शाम लेने से लाभ होता है।
*लहसुन की 5-6 काली पीसकर उसे 15 ग्राम शहद में मिलाकर सुबह-शाम लेने से लकवा में आराम मिलता है।
* लकवा रोगी का ब्लड प्रेशर नियमित जांचते रहें। अगर रोगी के खून में कोलेस्ट्रोल का लेविल ज्यादा हो तो उपाय करना वाहिये।खजूर खुछ दिन तक रोज दूध के साथ खाने से लकवा की बीमारी में फायदा होता है.
नासपती, एप्पल,अंगूर इन सबका बराबर मात्र में जूस बनाकर देने से फायदा होता है ये कुछ दिनों उपाय नियमित करने से लकवा की बीमारी दूर होती है.
तुलसी के पत्ते लेकर उबालकर देने से लकवा के रोगी के अंग को बफ देने से लकवा ठीक होने लगता है.
*योग से सब बीमारी से बच सकते है, प्राणायाम और कपालभाति करने से लाभदायी है.
*अंगूरः अंगूर के रस में बग्गूगोशा या नाशपाती का रस मिलाकर रोगी को नियमित रूप से दिन में दो बार पिलाएं|
*काजूः लकवाग्रस्त व्यक्ति को काजू का भरपूर सेवन कराना चाहिए। 
*किशमिशः नियमित रूप से किशमिश के सेवन से इस रोग में काफी लाभ होता है।
सफ़ेद कनेर की जड की छाल और काला धतूरा के पत्ते बराबर वजन में लेकर सरसों के तेल में पकावें। यह तेल लकवाग्रस्त अंगों पर मालिश करें। अवश्य लाभ होगा।
*लहसुन की ५ कली दूध में उबालकर लकवा रोगी को नित्य देते रहें। इससे ब्लडप्रेशर ठीक रहेगा और खून में थक्का भी नहीं जमेगा।
*दूध और केले  में पोटैशियम ,कैल्शियम,और मैग्नेशियम का प्रमाण ज़्यादा है ये कोलेस्ट्रॉल  को कम करता है जिसे लकवा की बीमारी से दूर होती है|
मैग्नीशियम से भरपूर फ़ूड ऐसे आहर जिसमे अधिक  मात्रा में मैग्नीशियम हो , उसको खाने से 30% तक लकवा होने की सम्भावना कम हो जाती है
*कुछ दिनों रोज छुहारों को दूध में भिगोकर रोगी को देते रहने से लकवा ठीक होने लगता है। सौंठ और उड़द को पानी में मिलाकर हल्का गरम करके रोगी को नित्य पिलाने से लकवा ठीक हो जाता है। 
*1 चम्मच काली मिर्च को पीसकर उसे 3 चम्मच देशी घी में मिलाकर लेप बना लें और लकवाग्रसित अंगों पर इसकी मालिश करें.एैसा करने से लकवा ग्रस्त अंगों का रोग दूर हो जाएगा। 6 कली लहसुन को पीसकर उसे 1 चम्मच मक्खन में मिला लें और रोज इसका सेवन करें। तुलसी के पत्तों, दही और सेंधा नमक को अच्छे से मिलाकर उसका लेप करने से लकावा ठीक हो जाता है.
*एक बड़ी जानकारी मिलने के बाद हमको पता चलता है हमारी भागदौड़ वाली लाइफ में जंकफूड सबसे जवाबदार है बाहर का खाने से ५८% लकवा की बीमारी की सम्भावना बढ़ सकती है लकवा से बचने के लिए बाहर का खाना छोड़ दीजिये और ये सब का सेवन करना शुरू करें.
 
*अखरोटः 
अखरोट के तेल की मालिश और सेमल के पत्तों का बफारा लेने से मुंह का लकवा जल्दी ठीक हो जाता है।
रोगी तमाम नशीली चीजों से परहेज करे। भोजन में तेल,घी,मांस,मछली का उपयोग न करे।
*बरसात में निकलने वाला लाल रंग का कीडा वीरबहूटी लकवा रोग में बेहद फ़ायदेमंद है। बीरबहूटी एकत्र करलें। छाया में सूखा लें। सरसों के तेल पकावें।इस तेल से लकवा रोगी की मालिश करें। कुछ ही हफ़्तों में रोगी ठीक हो जायेगा। इस तेल को तैयार करने मे निरगुन्डी की जड भी कूटकर डाल दी जावे तो दवा और शक्तिशाली बनेगी।
*अगर शरीर का कोई अंग या शरीर दायीं तरफ से लकवाग्रस्त है तो उसके लिए व्रहतवातचिंतामणि रस ले। उसमे छोटी-छोटी गोली (बाजरे के दाने से थोड़ी सी बड़ी) मिलेंगी। उसमे से एक गोली सुबह ओर एक गोली साँय को शुद्ध शहद से लेवें।
कुछ दिनों तो रोज छुहारों को दूध में भिगोकर रोगी को देते रहने से लकवा ठीक होने लगता है।
*सौंठ और उड़द को पानी में मिलाकर हल्की आंच में गरम करके रोगी को नित्य पिलाने से लकावा ठीक हो जाता है। >नाशपाती, सेब और अंगूर का रस बराबर मात्रा में एक ग्लिास में मिला लें। और रोगी को देते रहें। कुछ समय तक यह उपाय नित्य करना है तभी फायदा मिलेगा।
*1 चम्मच काली मिर्च को पीसकर उसे 3 चम्मच देशी घी में मिलाकर लेप बना लें और लकवाग्रसित अंगों पर इसकी मालिश करें। एैसा करने से लकवा ग्रस्त अंगों का रोग दूर हो जाएगा।
*करेले की सब्जी या करेले का रस को नित्य खाने अथवा पीने से लकवा से प्रभावित अंगों में सुधार होने लगता है। यह उपाय रोज करना है।
*प्याज खाते रहने से और प्याज का रस का सेवन करते रहने से लकवा रोगी ठीक हो जाता है।
*6 कली लहसुन को पीसकर उसे 1 चम्मच मक्खन में मिला लें और रोज इसका सेवन करें। लकवा ठीक हो जाएगा।
*तुलसी के पत्तोंए दही और सेंधा नमक को अच्छे से मिलाकर उसका लेप करने से लकावा ठीक हो जाता है। ये उपाय लंबे समय तक करना होगा।
गरम पानी में तुलसी के पत्तों को उबालें और उसका भाप लकवा ग्रस्ति अंगों को देते रहने से लकवा ठीक होने लगता है।
*आधा लीटर सरसों के तेल में 50 ग्राम लहसुन डालकर लोहे की कड़ाही में पका लें। जब पानी जल जाए उसे ठंडा होने दें फिर इस तेल को छानकर किसी डिब्बे में डाल लें। और इस तेल से लकवा वाले अंगों पर मालिश करें।
 
*धतूरे के बीजों को सरसों के तेल में मंदी आंच में पका लें और इसे छानकर लकवा से ग्रसित अंग पर मालिश करें।
*लकवा से ग्रसित हिस्से पर बादाम के तेल,सरसों के तेल,निर्गुण्डी का तेल आदि की मालिश करनी चाहिए।
मक्खन और लहसुन
मक्खन और लहसुन भी लकवा की बीमारी में राहत देते हैं। आप मक्खन के साथ लहसुन की चार कलियों को पीसकर सेवन करें।
सोंठ व दालचीनी
एक गिलास दूध में थोड़ी सी दालचीनी और एक चम्मच अदरक का पाउडर मिलाकर उबाल लें। और नियमित इसका सेवन करें। इस कारगर उपाय से लकवा रोग में आराम मिलता है।
लकवा में क्या खाएं क्या ना खाएं।
लकवा होने पर इन चीजों का सेवन जरूर करें
परवल
करेला
गेहूं की रोटी
लहसुन
बाजरे की रोटी
तरोई
फली।
इन फलों का सेवन करें
आम
चीकू
पपीता और
अंजीर।
इसके अलावा सुबह और शाम दूध का सेवन करें।
क्या ना खाएं
तली हुई चीजें
बेसन
चना
दही
चावल
छाछ
और साग का सेवन ना करें।
त्रिफला का सेवन करने से भी लकवा ठीक हो सकता है।
लकवा का सही समय पर इलाज न होने से रोगी एक अपाहिज की जिंदगी जीने को मजबूर हो जाता है इसलिए समय रहते लकवा का उपचार कराना जरूरी है। आयुवेर्दिक तरीकों से लकवा पूरी तरह से ठीक किया जा सकता है। ये उपाय लंबे समय तक लगातार करने से ही फायदा देगें। इसलिए धैर्य जरूर रखें।

10.3.17

दस्त रोकने के घरेलू उपचार::Home remedies for loose motions


दस्त लगना या डायरिया एक बहुत ही कॉमन प्रॉब्लम होती है। खाने या पानी को लेकर कि गई थोड़ी सी लापरवाही भी इस समस्या का कारण बन सकती है। दस्त लगने पर शरीर के मिनरल्स और पानी शरीर से तेजी से बाहर हो जाते हैं, जिससे मरीज को कमजोरी महसूस होने लगती है।
जब भी लगातार पतला दस्त आए या फिर उल्टी आए तो उसे हम डायरिया कहते हैं। डायरिया हमें वायरल, बैक्टीरियल संक्रमण के कारण होता है, लेकिन इसका सबसे मुख्य कारण हमारा गलत तरीके से खानपान, प्रदूषित पानी और हमारी आंतो में गड़बड़ी डायरिया जैसी बीमारी को जन्म देते हैं। दिन में यदि हमें तीन या इससे अधिक बार हमें पतला दस्त आता है, तो यह डायरिया की तरफ इशारा करता है। डायरिया होने पर हमारे शरीर में पानी की कमी आने लगती है, जिसके कारण हमें डिहाइड्रेशन हो जाता है, जो हमारे लिए किसी भयानक बीमारी से कम नहीं है, क्योंकि इससे हमारा शरीर कमज़ोर होने लगता है, जिससे शरीर में संक्रमण फैलने का खतरा अधिक हो जाता है। यह बीमारी अधिकतर रूप से हमें सर्दियों के दिनों में देखने को मिलती है, इसकी सबसे बड़ी वजह है गंदा पानी। यह किसी भी उम्र वाले व्यक्ति को हो सकती है। इसकी एक वजह एसिडिटी भी हो सकती है।
डायरिया का लक्षण…
1. बार-बार पतले (पानी की तरह ) दस्त आना।
2. आंतों में सुजन होना।
3. उल्टी आना।
4. दस्त में खून आना।
5. एसिडिटी होना।
6. शरीर में कमज़ोरी आना आदि डायरिया के लक्षण होते हैं|

डायरिया के कारण
आमतौर पर डायरिया जैसी परेशानी का सामना हमें तब करना पड़ता है, जब हम बाहर की वस्तुओं का अधिक सेवन करते हैं। इसके इलावा जब भी डायरिया हमें सर्दियों के दिनों में होता है, तो यह गर्मियों के मुकाबले अधिक घातक होता है। ठंड के मौसम में हमारे शरीर का तापमान कम हो जाता है, जिसके कारण हमें उल्टी या दस्त होने लगती है। इसके अलावा इसके और भी कई कारण है जैसे कि…
1. पेट में कीड़ो के संक्रमण से डायरिया हो सकता है।
2. आस-पास सफाई का न होना।
3. शरीर में पानी की कमी होना।
4. दवाई रिएक्श्न होना।
5. पानी में अधिक समय रहना।
6. पाचन शक्ति का कमज़ोर होना।
7. सर्दियों में कई दिनों तक रखा खाना खा लेना आदि से डायरिया हो सकता है।
डायरिया में अपनाएं ये घरेलू नुस्खे
मेथीदाना -

 मेथीदाना में एंटीबैक्टिरियल और एंटीफंगल प्रॉपर्टीज पाई जाती हैं। एक चौथाई चम्मच मेथीदाना पाउडर ठंडे पानी से लें। इससे पेट की गर्मी छट जाएगी और दस्त की समस्या से मुक्ति मिल जाएगी। यह पाउडर खाली पेट दो से तीन दिनों तक लेना चाहिए। बहुत जल्दी आराम मिलता है।
*शहद -

शहद भी इस समस्या में दवा का काम करता है। जब भी लूज मोशन की समस्या हो दिन भर में कम से कम दो से तीन चम्मच शुद्ध शहद खाएं। एक चम्मच शहद में आधा चम्मच दालचीनी पाउडर मिलाकर लेने पर भी दस्त से राहत मिलती है।
कच्चा पपीता -

 कच्चा पपीता दस्त की समस्या में एक जबरदस्त दवा का काम करता है। कच्चे पपीता को छिलकर छोटे-छोटे टुकड़ों में काटकर उबाल लें। इस पानी को छानकर जब हल्का गर्म रह जाए तब पिएं। दस्त बंद हो जाएंगे। यह पानी दिनभर में दो से तीन बार पीना चाहिए।
*सरसों के बीज -

सरसों के बीज में एंटीबैक्टिरियल गुण पाए जाते हैं। इसीलिए इसे डायरिया की समस्या में रामबाण माना जाता है। सरसों के एक चौथाई चम्मच बीजों को एक कप पानी में एक घंटे के लिए भिगो दें। एक घंटे बाद इस पानी को छानकर पी लें। यह नुस्खा एक दिन में दो से तीन बार दोहराएं। डायरिया की समस्या से बहुत जल्दी आराम मिल जाएगा।
पानी-

एक किलो पानी उबालें । चौथाई पानी रहने पर साफ कपड़े से छान लें। हल्का गर्म रहने पर इसे पीयें। इससे दस्त आना बन्द होते हैं, भूख अच्छी लगती है; आफरा, पेट दर्द, कब्ज, हिचकी, उल्टी होना ठीक हो जाते हैं। –
जब पानी जैसी पतली टट्टी होती है, तो उसे ‘दस्त होना’ कहा जाता है। दस्त का रंग या कारण कुछ भी हो सकता है, परन्तु एक बार दस्त होना गम्भीर खतरे का संकेत देता है। यह एक जानलेवा रोग है जो किसी भी, विशेषकर कमजोर व्यक्तियों और छोटे बच्चों को हो सकता है। इस रोग से बचने के लिए निम्न उपाय हैं- –
जब तक हो सके, बच्चे को माँ का दूध पिलायें। बच्चे को दूध पिलाने के लिए बोतल के बजाय कटोरी व चम्मच ही काम में लें । ।
*पीने का पानी ढक कर रखें। पानी लेने के लिए हत्थेदार लोटे का प्रयोग करें। स्वच्छ जल-स्रोतों से ही पेयजल भरें।
भोजन की चीजें ढक कर रखें और मक्खियों से बचायें। बासी भोजन नहीं करें। कटे एवं सड़े फल तथा मक्खियाँ बैठे पदार्थों का सेवन भी नहीं करें। भोजन बनाने अथवा खाने से 
पहले अच्छी तरह से हाथ धोयें। . रहने की जगह से दूरी पर शौच करें।
नींबू - 

नींबू के रस में एंटी इंफ्लामेट्री प्रॉपर्टीज पाई जाती हैं। इससे पेट आसानी से साफ हो जाता है। यह डायरिया की समस्या से राहत देने वाला बहुत प्राचीन नुस्खा है। एक नींबू के रस में एक चम्मच नमक और थोड़ी चीनी मिलाकर अच्छे से मिक्स करने के बाद पिएं। हर एक घंटे में ये घोल बनाकर पीने से डायरिया में बहुत जल्दी आराम मिलता है। इस नुस्खे को अपनाने के साथ ही हल्का खाना लें। इससे आपको इस समस्या से जल्दी छुटकारा मिल जाएगा।
* अनार -

अनार लूज मोशन्स की समस्या में रामबाण दवा की तरह काम करता है। अनार के बीजों को चबाएं। दिनभर में कम से कम दो बार अनाज का जूस पिएं। अनार की पत्तियों को पानी में उबाल लें। इस पानी को छानकर पीने से भी दस्त में आराम मिलता है
*जब कभी दस्त लगें हों तो एक चम्मच जीरा (5 ग्राम) हल्का भूनकर पीस लीजिये, अभी इसको तुरंत दही या दही की लस्सी के साथ लेने से तुरंत लाभ हो जाता है.
*मरोड़ के साथ पतले दस्त लगें तो जीरा और उतनी ही मात्रा में सौंफ को भून लीजिये, इन दोनों को पीसकर मिला लीजिये, अभी 1 चम्मच दिन में 3-4 बार लेने से मरोड़ के साथ लगने वाले पतले दस्त में तुरंत लाभ होता है.
केला
केले में काफी मात्रा में पौटेशियम होते हैं, इसलिए डायरिया वाले रोगी को दिन में दो से तीन पके हुए केलों का सेवन करना चाहिए।
चावल
डायरिया होने पर हमें चावल का सेवन करना चाहिए, क्योंकि चावल खाने से हमें दस्त कम आते हैं। ऐसे में आप को सादा चावल को थोडा गीला करके खाना चाहिए। इसके साथ आप दही का सेवन भी कर सकते हो।
गाजर का सूप
डायरिया होने पर हमारे शरीर के पोषक तत्वों में कमी आ जाती है, ऐसे में गाजर का सूप हमारे लिए बहुत ही फायदेमंद होता है। इसका सूप बनाने के लिए इसके छोटे छोटे टुकडों को काटकर पानी में तब तक उबाले जब तक गाजर अच्छे से घुल न जाए, फिर इस पानी को छान लें। फिर इसमें स्वादानुसार नमक,भुना हुआ जीरा और काली मिर्च पाउडर मिलाकर पी लें।
दही
हम जानते हैं कि दही में बैक्टीरिया होता है। जब हम डायरिया होने पर दही का सेवन करते हैं तो जो हमारे शरीर में विषैले बैक्टीरिया होते हैं उनका नाश हो जाता है।
सेब का सिरका
सेब के सिरके में एसिडिक गुण होते हैं, जो डायरिया के बैक्टीरिया को खत्म करने में बहुत ही फायदेमंद होते हैं। लेकिन जब भी आप इसका सेवन करते हैं, तो एक गिलास पानी में एक चम्मच सिरका मिलाकर पी लेना चाहिए और इसे दिन में दो से तीन बार पीना चाहिए। ऐसा करने से आपका डायरिया ठीक हो जाता है।
अदरक
डायरिया में अदरक बहुत ही फायदेमंद होता है, अदरक को कद्दूकस करके इसमें शहद मिलाकर खाएं फिर इसके तुरंत बाद ही पानी पी लें।
*एक छोटा चम्मच पावडर किया हुआ अदरक, दालचीनी, जीरा में ज़रूरत के अनुसार शहद डालकर पेस्ट जैसा बना लें। इस पेस्ट का सेवन दिन में तीन बार करने से दस्त से जल्दी राहत मिल जाता है। क्योंकि इसका एन्टी-बैक्टिरीअल (anti bacterial), एन्टी ऑक्सिडेंट (anti oxidant), एन्टी फंगल गुण जीवाणुओं से लड़कर दस्त को रोकने में मदद करता है। इस घरेलू मिश्रण का इस्तेमाल उपचार के रूप में सदियों से किया जा रहा है।
*एक कप बिना चीनी के ब्लैक टी का सेवन दस्त के कष्ट को दूर करने में बहुत मदद करता है। ब्लैक टी का रोगजनक (pathogenic) गुण दस्त को विकारों से लड़ने में बहुत मदद करता है।
• केला-

एक केला को मैश करके उसमें एक चुटकी नमक और एक छोटा चम्मच इमली का गूदा डालकर पेस्ट जैसा बनाकर दिन में दो बार इसका सेवन करने से जल्दी ही इसके कष्ट से राहत मिल जाता है। केला शरीर से ज़रूरी पोषक तत्वों   को रोकने और जल की मात्रा को संतुलित रखने में बहुत मदद करता है ।
लौकी-
लौकी का रायता दस्तों में लाभदायक है। * पोदीना-दस्तों में आधा कप पोदीने का रस हर दो घण्टे से पिलायें। चावल-चावल बनाने के पश्चात् इसका उबला हुआ पानी जिसे माण्ड कहते हैं, फेक देते है। यह माण्ड दस्तों में लाभदायक है। बच्चों को आधा कप, बड़ों को एक कप प्रति घण्टे पिलाने से दस्त बन्द हो जाते हैं। छोटे शिशुओं को अल्प मात्रा में पिला सकते हैं। इस माण्ड में नमक स्वाद के अनुसार मिलाने से यह स्वादिष्ट, पौष्टिक और सुपाच्य हो जाता है। अधिक समय रखने से बदबू देने लगता है। माण्ड को छ: घण्टे से अधिक पड़ा न रहने दें। माण्ड बनाने की सरल विधि यह है कि सौ ग्राम चावल आटे की तरह पीस लें, इसे एक लीटर पानी में उबालें। भली प्रकार उबालने के पश्चात् इसे छानकर स्वादानुसार नमक मिला लें। इसे उपर्युक्त ढंग से पीएँ, दस्तों में लाभकारी पायेंगे। दस्तों में चावल उत्तम खाद्य है। चावल दही में मिला कर खायें।

खस-
खस-दो चम्मच खस-खस में पानी डाल कर चौथाई कप दही में मिला कर नित्य दो बार छ: घण्टे के अन्तर से खाने से पेचिश, मरोड़ और दस्त ठीक हो जाते हैं। खसखस की खीर बनाकर खाने से भी लाभ होता है।
धनिया-

हरा धनिया, काला नमक, काली मिर्च मिलाकर चटनी बना कर चटाने से लाभ मिलता है। यह सुपाच्य रहती है। पिसे हुए धनिये को सेक कर एक-एक चम्मच पानी से फैकी लेने से दस्त बन्द हो जाते हैं। दस्तों में अॉव, मरोड़ हो तो धनिया के काढ़े में मिश्री मिलाकर पिलावें। खाने के बाद दस्त हों तो पिसे हुए धनिये में स्वादानुसार काला नमक मिलाकर भोजन के बाद एक चम्मच ठंडे पानी से नित्य दो बार फॅकी लें।
मसूर की दाल व चावल-

ये दस्त और पेचिश के रोगियों के लिए उत्तम् भोजन है। गेहूँ-सौंफ को बारीक पीस लें। इसे पानी में मिलायें। इस सौंफ के पानी में गेहूँ का आटा ओषण कर रोटी बनाकर खाने से दस्त और पेचिश में लाभ होता है।
छाछ-

आधा पाव छाछ में 12 ग्राम शहद मिलाकर तीन बार पीने से दस्त बन्द हो जाते हैं। घी-दस्त होने पर आधा गिलास गर्म पानी में एक चाय की चम्मच गाय या भैस का देशी घी मिला कर सुबह-शाम दो बार पीयें। दस्त बन्द हो जायेंगे। बच्चों को कम मात्रा में उनके पीने की क्षमतानुसार दें। यह नुस्खा अनेक परिवारों में पीढ़ियों से प्रयोग किया जाता है।
सौंफ-

यदि मरोड़ देकर थोड़ा-थोड़ा मल आता हो तो तीन ग्राम कच्ची और तीन ग्राम भुनी हुई सौंफ मिलाकर, पीसकर, मिश्री मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है। छोटे बच्चों के पतले दस्त, पेचिश में छ: ग्राम सौंफ 82 ग्राम पानी में उबालें। जब पानी आधा रह जाय तो उसमें एक ग्राम काला नमक डाल दें। बच्चों को बारह ग्राम पानी दिन में तीन बार देने से बहुत लाभ होता है।
जब ज्यादा दस्त उल्टी होने के कारण बच्चे के शरीर में पानी, नमक और सोडियम की कमी हो जाए तो बच्चे को नमक और चीनी का घोल बनाकर बार-बार पिलाते रहना चाहिए। डायरिया का मतलब है बच्चे को बार-बार पानी के जैसे पतले दस्त होना जिसकी वजह से बच्चे के शरीर में पानी और नमक की कमी हो जाती है यह रोग ज्यादातर 6 महीने से लेकर 2 साल तक के बच्चों को होता है। नमक-चीनी का घोल बनाने की घरेलू विधि : एक गिलास उबले पानी में एक चुटकी भर पिसा हुआ नमक या एक चुटकी खाने वाला सोडा और एक चाय वाला चम्मच भर चीनी ( यदि ग्लूकोज मिलायें तो चीनी से आधी मात्रा मिलाएं और यदि गुड़ मिलाना हो तो सुपारी के बराबर गुड़) डालकर घोल बनाकर किसी, कांच के बर्तन में ढककर रख दें। इस घोल के पानी को 1-2 चम्मच हर आधे घंटे के बाद बच्चे को तब तक पिलाते रहे जब तक दस्त चालू रहे और बच्चे को 2 बार पेशाब न आ जाए।

श्वेत प्रदर (ल्युकोरिया) के घरेलू उपचार


श्वेत प्रदर याने ल्यूकोरिया महिलाओं में होने वाली आम बीमारी है। यह रोग नारी की तंदुरुस्ती का शत्रु है। आयुर्वेदिक मतानुसार कफ़ दोष के प्रकुपित होने पर यह रोग जन्म लेता है। /> श्वेत प्रदर या ल्यूकोरिया (Leucorrhea) सफेद पानी जाना महिलाओं का एक रोग है जिसमें स्त्री-योनि से असामान्य मात्रा में सफेद रंग का गाढा और बदबूदार पानी निकलता है और जिसके कारण वे बहुत क्षीण तथा दुर्बल हो जाती है। महिलाओं में श्वेत प्रदर रोग आम बात है। ये गुप्तांगों से पानी जैसा बहने वाला स्त्राव होता है। यह खुद कोई रोग नहीं होता परंतु अन्य कई रोगों के कारण होता है।
  प्रत्येक महिला को अपने जीवन में कभी न कभी इस रोग से रूबरू होना पड़ता है इस रोग के अधिक बढ़ जाने पर स्त्रियाँ बहुत कमजोर हो जाती हैं और कमर दर्द, सिरदर्द ,पिंडलियों की वेदना आदि लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं पेडू में और कभी कभी पेट में पीड़ा होना भी पाया जाता है।मासिक धर्म के पहले या बाद में यह शिकायत अधिक देखने में आती है यह रोग आसान घरेलू नुस्खों के प्रयोग से ठीक किया जा सकता है। ल्यूकोरिया के सम्बन्ध में अपने चिकित्सा अनुभव यहाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ -
१) एक ज्यादा पका केला पूरे एक चम्मच देशी घी के साथ खाएं। १५ दिन में फ़र्क नजर आएगा। एक महीना प्रयोग करें।
2)आंवला बीज का पावडर बनालें एक चम्मच पावडर शहद और सौंफ के साथ प्रातःकाल लें।
३) बेल फल का गूदा श्वेत प्रदर में उपयोगी सिद्ध हुआ है।
4) पाँव भर दूध में इतना ही पानी तथा एक चम्मच सुखा अदरक डालकर उबालें जब आधा रह जाय तो इसमें एक चम्मच शहद घोलकर पीयें बहुत गुणकारी है।
५) आयुर्वेदिक औषधि अशोकारिष्ट इस रोग में अत्यंत लाभप्रद सिद्ध होती है प्रदरान्तक चूर्ण का भी व्यवहार किया जाता है ।
६) भोजन में दही और लहसुन का प्रचुर प्रयोग लाभकारी होता है बाहरी प्रयोग के लिए लहसुन की एक कली को बारीक कपडे में लपेटकर रात को योनी के अंदर रखें , यह कीटाणु नाशक है ,इसी प्रकार दही को योनी के भीतर बाहर लगाने से श्वेत प्रदर में लाभ मिलता है।
१० ग्राम मेथी बीज पाव भर पानी में उबालें आधा रह जाने पर गरम गरम दिन में २ बार पीना उपादेय है।
८) छाछ ३-४ गिलास रोज पीना चाहिए इससे योनी में बेक्टीरिया और फंगस का सही संतुलन बना रहता है
९) गुप्त अंग को निम्बू मिले पानी से धोना भी एक अच्छा उपाय है फिटकरी का पावडर पानी में पेस्ट बनाकर योनी पर लगाने से खुजली और रक्तिमा में फायदा होता है। फ़िटकरी श्रेष्ठ जीवाणुनाशक है और सरलता से मिल जाती है। यौनि की भली प्रकार साफ़ सफ़ाई रखना बेहद जरूरी है। फ़िटकरी के जल से यौनि धोना अच्छा उपाय है।
१०) मांस मछली,मसालेदार पदार्थों का परहेज करें
११) भोजन में हरे पत्तेदार सब्जीयाँ और फल अधिक से अधिक शामिल करें।
१२) माजूफ़ल चूर्ण ५० ग्राम तथा टंकण क्षार २५ ग्राम लेकर भली प्रकार मिलाकर इसकी ५० पुडी बनालें सुबह -शाम एक पुडी शहद के साथ चाटने से श्वेत प्रदर रोग नष्ट हो जाता है।
१३) अशोकारिष्ट दवा ४-४ चम्मच बराबर पानी मिलाकर खाने के बाद दोनों समय लेना हितकारी उपाय है।
१४) सुपारी पाक एक चम्मच सुबह -शाम दूध के साथ लेने से श्वेत प्रदर रोग नष्ट होता है।
१५) गोंद को देसी घी में तलकर फ़िर शकर की चाशनी में डालकर खाने से श्वेत प्रदर रोग ठीक हो जाता है।
१६) शिलाजीत में असंख्य सूक्ष्म पोषक तत्व होते है। नियमित एक माह तक दूध के साथ सेवन करने से लाभ मिलता है।
१७) सिंघाडे के आटे का हलुवा श्वेत प्रदर में लाभकारी होता है।
१८) श्वेत प्रदर रोग निवारण में होम्योपैथिक दवाएं अति उपयोगी हैं। । रोग के लक्षण के मुताबिक औषधि का निर्वाचन किया जाता है। । ७-८ दवाएं एक साथ मिलाकर प्रयोग करने से भी बेहतर परिणाम की आशा की जा सकती है।
निम्न औषधियां ल्युकोरिया में उपयोगी साबित हुई हैं-
पल्सेटिला, कल्केरिया, हिपर सल्फ, कैलीक्यूर, बोविस्टा, बोरेक्स, ‍सिपिया, सेबाईना, क्रियोजोट, कार्बो एनिमेलिस, नेट्रम क्यूर, एल्यूमिना, हाईड्रैस्टिस, सल्फर, वाईवर्नम आपुलस इत्यादि। एक माह या कुछ अधिक समय तक ईलाज लेना हितकारी होता है
विशिष्ट परामर्श -
    श्री दामोदर 9826795656 द्वारा विनिर्मित " दामोदर नारी कल्याण " हर्बल औषधि स्त्रियों के सभी रोगों खासकर गर्भाशय संबन्धित रोगों मे परम उपकारी साबित हुई है | ल्यूकोरिया,पीरियड्स संबन्धित अनियमितताएँ,बांझपन ,रक्ताल्पता आदि लक्षणों मे व्यवहार करने योग्य रामबाण औषधि है|

9.3.17

कलिहारी के आयुर्वेदिक गुण,प्रयोग,उपचार


स्थान:
 यह भारत के प्राय ऊंचे ,उष्ण प्रदेशों मे बंगाल दक्षिण भारत तथा सीलोन मे वरम मे अधिक होता है । म्लाया,चीन,कोचीन तथा अफ्रीका के गरम प्रदेशों में भी विशेष पाया जाता है। औषिधि कार्य मे प्राय इसकी जड़ का उपयोग होता है ।
जड़ के छोटे-छोटे पतले टुकड़े कर 12 या 24 घंटे तक गोमूत्र में डालकर फिर धूप में शुष्क कर लें । अथवा उकत टुकड़ो को नमक मिली हुयी शाश में रात्री के समय भिगो कर दिन मे सूखा लें । इस प्रकार तीन बार करने से वह शुद्ध हो जाता है । इसी शुद्ध कलिहारी का प्रयोग करे ।कलिहारी की गणना उपविष मे की गयी है । इसे बिना शोधन के नहीं खाना चाहिए ।
 
कलिहारी के नाम-
कलिहारी को वातस्नाभ,लांगली,गर्भघातिनी,विशल्य,अनन्ता,
केविका ,हलिनी ,इन्द्र , शूकपुष्पी ,अग्निमुखी आदि नाम से जाना जाता है|इसे मीठा तेलिया भी कहते हैं|
गुण-
कलिहारी कड़वी,कसैली,चरपरी,तीखी और गरम प्रकृति की होती है|इससे कब्ज दूर होता है|यह कुष्ठ,सूजन,अर्श,बवासीर को ठीक करती है इसका अधिक मात्रा मे सेवन गर्भ गिराने वाला होता है|
विभिन्न रोगों मे उपयोग-
गिल्टी,ट्यूमर-
कलिहारी की गांठ का लेप करने से ट्यूमर ठीक होते हैं|
कील या काँटा चुभना-
लोहे की कील,कांटा,पिन या कोई अन्य वस्ती चुभ गई ही तो कलिहारी को पीस कर लेप करना चाहिए|ऐसा करने से दर्द भी दूर होता है और कांटा ,कील पैर मे अंदर टूटकर रह गया हो तो वह भी बाहर आ जाता है|
 
*गाय , बैल आदि के दस्त मे रुकावट हो तो इसके पत्ते कूट कर आटा या दाना पानी मे मिला खिलाना है।
*इसकी जड़ ,धतूरा फल ,स्वरस ओर लहसुन का रस तथा सरसो तेल आधा सेर लेकर यथाविधि तेल सिद्धि कर मालिश करने से वातपीड़ा तथा शोथयुकत गठिया पर शीघ्र लाभ मिलता है ।
भगन्दर रोग का उपचार
कलिहारी की जड़, काले धतूरे की जड़ पानी में पीसकर भगंदर के फोड़े पर लेप करने से भगंदर रोग दस दिन में ठीक हो जाता है ।
*कलिहार की जड़ को पीसकर मधु और काला नमक (पिसा हुआ), इन तीनों का लेप तैयार करके योनि पर लगाने से रुका हुआ मासिक धर्म फिर से प्रारंभ हो जाता है ।
*कलिहारी की जड़ सिरसा के बीज कूट कर मदार का दूध, पीपर, सेंधा नमक को गो मूत्र में पीस कर बवासीर के मस्सों पर दस दिन तक लेप लगाने से रोग ठीक हो जाता है ।
*कलिहारी की जड़ पानी में पीसकर नस्य (नसवार) देने से सांप का जहर समाप्त हो जाता है ।
*कलिहारी की जड़ धतूरे के पंचाड –अफीम, असगंध तमाख जायफल और सोंठ सबको बराबर मात्रा में लेकर, पानी में पीसकर सबसे चारगुना तिल का तेल और तेल से चार गुना पानी डालकर हलकी आंच पर पकाएं । जब पानी पूरी तरह से जल जाये तो उसे नीचे उतारकर छान लें, अब उस तेल को जोड़ों के दर्द पर लगाकर धूप में बैठकर मालिश करने से जोड़ों का दर्द ठीक हो जाता है।
*अगर दाँत मे कीड़े लग गए हो और दर्द बना रहता हो तो कलिहारी मूल को पीसकर हाथ के अंगूठे के नाखून पर चुपड़ देने से दांत दर्द ठीक हो जाता है।

7.3.17

गुडमार के घरेलू आयुर्वेदिक प्रयोग उपचार


    गुड़मार या मेषश्रृंगी एक बहुत उपयोगी जड़ी-बूटी है। आयुर्वेद में इसके पत्तों और जड़ को औषधीय रूप से प्रयोग किया जाता है। जैसा की नाम से ही पता चलता है, यह जड़ी-बूटी गुड़ अर्थात मीठेपन को नष्ट करती है। इसका सेवन मधुमेह में बढ़ी हुई रक्तशर्करा को कम करता है। यह मधुमेह, जिसे डायबिटीज भी कहा जाता है, के उपचार में प्रभावी है। गुड़मार के पत्ते स्वाद में कुछ नमकीन-कड़वे होते हैं तथा इन्हें चबाने पर जीभ की स्वाद करने की क्षमता कुछ समय के लिए नष्ट हो जाती है। इसी कारण इसे मधुनाशनी भी कहा जाता है। इस बेल का नाम गुडमार संभवतः इसलिए पड़ा होगा कि इसे खाने के बाद यदि आप मीठा खाते है तो आपको मीठे स्वाद की अनुभूति नहीं होती. ये गुडमार के सक्रिय तत्व (Gymnemic acid) के कारण होता है जो जीव्हा के उन तंतुओं को थोड़े समय के लिये शिथिल कर देता हैं जो हमें मिठास या कड़वाहट की अनुभूति कराते हैं. इसकी पत्ती को खा लेने पर किसी भी मीठी चीज का स्वाद लगभग एक से दो घंटे तक के लिए समाप्त हो जाता है व गुड़ या चीनी की मिठास पानी के समान स्वादहीन लगती है. इसी प्रकार, इसे खाने के बाद कड़वी चीज़ें भी कड़वी नहीं लगती.यह जड़ी-बूटी बहुत सी एंटी-डायबिटिक दवाओं की एक महत्वपूर्ण घटक है।
 गुड़मार पाउडर Gudmar Leaf Powder के सेवन से शुगर नियंत्रण में रहती है। गुड़मार प्लाज्मा, रक्त, वसा और प्रजनन अंगों पर काम करता है। यह मूत्रल और भूख बढ़ाने वाला है। इसके पत्तों, जड़ के चूर्ण और काढ़े को अकेले ही या अन्य जड़ी-बूटियों के साथ प्रयोग किया जाता है। चरक संहिता के अनुसार, यह स्तन के दूध से दुर्गन्ध को दूर करती है। यह विरेचक है। इसका पौधा, कड़वा कसैला, तीखा, उष्ण, सूजन दूर करने वाला, पीड़ानाशक, पाचक, यकृत टॉनिक, मूत्रवर्धक, उत्तेजक, कृमिनाशक, विरेचक, ज्वरनाशक और गर्भाशय टॉनिक है।
गुड़मार (वानस्पतिक नाम: Gymnema sylvestre ) एक औषधीय पौधा है जो भारत सहित श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान, नेपाल, कोरिया, ताइवान का देशज है. यह बेल (लता) के रूप में होता है. इसमें कोई शक नहीं कि, मीठे कड़वे स्वाद को दबाने वाली गुडमार एक उत्तम योगवाही वनस्पति है. योगवाही का अर्थ है; ऐसी वनस्पति या औषधि जो अन्य आहारों के पाचन (Digestion) को बढ़ाये. A substance that increases bio availability of food. तीसरा, ये मूत्रल (diuretic) भी होती है. इन तीन गुणों के चलते गुडमार का उपयोग औषधियों में उनकी योगवाही क्षमता बढ़ाने व उनके कड़वेपन को कम करने के लिये होता है. 
मूत्रल गुण के कारण इसका उपयोग उच्च रक्तचाप व पथरी इत्यादि रोगों में भी किया जाता है. इसकी जड़ों को विषहर माना जाता है.
‘गुड़मार’ का उपयोग प्राचाीन काल से मधुमेह के रोगियों के लिए किया जाता रहा है। मधुमेह की चिकित्सा में दी जाने वाली आयुर्वेदिक औषधियों में गुड़मार प्रमुख घटक द्रव्य के रूप में प्रयोग में लाया जाता है। मधुमेह के अलावा इक्षुमेह में भी यह लाभ करता है। इस व्याधि में सामान्यतः शर्करा की जिस मात्रा का शरीर में चयापचय हो जाता है तथा पेशाब में शर्करा उत्सर्जित नहीं होती उसी मात्रा में शर्करा तथा स्टार्च का सेवन करने पर पेशाब में शर्करा निकलने लगती है। 
 
मधुमेह रोग होने पर कुछ लक्षण प्रकट होते हैं, जैसे- मुंह सूखना, अधिक प्यास लगना, अधिक भूख लगना, अधिक मात्रा में पेशाब आना ;खास कर रात कोद्ध, शरीर में कमजोरी, थकावट और सुस्ती बनी रहना, शरीर में फोड़े-फुंसी और खुजली होना, आदि। जब रक्त में शर्करा 160-180 उहध् कस के स्तर से अधिक हो जाती है तब यह मूत्र में उत्सर्जित होने लगती है, जिस से जहां पेशाब की जाती है वहां चींटे लगने लगते हैं। पेशाब गाढ़ा और चिपचिपा हो जाता है तथा बार-बार आता है। इन दोनों व्याधियों में ‘गुड़मार’ अर्क के लेने से इन लक्षणों में कमी आती है तथा भोजन से शर्करा बनने की प्रक्रिया पर अंकुश लगता है।
गुड़मार पाउडर के लाभ Health Benefits of Gudmar / Gurmar / Gymnema Powder :
यह पंक्रियास की सेल्स का रीजनरेशन कराती है।
यह शरीर में ग्लोकोज़ के उपयोग को सही करती है।
यह आंत से शुगर के अवशोषण को रोकती है।
यह हृदय के लिए टॉनिक Cardiotonic है।
यह मूत्रल Diuretic है।
यह कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली Hypocholesterolemic और ट्राइग्लिसराइड के लेवल को कम करती है।
यह विरेचक Laxative है।
यह गर्भाशय के लिए टॉनिक Uterotonic है।
यह कफ, पित्त, सांस लेने में तकलीफ, आँखों में दर्द आदि को दूर करती है।
यह सूजन, यकृत-वृद्धि, अपच, कब्ज़, पीलिया, पाइल्स, कृमि ब्रोंकाइटिस, विषम ज्वर, मासिक न आना, पथरी, त्वचा रोग और आँखों के रोगों में प्रयोग की जाती है।
यह डायबिटीजरोधी Antidiabetic है।
यह खून में ग्लूकोज के लेवल को कम करती है।
यह इन्सुलिन बहाव को बढ़ाती है।
यह मोटापा दूर करने वाली Antiobesity हर्ब है।
यह बुखार को कम Antipyretic करती है।
यह कड़वी Bitter है।
 
औषधीय मात्रा Recommended Dosage of Gudmar Leaf powder and Gudmar Root Powder :
गुड़मार की जड़ को अस्थमा, कफ, हृदय के रोग, त्वचा के रोग, पेशाब के रोग, रक्त विकार और प्रमेह के उपचार में प्रयोग किया जाता है।
इसको लेने की औषधीय मात्रा 1-2 ग्राम तथा काढ़े को 30- 50 ml की मात्रा में लिया जा सकता है।
काढ़ा बनाने के लिए 30 -50 g पाउडर को 200 ml पानी में उबाला जाता है जब तक पानी चौथाई रह जाए। इसे फिर छान कर पीया जाता है।
गुड़मार के पत्ते 🌿 
को दर्द, शोष, पाइल्स, अस्थमा, हृदय के रोगों, कफ, कृमि, कुष्ठ, आँखों के रोग, घाव, दांतों के कीड़ों, प्रमेह, और डायबिटीज के उपचार में प्रयोग किया जाता है।
गुड़मार पत्ती को लेने की औषधीय मात्रा 3-6 ग्राम (सूखा पाउडर), १-२ टेबलस्पून (ताज़ी पत्तियां) है।
गुड़मार अर्क - गुड़मार की पत्तियों को चौगुने जल में भिगो कर विशेष विधि से इस का अर्क खींच लिया जाता है। दिन में दो बार डेढ़-डेढ़ तोला की मात्रा में सेवन करने से यह यकृत ;स्पअमतद्ध की शर्करा बनाने की प्रक्रिया का दमन कर रक्त में शर्करा के बढ़े हुए स्तर को कम करता है।
गुड़मार चूर्ण - 
इस की पत्तियों का चूर्ण आधा चम्मच प्रातः सांय शहद या गाय के दूध के साथ दिया जाता है। इस से यकृत की क्रिया में सुधार होता है,  , जिस से अप्रत्यक्ष रूप से यकृत में ग्लूकोज का ग्यायकोजन के रूप में संचय होने की प्रक्रिया तेज हो जाती है।
योग - 
गुड़मार पत्तियॉं 50 ग्राम, ग्राम, जामुन की गुठलियों की मींगी 50 ग्राम, बेल के सूखे पत्ते (बिल्व पत्र) 50 ग्राम तथा नीम की सूखी पत्तियां 50 ग्राम, बबूल की छाल का चूर्ण 20ग्राम , दालचीनी 40ग्राम करेले के बीजों का चूर्ण 20ग्राम , श्यामा तुलसी 20 ग्राम । सब को कूट-पीस कर कपड़-छन कर शीशी में भर लें। बाजार से मिलने वाली हर्बल में तथा औषधि को खरीदते समय , या किसी बगीचे से चयन करते समय उसकी गुणवत्ता का ध्यान रखें|मात्रा - 2-3 ग्राम (लगभग आधा छोटा चम्मच( मात्रा में यह चूर्ण सुबह-शाम जल के साथ फांक लेना चाहिए।
लाभ - 
रक्त में शर्करा बढ़ना या मूत्र में शर्करा जाना, दोनों पर ही यह योग शीघ्र अंकुश लगाता है। अग्नाशय और यकृत पर इस का ऐसा अच्छा प्रभाव पड़ता है कि मधुमेह रोग के दुष्प्रभावों में कमी आती है।
परहेज़ -
 इन औषधियों का सेवन करते समय अगर आप मीठी चीज़ें, खटाई, तले पदार्थ और लाल मिर्च विशेषकर आलू , तथा चावल का प्रयोग कम करते हैं, तो लाभ शीघ्र ही होगा।

3.3.17

रतनजोत के औषधीय प्रयोग,उपयोग,लाभ


रतनजोत पौधा, 
अंग्रेजी में इसे जेट्रोफा कहते है। रतनजोत से बायो डीजल बनता है जो कि पर्यावरण के लिए आशीर्वाद साबित हो सकता है। खासकर के भारत जैसे देश में जहां प्रदूषण का लेवल दिन ब दिन बढ़ता जा रहा है ऐसे में इस पौधे की खेती करना अब अनिवार्य हो गया है। रहा है। यहीं वजह है कि रतनजोत की खेती बढ़ाने के लिए केंद्र और राज्य दोनों सरकारें किसानों को प्रोत्साहित कर रही है। इस पौधे का आयुर्वेद में भी महत्व बताया गया है। औषधी के रुप में ये कई रोगों को मिटाने में कारगर साबित हो रहा है।
*रतनजोत का उपयोग बालों को काला करने के लिए किया जाता है | परन्तु इसका उपयोग मसाले के रूप में भी किया जाता है | रतनजोत को और भी कई नामों से जाना जाता है | जैसे :- लालजड़ी और दामिनी बालछड | अंगेजी भाषा में इस पौधे को onosma भी कहा जाता है | रतनजोत अधिकतर हिमालय के भागों में पाया जाता है | इसका उपयोग आँखों की रौशनी और बालो को काला करने के लिए किया जाता है | तो आइए जानते है कि रतनजोत को कैसे बालों के लिए प्रयोग करें |
* सबसे पहले महंदी का पेस्ट बना लें | इसके बाद इस पेस्ट में रतनजोत मिला लें और गर्म कर लें | जब यह गर्म हो जाये तो ठंडा होने के लिए रख दें | जब यह ठंडा हो जाये तो इसे बालों में लगा लें और कम से कम 15 से 20 मिनट के लिए छोड़ दें | इसके बाद पानी से सिर धो लें |
*जिस तेल का आप प्रयोग करते है | उस तेल में रतनजोत के थोड़े से टुकड़े डालकर अच्छी तरह से मिलाएं | इसके मिलाने से तेल का रंग सुंदर तो होता है | इस तेल को बालों में लगाने से बाल स्वस्थ और काले हो जाते है |
रतनजोत की जड़ के फायदे
·* रतनजोत , एक किलोग्राम सरसों का तेल , मेंहदी के पत्ते , जलभांगर के पत्ते , और आम की गुठलियों को आपस में मिलाकर सरसों के तेल को छोडकर कूट लें | (लेकिन ध्यान रहे कि इन सभी पदार्थों की लगभग 100 – 100 ग्राम की मात्रा ही लेनी है | ) जब यह कूट जाये तो इसे निचोड़ लें | निचोड़ने के बाद इसे सरसों के तेल में इतना उबाल ले कि इसका पानी खत्म हो जाये और केवल तेल बचे | अब इस तेल को छानकर अलग कर लें | इस तरह से यह एक औषधि तैयार है | इस तेल को रोजाना सिर पर लगाने से बाल काले हो जाते है | इस तेल को लगाने के साथ ही साथ कम से कम 250 ग्राम दूध का सेवन करना चाहिए |यह उपचार बेहद कारगर है |वले को पीसकर बारीक़ चूर्ण बना लें | इस चूर्ण में निम्बू का रस और रतनजोत मिलाकर के मिश्रण बनाएं | इस तैयार मिश्रण को बालों में लेप की तरह लगा लें | इस लेप को लगभग १५ से 20 मिनट तक रखें और सिर धो लें | ऐसा करने से बाल काले हो जाते है | आंवला और लौह चूर्ण को आपस में मिलाकर पानी के साथ पीस लें | इसे अपने बालो में लगा लें और कुछ समय बाद सिर धो लें | ऐसा करने से सफेद बाल काले हो जाते है |

बाल झड़ना बंद -
 दही 100 ग्राम ,हल्दी पीसी हुई 10 ग्राम,  काली मिर्च पाँच  ग्राम  और रतनजोत 5  ग्राम  लें | अब इन सभी को आपस में मिलाकर एक मिश्रण बनाएं | इस मिश्रण को सिर में कुछ देर तक लगाकर छोड़ दें और हल्के गर्म पानी से सिर धो लें | इस तरह के उपचार को एक सप्ताह में कम से कम एक बार करें | इससे आपके बालों का झड़ना बंद हो जायेगा और बाल स्वस्थ और काले हो जायेंगे |
स्किन की प्रोब्लम-
*पौधे की जड़ को पीसकर पावडर बना लें | इस पावडर को रोजाना सुबह और शाम लगभग आधे ग्राम की मात्रा में सेवन करें | इस उपचार को करने से स्किन की प्रोब्लम दूर हो जाती है |
हृदय रोग-

*· रतनजोत के पौधे की पत्तियों की चाय बनाकर पीने से दिल से जुडी हुई बीमारी नही होती |
दाद , खुजली
* रतनजोत की ताज़ी पत्तियों का सेवन करने से खून का शुद्धिकरण होता है | इसके आलावा रतनजोत का उपयोग से स्किन पर होने वाले दाद , खुजली से छुटकारा मिल जाता है |
पथरी-
 जिसे पथरी की समस्या है , उसे नियमित रूप से रतनजोत के पत्तों का काढ़ा बनाकर पीना चाहिए | इस उपचार को करने से गुर्दे की पथरी ठीक हो जाती है |
 डिप्रेशन -

* रतनजोत को थोडा सा घिस लें | इस घिसे हुए रतनजोत को अपने माथे पे लगायें | इस उपचार को करने से डिप्रेशन नही होता और मानसिक क्षमता बढती है |
स्किन का रुखापन -

* रतनजोत को बारीक़ पीस लें | इसे तेल में डाल दें | इस तैयार तेल से अपने शरीर की मालिश करें | ऐसा करने से स्किन का रुखापन दूर हो जाता है |
रतनजोत के और भी अन्य उपाय निम्नलिखित है :-
·
मिर्गी और दौरे -
* रतनजोत के पौधे की जड़ को पीसकर बारीक कर लें | जिन लोगों को मिर्गी या दौरे पड़ते हों ,उन्हें इस बारीक़ चूर्ण की एक ग्राम की मात्रा को सुबह के समय और शाम के समय खिलाएं | इस उपचार को लगातार करने से मिर्गी और दौरे की समस्या दूर हो जाती है |
*इसके फूल और तने औषधीय गुणों के लिये जाने जाते हैं।
*इसकी पत्तियां घाव पर लपेटने (ड्रेसिंग) के काम आती हैं।
*इसके अलावा इससे चर्मरोगों की दवा, कैंसर, बाबासीर, ड्राप्सी, पक्षाघात, सर्पदंश, *मच्छर भगाने की दवा तथा अन्य अनेक दवायें बनती हैं।
*कब्ज या पेट से जूडी बिमारीयों के लिए रतनजोत का बीज वरदान है।
*इसके छाल और जड़ो से ‘डाई’ और मोम बनायी जा सकती है।

24.2.17

गले की खराश के उपचार,उपाय ,नुस्खे

  

   मौसम बदलते ही गले में खराश होना आम बात है। सामान्य शब्दों में गले में खराश, गले का संक्रमण है। आमतौर पर गले का संक्रमण वायरस या बैक्टीरिया के कारण होता है।
लेकिन ज्यादा गले की खराश वायरस के कारण होती है। यह कुछ समय बाद अपने आप ठीक हो जाता है लेकिन यह जितने दिन रहता है काफी कष्ट देता है।
गले में खराश के लक्षण-- 
● 100.5 ड्रिगी F या 38 ड्रिगी सेल्सियस से अधिक बुख़ार होना
 ● गर्दन में सूजन होना
 ● गले में दर्द होन 
●निगलने में कठिनाई होना 
● पेट में दर्द होना 
● भूख न लगना होना
. भाप लेना
कई बार गले के सूखने के कारण भी गले में इंफेक्शन की शिकायत होती है। ऐसे में किसी बड़े बर्तन में गरम पानी करके तौलिया से मुंह ढककर भाप लें। ऐसा करने से भी गले की सिकाई होगी और गले का इंफेक्शन भी खत्म होगा। इस क्रिया को दिन में दो बार किया जा सकता है।
एंटी-इन्‍फ्लेमेटरीज
गले की खराश से निपटने के सबसे कारगर उपायों में से एक शायद आपके पास पहले से मौजूद हो। ये एंटी-इन्‍फ्लेमेटरीज दवायें दर्द तो दूर करती ही हैं साथ ही गले की सूजन और दर्द से भी राहत दिलातीं हैं। इन दवाओं के सेवन के बाद आप पहले से बेहतर महसूस करते हैं साथ ही यह आपके गले में होने वाली परेशानी को कम करने में मदद करती हैं।
जिन व्यक्तियों के गले में निरंतर खराश रहती है या जुकाम में एलर्जी के कारण गले में तकलीफ बनी रहती है, वह सुबह-शाम दोनों वक्त चार-पांच मुनक्का के दानों को खूब चबाकर खा लें, लेकिन ऊपर से पानी ना पिएं। दस दिनों तक लगातार ऐसा करने से लाभ होगा।
तरल पदार्थों का सेवन
हाइड्रेटेड रहें। शरीर में तरल पदार्थों की कमी, आपकी तकलीफ को बढ़ा सकती हैं। आपको बहुत मात्रा में पानी पीना चाहिए। इससे आपका मूत्र हल्‍का पीला अथवा बिल्‍कुल साफ रहेगा। यह आपकी श्‍लेष्‍मा झिल्‍ली को तर और बैक्‍टीरिया और अन्‍य एलर्जी पहुंचाने वाले तत्‍वों को दूर रखेगा। इससे आपका शरीर सर्दियों के लक्षणों से बेहतर तरीके से लड़ सकेगा। आप क्‍या पीना चाहते हैं यह पूरी तरह आप पर निर्भर करता है। पानी सबसे बेहतर है, लेकिन आप चाहें तो फ्रूट जूस भी पी सकते हैं।
.लाल मिर्च 
गले की खराश को ठीक करने के लिए लाल मिर्च भी बेहद फायदेमंद है। उपचार के लिए एक कप गरम पानी में एक चम्मच लाल मिर्च और एक चम्मच शहद मिलाकर पीएं।
*कच्चा सुहागा आधा ग्राम मुंह में रखें और उसका रस चुसते रहें। दो तीन घण्टों मे ही गला बिलकुल साफ हो जाएगा।
चिकन सूप
अगर आप मांसाहारी हैं, तो चिकन सूप आपके लिए काफी फायदेमंद रहेगा। यह गले की खराश और सूजन में काफी मदद करता है। शोरबे में मौजूद सोडियम में सूजन को कम करने वाले तत्त्‍व होते हैं। जब आप बीमार होते हैं, तो सूप का आपको अधिक फायदा मिलता है। जब गले में सूजन और दर्द हो, तो वहां से कुछ भी नीचे नहीं उतरता। ऐसे में सूप के रूप में जरूरी पोषक तत्‍व आपके शरीर में पहुंच जाते हैं। इससे आपको संक्रमण से लड़ने के लिए जरूरी ऊर्जा मिल जाती है।
*सोते समय एक ग्राम मुलहठी की छोटी सी गांठ मुख में रखकर कुछ देर चबाते रहे। फिर मुंह में रखकर सो जाए। सुबह तक गला साफ हो जायेगा। मुलहठी चूर्ण को पान के पत्ते में रखकर लिया जाय तो और भी अच्छा रहेगा। इससे सुबह गला खुलने के साथ-साथ गले का दर्द और सूजन भी दूर होती है।
कफ ड्रॉप
कफ ड्रॉप को चूसना आपके लिए फायदेमंद हो सकता है। गोली चूसने से सेल्विया का निर्माण होता है, जो गले के अंदर जाकर वहां मौजूद खुशकी को दूर करता है। लेकिन, आपको ध्‍यान रखना चाहिए कि आप सख्‍त कैंडी का इस्‍तेमाल करें। आप ऐसे ब्रॉन्‍ड का इस्‍तेमाल कर सकते हैं, जो मैंथॉल अथवा मिंट से बनीं हों।
*रात को सोते समय सात काली मिर्च और उतने ही बताशे चबाकर सो जायें। बताशे न मिलें तो काली मिर्च व मिश्री मुंह में रखकर धीरे-धीरे चूसते रहने से बैठा गला खुल जाता है।
लौंग
लौंग का इस्तेमाल उपचार के लिए सदियों से होता आ रहा है। गले की खराश के उपचार के लिए लौंग को मुंह में रखकर धीरे धीरे चबाना चाहिए। लौंग एंटीबैक्टीरियल गुणों से भरपूर होती है जो गले के इंफेक्शन और सूजन को दूर करती है।
लाल मिर्च (Red chilli)-
गले की खराश को ठीक करने के लिए लाल मिर्च भी बेहद फायदेमंद है। उपचार के लिए एक कप गरम पानी में एक चम्मच लाल मिर्च और एक चम्मच शहद मिलाकर पीएं।
 अदरक
अदरक भी गले की खराश की बेहद अच्छी दवा है। अदरक में मौजूद एंटीबैक्टीरियल गुण गले के इंफेक्शन और दर्द से राहत देते हैं। गले की खराश के उपचार के लिए एक कप पानी में अदरक डाल कर उबालें। इसके बाद इसे हल्का गुनगुना करके इसमें शहद मिलाएं। इस पेय को दिन में दो से तीन बार पीएं। गले की खराश से आराम मिलेगा।
गरम पानी और नमक के गरारे
जब गले में खराश होती है तो सांस झिल्ली की कोशिकाओं में सूजन हो जाती है। नमक इस सूजन को कम करता है जिससे दर्द में राहत मिलती है। उपचार के लिए एक गिलास गुनगुने पानी में एक बड़ा चम्मच नमक मिलाकर घोल लें और इस पानी से गरारे करें। इस प्रक्रिया को दिन में तीन बार करें।
बेकिंग सोडा (Baking soda)-
गले की खराश दूर करने के लिए बेकिंग सोडा की चाय बेहद फायदेमंद है। कारण, बेकिंग सोडा में एंटी बैक्टीरियल (antibacterial) गुण होते हैं जो कि जीवाणुओं को नष्ट कर देते हैं। इसके लिए एक गिलास गरम पानी में बेकिंग सोडा और नमक मिलाकर दिन में तीन बार गरारे करें।
मसाला चाय
लौंग, तुलसी, अदरक और काली मिर्च को पानी में डालकर उबालें, इसके बाद इसमें चाय पत्ती डालकर चाय बनाएं। इस चाय को गरम गरम ही पीएं। यह भी गले के लिए बेहद लाभदायक उपाय है जिससे गले में तुरंत आराम मिलता है।
लहसुन
लहसुन इंफेक्शन पैदा करने वाले जीवाणुओं को मार देता है। इसलिए गले की खराश में लहसुन बेहद फायदेमंद है। लहसुन में मौजूद एलीसिन जीवाणुओं को मारने के साथ ही गले की सूजन और दर्द को भी कम करता है। उपचार के लिए गालों के दोनों तरफ लहसुन की एक एक कली रखकर धीरे धीरे चूसते रहें। जैसे जैसे लहसुन का रस गले में जाएगा वैसे वैसे आराम मिलता रहेगा।
*काली मिर्च को 2 बादाम के साथ पीसकर सेवन करने से गले के रोग दूर हो जाते हैं।
*पानी में 5 अंजीर को डालकर उबाल लें और इसे छानकर इस पानी को गर्म-गर्म सुबह और शाम को पीने से खराब गले में लाभ होता है।
*गले में खराश होने पर सुबह-सुबह सौंफ चबाने से बंद गला खुल जाता है।

*1 कप पानी में 4-5 कालीमिर्च एवं तुलसी की थोंडी सी पत्तियों को उबालकर काढ़ा बना लें और इस काढ़े को पी जाए।
*रात को सोते समय दूध और आधा पानी मिलाकर पिएं। गले में खराश होने पर गुनगुना पानी पिएं।
*गुनगुने पानी में सिरका डालकर गरारे करने से भी गले के रोग दूर हो जाते है।
*पालक के पत्तों को पीसकर इसकी पट्टी बनाकर गले में बांधे। इस पट्टी को 15-20 मिनट के बाद खोल दें। इससे भी आराम मिलता है।

21.2.17

विदारीकंद के गुण ,औषधीय उपयोग





विदारीकंद (Vidarikand) का प्रयोग निम्नलिखित बीमारियों, स्थितियों और लक्षणों के उपचार, नियंत्रण, रोकथाम और सुधार के लिए किया जाता है:
बाल समस्याओं
त्वचा रोगों
नेत्र संक्रमण
एसिडिटी
रक्ताल्पता
पोस्ट वितरण गर्भाशय दर्द
मासिक धर्म संबंधी विकार
रजोनिवृत्ति सिंड्रोम
गर्भाशय कमजोरी
रक्तस्राव विकार
अत्यधिक गर्मी
आयुर्वेद के द्वारा यौन रोग, यौन दुर्बलता, आंशिक व नपुंसकता का सही रूप से इलाज किया जा सकता है।  

आयुर्वेद के अंदर मुख्य चिकित्सा ग्रंथ चरक संहिता, सुश्रुत संहिता में संभोग शक्ति को बढ़ाने जैसे कार्य करने के अंदर आने वाला यौन विकार व यौन दुर्बलता से संबंध रखने वाले सभी कारण तथा अलग-अलग परिस्थितियों में अलग-अलग तरह की औषधि से इलाज करना बताया गया है। यदि यौन दुर्बलता का पूरे भरोसे व शांति के साथ इसका उपचार किया जाए तो इसका सम्पूर्ण इलाज किया जा सकता है।
*शीघ्रपतन की समस्या होने पर 50 ग्राम गोखरू, 50 ग्राम ताल मखाना, 50 ग्राम सतावर, 50 ग्राम विदारीकन्द, 50 ग्राम अश्वगंधा, 50 ग्राम विधारा, 50 ग्राम सफ़ेद चिरमिटी, 100 ग्राम मिश्री को मिलाकार बारीक़ चूर्ण बना लें. इस चूर्ण को 4-5 की मात्रा में सुबह नाश्ते और रात्रि भोजन के बाद लगातार 40 दिनों तक लेने से शीघ्रपतन की समस्या में लाभ मिलता है
*विदारीकन्द का चूर्ण 2.5 ग्राम को गूलर के 15 मिली रस में मिलाकर सुबह शाम दूध से लेने पर दीर्घ आयु पुरुष भी मैथुन में सक्षम हो जाते हैं !
*विदारीकन्द का चूर्ण 2.5 ग्राम को गूलर के 15 मिली रस में मिलाकर सुबह शाम दूध से लेने पर अधिक उम्र वाले पुरुष भी मैथुन में सक्षम हो जाते हैं !
:  

*लगभग 6 ग्राम की मात्रा में विदारीकन्द के चूर्ण को लगभग 10 ग्राम गाय के घी में और लगभग 20 ग्राम शहद में मिलाकर गाय के दूध के साथ लेने से शरीर में ताकत आती है। इसका सेवन लगातार 40 दिनों तक करना चाहिए।
वे आयुर्वेदिक योग जो यौन दौर्बल्य व नपुंसकता की स्थिति नही आने देते वाजीकारक योग कहलाते हैं।
वैद्यक चमत्कार चिन्तामणि नामक पुस्तक के अनुसार
सुन्दरि विदारिकायाः सम्यक् स्वरसेन भवति चूर्णम।
सर्पिः क्षौद्रसमेतं लीढ्वा रसिको दशांगना समयेत्।।

अर्थात विदारीकन्द को कूट पीस कर खूब बारीक चूर्ण करके इसे विदारीकन्द के ही रस में भिगो कर सुखा लें इस चूर्ण की एक चम्मच मात्रा में आधा चम्मच देशी घी और घी से तीन गुना यानि कि ढेड़ चम्मच शहद मिला कर चाट लें और ऊपर से एक गिलास मीठा कुनकुना दूध पी लें।इस प्रकार लगातार 60 दिन सेवन करने के उपरान्त यौन दौर्बल्य व नपुंसकता अवस्य ही मिट जाएगी।जो लोग शादी शुदा हैं उनके लिए यह योग नव यौवन प्रदान करने वाला है। यह बहुत ही सस्ता बनाने में सरल व शरीर को मजबूत व टिकाऊ बना देने वाला योग है ।

19.2.17

इमली के गुण,औषधीय उपयोग

   
 भारत में सभी गांवों में खूब ऊंचे, हरे-भरे फली से लदे झाड़ नजर आते है, जो 70-80 फुट तक ऊंचे रहते हैं। चारों ओर इसकी टहनियां होती है। इसके पत्ते हरे, छोटे और संयुक्त प्रकार के होते हैं। ये पत्ते खाने में खट्टे होते हैं। इसके पत्ते और फूल एक ही समय में आते हैं, इनसे झाड़ों की रौनक और भी बढ़ जाती है। इसकी झाड़ लंबी अवधि का दीर्घायु होती है। इसके सभी भागों का औषधि के रूप में उपयोग होता है। इमली का फल कच्चा हरा, पकने के बाद लाल रंग का हो जाता है। पकी इमली का स्वाद खट्टा-मीठा होता है। इसे खाने के बाद दांत तक खट्टे होने लगते हैं। एक इमली के फल में तीन से लेकर दस बीज निकलते हैं। ये बीज काले, चमकदार व बहुत कड़े होते हैं। पकी इमली का प्रयोग खट्टी सब्जी के लिये करते है। इसकी चटनी भी बनाते हैं। इससे सब्जी स्वादिष्ट बन जाती है। एक साल पुरानी इमली के गुण अधिक होते हैं। कच्ची तथा नयी पकी इमली कम गुणकारी होती है। कच्ची इमली खट्टी, भारी व वायुनाशक होती है। पकी इमली एसीडिटी कम करने वाली, कान्स्टीपेशन दूर करने वाली, गर्म तासीर वाली, कफ तथा वायुनाशक प्रकृति की होती है। सूत्री इमली हृदय के लिए हितकारी तथा हल्की तासीर की मानी जाती है। इससे थकान, भ्रम-ग्लानि दूर हो जाती है। इमली पित्तनाशक है, इमली के पत्ते सूजन दूर करने वाले गुणों से भरपूर होते हैं। इमली की तासीर ठंडी होती है। इसे कम प्रमाण में ही सेवन करने का फायदा होता है।
बहुमूत्र या महिलाओं का सोमरोग :
इमली का गूदा ५ ग्राम रात को थोड़े जल में भिगो दे, दूसरे दिन प्रातः उसके छिलके निकालकर दूध के साथ पीसकर और छानकर रोगी को पिला दे । इससे स्त्री और पुरुष दोनों को लाभ होता है । मूत्र- धारण की शक्ति क्षीण हो गयी हो या मूत्र अधिक बनता हो या मूत्रविकार के कारण शरीर क्षीण होकर हड्डियाँ निकल आयी हो तो इसके प्रयोग से लाभ होगा ।
अण्डकोशों में जल भरना :
लगभग ३० ग्राम इमली की ताजा पत्तियाँ को गौमूत्र में औटाये । एकबार मूत्र जल जाने पर पुनः गौमूत्र डालकर पकायें । इसके बाद गरम – गरम पत्तियों को निकालकर किसी अन्डी या बड़े पत्ते पर रखकर सुहाता- सुहाता अंडकोष पर बाँध कपड़े की पट्टी और ऊपर से लगोंट कस दे । सारा पानी निकल जायेगा और अंडकोष पूर्ववत मुलायम हो जायेगें ।
पीलिया या पांडु रोग :
इमली के वृक्ष की जली हुई छाल की भष्म १० ग्राम बकरी के दूध के साथ प्रतिदिन सेवन करने से पान्डु रोग ठीक हो जाता है।
आग से जल जाने पर :
इमली के वृक्ष की जली हुई छाल की भष्म गाय के घी में मिलाकर लगाने से, जलने से पड़े छाले व् घाव ठीक हो जाते है ।
पित्तज ज्वर :
इमली २० ग्राम १०० ग्राम पाने में रात भर के लिए भिगो दे। उसके निथरे हुए जल को छानकर उसमे थोड़ा बूरा मिला दे। ४-५ ग्राम इसबगोल की फंकी लेकर ऊपर से इस जल को पीने से लाभ होता है।


सर्प , बिच्छू आदि का विष :
इमली के बीजों को पत्थर पर थोड़े जल के साथ घिसकर रख ले। दंशित स्थान पर चाकू आदि से छत करके १ या २ बीज चिपका दे। वे चिपककर विष चूसने लगेंगे और जब गिर पड़े तो दूसरा बीज चिपका दें। विष रहने तक बीज बदलते रहे ।
खांसी :
टी.बी. या क्षय की खांसी हो (जब कफ़ थोड़ा रक्त आता हो) तब इमली के बीजों को तवे पर सेंक, ऊपर से छिलके निकाल कर कपड़े से छानकर चूर्ण रख ले। इसे ३ ग्राम तक घृत या मधु के साथ दिन में ३-४ बार चाटने से शीघ्र ही खांसी का वेग कम होने लगता है । कफ़ सरलता से निकालने लगता है और रक्तश्राव व् पीला कफ़ गिरना भी समाप्त हो जाता है 
ह्रदय में जलन :
पकी इमली का रस मिश्री के साथ पिलाने से ह्रदय में जलन कम हो जाती है ।
नेत्रों में गुहेरी होना :
इमली के बीजों की गिरी पत्थर पर घिसें और इसे गुहेरी पर लगाने से तत्काल ठण्डक पहुँचती है ।
चर्मरोग :
लगभग ३० ग्राम इमली (गूदे सहित) को १ गिलाश पानी में मथकर पीयें तो इससे घाव, फोड़े-फुंसी में लाभ होगा ।
उल्टी होने पर पकी इमली को पाने में भिगोयें और इस इमली के रस को पिलाने से उल्टी आनी बंद हो जाती है ।
भांग का नशा उतारने में :
नशा उतारने के लिये शीतल जल में इमली को भिगोकर उसका रस निकालकर रोगी को पिलाने से उसका नशा उतर जाएगा ।
खूनी बवासीर :
इमली के पत्तों का रस निकालकर रोगी को सेवन कराने से रक्तार्श में लाभ होता है ।
अगर किसी को चेचक हो गयी हो तो इमली के पत्ते और हल्दी को पानी में पीस कर शरबत बनाएं और रोगी को चीनी या नमक मिला कर पिला देने से बहुत आराम मिलता है।
शीघ्रपतन :
लगभग ५०० ग्राम इमली ४ दिन के लिए जल में भिगों दे । उसके बाद इमली के छिलके उतारकर छाया में सुखाकर पीस ले । फिर ५०० ग्राम के लगभग मिश्री मिलाकर एक चौथाई चाय की चम्मच चूर्ण (मिश्री और इमली मिला हुआ) दूध के साथ प्रतिदिन दो बार लगभग ५० दिनों तक लेने से लाभ होगा ।
*लगभग ५० ग्राम इमली, लगभग ५०० ग्राम पानी में दो घन्टे के लिए भिगोकर रख दें उसके बाद उसको मथकर मसल लें । इसे छानकर पी जाने से लू लगना, जी मिचलाना, बेचैनी, दस्त, शरीर में जलन आदि में लाभ होता है तथा शराब व् भांग का नशा उतर जाता है । हँ का जायेका ठीक होता है ।
 
वीर्य – पुष्टिकर योग :
इमली के बीज दूध में कुछ देर पकाकर और उसका छिलका उतारकर सफ़ेद गिरी को बारीक पीस ले और घी में भून लें, इसके बाद सामान मात्रा में मिश्री मिलाकर रख लें । इसे प्रातः एवं शाम को ५-५ ग्राम दूध के साथ सेवन करने से वीर्य पुष्ट हो जाता है । बल और स्तम्भन शक्ति बढ़ती है तथा स्व-प्रमेह नष्ट हो जाता है ।
शराब एवं भांग का नशा उतारने में : नशा समाप्त करने के लिए पकी इमली का गूदा जल में भिगोकर, मथकर, और छानकर उसमें थोड़ा गुड़ मिलाकर पिलाना चाहिए ।
*इमली के गूदे का पानी पीने से वमन, पीलिया, प्लेग, गर्मी के ज्वर में भी लाभ होता है ।
ह्रदय की दाहकता या जलन को शान्त करने के लिये पकी हुई इमली के रस (गूदे मिले जल) में मिश्री मिलाकर पिलानी चाहियें ।
कान दर्द कर रहा हो तो इमली के गूदे का दो चम्म्च रस ४ चम्म्च तिल के तेल में मिला कर पका कर रख लीजिये। अब इस तेल को कान में डालिये।
बदन में कहीं खुजली हो रही हो तो इमली केपत्तों का रस लगा सकते हैं।
लू-लगना :
पकी हुई इमली के गूदे को हाथ और पैरों के तलओं पर मलने से लू का प्रभाव समाप्त हो जाता है । यदि इस गूदे का गाढ़ा धोल बालों से रहित सर पर लगा दें तो लू के प्रभाव से उत्पन्न बेहोसी दूर हो जाती है ।
चोट – मोच लगना :
 
इमली की ताजा पत्तियाँ उबालकर, मोच या टूटे अंग को उसी उबले पानी में सेंके या धीरे – धीरे उस स्थान को उँगलियों से हिलाएं ताकि एक जगह जमा हुआ रक्त फ़ैल जाए ।
हड्डी टूट गयी हो तो इमली के गुदे को तिल के तेल के साथ मिला कर पेस्ट बताएं और लेप कर दें ,हर चार घंटे पर लेप बदल दीजिये। ५ दिन यह लेप लगा रहेगा तो हड्डी जुड़ जायेगी।
गले की सूजन :
इमली १० ग्राम को १ किलो जल में अध्औटा कर (आधा जलाकर) छाने और उसमें थोड़ा सा गुलाबजल मिलाकर रोगी को गरारे या कुल्ला करायें तो गले की सूजन में आराम मिलता है ।
सांप या किसी जहरीले जीव ने काट लिटा है तो १६० ग्राम इमली के पत्तों का रस २५ ग्राम सेंधा नमक मिलकर पी लेने से जहर निष्प्रभावी हो जाएगा।
इमली में साइट्रिक एसिड ,टार्टरिक एसिड, पोटैशियम बाई टारटरेट ,फास्फोटिडिक एसिड, इथाइनोलामीन , सेरिन, इनोसिटोल, अल्केलायड, टेमेरिन , केटेचिन, बाल सेमिन, पालीसैकेराइड्स, नॉस्टार्शियम आदि तत्व पाये जाते हैं.यही कारण है कि इमली अधिक खा लेने से तेज़ाब का काम करती है और हमारी त्वचा और गुणसूत्रों को सीधे प्रभावित करती है।